ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वैसे नानाविध व्यक्ति । नाना नाम तथा वृत्ति । उसमें मैं अभेद-मूर्ति । भेदमें जानते ॥ ५२ ॥ ऐसे भिन्नत्वमें धनुर्धर । करते ज्ञानयज्ञ सुन्दर । बोध न होता नाना प्रकार । जाननेसे ॥ ५३ ॥ या जहां जो कुछ है देखते । मेरे बिन अन्य न जानते । सदा मेरी प्रतीति करते । यह बोध उनका ॥ ५४ ॥ बुल्ले जहां तथा जितने होते । जलके आधारसे ही बनते । फिर रहते या घुल जाते । पानीमें ही ॥ ५५ ॥ मानो आंधीने परमाणु उडाये । वे भूमित्वसे अलग नहीं गये । वे जब पुनः नीचे ही गिर गये । तो पृथ्वी पर ही ॥ ५६ ॥ वैसे कहीं कुछ भी हो जाये । या कहो कुछ भी ना हो जाये । सब ही "मैं" बोध लेते गये । सर्व-भावसे ॥ ५७ ॥ अजी ! जहां जितनी मेरी व्याप्ति । उतनी ही है उनकी प्रतीति । बहुधाकारकी वर्तन स्थिति । बहुरूप उनकी ॥ ५८ ॥ जैसे भानु-बिंब नित्य । सबके सम्मुख दिव्य । वैसे वे विश्वके भव्य । सदा सम्मुख ॥ ५९ ॥ अजी ! उनका वह जो ज्ञान । आगे पीछे न जाने अर्जुन । वायु जैसा सदैव गगन । रहे सर्वत्र ॥ २६० ॥ वैसे जितना हूं मैं संपूर्ण । उतना उनका भाव-पूर्ण । इससे न करते अर्जुन । भजन होता है ॥ ६१ ॥ वैसे मैं हूं सर्वत्र पूर्ण रूपसे । कहां मेरा भजन न होता कैसे । किंतु यहां ऐसा ज्ञान होनेसे । भजन न होता ॥ ६२ ॥ यहां जो उचित रूपसे । भजते हैं ज्ञान-यज्ञसे । कही बात मैंने तुझसे । उनकी पार्थ ॥ ६३ ॥ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं— यह सब है सतत सबकी ओरसे । अर्पण होता मुझे सहज भावसे । यह नहीं जाननेसे अज्ञानियोंसे । न होता मुझे अर्पण ॥ ६४ ॥ २७१ राज-विद्या-समर्पणयोग
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ उदय होगा जब ज्ञानका । तब वेद ही "मैं हूँ" इसका । "मैं" ही तज्जन्य-ऋतु होनेका । अनुभव होगा ॥ ६५ ॥ तब यज्ञ जन्य सकल । सांगोपांग कर्म निर्मल । यज्ञ भी "मैं" यह निखिल । होगा बोध पार्थ ॥ ६६ ॥ स्वाहा "मैं" हूँ तथा स्वधा । सोमादि दिव्य विविध । आज्य और "मैं" समिधा । मंत्र औ, हवि भी ॥ ६७ ॥ होता मैं हवन करता । अग्नि स्वरूप मैं रहता । हवन-वस्तु जो जो होता । वह सब मैं हूँ ॥ ६८ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ अजी ! जिसके अंग-संगसे । यहां प्रकृति के अष्टांगसे । जन्म होता विश्वका जिससे । पिता वह मैं हूँ ॥ ६९ ॥ अर्धनारी नटेश्वरी । जो पुरुष वह नारी । वैसा मैं सचराचरीं । माता भी हूँ ॥ २७० ॥ जगत जहांसे होता औ' रहता । जिससे जीवन लेकर बढता । मेरे बिना वह कछु नहीं होता । अन्य धनुर्धर ॥ ७१ ॥ प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको यहां । जनम दिया हमने मनमें जहां । वह पितामह त्रिभुवनमें यहां । मैं हूँ विश्वका ॥ ७२ ॥ जहां ज्ञान-रूप सभी बाट । जिस स्थान आती हैं सुभठ ! उन वेदोंकी वेद्य जो गोष्ठ । कहलाती है ॥ ७३ ॥ मैं ही संकल्प मैं यज्ञ स्वावउंबन अन्न मैं । मंत्र मैं हव्य भी मैं हू अग्नि मैं आहुती तथा ॥ १६ ॥ जगदाधार ही मैं हूं माता पिता पितामह । मैं तीनों वेद ॐकार जानने योग्य पावन ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी २७२
जहां नाना मतोंका अपरिचितपन । मिटता है शास्त्रोंका अनजान । मिलते हैं जहां भूले हुए सभी ज्ञान । वह पवित्र मैं हूँ ॥ ७४ ॥ ब्रह्म-बीजका फूटा अंकुर । घोष ध्वनि नाद औ' आकार । उसका भुवन जो ओंकार । वह भी मैं हूँ ॥ ७५ ॥ उस ओंकारका है उदर । समालेता है अ, उ, म, कार । जनमते ही वेद लेकर । उठे वे तीनों ॥ ७६ ॥ इसीलिए ऋग् यजु तथा साम । ये तीनों कहे मैं आत्माराम । एवं मैं ही हूँ सब कुलक्रम । शब्द ब्रह्मका ॥ ७७ ॥ गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥ जो है यह चराचर संपूर्ण । जिसमें भरी है प्रकृति पूर्ण । उस प्रकृतिका विश्राम स्थान । परमगति मैं हूँ ॥ ७८ ॥ जिससे पाती है प्रकृति जीवन । अधिष्ठानसे होता विश्व जनन । आकर जो उस प्रकृतिके गुण । भोगता है ॥ ७९ ॥ विश्वश्रीका वह भर्ता । मैं हूँ जानो पांडुसुता । हूँ अधिपति समस्ता । त्रिभुवनका मैं ॥ २८० ॥ आकाशको सर्वत्र बसाना । वायुको कभी स्वस्थ न होना । तथा वर्षाको बरसना । औ' दहना अग्निको ॥ ८१ ॥ पर्वतको न छोड़ना आसन । समुद्रको न सीमा उल्लंघन । पृथ्वी करे भूतोंका वहन । यह है आज्ञा मेरी ॥ ८२ ॥ मेरे कहनेसे है वेद बोलता । मेरे चलानेसे सूर्य है चलता । मेरे हिलानेसे प्राण है हिलता । करता विश्वका चलन ॥ ८३ ॥ मेरे ही नियमनमें काल । प्राणि-मात्रको जाता निगल । मेरी ही आज्ञामें है सकल । चलता नित्य ॥ ८४ ॥ साक्षी स्वामी सखा भर्ता निवास गति आसरा । मैं हूं कर्ता भर्ता हर्ता निदान बीज अक्षय ॥ १८ ॥ २७३ राज-विद्या-समर्पणयोग (35)
ऐसा हूँ मैं समर्थ । जो जगतका नाथ । औ' मैं हूँ साक्षीभूत । गगन जैसा ॥ ८५ ॥ यहां नाम रूपमें पूर्ण । बसा हुआ है अर्जुन । नाम रूपका अधिष्ठान । वह भी मैं हूँ ॥ ८६ ॥ जलका है जैसे कल्लोल । औ' कल्लोलमें होता जल । वैसे विश्वका मैं सकल । आधार भूत हूँ ॥ ८७ ॥ होता जो मेरा अनन्य शरण । उसका हरता जन्म मरण । शरणागतका शरण्य स्थान । मैं ही एक ॥ ८८ ॥ एक मैं अनेक रूप-धारण । कर ले प्रकृतिके भिन्न गुण । बन सजीव जगतके प्राण । रहता हूँ पार्थ ॥ ८९ ॥ डबरा सागर भेद न मान । सबमें बिंबता सूर्य समान । वैसे ब्रह्मादि भूतमें समान । सु-हृदयस्थ मैं ॥ २९० ॥ अजी ! मैं ही हूँ अर्जुन । त्रिभुवनका जीवन । सृष्टि क्षयका कारण । मूल जो मैं हूँ ॥ ९१ ॥ बीज ही शाखाओंको प्रसवता । वही वृक्ष बीजमें है समाता । वैसे संकल्पसे सब बनता । औ' समाता संकल्पमें ॥ ९२ ॥ विश्वका बीज जो है संकल्प । अव्यक्त तथा वासना रूप । उस संकल्पका है निक्षेप । अन्तमें मैं हूँ ॥ ९३ ॥ . यहां नाम-रूप मिटते । वर्ण औ' व्यक्ति है अटते । जातिके भेद भी खुलते । जब न होता आकाश ॥ ९४ ॥ संकल्प वासना संस्कार । फिर रचनेमें आकार । रहते हैं जहां अमर । वह स्थान मैं हूँ ॥ ९५ ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ । तपके जलको खींच गिराता वृष्टि रूपसे । मृत्यु मैं और मैं मोक्ष मैं ही सत् और हूं असत् ॥ १९ ॥ ज्ञानेश्वरी २७४
मैं सूर्य बन तपता । शोषता औ' प्रकाशता । इंद्र बन मैं वर्षाता । आता सुकाल ॥ ९६ ॥ जब है अग्नि काष्ठ खाता । काष्ठ ही है अग्नि बनता । वैसे मरता व मारता । जानो स्वरूप मेरा ॥ ९७ ॥ जो जो दीखता है यहां मर्त्य । वह सब मेरा रूप खुत्य । तथा जो है सहज अमर्त्य । वह अविनाशी हूँ मैं ॥ ९८ ॥ अजी ! बहुत बोल क्या करना । सबही एक वाक्यमें जानना । सता·सत सार अनुभवना । मैं हूँ सब ॥ ९९ ॥ पुण्यकी समाप्तिके बाद पुनः मृत्यु-लोकमें— इसीलिए पार्थ मैं नहीं । ऐसा कछु है नहीं कहीं । प्राणियोंका दैव है कहीं । जो न देखें मुझको ॥ ३०० ॥ पानी बिन तरंग है सूखती । सूर्य बिन रश्मि न दीखती । न करते मद्रूपकी प्रतीति । है यह विस्मय ॥ १ ॥ भरा यह मुझसे बाहर भीतर । ढला है विश्व मुझसे ही ओर छोर । किंतु बीता है उनका कर्म-कठोर । कहते हैं मैं नहीं ॥ २ ॥ अमृत-कुण्डमें जो पडते । अपनेको निकाल कहते । ऐसोंको है क्या कह सकते । अप्राप्यको होता ऐसा ॥ ३ ॥ अन्नके लिए एक कौर । दौडता है अंध सत्वर । चिंतामणि ठुकराकर । अंधत्वमें ॥ ४ ॥ मिटती है जब ज्ञानमें आस्था । होती ऐसी अंधेकीसी अवस्था । करके न किया ऐसा सर्वथा । होता ज्ञानके बिन ॥ ५ ॥ अंधेको गरुड पंख मिलता । उसका क्या उपयोग होता । वैसे सत्कर्म सदा व्यर्थ जाता । ज्ञानके बिन ॥ ६ ॥ अजी ! देख तू यह अर्जुन । आश्रम-धर्मका आचरण । विधि-मार्गका देता शिक्षण । अपने आप ॥ ७ ॥ करनेसे सहज-यजन । होता है प्रसन्न वेदार्जन । क्रिया फल सह मूर्तिमान । आता सम्मुख ॥ ८ ॥ २७५ राज-विद्या-समर्पणयोग
ऐसे दीक्षित है जो सोमप । आपही होते यज्ञ-स्वरूप । वहां पुण्यके नामसे पाप । जुडा जान ॥ ९ ॥ श्रुतित्रयको वे जानकर । शत-यज्ञोंको सम्पन्न कर । यजित मुझको भूलकर । चाहते स्वर्ग ॥ ३१० ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥ जैसे जो कल्पतरुकी छायामें । बैठ गांठ बांधे भिक्षा-झोलीमें । निकलेगा ही वह भिक्षान्नमें । निर्दैवी निश्चित ॥ ११ ॥ वैसे सौ शत सौ यज्ञ किये मेरेलिए । किंतु चाह है स्वर्ग सुखकेलिए । पुण्य करना यह पापकेलिए । ऐसा नहीं क्या ? ॥ १२ ॥ मुझे छोडकर पाना स्वर्ग । अज्ञानका यह पुण्यमार्ग । ज्ञानी जन उसे उपसर्ग । कहते हैं जो ॥ १३ ॥ वैसे देख नरकको दुःख । दिया है नाम स्वर्गको सुख । नित्यानन्द-रूप है निर्दोष । स्वरूप मेरा ॥ १४ ॥ मेरे पास आते हुए पार्थ । पडते हैं ये दोनों सतत । स्वर्ग तथा नरकका पथ । है ये चोरोंके ही ॥ १५ ॥ जो मेरे पास लाता है वही शुद्ध-पुण्य है— स्वर्ग देता है पुण्यात्मक पाप । नरक देता है पापात्मक पाप । मुझ तक पहुंचाता है आप । यह है शुद्ध-पुण्य ॥ १६ ॥ मत्स्वरूपमें रहते । मुझसे हैं दूर होते । ऐसे कर्मको कहते । पुण्य कैसे ? ॥ १७ ॥ वेदाभ्यासी सोम पीके पुनीत यज्ञसे जो चाहते स्वर्ग पाना । वे पुण्यसे पाकर इंद्र-लोक पाते वहांके सुख भोग दिव्य ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी २७६
किंतु रहने दो यह प्रस्तुत । सुन इस भांति हैं वे दीक्षित यज कर मुझको ही याचित । स्वर्गका सुख ॥ १८ ॥ जो पापात्मक पुण्य होता । उससे मैं नहीं मिलता । उससे प्राप्त जो योग्यता । देती है स्वर्ग ॥ १९ ॥ स्वर्ग-सुखका वर्णन— अमरत्व जहां सिंहासन । ऐरावत जैसा है वाहन । राजधानी तथा है भुवन । अमरावती ॥ ३२० ॥ महासिद्धिंका जहां भंडार । अमृतका भरा है कोठार । वहां फिरते हैं समाहार । कामधेनुके ॥ २१ ॥ देवही जहां स्वयंसेवक । भूमि है चिंतामणिकी नेक । विनोद वाटिका हैं अनेक । सुरतरुकी वहां ॥ २२ ॥ गायन गंधर्वोंका । नर्तन है रंभाका । विलास उर्वशीका । मिलता वहां ॥ २३ ॥ मदन करता शय्या-श्रृंगार । चन्द्र बिछाता अमृत-तुषार । हरकारा है पवन तयार । वहां सदैव ॥ २४ ॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥ बृहस्पतिसे महान । स्वस्तिश्रीके ब्राह्मण । भोजनमें सुरगण । साथ रहते ॥ २५ ॥ वे भोगते स्वर्ग विशाल ऐसा आते यहीं क्षीण होते हि पुण्य । ऐसे फलासक्त जो वेद-धर्मी पुनः पुनः जाकर लौटते हैं ॥ २१ ॥ २७७ राज-विद्या-समर्पणयोग
लोकपालोंके समान । अश्व खींचते वाहन । उच्चैश्रवा स-सम्मान । चलता आगे ॥ २६ ॥ वहां मिलते हैं ऐसे । भोग इंद्र-सुख जैसे । पुण्यांश लोप होनेसे । होते लोप ॥ २७ ॥ पुण्य क्षीण होनेके बाद— पुण्यका जब लोप होता । ऐंद्रैश्वर्य भी है मिटता । तब लौट आना पड़ता । मृत्यु लोकमें ॥ २८ ॥ धन गंवाता है जो वेश्यागमनमें । जा न सकता फिर उसके द्वारमें । दीक्षितके वैसे लज्जित जीवनमें । कहना क्या रहा ? ॥ २९ ॥ उन्होंने यहां खोया मुझको । पुण्य बलसे चाहा स्वर्गको । वंचित हुवे अमरत्वको । तब फिर मृत्यु-लोक ॥ ३० ॥ फिर माताका उदर गहर । पचाना वहाँ मलमूत्र सागर । वहां रहके नवमास भर । जनमते औ' मरते ॥ ३१ ॥ अजी ! स्वप्नमें पाते निधान । जगकर भूलते सम्पूर्ण । वैसे स्वर्गका सुख है जान । वेदज्ञोंका ३२ ॥ यद्यपि हैं वेद महान । मेरे बिन हैं वे अर्जुन । भूसा कूटना धान बिन । वैसा है व्यर्थ ॥ ३३ ॥ जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं उनका मैं दास बनता हूँ— इसलिए जो मेरे बिन । वेद-धर्म है अकारण । जान मुझे कुछ न जान । तो भी होगा सुखी ॥ ३४ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ चितसे सर्व भाव संपूर्ण । मुझे किया सर्व समर्पण । जैसे गर्भ-गोल हे अजान । न जानता उद्यम ॥ ३५ ॥ अनन्य भावसे नित्य भजते भक्त जो मुझे । उनका जो सदा लीन चलाता योग-क्षेम मैं ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी २७८
मेरे बिन कुछ भी नहीं । जिन्हें सुहाता कभी कहीं । उनके जीवन हेतु ही । एकमात्र मैं ॥ ३६ ॥ ऐसा अनन्य गति जो चित्त । मेरे ही चिंतनमें है रत । उनकी मैं हूँ दिन रात । सेवा करता ॥ ३७ ॥ जब वे एकनिष्ठ हो पार्थ । चलते रहते मेरा पथ । उनकी चिंता है मेरे साथ । लगती सदा ॥ ३८ ॥ फिर जो जो है उनको करना होता । वह सब मुझको ही करना पड़ता । जैसा अजात पक्षीका जीवन होता । पक्षिणीको जीना ॥ ३९ ॥ शिशु अपनी भूख-प्यास न जानता । तब माताको सब करना पड़ता । वैसे जो प्राण-पणसे मुझे भजता । उनकी सेवा लजाता नहीं ॥ ४० ॥ उसको चाह मेरे सायुज्यकी । उसे पूर्ण करना मेरे मनकी । या सेवाकी चाह मुझसे उसकी । जिससे होती प्रीति ॥ ४१ ॥ वैसे मनमें वे जो जो भाव । धरते पूर्ण करता देव । देता जो उसे मैं ही सदैव । रक्षण करता ॥ ४२ ॥ किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही अधिक हैं— येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ यह योग-क्षेम सम्पूर्ण । मुझ पर पडा अर्जुन । उसका है सर्व भावेन । मैं ही आश्रय ॥ ४३ ॥ अब अन्य कयी हैं संप्रदाय । जो मुझे न जानते मैं उन्हें नित्य । वे हैं अग्नि इन्द्र सूर्य सोमाय । कहकर हैं यजते ॥ ४४ ॥ वह भी है मेरा ही भजन । क्योंकि यह जो है मैं ही पूर्ण । किंतु यह सरल न जान । वक्र ही हैं ॥ ४५ ॥ श्रद्धा-पूर्वक जो कोयी पूजते अन्य दैवत । पूजते हैं मुझको ही किंतु है विधि छोडके ॥ २३ ॥ २७९ राज-विद्या समर्पणयोग
जैसे शाखा पल्लव वृक्षके । सारे हैं ये एक ही बीजके । किंतु पानी लेते हैं जडके । धर्म वैसे ही ॥ ४६ ॥ या जो दस इन्द्रियां हैं । सब एक ही देहकी हैं । इनके विषय जाते हैं । एक ही स्थानपे ॥ ४७ ॥ किंतु मृष्टान्न कैसे मधुर । कानोंमें भरना सुखकर । कैसे जाने सौरभ मधुर । सूँघकर नमक ॥ ४८ ॥ जैसे जिह्वासे रस चखना । घ्राणसे ही परिमल लेना । वैसे मेरा भजन करना । मुझे जानकर ॥ ४९ ॥ मुझे न जानकर भजन । करते हैं वह पार्थ जान । तभी कर्मके चक्षु हैं ज्ञान । वह हो निर्दोष ॥ ३५० ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४॥ वैसे देखें तो हे पार्थ । यज्ञोपहार समस्त । मेरे बिन कहो भोक्ता । कौन है अन्य ॥ ५१ ॥ सकल यज्ञका मैं आदि । इसका मैं ही हूं अवधि । किंतु मुझे छोड दुर्बुद्धि । भजते देवोंको ॥ ५२ ॥ गंगाजीको गंगोदक ही जैसे । देते हैं देव पितरोद्देश्यसे । देते हैं मेरा ही मुझको वैसे । भावसे अन्य ॥ ५३ ॥ यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम् ॥२५॥ इसीलिए सुन पांडुसुता । मुझे न मिलकर सर्वथा । दिया मनमें रख जो आस्था । वहीं गया ॥ ५४ ॥ भोक्ता मैं सब यज्ञोंका फलदायक भी स्वयं । न जाने तत्व जो मेरा गिरते हैं सदा वही ॥ २४ ॥ देवोंके भक्त देवोंसे पितृओंसे पितृ-पूजक । भूतोंके भक्त भूतोंसे मेरे जो मिलते मुझे ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी २८०
मन-वचन करणसे अर्जुन । करता है जो देवार्पण भजन । शरीर त्यागकर वह तत्क्षण । पाता देव-लोक ॥ ५५ ॥ अथवा पितरोंके व्रत । आचरता जिनका चित्त । समाप्त होतेही जिवित । पाते पितृ-लोक ॥ ५६ ॥ या क्षुद्र देवतादि जो भूत । जिनके हैं परम दैवत । अभिचारसे जिनका चित्त । करता उपासना ॥ ५७ ॥ उनका शरीर जब गिरता । भूतत्वको वह प्राप्त करता । संकल्पवशतासे है फळता । उनका कर्म ॥ ५८ ॥ मैं उनका हो जाता हूं जो मेरी निष्काम भक्ति करते हैं - जिसने देखा मुझको ही आंखसे । जिसने सुना मुझको ही कानसे । मुझको ही प्रतीत किया मनसे । वाणीसे गाया ॥ ५९ ॥ अजी ! सर्वत्र सर्वांगसे । मुझे भजन पूजनसे । दान-पुण्य क्रिया भी उसे । मेरे ही हेतु ॥ ३६० ॥ जिन्होंने किया मेरा ही अध्ययन । अंदर बाहर मेरा ही चिंतन । मुझसे जुडा उनका जीवन । सर्व-भावसे ॥ ६१ ॥ धोते हैं वे सदैव अहंकार । हरि दास्यत्वका कर स्वीकार । उनका लोभ है एक आखर । केवल हरि-भक्ति ही ॥ ६२ ॥ जो मेरे ही काममें सकाम । मेरे ही प्रेममें सप्रेम । मेरे ही भ्रममें संभ्रम । जानता अन्य ॥ ६३ ॥ उनके शास्त्र मुझे ही जानते । उनके मंत्र मुझे ही जुडते । उनके तंत्र सदा ही करते । मेरा ही भजन ॥ ६४ ॥ आनेसे पहले वे मरण । ऐक्य हुए मुझसे अर्जुन । मर करके वे कौन स्थान । पाएंगे पार्थ ॥ ६५ ॥ इसीलिए जो मद्याजी हुए । मेरे ही सायुज्यमें वे आये । उपचारार्थ जिन्होंने दिये । अपने भाव ॥ ६६ ॥ २८१ राज-विद्या-समर्पणयोग (36)
वैभव-पूर्ण पूजासे मैं किसीका नहीं होता — मुझे क्या कम है ? — अजी ! आत्मार्पणके बिन । न भाता मुझे कुछ भिन्न । अन्य उपचारसे जान । मैं नहीं मिलता ॥ ६७ ॥ जाना कहता जो वह न जानता । संपन्नता दिखाना ही है न्यूनता । कृतार्थ हुआ मैं यह जो कहता । वह कुछ नहीं जान ॥ ६८ ॥ दान-यज्ञ-तपका जो अर्जुन । मनमें धरता है अभिमान । यहां यह सब तृण-समान । व्यर्थ जान तू ॥ ६९ ॥ जो है ज्ञानमें संपन्न । वेदसे बढ़के कौन । अचल शेष समान । कोयी है क्या ? ॥ ३७० ॥ शैयाके नीचे शेष छिपता । वेद नेति नेति है कहता । जहां ज्ञान भी है पगलाता । सनकादिकका ॥ ७१ ॥ तापसमें है कहां कौन । जो शूल-पाणीके समान । लेता है त्यज अभिमान । पद-जल सिरपे ॥ ७२ ॥ या ऐश्वर्यमें कौन । है लक्ष्मीके समान । है श्रियाके समान । घरमें दासी ॥ ७३ ॥ जिसके खेलका घरौंदा एक । कहलाता अमरावति नेक । तब हुए खिलौने इन्द्रादिक । उनके सब ॥ ३७४ ॥ जब वह तोड़ती अनचाह खेल । होते रंक इन्द्रादिक ले दल-बल । जिसके कटाक्षसे होते वृक्ष फल । सुरतरु दिव्य ॥ ७५ ॥ जिनकी दासियाँ विभिन्न । हैं इतनी शक्ति सम्पन्न । वह लक्ष्मी देवी महान । है यहाँ दासी ॥ ७६ ॥ करती वह सर्व भावसे सेवा । छोड़के अभिमान सब पांडव । तब कहीं चरण धोनेका दावा । पा सकी वह ॥ ७७ ॥ छोड़कर सब बड़प्पन । भूलकर व्युत्पत्ति सम्पूर्ण । होते हैं लघु अणु समान । पाते तब सामिप्य ॥ ७८ ॥ सहस्र करके समीप । चंद्रका भी होता है लोप । खद्योत करता प्रलाप । अपने प्रकाशका ॥ ७९ ॥ ज्ञानेश्वरी २८२
न चलती जहाँ लक्ष्मीकी महत्ता । तथा शिवका तप नहीं पुरता । घामड़ लोगोंका भला क्या चलता । वहाँ धनंजय ॥ ८० ॥ इसीलिए तन अर्पित कर । सकल गुण कर न्योछावर । संपत्ति-मद श्री-चरण पर । रख तत्पश्चात् ॥ ८१ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ मुझे निष्काम प्रेम चाहिये-प्रेमसे दिया पत्ता भी मैं सुखसे खाता हूं— कर निःसीम भाव उल्लास । मेरे अर्पणका ले उद्देश्य । जो भी फल दिया स-संतोष । लेता हूँ मैं ॥ ८२ ॥ जब वह भक्त मुझे दिखाता । अपने हाथ मैं दोनों बढ़ाता । उसका डंठल भी न तोड़ता । खाता हूँ आदरसे ॥ ८३ ॥ किसीने शुद्ध भक्तिसे । दिया सुमन प्रीतिसे । खाता भावातिरेकसे । भूल सूंघना ॥ ८४ ॥ फल-फूल क्यों इक पात । सूखा भी हो उसका गात । लेता उसे मोदसे पार्थ । देते हैं जो भक्तिसे ॥ ८५ ॥ देख भरा वह सर्व-भावसे । भूखा तोषता जैसे अमृतसे । वैसा मैं मुखमें तोषसे उसे । डालता हूँ पार्थ ॥ ८६ ॥ अथवा ऐसा भी जब होगा । वह पात भी नहीं मिलेगा । पानीका बूंद एक तो होगा । उसे नहीं अकाल ॥ ८७ ॥ वह है सर्वत्र रहता । सबको सहज मिलता । उसीका अर्पण करता । सर्वस्व मान ॥ ८८ ॥ उसने बैकुण्ठके विशाल । बनाया मेरे लिए महल । कौस्तुभसे भी अति निर्मल । दिये अलंकार ॥ ८९ ॥ प्रेमसे पत्र या पुष्प फल या जल दे मुझे भक्तिसे जो दिया सारा खाता मैं सुख-पूर्वक ॥ २६ ॥ २८३ - राज-विद्या-समर्पणयोग
दूधके शैयागार । क्षीराब्धिसे सुन्दर । मेरे लिए अपार । दिये उसने ॥ ३९० ॥ कर्पूर चंदन अगरु । ऐसे सुगंध महामेरु । दी दीपमाल दिनकरु । उसने मुझे ॥ ९१ ॥ गरुड समान वाहन । सुरतरुके उपवन । काम धेनु बहु गोदान । उसने दिये ॥ ९२ ॥ अमृताम्भसे भी सरस । भक्तका जल-बिंदु लेश । लेकर पाता हूँ संतोष । धनंजय मैं ॥ ९३ ॥ कहना क्या है वह बात । जानता है तू यह पार्थ । सुदामाके चिउडेके हित । खोली गांठ ॥ ९४ ॥ केवल भक्ति ही मैं जानता । छोटा-मोटा वहां न कहता । भावका भूखा मैं रहता । अतिशय अर्जुन ॥ ९५ ॥ यहां है पत्र-पुष्प-फल-जल । भावार्पणका निमित्त केवल । आवश्यक है मुझको निष्कल । भक्ति तत्व सदैव ॥ ९६ ॥ इसलिए तू पांडुकुमार । अपनी बुद्धिको वशकर । अपने हृदयमें ही फिर । स्मरकर मुझको ॥ ९७ ॥ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥ जो सदैव मेरा स्मरण करता है वह सदैव मुक्त ही है— जो कुछ तू व्यापार करता । अथवा जो कुछ है भोगता । तथा यज्ञमें तू जो यजता । नाना विधिसे ॥ ९८ ॥ अथवा विशेष पात्रको दान । या सेवकको तू देता वेतन । तथा व्रत-तप आदि साधन । करेगा तू ॥ ९९ ॥ खाता जो होमना देता जो जो आचरता तप । जो भी कुछ करें कर्म कर तू मुझ अर्पण ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी २८४
क्रिया-जात जो संपूर्ण । होगा तुझसे अर्जुन । करना तू यह मान । है सब मदर्थ ॥ ४०० ॥ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ जैसे अग्निकुंडमें पड बीज । अंकुर दशा खोता है सहज । वैसे अर्पित शुभाशुभ मुझ । न फलते कभी ॥ १ ॥ अनर्पित कर्म जब रहता । सुख दुःखमें वह फलता । उसके भोगार्थ आना पडता । नया जन्म लेकर ॥ २ ॥ है जो मदर्पित कर्म । पोंछता मरण-जन्म । करे जन्म-सह श्रम । अन्य सब नष्ट ॥ ३ ॥ यह है संन्यस्तकी युक्ति । सरल होती फल-प्राप्ति । आचरणमें इसे अति । शीघ्र ही लाना ॥ ४ ॥ इससे देह-बंध नहीं घडता । सुख-दुखाब्दिका संबंध न आता । सुखका है सुखमें ही ऐक्य होता । सहज-रूपसे ॥ ५ ॥ समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २६ ॥ पूछेगा पार्थ तू वह कैसा । सर्व भूतमें सदा एकसा । जहां नहीं आप पर ऐसा । भेद-भाव ॥ ६ ॥ जो सदा सर्वत्र मुझे देखते हैं वे सदेह मुक्त हैं, मद्रूप हैं— इस भांति मुझे जानकर । तोड कर्तृत्वका अहंकार । जीव-भावसे जो कर्मकर । भजते मुझको ॥ ७ ॥
जिससे तोडके सारे कर्म-बंध शुभाशुभ । साधके योग-संन्यास पायेगा मुक्त हो मुझे ॥ २८ ॥ सम मैं सब भूतोंसे प्रियाप्रिय न है मुझे । किंतु है मुझमें भक्त भक्तमें मैं बसा नित ॥ २९ ॥ २८५ राज-विद्या-समर्पणयोग
दीखते स्थित हैं देहमें । किंतु वे स्थिर हैं मुझमें । औ' मैं उनके हृदयमें । रहता संपूर्ण ॥ ८ ॥ संपूर्ण वटवृक्ष जैसे । बीजमें रहता है वैसे । तथा रहता बीज जैसे । वट-वृक्षमें ॥ ९ ॥ वैसे हमें और उन्हें परस्पर । बाहरको नामका ही है अंतर । किंतु अंतरमें जो वस्तु-विचार । हम हैं एक ॥ ४१० ॥ उधार लाये हुए अलंकार । चढाते हैं जैसे शरीर पर । वैसे धारण करता शरीर । उदास भावसे ॥ ११ ॥ परिमल ले गया जब पवन । डंडीमें रहता है तब सुमन । वैसे प्रारब्ध भोगके ही कारण । शरीर रहता है ॥ १२ ॥ अहंकार उनका संपूर्ण । हुआ है विलीन मद्भावन । मेरे ही अंदर है अर्जुन । स्थिर रूपसे वह ॥ १३ ॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥३०॥ प्रेम भावसे करता भजन । उसको फिर न मिलता तन । उसकी जातिकी नहीं अर्जुन । कोई बात ॥ १४ ॥ जो जिस क्षणसे भक्त बना उसी क्षणसे मेरा बना— देखें तो उसका पूर्व जीवन । सब ही दुराचारोंकी है खान । किंतु उसने है अब जीवन । बेचा है भक्तिको ॥ १५ ॥ मरण समयमें जैसी है मति । रहती है जैसी, वैसी ही गति । मिलती है यह जानके भक्ति । की है सर्व भावसे ॥ १३ ॥ पहले था रत दुराचार । सर्वोत्तम है पांडुकुमार । महापूरमें है डूबकर । मरा नहीं ॥ १७ ॥ कोयी बडा दुराचारी भजे मुझ अनन्य हो । मानना उसको साधु उसको शुभ निश्चयी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी २८६
जीवन उसका इस किनारे आया । इसलिए डूबा हुआ भी व्यर्थ गया रहा ही ऐसा नहीं जो पाप किया । भक्तिके कारण ॥ १८ ॥ पहले था जो दुराचारी महान् । किंतु पश्चात्ताप तीर्थमें कर स्नान । मेरी शरणमें आया जो अर्जुन । सर्व भावसे ॥ १९ ॥ उसका है अब पवित्र कुल । अभिजात्य तथा अति निर्मल । जन्मका उसको मिला है फल । भक्तिके कारण ॥ ४२० ॥ उसने किया सब अध्ययन । तथा समस्त तप अनुष्ठान । अष्टांग-योग भी सुन अर्जुन । सिद्ध उसको ॥ २१ ॥ रहने दे अब यह पार्थ । जिसकी चाह है "मैं" सतत । कर्म-बंधनसे वह मुक्त । सर्वदा ही ॥ २२ ॥ मन-बुद्धि सब एक गांठमें । बांध कर दी वह पिटारीमें । वह पिटारी मेरे स्वरूपमें । रख दी धनंजय ॥ २३ ॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ स-समय वह मद्रूप होगा । चितमें तेरे यह भाव होगा । सदैव जो अमृतमें रहेगा । मरेगा कैसे ॥ २४ ॥ तभी रात्री कहलाती है । सूर्य जब नहीं होता है । भद्भक्ति बिन जो होता है । वह सब पाप ॥ २५ ॥ इसलिए उसका चित । रहता मुझमें सतत । तभी होता वह निश्चित । मद्रूप तत्वतः ॥ २६ ॥ जैसे दीपसे दीप है जलता । वहां पहला कौन न जानता । वैसे सदैव जो मुझे भजता । होता वह मैं ही ॥ २७ ॥ फिर मेरी ही नित्य-शांति । उसकी दशा वही कांति । जीवित रहता स-भक्ति । मेरे ही जीवसे ॥ २८ ॥ होगा जो शीघ्र धर्मात्मा शांति शाश्वत पाकर । जान निश्चित तू मेरे भक्तका नाश है नहीं ॥ ३१ ॥ २८७ राज-विद्या-समर्पणयोग
केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी प्राप्ति नहीं होती— कहूँ कितना पुनः पुनः । वही वही फिर अर्जुन। नहीं होगी भक्तिके बिन । मेरी प्राप्ति ॥ २९ ॥ व्यर्थ है कुल अभिमान । व्यर्थ शास्त्राध्ययनभान । व्यर्थ है श्रेष्ठताका मान । लोभ-मात्र ॥ ४३० ॥ व्यर्थ है रूप अभिमान । व्यर्थ है तारुण्य यौवन । एक मेरे भावके बिन । व्यर्थका बतंगड ॥ ३१ ॥ भुट्टे लगे बहु धान विहीन । बसे नगर, पर हैं वीरान । उसका है कहो क्या प्रयोजन । वैसे ही पार्थ ॥ ३२ ॥ सरोवर बड़ा नीर विहीन । तथा दुखीसे दुखिका मिलन । बांझ लताका बहार सुमन । खिला वैसा ॥ ३३ ॥ वैसा मानो सकल वैभव । अथवा कुल-जाति-गौरव । वैसा ही देह स-अवयव । किंतु नहीं प्राण ॥ ३४ ॥ वैसी मेरी भक्ति बिन । व्यर्थ है सारा जीवन । अजी ! पृथ्विपे पाषाण । रहते वैसे ॥ ३५ ॥ हिंवारेका आच्छादन घन । त्यज देते हैं जैसे सज्जन । पुण्य करता अवहेलन । वैसे अभक्तको ॥ ३६ ॥ नीममें निंबौरिका बहार आया । जिससे कौवोंका ही सुकाल भया । वैसे भक्ति-हीनको ऐश्वर्य आया । दोष बढानेको ॥ ३७ ॥ परोसा खप्परमें षड्रसान्न । रखा चौराहे पर अपरान्ह । खायेगा उसको केवल श्वान । वैसे ही पार्थ ॥ ३८ ॥ वैसे भक्ति-हीनका जीवन । स्वप्नमें भी सुकृति-विहीन । संसार दुःखका आव्हान । केवल-मात्र ॥ ३९ ॥ व्यर्थ है कुलकी उत्तमता । अन्त्यजका भी तन मिलता । पशुका शरीर भी मिलता । शरीरके नामसे ॥ ४४० ॥ पकड़ा मगरने गजेन्द्रको । उसने स्मरण किया मुझको । व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी २८८
मेरी भक्ति में कुल जाति आदिका बंधन नहीं—मुझे प्रेम चाहिये— आती लेनेमें लज्जा नाम । जो अधमोंमें अधमतम । ऐसी योनिमें जिन्होंने जन्म । लिया है अर्जुन ॥ ४२ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ ३२ ॥ जो हैं पापयोनिके मूढ । जैसे पत्थर सम जड । किंतु है मुझमें वे दृढ । सर्व भावसे ॥ ४३ ॥ वाणीमें जिनके मेरे आलाप । नयन भोगते मेरे ही रूप । मनमें सतत मेरा संकल्प । भरे रहते हैं ॥ ४४ ॥ मेरी कीर्ति-कथाके बिन । न करते अन्य श्रवण । जिनके सर्वांग-भूषण । मेरी सेवा ॥ ४५ ॥ ज्ञानका विषय वे न जानते । केवल मुझ एकको जानते । उन्हें ऐसा लाभ मिला तो जीते । नहीं तो मरण ॥ ४६ ॥ ऐसा हुआ जो सम्पूर्ण । सर्व-भाव कर अर्पण । जीवनका बना जीवन । मैं ही एक ॥ ४७ ॥ पाप योनिमें हुआ जनन । सुनके भी न हुआ पठन । तुलनामें उनका वज़न । मुझसे कम नहीं ॥ ४८ ॥ भक्ति संपन्नताके कारण । देव बने राक्षसोंसे हीन । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ४९ ॥ किया प्रह्लादका अंगीकार । मेरे स्थानमें पांडुकुमार । प्रह्लाद कथामें साक्षात्कार । होता मेरा ही ॥ ४५० ॥ उसका है दैत्य-कुल आखर । इंद्रको नहीं वह अधिकार । यहां है भक्ति महिमा अपार । कुल-जातिकी नहीं ॥ ५१ ॥
करके आसरा मेरा भोले स्त्री-वैश्य-शूद्र भी । या पाप-योनिके जीव पाते हैं सुख शाश्वत ॥ ३२ ॥ (37) २८९ राज-विद्या-समर्पणयोग
राजाज्ञाके होते चार अक्षर । वह भी चामके टुकडे पर । वह टुकडा देता है अपार । वस्तु-मात्र ॥ ५२ ॥ आज्ञाके उन अक्षरके बिन । स्वर्ण-रजत भी प्रमाण-हीन । उस अक्षर चामके कारण । मिलते सर्व वस्तु ॥ ५३ ॥ उत्तमता तो तभी है । यथा सर्वज्ञता भी है । मन बुद्धि भारता है । जब मेरे प्रेमसे ॥ ५४ ॥ इसलिए कुल जाति वर्ण । ये सब ही हैं बिना कारण । मुझमें हैं अनन्य शरण । सार्थक एक ॥ ५५ ॥ मुझमें मिलनेके बाद कोयी भिन्नता नहीं रहती— जब किसी न किसी कारण । मन होता मद्रूपमें लीन । तब होता है पुर्णरूपेण । जाति कुलादि व्यर्थ ॥ ५३ ॥ तब तक नाले कहलाते । गंगामें जब नहीं मिलते । फिर मात्र गंगाजल होते । गंगारूप हो ॥ ५७ ॥ जैसे खदिर चंदनादि काष्ठ । तब तक भिन्न रहते स्पष्ट । यज्ञाहुति देने पर है नष्ट । भिन्नता सारी ॥ ५८ ॥ वैसे हैं क्षत्रिय वैश्य स्त्रियां । शूद्र अन्त्यजादि कहलाया । मुझमें विलय न हो गया । तब तक ही सब ॥ ५९ ॥ जाति कुल व्यक्ति फिर बनता शून्य । होता है जब चित्त मुझमें अनन्य । घुलते जैसे लवण कण सामान्य । सागरमें वैसे ॥ ४६० ॥ तब तक नदी नदोंका नाम रहता । वैसे ही पूर्व पश्चिम प्रवाह रहता । किंतु जब सागरमें मिल जाता । सब होता एकरूप ॥ ६१ ॥ लेकर कोयी न कोयी निमित्त । होता लय जब मुझमें चित्त । फिर होता है उसमें निश्चित । मद्रूप ऐसे ॥ ६२॥ अव्यभिचारी शत्रुतासे भी मेरी प्राप्ति होती है — तोडने हेतु पडा पारस पर । लोहेका घन उसे स्पर्श कर । होगा निश्चित ही सुवर्ण सत्वर । सहज-भावसे ॥ ६३ ॥ ज्ञानेश्वरी २९०