दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१२ दोहावली तुलसी परिहरि हरि हरहि पाँवर पूजहिं भूत । अंत फजीहत होहिँगे गनिका के से पूत ॥६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीशंकरजीको छोड़कर जो पामर भूतोंकी पूजा करते हैं, वेश्याके पुत्रोंकी तरह उनकी अन्तमें बड़ी दुर्दशा होगी ॥६५॥ सेये सीता राम नहिं भजे न संकर गौरि । जनम गँवायो बादिहीं परत पराई पौरि ॥६६॥ भावार्थ—यदि श्रीसीतारामजीकी सेवा नहीं की और श्रीगौरीशंकरका भजन नहीं किया तो पराये दरवाजेपर पड़े रहकर वृथा ही जन्म गँवाया ॥६६॥ तुलसी हरि अपमान तें होइ अकाज समाज । राज करत रज मिलि गए सदल सकुल कुरुराज ॥६७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरिका अपमान करनेसे हानियोंका समाज जुट जाता है अर्थात् हानि-ही-हानि होती है। [सन्धि करानेके लिये कौरवोंकी राजसभामें दूत बनकर गये हुए] भगवान् श्रीकृष्णका अपमान करनेसे राज्य करते हुए कुरुराज दुर्योधन अपनी सेना और कुटुम्बके सहित धूलमें मिल गये (नष्ट हो गये) ॥ ६७ ॥ तुलसी रामहि परिहरें निपट हानि सुन ओझ । सुरसरि गत सोई सलिल सुरा सरिस गंगोज्झ ॥६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अरे पण्डित ! सुनो, श्रीरामजीको छोड़ देनेसे अत्यन्त हानि होती है। श्रीगङ्गाजीका वही जल श्रीगङ्गाजीसे अलग हो जानेपर मदिराके समान हो जाता
दोहावली ३३ है* [इसी प्रकार श्रीरामसे विमुख होकर विषयोंका सङ्ग करनेसे परमात्माका अंश जीव अपवित्र होकर नरकगामी हो जाता है] ॥६८॥ राम दूरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह। भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतल छाँह ॥६९॥ भावार्थ—जैसे सूर्यको दूर देखकर छाया लम्बी हो जाती है और सूर्य जब सिरपर आ जाता है तब वह ठीक पैरोंके नीचे आ जाती है, उसी प्रकार श्रीरामजीसे दूर रहनेपर माया बढ़ती है और जब वह श्रीरामजीको मनमें विराजित जानती है, तब घट जाती है॥६९॥ साहिब सीतानाथ सों जब घटिहै अनुराग। तुलसी तबहीं भालतें झभरि भागिहैं भाग ॥७०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब स्वामी श्रीजानकीनाथजी- से प्रेम घट जायगा, तब उस आदमीके मस्तकसे सौभाग्य तुरंत ही विकल होकर भाग जायगा। (अर्थात् जो मनुष्य भगवान् श्रीरामसे विमुख हो जाता है; उसका सारा सुख-सौभाग्य नष्ट हो जाता है) ॥७०॥ करिहौ कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस। जहाँ तहाँ दुख पाइहौ तबहीं तुलसीदास ॥७१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कोसलपति श्रीरामजीको छोड़कर जबही दूसरी आशा करोगे तभी जहाँ-तहाँ दुःख ही पाओगे ॥७१॥ *शास्त्रका भी वचन है— गङ्गाया निःसृतं तोयं पुनर्गङ्गां न गच्छति। तत्तोयं मदिरातुल्यं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ दोहा० ३–४—
३४ दोहावली बिंधि न ईंधन पाइए सायर जुरै न नीर। परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर ॥७२॥ भावार्थ—यदि श्रीरघुनाथजी प्रतिकूल हो जायँ तो फिर (घनी लकड़ियोंवाले) विन्ध्याचलमें ईंधन नहीं मिलेगा, समुद्रमें जल नहीं जुड़ सकेगा और धनपति कुबेरके घर भी फाका पड़ जायगा ॥७२॥ बरषा को गोबर भयो को चहै को करै प्रीति। तुलसी तू अनुभवहि अब राम बिमुख की रीति ॥७३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू अब श्रीरामजीसे विमुख मनुष्यकी गतिका तो अनुभव कर; वह बरसातका गोबर हो जाता है [जो न तो लीपनेके काममें आता है न पाथनेके] अर्थात् निकम्मा हो जाता है। उसे कौन चाहेगा? और कौन उससे प्रेम करेगा? ॥७३॥ सबहि समरथहि सुखद प्रिय अच्छम प्रिय हितकारि। कबहुँ न काहुहि राम प्रिय तुलसी कहा बिचारि ॥७४॥ भावार्थ—[संसारकी यह दशा है कि] जो समर्थ पुरुष हैं उन सबको तो [सांसारिक] सुख देनेवाला प्रिय लगता है और असमर्थको अपना [सांसारिक] भला करनेवाला प्रिय होता है। तुलसीदासजी विचारकर ऐसा कहते हैं कि भगवान् श्रीराम [विषयी पुरुषोंमें] कभी किसीको भी प्रिय नहीं लगते ॥७४॥ तुलसी उद्यम करम जुग जब जेहि राम सुडीठि। होइ सुफल सोइ ताहि सब सनमुख प्रभु तन पीठि ॥७५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब जिसपर श्रीरामजीकी सुदृष्टि होती है, तब उसके सब उद्यम (क्रियमाण) और कर्म (प्रारब्ध) दोनों सफल हो जाते हैं और वह शरीरकी ममता छोड़कर
दोहावली ३५ प्रभुके सम्मुख हो जाता है ॥ ७५ ॥ राम कामतरु परिहरत सेवत कलि तरु ठूँठ । स्वारथ परमारथ चहत सकल मनोरथ झूठ ॥७६॥ भावार्थ—जो मनुष्य श्रीरामरूपी कल्पवृक्षको छोड़कर सूखे ठूंठ- जैसे [निःसार] कलियुग अर्थात् पापरूपी वृक्षका सेवन करते हैं और उससे स्वार्थ और परमार्थरूपी फल चाहते हैं, उनके सभी मनोरथ व्यर्थ होते हैं (अर्थात् स्वार्थ, परमार्थ कुछ भी सिद्ध नहीं होता) ॥ ७६ ॥ कल्याणका सुगम उपाय निज दूषन गुन राम के समुझें तुलसीदास । होइ भलो कलिकालहूँ उभय लोक अनयास ॥७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—अपने दोषों (अपराधों) तथा श्रीरामके [क्षमा, दया आदि] गुणोंको समझ लेनेपर अथवा दोषोंको अपना किया और गुण भगवान् श्रीरामके दिये हुए मान लेनेसे इस कलिकालमें भी मनुष्यका इस लोक और परलोक दोनोंमें सहज ही कल्याण हो जाता है ॥ ७७ ॥ कै तोहि लागहिं राम प्रिय कै तू प्रभु प्रिय होहि । दुइ में रुचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि ॥७८॥ भावार्थ—या तो तुझे राम प्रिय लगने लगें या प्रभु श्रीरामका तू प्रिय बन जा । दोनोंमेंसे जो तुझे सुगम जान पड़ तथा प्रिय लगे, तुलसीदासजी कहते हैं कि तुझे वही करना चाहिये । (अर्थात् या तो सबसे प्रेम छोड़कर श्रीरामको ही अपना एकमात्र प्रियतम मान ले या प्रभुकी शरण होकर सब कुछ उन्हें समर्पण कर दे, जिससे वे तुझे अपना अत्यन्त प्रिय मान लें) ॥ ७८ ॥
३६ दोहावली तुलसी दुइ महँ एक ही खेल छाँड़ि छल खेलु। कै करु ममता राम सों कै ममता परहेलु ॥७९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सब छोड़कर तू दोनोंमेंसे एक ही खेल—या तो केवल रामसे ही ममता कर या ममताका सर्वथा त्याग कर दे ॥ ७६ ॥ श्रीरामजीकी प्राप्तिका सुगम उपाय निगम अगम साहेब सुगम राम साँचिली चाह। अंबु असन अवलोकिअत सुलभ सबै जग माँह ॥८०॥ भावार्थ—जो हमारे स्वामी वेदोंके लिये भी अगम हैं, (वेद भी जिनको 'नेति-नेति' कहते हैं) वे ही श्रीराम सच्ची चाहसे ऐसे सुगम हो जाते हैं जैसे जल और अन्न जगत्में सबके लिये सुलभ देखे जाते हैं ॥ ८० ॥ सनमुख आवत पथिक ज्यों दिएँ दाहिनो बाम। तैसोइ होत सु आप को त्यों ही तुलसी राम ॥८१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सामने आते हुए पथिकको आप दायें-बायें जिस ओर देकर चलेंगे उसी प्रकार वह भी आपके दायें-बायें हो जायगा। ऐसे ही श्रीरामको भी जो जिस प्रकार भजता है श्रीराम भी उसे उसी प्रकार भजते हैं* ॥ ८१ ॥ रामप्रेमके लिये वैराग्यकी आवश्यकता राम प्रेम पथ देखिए दिएँ बिषय तन पीठि। तुलसी केंचुरि परिहरें होत साँपहू दीठि ॥८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विषयोंकी ओर पीठ देनेसे
- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११)
दोहावली ३७ ही (विषयोंमें वैराग्य होनेसे ही) श्रीरामजीके प्रेमका पथ दिखलायी पड़ता है। साँपको भी केंचुल छोड़ देनेपर ही दिखलायी देने लगता है ॥ ८२ ॥ तुलसी जौ लौं विषय की मुधा माधुरी मीठि। तौ लौं सुधा सहस सम राम भगति सुठि सीठि ॥८३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जबतक विषयोंकी मिथ्या माधुरी मीठी लगती है, तबतक हजार अमृतके समान मधुर होनेपर भी रामभक्ति बिल्कुल फीकी प्रतीत होती है ॥ ८३ ॥ शरणागतिकी महिमा जैसो तैसो रावरो केवल कोसलपाल। तौ तुलसीको है भलो तिहुँ लोक तिहुँ काल ॥८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे कोसलपति श्रीरामजी ! जैसा-तैसा (भला-बुरा) यह तुलसीदास केवल आपका ही है। यदि यह बात सच है तो तीनों लोकोंमें (यह जहाँ-कहीं रहे) और तीनों कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) में इसका कल्याण-ही-कल्याण है ॥ ८४ ॥ है तुलसी कें एक गुन अवगुन निधि कहैं लोग। भलो भरोसो रावरो राम रीझिबे जोग ॥८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग मुझको अवगुणोंका भण्डार कहते हैं, परंतु मुझमें एक गुण यह है कि मुझको आपका पूरा भरोसा है; इसीसे हे रामजी ! आपको मुझपर रीझ जाना योग्य है ॥ ८५ ॥
३८ दोहावली भक्तिका स्वरूप प्रीति रामसों नीति पथ चलिय राग रिस जीति। तुलसी संतन के मते इहै भगति की रीति॥८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीसे प्रेम करना और राग (आसक्ति या काम) एवं क्रोधको जीतकर नीतिके मार्ग- पर चलना, संतोंके मतसे भक्तिकी यही रीति है॥ ८६ ॥ कलियुगसे कौन नहीं छला जाता सत्य बचन मानस बिमल कपट रहित करतूति। तुलसी रघुबर सेवकहि सकै न कलिजुग धूति॥८७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिनके वचन सत्य होते हैं, मन निर्मल होता है और क्रिया कपटरहित होती है, ऐसे श्रीरामजीके भक्तोंको कलियुग कभी धोखा नहीं दे सकता (वे मायामें नहीं फँस सकते) ॥ ८७ ॥ तुलसी सुखी जो राम सों दुखी सो निज करतूति। करम बचन मन ठीक जेहि तेहि न सकै कलि धूति॥८८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य श्रीरामजीसे (भगवान् श्रीरामकी कृपासे ही) अपनेको सब प्रकारसे सुखी होना और (श्रीरामजीको छोड़कर) अपनी अहंकार भरी करतूतोंसे दुखी होना मानता है, जिसके कर्म, वचन और मन ठीक हैं (भगवान्में लगे हैं) उसको कलियुग धोखा नहीं दे सकता ॥ ८८ ॥ गोस्वामीजीकी प्रेम-कामना नातो नाते राम कें राम सनेहँ सनेहु। तुलसी मांगत जोरि कर जनम-जनम सिव देहु ॥८६॥
दोहावली ३१ भावार्थ—तुलसीदास हाथ जोड़कर वरदान मांगता है कि हे शिवजी ! मुझे जन्म-जन्मान्तरोंमें यही दीजिये कि मेरा श्रीरामके नाते ही किसीसे नाता हो और श्रीरामसे प्रेमके कारण ही प्रेम हो ॥ ८६ ॥ सब साधनको एक फल जेहिं जान्यो सो जान । ज्यों त्यों मन मंदिर बसहिं राम धरें धनु बान ॥६०॥ भावार्थ—सब साधनोंका यही एकमात्र फल है कि जिस-किसी प्रकारसे भी हो, धनुष-बाण धारण करनेवाले श्रीरामजी मन-मन्दिरमें निवास करने लगें । जिसने इस रहस्यको जान लिया, वही यथार्थ जाननेवाला है ॥ ६० ॥ जौ जगदीस तौ अति भलो जौ महीस तौ भाग । तुलसी चाहत जनम भरि राम चरन अनुराग ॥९१॥ भावार्थ—यदि श्रीरामजी समस्त जगत्के स्वामी हैं तो बहुत ही अच्छी बात है; और यदि वे केवल पृथ्वीके स्वामी—राजा हैं तो भी मेरा बड़ा भाग्य है । [राम कोई भी हों] तुलसीदास तो जन्मभर श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम ही चाहता है ॥ ६१ ॥ परौं नरक फल चारि सिचु मीच डाकिनी खाउ । तुलसी राम सनेह को जो फल सो जरि जाउ ॥९२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, मैं चाहे नरकमें पहूँ, चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) रूपी बालकोंको चाहे मृत्युरूपी डाकिनी खा जाय, श्रीरामजीसे प्रेम करनेका और कुछ भी जो फल हो वह जल जाय [किंतु फिर भी मैं तो श्रीरामके चरणोंमें प्रेम ही करता रहूँगा] ॥ ६२ ॥
४० दोहावली रामभक्तके लक्षण हित सों हित, रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ । उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ ॥९३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रामभक्तका ऐसा सहज भाव होना चाहिये कि श्रीराममें उसका प्रेम हो, मित्रोंसे मैत्री हो, बैरियोंसे बैरका त्याग कर दे, किसीमें पक्षपात न हो और सबसे सरलताका व्यवहार हो ॥ ९३ ॥ तुलसी ममता राम सों समता सब संसार । राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ॥९४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिनकी श्रीराममें ममता और सब संसारमें समता है, जिनका किसीके प्रति राग, द्वेष, दोष और दुःखका भाव नहीं है, श्रीरामके ऐसे भक्त भवसागरसे पार हो चुके हैं ॥ ९४ ॥ उद्बोधन रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीत । तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति ॥९५॥ भावार्थ—श्रीरामसे डरो, श्रीराममें ही ममता, प्रेम और विश्वास करो । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामका कपटरहित सेवक हो रहनेपर हारनेमें भी जीत ही है ॥ ९५ ॥ तुलसी राम कृपालु सों कहि सुनाउ गुन दोष । होय दूबरी दीनता परम पीन संतोष ॥९६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम कृपालु श्रीरामजीसे अपने सब गुण-दोष दिल खोलकर सुना दो। इससे तुम्हारी दीनता
दोहावली ४१
दुबली (कम) हो जायगी और सन्तोष परम पुष्ट (दृढ़) हो
जायगा ॥ ६६ ॥
सुमिरन सेवा राम सों साहब सों पहिचानि ।
ऐसेहु लाभ न ललक जो तुलसी नित हित हानि ॥९७॥
भावार्थ—श्रीरामजीका स्मरण हो, श्रीरामजीकी सेवाका
सौभाग्य प्राप्त हो और श्रीराम-सरीखे स्वामीको तत्त्वसे पहचान
लिया जाय । ऐसे परम लाभके लिये भी जो नहीं ललचाता,
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके हितकी सर्वथा हानि ही है॥६७॥
जानें जानल जोइए बिनु जाने को जान ।
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ आनु धरें धनु बान ॥९८॥
भावार्थ—जाननेपर ही जानना देखा जाता है, बिना जाने कौन
जान सकता है ? (जब हम किसीको जानने लगते हैं, तभी क्रमशः
उसका यथार्थ ज्ञान—साक्षात्कार होता है; जाननेकी चेष्टा ही न
करें तो कैसे जानेंगे !) तुलसीदासजी कहते हैं कि यह बात सुनकर
और समझकर धनुष-बाण धारण किये हुए श्रीरामजीको अपने
हृदयमें ले आओ। (ध्यान करते-करते ही साक्षात्कार हो
जायगा) ॥ ६८ ॥
करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन ।
तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो राम दुआरें दीन ॥९९॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कर्मठ (कर्मकाण्डी) लोग
तो मुझे काठकी माला धारण करनेवाला ‘कठमलिया’ कहते हैं,
ज्ञानी मुझको ज्ञानविहीन बतलाते हैं [और उपासना करना मैं
जानता ही नहीं] मैं तो तीनों मार्गोंको छोड़, दीन होकर श्रीराम-
चन्द्रजीके दरवाजेपर जा पड़ा हूँ ॥ ६९ ॥
४२ दोहावली बाधक सब सब के भए साधक भए न कोइ । तुलसी राम कृपालु तें भलो होइ सो होइ ॥१००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि इस जगत्में तो सब लोग सबके बाधक ही होते हैं, साधक कोई किसीका नहीं है ! कृपालु श्रीरामजीसे ही भला होता है सो होता है ॥ १०० ॥ शिव और रामकी एकता संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास । ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥१०१॥ भावार्थ—[भगवान् श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं कि] जिनको शिवजी प्रिय हैं, किंतु जो मुझसे विरोध रखते हैं अथवा जो शिवजीसे विरोध रखते हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य एक कल्पतक घोर नरकमें पड़े रहते हैं [अतएव श्रीशंकरजीमें और श्रीरामजीमें कोई ऊँच-नीचका भेद नहीं मानना चाहिए।] ॥ १०१ ॥ बिलग बिलग सुख संग दुख जनम मरन सोइ रीति । रहिअत राखे राम कें गए ते उचित अनीति ॥१०२॥ भावार्थ—संसारसे दूर-दूर (आसक्तिरहित होकर) रहनेमें ही सुख है, आसक्तिमें ही दुःख है। यही बात जन्म और मृत्युमें भी है। श्रीरामके रक्खे अर्थात् वे रखना चाहते हैं, इसीलिये (आसक्ति- रहित होकर यहाँ रहना चाहिये। अन्यथा इस अनीतिसे (रागयुक्त संसारसे) जो चले गये, उन्होंने ही उचित किया (तात्पर्य यह है कि जगत्में या तो भगवत्प्रेमी होकर रहे या ऐसी चेष्टा करे जिसमें इससे मुक्ति ही मिल जाय) ॥ १०२ ॥
दोहावली ४३ रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता जायँ कहब करतूति बिनु जायँ जोग बिन छेम । तुलसी जायँ उपाय सब बिना राम पद प्रेम ॥१०३॥ भावार्थ—बिना करनी किये केवल कथनमात्र व्यर्थ है, बिना क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) के योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति) व्यर्थ हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामके चरणोंमें प्रेम हुए बिना सब साधन व्यर्थ हैं ॥ १०३ ॥ लोग मगन सब जोगहीं जोग जायँ बिनु छेम । त्यों तुलसी के भावगत राम प्रेम बिनु नेम ॥१०४॥ भावार्थ—लोग सब योगमें ही (अप्राप्त वस्तुके प्राप्त करनेके काममें ही) लगे हैं, परंतु क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) का उपाय किये बिना योग व्यर्थ है। इसी प्रकार तुलसीदासके विचारसे श्रीरामजीके प्रेम बिना सभी नियम व्यर्थ हैं ॥१०४॥ श्रीरामकी कृपा राम निकाई रावरी है सबही को नीक । जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥१०५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामजी ! आपकी भलाई (सुहृद्भाव) से सभीका भला है। अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है। यदि यह बात सत्य है तो तुलसी- दासका भी सदा कल्याण ही है ॥१०५॥ तुलसी राम जो आदरयो खोटो खरो खरोइ । दीपक काजर सिर धरयो धरयो सुघरयो धरोइ ॥१०६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको श्रीरामने आदर दे
४४ दोहावली दिया (अपना लिया) वह बुरा भी भला, सदा भला ही है। दीपकने जब काजलको अपने सिरपर धारण कर लिया तो फिर कर ही लिया ॥ १०६॥ तनु बिचित्र कायर बचन अहि अहार मन घोर । तुलसी हरि भए पच्छधर ताते कह सब मोर ॥१०७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरका रंग-बिरंगा विचित्र शरीर है, कायरकी-सी उसकी बोली है, साँप उसका भोजन है और कठोर मन है। इतने अवगुण होनेपर भी भगवान् श्रीकृष्णने उसकी पाँखोंको सिरपर धारण कर लिया—भगवान् उसका पक्ष रखनेवाले हो गये, तो सभी उससे प्रेम करते हुए 'मोर, मोर' (मेरा, मेरा) कहने लगे ॥१०७॥ लहइ न फूटी कौड़िहू को चाहै केहि काज । सो तुलसी महँगो कियो राम गरीबनिवाज ॥१०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती थी (जिसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी), उसको भला कौन चाहता और किसलिये चाहता। उसी तुलसीको गरीब- निवाज श्रीरामजीने आज महँगा कर दिया (उसका गौरव बढ़ा दिया) ॥१०८॥ घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय । जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय ॥१०९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस समय मैं रामसे (श्रीरामके आश्रयसे) रहित था, उस समय घर-घर टुकड़े माँगता था। अब जो श्रीरामजी मेरे सहायक हो गये हैं तो फिर राजालोग मेरे पैर पूजते हैं ॥१०९॥
दोहावली ४५ तुलसी राम सुदीठि तें निबल होत बलवान । बैर बालि सुग्रीव कें कहा कियो हनुमान ॥११०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीकी शुभ दृष्टिसे निर्बल भी बलवान् हो जाते हैं। सुग्रीव और बालिके बैरमें हनुमान्जीने भला क्या किया ? [परंतु वही श्रीरामजीकी कृपासे महान् वीर हो गये] ॥११०॥ तुलसी रामहु तें अधिक राम भगत जियँ जान । रिनिया राजा राम से धनिक भए हनुमान ॥१११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामके भक्तको रामजीसे भी अधिक समझो। राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ऋणी हो गये और उनके भक्त श्रीहनुमान्जी उनके साहूकार बन गये (श्रीराम- जीने यहाँतक कह दिया कि मैं तुम्हारा ऋण कभी चुका ही नहीं सकता) ॥१११॥ कियो सुसेवक धरम कपि प्रभु कृतग्य जियँ जानि । जोरि हाथ ठाढ़े भए बरदायक बरदानि ॥११२॥ भावार्थ—श्रीहनुमान्जीने [अधिक कुछ नहीं किया, केवल] एक अच्छे सेवकका धर्म ही निभाया। परंतु यह जानकर वर देनेवाले देवताओंके भी वरदाता महेश्वर श्रीभगवान् हृदयसे ऐसे कृतज्ञ हुए कि हाथ जोड़कर हनुमान्जीके सामने खड़े हो गये (कहने लगे कि हे हनुमान् ! मैं तुम्हारे बदलेमें उपकार तो क्या करूँ, तुम्हारे सामनै नजर उठाकर देख भी नहीं सकता) ॥११२॥ भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप । किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥११३॥ भावार्थ—जगदीश्वर भगवान् श्रीरामजीने भक्तोंके लिये ही
४६ दोहावली राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंकी भाँति परम पवित्र लीलाएँ कीं ॥११३॥ ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार । सोइ सच्चिदानंदघन कर नर चरित उदार ॥११४॥ भावार्थ—जो ज्ञान (बुद्धि), वाणी और इन्द्रियोंसे परे, अजन्मा तथा माया, मन और गुणोंके पार हैं, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ॥११४॥ हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान । जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥११५॥ भावार्थ—जिन कृपासिन्धु भगवान्ने भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु-कैटभको मारा था, वे ही भगवान् [श्रीरामरूपमें] अवतरित हुए हैं ॥११५॥ सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु । चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥११६॥ भावार्थ—शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मङ्गलविग्रह), सच्चिदानन्दकन्दस्वरूप सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान् श्रीरामजी मनुष्योंके समान ऐसे चरित्र करते हैं, जो संसार-सागरसे तारनेके लिये पुलके समान हैं (अर्थात् उन चरित्रोंको गाकर और सुनकर लोग भवसागरसे सहज ही तर जाते हैं) ॥११६॥ भगवान्की बाललीला बाल बिभूषन बसन बर धूरि धूसरित अंग । बालकेलि रघुबर करत बाल बंधु सब संग ॥११७॥ भावार्थ—श्रीरामजी बालोचित सुन्दर गहने-कपड़ोंसे सजे हुए
हैं; उनके श्रीअङ्ग धूलसे मटमैले हो रहे हैं, सब बालकों तथा भाइयोंके साथ आप बालकोंके-से खेल खेल रहे हैं ॥११७॥ अनुदिन अवध बधावने नित नव मंगल मोद । मुदित मातु पितु लोग लखि रघुबर बाल बिनोद ॥११८॥ भावार्थ—श्रीअयोध्याजीमें रोज बधावे बजते हैं, नित नये-नये मङ्गलाचार और आनन्द मनाये जाते हैं। श्रीरघुनाथजीकी बाललीला देख-देखकर माता, पिता तथा सब लोग बड़े प्रसन्न होते हैं ॥११८॥ राज अजिर राजत रुचिर कोसलपालक बाल । जानु पानि चर चरित बर सगुन सुमंगल माल ॥११९॥ भावार्थ—कोसलपति महाराज दशरथके लाड़ले लाल राजमहल- के सुन्दर आँगनमें हाथों और घुटनोंके बल (बकैयाँ) चलते हुए ऐसी उत्तम-उत्तम लीलाएँ कर रहे हैं जो मानो सब शुभ गुण और सुमङ्गलोंकी माला ही है ॥११९॥ नाम ललित लीला ललित ललित रूप रघुनाथ । ललित बसन भूषन ललित ललित अनुज सिसु साथ ॥१२०॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीका नाम, उनकी लीला, उनका सुन्दर रूप, उनके वस्त्र, उनके आभूषण सभी अत्यन्त सुन्दर हैं और सुन्दर छोटे भाई तथा अयोध्यावासी बालक उनके साथ [खेल रहे] हैं ॥१२०॥ राम भरत लछिमन ललित सत्रु समन सुख नाम । सुमिरत दसरथ सुवन सब पूजहिं सब मन काम ॥१२१॥ भावार्थ—श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ऐसे जिनके सुन्दर और शुभ नाम हैं, दशरथजीके इन सब सुपुत्रोंका स्मरण करते ही सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥१२१॥
४८ दोहावली बालक कोसलपाल के सेवकपाल कृपाल। तुलसी मन मानस बसत मंगल मंजु मराल ॥१२२॥ भावार्थ—कोसलपति श्रीदशरथजीके बालक श्रीरामजी सेवकों की रक्षा करनेवाले तथा बड़े ही कृपालु हैं। वे तुलसीदासके मनरूपी मानसरोवरमें कल्याणरूप सुन्दर हंसके समान निवास करते हैं ॥१२२॥ भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जगजाल ॥१२३॥ भावार्थ—भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ, देवताओंके हितके लिये कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य-शरीर धारणकर [नाना प्रकारकी] लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेमात्रसे जगत्के [सारे] जंजाल कट जाते हैं ॥१२३॥ निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥१२४॥ भावार्थ—देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों [की रक्षा] के लिये भगवान् अपनी इच्छासे ही [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार धारण करते हैं। वहाँ सगुण स्वरूपके उपासक भक्तगण [सालोक्य, सामीप्य सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंका परित्याग कर [परिकररूपसे] उनके साथ रहते हैं ॥१२४॥ प्रार्थना परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥१२५॥ भावार्थ—हे परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम, मनकी [सारी]
कामनाओंके पूर्ण करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ! आप हमें अपनी अविचल प्रेमा भक्ति दीजिये ॥ १२५ ॥ भजनकी महिमा बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल । बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥१२६॥ भावार्थ—जलके मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय तथा बालूके पेरनेसे चाहे तेल निकल आवे; परंतु श्रीहरिके भजन बिना भवसागर- से पार नहीं हुआ जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ॥ १२६ ॥ हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं । भजिअ राम सब काम तजि अस बिचारि मन माहिं ॥१२७॥ भावार्थ—श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं नष्ट होते । ऐसा मनमें विचारकर सब कामनाओंको त्यागकर श्रीरामजीका भजन ही करना चाहिये ॥ १२७ ॥ जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य । अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ॥१२८॥ भावार्थ—जो चेतनको जड़ कर देते हैं और जड़को चेतन, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं वे धन्य हैं ॥ १२८ ॥ श्रीरघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान । ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥१२९॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके प्रतापसे समुद्रमें पत्थर तर गये । अतएव वे लोग [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं ॥ १२९ ॥
५० दोहावली लव निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चंड । भजसि न मन तेहि राम कहँ कालु जासु कोदंड ॥१३०॥ भावार्थ—हे मन ! तू उन श्रीरामको क्यों नहीं भजता; जिनका काल तो धनुष है और लव, निमेष, परमाणु, युग, वर्ष और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं ॥ १३० ॥ तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम । जब लगि भजत न राम कहूँ सोकधाम तजि काम॥१३१॥ भावार्थ—जबतक यह जीव शोकके घर काम (विषयोंकी कामना) को त्यागकर श्रीरामजीको नहीं भजता, तबतक उसके लिये न तो कुशल है और न स्वप्नमें भी [कभी] उसके मनको शान्ति मिलती है ॥ १३१ ॥ बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग । मोह गएँ बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग ॥१३२॥ भावार्थ—सत्संगके बिना भगवान्की लीला-कथाएँ सुनने को नहीं मिलतीं, भगवान्की रहस्यमयी कथाओंके सुने बिना मोह नहीं भागता और मोहका नाश हुए बिना भगवान् श्रीरामजीके चरणोंमें सुदृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता ॥ १३२ ॥ बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु । राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥१३३॥ भावार्थ—भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास हुए बिना उनकी भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते नहीं और श्रीरामजीकी कृपा बिना जीव स्वप्नमें विश्राम (शान्ति) नहीं पाता ॥ १३३ ॥
दोहावली ५१ सोरठा अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल । भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥१३४॥ भावार्थ—हे धीरबुद्धि ! ऐसा विचारकर सारे कुतर्कों और संशयोंको त्यागकर करुणाकी खान परम मनोहर दिव्यविग्रह, परम सुखदायक रघुवीर श्रीरामजीका भजन करिये ॥ १३४ ॥ भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन । तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥१३५॥ भावार्थ—सुखके खजाने और करुणाके धाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। अतएव ममता, मद और मानको त्यागकर निरन्तर सीतापति श्रीरामजीका भजन ही करना चाहिये ॥ १३५ ॥ कहहिं बिमलमति संत बेद पुरान बिचारि अस । द्रवहिं जानकी कंत तब छूटै संसार दुख ॥१३६॥ भावार्थ—निर्मल बुद्धिवाले संत वेद और पुराणोंका विचार करके यही कहते हैं कि जानकीनाथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जब कृपा करते हैं, तभी संसारके दुःखोंसे छुटकारा मिलता है ॥ १३६ ॥ बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु । गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥१३७॥ भावार्थ—वेद-पुराण कहते हैं कि क्या बिना गुरुके ज्ञान हो सकता है, अथवा वैराग्यके बिना क्या ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? और श्रीहरिकी भक्ति बिना क्या कभी [सच्चे] सुखकी प्राप्ति हो सकती है ? ॥ १३७ ॥