भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

किंतु कर्म फलकी आशा न करना । तथा कुकर्मका संग भी न धरना । सत्कर्मका आचरण सदा करना । बिन हेतुके ॥ ६६ ॥ योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्धयसिद्धयोःसमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥४८॥ ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण ही- तू योगयुक्त होकर । फलाशाको छोड़कर । अर्जुन ! मन देकर । कर कर्म ॥ ६७ ॥ किंतु हुआ कर्म सफल । दैव था यदि अनुकूल । न होना संतुष्ट बहुत । मनमें भी ॥ ६८ ॥ या हुआ कोई कारण । कार्य रहा जो अपूर्ण । जिससे तू अंतःकरण । न कर क्षुब्ध ॥ ६९ ॥ काम हुआ हाथका पूर्ण । यदि रहा वह अपूर्ण । इससे विचार सगुण । ऐसे मानना ॥ २७० ॥ कर्मका जो है मूल कारण । उसको ही किया समर्पण । वहीं हुआ वह परिपूर्ण । सहज भावसे ॥ ७१ ॥ सफल असफलमें सतत । रहता है जिसका सम चित्त । योग स्थिति है वह प्रशंसित । ज्ञानियोंसे ॥ ७२ ॥ दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५०॥ फल लाभे न लाभे तू असंग सम-भावसे । योग-युक्त कर कर्म योग-सार समत्व है ॥ ४८ ॥ समत्व-बुद्धि है श्रेष्ठ उससे कर्म हीन है । बुद्धिका आसरा ले तू चाहते फल दीन हैं ॥४९॥ यहां समत्व बुद्धिसे टलता पाप पुण्य है । समत्व-युक्त हो सारा योग है कर्म-कौशल ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ६२

ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है— अर्जुन ! समत्व जो चित्तका । सार जान वही तू योगका । जिससे मन तथा बुद्धिका । होता ऐक्य ॥ ७३ ॥ बुद्धियोगका विवेचन । करनेसे लगता हीन । कर्म मार्ग है जो अर्जुन । वह सकाम ॥ ७४ ॥ किंतु कर्म करना है सतत । उससे योग मिलता निश्चित । शेष कर्ममें जो सहज चित्त । योग स्थिति है ॥ ७५ ॥ बुद्धियोग है सधर । उसमें ही हो तू स्थिर । मनसे ही त्याग कर । फल हेतुका ॥ ७६ ॥ लेकर आसरा बुद्धियोगका । पार हो जाते हैं भव सागरका । तोड़कर बंधन उभयका । पाप-पुण्य ॥ ७७ ॥ कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥ वे यदि कर्म करते रहते । मनसे कर्म फल नहीं छूते । तभी जन्म-मृत्युसे मुक्त होते । सुनो पार्थ ॥ ७८ ॥ होते हैं जो योग च्युत । पद पाते हैं अच्युत । हैं जो आनंद भरित । धनुर्धर ॥ ७९ ॥ तू भी ऐसा ही होगा । यदि मोह छोड़ेगा । मनमें जो धरेगा । विराग को ॥ २८० ॥ यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥ तब निष्कलंक गगन । उदित होगा तत्वज्ञान । उससे निरीच्छ होगा मन । सहज रूपसे ॥ ८१ ॥ समत्व-बुद्धिसे ज्ञानी तजके कर्मके फल । छुडाके जन्मकी गांठ पाते हैं पद अच्युत ॥ ५१ ॥ बुद्धि जो तर जायेगी मोहका जब कीचड़ । हुवा होगा शब्द ज्ञान पचायेगा तभी सब ॥ ५२ ॥ ८२ सांख्ययोग

और है कुछ जानना। बीतेको अब स्मरना। ऐसा सब तू अर्जुन। भूलेगा तब ॥ ८२ ॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥ बुद्धि जो इंद्रियोंके संगमें । फैलती है दशदिशाओंमें । होगी वही फिर आत्मरूपमें । स्थिर नित्य ॥ ८३ ॥ समाधि सुखमें केवल। बुद्धि होगी अति निश्चल । वहां पायेगा तू सकल । योगस्थिति ॥ ८४ ॥ अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥५४॥ स्थितप्रज्ञताकी जिज्ञासा— कहता है पार्थ हे कृष्ण। इसी बातको जानुं पूर्ण । कहो अब हो सकरुण । कृपानिधि ॥ ८५ ॥ कहा अच्युतने फिर । पूछ ले तू धनुर्धर । मनके कोई विचार । मुक्त भावसे ॥ ८६ ॥ बोला अर्जुन कृष्णसे । कहो बातें ये मुझसे । जानना उसको कैसे । स्थितप्रज्ञ है ॥ ८७ ॥ जो है स्थिरमति कहलाता । समाधि सुख नित भोगता । कैसा कहो वह जाना जाता । शार्ङ्गधर ॥ ८८ ॥ किस स्थितिमें वह रहता । कैसे वह बर्ताव करता । किस रूपमें वह रहता । लक्ष्मीपति ॥ ८९ ॥ सुनके उलझी बुद्धि तेरी पाकर निश्चय । समाधिमें स्थिर होगी पायेगा तब योग तू ॥ ५३ ॥ अर्जुनने कहा समाधिमें स्थिराथा जो रहता किस भांतिसे । बोले रहे फिरे कैसे स्थित-प्रज्ञ कहो मुझे ॥५४॥ ज्ञानेश्वरी ६४

तब परब्रह्मका अवतरण । है जो षड्गुणाधिकरण । सुन इसे वहां नारायण । बोले ऐसा ॥ २९० ॥ भगवान उवाच प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥ स्थितप्रज्ञके लक्षण— सुन तू अब अर्जुन । मनकी प्रौढ़ कामना । होती अति उलझन । आत्म सुखमें ॥ ९१ ॥ सदैव जो हैं नित्य तृप्त । अन्तःकरणमें भरित । किंतु विषयमें पतित । जिसके संगसे ॥ ९२ ॥ काम वह जब मूलतः मिटता । मन उसका आत्मतोषी हो जाता । तभी वह स्थितप्रज्ञ कहलाता । धनंजय ॥ ९३ ॥ दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥ होते हैं जब दुख प्राप्त । तब न होता उद्विग्नचित्त । सुखमें भी वह हर्षित । होता नहीं ॥ ९४ ॥ होता अर्जुन उसका चित्त । सदा काम क्रोधसे रहित । तथा होता है भयसे मुक्त । परिपूर्ण वह ॥ ९५ ॥ ऐसा वह निरवधि । उसे जान स्थिर बुद्धि । सब त्यागके उपाधि । द्वंद्वातीत ॥ ९६ ॥ श्री भगवानने कहा मनकी कामना सारी छोडके अपनी वह । आत्मामें रहता तुष्ट कहाता स्थित-प्रज्ञ सो ॥ ५५ ॥ उद्विग्न दुःखमें ना हो सुखकी लालसा नहीं । गया राग भय क्रोध है स्थित-प्रज्ञ संयमी ॥ ५६ ॥ ६५ सांख्ययोग

यः सर्वत्रानभिस्नेह स्तत्त त्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५७॥ सर्वत्र सदैव एकसा । संपूर्ण चंद्र देता जैसा । सबको समान प्रकाश । न देख अधमोत्तम ॥ ९७ ॥ ऐसी अनवच्छिन्न समता । भूतमात्रमें हो सदयता । तथा अपरिवर्तित चित्त । सदा सर्वत्र ॥ ९८ ॥ भला पाकर नहीं रीझता । वैसे बुराईमें न खीजता । दोनोंमें एक-सा है रहता । अप्रभावित ॥ ९९ ॥ ऐसा जो हर्ष शोक रहित । सदा आत्म-बोधसे भरित । जान तू है वह प्रज्ञा युक्त । धनुर्धर ॥ ३०० ॥ यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८॥ अथवा कूर्मके समान । मोदमें फैलाता है तन । या इच्छावश आकुंचन । करता है जो ॥ १ ॥ इंद्रिया जिसके आधीन । उनका करती कथन । वही है स्थितप्रज्ञ जान । तू धनंजय ॥ २ ॥ विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः । रसवर्जं रसोऽप्यस्य परंदृष्ट्वा निवर्तते ॥५९॥

सर्वत्र जो अनासक्त पाता जब भला बुरा । न करे हर्ष या द्वेष है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥ ५७ ॥ लेता समेट संपूर्ण इंद्रियोंको विषयसे । जैसे कूर्म सभी अंग तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ५८ ॥ निराहार बलसे जो तजे विषय देहके । रस न छोड़ता चित्त जल्ता आत्म ज्ञानसे ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६६

परंदृष्ट्वा निवर्तते— अर्जुन ! तुझसे एक । कहूंगा ऐसा कौतुक । विषयोंके हैं साधक । करते नियम ॥ ३ ॥ संयम करते श्रोत्रादिक । किंतु छोड़ते रसना एक । घेरते धर रूप अनेक । तब विषय ॥ ४ ॥ ऊपर तोड़कर अंकुर । जड़में सदा जल देकर । फैलेगा वृक्ष जैसा अपार । नाश ऐसा ॥ ५ ॥ पीकर जल वह अधिक । फैलाता जैसा अंग अनेक । रसनासे विषय अनेक । फलते मनमें ॥ ६ ॥ टूटते अन्य इंद्रियोंके । विषय नहीं रसनाके । हैं जो आधार जीवनके । इसीलिये ॥ ७ ॥ अर्जुन इसका नियमन । होता है तब सहज जान । परब्रह्मानुभव महान् । होता जब ॥ ८ ॥ शरीरभाव भी मिटता । करण विषय भूलता । ब्रह्मभाव प्रतीत होता । अपनेमें ही ॥ ९ ॥ यततो ह्यपि कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितः । इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरंति प्रसभं मनः ॥६०॥ इंद्रियोंकी प्रबंलता— वैसे तो सुन तू अर्जुन । न होती इंद्रियां स्वाधीन । साधक करते जतन । निरंतर ॥ ३१० ॥ अभ्यासका कर घर । यम नियमका द्वार । मनको पकड कर । रखते मुट्ठिमें ॥ ११ ॥ करते हैं इंद्रियां व्याकुल । साधकोंको भी जो हैं कुशल । मांत्रिकको जैसे है चुडैल । भृष्ट करती ॥ १२ ॥ ज्ञानियोंके मनको भी यत्नमें रहते हुये । हटाती वेगसे मत्त इंद्रियां बलवान जो ॥ ६० ॥ ६७ सांख्ययोग

विषय भी होते हैं ऐसे । जो ऋद्धि-सिद्धिके रूपसे । जकडते हैं आ स्पर्शसे । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥ उनके संगमें जाता है मन । अभ्यासमें होकर बल हीन । बल है ऐसा इंद्रियोंका जान । तू धनंजय ॥ १४ ॥ तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीतमत्परः । वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६१॥ रहो हृदयमें सदा अनुरक्त मेरा— इसीलिये तू सुन पार्थ । छोडके विषयोंमें आस्था । इनका दमन सर्वथा । । कर निरंतर ॥ १५॥ इसीको तू जान अर्जुन । योग निष्ठाका है कारण । विषयोंसे अंतःकरण । न होता लिप्त ॥ १६ ॥ अजी ! जो आत्म बोध युक्त । होकर रहता सतत । हृदयमें हो अनुरक्त । रहता मेरा ॥ १७॥ विषयीको आत्मसुख नहीं— किया बाह्य विषयोंका त्याग । अंदरसे रहा अनुराग । तब साद्यंत संसार भोग । करता वह ॥ १८ ॥ जैसा विषका लेश । लेनेसे होता विशेष । करता वह विनाश । जीवनका ॥ १९॥ वैसे विषयोंका अंश । मनमें रहके नाश । करता जान अशेष । विवेकको ॥ ३२० ॥ ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥ उनको युक्तिसे रोक रहना मत्परायण । जिसने इंद्रियां जीती है स्थित-प्रज्ञ जान तू ॥६१ ॥ करे जो विषय ध्यान उनकी लगती लत । लतसे फूटता काम कामसे क्रोध उद्भव ॥ ६२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात् स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ॥ ६३॥ करता यदि मन विषय मनन । नि संगका भी होता उससे रंजन । रंजनसे प्रकट होती मूर्तिमान । अभिलाषा तब ॥ २१ ॥ होता है जहां काम उत्पन्न । क्रोधका वहां जमा आसन । क्रोध संगमें मोहको मान । अपने आप ॥ २२ ॥ मोहसे घिरते ही व्यक्ति । नाश होती उसकी स्मृति । जैसे बवंडरमें ज्योति । बुझ जाती है ॥ २३ ॥ अथवा सायंकालमें निशा । ग्रसती जैसा सूर्य प्रकाश । वैसी ही स्मृति भ्रंशमें दशा । होती मनुष्यकी ॥ २४ ॥ अज्ञानांध तब केवल । उससे घिरे हैं सकल । होती वहां बुद्धि व्याकुल । हृदयमें पार्थ ॥ २५ ॥ जन्मांध जैसे घबड़ाहटमें । अकुलाता है भाग दौड़में । होता वैसा बुद्धिका संसारमें । धनुर्धर ॥ २६ ॥ जब ऐसा बुद्धि-भ्रंश होता । सर्वत्र उसका कुंठा होता । ज्ञानका वहां नाश होता । मूल रूपसे ॥ २७ ॥ चैतन्यके नाशसे जैसे । होती देहकी दशा वैसे । पुरुषकी बुद्धि-नाशसे । होती है जान ॥ २८ ॥ इसीलिये सुन अर्जुन । जैसे चिनगारी ईंधन । पड़ बढ़ती त्रिभुवन । जलाती जाती ॥ २९ ॥ वैसे विषयोंका ध्यान । जब करता है मन । उससे होता पतन । जान निश्चय ॥ ३३० ॥ फूटता क्रोधसे मोह मोहसे स्मृति लोप है । स्मृति लोप बुद्धि-नाश उसीमें आत्म-नाश है ॥ ६३ ॥ ६९ सांख्ययोग

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥ आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी इंद्रियोंके लाड करके क्लेश ही पायेगा-- तभी विषयोंको मनसे । त्यागना है जड़ मूलसे । रागद्वेष सहजतासे । नष्ट होंगे सब ॥ ३१ ॥ सुन अर्जुन बात और एक । होकर नष्ट रागद्वेषादिक । इंद्रियोंका रमना है बाधक । न होता विषयोंमें ॥ ३२ ॥ सूर्य जैसा आकाशगत । छूता किरणोंसे जगत । किंतु संग-दोषसे लिप्त । होता नहीं ॥ ३३ ॥ इंद्रियोंमें वैसे उदासीन । आत्मरसमें होके तल्लीन । औ' कामक्रोधादिसे विहीन । होकर रहता ॥ ३४ ॥ विषयोंमें भी है जो सतत । आत्म तत्वमें रहता रत । उसको होंगे विषय पार्थ । बाधक कैसे ॥ ३५ ॥ पानीमें यदि पानी डूबता । तथा आगसे अग्नि जलता । तभी विषयोंमें है डूबता । जो है पूर्ण ॥ ३६ ॥ अपनेमें आप केवल । होकर रहा जो निर्मल । उसकी प्रज्ञा है निश्चल । तथा निर्भ्रान्त ॥ ३७ ॥ प्रसादे सर्व दुःखानाम् हानिरस्योपजायते । प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥६५॥ पाता प्रसन्नता अखंडित । जिसका चित्त है सदोदित । वहां प्रवेश नहीं समस्त । भवदुःखोंका ॥ ३८ ॥ मिटा तो राग औ' द्वेष होती हैं इंद्रियां वश । प्रभुत्वसे इंद्रियोंके प्रसाद मिलता फिर ॥ ६४ ॥ प्रसादसे सभी दुःख होते हैं नाश सत्वर । प्रसादसे बुद्धिकी तो स्थिरता शीघ्र निश्चित ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०

जैसे अमृतका निर्झर । बहाता जिसका उदर । भूख प्यासका क्या असर । उसपे होगा ॥ ३९ ॥ हृदय जब प्रसन्न होता है । तब दुःख वहां कैसे रहता है । सहज रूपसे मति रहती है । परमात्मामें ॥ ३४० ॥ जैसे निर्वातका दीप । न जाने सर्वथा कंप । स्थिर बुध्दिका स्वरूप । योगयुक्त वैसे ॥ ४१ ॥ नास्ति बुध्दिरयुक्तस्य न चा युक्तस्य भावना । न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥ मुक्तताका यह् मंथन । न करता जिसका मन । जकडा जाता वह् जान । विषयादिकोंमें ॥ ४२ ॥ उसमें स्थिर बुध्दि पार्थ । कुछ भी नहीं है सर्वथा । तथा स्थिरताकी जो आस्था । नहीं होगी ॥ ४३ ॥ निश्चलताकी भावना । चित्तमें न होती उत्पन्न । शांति होगी कैसी अर्जुन । उसको कभी ॥ ४४ ॥ नहीं जहां शांतिकी लगन । वहां न होता सुखका स्थान । पापियोंका जो ऐसा जीवन । वहां न देखता मोक्ष ॥ ४५ ॥ बीजको आगमें भूनकर । बोनेसे नहीं आता अंकुर । वैसा सुख नहीं पाता नर । है जो अशांत ॥ ४६ ॥ तभी अयुक्तपन मनका । वही सर्वस्व है दुःखका । कारण उसका इंद्रियोंका । भला दमन ॥ ४७ ॥ इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥६७॥ अयुक्तको नहीं बुध्दि उससे भावना नहीं । न भाव-हीनको शांति नहीं सुख अशांतको ॥ ६६ ॥ इंद्रियां दौड़ती स्वैर पीछे ही चलता मन । मानो प्रज्ञा बंधी नौका नदीमें वायुसे चली ॥ ६७ ॥ ७१ सांख्ययोग

जो जो इंद्रिय है करते । वही जो पुरुष करते । वे तरके भी न तरते । विषय सिंधु ॥ ४८ ॥ जैसे नांब लगी जो तीर । वही आंधीमें फंसकर । आती जैसी बीच भंवर । अपने आप ॥ ४९ ॥ वैसे आत्मत्व प्राप्त पुरुषके । दुलार करनेसे इंद्रियोंके । पायेगा वह क्लेश संसारके । अपने आप ॥ ३५० ॥ तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८॥ इसलिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है— अपने आप यदि अर्जुन । किया है इंद्रियोंको आधीन । पाना कछु रहा नहीं जान । इससे अधिक ॥ ५१ ॥ कछुआ जैसे अपने फैलाता । अवयव जब वह चाहता । नहीं तो इच्छासे सिकोड़ लेता । अपनेमें आप ॥ ५२ ॥ इंद्रियां जिसकी अपनी होतीं । वह कहें जैसी हू बरततीं । जानो वह हुवा है रिथर मति । धनुर्धर तू ॥ ५३ ॥ अब और एक गहन । कहूंगा सुनो पहचान । जिसने पाया है अर्जुन । पूर्णत्वको ॥ ५४ ॥ यानिशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥६९॥ होते हैं जहां सब निद्रित । होता है वह वहां जाग्रत । जहां होते हैं सब जाग्रत । वह सोता है ॥ ५५ ॥ जिसने इंद्रियां सारीं सर्वथा है समेटलीं । स-निग्रह विषयोंसे तभी प्रज्ञा हुयी स्थिर ॥ ६८ ॥ रात जो सब भूतोंकी संयमी जागता वहां । जहां जगे सभी भूत मुनिकी रात है वह ॥ ६९॥ ज्ञानेश्वरी ७२

अध्याय ३: कर्मयोग

होता है वही निरुपाधि । उसे जान तू स्थिर-बुद्धि । वही होता है निरवधि । मुणीश्वर ॥ ५६ ॥ आपूर्यमाणं अचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत् । तद्वत् कामा यं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥ सभी सुख-समुद्र उसमें लीन-- अर्जुन और एक प्रकार । उसको जाननेका विचार । शांत रहता जैसा सागर । अखंडित ॥ ५७ ॥ सरिता ओघ यदि समस्त । करते हैं जल समर्पित । तो भी रहता जैसे सीमित । अपनी सीमामें ॥ ५८ ॥ अथवा ग्रीष्मकालमें सरिता । सुखालेती है प्रवाह सर्वथा । किंतु उसमें न्यून नहीं आता । समुद्र वैसाही ॥ ५९ ॥ वैसे ही पानेसे ऋध्दि सिद्धि । नहीं क्षोभती उसकी बुद्धि । न मिलनेसे उसकी बुध्दि । न होती उदास ॥ ३६० ॥ अथवा सूरजके समीप । प्रकाश लगाते क्या दीप । होता क्या, न लगानेसे दीप । अंधार वहां ॥ ६१ ॥ ऋध्दि सिद्धिका उसपर । न होता कुछ भी असर । हियमें होती निरंतर । शांति उसके ॥ ६२ ॥ मानता जो अपना वैभव महान । उसके सम्मुख तुच्छ इंद्र भुवन । वह करें क्या पर्ण-कुटिमें रंजन । भिल्लोंकी ॥ ६३ ॥ न भंग पाता भर भी सदैव समुद्र है नीर सभी पचाता । वैसे पचाते सब काम भोग वे शांति पाते नहीं भोग-लुब्ध ॥७०॥ ७३ सांख्ययोग (10)

अमृतको जो फीका मानता। वह क्या कांजी पीता बैठता। वैसा ही स्वानुभावी त्यागता। ऋध्दि सिध्दि ॥ ६४ ॥ पार्थ है यह नवल देख । तुच्छ है जहां स्वर्गका सुख । वहां ऋध्दि सिध्दिको क्या साख। रहती है ॥ ६५ ॥ विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहंकारःस शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥ ममता और अहंता त्यागमें शांति— ऐसा आत्म बोधमें तुष्ट । परमानंदमें है पुष्ट । वही है स्थित-प्रज्ञ श्रेष्ठ । जान तू ॥ ६६ ॥ अहंकारको जो मिटाकर । सब कामनाको त्याग कर । विचरता विश्वमें बनकर । विश्वमें ही ॥ ६७ ॥ एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति. स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥ यही ब्राह्मी स्थिति— है यह ब्राह्मी स्थिति निःसीम । अनुभवनेसे जो निष्काम । अनायास पाये पर-ब्रह्म । धनंजय ॥ ६८ ॥ चिद्रूपमें जब मिलता । देह-अंतकी व्याकुलता । नहीं वह अनुभवता । चितमें अपने ॥ ६९ ॥ वही है यह स्थिति । स्वमुखसे श्रीपति । कहते पार्थके प्रति । बोले संजय ॥ ३७० ॥ तजके कामना सारी फिर होकर निःस्पृह । अहंता ममता छूटी हुवा जो शांति रूप ही ॥ ७१ ॥ अर्जुन स्थिति है ब्राह्मी पाके न टलती वह । टिकती अंतमें भी जो ब्रह्म निर्वाण दायिनी ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४

सुनकर यह कृष्ण वचन । अर्जुन कहता मन ही मन । इस विचारसे है सिद्ध जान । अपना कार्य ॥ ७१ ॥ तीसरे अध्यायकी भूमिका— कर्म- मार्ग इससे संपूर्ण । होता सहज निराकरण । तब रहा युद्धका कारण । कहां औ' कैसे ॥ ७२ ॥ इस विचारसे अर्जुन । होकर संतुष्ट महान । पूछेगा भला-सा प्रश्न । संदेहसे ॥ ७३ ॥ वह प्रसंग अति सुंदर । सकल धर्मका है आगर । या विवेकामृतका सागर । सीमातीत ॥ ७४ ॥ है जो स्वयं सर्वज्ञ नाथ । कहेगा अब श्रीअनंत । वही है ज्ञानदेव बात । निवृत्तिदास ॥ ७५ ॥ गीता श्लोक ७२ ज्ञानेश्वरी ओवी ३७५. ॐ (10*)

३ कर्मयोग अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मताबुद्धिर्जनार्दन । तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ तो र्म करने क्यों कहता है ?— सुनो तब बोला अर्जुन । देव तूने कहा वचन । किया है उसका मनन । कमलापति ॥ १ ॥ वहां कर्म तथा कर्ता । देखनेसे नहीं रहता । ऐसा मत तेरा अनंत । यदि निश्चित है ॥ २ ॥ मुझे तब कैसा श्रीधर । कहता है तू युद्ध कर । यहां कर्ममें महा घोर । ढकलता कैसे ॥ ३ ॥ अजी तू ही कर्म अशेष । निषेध करता निःशेष । किंतु मुझसे यह हिंसक । कराता कैसे ॥ ४ ॥ सोचो यह हृषीकेश । मानता तू कर्म-लेश । हमसे तू ऐसी हिंसा । कराता है ॥ ५ ॥ अर्जुनने कहा कर्मसे बुद्धिको श्रेष्ठ मानता तू जनार्दन । तब क्यों कर्ममें घोर डालता मुझ केशव ॥ १ ॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ सरल शब्दोंमें उपदेश दो— तू ही जब देव ! ऐसा कहता । अज्ञानी मैं कह क्या करता । मिट ही गयी अब मनो-वार्ता । विवेककी ॥ ६ ॥ ऐसा यदि तेरा उपदेश । रहा क्या दूसरा स्मृति-भ्रंश । हुआ अब संपूर्ण विनाश । आत्मबोधका ॥ ७ ॥ वैद्य पहल पथ्य कहता । फिरसे चुपके विष देता । फिर क्या है रोगीका बनता । कहो मुझे ॥ ८ ॥ भटकना जैसे अंधेको । मद्य पिलाना मर्कटको । वैसा उपदेश हमको । देता सुन्दर ॥ ९ ॥ पहले ही मैं हूं अजान । फिर मोहग्रस्त महान । विवेक मैंने यह मान । तुझसे पूछा ॥ १० ॥ देव ! है तेरी निराली बात । उपदेशसे चित्त भ्रमित । ऐसे करना है क्या उचित । अपनोंसे ॥ ११ ॥ हम हैं तन-मन जीवसे । करें अनुकरण सदासे । तथा तेरा करना जो ऐसे । मिटा सर्वस ॥ १२ ॥ ऐसा यदि तेरा उमदेश । उसमें कैसी हितकी आस । औ' मिटे ज्ञानार्जनकी आस । कहता अर्जुन ॥ १३ ॥ गई कुछ जाननेकी बात । मन भी हुआ अव्यस्थित । पहले था जो स्थिर चित्त । मेरा देव ॥ १४ ॥ वैसे है श्रीकृष्ण तेरा । चरित्र अंति गहरा । तू देखता चित्त मेरा । इस बहाने ॥ १५ ॥ अथवा तू हमें फंसाता । या गूढ तत्व है कहता । वह समझमें न आता । सोचनेसे ॥ १६ ॥ मिश्र-वचनसे बुद्धि करता मोह-युक्त तू। जिससे श्रेय पाऊं मैं कह तू एक निश्चित ॥ २ ॥ ७७ कर्मयोग

श्रीकृष्ण बात मेरी सुनना । गूढार्थ मुझसे न बोलना । सरल विवेक जो कहना । देश-भाषामें ॥ १७ ॥ मेरी मति है जड़ अत्यंत । तो भी समझं ऐसी ही बात । हरि तुझे बोलना सतत । निश्चयात्मक ॥ १८ ॥ रोगको है यदि जीतना । उस पर औषध देना । किंतु वह सुस्वादु होना । अति मधुर ॥ १९ ॥ देव तेरे जैसे सद्गुरु । इच्छाकी तृप्ति क्यों न करूं । यहां संकोच किसका धरूं । तू ही माय मेरी ॥ २० ॥ अजी ! कामधेनु दुहनेमें । आयी अपने ही सदनमें । तब भी कामना करनेमें । कृपणता क्यों ? ॥ २१ ॥ चिंतामणि करमें आया । वांछित जो मन भाया । भोगनेमें संकोच किया । ऐसा क्यों ॥ २२ ॥ अमृत-सागरके पास । आके न मिटाता है प्यास । आना तब उसके पास । व्यर्थ ही है ॥ २४ ॥ जन्मोंकी उपासनासे । श्रीहरि दैव योगसे । तू हुआ है अपनेसे । आधीन आज ॥ २५ ॥ तभी न मांगें क्यों सर्वस । सुकाल है यह परेश । आयी जन्मांतरकी आस । पूर्ण होनेको ॥ २६ ॥ सकल जीवन सफल । मिला पुण्य यशका फल । सिद्ध मनोरथ सकल । हुए मेरे ॥ २७ ॥ सकल मंगल धाम । अजी देवदेवोत्तम । हुआ आज पूर्ण काम । तू स्वाधीन है ॥ २८ ॥ माताके पास बालक जैसे । लगता है स्तनमें स्वेच्छासे । न देखे काल अकाल वैसे । भक्त वत्सल ॥ २९ ॥ वैसे देव तुझसे । पूछते हैं स्वेच्छासे । न जाने समय ऐसे । कृपानिधि ॥ ३० ॥ देव ! सर्वत्र जो हित । आचरणमें उचित । कह एक जो निश्चित । कहता पार्थ ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ७८

भगवान उवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥ अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता— इस बातसे अच्युत । कहता है हो विस्मित । अर्जुनका है ध्वनित । अभिप्रायसे ॥ ३२ ॥ अजी ! बुद्धि-योगकी बात । कहनेमें ही सांख्यमत । प्रकट किया स्वभावतः । अल्पमें ही ॥ ३३ ॥ उद्देश्य न वह जान कर । क्षुभित हुआ तेरा अंतर । कहूंगा मैं दोनों सत्वर । योग मार्ग ॥ ३४ ॥ सरल शब्दोंमें उपदेश दो— सुन तू वीर श्रेष्ठ । जनमें दोनों निष्ठा । मुझसे ही प्रकट । अनादि सिद्ध ॥ ३५ ॥ एक ज्ञान-योग कहलाता । अनुष्ठान जो सांख्य करता । मूल तत्वसे है तन्मयता । पाता है वह ॥ ३६ ॥ दूसरा कर्मयोग जान । जो साधक जन निपुण । प्राप्त करते वे निर्वाण । परमगति ॥ ३७ ॥ मार्ग है दोनों भिन्न । अन्तमें हैं समान । पक्वापक्व भोजन । तृप्ति एक ॥ ३८ ॥ या पूर्व-पश्चिमकी सरिता । दीखनेमें है अति भिन्नता । सागर संगमसे एकता । होती दोनोंमें ॥ ३९ ॥ वैसे हैं ये दोनों मत । एक हेतुसे प्रेरित । किंतु जैसे उपासित । योग्यतासे ॥ ४० ॥ श्रीभगवानने कहा जगमें दोहरी निष्ठा कही है पहले तुझे । ज्ञानसे सांख्य जो पाते योगी हैं कर्मसे यही ॥ ३ ॥ ७९ कर्मयोग

पंछी जैसे उड़कर । पाता है फल सत्वर । पायेगा क्या ऐसा नर । पक्षि की भाँति ॥ ४१ ॥ चढ़ेगा वह डाल डाल । देख करके काल बेल । धीरेसे पायेगा ही फल । निश्चित ॥ ४२ ॥ वैसे विहंगम गतिसे । आचरण कर ज्ञानसे । सांख्य अति तीव्र गतिसे । पाता मोक्ष ॥ ४३ ॥ वैसे योगी कर्माधार । विधिसे कर्म आचर । पूर्णत्व स-अवसर । पाता ही है ॥ ४४ ॥ न कर्मणामनारम्भात्रैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ न कर कर्मारंभ उचित । बनना चाहे तो सिद्धवत । कर्म हीनको जान निश्चित । असंभव ॥ ४५ ॥ प्राप्त कर्म छोड़ना । फिर नैष्कर्म्य होना । व्यर्थ बोल अर्जुन । मूर्खताके ॥ ४६ ॥ वहां किनारे लगना । यहां नावको त्यजना । ऐसी बातोंका घडना । कैसे होगा ॥ ४७ ॥ इच्छा करना भोजनकी । किंतु पाक न करनेकी । सिद्ध पाक भी त्यजनेकी । होगी कैसी ॥ ४८ ॥ जब तक नहीं हुई निरिच्छिता । तब तक कर्मकी अनिवार्यता । आत्म तृप्तिसे मिटता स्वभावता । कर्म बंधन ॥ ४९ ॥ इसलिये तू सुन पार्थ । जिसे है नैष्कर्म्यमें आस्था । उसे उचित कर्म सर्वथा । नहीं त्याज्य ॥ ५० ॥ अपने करनेसे होता । तथा छोड़नेसे मिटता । इच्छा पर है क्या चलता । कभी कर्म ॥ ५१ ॥ टालके कर्म आरंभ नैष्कर्म्य मिलता नहीं । संन्यासकी क्रियासे ही न पाते पूर्ण सिद्धिको ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ८०

ऐसा बोलना जान व्यर्थका । हल करना उलझनका । त्यजनेसे न होता कर्मका । त्याग निश्चित ॥ ५२ ॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ कर्मातीत अवस्थामें कर्मत्याग असंभव— जब है प्रकृतिका अधिष्ठान । तब छोड़ना करना अज्ञान । चेष्टायें चलती हैं गुणाधीन । अपने आप ॥ ५३ ॥ विहित कर्म है जितना । ठान लिया यदि त्यागना । मिटेंगे क्या स्वभाव नाना । इंद्रियोंके ॥ ५४ ॥ सुनना छोड़ेंगे क्या कान । देखना छोड़ेंगे नयन । सूंघना भूलेगा क्या घ्राण । गंध जो ॥ ५५ ॥ अथवा प्राणापानकी गति । निर्विकल्प बनेगी क्या मति । तथा क्षुधा-तृषादिकी आर्ति । मिटेगी क्या ॥ ५६ ॥ मिटेगा क्या स्वप्नादि बोध । भूलेंगे क्या चलना पाद । तथा जन्म-मृत्युका नाद । मिटेगा क्या ॥ ५७ ॥ यह सब नहीं रुकता । इसीलिये कर्म रहता । कर्मका त्याग नहीं होता । देह धारिका ॥ ५८ ॥ कर्म होता है पराधीन । प्रकृति गुणसे निष्पन्न । चित्तका यह अभिमान । है व्यर्थका ॥ ५९ ॥ बैठा जब रथ पर । अति निश्चल होकर । किंतु चले पथ पर । परतंत्र हो ॥ ६० ॥ अथवा उड़ा हवासे । सूखा पत्ता ऊंचा जैसे । भ्रमता निश्चेष्टतासे । आकाशमें ॥ ६१ ॥ बिना कर्म कभी कोई न रहे क्षण-मात्र भी । प्रकृति गुणसे सारे बद्ध हो करते नित ॥ ५ ॥ ८१ कर्मयोग