ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वैसे प्रकृति आधार । कर्मेंद्रियोंके विकार । चले कर्म निरंतर । नैष्कर्म्यका ॥ ६२ ॥ जब तक नाता है प्रकृतिका । तब तक त्याग न होता कर्मका । ऐसा करूंगा कहनेवालों का । रहता है उठ ॥ ६३ ॥ कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ६ ॥ कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ— उचित कर्म जो छोड़ते । नैष्कर्म्य साधना चाहते । प्रकृति निरोध करते । कर्मेंद्रियोंकी ॥ ६४ ॥ उनका कर्म त्याग नहीं होता । कर्तव्य भाव मनमें रहता । वैसा केवल बनाव बनता । दरिद्र जो ॥ ६५ ॥ ऐसे वे रहते पार्थ । विषयासक्त सर्वथा । जानना यह तत्वता । विभ्रांत ॥ ६६ ॥ अब मेरी बात सुन । अवसर है अर्जुन । कहता नैष्कर्म्य चिन्ह । तुझसे मैं ॥ ६७ ॥ यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेंन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ आत्मरत कर्मोंसे कर्म-मुक्त नैष्कर्मी है – होता जो अन्तरमें दृढ । परमात्म रूपमें गूढ । बाहर लौकिकमें रूढ । सबका सा ॥ ६८ ॥ इंद्रियोंको आज्ञा नहीं देता । विषयोंका भय न धरता । प्राप्त कर्म वह न छोड़ता । उचित जो ॥ ६९ ॥ रोक कर्मेंद्रियोंको तो चित्तमें स्मरता रहा । विषयोंको मह-मूढ मिथ्याचारी कहा उसे ॥ ६ ॥ मनसे इंद्रियोंको तो लगके कर्ममें नित । निःसंग रहता योगी माना वह विशेष है ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ८२
इंद्रियोंको वह कर्ममें । नहीं रोकता बंधनमें । किंतु उनकी धर्मियोंमें । उलझता नहीं ॥ ७० ॥ न होता कामनामें लिप्त । नहीं मोह मलमें सिक्त । सदा रहता है अलिप्त । पद्मपत्रसा ॥ ७१ ॥ सबके संगमें वह रहता । सब्रके समान वह दीखता । जैसे जलमें है आभास होता । भानुबिंबका ॥ ७२ ॥ जन सामान्यसा रहता । साधारण ही दीखता । वैसे निर्णय नहीं होता । कल्पनासे भी ॥ ७३ ॥ ऐसे चिन्होंसे चिन्हित । रहता है वह मुक्त । आशा पाशसे रहित । उसे जान ॥ ७४ ॥ वही है योगी कहलाता । विश्व-विशेष हो रहता । तभी मैं तुझसे कहता । बन वैसा ॥ ७५ ॥ मनका तू नियमन कर । निश्चल कर निज अन्तर । कर्मेंद्रियोंका व्यापार कर । सुखसे तब ॥ ७६ ॥ नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ निरहंकार निष्काम कर्म कर - होना चाहे' यदि कर्मातीत । यह यहां असंभव बात । सोचो निषिद्धकर्ममें रत । रहे क्यों ॥ ७७ ॥ इसी लिये जो है उचित । तथा समय पर प्राप्त । वह कर्म, हेतु रहित । करते जाना ॥ ७८ ॥ पार्थ अन्य ही एक । न जाने तू कौतुक । ऐसा कर्म मोचक । सहज होता ॥ ७९ ॥ रहता जो कर्मानुगत । स्वधर्ममें सतत रत । जिससे है मोक्ष निश्चत । जान तू ॥ ८० ॥ नेमे हुये करो कर्म योग्य हैं करना इसे । तेरी शरीर यात्रा भी बिना कर्म चले नहीं ॥ ८ ॥ ८३ कर्मयोग
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ स्वधर्म अनादि और अनिवार्य – स्वधर्म जो है अर्जुन । वही नित्य यज्ञ ज्ञान । करनेसे आचरण । नहीं पाप ॥ ८१ ॥ त्यजनेसे निज-धर्म । चिपकते हैं कुकर्म । यह बंधनका मर्म । सांसारिक ॥ ८२ ॥ तभी स्वधर्माचरण । नित्य यज्ञके समान । जिससे होता बंधन । कभी नहीं ॥ ८३ ॥ लोक है यह कर्ममें बद्ध । परतंत्र देहमें आबद्ध । क्यों कि हैं नित्य यज्ञ विरुद्ध । चलनेसे ॥ ८४ ॥ इस विषयमें अब पार्थ । कहता हूं तुझे एक कथा । विश्व आदिकी यह है संस्था । रची ब्रह्माने ॥ ८५ ॥ सहयज्ञाः प्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वम् एषवोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ वह नित्य-याग सहित । सृजे भूत मात्र समस्त । किंतु ये यज्ञसे अज्ञात । सूक्ष्म होनेसे ॥ ८६ ॥ प्रार्थना जब की प्रजाने ब्रह्माकी । औ' याचना की उनसे आश्रयकी । कमल संभवने तब बात की । भूतमात्रसे ॥ ८७ ॥ वर्ण विशेषको हमने उचित । व्यवस्था की है स्वधर्मकी निश्चित । उस पर चलनेसे है खचित । इच्छा तृप्ति ॥ ८८ ॥ यज्ञार्थ कर्मको छोड लोकमें कर्म-बंधन । यज्ञार्थ ही कर कर्म अर्जुन मुक्त संग तू ॥ ९॥ प्रजाके साथ ही यज्ञ ब्रह्माने सृजके कहा । यज्ञोंसे ही बने श्रेष्ठ तुम्हारी कामधेनु ये ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ८४
न करना अनुष्ठान । न यात्रादि तीर्थस्थान औ' अन्य देह दंडन । करना नहीं ॥ ८९ ॥ न करे योगादि साधन । तथा सकाम आराधन । मंत्र तंत्र आदि विधान । अनावश्यक ॥ ९० ॥ देवताओंका पूजन । सर्वथा ही वर्ज मान । करो स्वधर्माचरण । अनायास ॥ ९१ ॥ सदा अहेतुक भावसे । पतिव्रता जैसे पतिसे । अनुसरना तुम वैसे । स्वधर्मको ॥ ९२ ॥ वैसा स्वधर्म रूप मख । यही नित्य सेव्य है एक । ऐसा सत्य-लोक नायक । कहने लगे ॥ ९३ ॥ नित जो स्वधर्म भजेगा । उसकी कामधेनु होगा । न प्रजाको वह त्यजेगा । यह निश्चित ॥ ९४ ॥ देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इससे होगा समस्त । संतुष्ट होंगे दैवत । फिर तुम्हे वे ईप्सित । देंगे वर ॥ ९५ ॥ स्वधर्म पूजनसे नित । देव गण मिल समस्त । योग क्षेम सब निश्चित । देखेंगे तुम्हारा ॥ ९६ ॥ देवोंको तुम भजोगे । देव तुम्हें तोष देंगे । ऐसा परस्पर होगा । प्रेम वहां ॥ ९७ ॥ जहां जो करना चाहेगा । वह सहज सिद्ध होगा । वांछित जो वर मिलेगा । मानसका ॥ ९८ ॥ वाचा सिद्धि मिलेगी । आज्ञा धारक होंगी । तुमसे आज्ञा लेंगी । महा सिद्धियां ॥ ९९ ॥ देवोंको यज्ञसे तोषो तोषेंगे देव भी तुम्हें । अन्योन्य करके तुष्ट पावो परम श्रेयको ॥ ११ ॥ ८५ 'कर्मयोग'
जैसे ऋतुपतिका द्वार । वनश्रीसे ही निरंतर । लदा रहता फल भार । सौंदर्यमय ॥ १०० ॥ इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥ वैसे सब सुखके साथ । दैव ही जैसे मूर्तिमंत । खोज कर तुम्हारा पथ । आयेगा जान ॥ १ ॥ होंगे समस्त भोग भरित । वैसे ही सदा इच्छा रहित । होंगे यदि स्वधर्म निरत । रहोगे भाई ॥ २ ॥ किंतु सकल संपदा तजकर । तथा इंद्रिय मदमें डूब कर । विषय स्वादमें जो लुब्ध होकर । रहता है सदा ॥ ३ ॥ तजकर वह यज्ञ भाव । देते हैं जो यज्ञ-तुष्ट देव । रख ईश्वरमें भक्ति भाव । भजेगा नहीं ॥ ४ ॥ न अग्नि मुखमें हवन । न करेगा देवतार्चन । न प्राप्त समय भोजन । ब्राह्मणोंको ॥ ५ ॥ नहीं करेगा गुरु-भक्ति । तथा न आदर अतिथि । न रखेगा संतुष्ट जाति । अपनी भी ॥ ६ ॥ स्वधर्म-क्रिया रहित । संपन्नतामें प्रमत्त । ऐसा मात्र भोगासक्त । होगा वह ॥ ७ ॥ इसमें है आपदा बहुत । संपदा होगी उसकी हत । न भोग सकेगा वह प्राप्त । भोग भी कभी ॥ ८ ॥ शरीर है जिसका गतायुष । उसमें न होता चैतन्यवास । दैव हत घरमें कभी वास । न होता लक्ष्मीका ॥ ९ ॥ लोप होता है जब स्वधर्मका । टूटता तब आश्रय सुखका । मिटता बुझनेसे दीपकका । प्रकाश जैसे ॥ १० ॥ यज्ञ-तुष्ट तुम्हें देव देंगे इच्छित भोग जो । उनका न उन्हे देके खाता जो वह चोर है ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ८६
मिटती है जब निज-वृत्ति । न रहती स्वातंत्र्यकी बस्ती । सुनो प्रजाजन यह उक्ति । कहता है ब्रह्म ॥ ११ ॥ जो कोई स्वधर्म छोड़ेगा । उसको काल दंड देगा । चोर मानके हर लेगा । उसका सर्वस ॥ १२॥ जन्म देता सभी पापको । घेर लेते हैं जो उसको । रात्रि स-समय श्मशानको । जैसे भूत ॥ १३ ॥ दुःख ल्केश वहां त्रिभुवनके । पाप अनेकानेक प्रकारके । घर करते हैं दैन्य विश्वके । उसी स्थानमें ॥ १४ ॥ वह उन्मत्त ऐसे । कितने ही रोनेसे । कल्पांतमें भी उसे । नहीं मुक्ति ॥ १५ ॥ इसलिये निज धर्म न छोड़ना । इंद्रियोंको नहीं भड़कने देना । चतुरानने कहे ये वचन । प्रजा जनसे ॥ १६ ॥ छोड़ते ही जैसे जलचर । उसी क्षणम जाता है मर । वैसा ही स्वधर्म छोड़कर । होता नाश ॥ १७ ॥ इसलिये तुमको समस्त । अपनेलिये है जो उचित । स्वकर्ममें रहना उचित । कहा ब्रह्माने ॥ १८ ॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यंते सर्वकिल्बिषैः । भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥ तन त्यक्तेन-शेष प्रसाद सेवन — जो विहितक्रिया विधि । करे निर्हेतुक बुद्धि । जिससे प्राप्त समृद्धि । करता विनियोग ॥ १९ ॥ गुरु गोत्र अग्नि जो पूजता । स-समय द्विजको भजता । निमित्तादिकमें जो यजता । पितरुद्देशसे ॥ १२० ॥ यज्ञ क्रियामें जो उचित । आहुति देकर बचत । हुत शेष ही स्वभावतः । रहता है ॥ २१ ॥ खाके संत यज्ञ-शेष जलाते दोष हैं सब । पापी वे पाप खाते हैं पकाते अपने लिये ॥ १३ ॥ ८७ कर्मयोग्
अपने घरमें उसका सुखसे । आप सहित भोजन करनेसे । वह सुख भोग ही सब दोषोंसे । करेगा मुक्त ॥ २२ ॥ वह यज्ञ-शिष्ट भोग । सभी हरते हैं अध । जैसे नष्ट होते रोग । अमृत सिञ्चिसे ॥ २३ ॥ अथवा तत्व-निष्ठ जैसा । भ्रम रहित होता वैसा । यज्ञ शिष्ट भोग ही वैसा । होता दोष रहित ॥ २४ ॥ स्वधर्मसे जो किया उपार्जन । स्वधर्ममें व्यय कर सुजन । शेषका भोग करके अर्जुन । रहता तुष्ट ॥ २५ ॥ बिन उसके सुन तू पार्थ । आचरना नहीं अन्यथा । ऐसी है यह आदिकी कथा । कहता कृष्ण ॥ २६ ॥ जो हैं देहको ही आप मानते । विषय ही को है भोग्य जानते । बिन इसके नहीं समझते । दूसरा कुछ ॥ २७ ॥ जीवन है यज्ञोपकरण । न जानकर मोह कारण । भ्रमग्रस्त उदर भरण । करते अहंभावसे ॥ २८ ॥ जिव्हा चापल्यसे जो लोक । कराते रुचिकर पाक । सेवन करते पातक । पापी जन ॥ २९ ॥ जो है संपत्ति-मात्र संपूर्ण । यज्ञ द्रव्य होनेके कारण । करता स्वधर्म-यज्ञार्पण । आदि पुरुषमें ॥ १३० ॥ यज्ञ-शेष अन्न है ब्रह्म— यह छोड़ कर मूर्ख । अपने लिये ही देख । बनवाते हैं सुपाक । नानाविध ॥ ३१ ॥ जिससे यज्ञ सिद्ध होता है । परेशको संतोष होता है । यह सामान्य नहीं होता है । अन्न तू जान ॥ ३२ ॥ इसे न मानना तू साधारण । जीवन हेतु होनेके कारण । ब्रह्मरूप अन्न है यह जान । विश्वमें सर्वत्र ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ८८
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥१४॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥ अन्नसे ही हैं भूत । बढ़ते हैं समस्त । फिर मेघ अन्नार्थ । बरसते हैं ॥ ३४ ॥ यज्ञसे पर्जन्यका जन्म । यज्ञको प्रसवता है कर्म । तथा कर्मका आदि है ब्रह्म । वेद रूप ॥ ३५ ॥ फिर वेदोंका परापर । प्रसवता है अक्षर । इसीलिये सचराचर । ब्रह्म-बद्ध ॥ ३६ ॥ किंतु कर्मकी है जो मूर्ति । यज्ञमें अधिष्ठित श्रुति । सुन तू हे सुभद्रापति । अखंडित ॥ ३७॥ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥ पूर्व कर्म-फल भोगके लिये मनुष्य जन्म-- ऐसी है आदि परंपरा । संक्षेपमें धनुर्धरा । कही है तुझसे अध्वरा- । केलिये ॥ ३८ ॥ तभी मूलमें यह उचित । स्वधर्म रूप यज्ञ सुकृत । आचरण न करते मत्त । इस लोकमें ॥ ३९ ॥ अन्नसे जन्मते जीव वर्षासे अन्न संभव । यज्ञसे बरसे वर्षा कर्मसे यज्ञ उद्भव ॥ १४ ॥ ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न ब्रह्म अक्षरसे बना । सर्वव्यापक जो ब्रह्म यज्ञमें रहता नित ॥ १५ ॥ ऐसा प्रेरक जो चक्र निभाता जगमें नहीं । इंद्रियासक्त है पापी खोता है व्यर्थ जीवन ॥ १६ ॥ ८९ कर्मयोग (12)
रचते वे ढेर पातकोंके । भार रूप जानो वे भूमिके । कुकर्म करते इंद्रियोंके । तोषार्थ जो ॥ १४० ॥ उनका जन्म कर्म सकल । अर्जुन है अति निष्फल । जैसे होता है अभ्र पटल । अकालका ॥ ४१ ॥ अथवा कंठ स्तन हैं अजके । वैसे जीवन है मान उनके । जिससे अनुष्ठान स्वधर्मके । घडते नहीं ॥ ४२ ॥ इसीलिये सुन अर्जुन । स्वधर्मको नहीं त्यजना । सर्व भावसे है भजना । यही एक ॥ ४३ ॥ शरीर हुवा यदि प्राप्त । वह पूर्व -कर्मानुगत । फिर कर्तव्य जो उचित । छोड़ना क्यों ॥ ४४ ॥ सुन तू यह धनुर्धर । प्राप्त कर यह शरीर । आलस्य करते गंवार । कर्ममें जो ॥ ४५ ॥ यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥१७॥ आत्मलीन ही कर्म मुक्त- वे रह कर देह धर्ममें । लिप्त नहीं होते हैं कर्ममें । रमते हैं जो आत्म रूपमें । अखंडित ॥ ४६ ॥ आत्मबोधमें जो मुदित । अपनेमें हुवा कृतार्थ । इसीलिये सहज मुक्त । कर्म संगसे ॥ ४७ ॥ नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥ आत्मामें ही रमता जो तृप्त हो आत्म भोगमें । आत्मामें ही सदा तुष्ट वह कर्तव्य मुक्त है ॥ १७ ॥ करे या न करे कर्म उसको ना प्रयोजन । न रहा उसका लोभ किसी भी प्राणिमें कहीं ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ९०
आत्महित और लोकहितार्थ कर्म— तृप्ति हुई है जिसकी । साधना मिटी उसकी । बात आत्म-संतोषकी । कर्ममें नहीं ॥ ४८ ॥ जब तक है अर्जुन । आत्म-बोध न लेता मन । तब तक है साधना । रहती ही ॥ ४९ ॥ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥१९॥ इसीलिये तू नियत । सभी कामना रहित । होकर कर उचित । स्वधर्माचरण ॥ १५० ॥ स्वकर्ममें निष्कामता । अनुकरण किया पार्थ । उन्होंने पाया है तत्वता । कैवल्यधाम ॥ ५१ ॥ कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥ देख तू जानकादिक । कर्मजात है अशेष । न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ५२ ॥ इस कारणसे पार्थ । करना कर्ममें आस्था । और भी एक है अर्थ । उपकारक ॥ ५३ ॥ अपने आचरण करनेसे । होगा अनुकरण जिससे । कर्म लोपकी विपदासे । बचेगा विश्व ॥ ५४॥ जिसने पाया जो पानेका । बीज भी मिटा कामनाका । फिर भी कर्तव्य उनका । रहा औरोंकेलिये ॥ ५५ ॥ तथैव नित्य निःसंग कर कर्तव्य कर्म तू । निःसंग करके कर्म कैवल्य पद लाभता ॥ १९ ॥ प्राप्त की है कर्मसे ही संसिद्धि जनकादिने । कर तू कर्म जो योग्य लोक-संग्रहकेलिये ॥ २० ॥ ९१ कर्मयोग
अंधोंको दिखलानेमें जैसे । स-दृष्टि राह चला वैसे । आचरणसे धर्म वैसे । सिखाना मूढको ॥ ५६ ॥ ज्ञानी यदि ऐसा न करेंगे । अज्ञानी यह कैसे जानेंगे । कैसे धर्माचरण करेंगे । उचित रूपसे ॥ ५७ ॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ बड़े लोग जो जो करते । उसीको धर्म है कहते । उसको अन्य आचरते । सामान्य सभी ॥ ५८ ॥ ऐसा होना ही है स्वाभाविक । तभी कर्माचरण आवश्यक । विशेष रूपसे है अधिक । संत जनोंको ॥ ५९ ॥ न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ २२ ॥ मैं स्वयं कर्म रत हूं— अब दूसरोंकी बात । कहूं क्यों तुझसे पार्थ । स्वयं कर्ममें सतत । रहता यहां ॥ १६० ॥ मुझमें है कोई अपूर्णता । अथवा किसी इच्छासे पार्थ । मैं स्वधर्माचरण करता । ऐसा कहो तो ॥ ६१ ॥ देखें तो पूर्णत्वकी दृष्टिसे । दूसरा नहीं विश्वमें ऐसे । मुझमें बसा बल है ऐसे । जानता तू ॥ ६२ ॥ मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान । औ' मैं कर रहा कर्म सं-लग्न । प्रसन्न चित्तसे ॥ ६३ ॥ जो जो आचरते श्रेष्ठ उसीको दूसरे जन । वह जो करता मान्य उसीको अन्य लोग भी ॥ २१ ॥ नहीं कर्तव्य कोयी भी मुझको तीन लोकमें । फिर भी मैं सदा पार्थ रहता कर्म-तत्पर ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ९२
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥ पर स्वधर्म रत हूं कैसा । सकाम रत रहता वैसा । पार्थ उसका उद्देश्य ऐसा । एक ही है ॥ ६४ ॥ प्राणि मात्र यहां सकल । हमारे आधीन केवल । जिससे रहे वे सरल । स्वधर्ममें रत ॥ ६५ ॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ हम हैं पूर्ण काम होकर । आत्मस्थितिमें ही रह कर । करेगी कैसी प्रजा संसार । पार सकल ॥ ६६ ॥ हमारा ही आचरण देखना । उसीका अनुकरण करना । है यह प्रजा-जनका अपना । नियम जैसा ॥ ६७ ॥ इसीलिये जो हैं समर्थ । तथा सर्वज्ञतासे युक्त । कर्म त्याग नहीं उचित । उसको कभी ॥ ६८ ॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥ अर्जुन फलकी आशासे । आचरता कामुक जैसे । कर्म रत रहता वैसे । निरिच्छ ही ॥ ६९ ॥ बड़ोंको सुन पार्थ । सकल लोक-संस्था । रक्षणीय है सर्वथा । इसीलिये ॥ १७० ॥ न रहूं मैं कर्म-लीन तजके यदि आलस । चलेंगे लोगभी ऐसे सर्वथा इस मार्गसे ॥ २३ ॥ छोडूंगा यदि मैं कर्म होगा विनाश लोकका । बनूंगा संकर द्वारा प्रजाका नाश-कारण ॥ २४ ॥ फंसके करता अज्ञ ज्ञानीको मुक्त भावसे । करना कर्म वैसे ही लोक-संग्रह हेतुसे ॥ २५ ॥ ९३ कर्मयोग
शास्त्रोचित ही बरतना । विश्वको सुपथ बताना । अलौकिक नहीं बनना । लोगोंमें कभी ॥ ७१ ॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६॥ आयाससे जो स्तन्य पीता । वह पक्वान्न कैसे खाता । शिशुको नहीं दिया जाता । कभी मिष्टान्न ॥ ७२ ॥ वैसे कर्ममें अयोग्यता । उससे कभी नैष्कर्म्यता । विनोदमें भी न कहता । अर्जुन कभी मैं ॥ ७३ ॥ लोक संग्रहार्थ कुशलता पूर्वक कर्म— उन्हे सत्कर्ममें लगाता । उनकी प्रशंसा करता । आचरण कर दिखाता । नैष्कर्म्यका ॥ ७४ ॥ सदा जो लोक संग्रहार्थ । रहता है कर्ममें रत । वह कर्म बंध रहित । रहता है ॥ ७५ ॥ बहुरूपियोंके राजारानीको जैसे । न चिपकता स्त्री पुरुष-भाव वैसे । लोक-संग्रहार्थ कर्म-रत होनेसे । नहीं है कर्म बंधन ॥ ७६ ॥ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ २७॥ अजी दूसरेका है भार । यदि अपने सिर पर । लिया तो उसका असर । न होगा क्या ॥ ७७ ॥ वैसे हैं शुभाशुभ कर्म । उपजाता प्रकृति-धर्म । उसको मूर्ख-मति-भ्रम । कहता "मैंने किया" ॥ ७८ ॥ अहंकार पर आरूढ । ऐसा जो संकुचित मूढ । उसको परमार्थ गूढ़ । कहना नहीं ॥ ७९ ॥ अबोध कर्म-निष्ठोंका बुद्धि भेद करो नहीं । जगावो कर्ममें चाव करके साम्य भावसे ॥ २६ ॥ होते हैं कर्म जो सारे प्रकृतिके स्वभावसे । अहंकारी बना मूढ मानता करता स्वयं ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ९४
यह है जो प्रस्तुत । कहा तुझसे हित । पार्थ दे कर चित्त । सुन सब ॥ १८० ॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥ अजी है तत्त्वज्ञानियोंका चित्त । होता प्रकृतिसे अप्रभावित । इस प्रकृतिमैसे कर्म जात । होते उत्पन्न ॥ ८१ ॥ देहाभिमान वे तजकर । गुण कर्मको ही पारकर । रहते साक्षी रूप होकर । शरीरमें ही ॥ ८२ ॥ अजी शरीरधारी होकर भी । कर्म-बंधसे मुक्त होते तभी । जैसे लिप्त न होता सूर्य कभी । विश्वके कर्मसे ॥ ८३ ॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्नविचालयेत् ॥२९॥ गुण संग्राममें जो घिरकर । तथा प्रकृतिके वश होकर । रत होता कार्यमें निरंतर । वही कर्म बद्ध ॥ ८४ ॥ इंद्रियां सदा गुणाधार । करती अपना व्यापार । पर कर्म अपने पर । लेते वे बद्ध ॥ ८५ ॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥ गुण ये और ये कर्म इससे भिन्न मान मैं । रहे असंग तत्वज्ञ गुणमें गुण आचर ॥ २८ ॥ डूबे जो गुण कर्मोंमें प्रकृति गुणसे ठगे । ऐसे अल्पज्ञ मूढ़ोंको ज्ञानी भ्रांत करे नहीं ॥ २९ ॥ मुझे अध्यात्म बुद्धिसे कर सर्व समर्पण । फलाशा ममता सारी छोडके जूझ तू यहां ॥ ३० ॥ ९५ कर्मयोग
उठो, स्वधर्माचरणार्थ कर्म करो- उचित कर्म सभी कर । उन्हें मुझे अर्पण कर । चित्त वृत्तिको लीन कर । आत्मामें ही ॥ ८६ ॥ कर्म कर्तृत्वका भान । औ' उसका अभिमान । न कर कभी अर्जुन । मनमें भी ॥ ८७ ॥ शरीरासक्तिको छोड़ना । कामना सबको त्यजना । समयपे फिर भोगना । प्राप्त भोग ॥ ८८ ॥ कोदंड लेकर अब करमें । चढ़ कर बैठा अब रथमें । अलिङ्गन कर वीर वृत्तिमें । शांत भावसे ॥ ८९ ॥ विश्वमें कीर्तिको फैलाओ । स्वधर्मका मान बढ़ावो । पापके भारसे छुडावो । पृथ्वीको अब ॥ ९० ॥ अर्जुन ! संदेहको छोड़ दो । संग्राममें ही अब चित्त दो । अन्य कछु बोलना त्यज दो । अबसे फिर ॥ ९१ ॥ ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ : आत्म रत कर्मसे विकास, प्रकृति तंत्र कर्मसे विनाश- यह है मेरा मत यथार्थ । अत्यादरसे आचरणार्थ । निष्ठा पूर्वक अनुष्ठानार्थ । कहा अर्जुन ॥ ९२ ॥ सकल कर्ममें हो रत । ऐसा होना कर्म रहित । इसीलिये यह निश्चित । है करणीय ॥ ९३ ॥ ये त्वेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ मेरा शासन जो नित्य मानते हैं निर्मत्सर । श्रद्धासे अज्ञ निष्पाप तोडते कर्म-बंधन ॥ ३१ ॥ किंतु मत्सर-बुद्धिसे मेरा शासन तोड़ते । वे ज्ञान-शून्य जो मूढ पाते हैं नाश निश्चित ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ९६
या प्रकृतिमें रत हो कर । इंद्रियोंको दुलारकर । मेरे मतको ठुकरा कर । बरतते हैं ॥ ९४ ॥ तथा इसको तुच्छ मानते । इसकी जो अवज्ञा करते । इसे बेकार बात मानते । वाचालतासे ॥ ९५ ॥ हैं ये मोह मदिरासे अमित । विषय बिषमें रत सतत । अज्ञान कीचमें पतित नित । निःसंशय ॥ ९६ ॥ शवके हाथमें दिया रत्न । जैसे व्यर्थ जाता है अर्जुन । जन्मांधको उदयास्त दिन । अनुपयुक्त ॥ ९७ ॥ या हे चंद्रका उदय जैसा । कागको अनुपयुक्त वैसा । मूर्खको है विवेक भी वैसा । अरुचिकर ॥ ९८ ॥ वैसे ही जान तू पार्थ । विमुख जो परमार्थ । उनसे बात सर्वथा । न की जाती ॥ ९९ ॥ तभी वे कछु न मानते । निंदा भी करने लगते । पतंग कैसे क्या सहते । कभी प्रकाश ? ॥ २०० ॥ दीपसे पतंगका आलिंगन । उनका वहां निश्चित मरण । ऐसा होता है विषयाचरण । आत्मघातसा ॥ १ ॥ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ शरीर नाशवान है— तभी इंद्रियोंका दुलार । न करें कभी जानकर । मन रंजनके खातिर । त्याज्य मान ॥ २ ॥ अजी सापसे क्या खेल होगा । या बाघका साथ क्या निभेगा। या हलाहल कभी पचेगा । खाया तो ॥ ३ ॥ जैसी खेलमें आग लगती । न संभलते बढ़ती जाती । वैसी स्थिति इंद्रियोंकी होती । दुलारनेसे ॥ ४ ॥ ज्ञानीकी कर्म-चेष्टा भी चलती निज भावसे । स्वभाव वश हैं प्राणी बलात्कार निरर्थक ॥ ३३ ॥ ९७ कर्मयोग (13)
वैसे तो सुन अर्जुन । शरीर है पराधीन । नाना भोग क्यों निर्माण । करें सब ॥ ५ ॥ आयास करके बहुत । सकल ही समृद्ध जात । इस देहको अनवरत । पाले क्यों ? ॥ ६ ॥ सर्वस्व तज कर । संपत्तिको पाकर । स्वधर्म छोड़कर । पालना देह ॥ ७ ॥ फिर है यह पंच मेलका । अनुसरेगा पंच तत्वका । तब अपने किये श्रमका । मूल्य क्या है ? ॥ ८ ॥ केवल शरीर पोषण । धोखा मान असाधारण । इस पर अतःकरण । न देना कभी ॥ ९ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तो ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ इसलिये स्वधर्माचरण ही करना— वैसे इंद्रियोंके हितार्थ । विषय दिये नियमित । होगा संतोषित चित्त । यह है सच ॥ २१० ॥ किंतु जैसे सभ्य चोरका साथ । केवल समाजमें है विश्वस्थ । निश्चित ही है करता जो घात । एकांत आते ही ॥ ११ ॥ अजी विषकी है मधुरता । उपजाती चितमें ममता । परिणाममें भयंकरता । प्राणहारी ॥ १२ ॥ जैसे कंटियामें लगाया आमिष । भुलाता है मीनको दिखाके आस । वैसे भुलाते हैं विषय सुखाश । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥ आमिषमें कांटिया होती । प्राणको वह हर लेती । आमिषमें वह छिपी होती । न जानता मीन ॥ १४ ॥ वैसे यहां अभिलाषामें होगा । यदि विषयकी आशा करेगा । अभिलाषासे है बलि जायेगा । क्रोधानलका ॥ १५ ॥ इंद्रियोंके स्व-अर्थोंमें रहते राग द्वेष हैं । उन्हें वश नहीं होना देहीके पथ-शत्रु वे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ९८
शिकारी जैसे घेरकर। देखता है सु-अवसर । मारनेमें रहे तत्पर । मृगको सदा ॥ १६ ॥ यहां ऐसा ही होता है । संग उचित नहीं है । पार्थ काम औ' क्रोध है । अति घातुक ॥ १७॥ उसका आश्रय नहीं करना । मनमें स्मरण भी न धरना । ल्लान नष्ट नहीं होने देना । स्वधर्मकी ॥ १८ ॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ स्वधर्ममें मृत्यु भी श्रेष्ठ है— अजी ! स्वधर्म जो है अर्जुन । यदि आचरणमें कठिन । किंतु उसीका है अनुष्ठान । शुभदायक ॥ १९॥ यदि पराया आचार । देखनेमें है सुंदर । किंतु करना स्वीकार । अपना ही ॥ २२० ॥ शूद्रके घरके मिष्टान्न । खाये कैसे वह ब्राह्मण । हुआ भी है अति उद्विग्न । भूखसे ॥ २१ ॥ करना कैसे अनुचित । अनुचित इच्छाको प्राप्त । इच्छा हुई तो अनुचित । वह साधना क्या ? ॥ २२ ॥ दूसरोंका घर सुंदर । देखके अपना कुटीर । करें गिरानेका व्यापार । उचित क्या ? ॥ २३ ॥ अजी ! है अपनी सती । यदि कुरूप भी होती । संसारमें वही गति । वैसे ही यह ॥ २४ ॥ चाहे जैसे असुविधा-जनक । आचरणमें कष्ट-दायक । फिर भी स्वधर्म ही है तारक । इह परमें ॥ २५ ॥ अल्प भी अपना धर्म सु-सेव्य पर-धर्मसे । स्वधर्ममें भला मृत्यु पर-धर्म भयंकर ॥ ३५ ॥ ९९ कर्मयोग
अजी ! शर्करा तथा दूध । रुचिकर अति प्रसिद्ध । है क्रिमिरोगमें निषिद्ध । कैसे सेव्य ॥ २६ ॥ जानकर भी किया सेवन । होगा ही वह दुःख कारण । कुपथ्यसे होता है जीवन । अति कष्टकर ॥ २७ ॥ तभी औरोंको जो उचित । अपनेको है अनुचित । जो अंतिम हितके हित । अनाचरणीय ॥ २८ ॥ करनेमें स्वधर्मानुष्ठान । नष्ट होता है यदि जीवन । तो भी भला है वह अर्जुन । दोनों अर्थसे ॥ २९ ॥ ज्ञान पूर्वक स्वधर्माचरण नहीं करते उनका क्या— ऐसा समस्त सुरशिरोमणि । बोले जहां श्रीशार्गपाणी । अर्जुन कहे वहां विनवणी । सुनो देव ॥ २३० ॥ यह है तेरा कहना । मैंने वह सारा सुना । किंतु अब कछु पूछना । मेरे मनकी ॥ ३१ ॥ अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ तभी देव यह है कैसा । ज्ञानियोंका स्मृति-भ्रंश-सा । पथ-भ्रष्ट होके सहसा । चलते हैं ॥ ३२ ॥ सर्वज्ञ ही हैं वे होते । औ' उपाय भी जानते । अधर्ममें व्यभिचरते । वह किस गुणसे ॥ ३३ ॥ अजी ! बीज तथा है भूसा । अंध न जाने चुनना कैसा । क्षण भर चतुर भी वैसा । बहकता क्यों ? ॥ ३४ ॥ जो संसारका संग भी हैं छोड़ते । वे संग संसर्गसे गुप्त न होते । वनवास छोड़कर भी हैं आते । जन-पदमें ॥ ३५ ॥ अर्जुनने कहा मनुष्य करता पाप किसकी प्रेरणा लिये । जुता हुवा व्यर्थका-सा स्वेच्छाके प्रतिकूल भी ॥ ३६ ॥ ज्ञानेश्वरी १००
स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते । फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥ जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे । टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥ दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर । जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥ हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम । कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥ भगवान उवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ इसका मूल रजोगुण— अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है। ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥ ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ । भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥ ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार । अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥ रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका । पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥ यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न । तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥ मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार । करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥ श्री भगवानने कहा यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने । बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥ १०१ कर्मयोग