ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वृजांगनाएं प्रेमवश होकर । मनमें स्मरण कर निरन्तर । पार्थ वे सब मुझसे मिलकर । मद्रूप हो गयीं ॥ ३४ ॥ वैसे ही भयके करण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड बैर धर मन । कंस चेद्यादि ॥ ६५ ॥ ममत्वसे भी भक्त मुझे मिलते हैं— आप्तत्वसे हैं पांडव । संगसे सब यादव । ममत्वसे वसुदेव । तथा अन्य भी सब ॥ ६६ ॥ नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार । भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुवा प्राप्त ॥ ६७ ॥ वृजांगनाओंको कामसे । कंसको भय संभ्रमसे । धातुक मनके धर्मसे । शिशुपालादिकको ॥ ६८ ॥ सब पंथोंका एक स्थान । होना है मुझमें विलीन । सभक्ति विषय भंजन । या विराग वैसे ॥ ६९ ॥ इसलिए हे अर्जुन । होने मुझमें विलीन । उपायोंका जो बंधन । नहीं है कोई ॥ ४७० ॥ तथा किसी कुलमें होना जनन । करें प्रेम-वैर अथवा भजन । किंतु भक्त या शत्रु होना अर्जुन । एकमात्र मेरा ही ॥ ७१ ॥ किसी रूपमें सतत । होना है मुझमें रत । मद्रूप होना निश्चित । स्वाभाविक ॥ ७२ ॥ वैसे ही पाप योनी भी अर्जुन । क्षत्रिय वैश्य शूद्र औ' अंगना । भजकर मुझे मेरे सदन । पायेंगे ही ॥ ७३ ॥ वर्णमें हैं जो छत्र चामर । स्वर्ग है जिनका अग्रहार । मंत्र है जिनका मातृघर । वे हैं ब्राह्मण ॥ ७४ ॥ बसता जहाँ अखंड याग । तथा हैं जो वेदोंका वस्त्रांग । जिनकी दृष्टिका है उत्संग । बढाता मांगल्य ॥ ७५ ॥ जो हैं पृथ्वी तलके देव । तपावतार जो सवयव । सकल तीर्थोंका जो है दैव । उदित हुआ है ॥ ७६ ॥ २९१ राज-विद्या-समर्पणयोग
जिनकी आस्था है शीतल । बढाती सत्कर्मकी वेल । सत्य है जीवित केवल । उनके संकल्पसे ॥ ७७ ॥ किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥ सबके लिए मेरा द्वार खुला है— आशिर्वादसे उनके । बने आयुष्य अग्निके । दिया सिंधुने उनके । प्रेमसे नीर ॥ ७८ ॥ मैंने किया लक्ष्मीको कुछ दूर । लिया हाथ कौस्तुभ उठाकर । बढाया हृदय आगेकी ओर । चरण रजके लिए ॥ ७९ ॥ अब तक वह पद मुद्रा । हृदयपे धरी है सु-भद्र । अपने ही ऐश्वर्य समुद्र । रक्षा हेतु ॥ ४८० ॥ जिनका क्रोध है अर्जुन । कालाग्निका वसतिस्थान । उनका प्रसाद महान । देता सर्व-सिद्धि ॥ ८१ ॥ ऐसे पुण्य-पूज्य जो ब्राह्मण । मुझमें होते अति निपुण । होके नित मत्परायण । यह क्या कहना ? ॥ ८२ ॥ चंदन-वृक्षके समीप होनेसे । तथा उनके पवनके स्पर्शसे । निर्जीव नीम भी हुआ योग्यतासे । चढा प्रभु मस्तक पर ॥ ८३ ॥ फिर चंदन वहां न पहुंचेगा । इस बातको मन कैसे मानेगा । अथवा चंदन वहां पहुंचेगा । यह कहना पडे क्यों ? ॥ ८४ ॥ शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर । धारण किया जो निरंतर । अर्ध चन्द्र ही ॥ ८५ ॥ जहां शीतलतामें अप्रतिम । सुवासमें चंद्रसे भी उत्तम । ऐसा चंदन क्यों न सर्वोत्तम । लगायें सर्वांगपे ॥ ८६ ॥ वहां ब्रह्मर्षि राजर्षि इनकी बात क्या रही । भज तू मुझ आया है दुखी नश्वर लोकमें ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी २९२
रथ्योदक हो जहां गंगा-शरण । करते हैं सागरोदक वरण । वहां जान्हवीकी समरस पूर्ण । अन्य गति कैसी ॥ ८७ ॥ इसलिए राजऋषि हो या ब्राह्मण । उनकी गति मति मैं ही हूँ शरण । उनका त्रिशुद्धि पूर्वक है निर्वाण । स्थिति-गति मैं हूँ ॥ ८८ ॥ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर मूर्खता-- बैठकरके शत-जर्जर नावमें । होता कैसे कहो निश्चित मनमें । या विवश हो जीना कैसे रणमें । शत संवत्सर ॥ ८९ ॥ पडता जहाँ पाषाण शरीर पर । न रखें ढाल कहो बीचमें क्योंकर । रहे कैसे उदास हो रोग-जर्जर । शरीर औषधसे ॥ ४९० ॥ भड़की जहां चहूं ओर आग । न जाय कैसे बचाकर भाग । कष्टमें नित न हो सानुराग । मुझे न भजे कैसे ॥ ९१ ॥ नहीं लगे मेरे भजनमें । ऐसा क्या सामर्थ्य है जनमें । विश्वास घरमें या भोगमें । है उनके ॥ ९२ ॥ या विद्याका या आयुका । ऐसा कौनसा प्राणियोंका । है मुझे न भजनेका । कहो सुखाधार ॥ ९३ ॥ मिलता है जितना भोग्य-जात । वह है केवल शरीर हित । ओ' शरीर रहता है सतत । मृत्युके मुखमें ॥ ९४ ॥ अजी ! दुःखका माल आयात होता । हाठमें मृत्युके तौलसे तुलता । उस मृत्युलोकमें आना पडता । अन्तिम हाठमें ॥ ९५ ॥ अब सुखका जीवित । कैसे मिले पांडुसुत । फूंककर राख जोत । जलेगी कैसे ॥ ९६ ॥ अजी ! विषकंद पीसकर । उसका रस निचोडकर । उसे नाम अमृत देकर । अमर हो कैसे ॥ ९७ ॥ ऐसे हैं विषयोंका सुख । केवल है परम दुःख । सेवन करते हैं मूर्ख । जीव भावसे ॥ ९८ ॥ २९३ राज-विद्या-समर्पणयोग
अथवा काटकर अपना शिर । करना पैर तलके उपचार । ऐसा है मृत्यु लोकका व्यवहार । भला है सतत ॥ ९९ ॥ मृत्युलोकमें कहानी सुखकी । श्रवण करना सभी व्यथाकी । जहाँ शैया ही अग्नि-स्फुलिंगकी । सुख-निद्रा कैसी ॥ ५०० ॥ क्षयरोगी होता चन्द्र जिस लोकका । अस्तार्थ उदय होता रवि जहांका दुःख आता है आवरणमें सुखका । छलनेके लिए ही ॥ १ ॥ जहां फूटते ही मांगल्यका अंकुर । पडते अमंगल कीट उसपर । पडता जहां मृत्यु पाश भयंकर । गर्भमें ही ॥ २ ॥ मिलना नहीं जो उसका चिंतन । मिले तो करते गंधर्व हरण । जाता उसका न होता आकलन । कहां और कैसे ॥ ३ ॥ अजी ! खोल जब सब ही पथ । लौटा पदचिह्न न देख पार्थ । मिलता सब मृतकोंका कथित । पुराणोंमें जहाँ ॥ ४ ॥ यहाँकी अनित्यताकी महती । ब्रह्मकी आयुतक पहुँचती । नश्वरताकी है कितनी व्याप्ति । स्वस्थ चित्त सुन तू ॥ ५ ॥ सुन ऐसे लोगोंका बर्ताव । जबसे जन्म लिये ये जीव । उनकी निश्चिंतता वैभव । कौतुकास्पद ॥ ६ ॥ जहां होता इह परका लाभ । वहां धरते कवडीका लोभ । तथा होता जहां विनाश सब । खरचते हैं करोडों ॥ ७ ॥ उलझता जो विषय भोगमें । सुखी कहलाता इस लोकमें । गडा जाता है जो महा-लोभमें । वह है महा-ज्ञानी ॥ ८ ॥ जिसका रहा अल्प जीवन । हुआ सब बल-बुद्धि जीर्ण । उसके पकडते चरण । वृद्ध कहकर ॥ ९ ॥ जैसा होता बालकका विकास । माता-पिता नाचते स-उल्लास । अंदरसे होता जीवन ह्रास । इसका नहीं खेद ॥ ५१० ॥ जो जन्मके दिवस दिवस-से । चलता मृत्यु दिशामें गतिसे । करते शुभोत्सव उल्लाससे । वृद्धि-दिवस मानकर ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी २९४
अजी ! मृत्यु यह शब्द न सहते । मरने पर जो रुदन करते । तथा आयुष्य व्यर्थ ही खोते । मूर्खताओंमें ॥ १२ ॥ निगलता है सांप मेंढकको । मेंढक जीभ चाटता है कीटकको । औ' प्राणि किस लोभसे किसको । बढाता तृष्णा ॥ १३ ॥ अजी ! यह है सब अनिष्ट । मृत्यु लोकका सब उलट । यहां अर्जुन तू अवघट । जन्म लिया है ॥ १४ ॥ तू इससे दूर रह कर मेरी भक्ति कर - तू हो दूर इससे अलग । मेरी भक्तिके पथमें लग । पायेगा तू जिससे अव्यंग । निजधाम मेरा ॥ १५ ॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥ मनको तू मद्रूप कर । मेरी भक्तिमें डूब कर । सर्वत्र कर नमस्कार । एक मुझको ॥ १६ ॥ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब कुछ मुझे समर्पण करना - कर तू सतत मेरा अनुसंधान । उससे होगा संकल्प-बीज दहन । इसको कहते हैं भगवद्भजन । पांडुकुमार ॥ १७ ॥ होगा तू इससे मम-योग संपन्न । तब रहेगा मेरे स्वरूपमें लीन । यह मेरे अंतःकरणका वचन । कहा तुमसे ॥ १८ ॥ सबसे छिपाई बात । हुई अब तुझे प्राप्त । उससे हो तू सुखी शाश्वत । सदैव रहेगा ॥ १९ ॥ ऐसा श्याम-परब्रह्म । भक्त-वत्सल कल्पद्रुम । बोला है जो आत्माराम । कहता संजय ॥ ५२० ॥ प्रेमसे ध्यानसे नित्य भज तू पूज तू मुझे । ऐसे ही मिल आत्मामें मुझमें लीन होकर ॥ ३४ ॥ २९५ राज-विद्या-समर्पणयोग
कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते समय संजयकी मनस्थिति— अजी ! श्रवण किया क्या अपने। पूछा जब राजासे संजयने । मौन होके सुन लिया बूढेने । पानीमें पडे भैसेकासा ॥ २१ ॥ तब डुला संजय सहसा । मानो आज अमृत बरसा । किंतु होकर भी न होनासा । रहा यह बूढा ॥ २२ ॥ फिर भी यह हमारा दातार । मानके रहा स्वस्थ-स-आदर । इनका स्वभाव है मानकर । संजय मनमें ॥ २३ ॥ करके श्रीमुनि-व्यासने निमित्त । राजको सुनाना युद्धका वृत्तांत । किया मानो मेरा उद्धार निश्चित । हर्षाया संजय ॥ २४ ॥ दृढ कर अपना सायास । बोला वह इतना मानस । पुलक हो आये स-उल्लास । अष्ट-सिद्धि-भाव ॥ २५ ॥ भक्तिके अष्ट सिद्धि भाव— चकित हो भर आया है चित्त । लूली पडी वाचा हो प्रमुदित । आपाद मस्तक है कंचुकित । हुआ रोमांचसे ॥ २६ ॥ भये अर्धोन्मिलित नयन । वरस पडे आनंद घन । हुआ सकंप सारा बदन । अंतर्मुख भावसे ॥ २७ ॥ अजी ! संपूर्ण रोममूल । खिले स्वेदकण निर्मल । जैसे मोतिकी मणिमाल । बनी कंचुकिसी ॥ २८ ॥ महा सुखके अति-रससे ऐसा । मिटने लगी जैसी जीवदशा । वहां श्री व्यासाज्ञाका भान कैसा । रहेगा भला ॥ २९ ॥ इतनेमें कृष्णार्जुनके वचन । गूंजने लगे श्रवणोंमें महान । लौटा लाया वह शरीरका भान । संजयका तब ॥ ५३० ॥ ध्यान देनसे आनंद-सिंहासन पर चढते ?— पोंछा तब नयन जल । तथा स्वेद बिंदु निर्मल । मुखसे निकले ये बोल । श्रीमान् सुनिये जी ॥ ६१ ॥ ज्ञानेश्वरी २९६
पड़ेगे अब कृष्णार्जुन वाक्य बीज । सात्विक भाव-युत चित्तमें सहज । खिलेगा प्रेम-प्रमेयका बाग आज । श्रोताओंके लिए ॥ ३२ ॥ अजी ! देना अब अवधान । चढना आनंद सिंहासन । देवने डाली माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ ३३ ॥ विभूतियोंका अब महाज्ञान । देगा अर्जुनको सिद्ध श्रीकृष्ण । सुनिये ज्ञानदेवका कथन । जो है निवृत्तिका दास ॥ ३४ ॥ गीता श्लोक ३४ ज्ञानेश्वरी ओवी ५३४- ॐ (38)
१० विभूति-चिंतनयोग श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक स्वरूप विश्वबोधविदग्ध । विद्यारविंद-प्रबोध । पराप्रमेय-प्रमद- । विलासिया नमो ॥ १ ॥ संसारतमका तू सूर्य । अप्रतिम परम-वीर्य । नमो तरुण-तर-तूर्य । लालनलीला ॥ २ ॥ जगदखिल-पालन । मंगलमणि-निधान । स्वजन-वन-चंदन । नमो आराध्यलिंग ॥ ३ ॥ चतुर-चित-चकोरचंद्र । आत्मानुभव-महानरेंद्र । श्रुतिगुणगण तू समुद्र । मन्मथ मन्मथ नमो ॥ ४ ॥ सुभाव-भजन-भाजन । तू भवेभ-कुंभ-भंजन । विश्व-उद्भवका भवन । नमो श्री गुरुदेव ॥ ५ ॥ श्री गुरुका सामर्थ्य— तेरा अनुग्रह श्री गणेश । देता है जो अपना स्वरस । तब सरस्वतीमें प्रवेश । होता है शिशुका ॥ ६ ॥ आश्वासन उदार देयका । जलाता दीप नव-रसका । थाह लगाता तब वाणीका । अनायास ॥ ७ ॥
तेरा ही स्नेह वागीश्वर। कर गूंगेका अंगीकार। स्पर्धा बाहस्पतिसे कर। जीतता वह ॥ ८ ॥ पडती दृष्टि तेरी जिस पर। रखता तू सिरपे पद्मकर। करता वह जीव होने पर। समानता शिवसे ॥ ९ ॥ श्री गुरुका अवर्णनीय - महिमा - जिसकी महिमांका यह करना। वाचालतासे वर्णन क्या करना। सूर्यको कैसे उबटन लगाना। चमकाने को ॥ १० ॥ कल्पतरुके फलका कैसे बहार । क्षीरसागरका कैसा पाहुनाचार । अन्य किस गंधकी अपेक्षा कर्पूर । सुवासित करनेमें ॥ ११ ॥ चंदनको किसका उबटन । अमृतका कैसे करें पक्वान । कैसे बांधे गगनपे भवन । कहो मुझसे ॥ १२ ॥ वैसे श्री गुरुका महिमान । आकलनका क्या है साधन । यह जानके किया नमन । मैंने चुपचाप ॥ १३ ॥ बुद्धिकी संपन्नता पर समर्थ । श्री गुरु-वर्णन करना यथार्थ । मोति पर पानी चढाना है सार्थ । अभ्रकका वैसे ॥ १४ ॥ स्वर्ण पर रौप्यका पानी चढाना । वैसा है श्रीगुरुका स्तवन गाना । स-मौन श्री-चरणपे नत होना । यही भला है ॥ १५ ॥ गीताकी यह धरोहर श्री गुरु-कृपाका फल है— अजी ! श्रीगुरु परम उदार । कृपा-दृष्टी रखते हम पर । तभी कृष्णार्जुन संगम पर । प्रयाग बने हम ॥ १६ ॥ मांगा जब दूध घूंट भर । बना क्षीरसागर कटोर । सम्मुख रखता है शंकर । उपमन्युके वैसे ॥ १७ ॥ अथवा जैसे वैकुंठनायक । रिझाया ध्रुव जब स-कौतुक । रीझाया ध्रुवपद भातुक । समझाके वैसे ॥ १८ ॥ ब्रह्मविद्याका जो राजा महान । सकल शास्त्रका बसति स्थान । ओवियोंमें भगवद्गीता गान । संभव किय ॥ १९ ॥ २९९ विभूति-चिंतनयोग
शब्दारण्यमें भटक दिन-रात । न सुनी अक्षर फलनेकी बात । वाचा-बनी स्वयं कल्पलता सत्- । विवेककी यहां ॥ २० ॥ देहात्म-बुद्धि भी जो निरंतर । बनी थी मंदिर आनंदका भंडार । मनने किया गीतार्थका सागर । शयन सुखसे ॥ २१ ॥ श्री गुरुकी लीला अपार । करूं कैसे वर्णन मै पामर । फिर भी गाया ढीठ बनकर । सहन कीजिये यह ॥ २२ ॥ आपका ही कृपा-प्रसाद । बना भगवद्गीता प्रबंध । पूर्वार्ध गाया स-विनोद । ओवियोंमें ॥ २३ ॥ सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उपसंहार -- पहलेमें अर्जुनका विषाद । दूसरेमें गाया योग विशुद्ध । किंतु सांख्य तथा ज्ञानका भेद । दिखा कर ॥ २४ ॥ तीसरेमें केवल कर्म प्रतिष्ठित । चौथेमें वही ज्ञान-सह प्रकटित । पांचवेमें अष्टांग-योगका गुपित । कहा वैसे ही ॥ २५ ॥ छठेमें कहा वही प्रकट । आसनादि-सह कर स्पष्ट । जीवात्म-भावैक्य जो है श्रेष्ठ । होता जिससे ॥ २६ ॥ वैसी ही वह योग-स्थिति । योग-भ्रष्टोंकी है क्या गति । वह पूर्णस-उपपत्ति । सुना दी है ॥ २७ ॥ उस पर है जो सप्तम । प्रकृति-रूप उपक्रम । भक्त चार पुरुषोत्तम । होते हैं कैसे ॥ २८ ॥ फिर सप्तमीकी प्रश्न सिद्धि । कह करके प्रयाण-सिद्धि । एवं सकल वाक्य अवधि । अष्टमाध्यायमें ॥ २९ ॥ अगणित है जो शब्द-ब्रह्म । उसमें है जो अर्थ परम । महा-भारतमें अनुपम । एक लक्ष्यमें मिलता ॥ ३० ॥ फिर अठारह पर्व भारतमें । मिलता वह कृष्णार्जुन उक्तिमें । तथा अभिप्राय जो सप्तशतिमें । नौवेमें मिलता ॥ ३१ ॥ तभी नवमका अभिप्राय । पूर्ण हुआ करनेमें भय । प्रतीत कर नवमाध्याय । हुआ किस गर्वसे ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३००
अजी ! गूड़ शर्करा औ' राब । होते एक ही वस्तुके सब । अनुभवती है स्वाद जीभ । भिन्न भिन्न ॥ ३३ ॥ कुछ जान करके कहते । कुछ पुनः पुनः ज्ञान देते । कुछ जानतेमें है खो जाते । ज्ञेय गुणमें ॥ ३४ ॥ ये सारे अध्याय मैंने गुरु-कृपासे गाये है— ऐसे हैं ये गीताके अध्याय । नवम है अनिर्वचनीय । गाया मैंने कर श्रवणीय । तव सामर्थ्यसे ॥ ३५ ॥ किसीके दंडसे सूर्योदय कराया । किसीसे नव-विश्व ही है रचाया । सिंधुमें पाषाण तैराके उतराया । सैन्य तुमने ॥ ३६ ॥ किसीसे आकाशमें सूर्य पकड़वाया । किसीसे सागरका आचमन करवाया । तुमने ही मुझ गंवारसे है गवाया । अनिर्वचनीय ऐसे ॥ ३७ ॥ पर यह रहने दो तू ऐसे । राम-रावण भिडे थे कैसे । राम-रावण भिडे थे वैसे । समरमें जो ॥ ३८ ॥ वैसे नवमें श्री कृष्णका बोलना । उसे नवम जैसा ही है कहना । गीता-तत्त्वज्ञ जाने यह कहना । मेरा समुचित ॥ ३९ ॥ नवमका प्रारंभिक कथन । जिसका किया अल्पसा वर्णन । अब उत्तर खंडका श्रवण । कीजियेगा ॥ ४० ॥ यहां विभूति प्रति विभूति । धनुर्धरसे हैं कही जाती । उसमें चातुर्य-रस-वृत्ति । प्रतीत होगी ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरका मातृभाषा प्रेम-मेरा अनुवाद गीताके तोडका है— यहां देशिका नागरिकपन । जीतेगा शांत श्रंगारको जान । ओवियां ये होंगी महा-भूषण । साहित्यका ॥ ४२ ॥ मूल-ग्रंथ जो गीता संस्कृतका । तथा यह अनुवाद देशिका । जाननेसे मूल अनुवादका । होगा अनुभवैक्य ॥ ४३ ॥ जैसे शरीरका सुंदरपन । बनता अलंकारका भूषण । सजा कौन किससे यह ज्ञान । होता नहीं ॥ ४४ ॥ ३०१ विभूति-चिंतनयोग
वैसे देशी और संस्कृतवाणी । सोहती सार्थ चिर-संगिनी । भावार्थ-सिंहासन भूषिणी । शुद्ध भावसे ॥ ४५ ॥ खिलाया जहां भावोंका रूप । आया है रस-वृत्तिमें ओप । प्रतिष्ठा मिली हमें अमाप । कहता चातुर्य ॥ ४६ ॥ वैसे देशीका लावण्य । जिससे लेके तारुण्य । रचा है फिर अगण्य । गीता-तत्व ॥ ४७ ॥ ऐसा चराचर गुरुवर । जो चतुर चित्त चमत्कार । वह सुनोजी यादवेश्वर । बोलने लगे ॥ ४८ ॥ कहे ज्ञानदेव निवृत्तिदास । सुनो श्री हरि बोले जो सरस । अर्जुन तू है अन्यंग सर्वस । अंतः करणका ॥ ४९ ॥ भगवान उवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥ मैं तेरी आंखों से दीखता हूं उतना ही नहीं— हमने जो निरूपण किया । तेरा अवधान भी देख लिया ! वह भी हमने संपूर्ण पाया । धनुर्धर ॥ ५० ॥ देखना घटमें भर अल्प नीर । वह नहीं चुआ तो अधिक भर । देखी तेरी चाह कुछ कह कर । अब कहता हूं सुन ॥ ५१ ॥ कोई आया जो अनायास । उस पर छोड़ा सर्वस । हुआ मेरा निज-निवास । तू इस समय ॥ ५२ ॥ पार्थकी योग्यता देख सर्वेश्वर । ऐसे बोलने लगा सादर । आती मेघमाला जैसे घर कर । देख हिमालय ॥ ५३ ॥ फिरसे सुन तू मेरी बात उत्तम अर्जुन । प्रेमसे कहता तेरी करके हित-कामना ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी : ३०२
बोले कृपालुओंके राज । सुन धनुर्धर तू आज । कहा था तुझको जो गूज । कहूंगा पुनरपि ॥ ५४ ॥ अजी ! प्रतिवर्ष जैसे खेत पेरना । हरे भरे खेतको फिर काट-लेना । खेतमें श्रमने कभी न डकताना । पाने अधिक उपज ॥ ५५ ॥ पुनः पुनः पुट देनेसे । सुवर्ण चमकता जैसे । वैसा सुवर्ण खोजनेसे । मिलता नहीं ॥ ५६ ॥ यहां भी ऐसा ही है पार्थ । तेरे हित नहीं सर्वथा । सुनो अपने ही स्वार्थार्थ । बोलता मैं ॥ ५७ ॥ करनेसे शिशुका अलंकार । होगा क्या उसपर उपकार । देखके होंगे आनंद विभोर । स्वयं माता पिता ॥ ५८ ॥ जैसे तू अपना हित पूर्ण । जानेगा हम होंगे प्रसन्न । यह है वास्तविकता जान । हमारे कहनेकी ॥ ५९ ॥ जाने दो सुमन सुभाषित । तुझसे है ममत्व बहुत । औ' तुझे भाती है यह बात । तभी कहता हूं ॥ ६० ॥ अर्जुन हम इसी कारण । करते हैं तुझसे भाषण । सुन यह स-अंतःकरण । चित्त देकर ॥ ६१ ॥ सुन सुन तू यह मर्म । मेरा वाक्य यह परम । आया स्वयं अक्षर-ब्रह्म । तुझसे मिलने ॥ ६२ ॥ पार्थ तू मुझको न जानता । न जानो तो मैं यह कहता । अजी ! मैं जो यहां हूं बोलता । मानो ब्रह्मांड ही है ॥ ६३ ॥ न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥ यहां वेद हुए मौन । लंगडा हुआ पवन । बिन रातके विलीन । होते रवि-शशि ॥ ६४ ॥ न देव जानते मेरा प्रभाव न महर्षि भी । सभी प्रकारसे मैं हूं उनका मूल कारण ॥ २ ॥ ३०३ विभूति-चिंतनयोग
सब कोयी मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं इसलिये मुझे कोयी नहीं जानता— अजी ! गर्भ जो है उदरका । नहीं जानता पय माताका । वैसे ही ज्ञान-जात देवोंका । मेरे विषयमें ॥ ६५ ॥ जलचरोंको सागरका भान । गुरगुरेको जैसा है गगन । वैसा ही महर्षियोंका ज्ञान । मेरे विषयमें ॥ ६६ ॥ मैं हूँ कौन तथा हूँ कितना । कब किससे हुआ उत्पन्न । इसपे न कहा है वचन । युग-युगोंसे ॥ ६७ ॥ महर्षी तथा वे देव । ये भूतजात हैं सर्व । मैं अनादि हूँ पांडव । जान तू यह स्पष्ट ॥ ६८ ॥ उतरा हुआ नीर चढ़ेगा पर्वत । वृक्ष बढता जायेगा जड पर्यंत । जानेगा तब मुझसे बना जगत । मुझे पूर्ण ॥ ६९ ॥ या वटांकुरमें वृक्ष समायेगा । अथवा उर्मिमें सागर डूबेगा । या परमाणुमें ही समा जायेगा । ब्रह्मांड गोल ॥ ७० ॥ तो भी मुझसे बने थे जीव । महर्षी अथवा जो हैं देव । मुझे जाननेमें हैं पांडव । लेंगे समय बहुत ॥ ७१ ॥ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको अंतरमुख करो— मुझे जानना है यद्यपि कठिन । कोई रखे इंद्रिय बहिर्गमन । कर उसको अंतर्मुख विलीन । अपनेमें ही ॥ ७२ ॥ बढ़ता है वह मेरी ओर । चढ़ भूतोंके सिरपर । छोड़के असत्य संसार । धनंजय ॥ ७३ ॥ यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥ जाने जो मैं अजन्मा हूं स्वयम्भू विश्व-चालक । निर्मोही हो मनुष्योंमें छूटता सब पापसे ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०४
भली भांति यहां रह कर । स्व-प्रकाशमें ही जानकर । देखता अजत्व जो प्रखर । मेरे नयनों से ॥ ७४ ॥ मैं हूं अनादिसे पर । सर्व लोक महेश्वर । मुझको ऐसा जो नर । जानता है ॥ ७५ ॥ पाषाणमें वह पारस । रसमें है जो सिद्धरस । मनुष्याकृतिमें जो अंश । मेरा ही जान ॥ ७६ ॥ जंगम बिंब है वह ज्ञानका । अवयव सुखके अंकुरका । प्रकाश है वह मानवताका । लोकदृष्टिका है भ्रम ॥ ७७ ॥ कर्पूरमें हिरा मिला । उस पर पानी डाला । कर्पूर सब पिघला । प्रकटा हीरा ॥ ७८ ॥ रूपमें है वह मानुष । देखनेमें अन्य सदृश । न स्पर्शते प्रकृति-दोष । उसको कभी ॥ ७९ ॥ उसको छोड़ जाते हैं सब पाप । जैसे जलता चंदन वृक्ष साप । वैसे ब्रह्म-ज्ञानीको कोई संकल्प । कभी छूता नहीं ॥ ८० ॥ होना यदि मेरा ज्ञान । ऐसा चाहता है मन । मैं कैसा हूँ यह जान । तथा मज्जन्य वस्तु ॥ ८१ ॥ सभी है मेरे ही विकार । भूतमात्रके रूप धर । फैले हैं त्रिलोकमें भर । धनंजय ॥ ८२ ॥ बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥ बुद्धि ज्ञान क्षमा शांति सत्य निर्मोह निग्रह । जन्म-मृत्यु सुख-दुःख लाभालाभ भयामय ॥ ४ ॥ अहिंसा समता तुष्टि तप दान यशायश । हुये ये मुझसे भाव भूतोंमें भिन्न भिन्न जो ॥ ५ ॥ (३१) ३०५ विभूति-चिंतनयोग
प्रथम है जान तू बुद्धि । फिर ज्ञान जो निरवधि । असंमोह सहन सिद्धि । क्षमा सत्य ॥ ८३ ॥ तब इंद्रिय मन दमन । सुख दुखमें समवर्तन । भाव अभाव मान अर्जुन । मेरे ही विकार ॥ ८४ ॥ भय तथा अभयता । अहिंसा तथा समता । मेरा रूप पांडुसुत । जान तू यह ॥ ८५ ॥ दान यश अपकीर्ति । इन भावोंकी वसती । मेरी ओरसे है होती । सब भूतोंमें ॥ ८६ ॥ जैसे भूत जात भिन्न भिन्न । वैसे मेरे गुण भी है जान । होते मेरे ज्ञानसे उत्पन्न । कुछ अज्ञानसे भी ॥ ८७ ॥ जैसे प्रकाश औ' अंधार । लेकर सूर्यका ही आधार । फैलता अस्तमें है अंधार । उदयमें वैसे प्रकाश ॥ ८८ ॥ मेरा ज्ञान और अज्ञान । है जो दैवके ही कारण । तभी भूतोंमें भाव जान । कम और अधिक ॥ ८९ ॥ तभी जीव सृष्टि संपूर्ण । मेरे ही विकारमें तू जान । उलझी हुई यहां अर्जुन । जान तू यह ॥ ९० ॥ अब इस सृष्टिके पालक । जिसके आधीन होते लोक । वे ग्यारह भाव भिन्न देख । कहता तुझे ॥ ९१ ॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥ संपूर्ण गुणसे जो वृद्ध । औ' महर्षियोंमें प्रबुद्ध । जो हैं कश्यपादि प्रसिद्ध । सप्त-ऋषी ॥ ९२ ॥ चौदह मनु जो विख्यात । उसमें चार प्रतिष्ठित । स्वयंभू आदि ख्याति प्राप्त । कहे हैं अन्य ॥ ९३ ॥
महर्षि सात आदीके मनु जो चार हैं तथा । मेरे संकल्पसे भाव लोकमें उनकी प्रजा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०६
ऐसे एकादश ये समस्त । मेरे मनसे ही है निर्मित । सृष्टि व्यापार संचलनार्थ । धनुर्धर ॥ ९४ ॥ न हुए थे लोक व्यवस्थित । ये त्रिभुवन अनधिष्ठित । तथा यह सब भूतजात । जो था पडा हुआ ॥ ९५ ॥ तभी हुए ये ग्यारह उत्पन्न । उन्होने ही लोकपाल निर्माण । करके उनको अध्यक्ष जान । रखा यहां ॥ ९६ ॥ इसलिये ये ग्यारह राजा । उनके रहे अनेक प्रजा । है विस्तार यह सजा-धजा । मेरा ही सारा ॥ ९७ ॥ पहले होता है बीज एक । वही बनता तना नेक । उसमें ही अंकुर अनेक । निकलते हैं ॥ ९८ ॥ उस अंकुरके अनेक । निकलते शाखोपशाख । शाखाओंमें फुटते देख । असंख्य पल्लव ॥ ९९ ॥ उन पल्लवोंमें फल फूल । वृक्षत्व बहरता सकल । चिंतन रतको है केवल । बीज-मात्र ॥ १०० ॥ वैसे मैं आदि एक ही जान । उत्पन्न है मुझसे ही मन । मनसे सप्तऋषी उत्पन्न । तथा मनु भी ॥ १ ॥ उन्होंने किये लोकपाल निर्माण । लोक-पालोंने किया लोकसृजन । लोकोंसे हुई नाना प्रजा उत्पन्न । दीखती जो ॥ २ ॥ ऐसे इस विश्वका निर्माण । किया मैने ही पूर्ण रूपेण । चिंतन रतको होता ज्ञान । अन्यको नहीं ॥ ३ ॥ एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥ मेरा जो योग-विस्तार जानता यह तत्वता । वह निश्चय पायेगा इस निष्कंप योगको ॥ ७ ॥ ३०७ विभूति-चिंतनयोग
मैं सर्व व्यापी हूँ इसलिये “जो जो मिला भूत । उसे मान भगवंत”— इसी लिये सुभद्रा-पति । ये भाव मेरी ही विभूति । तथा उसकी है ये व्याप्ति । संपूर्ण विश्व ॥ ४ ॥ इसीलिये सुन तू पार्थ । ब्रह्मादिसे चीटि पर्यंत । बिना मेरे दूसरी बात । नहीं है विश्वमें ॥ ५ ॥ ऐसे जो जानता यथार्थ । ज्ञान बोधसे हो जागृत । उसे नहीं दुःस्वप्न द्वैत । उत्तम-मध्यमादिक ॥ ६ ॥ मैं तथा मेरी विभूति । औ' विभूति व्याप्त व्यक्ति । एक है यह प्रतीति । करता वह ॥ ७ ॥ ऐसे जो संवेह रहित । अनुभव-ज्ञान सहित । मिलकर हुआ कृतार्थ । मनसे मुझमें ॥ ८ ॥ ऐसे जो मुझको भजता । अभेद दृष्टिसे जानता । भजन नादमें झूमता । उसके मैं ॥ ९ ॥ भक्तियोग यह भेद रहित । है अखंड तथा संशयातीत । आचारमें टूट भी शुभदाता । ऐसा कहा छठेमें ॥ ११० ॥ मेरा यह अभेद ज्ञान । जानना चाहता तो मन । कहता हूँ उसको सुन । ध्यान देकर ॥ ११ ॥ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥८॥ मुझसे ही यह संपूर्ण । होता है विश्वका जनन । तथा है पालन पोषण । मुझसे ही ॥ १२ ॥ जैसे जल-कल्लोल माल । उसका जन्मदाता जल । औ' आधार भी वही जल । तथा जीवन भी ॥ १३ ॥ मुझमें सबका मूल प्रेरणा मुझसे सब । यह जान मुझे ज्ञानी भजता भक्ति-भावसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३०८
जैसे यहां सर्वत्र कहीं । जलके बिना कछु नहीं । वैसे विश्वमें जहां कहीं । मेरे बिन ना कछु ॥ १४ ॥ मुझे ऐसे व्यापक मान । भजन करते सर्व स्थान । ये उनके भजन पूजन । प्रकट है प्रेम-भावसे ॥ १५ ॥ देशकाल वर्तमान । मुझमें देख अभिन्न । जैसे वायु हो गगन । फिरता गगन में ॥ १६ ॥ ऐसे निज-ज्ञान संपन्न । हो विचरते त्रिभुवन । मुझको जगद्रूप मान । अंतः करणमें ॥ १७ ॥ जो जहां मिलता है भूत । उसीको माना भगवंत । यह भक्ति-योग निश्चित । मेरा जान ॥ १८ ॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ९ ॥ दो भक्तोंकी भेंट आनंद-महोत्सव है— अन्तःकरण मैं बना । प्राण भी मद्रूप बना । भूला है जीव मरण । बोध-मूलसे ॥ १९ ॥ फिर बोधके नशेमें । औ' संवादके सुखमें । नाचते लेने देनेमें । ज्ञानानंदके ॥ २० ॥ जैसे समीपके दो सरोवर । उमड आते जब परस्पर । बनाते तब तरंग ही घर । तरंगको वैसे ॥ २१ ॥ होता जब भक्तसे भक्तका मिलन । मानो आनंदसे आनंदका गुंफन । ज्ञानसे करता ज्ञानका ही भूषण । ज्ञानके लिये ॥ २२ ॥ सूर्यसे सूर्यकी आरती उतारना । चंद्रने चंद्रका आलिंगन करना । या-गंगा यमुनाका है मिलन होना । वैसे ही धनंजय ॥ २३ ॥ चित्त प्राण मुझे मान बोध देते परस्पर । मेरे कीर्तनमें नित्य रमते तुष्ट होकर ॥ ९ ॥ ३०९ विभूति-चिंतनयोग
जैसे प्रयाग है समरसका । संगम प्रवाह सात्विकताका । हुआ जो सुसंवाद चौराहका । गणपति ही मानो ॥ २४ ॥ तब है महा सुखके नशेमें । उडे देह-ग्रामके बाहरमें । आत्म-तृप्तिके गर्जनानंदमें । गूंजता गगन ॥ २५ ॥ गुरु शिष्यका एकांत-स्थल । वहां भी देखके देश-काल । कहनेकी बात जो मंगल । गरजते हैं मेघ-से ॥ २६ ॥ पूरा खिला हुआ जो कमल । समा न सकता परिमळ । अभेद रूप देता प्रफुल्ल । आमोदोन्माद ॥ २७ ॥ सदा सर्वत्र मेरा गुणवर्णन । औ' वर्णनानंदमें खो जाता कथन । उस खोनेमें घुलते तन मन । जीव सहित ॥ २८ ॥ जीत लिया मत्सुख पूर्ण । प्रेमोत्कर्षमें हों बे-भान । भूले देश-काल भी पूर्ण । अपनेमें ही ॥ २९ ॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ १० ॥ भक्त केवल मेरा प्रेम-सुख चाहते हैं— हमको उन्हे जो कुछ देना था । उन्होने पहले ही पालिया था । हमारे दिये बिना कमाया था । फिर रहा क्या देनेको ॥ १३० ॥ उनका जो निश्चित पथ । उसके सम्मुख हे पार्थ । स्वर्ग-मोक्ष आदिके पथ । जैसी पगडंडियां ॥ ३१ ॥ अंगीकार किया उन्होंने प्रेम । दे देना है जो हमारा नियम । कर लिया उन्होंने वही काम । नाम लिया हमारा ॥ ३२ ॥ अनुदिन वह बढते जाये । कालकी दृष्टि नहीं पड पाये । इतना ही काम हमारे लिये । रहता है तब ॥ ३३ ॥ ऐसे मगन जो नित्य भजते प्रीति-पूर्वक । देता उन्हे बुद्धि योग जिससे मैं मिलूं उन्हे ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ३१०