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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

मुक्तात्माका शरीर वैसा । चलता है संस्कारवश । देखके लोक भ्रमवश । कहते हैं कर्ता ॥ ४७ ॥ तथा उसके करनेसे पार्थ । होता यदि तीनों लोकका घात । किंतु उसने किया ऐसी बात । कहना नहीं ॥ ४८ ॥ ज्ञानीकी बुद्धि द्वंद्वातीत होती है— न देख कर सूर्यने कभी अंधार । नाश किया कहना कैसे धनुर्धर । जब ज्ञानियोंको नहीं कुछ दूसरा । कहेगा क्या ॥ ४९ ॥ इसीलिये ज्ञानीकी जो बुद्धि । न जाने पाप पुण्य अशुद्धि । मिलकर जैसे गंगा नदी । न रहता दोष ॥ ४५० ॥ आगका आगसे स्पर्श होकर । कौन जलेगा कहो धनुर्धर । अपने आपको है हथियार । चुभेगा क्या ॥ ५१ ॥ वैसे जो अपनेसे कुछ भिन्न । न मानता कर्म मात्र अर्जुन । नहीं होगी उसकी बुद्धि जान । लिप्त कभी किसीसे ॥ ५२ ॥ इसीलिये कार्य कर्ता क्रिया । अपना रूप जिसका भया । नहीं देहादिक धनंजया । न रहा कर्म-बंध ॥ ५३ ॥ स्वकर्तृत्वसे जीव कारीगर । पांच ही खाने सब खोद कर । दशेंद्रियोंसे करता तैयार । कर्म-मात्र ॥ ५४ ॥ वहां विधि तथा निषेध । साधके आकार द्विविध । कर्म-रचनामें विविध । न खोता क्षण भी ॥ ५५ ॥ इतना बडा यह कार्य । न होता आत्माका सहाय । प्रारंभमें भी धनंजय । न छूता वह ॥ ५६ ॥ केवल साक्षीभूत चिद्रूप । कर्म-प्रवृत्तिका जो संकल्प । उठता उसे प्रेरणा आप । नहीं देता ॥ ५७ ॥ कर्म-प्रवृत्तिका जो भार । न होता वह धनुर्धर । उस प्रवृत्तिका जो भार । उठाते अन्य ॥ ५८ ॥ तभी आत्माका जो केवल । रूप ही हुवा है निखिल । उसको नहीं बंदिशाल । कर्मकी कमी ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५०

किंतु जहां अज्ञानके पट पर । अन्यथा ज्ञानका चित्र उठाकर । दिखानेमें प्रसिद्ध धनुर्धर । त्रिपुटी जो अन्य ॥ ४६० ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन— जो है ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । जगके ये बीज त्रय । कर्मकी ये निःसंशय । प्रवृत्ति जो ॥ ६१ ॥ अब जो यह है तीन । विषय हैं भिन्न भिन्न । उनका करें वर्णन । स्पष्ट रूपसे ॥ ६२ ॥ जैसे जीव सूर्य-बिंबका । रश्मिजाल जो श्रोत्रादिका । खिलाते विषय पद्मका । मुकुल-वृंद ॥ ६३ ॥ जीव नृपका घोड़ा खुला हुवा । इंद्रियोंका समूह लिया हुवा । विषय देश लूटता पांडवा । सुखदुःखादिक ॥ ६४ ॥ इन इंद्रियोंसे कराता व्यापार । सुखदुःखानुभव देता लाकर । सुषुप्ति कालमें जो लीन होकर । रहता है ज्ञान ॥ ६५ ॥ उस जीवको कहते ज्ञाता । इसको मैं अब जो कहता । पहले छंदमें जो कहा था । वह है ज्ञान ॥ ६६ ॥ अविद्याके उदरमें । उपजते समयमें । कर देता जो आपमें । तीन भाग ॥ ६७ ॥ फिर अपनी दौड़के सम्मुख । बांध डालते ज्ञेय विषयक । पीछेका भाग जो है ज्ञातृत्वका । उठा देता है ॥ ६८ ॥ ज्ञाता ज्ञेयके मध्यमें फिर । ज्ञानके रहनेका प्रकार । जिससे दोनोंका व्यवहार । चलता रहता है ॥ ६९ ॥ ज्ञाता ज्ञेय तथा कर्म तिहरा कर्म-बीज है । क्रिया कारण कर्तृत्व तीन कर्मांग है उसे ॥ १८ ॥ ७५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

आते ही ज्ञेयका सीमा-स्थान । जिसकी दौड सकती जान । तभी सभी वस्तुको अर्जुन । देता है नाम ॥ ४७० ॥ कहाता यह सामान्य ज्ञान । इसमें अन्यथा नहीं जान । सुन तू ज्ञेयका अब लक्षण । मुझसे अब ॥ ७१ ॥ अजी ! शब्द स्पर्श । रूप गंध रस । ये पांच आभास । ज्ञेयके हैं ॥ ७२ ॥ एक ही अमृत फल जैसे । इंद्रियोंको भिन्न रूपसे । रस वर्ण गंध स्पर्शसे । मिलता है ॥ ७३ ॥ ऐसे ज्ञेय है एकसर । किंतु ज्ञान इंद्रिय द्वारा । लेता तब होते प्रकार । यहां पांच ॥ ७४ ॥ प्रवाहका जैसे समुद्रमें जाना । रुकना पड़ावके आनेपे चलना । भुट्टा आने पर बढ़ना रुकना । सस्यका पार्थ ॥ ७५ ॥ इंद्रियोंसे ऐसे जो दौडता । वह ज्ञान जहां है रुकता । उसीको है ज्ञेय कहा जाता । धनुर्धर यहां ॥ ७६ ॥ ऐसे हैं ये ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । तीन रूप हुए धनंजय । यह सब है त्रिविध क्रिया । प्रवृत्तिकी जान ॥ ७७ ॥ जो है शब्दादि विषय । यह पंचविध ज्ञेय । वही है प्रिय अप्रिय । एक प्रकारसे ॥ ७८ ॥ ज्ञाताको जिस समय ज्ञान । करता है अल्पसा दर्शन । स्वीकार या तजनेमें अर्जुन । होता प्रवृत्त ॥ ७९ ॥ किंतु जैसे मीन देख बक । तथा निदान देखके रंक । अथवा स्त्रीको देख कामुक । होता प्रवृत्त ॥ ४८० ॥ अथवा उतार पर नीर । परिमल पर है भ्रमर । या गायके पास धनुर्धर । दौडता बछडा ॥ ८१ ॥ स्वर्गकी उर्वशीका विषय । सुनकर जैसे धनंजय । नभमें सीढी लगाता मनुष्य । यज्ञ यागकी ॥ ८२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५२

आकाशमें उड़ता कबूतर । कबूतरीको वहां देखकर । छोड़ता अपना सारा शरीर । उसपे जैसे ॥ ८३ ॥ अथवा सुनकर मेघ गर्जन । मयूर उड़ना चाहता गगन । वैसे ही ज्ञेय देखकर अर्जुन । दौड़ता ज्ञाता ॥ ८४ ॥ इसीलिये ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता । विविध हैं जो पांडुसुता । होते हैं यहां कर्मको समस्त । प्रवृत्त सदैव ॥ ८५ ॥ होता है यदि ज्ञेय प्रिय । ज्ञाताको वह धनंजय । भोगमें न खोता समय । क्षणका भी वह ॥ ८६ ॥ तथा होता यदि अप्रिय । तजता सबका समय । आया जैसे जग-प्रलय । मानता वह ॥ ८७ ॥ व्याल है अथवा हार । इस संशयमें नर । हर्षसे डालता कर । औ' कांप उठता ॥ ८८ ॥ ऐसे है ज्ञेयका प्रियाप्रिय । देख होता ज्ञाता धनंजय । स्वीकार या तजते समय । होता है प्रवृत्त ॥ ८९ ॥ अनुरागी जो प्रतिमल्लका । सेनापति संपूर्ण सैन्यका । आता है त्याग कर रथका । भूमि पर जैसे ॥ ४९० ॥ वैसे ज्ञातापनसे जो होता । वह कर्तापनमें है आता । नितही जो अनायास खाता । बैठता रसोईमें ॥ ९१ ॥ या भ्रमका ऐसे बाग लगाता । स्वर्णकारही कसौटी बनता । या भगवंत ही है राज बनता । घड़ने मंदिर ॥ ९२ ॥ ज्ञेयकी लालसा धर ऐसे । ज्ञाता कराता है इंद्रियोंसे । व्यवहार सभी प्रकारसे । होकर कर्ता ॥ ९३ ॥ तथा स्वयं आप होकर कर्ता । ज्ञानमें लाता जब सधनता । वहां ज्ञेयही होता स्वभावता । कार्य धनंजय ॥ ९४ ॥ ज्ञानकी ऐसी निजगति । पलटती जो इस भांति । रात्रिमें जैसे नेत्र-कांति । पलटती है ॥ ९५ ॥ अथवा होता जब वैष उदास । उतरता है श्रीमंतका विलास । पूर्णिमाके नंतर जैसे चंद्रांश । उतरता आता ॥ ९६ ॥ (87) ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

वैसे इस चेष्टाके कारण । ज्ञाताको घिरता कर्तापन । वहांके जो उसके लक्षण । सुन तू अब ॥ ९७ ॥ अंतःकरणका विवेचन— यहां बुद्धि और मन । चित्त अहंकार जान । ये हैं चतुर्विध चिन्ह । अंतःकरणके ॥ ९८ ॥ बाहर त्वचा और श्रवण । नयन रसना और घ्राण । ये हैं जो पंच-विध अर्जुन । ज्ञानकी इंद्रिया ॥ ९९ ॥ तब जो कर्ता जीव अर्जुन । ले अंतःकरणके साधन । करके कर्मका विचारण । यदि वह सुख हो ॥ ५०० ॥ जगा करके तब बाह्य । चक्षुरादि दस इंद्रिय । कर्ममें वह धनंजय । लगता त्वरित ॥ १ ॥ फिर वह इंद्रिय कवृंब । लगा देता है कर्ममें सब । जब तक कर्म-फल लाभ । हाथ न आता ॥ २ ॥ या किसी कर्तव्यमें सुख । फलेगा वह नहीं देख । कर देता है पराङ्मुख । इंद्रियोंको वह ॥ ३ ॥ जब तक लगान नहीं मिलता । राजा किसानको काममें जुताता । वैसे दुखका नाम भी न मिटता । जोतता इंद्रियोंको ॥ ४ ॥ कर्ता कारण और कर्म— ऐसे त्याग और स्वीकार । इंद्रियोंकी धुराको धर । करता उसे धनुर्धर । कहते हैं कर्ता ॥ ५ ॥ तथा कर्ताके सभी काम । करते जो स-परिश्रम । उन इंद्रियोंको हम । कहते हैं कारण ॥ ६ ॥ इन्ही कारणों पर जो कर्ता । सभी क्रियाओंको उभारता । उन क्रियाओंसे जो घिरता । वह है कर्म ॥ ७ ॥ सुनारकी बुद्धिसे जैसे आभूषण । घिरते चंद्रको जैसे चंद्रकिरण । तथा विलासतासे लता वृक्षगण । घेरते जैसे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५४

या नाना प्रभा जैसे प्रकाश । या मधुरतासे इक्षु-रस । या आकाश जैसे अवकाश । घिरा रहता है ॥ ९ ॥ वैसे कर्ताकी सभी क्रिया । व्याप लेती है धनंजय । उसको कर्म नाम दिया । अन्यको नहीं ॥ ५१० ॥ ऐसे कर्ता कर्म कारण । इन तीनोंके जो लक्षण । कहे हैं तुझसे अर्जुन । चातुर्यनिधि ॥ ११ ॥ यहां ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय । ये हैं कर्मके प्रवृत्तित्रय । वैसे ही कर्ता कारण कार्य । कर्म संचय यह ॥ १२ ॥ अग्निमें रखा जैसे धूम । तथा बीजमें जैसे द्रुम । वैसे मनसे जुडा काम । सदैवही ॥ १३ ॥ वैसे कर्म क्रिया कारण । कर्मका रहा है जीवन । जैसे सुवर्ण ही जीवन । स्वर्णमात्रका ॥ १४ ॥ इसीलिये यह कार्य मैं कर्ता । ऐसे भाव यहां है पांडुसुता । वहां भी आत्मा दूरही रहता । सभी क्रियाओंसे ॥ १५ ॥ इसीलिये जान तू अर्जुन । आत्मा रहता कर्मसे भिन्न । जाने दे अब यह कथन । सुनेगा कितना तू ॥ १६ ॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥ ज्ञान कर्म कर्ता भी त्रिगुणसे घिरे हैं— किंतु कहा जो ज्ञान । कर्म कर्ता ये तीन । इनमें गुण तीन । भिन्न हैं जो ॥ १७ ॥ इसलिये ज्ञान कर्म कर्ता । इसी पर न भूलना पार्था । एक है जो छुटकारा देता । और दो बंधन ॥ १८ ॥ ज्ञान औ' कर्म कर्तामें तीन भेद त्रिगुणसे । रचे हैं सुन तू कैसे गुण तत्त्वज्ञने कहे ॥ १९ ॥ ७५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वह सात्विक तुझसे ज्ञात । इसलिये त्रिगुणकी बात । सांख्य शास्त्रमें जो है कथित । कहता हूं तुझे ॥ १९ ॥ वह विचार क्षीर समुद्र । स्वबोध कुमुदिनीका चंद्र । ज्ञान-जागृतोंका जो नरेंद्र । शास्त्रोंका है ॥ ५२० ॥ अथवा प्रकृति पुरुष ये दोन । घुल गये जैसे रात और दिन । त्रिभुवनमें उसे दिखाता कर भिन्न । मार्तंड जैसे ॥ २१ ॥ जहां मोहरात्री है अपार । चोवीस तत्त्वोंसे गिनकर । निरास करके धनुर्धर । रहे सुखसे ॥ २२ ॥ अर्जुन ! यह सांख्यशास्त्र । पढते हैं जिसके स्तोत्र । वह गुण भेद चरित्र । है इस भांति ॥ २३ ॥ अपने ही गुण भेदसे । त्रिविधपनकी मुद्रासे । विश्वमें जो दृश्य है उसे । किया मुद्रित ॥ २४ ॥ सत्व रज तम हैं ऐसे । तीनोंकी महिमा भी ऐसे । विविध जो आदि ब्रह्मासे । अंतमें है कृमितक ॥ २५ ॥ किंतु है विश्वके सभी समुदाय । जिसके भेदसे भेदते समय । उस ज्ञानका कैसे हुवा उदय । पहले उसे कहता ॥ २६ ॥ दृष्टिको जब शुद्ध किया जाता । तब सभी है शुद्ध ही दीखता । वैसे ही जब ज्ञान शुद्ध होता । सब है शुद्ध ॥ २७ ॥ इसीलिये वह सात्विक ज्ञान । कहता हूं उसको अब सुन । ऐसे हैं कैवल्य गुण निधान । श्रीकृष्ण कहता ॥ २८ ॥ सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥ अब कहता मैं तुझसे अर्जुन । शुद्ध जो वास्तविक सात्विक ज्ञान । उदयसे नाश करता है जान । ज्ञेय सह ज्ञानको ॥ २९ ॥ जो देखे भूत मात्रोंमें भाव एक सनातन । अभिन्न भेदमें देख जान जो ज्ञान सात्विक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ७५६

सात्त्विक ज्ञानका विवेचन— न देखता जैसे सूर्य अंधार । सरिता नहीं जानती सागर । आत्म-छाया न आती धनुर्धर । आलिंगनमें कभी ॥ ५३० ॥ इस भांति है जो ज्ञान । शिवादि गणावसान । इसे भूत व्यक्ति भिन्न । नहीं दीखता ॥ ३१ ॥ हाथसे चित्र देखनेसे । या नून पानीमें धोनेसे । या स्वप्न जैसे जगनेसे । नहीं दीखता ॥ ३२ ॥ इस प्रकार है जिस ज्ञानसे । ज्ञातव्य जाननेके प्रयाससे । ज्ञाता जानना या जानता ऐसे । नहीं रहता कुछ ॥ ३३ ॥ जैसे भूषण गलाके स्वर्ण । नहीं निकालते बुद्धिमान । तथा तरंग छान अर्जुन । नहीं लेते नीर ॥ ३४ ॥ जैसे ज्ञानके हाथमें पार्था । नहीं लगती है दृश्य-कथा । वह ज्ञान जान तू सर्वथा । सात्विक ज्ञान ॥ ३५ ॥ सहज देखनेसे जैसे दर्पण । आप देता प्रतिबिंब हो दर्शन । वैसे ज्ञेय दूर हो ज्ञाता अर्जुन । देता अनुभव ॥ ३६ ॥ ऐसा है जो सात्त्विक ज्ञान । मोक्ष-लक्ष्मीका है सदन । अब तू राजसका सुन । लक्षण पार्थ ॥ ३७ ॥ पृथक्त्वेन' तु तज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ राजस ज्ञानका विवेचन— तमी यह जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्रसे हीन । श्रुतिने उसे मानके नग्न । किया अनादर ॥ ३८ ॥ भूतोंकी विचित्रताके कारण । स्वयं आप होकर छिन्न भिन्न । उस भेदसे ज्ञानीको अर्जुन । किया भ्रमिष्ट ॥ ३९ ॥

पोसके भेद बुद्धीको देखता भूतमात्रमें । विभिन्न भाव जो ज्ञान वह राजस जान तू ॥ २१ ॥ ७५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

जैसे है सच्चे रूप पर । लगाके विस्मयका द्वार । फिर वह स्वप्नका भार । होता निद्रामें ॥ ५४० ॥ वैसे स्व-ज्ञान सीमाके बाहर । असार संसार पंजर पर । तीन अवस्थाओंके धनुर्धर । दिखाता खेल ॥ ४१ ॥ अलंकार रूपमें ढका स्वर्ण । बालक नहीं समझता स्वर्ण । नाम-रूपसे दूर गया मान । अद्वैत जिससे ॥ ४२ ॥ भांडोंके रूपमें आकर । मृत्तिका गयी छिपकर । अथवा दीप बनकर । अग्नि हुवा दुर्बोध ॥ ४३ ॥ अथवा वस्त्रके रूपमें जैसे । मूर्खको तंतु खो जाते वैसे । अथवा चित्रका रूप लेनेसे । खो जाता वस्त्र ॥ ४४ ॥ उसी प्रकार है जो ज्ञान । जानता भूतमात्र भिन्न । तथा ऐसा बोध कल्पना । भूलही गया ॥ ४५ ॥ ईंधनसे भेदा गया अनल । तथा फूलोंसे मानो परिमल । अथवा जलभेदमें सकल । भिन्न हुवा चंद्र ॥ ४६ ॥ तथा वस्तुके नाना प्रकार । देखके छोटे बडे आकार । अनेकत्व देखता अंतर । राजस ज्ञान ॥ ४७ ॥ कहता अब तमका लक्षण । कराता हूं उसकी पहचान । तम जैसे चांडालका स्थान । दिखा रखता ॥ ४८ ॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ तामसिक ज्ञानका विवेचन— तब है जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्र हीन । श्रुति पराङ्मुख है नग्न । इसी लिये उसे ॥ ४९ ॥ देहको मान सर्वस्व व्यर्थ ही उलझा रहा । भावार्थ हीन जो क्षुद्र ज्ञान है जान तामस ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७५८

अन्य शास्त्र जो श्रुत्यागम रत । तामस ज्ञानको मानके निंदित । भगा दिया है पर्वत पर पार्थ । म्लेंछ - धर्मके ॥ ५५० ॥ अजी ! जो ज्ञान है ऐसा । गुण ग्रहण तामस । पागल होकर जैसा । भटकता है ॥ ५१ ॥ नात - गोतकी बाधा न जानता । किसीको निषिद्ध नहीं मानता । मानो खंडहरमें बसा कुत्ता । रहता जैसे ॥ ५२ ॥ उसके मुखमें जो नहीं आता । अथवा खानेसे मुख जलता । ऐसे वस्तुमात्र वह तजता । खाता है सब और ॥ ५३ ॥ सोना चुराते हुए चूहा । भला बुरा न कहता पांडव । न कहता मांसाहारमें जीव । काला या गोरा ॥ ५४ ॥ या जलती जब आग वनमें । भला बुरा न सोचती मनमें । न सोचे माखी जैसे बैठनेमें । मरा या जिया है ॥ ५५ ॥ परोसा हुवा है या वमन । अथवा ताजा या बासी अन्न । जैसे यह भी कागका मन । नहीं जानता वैसे ॥ ५६ ॥ निषिद्धको है तजना । विधिको सदा पालना । इस विषयका ज्ञान । न रहता उसे ॥ ५७ ॥ आंखोंके सामने जो जो आता । वह भोग्य हेतु ही मानता । जो कुछ भी द्रव्य है मिलता । देता शिश्न देवको ॥ ५८ ॥ न तीर्थातीर्थका कुछ ज्ञान । पानीकी न कोई पहचान । प्यासका मुख इसके बिन । न जानता कुछ ॥ ५९ ॥ वैसे ही वह खाद्याखाद्य । न जानता निंद्य - अनिंद्य । जीभको भाता वही योग्य । वह मानता है ॥ ५६० ॥ मानता स्त्री-जात सकल । भोग्य वस्तु ही है केवल । इस विषयमें केवल । यही बोध ॥ ६१ ॥ स्वार्थमें जो जब काम आता । वही उसका आप बनता । अन्य संबंध नहीं जानता । वह कभी कोई ॥ ६२ ॥ सभी होता है मृत्युका अन्न । तथा होता आगका ईंधन । वैसे ही होता विश्वका धन । तामस ज्ञानीको ॥ ६३ ॥ ७५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वैसे ही विश्व सकल । विषय जाना केवल । इसका एक ही फल । देह-पूजन ॥ ६४ ॥ आकाशसे गिरा हुआ नीर । समुद्रही उसका आधार । वैसे है सभी काज उदर- । पूर्तिके लिये ॥ ६५ ॥ इसे छोड स्वर्ग नर्ककी बात । तथा क्या विहित या अविहित । इस विषयमें है काली रात । जिसको सदैव ॥ ६६ ॥ जिसे देह-खंडका नाम आत्मा । ईश्वर है पाषाणकी प्रतिमा । न उसे इसके परेकी प्रमा । छूती भी कभी ॥ ६७ ॥ इसलिये जब शरीर गिरता । कर्म सह आत्मा भी है मिटता । तब भोगनेके लिये रहता । किस रूपसे कौन ॥ ६८ ॥ यदि कोई ईश्वर है कहता । वह कर्मका फल भी है देता । तब वह ईश्वरको खा जाता । बेच करके ॥ ६९ ॥ गावोंके जो ये देवालयेश्वर । सच्चे नियामक तो धनुर्धर । तब देशके ये बडे डोंगर । चुप क्यों रहते हैं ॥ ५७० ॥ यदि वह ईश्वरको मानता । इस भांति पाषाण ही मानता । आत्माको वह केवल जानता । शरीर मात्र ॥ ७१ ॥ अन्य जो पाप-पुण्यादिक । मानता भ्रम-मात्र एक । मिले सो भोगनेमें सुख । मानता अम्रिसा ॥ ७२ ॥ चर्म-चक्षु जो कुछ दिखाता । इंद्रियां दिखाती मधुरता । उसीको सब कुछ मानता । सत्य अनुभव ॥ ७३ ॥ अथवा जहां ऐसी प्रथा । बढती देखता तू पार्था । बढ़ती गगनमें वृथा । धूम-लता जैसे ॥ ७४ ॥ गीला अथवा सूखा हुआ । व्यर्थ ही जाता है पांडवा । बढ़कर टूटता हुआ । गजदंड जैसा ॥ ७५ ॥ जैसे ईखका बुट्टा होता । या जैसे हिजड़ा रहता । या जैसे वन है लगता । सेमलका जो ॥ ७६ ॥ अथवा बालकका मन । या चोरके घरका धन । अथवा जैसे गल-स्तन । बकरेके जैसे ॥ ७७ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६०

ऐसे जो अर्थ हीन । तथा स्वैर अर्जुन । उसे तामस ज्ञान । कहता हूं मैं ॥ ७८ ॥ ऐसे तामस ज्ञानको भी ज्ञान । कहते इसका भाव अर्जुन । कहते हैं जन्मांधके नयन । बडे विशाल जैसे ॥ ७९ ॥ अथवा बहरेके खडे कान । या अपेयको कहते हैं पान । वैसे कुल नाम उसका ज्ञान । इतना ही ॥ ५८० ॥ जाने दे कितना बोलना । ऐसी बातको कभी ज्ञान । न कहना उसे जानना । तामस मात्र ॥ ८१ ॥ गुणमें कहे ऐसे तीन । भेद कर यथा लक्षण । ऐसा श्रोता श्रेष्ठ अर्जुन । कहां है तुझसे ॥ ८२ ॥ ऐसे तीन प्रकार । ज्ञानके जो धनुर्धर । दीप्तिमें होगी गोचर । कर्ताकी क्रियाकी ॥ ८३ ॥ जैसे है बहता हुवा नीर । लेके जाता पात्रका आधार । उसी प्रकार लेता आकार । उसी भांतिका ॥ ८४ ॥ ज्ञान-त्रयके कारण । त्रिविध कर्म अर्जुन । होता है सात्विक सुन । कहता पहले ॥ ८५ ॥ नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ सात्विक कर्मका लक्षण— स्वाधिकारानुसार जो आता । उसीमें वह संतोष पाता । पति-व्रतालिंगनसे पाता । पति जैसे ॥ ८६ ॥ जैसे सांवले रंगमें चंदन । प्रमदाकी आंखोंमें अंजन । वैसे स्वाधिकारका भूषण । नित्यकर्म ॥ ८७ ॥ निर्दिष्ट और निष्काम तजके राग-द्वेषको । किया असंग वृत्तीसे वह है कर्म सात्विक ॥ २३ ॥ ७६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

नित्य-कर्म जो है भला भला । नैमित्तिकका जोड़ भी मिला । मानो सोनेसे सुहाग मिला । ऐसी है शोभा ॥ ८८ ॥ तन मनका सार सर्वस । दे कर बढाती स-संतोष । माता बालकको पाल पोस । बिन उकताये ॥ ८९ ॥ जीव भावसे ऐसे कर्मानुष्ठान । कर भी न जाते फलपे नयन । करता है उस कर्मका अर्पण । केवल ब्रह्ममें ॥ ५९० ॥ प्रियाराधनमें जैसे सहज भाव । नहीं रहता कम अधिकका भाव । ऐसे सत्प्रसंगमें रहता पांडव । नित्य-कर्म ॥ ९१ ॥ तब न होता अकारण खेद । उद्वेगसे जीवको न दें बांध । अथवा होनेसे मान आनंद । उछलता कभी ॥ ९२ ॥ ऐसे कुशलता पूर्वक । किया जाता है कर्म नेक । कहते हैं उसे सात्विक । कर्म पांडव ॥ ९३ ॥ इस पर राजसका सुन । कहता हूं मैं सही लक्षण । अपना चित्त देके अर्जुन । सुन तू यह ॥ ९४ ॥ यत् तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥ राजस कर्मका लक्षण— धनमें जैसे कोई माता पितासे । न बोलता व्यवहारमें ठीकसे । किंतु चलता विश्वमें आदरसे । महामूर्ख ॥ ९५ ॥ या जड़में न दें तुलसीके । दूरसे देता बूंद पानीके । किंतु सींचता नित द्राक्षके । मूलमें दूध ॥ ९६ ॥ वैसे हैं जो नित्य नैमित्तिक । कर्म करना जो आवश्यक । उसके विषयमें जो देख । उठता भी नहीं ॥ ९७ ॥ सकाम और सायास साहंकारेण वा पुनः । किया जाता वही सारा कहाता कर्म राजस । २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६२

अब कार्यक्रममें तन मन । दानादि देकर भी संपूर्ण । न जानता है कुछ भी अर्जुन । दिया अधिक ॥ ९८ ॥ ड्योढे सूदमें जब लगाता । तब देनेमें तृम न होता । या खेतमें जब बीज बोता । न कहता रुको अब ॥ ९९ ॥ पारस हाथमें आता अर्जुन । तब जैसे लोह लेनेमें धन । खर्च करनमें सोत्साह मन । उछलता जैसे ॥ ६०० ॥ वैसे फल देखकर सम्मुख । कर्म करता उत्साह पूर्वक । करता सो कम मान अधिक- । अधिक करता जाता ॥ १ ॥ ऐसे फल कामुकसे । होते हैं यथाविधिसे । काम्य-कर्म अधिकसे । होते अधिक ॥ २ ॥ तथा उस काम्य-कर्मका । पीटता ढिंढोरा सदाका । नाम-पाठसे है कर्मका । करता भोज्य ॥ ३ ॥ इससे बढ़ता कर्माहंकार । न जानता पिता या गुरु फिर । जैसे नहीं मानता काल-ज्वर । कोई औषध ॥ ४ ॥ ऐसे है स-अहंकार । फलाभिलाषासे नर । करता है स-आदर । जो जो कुछ ॥ ५ ॥ तथा इस करनेमें भी जैसा । मदारीका व्यवसाय हो ऐसा । करता है जो अतीव संयास । जीविकाही जान ॥ ६ ॥ एक दानेके लिये उंदुर । खोदता जाता सभी डोंगर । या सेवारके लिये दर्दुर । मथता समुद्र ॥ ७ ॥ भीखके परे कुछ न मिलता । फिर भी सपेरा साप ढोता । किसीको कष्ट भी अच्छा लगता । इसको करें क्या ॥ ८ ॥ देखके परमाणुका भी लाभ । दीमक खोदती पृथ्वीका गर्भ । वैसे धर स्वर्ग-सुखका लोभ । करते कष्ट ॥ ९ ॥ यह काम्य-कर्म सक्लेस । जानना है यहां राजस । कहता लक्षण तामस । सुन तू अब ॥ ६१० ॥ ७६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ तामस कर्मका लक्षण— वह जो तामस कर्म । निंदाका है काला धाम । निषिद्ध कर्मका जन्म । हुवा हो सफल ॥ ११ ॥ वह जब संपन्न होता । दृष्टिमें कुछ भी न आता । जैसे पानीपे लिया जाता । रेखा चित्र ॥ १२ ॥ किया हो जैसे छासका मंथन । अग्निके लिये राख फूकी मान । या कोल्हूमें रेती पेरी अर्जुन । उसी प्रकार ॥ १३ ॥ पवनपे भूसा धरना । तीरसे गगन छेदना । पवनको फांस डालना । बांधानेके लिये ॥ १४ ॥ जैसे यह सकल । नासता है निष्फल । वैसे होता सकल । तामस कर्म ॥ १५ ॥ वैसे नरदेहके समान । व्यय होता है व्यर्थ ही धन । नासता कार्यके साथ जान । विश्वका सुख ॥ १६ ॥ कमल वनपे कांटेका फांस । खींचनेसे होता जिसके नाश । तथा करना वनका विध्वंस । पांडु कुमार ॥ १७ ॥ जैसे अपना तन जलाता । लोगोंको अंधेरेमें डालता । द्वेषसे दीपपे झेंप लेता । जैसे पतंग ॥ १८ ॥ वैसे सर्वस्व हो व्यर्थ । देह पर हो आघात । तथा होते अन्य त्रस्त । जिस कार्यसे ॥ १९ ॥ माखी अपनेको निगलाती । दूसरोंको वमन कराती । स्मरण दिलाती ऐसी कृति । तामस कर्म ॥ ६२० ॥ विनाश व्यय निष्पत्ति सामर्थ्य भी न देखके । मोहसे जो किया जाता कर्म तामस जान तू ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६४

अपना सामर्थ्य न देखता । आगेका विचार न करता । मनमें जो आता सो करता । न देखता कुछ ॥ २१ ॥ मेरा सामर्थ्य कितना । कर्मकी कैसी है घटना । करने पर है क्या होना । सोचता नहीं ॥ २२ ॥ इस भांतिसे सब जो विचार । अविवेक पगसे पोंछकर । उद्यत होता है स-अहंकार । कर्ममें वह ॥ २३ ॥ अपना ही आसरा जलाकर । भड़कता है अग्नि भयंकर । या मर्यादा भंग कर सागर । उमड पड़ता ॥ २४ ॥ तब कम अधिक न जानता । आगे पीछे कुछ भी न देखता । पथ कुपथ भी एक करता । तामस कर्म ॥ २५ ॥ कृत्याकृत्य ऐसा कुछ लेकर । आप पर विचार भी न कर । होता है जो कर्म धनुर्धर । निश्चय ही तामस ॥ २६ ॥ ऐसे गुणत्रय भिन्न । कर्मकी स्थिति अर्जुन । यह किया विवेचन । कारणों सह ॥ २७ ॥ अब इन कर्मोंको जो करता । कर्मोंके अभिमानसे जो कर्ता । वह जीव भी कैसे त्रिविधता । पाता है देख ॥ २८ ॥ जैसे होके चतुर्थाश्रमवश । चतुर्धा दीखता एक पुरुष । कर्ता दीखता कर्मभेद वश । तीन प्रकारका ॥ २९ ॥ तीनमें अब मैं पार्थ । सात्विक तुझे प्रस्तुत । करता हो दत्त चित्त । सुन तू इसे ॥ ६३० ॥ मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ २६ ॥ निःसंग निरहंकारी उत्साही धैर्यसे भरा । फले जले अविकारी कर्ता सात्विक है कहा ॥ २६ ॥ ७६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद ग्रोग

सात्विक कर्ताके लक्षण— छोडकर फलोद्देश । जैसे बढ़ जाती शाख । चंदनका जो विशेष । कहाता बावनी ॥ ३१ ॥ या फल बिना ही जो सार्थक । होती है जैसे नाग लतिका । वैसे करता है नित्यादिक । कर्म सदैव ॥ ३२ ॥ उनमें नहीं फल-शून्यता । अथवा नहीं है विफलता । फलके भी फल पांडुसुता । होते हैं क्या ॥ ३३ ॥ आदर-पूर्वक सब करता । किंतु किया ऐसा न कहता । वर्षाकालमें नहीं गर्जता । बादल जैसे ॥ ३४ ॥ वैसे परमात्म-प्रीत्यर्थ । समर्पणमें जो उचित । कर्म-समुदाय है पार्थ । करनेमें उत्पन्न ॥ ३५ ॥ कालका उल्लंघन नहीं करता । शुद्ध स्थलका विचार भी रखता । तथा शास्त्र-दृष्टिसे भी देखता । कार्य निर्णय ॥ ३६ ॥ वृत्तिको सदा एकाग्र रखता । चित्तको फलसे दूर रखता । नियमोंका बंधन भी पालता । शास्त्रोक्त जो ॥ ३७ ॥ इस निरोधको सहनेमें । सर्वोत्कृष्ट धैर्यको मनमें । रखनेका सद् चिंतनमें । रहता है नित ॥ ३८ ॥ तथा आत्म-प्रेमसे विहित । कर्म करनेमें जो सतत । देह-सुखकी चिंता किंचित । करता नहीं ॥ ३९ ॥ निद्रासे सदा दूर रहता । भूखको भी नहीं जानता । देह-सुख नहीं मिलता । उसको कभी ॥ ६४० ॥ सोना जैसे आगमें तपता । भार घट कसमें चढ़ता । वैसे उत्साह बढ़ता जाता । कर्ममें उसका ॥ ४१ ॥ पति पर प्रेम हो तो सच । सतीको जीनेमें हो संकोच । चितामें जलनेमें रोमांच । होते पतीसह ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६६

प्रिय हो आत्माके समान । उसके लिये क्या अर्जुन । देहको दुःख होता मान । होगा क्या क्लेश ॥ ४३ ॥ विषय-सुख जैसे टूटता जाता । देह तथा बुद्धिका लय हो जाता । कर्ममें ही आनंद बढ़ता जाता । उसको सदैव ॥ ४४ ॥ ऐसा जब कर्म करता । कोई समय ऐसा आता । कर्म करना भी रुकता । उस समय ॥ ४५ ॥ कगार परसे जब गिरता रथ । टूटेगा मान सकुचाता नहीं पार्थ । वैसे मनमें नहीं होता संकुचित । किंचित भी वह ॥ ४६ ॥ अथवा मैंने जो कर्म किया । संपूर्ण रूपसे सिद्ध भया । ऐसे मैंने बडा जय पाया । यह भी नहीं मानता ॥ ४७ ॥ ऐसे जो कर्म करता । जहां कहीं देखा जाता । उसे कहना तत्वता । कर्ता सात्विक ॥ ४८ ॥ राजसका अब अर्जुन । कहता सुन पहचान । आकांक्षाका आश्रय-स्थान । बनता विश्वका ॥ ४९ ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ राजस कर्ताके लक्षण— गांवका सब कल्मश जैसे । घूरेपे एक होता है वैसे । या स्मशानपे आता गांवसे । सारा अमंगल ॥ ६५० ॥ उसी भांति है जो अशेष । विश्वका सभी अभिलाष । पद प्रक्षालन विशेष । हुवा है स्थान ॥ ५१ ॥ इसीलिये फल लाभ । होता है जहां सुलभ । हो जाता है वहां लोभ । ऐसे कार्यमें ॥ ५२ ॥ फल कामुक आसक्त लोभी अस्वच्छ हिंसक । हर्ष औ' शोकसे मारा कर्ता राजस है कहा ॥ २७ ॥ ७६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तथा आप कमाया हुवा धन । व्यय न करता कवडी जान । उस पर करता क्षण क्षण । निछावर जीव ॥ ५३ ॥ सावध रहता जैसा कृपण । बक रखता मीनपे नयन । वैसे देख वह पराया धन । रहता दक्ष ॥ ५४ ॥ पास जानेसे जो उलझाता । लगनेसे देह ही फाडता । फल मानो जीभको जलाता । खट्टा बेर ॥ ५५ ॥ वैसे वह जो काया वाचा मन । दुखाता रहता सबका मन । करनेमें वह स्वार्थ-साधन । न देखता परहित ॥ ५६ ॥ वैसे ही करनेमें जो कर्म । होता है यदि वह अक्षम । किंतु नहीं होता मनोधर्म । अरोचक उसका ॥ ५७ ॥ कनक फल सबाह्य जैसे । भरा रहता विष कांटोंसे । रहता वह दुर्बल वैसे । सदा शुचित्वमें ॥ ५८ ॥ जब वह कर्म फल पाता । फूलकर कुप्पा बन जाता । विश्वको अंगूठा भी दिखाता । चिढाकरके ॥ ५९ ॥ या कर्म होता जब निष्फल । शोकमें डूब जाता पाताल । तथा धिक्कारता है सकल । कर्म जात ॥ ६६० ॥ देख ऐसा कर्माचरण । जान तू काया वाचा मन । कर्ता है राजस अर्जुन । निःसंशय वह ॥ ६१ ॥ अब कहता धनुर्धर । जो है कुकर्मका आगर । होता है जो ऐसा गोचर । कर्ता तामस ॥ ६२ ॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥ स्वच्छंदी क्षुद्र गर्विष्ठ घातकी शठ आलसी । दीर्घ-सूत्री सदा खिन्न कर्ता तामस है कहा ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी ७६८

तामस कर्ताके लक्षण— लगने पर मैं जैसे । आगेका जलता कैसे । यह न जानता वैसे । अग्निस्र्फुलिंग ॥ ६३ ॥ होता मैं कैसे वधका कारण । यह न जानता शस्त्र अर्जुन । कालकूटको नहीं होता ज्ञान । अपने परिणामका ॥ ६४ ॥ ऐसे वह धातुक क्रिया । करता रहता धनंजय । उससे अपना पराया । होता घात ॥ ६५ ॥ उसको जब जो कुछ करना । क्या होता है यह नहीं देखना । जिसभांति बवंडरका आना । ऐसी क्रिया उसकी ॥ ६६ ॥ उसका और जिस कार्यका । संबंध नहीं होता किसीका । पागलसे है जैसे कर्मका । नहीं होता वैसे ॥ ६७ ॥ बैलोंके गलेमें जैसे किल्हर । इंद्रियोंमें विषय है धनुर्धर । लगते हैं तब उन्हें भोगकर । बिताता जीवन ॥ ६८ ॥ हंसने या रोनेका काल । नहीं जानता जैसे बाल । वैसे ही सदा उच्छृंखल । रहता है वह ॥ ६९ ॥ होनेसे सदा प्रकृतिके आधीन । कृत्याकृत्य स्वादसे होता उलझन । अपने कृत्योंसे फूलता अर्जुन । कूडेके घरसा ॥ ६७० ॥ तथा कभी किसीको देनेमें मान । ईश्वरको भी न करता नमन । स्तब्धतामें पर्वतको भी अर्जुन । हराता वह ॥ ७१ ॥ अति कुटिल उसका मन । छुपाये हुए सभी वर्तन । पण्यांगना सम जो नयन । छल-मदसे भरे ॥ ७२ ॥ अथवा मानो कपटका । बनाया ही तन उसका । जीना मानो द्यूत-कर्मका । घर ही रहता है ॥ ७३ ॥ यह जो उसका प्रादुर्भाव । साभिलाष भिल्लका है गांव । उस राह पे कभी पांडव । जाना भी नहीं ॥ ७४ ॥ ७६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग (88)