ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
कार्यज्ञान, कर्म विकर्म समासिरूप आत्मज्ञान, संशय-विच्छेद, ईश्वर विषयक ज्ञान, समर्पण प्रक्रिया- जन्य ज्ञान. ईश्वरी भावका ज्ञान, विभूति ज्ञान, विश्वरूप-बोधज्ञान, फल त्यागका ज्ञान, वास्तविक- ज्ञान, दैवी गुणोंका ज्ञान, मनन- निदिध्यासादिद्वारा शास्त्रीय ज्ञान, गुण-विस्तार प्रक्रियाजन्य ज्ञान, बुद्धिका प्रकाश, आकलन शक्ति, चिंतन शक्ति, ज्ञानत्रिपुटीमें एक, ज्ञानत्रिपुटीका प्रतीक रूप, ब्राह्मणोंके कर्तव्यरूप स्वाध्या- यादिस संपादन करनेवाली संपत्ति, अध्ययन, ज्ञानाग्नि- आत्मज्ञानरूपी अग्नि, ज्ञानोपदेश- आत्मज्ञानका उपदेश. ज्ञानखड्ग, ज्ञानदीप- ज्ञानरूपी खड्ग ज्ञानरूपी दीप. ज्ञानदृष्टि- शास्त्रीय विवेक दृष्टि स्वानुभव प्रधान विवेकदृष्टि. ज्ञाननौका- आत्मज्ञानरूपी नौका. ज्ञानयज्ञ- आत्मज्ञानरूपी यज्ञ, परमेश्वर, विषयक ज्ञानरूपी यज्ञ, सर्वत्र ब्रह्मही है उसके बिना अन्य कुछ भी नहीं ऐसी साम्यदृष्टि जन्य आचरण, विश्वमें जो कुछ भला बुरा होता है वह ईश्वरार्पण होता यह भाव, अविरोधीजीवन दृष्टि, यह व्यापक ज्ञानयज्ञ है. अर्थचिंतनयुक्त गीताभ्यास भी ज्ञानयज्ञ है. ज्ञानशून्य, ज्ञानहीन- बुद्धिहीन, विवेकहीन. ज्ञानी- आत्मविषयकज्ञान जिसमें है वह. ज्ञानीजनवनवसंत- ज्ञानी लोगोंमें आनं- दका बहार लानेवाला. ज्ञेय- ज्ञान त्रिपुटीमें एक, नम्रता आदि ज्ञान लक्षणोंसे जिस वस्तुको जाना जाता है वह वस्तु; विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति तथा क्षयका मूल कारण, सबके हृदयमें जो है वह, ज्ञेय-दर्शन- अपने हृदयस्थको जानना. ज्ञामोन्मेषवासना- ज्ञानरूपी आनंदकी वासना करनेवाला. ज्योतिरिंगण-ज्ञानेश्वरीका मूल मराठी शब्द जुगनू. झ झिल्ली- बहुत पतली खाल. आंख पर आने वाला जाल. झुंज- मूलमराठी शब्द लडाई. झोल- झूठा, मिथ्या, असत्य मूल मराठी शब्द. ट-ठ टेकडी- पहाडी, टीला. ठाव- स्थान, आसरा. ठठोली- हंसी मजाक. ठौर- स्थान. ड डबरा- पानीसे भरा हुवा गड्डा. कुंड. डोंगर- पहाड, टीला. डोंगी- छोटी नांव. त तंतु- सूत, तागा. तत्- ब्रह्मवाचक शब्द अलिप्त साधना तथा निष्कामताका प्रतीक तत्पद- ईश्वरत्व तथा ब्रह्मतत्व. श्रेष्ठ पद. तत्व- ब्रह्मवस्तु, भाव, सिद्धांत, वस्तुका यथार्थ रूप, रहस्य, मूलस्थिति, तत्वज्ञान, विश्वके कारणीभूत मूल तत्व, जीवनका स्वरूप, पृथक्करण शास्त्र. तत्वज्ञ- वस्तुको यथार्थरूप जाननेवाला. तत्वनिष्ठ- ब्रह्मनिष्ठ. तप साधना, श्रोत्रादि इंद्रियोंका संयमाग्निमें हवन, वृत्तिशोषण, वा.
३०७ परिशिष्ट ६
अप्रशस्य वृत्ति, दुःखका विचार करके प्रसन्न रहना, हीन वृत्तिका विरोध करके भी सौम्यता, निरंतर कर्म करते हुए आत्मचिंतन, भोग पचा सके इतना संयम, गुणदोष पचा सके विश्लेषण करके साम्य भाव, यह मानस तप, ऐच्छिक दारिद्र्य ब्राह्मणोंका तप है. तम- अंधकार, मोह, तामस कर्म. ताज- मुकुट शिरोभूषण. तामस- तमोगुणी मनुष्य. तुर्या- जाग्रति, स्वप्न, सुषुप्ति, इन तीनोंके परेकी चौथी अवस्था. तृष्णा- अभिलाषा, लालच, जो देखा वह चाहिए ऐसा लगना, अप्राप्त वस्तुकी आशा, तृष्णा. त्याग- तजना, कर्मफल त्याग, अहंता- ममता त्याग, स्वार्थत्याग, स्वामित्वविसर्जन = सर्व समर्पण. त्रिपुटी- तीनोंका पुंज, कर्ता, क्रिया, कर्म, ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान ज्ञेय आदि. त्रिभुवनगजपंचानन- त्रिभुवन रूपी गजके लिये सिंह समान. थ थैमान- मूल मराठी शब्द, नंगा नाच. थोथा- पोला, खोखला. थोर- मूल मराठी शब्द- श्रेष्ठ. द दक्ष- कुशल, प्रवीण, सावधान, तत्पर. दंडवत- सरल भूमिष्ठ होकर सर्वांग प्रणाम करना. दंभ- दिखावटी धर्माचरण, अहंकार प्रदर्शन. वृथा अभिमान, अपने विषयमें मूढ भावना. दया- दुखितोंके विषयमें करुणा, दूसरोंके दुःख निवारणकी तडप, दर्शन- दृष्टि, शास्त्र, साक्षात्कार, व्यापक, अनुभव, प्रतिभादर्शन, प्रतीति- दर्शन. दर्शनानुग्रह- साक्षात्कारका अनुग्रह. दशन- दांत. दादुर- मेंढक. दावानल- वनकी आग. दिव्य- अद्भुत, प्रकाशमय, लोकोत्तर, स्वर्गीय, देवत्व-युक्त, भावमय, प्रतिभा. दिव्यदृष्टि- ईश्वरप्रसादसे प्राप्त दृष्टि. दीठ- दृष्टि. दुभती- मूल मराठी शब्द, दूध देनेवाली दुधाल गाय. दुराराध्य- अत्यंत कष्टसे संतुष्ट होनेवाला, प्राप्त होनेमें अत्यंत कठिन. दुःख- प्रतिकूल संवेदन. दुःखान्धि- दुःखका समुद्र. देवः स्वर्गके इंद्रादिदेवता, सृष्टिदेवत ईश्वरसे भिन्न अन्य दैवत, सर्व नियंता, जिसके नियंत्रणमें अन्य देव भी हैं, पितृरूप देवता, पूज्य लोगोंके साथ आनेवाला आदर सूचक शब्द. देवतार्चन- देवपूजा. देहरी- द्वारके चौखटकी नीचेकी लकडी. देहहेत- देह ही मैं ऐसी भावना, देहका अभिमान. दैवी- ईश्वरीय, देवोका, ईश्वरनिष्ठ, ईश्वराभिमुख. दोष- अनर्थ, हानि, व्याधि, अनर्थ आचार, आहारादिसे होनेवाला अनिवार्य पाप, चित्तका मल, विकार, पापरूप. द्यूत- जूआ, बिना परिश्रम धन कमानेकी वृत्ति. द्रवना- पिघलना, गलना, ज्ञानेश्वरी २०८
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[बायाँ स्तम्भ]
द्वेष- दुःखानुशायी वृत्ति, शत्रुता, मत्सर. द्वैत- भेद, ये जीव-ईश्वर भेद, जड ईश्वर भेद, जीवोंमें परस्पर भेद, जड जीव भेद, जड-जड भेद. यह पांच प्रकारके भेद हैं अर्थात द्वैत है. द्वैताकार- इस प्रकारके पंच भेदात्मक अनुभूति. द्वैध- मनका द्विधा भाव, संकल्प-विकल्प, डांवाडोल मनःस्थिति.
ध धनंजय- अर्जुन. धरा, धरातल- पृथ्वी, धर्म- धर्म विशेष, जिनका गीता अथवा ज्ञानेश्वरी मे चर्चा हुई है, जाति-धर्म अथवा कुल धर्म, कर्तव्या-कर्तव्य विचार, प्राप्तकर्तव्य, क्षत्रियोंका धर्मयुद्ध, फलत्यागका निष्काम कर्म, निष्ठानसार प्राप्तकर्म स्वधर्म, अभ्युदय निःश्रेयस प्रधान आचरण संहिता, यमनियमादि शुभप्रवृत्ति, पुण्याचरण, समर्पणपूर्वक सेवाका सेवाधर्म, भक्ति-वेदाध्ययनादि कर्म, भक्ति-आहार-शुद्धि, अध्ययनयज्ञ-कर्तव्य, गुण विकारात्मक नीति धर्म, विहितकर्म धर्म, परोपकार धर्म वर्ण-धर्म, धर्माधर्मचिंतन, ईश्वरशरणताका सर्व श्रेष्ठ धर्म. धर्म निधान- धर्मका भांडार. धसाल- अविचारी, ढीला. धातु- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा ये सप्त धातु जिस पर शरीर टिका हुवा है. धात्री- आधार, जन्मभूमि, धी- ज्ञान, बुद्धि.
[दायाँ स्तम्भ]
धीर- धैर्य, धैर्यवान, धीरज, धीरजवाला धूम- शरीरस्थ अग्निकी ज्वालाहीन स्थिति, कर्मयोग-स्फूर्तिका अभाव. धूममार्ग- स्फूर्तिशून्य तमोमार्ग जो कर्तव्य-भावना की आगकी दवा देता है धृति- तितिक्षा, सहनशक्ति, शरीर घटककी परस्पर चिपके रहनेकी शक्ति, कार्य चलाने प्रेरणा देनेवाली बुद्धिकी सहयोग शक्ति. धोकटी- नायीका चमडेका थैला. ध्यान- किसी बातको चित्तमें घुलाते रखना, चित्तै काग्रता, ईश्वर चिंतन समझना, सम्यक विचार
न नग- पर्वत पहाड, नग्नसुंचितमुंड- दिगंबर श्रमण, नभ- आकाश. नंदिनीकाबछडा- कामधेनुका बछडा. नम- नमस्कार, नम्र, भक्तियुक्त, नम्र- विनीत, लीन. नवल- मूल मराठी शब्द. आश्चर्य, अचरज नवविधवायु- पंचप्राण. प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान तथा नागकूर्म, कृकला, देवदत्त व धनंजय ऐसे पांच प्रकारके वायु हैं इसमें कोई धनंजयको नौ प्रकार के वायु मानते हैं प्राणों को वायु माना है. नाद- ध्वनि, आवाज. नाभीकंद- नाभीकी गांठ निकंदन- विनाश, वध, निकुंभ- गंडस्थल हाथीका मस्तक परका मर्मस्थान. मूल मराठी शब्द. निगमरत्नाचल- वेदरूपी रत्नोंका पर्वत. निगमागमद्रुमफल- वेद तथा शास्त्ररूपी वृक्षका फल. निगूढ- न दीखनेवाला, रहस्यमय, गुप्त. निग्रह- नियमन, इंद्रिय-दमन.
२०९ | परिशिष्ट ६
निग्रही- निगमन करनेवाला। इंद्रिय, मन तथा प्राणका निरोध करनेवाला. निजजनाखिलमंगल- अपने भक्तोंका संपूर्ण कल्याण करनेवाला. निजजनमितभजनीय- नित्य अपने लोगोंकी ओरसे भजन किये जानेयोग्य. निजधाम- अपना स्थान, आत्मस्वरूप. निजनिर्झरसोमकांत-आप द्रवेनेवाला सोम- कांत मणि. निजसुख- आत्मसुख. नित्य- किसी न किसी रूपमें सदैव रहने- वाला. आत्मा, ईश्वर ब्रह्म, सदैव सतत. नित्यकर्म- रोज किया जानेवाला संध्यादि कर्म. नित्यतत्व-सतत रहनेवाला तत्व, आत्मा ब्रह्म नित्यपद- परमात्मपद. नित्ययुक्त-सतत परमात्मासे जुडा हुवा. नित्यनिस्तारखिलमल - जिसने सदा के लिये अपने सभी दोष निकाल दिये हैं, जो नित्यशुद्ध है. निदान-मूल कारण, परिणाम. निधान-आश्रय, आधार, निधि, कोष. निनाद-मूल मराठी शब्द, गूंजन. निबौंला-नीमका फल. निमिषोन्मिष-पलकोकी हलचल. नियतांतःकरण-संयमित-नियत-अंतःकरण. नियोजितवितंड-निश्चित प्रकारका मिथ्या वादविवाद, शाब्दिक तर्क या युक्तिवाद बातूनी कला. निरपेक्षालंकार-इच्छा रहितताके अलंकारसे सजा हुवा. निरवधि-अमर्याद. निराकार-बिना किसी खास आकाराका परमात्मा. ब्रह्म, आकाश शून्य. निरालंब-जिसे दूसरे किसीका आश्रय न हो, स्वयंसिद्ध. बाह्य साधना का आश्रय टूटा हुवा. सिद्ध. निरिच्छ-इच्छा रहित, कामना रहित. निरुपाधिक-उपाधिरहित, देहादि बाह्य प्रपंच रहित, संग रहित, अपने मूल रूपका. निरूपण-कहना, किसी पर विशेष प्रकाश डालना, किसीका विवेचन करना. निरोध-निग्रह, चित्त निरोधकी साधना. योग-साधना. निर्गुण-गुण रहित, गुणवर्जित, सत्त्वादि तीन गुणोंसे परेका. निर्भय-भय रहित, जिसमें भय का कारणभी न रहा हो. निर्मत्सर- मत्सररहित. दूसरोंका बिचार न करके अपना कर्तव्य करनेवाला. निर्मल- वासना रहित, काम-संकल्प रहित अंतर्बाह्य पवित्र, त्रिकरणशुद्ध, सात्विक चारित्र्यका, मत्सरादि दोष रहित, अर्जुन. निर्मोह- मोहरहित. वैषम्यभावरहित. अनिश्चिततामेंसे निकला हुवा, विवेकी, कार्याकार्य व्यस्थित जाननेवाला. निर्लिप्त- अलिप्त, लेप रहित, जैसेके वैसे रहनेवाला, परिवर्तनके परिणामसे रहित. निर्विकार- विकाररहित, जन्ममरणादि विकार रहित, कामक्रोधादि विकार रहित, कर्तृत्वादि विकार रहित, गुणजन्य विकार रहित, किसी भी विका- रोंसे रहित. निर्विकल्प- असंप्रज्ञात. बाह्य जगतका भान रहित, अहंकार-बीज रहित. समाधि स्थितिका अंतिम छो निर्विकल्प समाधि. इस स्थितिमें किसी भी प्रकारकी वासनाका बीज भी नहीं रहता. इसलिए इस अव- स्थाको 'निर्बीज' भी कहते हैं बीज ही नहीं रहा तब अंकुर कहां ?
ज्ञानेश्वरी २१०
निश्चिंत- चिंतारहित. संसारके विषयमें निश्चिंत, कर्म फलके विषयमें निश्चिंत, उदासीन. निष्काम- भोग वासना रहित. अन्य कामना रहित. फलेच्छा रहित, निरिच्छ. निःसंग- संगरहित, आसक्ति रहित, प्राप्त वस्तुके विषयमें स्नेह रहित, तथा अप्राप्य वस्तुके विषयमें कामना रहित. निःसीमागम्य- निःसीम+अगम्य, मर्यादा रहित, अनंत इसलिये अगम्य. समझकी सीमामें न आनेवाला. नीलोत्पल-नील कमल. नैष्कर्म्य- कर्मसमाप्तिकी अवस्था, अनंत कर्म करने पर भी न करनेकासा, रहना, न करनेकासा करना, कर्मके थकानसे मुक्ति ! प पगहा-गिरवाँ, पशुके गलेमें बांधा हुवा लकडीका लंबा टुकडा. पघा, असहायस्थिति. पंचक-पांचोंका समुदाय. अर्थ-पंचक, इंद्रिय पंचक (पांच ज्ञानेंद्रिय पांच कर्मेंद्रिय) शब्द स्पर्शादि विषय पंचक, पृथ्वी आप तेजादि भूतपंचक, आदि. पंचत्वलीन-मृत्यु. पंचम-सप्त स्वरोंमेंसे पांचवा स्वर, कोकिलाका स्वर. चांडाल. पंचानन-सिंह. पट-वस्त्र. पटीं-मूल मराठी ज्ञानेश्वरीके मराठी व्याक- रणको स्वीकार करके पट शब्दको ही " पटीं " सप्तमी विभक्ति बना करके " पटमें " ऐसा अर्थ लिया गया है. पण्यांगना-खरीदी गयी स्त्री, वेश्या, दासी. पद-मोक्षरूप, ब्रह्मपद, अक्षर ब्रह्म, प्राप्तव्य स्थान, साध्य. पदपिंडत्व-जीव-शिवत्व-आत्म-परमात्मत्व. पदबंध-विशिष्ट प्रकारकी शब्दरचना. पद्मकर-कमलसा हाथ. पर-वस्तु, ब्रह्म, उस पारका, दूसरी ओरका. परतत्त्व- परब्रह्म. परम- अंतिम, श्रेष्ठ, विश्वव्यापक, सर्वांतर्यामी. परमात्मतत्व- विश्वव्यापक आत्मतत्व. परमात्मा- सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, चैतन्य स्वरूप, विश्ववाला, सर्वात्मक- सत्ता, तथा देहमें प्रतिबिंबित अंतरात्मा. परमेश्वर- सर्वश्रेष्ठ सर्वसत्ताधीश स्वामी. परा- उस ओरकी. पराकृति श्रेष्ठ- प्रकृति. परा भक्ति, श्रेष्ठभक्ति ज्ञानभक्ति. पराप्रमेयप्रमदाविलासिंया- परावाणीका विषय जो स्वरूपस्थिति है उस चिर तरुणीसे विलास करनेवाला. परिग्रह- व्यर्थ वस्तुओंका संग्रह. परिवार प्रपंच. परिणितोपरमॅकप्रिय- परिपक्व वैराग्य- वंतोंसे प्रेम रखनेवाला. परिमल- सुगंध. परिहार- उत्तर, निराकरण. पवित्र- पुण्यरूप, पावन करनेवाला. जहांके भाव, संस्कार, स्मरण आदि सभी पावन हों ऐसा अंतर्बाह्य शुद्ध. पसायदान-- प्रसाददान. पांडुरोगकी पुष्टि- पांडुरोग-रक्ताल्पता-में आनेवाली सूजन. पाणिग्रहण- हाथ थामना, करग्रहण, विवाह, अंतिम समय तक साथ देना. पातालव्याल- पातालका सर्प. पादज- पैरकी ओरसे जन्मनेवाला, भाग्यशाली. पाप- गीतामें अनेक प्रकारके पापोंका ३११ परिशिष्ट ६
उल्लेख है, स्वजन घातका पाप, पाप, पूर्वमीमांसा- कर्मकांड. पूर्व-मीमांसामें हीन विचारका पाप, स्वधर्म आचरण-धर्म है. दर्शन शास्त्रमें परित्यागका पाप, कर्तव्यच्युतिका ज्ञानका विचार करनेके प्रथम पाप, अपने लिये ही पकाकर अन्न कर्मकांड अथवा धर्मका विचार खानेका पाप, यज्ञ-रहित भोजनका करना आवश्यक माना जाता है. पाप, परधर्म स्वीकारका पाप, तभी वेदांतमें कहे गये आत्माका दुष्कर्मका पाप, पूर्वजन्मकृत पाप, विचार समझ सकते हैं. इसीलिये पापयोनि- पूर्वजन्मकृत पापका परिणाम. कर्मकांडको पूर्वमीमांसा तथा पापिष्ठ, पापी- अतिशय पाप करनेवाला. वेदांत विषयको उत्तरमीमांसा दुराचारी. परपीडक. कहा जाता है. जैमिनी इसका पारंगत- पार पहुंचा हुवा, निष्णात. मूल आचार्य है. बारह अध्या- पार्थिव- पृथिवी विषयक. योंमें जैमिनिने इसका विचार पारुष्य- कठोरता, कड़ापन. किया है इसलिये इस ग्रंथको पालनशीललालस- रक्षण करनेके स्वभाव "द्वादश-लक्षणी" कहा जाता है. वाला. पेरक- पेरनेवाला. पिंगलानल- पीला भूरा रंगवाला अग्नि. पोखरा- पुष्करणी, तालाब, सरोवर. पिनाकपाणि- शंकर. पौली- दक्षिणके मंदिरोंमें मंदिरके पिशाचोच्चाटन- पिशाचको अलग करना. चारों ओर बरामदा बनाकर किसीको लगे भूत वेतालादिको उसके एक ओर दीवार रहती उससे अलग करके भगाना. है, किसी बडे संतर्पणमें इसी पीनाकावयव- पुष्ट अवयववाला, पुष्ट- बरामदे पर बैठ कर भोजनादि शरीरवाला. किया जाता है, इन बरामदोंको पीयूष- अमृत. पौली कहा जाता है. पुण्य- सत्कार्य, सत्कार्य जन्य आनंद, प्रकृति- शरीर, माया, मूल स्थिति, मूल- यज्ञादि धर्मकृत्य तथा उसका फल, माया, कर्तृत्वकारण, त्रिगुणा- पुण्य-कर्मजन्य पावित्र्य, चित्त- त्मक, ब्रह्मकी सगुणावस्था, शुद्धि, शुभ-विचार, सत्त्वगुण, अवतार कारणार्थ ईश्वरीशक्ति, पुण्यकर्म- शुभकर्म, निष्काम-शुभकर्म, चित्त- जडाजड प्रकृति. शुद्धि, पाप-वासनासे निवृत्ति, भ्रम पुरुष- मनुष्य, ईश्वर, सर्वान्तर्यामी, ब्रह्म निरास, द्वंद्व-निरास, भक्तिमें द्वंद्वातीत सगुण-निर्गुणातीत-जीव, निष्ठा, ज्ञान-निष्ठा, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ उपाधियुक्त, प्रकृतिपूरक, प्रकृतिसे ज्ञान, आत्मानारमज्ञान, आत्मा परे, निरुपाधिक क्षर-पुरुष,अक्षर- अगत तथा परमात्मा विषयक पुरुष, क्षराक्षर पुरुष, पुरुषोत्तम, ज्ञान, अधिभूतादिका विज्ञान, प्रकृति- शरीर, माया, मूल स्थिति, मूल- अंतकालीन साधना, ब्रह्मलीनता. माया, कर्तृत्वकारण, त्रिगुणात्मिका पुनरावर्तन- पुनर्जन्म, पुनः पीछे आना. ब्रह्मकी सगुणावस्था,अवतारार्थ पुलक- हर्षोन्मादसे आनेवाला रोमांच. ईश्वरीयशक्ती, जडाजडप्रकृति. प्रेमोद्वेगजन्य आनंद. उत्पत्ति, स्थिति, लयके कारणीभूत ज्ञानेश्वरी २१२
प्रकृति, ईश्वरी अवतारका काम, संकल्पादियुक्त जीव, प्रकृति ईश्वरकी विविध संकल्पमय निर्बीज प्रकृति पुरुषयुग्ममें पुरुषसे जुडी हुई प्रकृति प्रकृतिके अष्ट विकार- (१) प्रकृति (२) महत्तत्व (३) अहंकार (४) शब्द (५) स्पर्श (६) रूप (७) रस (८) गंध, भागवतमेंसे. (१) पृथ्वी (२) आप (३) तेज (४) वायु (५) आकाश (६) मन (७) बुद्धि (८) अहंकार गीता ज्ञानेश्वरी से. प्रक्षुब्ध- कुपित, क्रुद्ध, अधीर, भयभीत. प्रगल्भ- प्रतिभाशाली, उत्साही, साहसी, धीरजवाला, प्रवीण. प्रज्ञा- ईश्वरोन्मुख अथवा आत्मोन्मुख बुद्धि, आत्मसत्तात्मक ज्ञान जो इंद्रियोंद्वारा व्यक्त होता है. प्रतिभा- प्रतिबिंबित, अनुभव, प्रकाश, आत्मशक्तियुक्त प्रगल्भता. असाधारण मानसिक शक्ति, आत्मप्रतीतिजन्य बुद्धिप्रकाश नित्यनूतन मति अनुभव जन्य ज्ञानदीप्ति. प्रतिमल्ल- प्रतिद्वंद्वी मल्ल. प्रत्यग्बुद्धि- आत्मोन्मुखी बुद्धि, अंतर्मुख बुद्धि. प्रथा- परंपरागत व्यवहार. प्रभव- उत्पत्ति. प्रमा- यथार्थज्ञान, निश्चित ज्ञान, पूर्ण विवेक. प्रमाद्- भूल, असावधानता, वास्तविक ज्ञान पालेनेमें उदासीनता. प्रमेय प्रवाल सुप्रभ- श्रुतिस्मृतिमें निरूपित तत्त्वरूपी दूर्वादलोंसे सुशोभित. प्रयाणकाल- मृत्युसमय. प्ररूढ- पूर्णरूपसे ढका हुवा, सभी ओरसे आच्छादित, आवृत्त.
प्रलयवात-प्रलय कालका बवंडर. वायुका उमड आना, बवंडर जन्य विनाश. प्रलयसत्र-विश्व-संहारका यज्ञ, संहारकाल, विनाशकाल. प्रलयांबु-विश्व संहारकालीन महापूर, जब पानी समूचे विश्वको डूबो देता है. प्रलोभन-लालच. प्रवचन-वेदांतव्याख्या, जीवनकी गूढ समस्याओंको भलीभांति समझा देना. अपने हृदयके भावको जगदंतर्यामी सर्वात्मक देव तक पहुंचा देना. प्रशंसा-गुणगान, स्तुति, स्तवन करना. प्रसाद-अनुग्रह, दया, जो वस्तु प्रसन्नतासे देवता या गुरुजनोंसे छोटों को मिलता है. नैवेद्य लोगोंमें बांटना. प्रहर-तीन घंटे, दिनके आठ भागोंमें एक. प्राग्ज्योतिकी आरति- आत्मप्रकाशसे साधककी आरती उतारना. प्रांजल-सरल, प्रामाणिक. प्राण-देहजीवित, पंचप्राण, आकुंचन प्रसरणके कारणरूप शक्ति, शरीरजन्य वायुतत्व, समाधि साधनेके लिये जिसका नियमन करना पडता है, श्वास प्रश्वास शरीर जन्य सभी शक्तियोंका मूलस्रोत, जीवन, प्राणि-जिसमें प्राण है वे सारे जीव. प्रायश्चित्त-पापक्षालनके लिये किया जाने- बाला कर्म. प्रेम, प्रीति-स्नेह, भक्ति, चाव, आत्मीयता. प्रेरणा-प्रवृत्त करना, किसी कार्यमें स्फूर्ति देना. प्रौढ- गंभीर, दृढ, गूढ, विचारपूर्वक कार्य करनेवाला. फ फल-कर्मजन्य विविध परिणाम. फलाशा-अपने कर्मके परिणामके भोगकी आशा. परिणामकी आकांक्षा.
प. छ. २ ११३ परिशिष्ट ६
(कर्म) फलसंयोग-कर्मसे उसके परिणामोंको जोड़ देना. फुरहर-स्फूर्त, स्फुरण, उद्भूत, निकलना निष्पन्न होता. फुरसै-रेंगनेवाला एक जहरीला जंतु जो काटनेसे बडा कष्ट होता है, कभी कभी आदमी मर भी जाता है. ब बछनाग-एक प्रकारका जहर, जो पहले मीठा लगता है. बंजर-ऊसर भूमि. बंधनवार-तोरण, घरके दरवाजेके चौखटमें घरके सामने फूल पत्तियां आदि बांधकर सजाना. बद्ध-बंधा हुवा, बंधित, बंदी. बहुधाकार अनेक आकार प्रकार. बहुश्रुत-जिसने बहुत सुना हो, अनेक विषयोंका जानकार. बहेलिया-व्याध, चिडियामार, क्रूरकर्मी. बाह्यावर्ती-बाहरका, बहिरंग, बिजुका-पशु पक्षियोंको डरानेके लिए खेतमें खडी की जानेवाली काली हांडी. बिंदु-शून्य, बिल्लौर- स्फटिक, पारदर्शक पत्थर, स्वच्छ शीशा. बीज-धर्म, रहस्य, बीजशक्ति, प्रत्येक प्राणि- मात्रके विषयमें जो ईश्वरी-संकल्प है वह, प्रेरणा. प्रत्येक मानवी शक्ती तथा मानवमें स्थित दैवी शक्तीकी छिपी संभावना, चिदाभास, चेतनास्पर्श. बुद्धि- विवेकशक्ति, समझ, आत्मौपम्य बुद्धि. भेद-बुद्धि, मनोबुद्धि, ममत्व-बुद्धि योग-बुद्धि, व्यवसा- यात्मिका-बुद्धि, समत्व-बुद्धि, सांख्य-बुद्धि, स्थिर-बुद्धि, हत-बुद्धि हीन-बुद्धि, आत्माभिमुखबुद्धि, भावना, वृत्ति, प्रकृतिगत बुद्धि- तत्त्व, आकलनशक्ति, कल्पना- शक्ति, चिंतनका इंद्रिय, समर्पण- बुद्धि. बुद्धिनाश- संशयाकुल बुद्धि अस्थिरबुद्धि, स्वार्थाभिमुखबुद्धि, परमात्मविमुख बुद्धि, ये हतबुद्धिके, बुद्धिनाशके लक्षण. बोध- आकलन, ज्ञानकी जागृति, अनुभूतिजन्य ज्ञान. बोधार्क- बोधरूपी सूर्य. ब्रह्म- बृहत् बडा, इतना बडा और कुछ भी न हो, सर्वव्यापक, जगतका मूलकारण परमात्मतत्व, सगुण ब्रह्म, जो ईश्वरार्पण बुद्धिसे कर्म करता है, कर्मोहंताका नाशक निर्गुण ब्रह्म सर्वव्यापक बनकर सोऽहंभावका शान्त आनंद, देता है. ब्रह्मानंद- ब्रह्मानुभूतीका आनंद, सोऽहं- भावका आनंद, तत्वमसिक्रा आनंद, ब्रह्मसमरसैक्यका आनंद. ब्रह्मकर्म- अध्ययन अध्यापनादि ज्ञानसा- धनाके ब्राह्मण कर्म, शांति क्षमादि शमदमावि ब्राह्मणोंका ब्रह्मकर्म है. ब्रह्मचर्य- ब्रह्म जिज्ञासा तथा ब्रह्मचिंतनसे उसी उद्देश पूर्तिकाके लिये की जानेवाली सर्वेंद्रियसंग्रमपूर्वक ध्येयनिष्ठ एकात्म साधना, अनन्य भक्ति, ब्रह्मगोलक- ब्रह्मांड. ब्रह्मरंध्र- योग सामर्थ्यसे जहांसे प्राण बाहर ले जा सकते हैं वह गुप्त छिद्र. जो मस्तकमें-तालूमें- रहता है ब्रह्मस्थान- सहस्रदल कमल सहस्रार चक्र. भ भक्त- ईश्वरका भजन करनेवाला, ईश्वरसे निष्काम प्रेम करनेवाला, ईश्वरो- ज्ञानेश्वरी २१४
पासक, भक्तके गुणोंका उपासक, आर्तभक्त, जिज्ञासुभक्त, अर्थार्थी भक्त, ज्ञानी भक्त, भक्तभावभुवनदीप- भक्तके प्रेमरूपी घरका दीपक. भक्तानुग्रह- भक्तपर अनुग्रह, भक्त वत्सलता. भक्ति- ईश्वरसे निस्सीम और निष्काम प्रेम, ईश्वरोपासना, अनन्य- भक्ति, पराभक्ति, अव्यभिचारी भक्ति, अद्वैतभक्ति, सहजभक्ति, श्रवणभक्ति, कीर्तनभक्ति, स्मरण- भक्ति, पादसेवनभक्ति, अर्चन- भक्ति, वंदनभक्ति, दास्यभक्ति, सख्य आत्मनिवेदनभक्ति. भर्ता- भरण-पोषण करनेवाला, भार वाहन करनेवाला, सहायक. भवतरु, भवद्रुम- संसाररूपी वृक्ष. भवद्रुमबीजिका-- संसार वृक्षका बीज. भवभंवर-- संसाररूपी भंवरा संसारका चक्कर. भवेभ कुंभभंजनं-- संसाररूपी हाथीका मर्मस्थल, गंडस्थल भेद करनेवाला. भातुक- मूल ज्ञानेश्वरीका मराठी शब्द. खाना, खानेकी वस्तु, मिठाई. भानु- सूर्य. भाव- स्थिति, अस्तित्व, भक्ति, श्रद्धा, कल्पना, अभिप्राय, वस्तु, पदार्थ भावार्थ गूढार्थ, अष्ट-सात्विक-भाव, अनन्यभाव, अहंभाव, धर्म-भाव, नम्रभाव, ब्रह्म-भाव, मूढ भाव, शिष्य भाव, सहज-भाव, स्वभाव तात्पर्य, आविर्भाव, पूर्वजन्मकृत संस्कार अन्य-भाव, तत्त्व, ब्रह्म. भावना- बुद्धिकी वह अवस्था अभ्याससे जो छीजगयी हो, सगबगा गयी हो, चित्तवृत्ति, मनकी एक शुद्ध अवस्था, आदि. भावशुद्धि- अंतःकरण शुद्धि. भास- अस्पष्ट दीखना, अल्पसा दीखना, झलकना, थोडे समयके लिये दीखना, भ्रमात्मक संवेदना. भास्कर- सूर्य. भुवनोद्भवारंभस्तंभ-स्वर्ग मृत्यु आदि भुवनोंकी उत्पत्तिका आधार स्तंभ भूतचतुष्टय- भूत=प्राणिमात्र भूत+चतुष्टय चार प्रकारके प्राणि, उद्भिज, स्वेदज, अंडज, जारज, इसे योनिचतुष्टय अथवा भूतचतुष्टय कहा जाता है, या पृथ्बी, आप, तेज, वायु, आकाश नही दीखता इसलिये अस्वीकार्य. भूतभावना- भूत अथवा जगतकी कल्प- नाका आश्रय, भूतोंका रक्षण करनेवाला. भूताभास- जगतका आभास. भेद- प्रकार, रहस्य, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भेद, बुद्धिभेद, भंग, तोड गिराना, अंतर भिन्नता. भेदाभेदवतम- भेद अभेदका अंधःकार. भोक्ता- भोगनेवाला, भोगनेका अधिकारी. भोक्तृत्व- भोगना, अनुभवना. भोग- सुखदुःखानुभव, कर्मफलभोग, ऐहिक पारलौकिक. विषयभोग, राज्यापभोग ऋद्धि सिद्धीके योग- भोग, आध्यात्मिक आनंद भोग. भ्रूलता-भौवें. म मकरंद-मधु, शहद. मकारांतसोपान, - योगमार्गका आज्ञाचक्र मख,-यज्ञ. मंगलमणिभिधान-कल्याणरूपी रत्नोंकी खान मज्जा-शरीरगत धातुविशेष. मठ- मटका. मणिज- अंडज, अंडोमेंसें उत्पन्न होनेवाले जीव मद-गर्वातिरेक, उन्मत्तता, उन्माद, धुंध प. छ. ३ २१५ परिशिष्ट ६
मदत्रय- कुलमद, विद्यामद, धनमद. मंत्र-युक्ति, विशेषशक्तिसंपन्न ऋषिमुनियोंका वाक्य, यशका प्रेरक विचार वेदमंत्र मदांध-मदके कारण अंध, मदमें चूर मंदराचल-मंदार पर्वत मध्यमा- सुषुम्नानाडी, चार वाणियोंमें कंठस्थ तीसरी वाणी. मध्यमा मध्यविवर - सुषुम्नानाडीके बीचमेंसे. मनपवनखिलौना - मन और प्राणनिरो- धका खिलौना . मन- संकल्प कल्प करनेवाली शक्ति, अंतःकरण सामान्य, इंद्रिय व बुद्धिके बीचका जोड, विका- राश्रय, मननकारी, मन+बुद्धि चित्त,चित्तका विकाराश्रित घटक. मनशुद्धि- मनकी निर्मलता, चित्तशुद्धि. मनसोक्त- यथेच्छ, स्वैर विहार. मनौती-मन्नत, मानना, देवपूजा. ममता- अपनापन, प्रेम, वात्सल्य, कर्मसंग, परिग्रहका अपनापन. मरगज- एक प्रकारका रत्न, हरे रंगका. मलत्रय- आणवमल, माथामल, कार्मक- मल इन मलोंके कारण अनेक- त्वका आभास होता है. महज- केवल. महदहंबुद्धि-महत्+अहं+बुद्धि. महदाकाश-महत्तत्वका विश्रांतिस्थान, जहां महत्तत्व लीन होता है वह. महादिक- शरीरमें महत्तत्वसे स्थूल शरीरतक महार्णवसिंधु- मोहरूप समुद्र जो लहरें मारता रहता हैं. महाकालकाल जो महाकालका भी काल है. महातेजमहार्णव-महान तेजका महासागर. महोदधि- महासागर. मांझी- नांव खेनेवाला मल्लाह,. माझा- मूल ज्ञानेश्वरीका मराठी शब्द, अर्थ मेरा, प्रासके लिये अनिबर्य होनेसे लिया गया है.
मात्रात्रय- ॐ अ, उ, म्. माया- आभास निर्माण करनेवाली ईश्वरीशक्ती, अज्ञान, जीवोंका अंधार, अविद्या, अज्ञान. मारुत- वायु. जब प्राणवायु निकलकर गगनमें विलीन हो जाता है उस स्थितिमें कुंडलिनी मारुत कहलाती है. मिस- निमित्त, बहाना. मीलनोन्मीलन-खुलना रुकना बारबार खोलना और बंद करना. मुकुल - कमलकली. मुदित-प्रसन्न. मुद्री- मूल मराठी शब्द, प्रासके लिये लिया गया. मुद्रिका अंगूठी. मुमुक्षु- मोक्षकी इच्छ करनेवाला. मूर्धन्य- मस्तक, मूर्धन्याकाश- मस्तककी रिक्तताम. मेखला- कटिसूत्र, कमरबंध. मेघ- यज्ञ. मेधा- बुद्धि, धारणाशक्ति, स्मरणशक्ति. मोक्ष- संतिम पुरुषार्थ तिरालंब शास्वत आनंदकी स्थिति, जीवन-मोक्ष, मरणोत्तर मोक्ष, देहरहित परिशुद्धि, ब्रह्मनिर्वाण मोघ- पाप. मोह- भ्रम, कर्त्तव्यनिर्णयमें आसक्ति- जन्य मोह, स्वर्ग नरक सुकृत-दुष्कृ- तादि द्वंद्वजन्य मोह, कर्तव्य-पराङ्- मुखताका मोह, अनिश्चय या स्वधर्म त्यागका संस्कारजन्य मोह, पापकारी मोह, भूतवैषम्यजन्य मोह; मानवोंमे ईश्वरका ग्रहण न करने देनेवाला मोह, तमरूपी जडताजन्य मोह, भेदबुद्धिजन्य मोह, ऐसे अन्य अनेक प्रकारके मोह वासनाओं के कारण होते हैं.
ज्ञानेश्वरी २१६
य यजन- यज्ञ, पूजन. यज्ञोपकरण- यज्ञके उपकरण, यज्ञके साधन. युक्तित्रय- योगका पारिभाषिक शब्द, तीन बंध, मूलबंध, जालंधरबंध, तथा उड्डियानबंध. यूप- यज्ञका एक स्तंभ. योग- कर्म-कुशलता, सिद्धांतोंको व्यव- हारमें लानेकी कला, फल वासना त्याग द्वारा. कर्ममें ही एकाग्रताका अभ्यास व तज्जन्य कर्म-समाधि, समाधिकी परिपक्वता; स्थित प्रज्ञता, ईश्वर प्राप्तिके लिये एकाग्र साधना, आत्मदर्शनोपायसाधन, आत्म- ज्ञाननिष्ठ समर्पणजन्य निष्काम कर्मयोग, यज्ञादि कर्माचरणानुष्ठान, चित्तवृत्तिनिरोध, समदृष्टि व साम्यभाव, एकाग्र चित्तसे ब्रह्मानु- संधान, समत्व भावसे ईश्वरसे जुडना, ईशत्व प्राप्तिकी सिद्धि, ईश्वर तुल्य होकर समत्व सिद्धि, योग समुच्चय कर्म भक्ति ज्ञान द्वारा आनंद प्राप्ति, ईश्वरी शक्तिका आविर्भाव, सदैव ब्रह्मानुसंधान, ब्रह्मलीन समरसता. योग-क्षेम- सर्वस्व ईश्वरार्पणकी प्रेरणा, इससे जो साधकके पास नहीं है और उसके लिये जिसकी आवश्यकता है वह परमात्म- कृपासे मिलेगा और जो उसके पास है और साधकके लिये आवश्यक है उसकी रक्षा परमात्मा करेगा यह भाव. योगाब्जिनीसरोवर- योगरूपी कमल उगनेवाला सरोवर. योगी- कर्मयोगी जो न करनेका सा करता रहता है, कर्मजन्य थकानसे मुक्त, कर्मयोगीका प्रत्येक श्वास और धडकन ईश्वरो- पासना होती है, सदैव सर्वत्र ईश्वरानुभव जन्य साम्यता और एकाग्रता इसका परिपाक है. ध्यानयोगी ध्येयसे समरस हुआ साधक, जहां ध्येय और ध्याता ऐसा द्वैत नहीं रहा, ध्येयरत ध्येय-लीन, सगुण-निर्गुण उपासक ज्ञानयोगी, ज्ञेयसें समरस हुआ ज्ञानी. सदैव सर्वत्र ज्ञेयरत ज्ञेय लीन, भक्त-योगी; नित्य भगवद्रू- पमें भक्तिरत भक्त.
र रत-तन्मय, लीन, किसीमे डूबा हुआ. रथ्योदक-रास्ते पर बहनेवाला नालोंका पानी. रव- शब्द. रविचंद्रराहुमेल- सूर्यचंद्रग्रहण. रश्मिकर- सूर्य. रश्मिजाल- किरणोंका जाला. रस- आर्द्रता, पानी, औषध, रसायन, अन्नके रुचिके छह प्रकार-षड्रस, अंतःकरणमें उत्पन्न होनेवाले वृत्तिरूप भावरस नवरस, पतला पदार्थ, पारद पांच विषयोंमें एक जिव्हाका विषय. रसाई- प्रवेश, पैठ. रसायन- भस्मादि पौष्टिक औषधविशेष. रसोईदार- रसोई बनानेवाला. रातोत्पल- लालकमल. रुतना- गढना, घुसना, रुझना. रूख- वृक्ष, पेड. रोमबीज- बालका मूल. रोमांच- अष्ट सात्विक भावमे एक.
ल लगन- प्रवृत्ति, रुचि, एकाग्रता, चाह.
२१७ परिशिष्ट ६
लसितकंचन- तेजस्वी, सोना. लालनकील- लालन पालन करनेकी क्रीडा करनेवाला. लिंग- चिन्ह, लक्षण, आराध्यदैवत, शिवलिंग. लिंगदेहकमल- वासनात्मक तत्त्वोंसे बने लिंग देहका कमल, देह कमल. लिंग देहके वासना तत्व १७ होते हैं. पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय पंचप्राण मन और बुद्धि. लिप्त- लिपा हुआ. पुताहुवा, आसक्त. लीलना- निगलजाना. लीला-विलास- क्रीडाका विलास करनेवाला, लीला सहज क्रीडायें लुब्ध- लोलुप, मोहित, ललचाया हुवा. लुब्धक- व्याध, बहेलिया, चिडियामार, शिकारी. लेंडूक- लैंड, मलकी बत्ती. लोक- जगत, स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक, त्रिलोक, अथवा त्रिभुवन. अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, महातल, तथा पाताल ये सात अधोलोक और भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महा- लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक ये सात ऊर्ध्वलोक मिलकर चौदा लोक अथवा चौदा भुवन माने गये हैं. लोकाचल- ऊर्ध्वलोकोंका शिखर. लोकोत्तर- अलौकिक. व वक्त्र- मुख, वंग- कलंक, सोनेका मल. वंचना- धूर्तता, ठगी, छल. वज्रकवच- अभेद्य आवरण, वज्रकी अमेद्य पोषाक. वज्राग्नि- वज्रासन करनेके कारण मूलबंधसे उत्पन्न होनेवाली उष्णता.
वज्रयोग- वज्रासन जन्ययोग. वटांकुर- वटबीजका अंकुर. वडवानल- समुद्रके नीचे जलनेवाला प्रचंड अग्नि. वध्य- मारनेका विषय. वह्नी- अग्नि. वर्ण वपु- वर्णरूपी शरीर. वर्णाश्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये चार वर्ण तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास, ये चार आश्रम मिलकर वर्णाश्रम धर्म कहलाता है. वसु- विभूति परिचयमें अष्टवसु देखें. वाक्पूजा- शब्दरूपी पूजा. वाग्जाल- शब्दपांडित्य. वाग्ब्रह्म- वेद. वाग्विलासिनी- वाणीकी क्रीडा करनेवाली. वाचस्पति- बृहस्पति. वांछित- जो चाहा था वही. वार्तिक- सूत्रोंपर किये गये व्याख्यान. विकर्म- भावनात्मक कर्म, विशेष कर्म, यह गीताका विशेष पारिभाषिक शब्द हैं. विकार- प्रकृतिजन्य इंद्रिय विकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह षड्विकार जन्य मनोमल. विकाराष्टक- अष्ट सात्विक भावको ही कई स्थान पर अष्ट विकार, अथवा विकाराष्टक कहा गया है. विगत विषय वत्सल- विषय वासना ओंको नष्ट करनेवालोंसे प्रेम कर- नेवाला. विचक्षण- चिकित्सक, आलोचक, विचार- वान. वितरण- बांटणा. वितृष्णा- निरिच्छा, निरपेक्षा, विदलित मंगलकुल- अशुभकुलोंको समूल नष्ट किया हुवा.
ज्ञानेश्वरी २१८
विशुदोद्यानद्विरद- ज्ञानोयरूपी वनका हाथी. विद्या- जानना, वेद-विद्या, ज्ञान-दृष्टि, शास्त्राध्ययन, आत्मज्ञानका शास्त्र. अधिक पांचवा परिशिष्ट देखें. विद्यारविंदप्रबोध- विद्यारूपी कमलका विकास करनेवाला विद्युताग्नि- आकाशस्थ बिजलीका अग्नि. विद्युत्त्वन- बिजलीका वन. विधिनिषेध-विधि=जो करना है वह, निषेध जो त्याज्य है वह, कार्याकार्य. विधिविवर्जित-शास्त्र मर्यादाका उल्लंघन. किया हुआ. विनट- खेलका साथी. विनोद्वनवाटिका- मनोविनोदके लिये बनायी गयी जगह. विपरीतज्ञान-अन्यथा ज्ञान. ज्ञानको अज्ञान और अज्ञानको ज्ञान समझना. विभुद्यवनवसंत- विद्वानोंके वनमें आया हुवा वसंत, विद्वानोंकी विद्वत्ता खिलानेवाला. विद्वद्वृत्तिमें बहार लानेवाला. विभूति- जहां ईश्वर भावका उठाव स्पष्ट दीखता है, ईश्वरी भाव. शुचि- साधनसंपन्न, प्रज्ञायोगादि- संपन्न=विभूति. विमनस्क- अन्यमनस्क, उदास, तटस्थ, उन्मन, जिसका मनोर्लय हुवा है वह. विरक्त- वैराग्यसंपन्न, वासनाओंसे परा- ङ्मुख, आत्माभिमुख, वैराग्य- संपन्न. विलुप्त- अदृश्य. विवेकवल्लीका उद्यान- विवेकरूपी लताका उपवन, अर्थात् जहां कार्याकार्य विवेक हो.
विवेचन- मीमांसा, आलोचना, औचित्य अनौचित्यका दर्शन. विषयबोधविदग्ध- स्पष्ट बोध देनेमें कुशल. विषयविद्यावधुवल्लभ-शुद्ध ब्रह्मविद्या रूपी वधूका वल्लभ, पति. विशेष-तुलनामें श्रेष्ठ, विशिष्ट, सर्वोत्तम अधिक. विश्व- जगत् सृष्टि. विश्वतश्चक्षु- सारा विश्वही जिसकी आंखें हैं. विश्वतोमुख- सारा विश्वही जिसका मुख है. विश्वतः पाद्- विश्वही जिसके चरण हैं. विश्वदभ्र- विश्वके बादल, विश्वरूपी मेघ. विश्वबाहु- सारा विश्वही जिसके बाहू हैं. विश्वमोहिनी- विश्वको मोहनेवाली. विश्ववस्वप्न- यह विश्व एक स्वप्न है. विश्वात्मकदेव- विश्वस्वरूपी देव, जगदंतर्यामी. विश्वोद्भवभवन-विश्व निर्मितिका स्थान. विश्वोदरतोंदल- विश्वरूपी उदरकी तोंद. विशद- स्पष्ट खोलकर, शुद्ध रुपसे. विषय- इंद्रियोंके विषय. विषयवाहिनी- विषयोंका प्रवाह. विषयविध्वंसैकवीर-विषयोंको नष्ट करनेमें एकैकवीर. विषयविषजाल- विविध विषयरूपी विषका आवरण. विषयव्यालय - विषयरूपी सर्प, विषयरूपी अजगर. विसर्जन - पोछ डालनेकी क्रिया, पूजामें विसर्जन क्रिया अंतिम होती है. पूजामें सर्व प्रथम अपने हृदयस्थको मूर्तिविशेषमें प्रतिष्ठा करके अंतमें वह उसी हृदयस्थको मूर्ति- मेसे विसर्जित कर अपने हृदयमें वापिस बुलाया जाता हैं मूर्तिपूजा एक प्रकारसे हृदयस्थकी पूजा हैं.
३१५ परिशिष्ट ६
विस्फुलिंग – चिनगारी, विस्मरण विस्मृती-भूलना, भूलनेकी क्रिया. विस्मित – आश्चर्य चकित, चमत्कृत. विहंग, विहंगम- आकाशमें उडनेवाला पक्षी. विहितकर्म- शास्त्रोंद्वारा कहे गये कर्म. विज्ञ- जानकार, विद्वान. विज्ञान- प्रापंचिक ज्ञान, बुद्धिकी जानकारी आचरणमें लानेकी कुशलता. अपरोक्षानुभूत ज्ञान. शास्त्रोक्त कर्मोंसे बुद्धि ईश्वरमे स्थिर करना. वीतराग- विरक्त. वृत्ति- मनोदशा, मनकी अवस्था, स्वभाव, भावना, आचार पद्धति, चित्त वृति, चरितार्थका साधन. वेदप्रतिपाद्य,- वेदोंद्वारा प्रतिपादित विषय. वेदवादरत-वेदके अर्थवादमें शब्दार्थ वादमें. मग्न. वेद्य- जानने योग्य. वेध- चित्तका आकर्षण, धुन, रट, झक, चसका, लत. वेधना- व्यापना. वेष्टन- आवरण. वैखरी- चारवाणियोंमें एक स्वपरवेद्य वाणी. वैजयंतीमाला- श्रीविष्णुके गलेमें पडी एक- माला जिसमें पंचतत्वदर्शक पांचोंरत्न होते हैं हीरा आकाश, माणिक्य अग्नि, पुष्कराग वायु. मोति जल, नील पृथ्वी. वैराग्य – अनिष्ट विषयोंको वर्ज्य माननेका भाव, अनासक्ति, किसी भी सत्ताके विषयमें उदासीनता, व्याप – अपनेमें समालनेकी वृति. व्यभिचार – कृतघ्नता, भ्रष्ट होनेकी वृत्ति, अलगता, अंतर, बीचमें परदा होना. व्यसन- कुटेव, विषयानुरक्ति, आसक्ति लंपटता, व्याख्यान- किसी विषयक, प्रमेयका विवेचन करके उसको समझाना. व्याघ्र गह्वर- शेरकी मांद. व्यापना- अपनेमें समालेना. व्यापक- सर्वगत, जो सर्वत्र रहा हो. व्याल विवर- सांपका बिल. व्रत- नैष्ठिक नियम. श शतघ्नी- तोप; जिससे सौ सौ लोग मारे जाते हों. शतधा- सैंकडो प्रकारसे. शतमख- सौ यज्ञ. शतमखउत्तीर्ण- सौ यज्ञ करके इंद्रपद पाया हुवा. शब्दब्रह्म- वेद. शम- अंतःकरणके संयमके कारण स्वस्थता, शांत होना, अंतर्दाहका शमन. शमदममदनमदमभेद- शमदमादि द्वारा- काम- मदका नाश करनेवाला. शरीरासक्ति- शरीर पर आसक्ति. शरीरभाव- शरीरके विकार, शरीरही मैं हूं ऐसा भाव शांत, शांति- उपशम पाया हुवा, अक्षोभ चित्त, चित्तका समाधान, मोक्षका पूर्वसूचन. शार्ङ्गीधर- श्रीकृष्ण. शार्दूल- सिंह. शालिखेत- विशिष्ट प्रकारके धान-जो सुगं- धित होता है, खेत. शाश्वत- नित्य, सदैव रहनेवाला अविने- वाशी, सनातन, स्थिर, अविचल. शास्ता- शासन करनेवाला, शासक. शास्त्र- कर्म, उपासना, तप, यज्ञादि जीवन विषयक प्रश्नोंका पूर्वसिद्ध अनुभव. शिष्टआगामविधान- शिष्टाचार, वेदोक्त शास्त्रीय आचरण, परंपरागत आचरण, ज्ञानेश्वरी २२०
शीत- सर्द, ठंडा, शीतल. शुक्ति- सीप. शुचिता- पवित्रता, नीतिमत्ता, निर्विकारिता शुभ- इष्ट, भला, निर्मल, सत्कार्य. शून्य- निराकारब्रह्म, आकाश, कुछ भी नहीं, निःशेष, अभाव, रिक्तता. शैलकक्षाके गह्वर- पर्वत श्रेणियोंकी गुफायें. शोक- मोह आसक्तिजन्य व्याकुलता, उद्वेग, अनुत्साह, पश्चात्ताप जन्य अनुत्साह, विकारोंका परिणाम. शोष- सूखना, शुष्क, सूखा. शौच- पवित्रता, शुचिता, शुद्धता, स्वच्छता. श्रीमहालया- नेवासेका मोहिनीराज मंदिर. श्रुति- वेद. श्रुतिगुणगणसमुद्र- वेदोक्त गुण समुच्च- यका सागर. श्वशुर- ससुरा. श्वानपिशित- कुत्तेका मांस. -ष- षट्कर्म- यज्ञ कराना, यज्ञ करना, वेदाध्य- यन, वेद अध्यापन, दान और प्रतिग्रह (दान देना लेना) ये ब्राह्मणोंके षट्कर्म हैं. षड्गुणचक्रवर्ति- यश, श्री, औदार्य, ज्ञान, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये भगवानके छ गुण हैं, इन गुणोंका चक्रवर्ति भगवान. षड्गुणाधिकरण- उपरोक्त छः गुणोंका स्थान. षड्रसाज्ञ- छ रसोंका अज्ञ. -स- संकर- व्यभिचारजन्य मिश्रण, सामा- जिक अव्यवस्था. संकल्प-मानसिक कर्म प्रवृत्ति, मनका मूल स्वरूप, यज्ञादिक कार्योंका संकल्प, मनसे उत्पन्न करना.
संकल्प संध्या-मनकी संकल्प करनेकी प्रवृत्ति- का अंत. सकल काम पूर्णता- सभी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला. सकलमतिप्रकाश- 'सबकी बुद्धिको प्रकाश देनेवाला. सकलायवयदर्शन-अवयवोंका दर्शन. सभी संपूर्ण दर्शन. सकलैश्वर्यसुख-सभी प्रकारके ऐश्वर्यका सुख सकाम- इच्छायुक्त, फलेच्छासे कर्म करने वाला. विजयेच्छायुक्त. सख्य- नवधाभक्तिमें आठवे प्रकारकी भक्ति. संग- आसक्ति, संबंध, अनुराग, कर्म- संग, गुणसंग, जनसंग, मुक्त-संग संगदोष, संग, आसक्तिसे दोष निर्माण होते हैं, कर्म फलास- क्तिसे जैसे साधक कर्म बंधनमें आता है वैसे ही कर्मासक्तिसे भी, संगमस्थान-ऐक्य स्थान. सगबगाना-सराबोर हो जाना, भीग जाना, तर हो जाना, परिपूर्ण हो जाना. संग्रह- संचय, एकत्र करना, फूटने न देना सही दिशामें रखना, दुरूपयोग न होने देना, परिग्रह. संघात- समष्टि, नियम, वृंद, समवाय. सज्जनवनचंदन-सज्जन रूपी वनमें चंदन के समान. सत्- भला, सत्कर्म ब्रह्मवाचक शब्द, ॐ तत् सत्में अंतिम तत्व, केवल शुभ. सत् असत्का प्रश्रय-वह तत्व जो सत् असत् का द्वंद्व नहीं था तब भी इन दोनोंका आश्रय रूप था. संत- सत्पुरुष, सदैव सर्वहित. कामना करनेवाले, सदैव टिकने- वाला ईश्वर भक्त, ज्ञानी, योगी, तत्वदर्शी, सदसद्विवेक रखनेवाला
२२१ परिशिष्ट ६
यशावशेषभोगी, सदैव सन्मार्गसे चलनेवाला, सर्वत्र ईश्वर दर्शन करनेवाला, सत्यनिष्ठ, धैर्यसे सत्य तथा सत्वमें स्थिर रहनेवाला. संतर्पण- भोजन देना. अन्नसत्र. सत्कार्यवाद- कार्यकी अभिव्यक्तिके पहले अर्थात् कार्य प्रकट होनेसे पूर्व कारणमें उसका अस्तित्व मानने- वाले निरीश्वरवादी सांख्योंका मत. सत्ता- सत्व, सामान्य चैतन्य, अस्तित्व, स्वामित्व. सत्वशुद्धि- सत्वगुणका निर्मलत्व, चित्तशुद्धि, अंतःकरणका निर्मलत्व. संन्यास- कर्मत्याग, अहंता ममताका त्याग, जीवन्मुक्तावस्थाकी अनुभूति, ब्रह्मार्पण भावसे जीवनयापन. संन्यासी- ब्राह्मभावमें लीन जीवमुक्त पुरुष. संनिधान- सामीप्य. संप्रदाय- परंपरागत जीवनपद्धति. सबरी- खोदनेके काम आनेवाली लोहकी मोटी छड. समता- एक जैसा, शांत, द्वंद्वातीत अवस्था, समबुद्धि, समान मानना, सहज, समचित्त- चित्तकी समानतावाला. समबुद्धि- बुद्धिसे समान माननेवाला. समदृष्टि- सबको समान देखनेवाला. सबको समान समझने वाला. समन्वय- मिलान, मेल. समरस- एकरस. समवाय- नित्यसंबंध, समष्टिरूप, समुदाय. समाधान- निःसंशयवृत्ति, शांतवृत्ति, संतोष, अवरोध निराकरण. समाधिबोध- ध्यानशून्य तन्मयताका बोध, निष्काम कर्मलीनताका बोध, भगवत् चिंतनमें डूब जाना. समुद्धर्ता- सही तरीकेसे, पूर्ण रूपसे उद्धार करनेवाला. समूहपरस्थ- समूहमें, समुदायमें आगे होने का भाव. सम्मोहनावस्था- मुग्धावस्था, मोहावस्था. सर्वगत- सर्वव्यापी, सभीस्थानोंमें फैला हुवा. सर्वज्ञ- सब कुछ जाननेवाला. सर्वात्मकदेव, सर्वात्मकस्वामी- सबमें बसा हुवा देव, जगदंतर्यामी, सर्वांतर्यामी. सर्वेश्वर- सबका स्वामी. सर्वोपशांतिप्रमदा-सभी प्रकारकी शांतिरूपी तरुणी. सलिल- पानी. सलोनापन- सौंदर्य. संवादफलनिदान- संवादरूपी फलका अंत. सव्यसाची- अर्जुन, दोनों हाथसे समान रूपसे बाण चलानेवाला. संसर्ग- लगाव, संग, संबंध. संसारतमसूर्य- संसाररूपी अंधकारके लिये सूर्यके समान. सहजसमाधि- सहज एकाग्रता, सदैव स्वाभाविक ध्येय तन्मयता. सहजकृपामंदानिल- स्वाभाविक कृपारूपी मंदशीतल पवन. सहजस्थपुरुष- अपने भावमें लीन पुरुष. सहस्रकरकुमार- सूर्यपुत्र कर्ण. संहाररुद्र- प्रलयकालका रुद्र. सांख्य- ज्ञानीलोक, सांख्यशास्त्र, सांख्यदर्शन जीवनके सिद्धांत, जीवन सिद्धांतमें सगबगाया हुवा ज्ञानी, ज्ञान निष्ठा, क्षराक्षर विचार, आत्मा- नात्मविवेक, पिंडब्रह्मांड ज्ञान; सांख्यबुद्धि- आत्माका अकर्तृत्व, अक- र्मत्व, अप्रैरकत्व, अविनाशित्व नाशवान देहके जरिये स्वधर्माचरणकी अनिवार्यता. सांतःकरण- अंतःकरणके सह. साधक-मोक्षसाधक, मुमुक्षु, विषयत्यागका प्रयत्न करनेवाला, ईश्वरसे जुडनेका ज्ञानेश्वरी २२२
अभ्यास करनेवाला, आत्मदर्शन- इच्छुक तथा प्रयत्नशील, कर्मफल त्यागका प्रयत्न करनेवाला, सदैव ब्रह्म चिंतनमें लीन होनेका अभ्यास करनेवाला. साधु— सज्जन, सुविचारी, सदाचारी, साधु और पापीको समान माननेवाला, साम्यवृत्तिवाला. साध्य—देवतागण विशेष, विशिष्ट साधनाके द्वारा सिद्धीतक पहुंचे हुए, जिसको पाना होता है और साधनाके द्वारा उसे पा सकते है वह. साम्यबुद्धि—विश्वात्मैक्य जन्य समत्व बुद्धि. सभी प्राणिमात्रोंमें परमात्मभाव- को अनुभवना. साम्ययोग—समतासे साधा जानेवाला योग, समता प्राप्तिके लिये कीजानेवाली साधना. साधनाके साथ समत्वका अनुभव. साम्राज्य— निष्कंटक सार्वभौम राज्य. सायास— कष्ट. सायुज्यसिद्धिदिन— अंतिम मोक्षावस्था प्राप्त होनेवाला दिवस. सार— सत्य, तत्व, तत्वांश, रहस्य, सारभाग, सारसर्वस्व, समग्रता. सारस्वत—विद्या, साहित्य, सरस्वतीका पुत्र, सरस्वती जन्य. सावध— जागृत, परमार्थके विषयमें, ज्ञानमें तत्पर, सर्वत्र ईश्वरानु- भवमें अभ्यस्त, प्रमादरहित. साक्षात्कार—प्रत्यक्ष परमात्मदर्शन, सदैव सर्वत्र परमात्मानुभूति, साक्षीभूत—केवल दर्शक, तटस्थ, घटना- ओंमें, न उलझा हुवा. सिद्ध— पूर्णावस्थाप्राप्त, सर्वत्र ब्रह्म दर्श- नके कारण सदैव निर्भय, जो पाना है उनका निश्चय किया हुवा, कृतिसे तैयार, निष्कर्ष, एक देवयोनि, प्रत्यक्ष. सिद्धप्रज्ञा— पूर्व जन्मसे परिपक्व, तथा इस जन्ममे कमायी गयी बुद्धि. सिद्धि— अष्टमहासिद्धि, पूर्णत्व प्राप्ति, जीवनकी सफलता=दैवी गुणोंका पूर्णविकास, ईश्वर भक्ति जन्य साम्य दर्शन, ईश्वरलीनता, कर्मकी थकानसे मुक्ति, न करनेकासा कर्म रत रहनेकी क्षमता, शून्यवत् रहना. सुवृततरु- पुण्य कर्मोंका वृक्ष. सुखाभास— सुखका आभास. सुधाब्धि— अमृतका समुद्र. सुप्रभ— तेजस्वी. सुभग— उत्तम दैवका. सुभावभजनभाजन— शुद्धभावनासे भजन करने योग्य. सुमनस— अच्छे मनका, शुभ संकल्पोंका. सुरतरु— कल्पवृक्ष. सुविमल— अतिशय निर्मल. सुस्ताना— आराम करना, विश्रांति लेना. सुहृद्वजन— बदलेकी भावनाके बिना उपकार करनेवाले सज्जन मित्र. सूत्रकार— धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्रके सूत्रोंके रचयिता. सूत्रधार— कठपुतलीके नाचमें सूत हिलाने- वाला. सूर्यकांत— सूर्यकांतमणि, जो सूर्यकिरणोंको एकत्र करके उष्णता निर्माण करता है. सृष्टि— सृजन, उत्पत्ती, भूतसृष्टि, सेवा— परिचर्या, उपासना, भक्तिकरना. सैंतीस— छत्तीस तत्व, देखो, पांचवा परिशिष्ट. सोंधणी— सुगंध. सोऽहंबोध— वह आत्मा मैं हूं अथवा वह ब्रह्म मैं हूं इसकी अनुभूति. सोऽहंभाव— सोऽहं बोधमें स्थिर रहना. सौरभ— सुगंध. २२३ परिशिष्ट ६
स्तवन- स्तुति. स्ताव्य- स्तुतिका विषय. स्तोत्र- स्तुति, ईश्वर-स्तवनार्थ बनायेगये विशिष्ट प्रकारके काव्य. स्थावर- अचल हलचल न कर सकनेवाला स्थित- स्थिर, अस्तित्व, अपने स्थान पर अधिष्ठित, स्वप्रमाणपर जमा हुवा. स्थितप्रज्ञ- जिसकी बुद्धि समाधिमें स्थिर है वह, आदर्श-सिद्धांत तथा उसके व्यवहार-कुशलतामें जो प्रवीण है ऐसा, सभी इच्छाओंका अतिक्र- मण करके अपनेमें अपनेसे निरा- लंब आनंदमे स्थिर है वह, गीताका आदर्श पुरुष. स्नेहाद्रंचित्त-स्नेह वात्सल्यपूर्ण चित्त. स्फुरदमंदामंदवत्सल-सदैव स्फुरनेवाले आनंदसे भरा हुवा. स्वजनवनचंदन-अपने भक्तोंके समूहमें चंदनरूप. स्वसंविद्रुमबीजप्रसभूमिरूप स्वसंवित् रूप स्वरूपज्ञानरूपी वृक्षका बीज पडने योग्य भूमिरूप. स्वसंवेद्य अपने आप जानने योग्य. ह हडप — मूल शब्द कन्नड भाषाका, क्षौर सामग्री रखनेका नाईका थैला. किंतु महाराष्ट्रमें इसको पानदानके रूपमें स्वीकार किया गया है. हरना- हरण करना, दूर करना, फैलाना, पीछे हटाना.
हरित-हरे रंगका. हर्ष-आनंद. हवि-हवनद्रव्य. हस्तोदक-हाथपर पानी छोड़कर दान देना, हतोदक देना. हिमवंत-हिमाचल. हिय-हृदय. हृदयकमल आराम-हृदयरूपी कमलमें विश्रांति लेनेवाला. हृदयस्थ-हृदयमें रहनेवाला. हेतुमंत-युक्तित्राला. क्ष क्षमा-सहनशीलता अपराध, सहिष्णुता. क्षय- मरण, नाश क्षर- नाशवंत. क्षितीश- राजा. क्षीण- क्षय होनेवाला, समाप्त होनेवाला. क्षीरसागर- दूध का सागर. क्षीरार्णवकल्लोल-लहरानेवाले दूध-सागरका कल्लोल. क्षुद्रघंटिका- घुंगरू. क्षुब्ध- चंचल, अधीर, क्रुद्ध, भीत. क्षेत्र- खेत, मैदान, पवित्रस्थान, गीतामें जीवात्माका क्षेत्र शरीर, भूतोंका उत्पत्तिस्थल. क्षेत्रसंन्यास- स्थान निष्ठा संन्यास, यह अंतिमस्थान स्थान है इस भावसे एकही स्थान पर रहनेका निश्चय और प्रयत्न करना. क्षेत्रसंन्यासी- क्षेत्रसंन्यास लिया हुवा. क्षेत्रज्ञ- शरीररूप क्षेत्रका साक्षीरूप जीव. क्षेम- मोक्ष विषयक उपलब्धीका रक्षण.
ॐ ज्ञानेश्वरी २२४
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