ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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इस शरीरके निमित्त । लगा जो कर्म सतत । तन हो जीवित या मृत । न छूटेगा कभी ॥ २६ ॥ इस कर्म-त्यागका प्रकार । एक ही है यहां धनुर्धर । न बनो फलाशाका आहार । कर्ममें कभी ॥ २७ ॥ कर्म-फल करो ईश्वरार्पण । तत्प्रसादसे बोध उद्दीपन । तब हो रज्जु-ज्ञान विलोपन । व्याल-शंका ॥ २८ ॥ इस भांति आत्म-बोधसे पार्थ । अविद्या सह कर्म-नाश होता । तथा ऐसा त्याग जो कहलाता । कर्म-त्याग ॥ २९ ॥ तभी जो इस प्रकार त्याग करता । उसको मैं सही कर्म-त्यागी मानता । रोगमें मूर्छाको विश्रांति कहा जाता । वैसे हैं अन्य त्याग ॥ २३० ॥ ऐसे एक कर्ममें जो थकता । दूसरेमें जा विश्रांति खोजता । तथा झांपड पर जो है खाता । सोटोंकी मार ॥ ३१ ॥ रहने दे यह वाग्विस्तार । त्रिलोकमें त्यागी है धनुर्धर । फल-त्यागसे है निष्कृती पर । ले जाता कर्म ॥ ३२ ॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥ वैसे तो सुन यह धनंजय । त्रिविध कर्म-फल कहा गया । समर्थ वही है जान निश्चय । न छोडते फलाशा ॥ ३३ ॥ तीन प्रकारके कर्म-फल- जन्म देकरके आप दुहिता । "इदं न मम" कह माता पिता । छूट जाते दान लेके फंसता । दामाद आप ॥ ३४ ॥ बोकर जैसे विषका खेत । सुखसे लाभ लेते हैं पार्थ । किंतु खर्च कर होते मृत । उसको खाकर ॥ ३५ ॥ तेहरा फल कर्मोंका मधुर कटु मिश्रित । उससे मुक्त संन्यासी पाते हैं त्याग-हीन जो ॥ १२ ॥ ७३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
वैसे अकर्ता मान कर्म करता । कर्ता मान जो फलाशा न धरता उन दोनोंको बांध न सकता । केवल कर्म ॥ ३६ ॥ पकता पेड जो राह पर । उसके फलकी आशा कर । सदा कर्मका भी धनुर्धर । फल बांधता है ॥ ३७ ॥ किंतु करके फलाशा तजता । जगतके कार्यमें न घुसता । त्रिविध विश्व यह जो पूर्णता । कर्म फल है ॥ ३८ ॥ देव मानव और स्थावर । इसका नाम जगदंबर । ऐसे ही हैं ये तीन प्रकार । कर्म फलके ॥ ३९ ॥ एक है वही अनिष्ट । एक है जो केवल इष्ट । तथा एक है जो इष्टानिष्ट । त्रिविध ऐसे ॥ २४० ॥ किंतु बुद्धि बन विषयासक्त । स्वैराचारमें होकर अभ्यस्त । निषिद्ध कर्ममें होते प्रवृत्त । दुर्व्यवहारमें ॥ ४१ ॥ वहां है कृमिकीट लोष्ट । देह पाते हैं जो निकृष्ट । उसका नाम है अनिष्ट । कर्मका फल ॥ ४२ ॥ या स्वधर्मको मान देकर । अपने अधिकारानुसार । सुकृत करते धनुर्धर । वेदाज्ञासे ॥ ४३ ॥ देवोंके वे इंद्रादिक । देह पाते हैं अति नेक । कर्म-फल इष्टमें देख । उसकी प्रसिद्धी ॥ ४४ ॥ किंतु खटा मीठा मिलकर । होता है विशिष्ट रसांतर । स्वादमें दोनोंसे रुचिकर । होता भिन्न ही ॥ ४५ ॥ रेचक ही होके योग-वश । करता है स्तंभनका दोष । वैसे सत्यासत्य समस्त । जीतता असत्य ॥ ४६ ॥ सम-भागसे है शुभाशुभ । होके खड़ा अनुष्ठान भाग । उससे जो मनुष्यत्व-लाभ । मिश्र फल है ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३२
इस कर्म-फलसे बद्ध और मुक्तता— ऐसे इसके त्रिविध भागमें । कर्म-फल रचा जगतमें । फंसे हैं जो भोगकी आशामें । उससे वे हैं बद्ध ॥ ४८ ॥ जिव्हा-चापल्य जैसे बढ़ता । वैसे भोजन मीठा लगता । अंतमें जो फल निकलता । रोगसे मृत्यु ॥ ४९ ॥ चोर-मैत्री तब तक भली । जब न आती एकांत-स्थली । वैसे होती है वेश्या भी भली । न होता स्पर्श ॥ २५० ॥ जब तक करता कर्म शरीर । मिलता जाता सन्मान धनुर्धर । मृत्यु समयमें घिरते आकर । कर्मके फल ॥ ५१ ॥ समर्थ होता जो महाजन । द्वारपे बैठ ले जाता धन । वैसे ही कर्म-फल अर्जुन । भोगने पड़ते ॥ ५२ ॥ भुट्टेसे जैसे धान झड़ता । उसी धानसे भुट्टा लगता । फिर भुट्टेसे धान गिरता । उससे फिर भुट्टा ॥ ५३ ॥ वैसे जो भोगसे कर्म होता । उस कर्ममें भोग लगता । पैर पैरको जीतता जाता । चलनेमें जैसे ॥ ५४ ॥ नांव रुकती उतार देखकर । होता वह उसका उरला तीर । वैसे है कर्म-फलसे धनुर्धर । नहीं है मुक्ति ॥ ५५ ॥ साध्य-साधन प्रकार फिर । करता फल-भोग प्रसार । ऐसे ही उलझाता संसार । अत्यागीको ॥ ५६ ॥ चमेली पुष्पका जैसे खिलना । उसका नाम ही है सूख जाना । वैसे फलाशासे नहीं करना । किया है ऐसे ॥ ५७ ॥ बीजका धान्य ही जब खाया जाता । किसानीका काम ही है रुकता । वैसे फल-त्यागसे है मिटता । कर्मका फल ॥ ५८ ॥ तब सत्व-शुद्धिके सहायसे । गुरु-कृपामृतके तुषारोंसे । उतरता खिले हुए बोधसे । द्वैतदैन्य ॥ ५९ ॥ तब है जगदाभासके कारण । मिटता है त्रिविध फल स्फुरण । वैसे ही भोक्ता-भोग्य सहज मान । होता है अस्त ॥ २६० ॥ ७३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
संन्याससे मूल अविद्या रहती ही नहीं— सधता ज्ञान-प्रधान ऐसा । जिसका संन्यास है वीरेशा । फल-भोगके कष्टसे जैसा । होता है मुक्त ॥ ६१ ॥ तथा संन्यासमें है एक बात । आत्म-रूपमें दृष्टि होती रत । वहां कर्म दूसरा ऐसे पार्थ । दीखेगा कैसे ॥ ६२ ॥ ढह जाती है सब सारी दीवार । मिटते चित्र माटीमें मिलकर वैसे ही नहीं रहता है अंधार । उदय होते ही ॥ ६३ ॥ न रही रूपकी काया जब । कहांसे दीखेगी छाया तब । कहांसे दिखेगा प्रतिबिंब । दर्पण ही नहीं ॥ ६४ ॥ जहां नहीं निद्राको ही स्थान । आयेगा वहां कहांसे स्वप्न । फिर कैसे कहे कहो कौन । स्वप्न मिथ्या या सत्य ॥ ६५ ॥ उसी भांति संन्यासमें यहां । मूल अविद्या न रही जहां । उसका व्यापार रहा कहां । तथा करे कौन ॥ ६६ ॥ तभी इस संन्यासमें एक । कर्मकी बात कैसी है देख । किंतु अविद्या देहमें एक । रहती है जो ॥ ६७ ॥ कर्तृत्वके बल पर पार्थ । आत्मा होती शुभाशुभमें प्रवृत्त । तथा दृष्टि-भेदके स्थानपे स्थित । रहती है वह ॥ ६८ ॥ होता जैसे पूर्व पश्चिम । वैसे है आत्मा और कर्म । ऐसी भिन्नता है सुवर्म । जान तू यह ॥ ६९ ॥ अथवा नभ और बादल । तथा सूर्य और मृगजल । पृथ्वी और वायुमें निर्मल । होती है भिन्नता ॥ २७० ॥ ओढकर नदीका नीर । बैठता नदीमें पत्थर । उन दोनोंमें धनुर्धर । जानता तू भेद ॥ ७१ ॥ जलकुंभी होती जलके पास । किंतु जलसे भिन्न होती खास । कालिख रहती दीपके पास । किंतु होती क्या दीप ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३४
यदि चंद्रमें होता कलंक । किंतु चंद्रसे न होता एक । अलग दृष्टि और आंख । अतिशय वैसे ॥ ७३ ॥ जैसे है पथ और पथिक । नदीतल और है उदक । दर्पण और जैसे दर्शक । भिन्न है जितने ॥ ७४ ॥ उतना ही भिन्न है मान । आत्मा और कर्म अर्जुन । किंतु है अज्ञान कारण । दीखता एक ॥ ७५ ॥ सूर्यसे विकास उपजता । भ्रमरसे सुगंध भोगाता । किंतु जलमें स्वस्थ रहता । कमल जैसे ॥ ७६ ॥ बार बार कहता हूं सुन । आत्मामें कर्म-भासका कारण । भिन्न ही है पांच जो अर्जुन । कारण रूप ॥ ७७ ॥ पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥ कर्मके जो पंचकारण । जानता होगा तू अर्जुन । करते हैं सांख्यकथन । मुक्त कंठसे ॥ ७८ ॥ वेद-राजाकी राजधानीमें । सांख्यवेदांतके भुवनमें । घोष करते उच्च स्वरमें । गूंजा करके ॥ ७९ ॥ जगतमें है कर्म-सिद्धार्थ । पांच कारण जान ये पार्थ । उसमें फंसना अनुचित । आत्मराजको ॥ २८० ॥ कृष्णार्जुन गुरुशिष्य प्रेमका वर्णन— ऐसा यह शास्त्र-कथन । प्रसिद्ध है जान अर्जुन । मुझसे तू इसको सुन । चित्त देकर ॥ ८१ ॥ अन्योंके मुखसे सुनना । ऐसा कष्ट क्या है अर्जुन । चिद्रत्न मैं तेरे आधीन । रहते हुए ॥ ८२ ॥ जान तू मुझसे पार्थ प्राज्ञोंका कर्म-निर्णय । सीधे ही करते कर्म उसके पांच कारण ॥ १३ ॥ ७३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अजी ! सम्मुख है दर्पण । करते अपना रूप दर्शन । देखना क्यों दूसरोंके नयन । कह तू पार्थ ॥ ८३ ॥ भक्त जैसे जहां जब देखता । उसको वैसे वहां जो दीखता । ऐसा मैं जब सम्मुख रहता । तेरा खिलौना बन ॥ ८४ ॥ ऐसे भावनावेगसे जब । बोलते थे देख वहां तब । देहभान भूलकर सब । डुलता है अर्जुन ॥ ८५ ॥ चंद्र-किरणका जब भरमार । पडता चंद्रमणि-पहाडपर । पिघलके होता जैसे सरोवर । उसी भांति ॥ ८६ ॥ तब सुख तथा सुखानुभूति । इन भावोंकी तोडकर भित्ति । बन गया वह अर्जुनाकृति । सुख केवल ॥ ८७ ॥ श्रीकृष्ण होनेसे अति समर्थ । यथावत हुवा सहज स्थित । तब होने सहजस्थित पार्थ । करता प्रयास ॥ ८८ ॥ व्यक्तित्व जहां अर्जुनसा । गया प्रज्ञा सह डूबसा । आया ऐसा महा पूरसा । आनंदका तब ॥ ८९ ॥ कहता है देव अजी हे पार्थ । पूर्ण रूपसे हो सहज-स्वस्थ । सांस भर डुलता है पार्थ । अपना मस्तक ॥ २९० ॥ कहता तब जानता तू उदार । तेरे साथमें भिन्न शरीरधर । ऊब चुका तब एकत्वमें भर- । जाना चाहता था ॥ ९१ ॥ मेरे प्रेमसे तू ऐसा । पूर्ण करता लालसा । रोकती क्या जीव दशा । इस प्रकार ॥ ९२ ॥ श्रीकृष्ण हंस तब भला कहता । अबतक तू यह नहीं जानता । पगले ! चंद्र चंद्रिकामें भिन्नता । रहती क्या कभी ॥ ९३ ॥ तथा कहनेमें यह भाव । डर जाते हैं हम पांडव । मन भायेका क्रोध-भाव । बढाता है प्रेम ॥ ९४ ॥ यहां है जो परस्पर भिन्नता । तभी ऐसे जीवनकी शक्यता । रहने दे ऐसे ये बोल पार्था । इस विषयके ॥ ९५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३६
अब कैसा प्रसंग चला था । क्या बोल रहे थे हम पार्था । सब कर्मोंकी जहां भिन्नता । आत्मामें है ॥ ९६ ॥ तब कहता हरिसे अर्जुन । कहता तू सहज मेरा मन । प्रारंभ किया उचित श्रीकृष्ण । मेरी समस्याका ॥ ९७ ॥ कर्म-सिद्धिके पांच कारण— जो है सभी कर्मका बीज । कारण पंचक जो तुझ । 'करूंगा मैं तुझसे आज' । कहा था मैने ॥ ९८ ॥ तथाँ है जो कर्म कारणसे । संबंध नहीं है आत्मासे । कहा था अब तूने ऐसे । वह भी कहना ॥ ९९ ॥ तब विश्वेश्वर कहता । संतोष-चित्तसे हे पार्थ । हमसे जिद्द कर बैठता । ऐसा मिलता कौन ॥ ३०० ॥ करूंगा सरल निरूपण । कहता तब यह श्रीकृष्ण । किंतु चुकाना पडेगा ऋण । तुझे इस बातका ॥ १ ॥ तब अर्जुन कहता देव । भूल गया क्या पिछले भाव । इस बातमें रखता ठाव । मैं तू पनका ॥ २ ॥ कहता है तब श्रीकृष्ण । कहूंगा अब जो वचन । मनोयोग पूर्वक सुन । पांडुकुमार ॥ ३ ॥ यह सच है धनुर्धर । कर्म जिस पर है स्थिर । वे सब आत्मासे बाहर । कारण हैं पांच ॥ ४ ॥ इन पांचोंके ही कारण । कार्यारंभ होते हैं जान । इससे कर्ममें है जान । हेतु भी पांच ॥ ५ ॥ यहां है आत्म-तत्व उदासीन । वह ना हेतु या न उपादान । न बनता है आप संवहन । कार्य-सिद्धिका ॥ ६ ॥ शुभाशुभ अंशमें वहां जैसे । उत्पन्न हो जाते हैं कर्म ऐसे । रात और दिवस आकाशसे । बनते रहते ॥ ७ ॥ (36) ७३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तोय तेज तथा धूम । यहां वायुसे संगम । होनेसे है अभ्रागम । न जानता गमन ॥ ८ ॥ अनेक काष्ठोंसे नांव बनती । केवटसे वह चलाई जाती । वैसे ही वायुसे वह चलती । उदक है साक्षी ॥ ९ ॥ जैसे एक मृत्तिकाका पिंड । व्यय हो कर बनता भांड । जब घुमाता है एक दंड । भ्रमण चक्र ॥ ३१० ॥ यह कर्तृत्व कुलालका । वहां क्या रहा है पृथ्वीका । बिन आधारके किसीका । कह तू संबंध ॥ ११ ॥ सूर्य-उदयके साथ सदैव । सभी व्यापार चलते पांडव । इसमें सविताका क्या कर्तृत्व । रहता है कह तू ॥ १२ ॥ ऐसे पांच हेतुका मिलन । होते हैं यहां पांच कारण । उगती कर्म-लता अर्जुन । आत्मा स्वतंत्र ॥ १३ ॥ अब मैं वह सब भिन्न भिन्न । करता हूं पांचोंका विवेचन । तुला कर देख लेते हैं जान । मोतियां जैसे ॥ १४ ॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥ १ कर्म-सिद्धिका कारण, देह— ऐसे हैं ये सब लक्षण । सुन तू जो कर्म कारण । देह है पहला कारण । कहता हूं मैं ॥ १५ ॥ देहको कहते हैं अधिष्ठान । कहता सुन इसका कारण । स्व-भोग सह जीवका है स्थान । यह शरीर ॥ १६ ॥ बना कर इंद्रियोंके दस हाथ । उससे श्रमकर दिवस रात । प्रकृतिसे भोग पाता है पार्थ । इस स्थानपे ॥ १७ ॥ अधिष्ठान अहंकार तथा विविध साधन । भिन्न भिन्न क्रिया पार्थ करते दैव पांचवा ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३८
उसके भोगके कारण । शरीर बिन अन्य स्थान । नहीं होनेसे अधिष्ठान । कहते शरीरको ॥ १८ ॥ यह चौबीस ही तत्वोंका । कुटुंब गृह है बस्तीका । छूटना है बंध मोक्षका । उलझन यहीं ॥ १९ ॥ अथवा जो हैं अवस्थात्रय । अधिष्ठान जान धनंजय । इसीलिये जान यह काय । कहलाता अधिष्ठान ॥ ३२० ॥ २ कर्म-सिद्धिका कारण, कर्ता=अहंकार— तथा कर्ता यह दूसरा । कर्म कारण धनुर्धर । प्रतिबिंबसा है अपार । चैतन्यका जो ॥ २१ ॥ आकाशसे बरसता है नीर । उससे जो बनता सरोवर । तथा बिंबित होता तदाकार । आकाश जैसे ॥ २२ ॥ अथवा राजा निद्रासे भरकर । स्वयं आप विस्मृतिमें डूबकर । स्वप्नमें अनुभवता धनुर्धर । दरिद्री जैसे ॥ २३ ॥ वैसे अपनेको भूलकर । चैतन्य देहाकार लेकर । अनुभवता है देहाकार । आत्मस्वरूप ॥ २४ ॥ ऐसे ही विचारोंके कारण । प्रसिद्ध है जीव ऐसा जान । बंधकर वह सह तन । संपूर्ण रूपसे ॥ २५ ॥ प्रकृति करती है जो कर्म । कहता है मैंने किया सभ्रम । वहां यह कर्ता ऐसा नाम । लेता है जीव ॥ २६ ॥ ३ कर्म-सिद्धिका कारण, विविध साधन— होती है जो एकही वैसी । दीखती है चोरी हुईसी । पलकोंमेंसे दृष्टि जैसी । चवरोंके बाल ॥ २७ ॥ यह घरमें रहता एक । दीपका वह अवलोक । गवाक्षोंके-भेदसे अनेक । दीखता जैसे ॥ २८ ॥ वैसे बुद्धिका जानना । श्रोत्रादि भेदसे नाना । बाहर इंद्रियपन । होता है व्यक्त ॥ २९ ॥ ७३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
यह पृथग्विध कारण । यहां जो कर्मका कारण । तीसरा है जान अर्जुन । इंद्रियां जो ॥ ३३० ॥ ४ कर्म-सिद्धिका कारण, भिन्न भिन्न क्रिया— होता है जैसे एक ही नीर । पूर्व पश्चिममें बहकर । कहलाता है पांडुकुमार । नदी नद जैसे ॥ ३१ ॥ तथा जैसे एकही पुरुष । अनुकरणसे नव रस । होता जैसे नवविध भास । उसी प्रकार ॥ ३२ ॥ प्राण वायुकी अखंड क्रिया शक्ती । अन्यान्य स्थान पर जो बिखुरती । अन्यान्य नामसे पहचानी जाती । शतरूप लेकर ॥ ३३ ॥ जब वह वाणीमें आती । तब वाक्शक्ति कहलाती । जब हाथोंमें उतरती । बनती व्यापार ॥ ३४ ॥ तथा चरणोंमें आकर । वही गति कहलाकर । उतरती है अधोद्वार । होती क्षरण ॥ ३५ ॥ नाभिकंदसे जो हृदय । करता प्रणव उदय । कहलाती है धनंजय । वह प्राण ॥ ३६ ॥ फिर है ऊर्ध्वके अर्जुन । आवागमनके कारण । कहलाता वही उदान । उसी प्रकार ॥ ३७ ॥ • अधोरंध्रसे वह बहता । अपान नामसे जाना जाता । वही जब व्यापक हो जाता । कहलाता व्यान ॥ ३८ ॥ खाया हुवा अन्नका रस । शरीर भरता सरस । नहीं छोडता है विशेष । शरीर भाग ॥ ३९ ॥ सभी व्यापार जो ऐसे । होते हैं क्रिया कर्म ऐसे । कहते समान ऐसे । धनुर्धर ॥ ३४० ॥ उबासी छींक डकार । ऐसे होते जो व्यापार । नाग कूर्मादि कृकर । भिन्न नामसे ॥ ४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४०
एवं वायुकी यह चेष्टा । एकही होती है सुभट । व्यापार भेदसे पलटा । होता है जो ॥ ४२ ॥ भिन्न भिन्न कार्यास्तव । वायुशक्ति जो पांडव । भिन्न होती है सदैव । कारण चौथा ॥ ४३ ॥ ५ कर्म-सिद्धिका कारण, दैव— ऋतुओंमें शरद सुंदर । शरदमें भी है सुधाकर । उसमें है योग धनुर्धर । पूर्णिमाका ॥ ४४ ॥ या वसंतमें भला आराम । आराममें भी प्रिय-संगम । उसमें भी होता आगम । उपचारोंका ॥ ४५ ॥ नाना कमलमें धनुर्धर । विकसन होता है सुंदर । उसमें भी होता है उभार । परागका ॥ ४६ ॥ वाचाका सौंदर्य है कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व । रसिकत्वमें है परतत्व । स्पर्श जैसे ॥ ४७ ॥ सभी वृत्तियोंका वैभव । बुद्धिही एक है पांडव । बुद्धिकी शोभा नित्य नव । सामर्थ्य इंद्रियोंका ॥ ४८ ॥ इंद्रिय मंडलका वैभव । शृंगार एक ही है पांडव । वह है जो अधिष्ठात्री दैव- । अनुकूलता ॥ ४९ ॥ तभी चक्षु आदि जो दस इंद्रिय । उन पर अनुग्रह धनंजय । सूर्यादि देवताओंका समुदाय । रहता है सदा ॥ ३५० ॥ ऐसा जो देव-वृंद अर्जुन । कहा पांचवा कर्म कारण । जानना यहां ऐसा श्रीकृष्ण । कहता है जो ॥ ५१ ॥ ऐसी जो सब कर्म खान । उसकी उत्पत्तिका कारण । बुद्धिगम्य हो ऐसा अर्जुन । कहा है यहां ॥ ५२ ॥ अब जिन हेतुके कारण । बढ़ती है जो कर्मकी खान । उसका सभी हेतु अर्जुन । कहूंगा मैं पांच ॥ ५३ ॥ ७४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥ विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य होता है— आता जब जब वसंत । होता नव-पल्लवका हेत । नव-पल्लव पुष्प हेत । पुष्प देता है फल ॥ ५४ ॥ या वर्षाको लाते मेघ । मेघसे वृष्टि प्रसंग । वृष्टिसे मिलते भोग । सस्य-सुखके ॥ ५५ ॥ या सूर्य अरुणको प्रसवता । अरुणसे सूर्य उदय होता । सूर्यसे सब विश्व उजलता । दिवस रूप ॥ ५६ ॥ वैसे ही है हेतु जो मन । संकल्प-भावका अर्जुन । संकल्प है वाचाका जान । जलाता दीप ॥ ५७ ॥ फिर वह वाचाकी मशाल । दिखाती कर्म-मार्ग सकल । सो खोलता कर्ता टंकसाल । कर्तृत्वकी तब ॥ ५८ ॥ शरीरादि यहां समुदाय । शरीर हेतु है धनंजय । होता है जैसे लोहका कार्य । लोहसे ही ॥ ५९ ॥ अथवा तंतुओंका ताना जैसे । मिलकर तंतुओंके बानेसे । कहलाता जब कपडा ऐसे । केवल हैं तंतु ॥ ३६० ॥ वैसे ही है मानवके देहका । रचता हेतु कर्म-मनादिका । रत्नसे ही बनता है रत्नका । उपहार जैसे ॥ ६१ ॥ यहां जो शरीरादि कारण । हेतु कैसे होता यह ज्ञान । जानना चाहता तो अर्जुन । सुन तू अब ॥ ६२ ॥ कारण और हेतुके मिलनसे कर्म-निर्माण होता है— अथवा सूर्य प्रकाशके जैसा । हेतु कारण सूर्य ही है वैसा । या ईखका कांड है ईख जैसा । बढनेका कारण ॥ ६३ ॥ काया वाचा मनसे जो विश्वमें करता नर । धर्म या अधर्मका हो उसके पांच हेतु हैं ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४२
वाग्देवताका अनेक वर्णन । वाचा ही करती है ऐसे जान । अथवा वेद ही प्रतिष्ठापन । करते वेदोंका ॥ ६४ ॥ वैसे ही कर्मका शरीरादिक । कारण जानते हैं स्वाभाविक । किंतु यही हेतु नहीं है चूक । इस स्थानपे ॥ ६५ ॥ तथा देहादिक जो कारण । तथा देहादि हेतु मिलन । होनेसे सभी कर्म निर्माण । होते उसके ॥ ६६ ॥ सब जो वह शास्त्र सम्मत । मार्ग अनुसरता है पार्थ । तब न्यायसे है न्यायोचित । होता है हेतु ॥ ६७ ॥ जैसे वर्षा नीरका बडा बहाव । सहज शालि-खेतमें जाता पांडव । सोखकर होता है वह अतीव । लाभ दायक ॥ ६८ ॥ या निकला रोषसे अकस्मात । द्वारकाकी राहपे चला पार्थ । चलना उसका न होता पार्थ । थकने पर भी ॥ ६९ ॥ होनेसे हेतु कारण मिलन । होता जहां अंधा कर्म उत्पन्न । उसे मिले शास्त्रोचित नयन । होता है न्याय ॥ ३७० ॥ दूधमें आया बडा उफान । तथा वह गिर गया जान । उसे यज्ञ कहना अर्जुन । नहीं उचित ॥ ७१ ॥ वैसे शास्त्र-सम्मतिके बिन । किया हुवा नहीं अकारण । तब चुराया हुवा जो धन । दानमें गया क्या ॥ ७२ ॥ बावन वर्णपर कौन । मंत्र है कह तू अर्जुन । नहीं उच्चारता बावन । वर्णको कौन यहां ॥ ७३ ॥ किंतु मंत्रकी कुशलता । जब तक नहीं जानता । उच्चार फल नहीं पाता । उसी प्रकार ॥ ७४ ॥ कारण हेतु योगसे । होता जो अचानकसे । शास्त्रकी सो कसौटीसे । नहीं उतरता ॥ ७५ ॥ तबभी सब कर्म होता ही है । किंतु वह होना योग्य नहीं है । वह जो अन्याय ही अन्याय है । ऐसाही मानना ॥ ७६ ॥ ७४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥ आत्मा कभी कर्ता नहीं होता— एवं कर्मके हैं पांच कारण । वैसेही पांच हेतु हैं अर्जुन । उसमें कहां आत्माका दर्शन । होता है तुझको ॥ ७७ ॥ नहीं होता सूर्य जैसे रूप अर्जुन । चक्षुरूपसे कराता प्रकाशमान । वैसे ही आत्मा नहीं होता कर्म जान । कराता वह प्रकट ॥ ७८ ॥ दर्पणमें जो है जैसे देखता । दर्पण औ' प्रतिबिंब न होता । किंतु इनको है प्रकाश देता । देखकर जो ॥ ७९ ॥ अथवा अहोरात्र सविता । न होके करता पांडुसुता । वैसे आत्मा नहीं कर्म कर्ता । किंतु दिखाता है ॥ ३८० ॥ किंतु देहाहंकारके भ्रमसे । बुद्धिके देह ही मैं माननेसे । आत्म-विषयमें उसको जैसे । हुई मध्य रात्री ॥ ८१ ॥ जिसने चैतन्य ईश्वर ब्रह्म । किया हो देह ही सीमा परम । उसको आत्मा कर्ता ऐसा भ्रम । होता निश्चित ॥ ८२ ॥ किंतु आत्मा ही है कर्म-कर्ता । ऐसा भी निश्चय नहीं होता । शरीर ही मैं हूं कर्म-कर्ता । मानता सत्य ॥ ८३ ॥ आत्मा ही मैं कर्मातीत । सर्व कर्म साक्षीभूत । यह जो यथार्थ बात । न सुने कानसे ॥ ८४ ॥ इसीलिये अमाप आत्माको जहां । देहमें ही सीमित करता यहां । उलूक रातकोही दिवस जहां । मानता है वैसे ॥ ८५ ॥ जिसने आकाशका कहीं । सच्चा सूर्य देखा ही नहीं । वह गढेके बिंबकोही । मानके सूर्य ॥ ८६ ॥ वहां जो शुद्ध आत्माको कर्ता मान बसा हुवा । संस्कार हीन जो मूढ न जाने तत्त्व दुर्मति ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४४
डबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना । उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥ अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता । रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥ जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला । मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥ शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार । लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥ उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण । अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥ फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन । कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥ सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर । वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥ वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर । कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥ किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता । वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥ ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत । जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥ करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार । दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥ जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन । या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥ देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर । तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥ ७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
वैसे खोया हुवा आप यदि पाना । संत जनोंमें ही वह देख लेना । इसीलिये है सुनना और गाना । संतोंका चरित्र ॥ ४०० ॥ वैसे कर्ममें भी रहके कर्ममें । लिप्त नहीं होता सब विषयमें । रहती जैसे चर्म-चक्षु चाममें । अलिप्त दृष्टि ॥ १ ॥ इस प्रकार जो मुक्त है । उसका रूप दिखाना है । हाथ उठाके कहना है । उपपत्तिको ॥ २ ॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबद्ध्यते ॥ १७ । अविद्या-निद्रामें डूब कर । विश्व-स्वप्नका जो व्यवहार । भोगता था प्रबुद्ध धनुर्धर । अनादि जो ॥ ३ ॥ महावाक्यसे तब पुकारकर । गुरु अनुग्रहके सामर्थ्यपर । जगाते हाथ रख मस्तक पर । या थपकाते ॥ ४ ॥ आत्मानुभवीका अनहंकारी देह भाव— तभी विश्व-स्वप्नकी माया । नींद छोड़के धनंजया । सहसा जगा जो अद्वय । आनंदमें ही ॥ ५ ॥ मृगजलके तब पूर । दीखते थे जो निरंतर । खो जाते जैसे चंद्रकर । फैलते ही ॥ ६ ॥ या बालत्व जब बीतता । हौवा कभी नहीं डराता । या स्वयंपाक नहीं बनता । आग बुझने पर ॥ ७ ॥ अथवा जगने पर जैसे । सपना नहीं दीखता वैसे । न होती अहं ममता उसे । पांडुकुमार ॥ ८ ॥ देखनेके लिये मानो अंधार । घुसता सुरंगमें भी भास्कर । फिर भी न दीखता वहां पर । अंधार उसको ॥ ९ ॥ नहीं जिसे अहंभाव बुद्धिमें लिप्तता नहीं । मारके विश्वको सारे न मारता न बंधता ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४६
वैसे जो आत्मत्वसे भरित । देखता जो कुछ भी समस्त । द्रष्टा-दृश्यत्व परिवर्तित । होता अपनेमें ॥ ४१० ॥ लगती जिसको आग । अग्नि ही बनता अंग । दाह्य दाहक विभाग । रहता नहीं ॥ ११ ॥ वैसे ही जो कर्म है भिन्न । लाता आत्मापे कर्तापन । जाता है आभास-बंधन । तब जो रहता ॥ १२ ॥ इस आत्म-स्थितिका जो राव । जाने क्या फिर देहका ठाव । प्रलयांबुधि पूर पांडव । मानता क्या ओघ ॥ १३ ॥ वैसे ही संपूर्ण अहंता । शरीर कैसे लपेटता । सूर्य-प्रभा होगी क्या सीमित । सूर्य बिंबमें ॥ १४ ॥ मथकर निकाला जो नवनीत । फिर छासमें डाला तो पार्थ । रहता है जिस भांति अलिप्त । उसी प्रकार ॥ १५ ॥ जैसे जो अग्नि काष्ठमें रहता । जब वह काष्ठसे भिन्न होता । फिर क्या काष्ठ-पेटीमें रहता । सिकुड करके ॥ १६ ॥ या जो रात्रीके गर्भसे । निकला भास्कर जैसे । बात वह सुने कैसे । रातकी कभी ॥ १७ ॥ तथा जो ज्ञाता ज्ञेयपन । निगल बैठा है अर्जुन । उसे देहाहंताका भान । होगा कैसे ॥ १८ ॥ जहां कहींसे गगन । भर रहा है संपूर्ण । भर रहना लक्षण । सहज उसका ॥ १९ ॥ ऐसा वह जो करता । वह सबं जो स्वयं होता । फिर कौन उसे लोपता । कर्तापनसे ॥ ४२० ॥ देहाहंकार आत्म-बोधमें विलय होनेके बाद— न रहता आकाश बिन ठाव । उसी भांति सागरको प्रवाह । तथा ध्रुवका उठना पांडव । रहता कहां ॥ २१ ॥ ७४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
उसका देहाहंकारका भाव । बोधमें विलय हुवा पांडव । फिर भी जो शरीरका स्वभाव । होते हैं कर्म ॥ २२ ॥ चलकर रुकता यदि चंड मारुत । फिर भी वृक्षोंमें रहता कंप भारत । तथा संदूकमें होता कर्पूर समाप्त । किंतु रहती सुगंध ॥ २३ ॥ हो जाता है संगीतका कार्यक्रम । किंतु चित्तपे रहता परिणाम । बहाव बह जाता है किंतु नम । रहता है भूमिका ॥ २४ ॥ अस्त होने पर भी सूर्यका । रहती है संध्याकी भूमिका । तथा ज्योति दीप्ति सकौतुक । दीखती है ॥ २५ ॥ लक्ष-भेद होने पर । दौडता रहता तीर । जब तक धनुर्धर । रहती शक्ति ॥ २६ ॥ चक्र पर मटका बन जाता । कुम्हार उसको उठा भी लेता । किंतु चक्र जो फिरता रहता । पहली गतिसे ॥ २७ ॥ वैसे ही देहाभिमान मिट जाता । जिस स्वभावसे है देह बनता । वही है देहको चेष्टित करता । अपने आप ॥ २८ ॥ संकल्प बिन जैसे स्वप्न दीखता । बनमें न लगता वृक्ष उगता । अथवा गंधर्व-नगर बनता । बनाये बिना ही ॥ २९ ॥ वैसे आत्माके उद्यम बिन । देहादि जो है पांच कारण । अपने आपही है अर्जुन । करते हैं कर्म ॥ ४३० ॥ विदेहावस्थामें किये गये मुक्त-कर्म- रहते हैं जो प्राचीन संस्कार । पांच कारण हेतु धनुर्धर । कराते कर्म अनेक प्रकार । शरीरादिसे ॥ ३१ ॥ उन कर्ममेंसे फिर । होता है विश्व-संहार । या नव-विश्व सुंदर । होता सृजन ॥ ३२ ॥ किंतु कुमुद जैसे सूखता । या कमल कैसे विकसता । यह दोनों रवि न देखता । उसी प्रकार ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७४८
या वज्र प्रहार कर गगन । तुकडे करे भूतल अर्जुन । या मेघ-वर्षासे नंदनवन । बनाये यह भूमि ॥ ३४ ॥ किंतु इन दोनोंको जैसे । न जानता आकाश वैसे । देहमें रहती है वैसे । विदेह दृष्टि ॥ ३५ ॥ देहादिमें चेष्टा न करता । या विश्व बनता या टूटता । यह भी वह नहीं देखता । जैसे जगता स्वप्न ॥ ३६ ॥ किंतु जो चर्म-चक्षु देखते । तथा देह-भावसे है देखते । वे कर्म करता ऐसे कहते । तथा मानते ऐसे ॥ ३७ ॥ या घाससे बिजूखा बनाते । किसान खेती पर रखते । उसे सस्य-रक्षक जानते । पंछी सियार ॥ ३८ ॥ पागल पहना हुवा या नंगा । जैसे दूसरा ही कोई देखेगा । युद्धमें वीरके घाव गिनेगा । दूसरा कोई ॥ ३९ ॥ अथवा महासतीके भोग । देखता रहता सदा जग । किंतु आगमें जलना अंग । न देखता कोई ॥ ४० ॥ अजी ! स्वस्वरूपमें जो जागृत । दृश्य सह द्रष्टा हुवा है अस्त । वह जाने क्या इंद्रियोंकी बात । क्या करते वह ॥ ४१ ॥ बडे कल्लोलमें जब छोटा कल्लोल । समेटते तब किनारेके सकल । मनमें मानते यदि गया निगल । बडा छोटेको ॥ ४२ ॥ किंतु पानीकी दृष्टिसे देख वहां । कौन निगलेगा किसको औ' कहां । वैसे पूर्णको अन्य नहीं है जहां । वह मारेगा ॥ ४३ ॥ जैसे सुवर्णकी ही दुर्गा । तथा सुवर्णका ही खड्ग । उससे जो है नाश होगा । सुवर्ण महिष ॥ ४४ ॥ पूजारीकी दृष्टिसे व्यवहार । यह सब सही है धनुर्धर । किंतु खड्ग दुर्गा महिषासुर । तीनो हैं सुवर्ण ॥ ४५ ॥ जैसे चित्रका पानी हुताश । दृष्टि मात्रका यह आभास । चित्रमें आग या आर्द्र अंश । नहीं दोनों ही ॥ ४६ ॥ ७४९ सर्वगीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
मुक्तात्माका शरीर वैसा । चलता है संस्कारवश । देखके लोक भ्रमवश । कहते हैं कर्ता ॥ ४७ ॥ तथा उसके करनेसे पार्थ । होता यदि तीनों लोकका घात । किंतु उसने किया ऐसी बात । कहना नहीं ॥ ४८ ॥ ज्ञानीकी बुद्धि द्वंद्वातीत होती है— न देख कर सूर्यने कभी अंधार । नाश किया कहना कैसे धनुर्धर । जब ज्ञानियोंको नहीं कुछ दूसरा । कहेगा क्या ॥ ४९ ॥ इसीलिये ज्ञानीकी जो बुद्धि । न जाने पाप पुण्य अशुद्धि । मिलकर जैसे गंगा नदी । न रहता दोष ॥ ४५० ॥ आगका आगसे स्पर्श होकर । कौन जलेगा कहो धनुर्धर । अपने आपको है हथियार । चुभेगा क्या ॥ ५१ ॥ वैसे जो अपनेसे कुछ भिन्न । न मानता कर्म मात्र अर्जुन । नहीं होगी उसकी बुद्धि जान । लिप्त कभी किसीसे ॥ ५२ ॥ इसीलिये कार्य कर्ता क्रिया । अपना रूप जिसका भया । नहीं देहादिक धनंजया । न रहा कर्म-बंध ॥ ५३ ॥ स्वकर्तृत्वसे जीव कारीगर । पांच ही खाने सब खोद कर । दशेंद्रियोंसे करता तैयार । कर्म-मात्र ॥ ५४ ॥ वहां विधि तथा निषेध । साधके आकार द्विविध । कर्म-रचनामें विविध । न खोता क्षण भी ॥ ५५ ॥ इतना बडा यह कार्य । न होता आत्माका सहाय । प्रारंभमें भी धनंजय । न छूता वह ॥ ५६ ॥ केवल साक्षीभूत चिद्रूप । कर्म-प्रवृत्तिका जो संकल्प । उठता उसे प्रेरणा आप । नहीं देता ॥ ५७ ॥ कर्म-प्रवृत्तिका जो भार । न होता वह धनुर्धर । उस प्रवृत्तिका जो भार । उठाते अन्य ॥ ५८ ॥ तभी आत्माका जो केवल । रूप ही हुवा है निखिल । उसको नहीं बंदिशाल । कर्मकी कमी ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५०