श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०८२] * शंकरद्वारा गौरीपुत्र गुणेशकी महिमाका कथन * ४६३ अमंगलोंका विनाश करनेवाले कल्याणकारी प्रभु शंकर पुनः पार्वतीजीसे बोले- ॥ ६-७॥ हे देवि! गुणोंसे अतीत परमात्मा ही तुम्हारे पुत्र रूपमें अवतरित हुए हैं। तुमने अपने महान् तपस्यानुष्ठानसे साक्षात् विभुका दर्शन किया है ॥ ८ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब शिवजीने ब्राह्मणोंको आमन्त्रितकर गणपतिपूजन, मातृकापूजन, पुण्याहवाचन करके आभ्युदयिक श्राद्ध किया और बालकको घृत एवं मधुका प्राशन कराया। तदनन्तर भूमिको अभिमन्त्रण करनेके पश्चात् देवी पार्वती ने उस शिशुको अपना स्तनपान कराया ॥ ९-१० ॥ भगवान् शिवने गौतम आदि महर्षियोंकी पूजा करके उन्हें अनेक प्रकारके दान दिये। तब उनकी अनुमति पा करके वे महर्षिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर शंकरजीसे बोले- ॥ ११ ॥ ये अनादिसिद्ध, अखिलेश्वर, सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले और चराचर जगत्के गुरुके भी गुरु आपके पुत्रके रूपमें प्रकट हुए हैं। ये मायाके अधिष्ठाता तथा वेद-वेदान्तादि शास्त्रोंके लिये भी अगोचर हैं। ये सूर्यके मध्याकाशमें स्थित रहनेपर शुभ मुहूर्तमें अवतीर्ण हुए हैं। ये आपके यशका विस्तार करेंगे ॥ १२-१३ ॥ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको सोमवारके दिन स्वाति नक्षत्रमें, सिंह लग्नमें तथा पाँच शुभग्रहोंके उत्तम योगमें ये पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ १४ ॥ ये श्रीसम्पन्न, पराक्रमशाली, अद्भुत कर्म करनेवाले महान् बलसे सम्पन्न और समस्त लोकों तथा भक्तोंको अत्यन्त सुख प्रदान करनेवाले होंगे। हे शम्भो ! आप ग्यारहवें दिन इनका शुभ नामकरण-संस्कार करें ॥ १५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे सभी मुनिगण अपने-अपने स्थानोंकी ओर चले गये। भगवान् शिव बालकको पार्वतीकी सुन्दर शय्यापर रखकर सभी लोगोंको विदा करके प्रसन्नताके साथ भवनसे बाहर चले आये ॥ १६-१७ ॥ उसी समय शेषनाग वहाँपर आये और उन्होंने अपने फणोंकी छाया बालकपर की। मेघोंने वर्षा करके भूमिको धूलिरहित बना दिया। मालती पुष्पकी गन्धसे समन्वित सुखद वायु प्रवाहित होने लगी। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वोंके समूह गायन करने लगे। चारण उन प्रभुकी स्तुति करने लगे ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर मुनिगणोंने विनायककी मिट्टीकी एक उत्तम मूर्ति बनायी। एक सुन्दर मण्डप बनाया, उसे कदलीवृक्षों तथा पुष्पोंसे सजाया। तदनन्तर पद्मासनमें बैठकर उन्होंने परम श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की और वे सभी 'गुणेश-गुणेश' इस नाम-मन्त्रका प्रसन्नतासे निरन्तर जप करने लगे ॥ २०-२१ ॥ उन्होंने एक दिन-रातका उपवास किया तथा रात्रिमें जागरण किया। यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन ब्राह्मणों (मुनियों)-ने व्रतका पारण किया ॥ २२ ॥ इसी प्रकारसे उन्होंने दस दिनोंतक बड़े ही आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन देव गुणेशकी प्रसन्नताके लिये घर-घर महोत्सव किया ॥ २३ ॥ ग्यारहवें दिनकी बात है, उन सभी मुनिजनोंको भगवान् शिवने आमन्त्रित किया और वे सभी भगवान् शिवके पुत्रका नामकरण-संस्कार करनेके लिये वहाँ आये। भगवान् शिवने भलीभाँति उनका मान-सम्मान किया, तब उन मुनियोंने उस बालकका सभीका ईश्वर होनेके कारण 'गुणेश' यह नाम रखा। जो अत्यन्त उत्तम, शुभकारक और सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाला है ॥ २४-२५ ॥ भगवान् शिवने भी उन मुनिजनोंसे कहा कि आप लोगोंने बहुत अच्छा नाम रखा है। तदनन्तर शंकरने यह वरदान दिया कि सभी कर्मोंके आरम्भमें यह प्रथमपूज्य होगा। अनेक प्रकारके दानोंके देनेसे पूजित हुए वे सभी मुनिगण भगवान् शंकरसे आज्ञा लेकर अपने-अपने आश्रमोंको चले आये ॥ २६-२७ ॥ घरके भीतर स्थित देवी पार्वती ने स्वयं भी देवताओंका पूजन किया। तबसे लेकर वह चतुर्थी तिथि गुणेशकी तिथिके रूपमें प्रसिद्ध हो गयी, जो अनेक प्रकारके वर प्रदान करनेवाली है। अपने कल्याणकी प्राप्तिके लिये उस चतुर्थी तिथिको महान् उत्सव मनाना चाहिये।
४६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भगवान् गुणेशकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर यथाविधि उसका पूजन करना चाहिये॥ २८-२९॥ सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। उपवास करके रात्रिमें जागरण करना चाहिये। मोदक, अपूप तथा लड्डुओं और खीरका नैवेद्य लगाकर प्रभु गुणेशका पूजन करना चाहिये॥ ३०॥ दूसरे दिन यथाविधि इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करे। उन्हें प्रणाम करे, तदनन्तर स्वयं भी भोजन करे। जो इस चतुर्थी तिथिको भगवान् गुणेशकी मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर उनका पूजन नहीं करता है, वह बार-बार विघ्नोंके द्वारा बाधित होता है। इसीके साथ ही वह विविध रोगोंसे भी पीड़ित होता है। पतित व्यक्तिकी भाँति ऐसे व्यक्तिका कभी भी दर्शन नहीं करना चाहिये॥ ३१-३३॥ यदि कदाचित् ऐसे व्यक्तिका दर्शन हो जाय तो 'गुणेश' इस नामका मनमें स्मरण करना चाहिये। गणेशचतुर्थीकी महिमाका यथार्थरूपसे वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ। तथापि मैं उनके कर्मोंका यथामति निरूपण करता हूँ॥ ३४१/२॥ सिन्धुदैत्यके दूत गुप्तरूपसे भगवान् शंकरके स्थानपर निवास कर रहे थे। उन दूतोंने जा करके वहाँका सम्पूर्ण समाचार उस सिन्धु दैत्यको बतलाया। उस समय दैत्य सिन्धु बहुत-से योद्धाओंसे घिरा हुआ बैठा था। उसने अप्सराओंके नृत्य तथा गन्धर्वोंके गानका आयोजन किया हुआ था॥ ३५-३६१/२॥ दूत बोले—दक्षिण दिशाके दण्डकारण्यमें त्रिसन्ध्या नामक क्षेत्रमें हमलोग रह रहे थे। वहाँ रहते हुए हमने शिव नामवाले भगवान्को तथा अट्ठासी हजार मुनियोंके बहुत-से आश्रमोंको देखा॥ ३७-३८॥ एक दिनकी बात है, [शिवकी पत्नी] देवी पार्वतीने एक बालकको जन्म दिया। उसकी छः भुजाएँ थीं। वह लावण्यका खजाना था। तीनों लोकोंमें उसके समान कोई नहीं था और वह तेजसे उज्ज्वल था॥ ३९॥ अत्यन्त महान् उत्सवोंके साथ दस दिन बीत जानेपर ग्यारहवें दिन मुनिश्रेष्ठोंने तथा भगवान् शंकरने उस बालकका 'गुणेश' यह नाम रखा॥ ४०॥ उस समय वहाँ हो रहे वाद्योंके निनादसे हम लोग बधिर-से होकर वहाँ स्थित थे। यदि हम उस समय उसे सहसा पहुँचकर मारनेके लिये जाते तो वहाँ जो सात करोड़ गण थे, वे हमें मार डालते। उनमेंसे एक-एक गणका ऐसा बल-पराक्रम था कि वह पर्वतको उखाड़नेमें भी समर्थ था। तब फिर शीघ्र ही आपके पास आकर इस समाचारको कौन बतलाता ?॥ ४१-४२॥ ब्रह्माजी बोले—जब दूत इस प्रकार बोल ही रहे थे कि उस समय एक आकाशवाणी सुनायी पड़ी कि 'अरे दैत्य सिन्धु! तुम्हें मारनेवाला कहीं उत्पन्न हो चुका है, अतः तुम सावधान हो जाओ'॥ ४३॥ सिन्धु बोला—यहाँ कौन है, जो ऐसे दुष्ट वचन बोल रहा है, मारो, मार डालो॥ ४३१/२॥ ब्रह्माजी बोले—तब कुछ दैत्य तो उछल-कूद करते हुए गिर पड़े, और कुछ दौड़ते हुए पलायित हो गये। उसी समय वह दैत्य भी महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गया और भूमिपर गिर पड़ा। वह अत्यन्त चिन्तित, म्लान मुखवाला, उत्साहरहित और हतप्रभ हो गया॥ ४४-४५॥ जब मुहूर्तभरका समय बीत जानेपर उसे चेतना आयी तो वह लड़खड़ाती आवाजमें बोला—'तीनों लोकोंका कण्टक तो मैं हूँ, फिर मेरे लिये यह नया कंटक कौन आ गया ? ॥ ४६॥ बकरा सिंहको कैसे मार सकता है अथवा मच्छर क्या कभी हाथीको मार सकता है? मैंने तैंतीस करोड़ देवताओंको क्षणभरमें जीत लिया था॥ ४७॥ इस प्रकारके पराक्रमवाले मेरी मृत्यु किसके हाथोंमें हो सकती है? आकाशवाणी जो हुई, वह झूठी है, अथवा यदि वह सत्य भी हो तो मैं अपने उस शत्रुको खानेके लिये दौड़ पडूँगा'॥ ४८॥ ऐसा कहकर वह आधे क्षणमें [उठकर] भद्रासनपर बैठ गया। उसकी उस प्रकारकी बात सुनकर सभी वीर उसके पास चले आये और कहने लगे—आप तो कालके भी काल हैं, फिर आपकी मृत्यु कैसे हो सकती है? अथवा आपको कोई मारनेवाला हो तो उसे हम मार
क्री०ख०-अ०८३] * पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्का शिशुके दर्शनके लिये आना * ४६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 डालेंगे, चाहे वह स्वर्गमें हो, भूमिपर हो, पातालमें हो | अनेक प्रकारकी माया करके शत्रुका विनाशकर मुझे अथवा आकाशमें रह रहा हो। आप हमें आज्ञा प्रदान | समाचार दें॥ ५२१/२॥ करें, हम लोग जायँगे। तब दैत्यराज सिन्धुने उन दैत्योंसे | ब्रह्माजी बोले— इस प्रकार दैत्यराजकी आज्ञा प्राप्तकर कहा— ॥ ४९-५१॥ | वे असंख्य दैत्य वहाँसे निकल पड़े और त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें आप-जैसे मित्रों तथा सेवकोंकी वचनसुधाका | पहुँचकर गुप्तरूपसे वहाँ निवास करने लगे। उनके मनमें पानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आप लोग शीघ्र | यही विचार था कि गौरीका पुत्र गुणेश जहाँ-कहीं भी वहाँ जायँ, जहाँ मेरा वह शत्रु रहता है। आप लोग | होगा, उसे हम मायासे मार डालेंगे॥ ५३-५४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दैत्यवीरोंके त्रिसन्ध्याक्षेत्रमें गमनका वर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८२॥ तिरासीवाँ अध्याय पार्वतीको पुत्रकी प्राप्ति होनेपर हिमवान्का शिशुके दर्शनके लिये आना और उसे अनेक प्रकारसे आभूषणोंसे अलंकृतकर उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखना, फिर हिमालयका प्रस्थान, गृध्रासुरद्वारा बालक हेरम्बका हरणकर आकाशमें ले चलना, पार्वतीका शोक, बालक हेरम्बद्वारा गृध्रासुरका वध ब्रह्माजी बोले— हे ब्रह्मन् व्यासजी! वह बालक | लगा रहता है॥ ५१/२॥ गुणेश शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने | ब्रह्माजी बोले— पिताके इस प्रकारके वचनोंको लगा। पार्वतीको सुन्दर पुत्रकी प्राप्ति हुई है—यह | सुननेके पश्चात् पार्वतीजीने उन्हें बैठनेके लिये सुन्दर आसन समाचार जानकर पार्वतीके पिता हिमालय भी बहुत सारे | प्रदान किया। आसनपर बैठनेके अनन्तर गिरिवर हिमालय अनमोल रत्नोंसे समन्वित अलंकारोंको लेकर वहाँ गये। | पुनः अपनी पुत्रीसे कहने लगे—'मैंने देवर्षि नारदजीके मुखसे पिता हिमालयको अपने आँगनमें आया देखकर [उनकी] | सुना है कि तुम्हें परम अद्भुत पुत्रकी प्राप्ति हुई है, इसी कारण पुत्री पार्वतीजी दौड़कर उनके पास गयीं॥ १-२॥ | मैं सभी प्रकारके विघ्नोंका हरण करनेवाले उस मंगलमय बहुत समयके बाद आये हुए पिताका गौरीने | बालकको देखनेके लिये आया हूँ'॥ ६-७१/२॥ आनन्दपूर्वक आलिंगन किया। आनन्दके कारण उन | ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर पार्वतीजीने बालकको दोनों पिता-पुत्रीकी आँखोंसे आँसू निकल पड़े, तदनन्तर | लाकर पिताकी गोदमें बैठाया। तब पिता हिमवान्ने उसे गौरीने अपने पिता हिमालयसे कहा—॥ ३॥ | नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित किया और फिर वे गौरी बोली— हे निर्दय पिताजी! आप इतने | उसकी महिमाको बतलाने लगे॥ ८१/२॥ निष्ठुर क्यों हो गये हैं, आप न तो कभी मेरा समाचार | वे हिमालय बोले— यह महान् मायासम्पन्न ही लेते हैं और न अपना समाचार ही भेजते हैं ?॥ ४॥ | बालक इस पृथ्वीको उसी प्रकार निष्कंटक बना देगा, हिमवान् बोले— हे गौरी ! तुम सत्य ही कह रही | जैसे कि चन्द्रमा अपनी किरणोंसे इस पृथिवीको शीतल हो। तुम्हारे बिना मेरे प्राण तो कण्ठमें आकर रुक गये | बना देता है। यह सभी देवताओंको अपने-अपने हैं, अतः हे हरप्रिये! तुम्हें देखनेकी अभिलाषावाला मैं | स्थानपर प्रतिष्ठित करेगा॥ ९-१०॥ यहाँ आया हूँ। जैसे गौका मन हर समय अपने बछड़ेपर | यह तुम्हारे चरणोंकी सेवा करेगा और इसके लगा रहता है, वैसे ही मेरा मन भी निरन्तर तुममें ही | चरणोंकी सेवा मुनीश्वर करेंगे। सभी स्थावर तथा जंगम
४६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] प्राणी इसीके रूप हैं। यह ब्रह्मा आदि देवोंके लिये सदा ध्येय है। यह हजार नेत्रोंवाला, हजार चरणोंवाला तथा सभी ब्रह्माण्डोंके कारणोंका भी कारण है॥ ११-१२॥ यह हजार मुखवाला, अनन्त मूर्तियोंवाला तथा समष्टि और व्यष्टिरूप है। मैंने तीनों लोकोंमें इस प्रकारका तेजोमय बालक कहीं भी नहीं देखा है॥ १३॥ मैं इसके चरणकमलका दर्शनकर उसमें वैसे ही तल्लीन हो गया, जैसे कि जलमें छोड़ा गया जल क्षणभरमें ही तन्मय अर्थात् उसी रूपवाला हो जाता है। हे शुभे! इसके पालन-पोषणका प्रयत्न करो, यह पुरातन निधि है॥ १४ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर पर्वतराज हिमालयने उसके मस्तकपर मुकुट पहनाया, दोनों भुजाओंपर बाजूबन्द धारण कराये, हृदयदेशमें कमलकी आकृतिका आभूषण पहनाया, दोनों कानोंमें रत्नजटित कुण्डल पहनाये, कमरमें करधनी धारण करवायी और पैरोंमें छोटी घण्टियोंसे युक्त बहुमूल्य नूपुरोंको धारण करवाया। इस प्रकार विविध आभूषणोंसे सुसज्जितकर हिमवान्ने उसका 'हेरम्ब' यह नाम रखा। यह नाम महान् विघ्नोंका हरण करनेवाला तथा भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाला है॥ १५-१७॥ तदनन्तर भोजन करनेके उपरान्त पुत्री पार्वतीकी अनुमति प्राप्तकर पर्वतराज हिमालयने अपने स्थानको प्रस्थान कर दिया। एक दिनकी बात है, बालक हेरम्ब अपने भवनमें खेल रहे थे, उसी समय गृध्रासुर नामक एक असुर गीधका रूप धारणकर वहाँ आया। वह महान् बलवान् तथा अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न था। उसके पंखोंकी हवासे पर्वतोंके समूह चूर-चूर हो जाते थे और उसके पंजोंके आघातसे विशाल पर्वतशिखर तथा वृक्ष भी गिरकर टूट जाते थे॥ १८-१९ १/२॥ उस समय गृध्रासुरने [हेरम्बको उठा लिया और] अपने पंखोंकी छायासे बालक हेरम्बको आच्छादित करके आकाशमें उड़ने लगा॥ २०॥ उसने अपने पंखोंकी फड़फड़ाहटसे उठी हुई धूलके द्वारा सभीके नेत्रोंको आच्छादित कर दिया था। [उसके पंखोंसे होनेवाली] महान् ध्वनिसे लोगोंके कान
[दायाँ स्तम्भ] बधिर हो गये। तदनन्तर उस महान् गृध्रासुरने अपनी चोंचके द्वारा बालक हेरम्बको वैसे ही पकड़ लिया, जैसे कि गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है और वह आकाशमार्गमें दूरतक चला गया॥ २१-२२॥ बालकके पराक्रमको न जानता हुआ वह दुष्ट असुर आकाशमें भ्रमण करने लगा। तभी गिरिपुत्री पार्वतीने देखा कि मेरा बालक कहाँ चला गया!॥ २३॥ जब उन्होंने आँगनमें बालकको नहीं देखा तो वे शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और कहने लगीं— किस दुष्ट दुरात्माने मेरे बालकका हरण कर लिया है? तदनन्तर उन्होंने ऊपर आकाशमें गृध्रके मुखमें अपने बालकको देखा। वे मूर्च्छित होकर भूमिमें गिर पड़ीं और 'दौड़ो-दौड़ो'—इस प्रकारसे कहने लगीं॥ २४-२५॥ हे सुरेश्वर! बिना पुत्रके मेरे प्राण निकल जायँगे। क्यों मेरे ऊपर यह आकाश गिर पड़ा है? जगदीश्वर शंकर क्यों मुझपर ही इस प्रकारसे निष्ठुर हो गये हैं? मैंने तो बारह वर्षोंतक निराहार रहकर व्रत किया था। तब वे करुणासागर स्वयंप्रकाश प्रभु मेरे घरमें अवतरित हुए थे, आज वे ही निधिरूप मुझ अभागिनके पापसंचयके फलस्वरूप चले गये हैं, मेरे बालकके चले जानेपर मेरा जो आत्यन्तिक सुख है, वह सर्वथा चला गया है॥ २६-२८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे उन पार्वतीको शोकमें पड़ा देखकर उनकी सखियाँ भी दुखी हो गयीं। तब उन्होंने अपने बुद्धिबलसे युक्तियोंके द्वारा उनका समाधान किया कि—'[हे देवि!] वह बालक आदि और अन्तसे रहित है, अतः उसके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये॥ २९-३०॥ आपके तपस्यारूपी महान् अनुष्ठानके फलस्वरूप वे स्वयंप्रकाशस्वरूप आपके यहाँ अवतरित हुए हैं। बतलाओ तो सही, क्या कहीं कोई मिट्टीकी मूर्ति सजीव हुई है? हे शुभे! आप स्वस्थ हो जायँ, क्षणभरमें ही आप अपने पुत्रको देखेंगी, वह बालक कालका भी काल है, वह आपके स्नेहवश शीघ्र ही आयेगा'॥ ३१-३२॥ जिस समय सखियाँ इस प्रकारसे कह रही थीं, उसी समय उस बलवान् बालकने अपनी मुट्ठीमें उस
क्री०ख०-अ०८४ ] * बालक हेरम्बकी बाल-लीलामें दैत्योंके वधका आख्यान * ४६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गृध्रासुरकी चोंचको पकड़ लिया, जिससे उसकी साँस बाहर न निकल सकी ॥ ३३ ॥ श्वासके रुक जानेसे वह गृध्र प्राणहीन हो गया और उस बालकसहित वह भूमितलपर उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे कि वज्रसे आहत होकर पर्वत गिर पड़ता है। गिरते हुए उस गृध्रासुरकी दस योजन विस्तारवाली देहसे बहुत-से घर आदि चूर-चूर हो गये। यह एक महान् आश्चर्यजनक बात हुई! देवालय आदिमें स्थित वृक्षोंके टूट जानेसे पक्षिगण दिशाओंमें भाग चले। तब उस बालकको देखकर सखियाँ कहने लगीं—यह पार्वतीका पुत्र इस प्रकारसे गिरा है कि इसके शरीरमें कहीं भी चोट नहीं लगी है ॥ ३४-३६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—सखिजनोंका इस प्रकारका वचन सुनकर गौरीने शीघ्र ही बालकको पकड़ लिया और उसे अपने हृदयसे लगाकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ। उन्होंने [अरिष्टनिवारणार्थ] अनेकों प्रकारके दान दिये ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा—हे द्विजो ! इस समय तो इस बालकका महान् अरिष्ट चला गया है, आगे भी न हो, ऐसा कहकर ब्राह्मणोंको नमस्कार करके पार्वतीजी अपने भवनमें चली गयीं ॥ ३९ ॥ कहाँ तो वह दस योजन विस्तारवाला पराक्रमी गृध्रासुर और कहाँ यह कोमल शरीरवाला छोटा बालक ! फिर भी इसने उस असुरको मार डाला ॥ ४० ॥ इस समय बालकपनमें जब इसका इतना बल है, तो आगे चलकर यह न जाने क्या करेगा? इसे छोटा नहीं समझना चाहिये, जिस प्रकार आगकी एक चिनगारी विशाल काष्ठसमूहको भस्म कर डालती है, वैसे ही इसने भी उस विशाल असुरको मार डाला है ॥ ४१ १/२ ॥ गौरीने इस प्रकारकी बात अपनी सखियोंसे कही और फिर उन्होंने प्रसन्न होकर बालकको स्तनपान कराया। तदनन्तर शिवगणोंने उस गृध्रासुरकी देहके टुकड़ोंको दूर ले जाकर फेंक दिया। जो इस आख्यानका श्रवण करता है, वह असुरोंके द्वारा पराजित नहीं होता ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गृध्रासुरवधवर्णन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥ चौरासीवाँ अध्याय बालक हेरम्बकी बाल-लीलाद्वारा क्षेम, कुशल, क्रूर तथा बालासुर आदि दैत्योंके वधका आख्यान ब्रह्माजी बोले—बालक हेरम्बके दूसरे मासमें सायंकालके समय पार्वतीने उसे उबटन आदि लगाकर पालनेमें रखा और वे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक गीत गाने लगीं। उसी समय क्षेम तथा कुशल नामक दो दैत्य, जो बालक हेरम्बका वध करना चाहते थे, वे दोनों मायावी चूहेका रूप धारणकर वहाँ आये ॥ १-२ ॥ नख तथा दाँत ही उन दोनोंके आयुधरूप थे, ऐसे वे दोनों भयानक चूहे घरके अन्दर आये और जहाँपर बालक हेरम्ब पालनेपर लेटा था, वहींपर आकर परस्पर लड़ने लगे। उन दोनों दुष्टोंके शरीरके बाल खड़े हो गये थे ॥ ३ ॥ उन दोनों चूहोंके चीत्कार शब्दसे कान बहरे हो गये थे तथा उनके पैरोंके आघातसे वहाँकी सम्पूर्ण भूमि जोती हुई भूमिके समान कृषियोग्य हो गयी। तब देवी पार्वती लाठी लेकर उन दोनों चूहोंको डराने लगीं तो भागते हुए वे दोनों ऊपरकी ओर जाने लगे ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए वे दोनों भयानक चूहे बालक हेरम्बके ऊपर गिरे। वक्षःस्थलमें चोट लगनेके कारण कर्कश शब्द करता हुआ वह श्रेष्ठ बालक हेरम्ब जग पड़ा। उस समय वे पार्वती डर गयीं। भयभीत हुएके समान बालकने भी अपने दोनों हाथोंको इधर-उधर चलाया। बालकके हाथोंके उस प्रहारसे वे दोनों प्राणहीन-से होकर भूमिपर गिर पड़े। उन दोनोंके मुखसे रक्त प्रवाहित हो रहा था। यह दृश्य देखकर पार्वतीजी अत्यन्त घबड़ा गयीं ॥ ६-८ ॥
४६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जब उन चूहोंके प्राण पूरी तरह नहीं निकले थे, | देवी पार्वती अपने बालकको लेकर शय्यापर सोयी थीं। उससे पूर्व ही भगवान् शिवके गण उन्हें फेंकनेके लिये | उस समय उनकी जो सेविकाएँ थीं, उनमेंसे कुछ तो सो बाहर ले गये। गणेशजीके हाथोंका आघात लगनेके | गयी थीं और कुछ दूसरे कार्योंमें लगी हुई थीं॥ १९-२०॥ फलस्वरूप वे दोनों मोक्षको प्राप्त हुए॥ ९॥ | कुछ सेविकाएँ भवनके द्वारपर बैठकर वार्तालाप दस योजन विस्तारवाले तथा महान् भयंकर उन | कर रही थीं। उसी समय क्रूर नामक असुर विडालका दोनों असुरोंके देह जब बाहर गिरे तो उन्हें देखकर | रूप धारणकर देवी पार्वतीके घरमें प्रविष्ट हुआ॥ २१॥ शिवके गणों, पार्वती तथा उनकी सखियोंका उस समय | वह महाबली दुष्ट असुर लोगोंकी नजर बचाता महान् कोलाहल होने लगा॥ १०१/२ ॥ | हुआ कुत्तेके समान वहाँ गया। पार्वतीजीको सोया हुआ उन दोनों असुरोंके प्राणरहित विस्तृत आकारवाले | देखकर वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ कि जबतक शरीरोंके गिरनेसे आश्रम, वृक्ष, पर्वत तथा घर विध्वस्त | ये गिरिजा सोती रहती हैं, उसी बीच मैं इस शिशुको उठा हो गये। तब शिवके गण उनके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े | ले जाऊँगा। वह शीघ्र ही पलंगके ऊपर चढ़ गया और करके बाहर फेंकनेके लिये ले गये॥ ११-१२॥ | बालकको अपने मुखमें पकड़कर शीघ्र ही पलंगसे नीचे उस समय पार्वती अत्यन्त भयभीत हो गयीं, उन्होंने | कूदा। उस समय बालक रोने लगा॥ २२-२३१/२ ॥ शीघ्र ही बालकको गोदमें ले लिया और वे पुत्रके प्रति | उसी समय पार्वतीजी नींदसे जग पड़ीं, उन्होंने वात्सल्यभावके कारण स्नेहपूर्वक अपना स्तनपान कराने | विडालके मुखमें अपने बालकको देखा तो वे भयसे लगीं। उसी समय पुण्यमयी ऋषिपत्नियां वहाँ आ पहुँचीं | विह्वल हो उठीं और 'दौड़ो-दौड़ो' इस प्रकारसे चिल्लाने और पार्वतीजीसे बोलीं-हे गौरी ! तुम्हारा महान् पुण्य | लगीं। दुःख तथा भयसे उनके नेत्र बन्द हो गये। उन्हें है, जिसके कारण यह विघ्न नष्ट हो गया है। इस दो | मूर्च्छा आ गयी॥ २४-२५॥ मासकी अवस्थावाले बालकने दुष्ट महान् असुरोंको मार | जबतक वह विडाल बालकके कण्ठमें दाँत चुभाता, डाला है। आगे भी तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं | उससे पहले ही बालकने उसके दोनों कानोंको अपने होगा॥ १३-१५॥ | दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और बालस्वभाववश अपने हे माता! यह भूमि राक्षसभूमि है, अतः यहाँ | पैरोंसे उसके सिरपर आघात किया तथा उस महान् शिशुकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। गुप्त रूपसे | असुरको पलंगसे नीचे गिरा दिया। उस विडालका हृदय यहाँ रहनेवाले राक्षस तथा दूसरे मायावी असुर इस | विदीर्ण हो गया और वह बाहर जाकर उसी प्रकार गिर बालकका हरण कर सकते हैं॥ १६॥ | पड़ा, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्षसे थोड़ा-सा पका हुआ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे ऋषिपत्नियां | फल गिराया जाता है। उसका दुर्गन्धयुक्त रक्त भूमिपर चली गयीं, तब शिवगणोंने देवी पार्वतीसे कहा- हे | गिरने लगा॥ २६-२८॥ शिवे! आपका यह बालक तो प्रतिदिन असुरोंका वध | तब उस समय शोकसे विह्वल गिरिजाने दुर्गन्धसे करेगा, ऐसेमें हम लोगोंके द्वारा कबतक मरे हुए | बचनेके लिये अपनी नाक बन्द कर ली और वहाँ पहुँचकर असुरोंको बाहर फेंका जायगा? उसी समय मुनिगण वहाँ | उन्होंने झटसे बालकको पकड़कर प्रीतिपूर्वक अपना आ पहुँचे और उन्होंने रक्षामन्त्रोंके पाठसे उस बालकको | स्तनपान कराया। बालकके रुदनकी ध्वनि सुनकर सभी अभिमन्त्रित किया। देवीने उन्हें अनेक प्रकारके दान | सेविकाएँ वहाँ आ पहुँचीं और कौतूहलयुक्त होकर प्रत्येक दिये, फिर उन्हें प्रणामकर विदा किया॥ १७-१८१/२ ॥ | सेविका उस बालकके अंगोंको छूने लगी॥ २९-३०॥ तीसरे मासकी बात है, एक दिन जब सभी लोग | वे उस बालकके विषयमें दृढ़मति थीं कि यह अपने-अपने कार्यमें व्यस्त थे। मध्याह्नकालका समय था। | बालक अजर-अमर है। उस समय वह विडाल बारह
क्री०ख०-अ०८४ ] * बालक हेरम्बकी बाल-लीलामें दैत्योंके वधका आख्यान * ४६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 योजन विस्तारवाला हो गया॥ ३१ ॥ उसके गिरनेसे कुछ सखियाँ चूर-चूर हो गयी थीं और कितनी ही सेविकाएँ भी चूर-चूर हो गयीं। उस समय भगवान् शिवके गण भी उस प्रकारके विडालको देखने वहाँ आये। वे बालकके बल-पराक्रमको देखकर परम आश्चर्य करने लगे और कहने लगे कि कहाँ तो यह अनेक प्रकारकी माया करनेवाला दुष्ट दैत्य और कहाँ बालकका चरण-प्रहार ? ॥ ३२-३३॥ जो दैत्य इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी सर्वथा अवध्य थे, उन्हें यह बालक लीलामें ही मार गिरा रहा है! ऐसा कहकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे शिवगण अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ३४ ॥ कुछ बलवान् गणोंने उस दैत्यको कमरसे पकड़कर खींचते हुए बाहर ले जाकर छोड़ा। तदनन्तर वे देवी पार्वती अपने भवनके अन्दर गयीं ॥ ३५ ॥ चौथे मासमें सूर्यके उत्तरायण होनेपर मुनिपत्नियाँ विविध प्रकारके सौभाग्य-द्रव्योंको लेकर पार्वतीके मंगलमय भवनमें आयीं, उनमेंसे कुछ अपने बालकोंको साथ लायी थीं और कुछ अकेले ही आयी थीं। तब देवी पार्वती ने आसन आदि प्रदानकर उनका सत्कार किया ॥ ३६-३७ ॥ अपने बालकको गोदमें पकड़े हुए ही पार्वती ने उन मुनिपत्नियोंको नमस्कार किया। वे सभी हरिद्रा तथा कुंकुमके द्वारा परस्पर एक-दूसरेका पूजन करने लगीं ॥ ३८ ॥ उस समय उन मुनिपत्नियोंने अपने चलनेवाले बालकोंको तथा जो अभी ठीकसे चलना नहीं जानते थे, उन शिशुओंको भूमिपर बैठाया हुआ था। तब देवी पार्वतीका बालक भी उन बालकोंके साथ क्रीडा करने लगा। उस पार्वतीपुत्रकी शोभासे वे सभी बालक ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रमाके द्वारा अन्य तारे सुशोभित होते हैं। यह दृश्य देखकर वे मुनिपत्नियाँ गिरिपुत्री पार्वतीसे इस प्रकार कहने लगीं- ॥ ३९-४० ॥ हे गौरी ! भगवान् शिवके द्वारा प्रदत्त इस तेजस्वी पुत्रको पाकर तुम धन्य हो। तुम्हारे बालकका सान्निध्य पाकर हमारे बालक भी प्रकाशमान-से दिखायी देते हैं ॥ ४१ ॥ पारसमणिका संयोग प्राप्तकर लोहा भी अपने लोहत्वको समाप्तकर सुवर्ण हो जाता है। इस प्रकार कौतुकसम्पन्न वे सभी मुनिपत्नियाँ हलदी, कुमकुम, ईंखके टुकड़े, चन्दन, गुंजक, तिल, गुड़, ताड़पत्र तथा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे परस्पर एक-दूसरेका पूजन करने लगीं। कोई-कोई शरीरमें तथा मुखमण्डलमें हलदीका उबटन लगा रही थीं ॥ ४२-४३ १/२ ॥ उसी बीच बालासुर नामका महान् दैत्य समान अवस्थावाला बालक बनकर उन बालकोंके साथ क्रीडा करनेके लिये वहाँ आ पहुँचा। वह पार्वतीपुत्रके साथ मनोविनोदके रूपमें युद्ध-सा करता हुआ, वैसे ही क्रीड़ा करने लगा, जैसे कोई सियार सिंहके साथ और जैसे कोई महिष हाथीके साथ खेलता हो। वे दोनों कठोर बनकर गलेसे गलेको रगड़ते हुए भूमिपर गिर रहे थे ॥ ४४-४६ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट असुरने अपने दोनों पैरोंसे गजाननके मस्तकपर प्रहार किया और वह अपने दोनों हाथोंसे बालक विनायकके बालोंको पकड़कर जोरसे खींचने लगा। इतना ही नहीं, वह दुष्ट उसी प्रकारकी ध्वनि करने लगा, जैसे रात्रिमें वृद्ध सियार चिल्लाता है। उन दोनोंको वैसी स्थितिमें देखकर वे गिरिजा उन मुनिपत्नियोंसे कहने लगीं। यह बलवान् बालक किस ऋषिका है, जो मेरे पुत्रको मार रहा है ? यह दुष्ट गधेकी भाँति प्रहर-प्रहरमें चिल्ला रहा है ॥ ४७-४९॥ तदनन्तर बालकोंका ऐसा स्वभाव ही होता है, यह समझकर पार्वती उस ओरसे उदासीन हो गयीं। वे दोनों अत्यन्त प्रिय बालक बार-बार लोट-पोट करने लगे ॥ ५० ॥ वे दोनों बालक एक-दूसरेके सिरके बालोंको सभी ओरसे पकड़कर खींच रहे थे। स्वयं हँस भी रहे थे और अन्य बालकों तथा मुनियोंकी स्त्रियोंको हँसा भी रहे थे। बालक विनायक जान रहे थे कि यह महान् दैत्य है, फिर भी वे उसके साथ खेल रहे थे। तदनन्तर उस दुष्ट बालासुरने अपने दोनों हाथोंसे गणनायक गणेशके कण्ठदेशको इस प्रकार कसकर पकड़ा, ताकि उनके प्राण निकल जायँ। तब विनायकने भी उसी प्रकारसे उस बालासुरको पकड़ा। अब तो असुरकी साँस रुकने लगी ॥ ५१-५३ ॥ उस दैत्यपुत्र (बालरूप दैत्य) को विह्वल देखकर वे
४७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुनिपत्नियाँ अत्यन्त चिन्तित हो उठीं और चिल्लाने लगीं | वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ गिर पड़ा। यह देखकर कि निश्चित ही इस विनायकने इस बच्चेको मार डाला है। | सभी स्त्रियाँ अत्यन्त भयभीत हो गयीं और वे अपने- कुछ स्त्रियाँ दौड़ती हुई उनके पास गयीं, किंतु वे उन | अपने बालकोंको लेकर शीघ्र ही उसी प्रकार दौड़ पड़ीं, दोनोंको छुड़ानेमें समर्थ नहीं हो सकीं। तदनन्तर वे सभी | जैसे कि भेड़ियोंके समूहको देखकर गायें और बकरियाँ पुरुष तथा स्त्रियाँ उन मंगलमयी पार्वतीसे कहने लगीं— | भयभीत होकर दौड़ पड़ती हैं। तदनन्तर पार्वती ने भी 'तुम इसे छुड़ा डालो। यह विनायक निश्चित ही इस | अपने पुत्रको पकड़कर उसके ऊपर मिट्टी घुमाकर उसे मुनिपुत्र को मार डालेगा।' तदनन्तर पार्वती ने विनायकसे | स्तनपान कराया और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा शान्तिकर्म कहा—'इस बालकको छोड़ दो-छोड़ दो ॥ ५४-५६ ॥ | करवाकर तथा उन्हें अनेक प्रकारके दान देकर बहुत- अगर कहीं यह मर गया तो तपोबलसे सम्पन्न | से आशीर्वाद ग्रहण किये ॥ ६०-६२ ॥ मुनिगण हमें शाप दे डालेंगे। इस ब्रह्माण्डगोलकमें | मैं तो इन असुरोंकी मायाको नहीं जानती हूँ, कितने प्राणदानसे अधिक पुण्य और कोई नहीं है। उन मुनियोंके | ही असुर मेरे बालकको मारनेके लिये आते रहते हैं, किंतु शापसे तुम्हारी महान् शक्ति लुप्त हो जायगी' ॥ ५७१/२ ॥ | वे महान् दुष्ट असुर इसके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो जाते ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे पार्वती जब | हैं। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन विनायकको मना कर रही थीं, उसी समय क्षणभरमें | समर्थ हो सकता है? ॥ ६३१/२ ॥ नेत्रोंके मार्गसे उस असुरके प्राण बुद्बुदकी भाँति निकल | ब्रह्माजी बोले—देवी पार्वतीके ऐसे वचनोंको पड़े। तब सभीने उस मृत दैत्यको देखा, वह दस | सुनकर वे सभी मुनिपत्नियाँ वापस चली गयीं। तब उन योजन विस्तारवाला था ॥ ५८-५९ ॥ | शिवगणोंने उस असुरको दूर फेंक दिया और स्नान उसका मुख अत्यन्त विकराल था। वह बड़े-बड़े | करनेके अनन्तर वे अपने स्थानको चले गये ॥ ६४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालासुरके वधका वर्णन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥
पचासीवाँ अध्याय महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना, मरीचिद्वारा देवी पार्वतीसे विनायकके परब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन, बालककी रक्षाके लिये महर्षिका गणेशकवच बतलाना, गणेशकवचका माहात्म्य तथा उसकी उपदेश-परम्परा ब्रह्माजी बोले—विनायकके पाँचवें मासके आरम्भ | करके पार्वती ने अपनी सखियोंके सहित उनके चरणोंमें होनेपर मुनियोंके मुखसे देवी पार्वतीके महान् बलशाली | विनम्र प्रणाम किया ॥ २-३ ॥ पुत्रका समाचार सुनकर महर्षि मरीचि उसको देखनेके | उन्हें आसनपर विराजमान करके भक्ति-श्रद्धापूर्वक लिये आये ॥ १ ॥ | उनके चरणोंका प्रक्षालन किया और उस पवित्र जलका महर्षि मरीचि भूत-भविष्य तथा वर्तमान तीनों | प्रसन्नतापूर्वक पान करनेके साथ ही उससे अपने सारे कालोंके ज्ञाता थे। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें | घरका भी सेचनकर उसे पवित्र किया ॥ ४ ॥ उनकी समान दृष्टि थी। वे वेद एवं शास्त्रोंके तत्त्वको | देवी पार्वती ने सोलह उपचारोंके द्वारा भगवद्बुद्धिसे जाननेवाले थे। यह अपना है, यह पराया है—इस | उनका पूजन किया और वे प्रसन्नतापूर्वक बोलीं— प्रकारकी भेददृष्टिसे वे परे थे। वे मनसे ही जगत्की | आज आपके दुर्लभ चरणोंका मुझे भाग्यवश दर्शन सृष्टि, पालन और संहार करनेमें समर्थ थे। उनका दर्शन | प्राप्त हुआ है ॥ ५ ॥
क्री०ख०-अ०८५ ] * महर्षि मरीचिका पार्वतीपुत्रका दर्शन करनेके लिये आना * ४७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
मुनि मरीचि बोले—हे देवि! मेरा मन निरन्तर आत्मचिन्तनमें लगा रहता है, मैं कहीं आता-जाता नहीं हूँ। किंतु अकस्मात् ही आपका पुत्र मेरे ध्यानमें आ गया। इसीलिये मैं आपके पुत्रके, आपके तथा भगवान् शिवके दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ आया हूँ॥ ६१/२॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षि मरीचिके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर गौरी पार्वतीका मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने अपने पुत्र विनायकको उनकी गोदमें बैठा दिया। फिर वे उनसे कहने लगीं—आज आपका दर्शनकर मेरा महान् भाग्य सफल हो गया है। आज मुझे परम पुण्यकी प्राप्ति हुई है और भविष्यमें भी शुभ ही होगा॥ ७-८१/२॥ मुनि बोले—हे गौरी! आपका यह पुत्र मुझे परब्रह्मस्वरूप प्रतीत होता है। मूलाधार आदि षट्चक्रोंके भेदनमें जो योगनिष्ठ महर्षि निरन्तर संलग्न रहते हैं और मात्र वायुका सेवन करते हुए जिन परमात्माकी उपासना करते रहते हैं, वे ही आपके पुत्रके रूपमें अवतरित हुए हैं॥ ९-१०॥ सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके भेदसे जो ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवके नामसे तीन विग्रह धारणकर सृष्टि, पालन तथा संहार—इन तीन क्रियाओंको सम्पन्न करते हैं और जिनकी सत्तासे ही शेषनाग भी इस पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण किये रहते हैं, वे ही परमात्मा आपके पुत्ररूपमें अवतरित हुए हैं॥ ११॥ ये ही अणुरूप तथा स्थूलरूप हैं और सत्ताईस तत्त्वोंके भी कर्ता हैं। यह चराचर सम्पूर्ण जगत् इन्हींका रूप है। ये सभी प्रकारके कर्म करनेवाले हैं॥ १२॥ ये सत्ययुगमें दस भुजाओंवाले तथा सिंहपर आरूढ़ रहते हैं, तब इनका नाम 'विनायक' होता है। त्रेतायुगमें इनकी छः भुजाएँ और इनका वाहन मोर होता है। इनकी आभा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल होती है और तब इनका नाम 'मयूरेश' होता है। उस समय ये अनेकों दैत्योंका वध करते हैं। द्वापरयुगमें ये देव चार भुजाओंवाले और रक्तवर्णवाले होते हैं। इस युगमें इनका 'गजानन' यह नाम प्रसिद्ध है। कलियुगमें ये धूम्र वर्णवाले रहते हैं, इनकी दो भुजाएँ रहती हैं, ये सभी दैत्योंका वध करते
हैं और 'धूम्रकेतु' इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त होते हैं। हे गौरी! आपको दैत्योंसे सदा ही इनकी रक्षा करनी चाहिये॥ १३-१५१/२॥ पार्वतीजी बोलीं—हे मुनिसत्तम! यह गणेश अत्यन्त चंचल है; यह बाल्यावस्थामें ही असुरोंका संहार कर रहा है। आगे चलकर यह न जाने क्या करेगा? दैत्य अनेक प्रकारके रूपोंवाले, दुष्ट, खल स्वभाववाले और सज्जनों तथा देवताओंसे द्रोह करनेवाले हैं। अतः रक्षाके लिये इसके कण्ठमें आप कुछ बाँध दीजिये॥ १६-१७१/२॥ मुनि बोले—हे पार्वति! सत्ययुगमें आठ भुजावाले सिंहारूढ विनायकका, त्रेतायुगमें छः भुजावाले सिद्धिप्रदायक तथा मयूरवाहन विनायकका, द्वापरमें रक्त वर्णवाले सुगन्धित द्रव्यके लेपसे विभूषित चार भुजाओंवाले प्रभु गजाननका और कलियुगमें उज्ज्वल वर्णवाले, सुन्दर दो भुजाओंसे युक्त तथा सर्वदा सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले गणेशका ध्यान करना चाहिये॥ १८-१९॥ परात्पर परमात्मा विनायक शिखाकी रक्षा करें, अति सुन्दर शरीरवाले सुमहोट्कट मस्तककी रक्षा करें॥ २०॥ कश्यपपुत्र ललाटकी रक्षा करें, महोदर भ्रूयुगोंकी रक्षा करें, भालचन्द्र दोनों नेत्रोंकी रक्षा करें और गजानन कोमल ओष्ठोंकी रक्षा करें॥ २१॥ गणक्रीड जिह्वाकी रक्षा करें, गिरिजासुत चिबुककी रक्षा करें, विनायक वाणीकी रक्षा करें तथा दुर्मुख दाँतोंकी रक्षा करें। पाशपाणि कानोंकी रक्षा करें, नासिकाकी रक्षा चिन्तितार्थ करें, गणेश मुखकी रक्षा करें एवं भगवान् गणंजय कण्ठकी रक्षा करें॥ २२-२३॥ गजस्कन्ध स्कन्धोंकी रक्षा करें, विघ्नविनाशन स्तनोंकी रक्षा करें, गणनाथ हृदयकी रक्षा करें और महान् हेरम्ब जठरकी रक्षा करें॥ २४॥ धराधर पार्श्वोंकी रक्षा करें, मंगलमय विघ्नहर पृष्ठकी रक्षा करें और महाबल वक्रतुण्ड लिंग तथा गुह्यदेशकी सदा रक्षा करें। गणक्रीड जानु तथा जंघोंकी रक्षा करें, मंगलमूर्तिमान् ऊरूकी रक्षा करें और महाबुद्धिमान् एकदन्त चरणों तथा गुल्फोंकी सदा रक्षा करें॥ २५-२६॥ क्षिप्रप्रसादन बाहुओंकी रक्षा करें, आशाप्रपूरक
४७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हाथोंकी रक्षा करें और हाथमें कमल लिये हुए अरिनाशन अंगुलियों और नखोंकी रक्षा करें ॥ २७ ॥ विश्वव्यापी मयूरेश सभी अंगोंकी सदा रक्षा करें और जिन स्थानोंका उल्लेख नहीं किया गया है, उनकी भी रक्षा सदा धूम्रकेतु करें। आमोद आगेसे रक्षा करें, प्रमोद पीछेसे रक्षा करें, बुद्धीश पूर्वमें रक्षा करें और सिद्धिदायक आग्नेय दिशामें रक्षा करें ॥ २८-२९ ॥ उमापुत्र दक्षिण दिशामें रक्षा करें, नैर्ऋत्यकोणमें गणेश्वर रक्षा करें, विघ्नहर्ता पश्चिम दिशामें एवं गजकर्णक वायव्य दिशामें रक्षा करें ॥ ३० ॥ निधिपति उत्तर दिशामें रक्षा करें, ईशनन्दन ईशानदिशामें रक्षा करें, इलानन्दन दिवामें रक्षा करें तथा रात्रि और सन्ध्याकालोंमें विघ्नहृत् रक्षा करें। राक्षस, असुर, वेताल ग्रह, भूत, पिशाचसे और सत्त्व-रज-तम गुणोंसे स्मृतिकी पाशांकुशधर रक्षा करें ॥ ३१-३२ ॥ ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति, दया, कुल, शरीर, धन-धान्य, गृह, स्त्री-पुत्र तथा मित्रोंकी एवं पौत्रोंकी सर्वदा रक्षा सभी प्रकारके अस्त्र धारण करनेवाले मयूरेश करें। कपिल भेड़-बकरोंकी रक्षा करें और विकट गाय [हाथी]-घोड़ोंकी रक्षा करें ॥ ३३-३४ ॥ जो विद्वान् भूर्जपत्रमें इसे लिख करके कण्ठमें धारण करता है, उसको यक्ष, राक्षस तथा पिशाचोंसे भय नहीं होता है। जो तीनों सन्ध्या-कालोंमें इसका जप करता है, उसका शरीर हीरेकी भाँति कठोर हो जाता है। जो व्यक्ति यात्राकालमें इसका पाठ करता है, उसे निर्विघ्नतापूर्वक फल प्राप्त होता है ॥ ३५-३६ ॥ जो युद्धकालमें इसका पाठ करता है, वह निश्चितरूपसे विजय प्राप्त करता है। मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन तथा मोहनादि कर्मके लिये यदि साधक इक्कीस दिनपर्यन्त प्रतिदिन सात बार इसका जप करे तो वह उन-उन वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें भी संशय नहीं है। जो इक्कीस दिनतक इस मन्त्रका इक्कीस बार पाठ करता है, वह राजाके द्वारा वधके लिये आदेशप्राप्त और कारागारमें बन्द किये गये व्यक्तिको भी शीघ्र ही मुक्त करा लेता है ॥ ३७-३९ ॥ राजाके दर्शनके समय जो व्यक्ति इस मन्त्रका तीन बार पाठ करता है, वह राजाको वशमें करके मन्त्रियोंको तथा राजसभाको जीत लेता है ॥ ४० ॥ यह गणेशकवच सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और सभी प्रकारकी मनोकामनाको पूर्ण करनेवाला है। इस गणेशकवचको महर्षि कश्यपने मुद्गल ऋषिसे कहा और उन्होंने महर्षि माण्डव्यसे कहा और माण्डव्यने इस सर्वसिद्धिप्रद कवचको कृपा करके मुझसे कहा है। इस शुभ कवचको श्रद्धावान्को ही देना चाहिये, भक्तिहीन व्यक्तिको कभी भी नहीं देना चाहिये। इस कवचके द्वारा इस (बालक)-की रक्षा की गयी है, इस कारणसे राक्षस, असुर, वेताल, दैत्य, दानव आदिसे होनेवाली किसी प्रकारकी भी बाधा इसे नहीं हो सकती है ॥ ४१-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गणेशकवचवर्णन' नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥ छियासीवाँ अध्याय गौतम आदि महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक संस्कार सम्पन्न किया जाना, बालकके वधकी इच्छासे व्योमासुरका वहाँ आना, बालकद्वारा व्योमासुरका वध ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर गौरीने उन महर्षि मरीचिकी गोदसे पुत्रको उठा लिया और उन्हें नमस्कार करके तथा उनसे अनुमति लेकर वे अत्यन्त हर्षित होकर अपने भवनमें चली गयीं ॥ १ ॥ वे महर्षि भी उनसे अनुमति प्राप्तकर भगवान् शिवको प्रणामकर अपने आश्रमको गये। तदनन्तर गौरीने एक शुभ दिनमें उत्तम मुहूर्तमें गौतम आदि महर्षियोंको आमन्त्रितकर बुलाया और बालकका उपवेशन संस्कार करवाया। पार्वतीजीने उन ब्राह्मणोंको बैठाकर पहले स्वयं उन्हें प्रणाम किया, फिर बालकसे उन द्विजजनोंको प्रणाम करवाया ॥ २-३ ॥ उस समय सभी देवगण अपने हाथोंमें विविध
क्री०ख०-अ०८६ ] * महर्षियोंद्वारा पार्वतीपुत्रका भूमि-उपवेशन नामक संस्कार सम्पन्न करना * ४७३ प्रकारकी उपहार-सामग्री लेकर वहाँ आये। साथ ही शिवके गण, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी वहाँ आयीं ॥ ४ ॥ तदनन्तर गौरी उन विप्रोंसे बोलीं- हे श्रेष्ठ द्विजो ! आप सभी मुनियोंसे विचार-विमर्श करके इस बालकका उपवेशन-संस्कार सम्पन्न करें। तब वे सभी मुनि बोले- आज बृहस्पतिवार है, त्रयोदशी तिथि है और रेवती नक्षत्र है, इसलिये आज ही उपवेशन-संस्कार-सम्बन्धी महोत्सव सम्पन्न करनेयोग्य है ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर महर्षि गृत्समदने तुरन्त भूमिपर विविध प्रकारके रत्नसमूहोंको रखकर शीघ्र ही रत्नोंके द्वारा चौकका निर्माण किया। गणेश-पूजन करनेके अनन्तर उन्होंने पुण्याहवाचन किया। तदनन्तर दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित किये हुए उस चौकपर पार्वतीके पुत्रको बैठाया और फिर सौभाग्यशालिनी स्त्रियोंके द्वारा बड़े ही आदरपूर्वक उसका नीराजन करवाया। वह बालक रत्नोंके आभासमूहमें स्थित था और नाना प्रकारके अलंकारोंसे प्रकाशित हो रहा था ॥ ७-९॥ उस समय दिव्य वाद्य बजाये जा रहे थे, तभी सभी जनोंने शिव-पार्वतीको तथा उनके पुत्रको श्रद्धाभक्तिपूर्वक विविध प्रकारकी भेंट-सामग्री प्रदान की ॥ १० ॥ तदनन्तर देवी पार्वती ने रत्न, वस्त्र तथा सुवर्ण आदि प्रदानकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन सभीके द्वारा आशीर्वादके रूपमें प्राप्त अक्षतोंको उस बालकके ऊपर छोड़ा। माता भवानीने कन्याओंसहित मुनिपत्नियोंका पूजन किया। वे मुनिपत्नियां बोलीं- हे गिरिजा ! तुमसे अधिक धन्य अन्य कहीं कोई स्त्री नहीं है। इस प्रकारका सभी शुभ लक्षणोंसे समन्वित पुत्र भी कहीं किसीका नहीं है॥ ११-१२१/२॥ ब्रह्माजी बोले-वे मुनिपत्नियां इस प्रकार कह ही रही थीं कि उसी समय व्योमासुर नामक एक दैत्य वहाँ आ पहुँचा। वह महान् दुष्ट व्योमासुर नाना प्रकारकी माया करनेमें पारंगत था, उसके कान आकाशतक व्याप्त थे। तीनों लोकोंमें उसके समान बलशाली कोई भी नहीं था ॥ १३-१४॥ वहाँ दरवाजेके समीप एक आमका वृक्ष था, जिसमें अनेक डालियाँ लगी थीं। वह आमका वृक्ष सैकड़ों हाथियोंके लिये भी अभेद्य था और प्रलयकालीन वायुके द्वारा भी न तोड़े जानेयोग्य था ॥ १५ ॥ वह व्योमासुर अपनी मायाके बलसे उस आमके वृक्षमें उसी प्रकार प्रविष्ट हो गया, जैसे कि किसी सीधे- सादे व्यक्तिको प्रारब्धवश भूत लग जाता है ॥ १६ ॥ प्रलयकालीन आँधीके समान उसने उस आमके वृक्षको हिला डाला। वृक्ष टूटकर कहीं गिर न जाय, इस भयसे वहाँ आये हुए मुनिगण भयभीत हो गये और कहने लगे- यह महान् वृक्ष हवाके चले बिना ही कैसे काँप रहा है? तभी उन्होंने उस वृक्षसे निकलते हुए 'कट-कट' शब्दको सुना ॥ १७-१८ ॥ सभी स्त्रियाँ, शिवगण तथा वे मुनिगण वहाँसे पलायित हो गये। पार्वती भी घबड़ाहटके मारे अपने बालकको भुलाकर स्वयं भी भाग चलीं ॥ १९ ॥ इसी बीच वह आमका वृक्ष बालकके ऊपर गिरा। तब बालकने अपने दोनों हाथोंसे उसपर आघात किया। जिससे सैकड़ों टुकड़े होकर वह वृक्ष भूमिपर गिर पड़ा। वह वृक्ष उसी प्रकार चूर्ण-चूर्ण हुआ, जैसे कि पत्थरके ऊपर रखी हुई सुपारी घनके द्वारा चोट करनेपर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। उस समय उस वृक्षकी शाखाएँ, जो कि पल्लवोंसे समन्वित थीं, आकाशमें उड़ने लगीं ॥ २०-२१ ॥ वृक्षकी शाखाओंके गिरनेसे ऋषियोंके कुछ आश्रम भग्न हो गये। पल्लवोंसे युक्त कुछ शाखाएँ वहाँसे भाग रहे लोगोंपर भी गिरीं ॥ २२ ॥ तदनन्तर वह दुष्ट व्योमासुर अपने मुखको खोलकर रक्त वमन करता हुआ प्राणहीन होकर नीचे गिर पड़ा। गिरनेसे उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये। तदनन्तर वे सभी लोग तथा स्त्रियाँ वहाँ आयीं उन्होंने बालकको पूर्वकी भाँति निःशंक होकर बैठा हुआ देखा ॥ २३-२४ ॥ वह सुमेरुपर्वतके समान निश्चल तथा स्वस्थ था। यह देखकर सभीको बड़ा ही विस्मय हुआ कि इस पाँच मासकी अवस्थावाले बालकने खेल-खेलमें वृक्षसहित उस महान् बल-पराक्रमशाली दैत्यको अपने हाथके आघातसे सैकड़ों टुकड़ोंमें खण्डित कर दिया ! उसी
४७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समय हाहाकारकी ध्वनि करती हुई पार्वती दौड़ते हुए अपने पुत्रके पास आयीं ॥ २५-२६॥ वे मुनिगण उनसे कहने लगे—आपके पुत्रने दैत्यका वध कर दिया है। तब पार्वतीने अपने बालकको हिमवान् पर्वतके समान निश्चल बैठा हुआ देखा। तदनन्तर पार्वतीने बालकको उठाकर अपनी गोदमें रखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक स्तनपान कराया और महर्षि मरीचिके वचनोंका स्मरण किया तथा महेश्वरकी प्रशंसा की ॥ २७-२८ ॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतंगा नष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ तदनन्तर सभी मुनिगण तथा स्त्रियाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये। इसके बाद कुछ गण वहाँ आये और पार्वतीके पुत्रको सुरक्षित देखकर कहने लगे कि माता आप अत्यन्त धन्य हैं, जो कि आपका यह पुत्र असुरसे बच गया। निश्चित ही दुष्ट लोग ही विनष्ट होते हैं। साधु पुरुष कभी भी कोई कष्ट नहीं प्राप्त करते ॥ ३०-३१॥ तदनन्तर पार्वतीने उन सभी गणों तथा स्त्रियोंको भी शर्करा प्रदानकर जानेकी आज्ञा प्रदान की। प्रसन्न होकर पार्वती अपने पुत्रको लेकर अपने भवनमें चली गयीं ॥ ३२ ॥ जो भक्तिमान् पुरुष इस पवित्र आख्यानका श्रवण करता है, उसे कभी कहीं कोई भी बाधा नहीं प्राप्त होती और वह सर्वत्र निर्भय होकर रहता है ॥ ३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका भूमि-उपवेशन-वर्णन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥ सतासीवाँ अध्याय बालक विनायकद्वारा शतमाहिषा नामक राक्षसी और कमठासुरका वध, इस आख्यानके श्रवण और श्रावणका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले—व्योमासुरकी बहन उसकी मृत्युके दुःखद समाचारसे अत्यन्त दुखी हो गयी। वह अमावस्याके दिन सायंकालके समय उत्पन्न हुई थी। उत्पन्न होते ही वह भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उसने उसी समय सौ महान् बलशाली भैंसोंको खा डाला था। उसके बाल अत्यन्त विकराल थे और ओष्ठ अत्यन्त लम्बे थे। उसकी नाक ताड़ वृक्षके समान लम्बी थी और उसका मुख एक विशाल गुफाके समान था ॥ १-२ ॥ उसके दाँत हलके समान मोटे एवं लम्बे, नेत्र कूपके समान अत्यन्त गहरे थे तथा बड़े-बड़े कानोंके द्वारा वह आच्छादित थी। उसके स्तन अतिदीर्घ थे, स्वरूप महाभयावह था और उस दुष्टाके केश भूतलका स्पर्श करते थे ॥ ३ ॥ उसके बाहु विशाल थे। नाभि अत्यन्त गहरी थी। उसकी त्वचा मगरमच्छके समान कर्कश थी। उत्पन्न होते ही सौ भैंसे खा जानेके कारण उस समय लोगोंने उस दुष्ट मनोभाववाली राक्षसीका 'शतमाहिषा' यह सार्थक नाम रखा। अपने बन्धुओंका हित करनेवाली वह शतमाहिषा अपने भाईका वध करनेवालेको मारनेकी दृष्टिसे वहाँ आयी ॥ ४-५ ॥ उस समय वह अत्यन्त सुरूपवान्, मनोहर तथा सुलक्षण अंगोंवाली बनकर आयी। उसने अनेक आभूषण धारण कर रखे थे। उसका वर्ण गौर था, अवस्था उसकी सोलह वर्षकी-सी थी, सोलह शृंगार करके वह अपने कटाक्षद्वारा सबको मोहित कर रही थी। इस प्रकारकी सुन्दर युवती बनकर वह शतमाहिषा मनमें दूषित भाव रखकर पार्वतीके शुभ भवनमें गयी ॥ ६-७ ॥ वहाँ पहुँचते ही सबसे पहले उसने देवी पार्वतीको विनयपूर्वक प्रणाम किया और बड़े-ही आदरभावसे वह उनसे कहने लगी कि आज मैं धन्य हो गयी, कृतार्थ हो गयी। आज मैंने अपना अभीष्ट फल प्राप्त कर लिया है, जो कि मैं जगन्माता, सर्वदेवमयी, कल्याणी, सबके
क्री०ख०-अ०८७ ] * विनायकद्वारा शतमाहिषा और कमठासुरका वध * ४७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
४७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०८८ ] * आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधका आख्यान * ४७७ उस कमठासुरने गिरते समय वहाँके वनों, आश्रमों और नाना प्रकारके वृक्षोंको एकाएक तोड़ डाला। इसके पश्चात् माता पार्वतीने प्रसन्न होकर अपने पुत्रको स्तनपान कराया। वे अपने मनमें सोचने लगीं कि नाना प्रकारकी माया करनेवाले असुरोंकी मायाको जाना नहीं जा सकता। भगवान् त्रिलोचन शंकरकी कृपासे मैंने अपने पुत्रको पुनः प्राप्त किया है॥ ५२-५३॥ जो कि इसने यमराजसे भी अधिक बलशाली कमठासुरको मार डाला। उसी समय देवी पार्वतीकी सखियाँ और उनके गण वहाँ आ पहुँचे और वे बालककी कुशल पूछने लगे ॥ ५४॥ देवी गौरीने उनको प्रसन्नतापूर्वक बतलाया कि सब कुशलसे है। तब गणोंने उस असुर कमठके टुकड़े- टुकड़े करके उन्हें बहुत दूर ले जाकर छोड़ दिया ॥ ५५ ॥ उस समय देवगणोंने उस बालकपर फूलोंकी वर्षा की। जो इस श्रेष्ठ आख्यानको सुनेगा अथवा सुनायेगा वह सभी प्रकारके अरिष्टोंसे मुक्त हो जायगा और अपनी सभी मनोभिलषित कामनाओंको प्राप्त कर लेगा ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कमठासुरके वधका वर्णन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥ अठासीवाँ अध्याय आठवें मासमें बालक गुणेशद्वारा किये गये तल्पासुर एवं दुन्दुभि नामक दैत्योंके वधका आख्यान व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! आपके मुखारविन्दसे मैंने बालक गुणेशके द्वारा किये गये अद्भुत चरित्रोंको सुना, वे [श्रवण करनेसे] सब प्रकारके पापोंको दूर करनेवाले हैं ॥ १ ॥ तथापि हे सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ ! मेरी सुननेकी इच्छा अभी भी पूर्ण नहीं हुई है, अतः आप बालक गुणेशके चरित्रके विषयमें मुझे पुनः आदरपूर्वक बतायें ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! आप पुनः गुणेशकी कथाको सावधान होकर सुनें। इस कथाका श्रवण सभी पापोंका विनाश करनेवाला और धर्म तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है। बालक गुणेशके आठवें मासकी बात है। एक दिन ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें देवी पार्वती जब अपने भवनमें ग्रीष्मसे अत्यन्त पीड़ित हो गयीं तो वे पुष्पवाटिका में चली गयीं ॥ ३-४ ॥ वह वाटिका अशोक, चन्दन, कटहल, आम्र, बहेड़ा, मालती, चम्पक, जाती, चिंचडी, नीम तथा पारिजात वृक्षोंकी सघन छायासे आच्छादित थी। वहाँ एक रमणीय सरोवर था, जिसमें कमल खिले हुए थे और उस सरोवरका जल अत्यन्त सुन्दर तथा शीतल था। वहाँ बने हुए एक श्रेष्ठ पलंगपर सखीके द्वारा लाये गये शुभ बिस्तरमें वे गिरिजा अपने बालक गुणेशको लेकर निःशंक होकर सो गयीं ॥ ५-७॥ उस समय पार्वतीकी सखियाँ उन्हें अश्मा (रत्नादि)- से जटिल मूठवाले चाँवरसे पंखा झल रही थीं। जब वे गहरी निद्रामें सो गयीं, तब उसी समय महान् बलशाली दैत्य, जो तल्पासुर नामसे विख्यात था, वह वायुका रूप धारणकर वहाँ आया और शय्याके भीतर प्रविष्ट होकर उस शय्याको लेकर आकाशमें उड़ चला ॥ ८-९ ॥ उस तल्पासुरके शब्दसे पार्वतीकी वे दोनों सखियाँ भयभीत हो भूमिपर गिर पड़ीं और इधर शय्यापर स्थित देवी पार्वती बहुत जोर-जोरसे चिल्लाने लगीं ॥ १०॥ आकाशमें स्थित होकर ही वे पार्वती क्रन्दन करते हुए कहने लगीं- हे शंकर ! दौड़ो ! दौड़ो। हे देव! मैंने कौन-सा [आपका] अपकार किया है, क्यों आप मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ ११ ॥ यह तल्पासुर नामक दैत्य बहुत बलवान् है, यह आकाशको चीरता हुआ तेजीसे दौड़ रहा है। आप तो सब प्रकारसे समर्थ हैं, फिर पराये हाथमें गयी हुई अपनी भार्याकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ? ॥ १२ ॥ इस पुत्रके साथ सम्बन्ध होनेसे मुझे नाना प्रकारके
४७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दुःख उठाने पड़े हैं। क्या इस दैत्यके हाथों अपने पुत्रसहित मेरी मृत्यु लिखी है ? यह अगर उत्पन्न ही नहीं होता, तो इस प्रकारका बन्धन मुझे कैसे प्राप्त होता ? ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-माता पार्वतीके इस प्रकारके विलापको सुनकर उमापुत्र वे महामनस्वी बालक गुणेश उस समय बादलोंकी भाँति दिशाओंको गुँजाते हुए बार-बार उच्च स्वरमें गर्जना करने लगे। उस गर्जनासे समुद्र, वन तथा खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी कम्पित हो उठी ॥ १४-१५ ॥ उस समय जब प्रमथगणों आदिने देवी पार्वतीको वहाँ नहीं देखा, तो वे शोक करने लगे। तदनन्तर बालक गुणेशने अपने चरणोंके प्रहारसे उस शय्यापर प्रहार किया। उस ध्वनिसे सभी प्राणी एकाएक भयभीत-से हो गये। आकाश मानो सैकड़ों भागोंमें विभक्त हो गया। उनके पादाघातसे वह शय्या टुकड़े-टुकड़े होकर भूमिपर गिर पड़ी। तब वह तल्पासुर दीख पड़ा तो बालक गुणेशने उसे पकड़ लिया और एक हाथसे उन्होंने लीलापूर्वक अपनी माताको इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे कि चातक पक्षी मेघसे छूटी हुई जलकी बूँदको अपनी चोंचद्वारा सहसा पकड़ लेता है ॥ १६-१८१/२ ॥ बालक गुणेशने माताको अपने कन्धेपर बैठा लिया और बायें हाथसे तल्पासुरकी चोटी पकड़कर बड़े वेगसे सहसा उसे भूमिपर पटक दिया। फिर वे एक योगीकी भाँति पद्मासन लगाकर उस दैत्य तल्पासुरकी देहके ऊपर बैठ गये ॥ १९-२० ॥ बड़े वेगसे बलपूर्वक मसल दिया गया वह दैत्य दूर आकाशसे भूमिपर गिर पड़ा, मुँहसे बार-बार रक्त वमन करते हुए उस दैत्य तल्पासुरने प्राण त्याग दिये। लोगोंने देखा कि वह दुष्ट दैत्य इक्कीस योजन विस्तारवाला है। वह वृक्षों, पत्थरों, आश्रमों तथा घरोंको चूर-चूर करता हुआ गिरा ॥ २१-२२ ॥ तभी गणों तथा सखियोंने उस बालकको देखा तो वे कहने लगीं-हे गौरी ! तुम्हारा यह बलवान् बालक कुशलसे है और प्रसन्न होकर खेल कर रहा है ॥ २३ ॥ उस समय देवी पार्वती भ्रान्तिवश आकाश, पृथ्वी तथा अपने बालकके विषयमें कुछ भी नहीं जान पा रही थीं। तब मुनिजनोंने उनसे कहा- हे सती ! आप सावधान मनवाली हो जाइये। आपके बालकने विशाल रूप धारणकर उस दैत्य तल्पासुरका वध कर डाला है। हे शुभे ! आप अपनी आँखें खोलकर अपने बालकको पहले-जैसी स्थितिमें देखिये, जो कि कुशलसे है और मंगलकारी है ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन मुनिजनोंके कथनसे वे पार्वती सचेत हो उठीं और तब उन्होंने उस दैत्यको तथा बालक गुणेशको देखा ॥ २५१/२ ॥ गौरी बोलीं- क्या मैं कुछ विपरीत देख रही थी कि बालकने मुझे उठा रखा है। अथवा क्या सचमुच इस बालकने इक्कीस योजनवाले इस महान् दैत्यका वध कर डाला है। मुझे जीवनदान प्रदान करनेवाला यह बालक अपने मातृ-ऋणसे उऋण हो गया है ॥ २६-२७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने बालकको ले लिया और शान्तिकर्म करवाया। [ब्राह्मणोंको] अनेक दान प्रदान किये और फिर अपने बालकको स्तनपान कराया ॥ २८ ॥ इस [दैत्यवधरूप] कौतुकको देखकर वहाँ उपस्थित सभी जनोंने बालककी प्रशंसा की और वे अत्यन्त प्रसन्नतासे भर गये। इसी समय एक दूसरे महान् असुरने बड़ा भयंकर शब्द किया ॥ २९ ॥ उसकी शब्दध्वनि दुन्दुभिवाद्यके समान थी, इसलिये वह दुन्दुभि नामसे ही विख्यात भी था। उसकी हथेलीके आघातसे पृथ्वी चूर-चूर हो जाती थी ॥ ३० ॥ उसके गगनचुम्बी विशाल शरीरसे भगवान् सूर्य ढक जाते थे। उसने [किसी] शिवगणके बालकका रूप धारणकर गौरीके बालक गुणेशको पुकारते हुए कहा- यहाँ आओ, आज हम दोनों मिलकर खेल करते हैं। तब वे बालक गुणेश भी उसके पास चले आये। तब उस बालकरूप दैत्यने पार्वतीपुत्र गुणेशको अपनी गोदमें बिठा लिया और उन्हें विषभरा एक फल दिया ॥ ३१-३२ ॥
क्री०ख०-अ०८९ ] * दसवें तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी कथा * ४७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 फल देकर वह बालक गणेशसे बोला—खाओ- | तरहसे टूट गया। इधर बालक गुणेशने भी उसी क्षण खाओ, इस फलको शीघ्र ही खाओ। मैं इस फलको | बलपूर्वक उसके सिरको खींचा, जिसके कारण कण्ठनालसे बहुत दूरसे लाया हूँ, यह फल जन्म, मृत्यु और | पृथक् होकर उसका सिर बालक गुणेशके हाथमें आ वृद्धावस्थाका हरण करनेवाला है॥ ३३॥ | गया। उसी क्षण सारी भूमि रक्तसे सन गयी। उस दैत्यके बालक गुणेशने उसके दुष्ट मनोभावको जानते हुए | सिरको कमलकी भाँति हाथमें लेकर गिरिजापुत्र गुणेश वह फल ले लिया और उसे खा भी लिया, पुनः उन्होंने | उससे खेलने लगे॥ ३९-४१॥ निडर होकर दूसरा फल भी उस दैत्यसे माँगा ॥ ३४॥ | बालक गुणेशके सभी अंग भी रक्तसे लथपथ हो ब्रह्माजी बोले- भगवान् शिवकी इच्छासे अमृत | गये, यह देखकर गणोंने माता पार्वतीको यह समाचार भी विष हो जाता है और विष भी अमृत हो जाता है। | सुनाया। वहाँ जाकर उन्होंने पुत्रको देखा और पुत्रकी तदनन्तर वे गुणेश उसके वक्षःस्थलको पकड़कर उसी | वैसी स्थिति देखकर उन्होंने बालकके हाथसे उस दैत्यके क्षण उठ खड़े हुए। उन्होंने उसके दोनों घुटनोंपर अपने | सिरको दूर फेंक दिया और वस्त्रसे बालकको पोंछा। फिर पैर रख दिये और दोनों हाथोंसे उसकी चोटीको पकड़ | उसे स्नान कराया, स्वयं भी स्नान किया और प्रसन्नतापूर्वक लिया। फिर उन्होंने अपने हाथोंसे उसकी दाढ़ी पकड़कर | बालक गुणेशको स्तनपान कराया॥ ४२-४३॥ लीलापूर्वक उसे झुला डाला ॥ ३५-३६॥ | तदनन्तर उनकी सखियाँ तथा गण वहाँ आये और फिर वे पृथ्वीके समस्त भारको धारणकर उसके | उन्होंने बालककी कुशल पूछी। वे बोलीं शिवभक्तिके जानु-भागमें खड़े होकर नाचने लगे। पीड़ित होकर वह | कारण यह बालक अत्यन्त कुशलसे है॥ ४४॥ दैत्य कहने लगा-मेरे जानुदेशसे नीचे उतरो ॥ ३७॥ | महर्षि मरीचिद्वारा किये गये रक्षाविधानके कारण तुम्हारे बोझसे तथा तुम्हारे द्वारा नाच करनेसे मेरे | भी मेरा बालक कुशलसे है। तदनन्तर उन गणोंने उस शरीरमें अत्यन्त पीड़ा हो रही है, अरे गिरिजाके पुत्र ! | दुष्ट दानवको ले जाकर दूर फेंक दिया ॥ ४५ ॥ मुझे छोड़ दो-छोड़ दो, मैं अपने घरको चला जाऊँगा ॥ ३८॥ | तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर सभी गण तथा ब्रह्माजी बोले- उस दैत्यके द्वारा इस प्रकार | सखियाँ अपने-अपने घरोंको गये। पार्वती भी अत्यन्त प्रार्थना किये जानेपर भी बालक गुणेशने उसे नहीं छोड़ा। | हर्षयुक्त होकर बालक गुणेशको लेकर अपने भवनमें तब वह दैत्य जोर लगाकर उठा तो उसका शरीर पूरी | प्रविष्ट हुईं ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार गणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'मंचकासुरका वध' नामक अठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥ नवासीवाँ अध्याय दसवें मास तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें बालक गुणेशद्वारा किये गये आजगरासुर तथा शलभासुर नामक दैत्योंके वधकी कथा ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] जब बालक | बोल भी रहे थे। कभी वे लुढ़क जाते थे। कभी नाचने गुणेशका दसवाँ मास चल रहा था। उस समय एक | लगते थे, तो कभी माता पार्वतीको देखकर रोने लगते दिनकी बात है, जब भगवान् सूर्यका उदय होनेके बाद | और उनके पीछे लग जाते और कभी सहसा भगवान् तीन मुहूर्तका समय व्यतीत हो गया था। तब पार्वतीपुत्र | शिवके पीछे चलने लगते। इस प्रकारकी आनन्ददायिनी गुणेश कभी पेटके बल रेंगते हुए और कभी पैरोंसे चलते | क्रीडा करते हुए अपने बालकको देखकर उस समय हुए क्रीडा कर रहे थे और कुछ-कुछ अस्पष्ट वाणीमें | पार्वती अत्यन्त हर्षित हो उठीं ॥ १-३॥
४८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] इसी समय बालक गुणेशने आजगर नामक एक दैत्यको देखा। वह दैत्य अपने नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ बरसा रहा था। उसका शरीर वज्रसारके समान कठोर था। वह अपनी जिह्वा लटकाये हुए था। उसका शरीर बहुत विशाल था। वह ऐसा दिखायी पड़ रहा था, मानो महान् पर्वतको निगल रहा हो। वह एक बहुत बड़े वृक्षके नीचे बैठा हुआ था और अपनी दोनों जिह्वाओंको बार-बार लपलपा रहा था ॥ ४-५ ॥ बालक गुणेशने बालस्वभाववश रेंगते हुए जाकर उस अजगरको पकड़ लिया। तब उस अजगरने सहसा उन्हें शीघ्र ही अपने मुखके अन्दर भर लिया। उनके मुखके अन्दर प्रविष्ट होते ही उस वायुभक्षी अजगरने अपने दोनों ओठोंको मिला लिया ॥ ६१/२ ॥ जब गौरीने आँगनमें बालक गुणेशको नहीं देखा तो उनका मन अत्यन्त व्याकुल हो गया। वे कहने लगीं—मेरा बालक अभी-अभी यहींपर खेल रहा था, फिर किसने उसका हरण कर लिया और किसीने मार तो नहीं डाला ? वे अत्यन्त शोक करने लगीं और दुःखसे परम आर्त होकर वे अपने सिरको पीटने लगीं ॥ ७-८ ॥ उस समय गणोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा हे माता ! आप निराश न हों। उस बालकका प्रभाव सबको विदित ही है, वह सैकड़ों गुना अधिक बलवान् है। उस अजगरके उदरमें प्रविष्ट हुए वे बालक गुणेश बढ़ने लगे, जिससे उस दैत्यकी साँस रुकने लगी। तब वह अजगर अपनी पूँछके अन्तिम भागको हिलाने डुलाने लगा। तदनन्तर उस अजगरकी प्राणवायु रक्तके साथ दोनों नेत्रोंसे बाहर निकल गयी। तब अम्बिकापुत्र गुणेश उसकी देहको चीरते हुए बाहर निकल आये ॥ ९-११ ॥ उस दैत्य अजगरके रक्तसे सने हुए अंगवाले उन गुणेशको देखकर यह लग रहा था कि क्या यह खिला हुआ पलाशका वृक्ष तो नहीं है? तदनन्तर गणोंने अपनी अंगुलिको चाटते हुए उन बालक गुणेशको देखा और वे जोर-जोरसे चिल्लाते हुए पार्वतीसे कहने लगे कि दुष्ट अजगर दैत्यको मार करके ये बालक गुणेश उसके
[दायाँ स्तम्भ] मुखसे बाहर निकल आये हैं ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन (गणों)-की बात सुनते ही तत्काल पार्वतीने बालक गुणेशको उठा लिया। जल्दीसे स्नान कराया और उन्हें प्यार करते हुए स्तनपान कराया ॥ १४ ॥ अरे वत्स ! तुम कहाँ चले गये थे ? तुम्हें देखे बिना मुझे तो एक क्षणका समय भी एक वर्षके समान लगता था। तदनन्तर उन्होंने सौ योजन विस्तारवाले अजगरको देखा। वह बड़ा ही दुष्ट था। उसका मुख बड़ा ही भयानक था। वह बहुत-सा रक्त वमन कर रहा था और अनेक वृक्षसमूहों तथा घरोंको गिराते हुए जमीनपर गिरा था ॥ १५-१६ ॥ गौरी बोलीं—इस स्थानपर अभी न जाने कितने दैत्य और राक्षस होंगे। इस बालकके पराक्रमसे कितने ही राक्षस मृत्युको प्राप्त हो चुके हैं। तदनन्तर उन सभी गणोंने उस महान् असुरको दूर ले जाकर फेंक दिया ॥ १७१/२॥ तदनन्तर ग्यारहवें मासकी बात है। देवी पार्वती अपने द्वारपर गयी हुई थीं। वहाँ वे अपनी सखियोंके साथ बालक गुणेशकी बहुत-सी क्रीडाओंको देख रही थीं। वह बालक किसी सखीका मुख चूम रहा था और किसीसे अपना चुम्बन करा भी रहा था ॥ १८-१९ ॥ किसी सखीके पीछे जाकर स्वयं अपने हाथोंसे उसकी दोनों आँखोंको बन्द कर दे रहा था और किसी दूसरे बालककी माताके पास जाकर बलपूर्वक उसके स्तनोंका पान कर ले रहा था। अपना मुख वस्त्रसे ढककर किन्हीं दूसरी स्त्रियोंको डरा दे रहा था। वह गुणेश उनके मुख, केश तथा नासिका और आभूषणोंको खींच दे रहा था। वह अपने तथा पराये जनोंको देखकर तोतली वाणीमें बोल रहा था ॥ २०-२११/२ ॥ इसी समय शलभासुर नामक एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अपराजेय था। उसके स्कन्ध पर्वतके समान ऊँचे थे। उसका विशाल सिर आकाशको भी फोड़ देनेवाला था। वह बादलकी भाँति नीले वर्णका था। उसके नेत्र जपापुष्पके
क्री०ख०-अ०९० ] * बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें दैत्योंका वध * ४८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 समान लाल रंगके थे। उसके सींग बादलोंको स्पर्श | अपने बालक गुणेशसे बोलीं—हे पुत्र! किसी भी जीवकी करनेमें समर्थ थे। वह तीनों लोकोंको ग्रसता हुआ-सा | हत्या नहीं करनी चाहिये, इस प्राणीको तुम छोड़ दो। उस बालक गुणेशके समीपमें आया ॥ २२-२४ ॥ | तब भी बालक गुणेशने हठ करके बलपूर्वक उस वह जहाँ-जहाँ जाता था, उसे पकड़नेके लिये बालक | असुरको पत्थरपर पटक डाला ॥ २९-३० ॥ गुणेश भी वहीं-वहीं जाते थे। इस प्रकारसे महान् वेगशाली | उस समय उसके सौ टुकड़े हो गये और वह वे दोनों बहुत समयतक इधर-उधर घूमते रहे। तदनन्तर | आकाशको गर्जनासे गुँजाता और घरों तथा तोरणोंको बालक गुणेश जब थक गये, तब वे बहुत वेगसे दौड़ते हुए | गिराता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ ३१ ॥ उस असुरके पास गये और उन्होंने उस महान् बलशाली | उसका शरीर दस योजन विस्तारवाला हो गया। उस शलभासुरको एकाएक पकड़ लिया ॥ २५-२६ ॥ | समय उसके मुखसे बहुत-सारा रक्त बह चला। वह बहुत- वह अपने दोनों पंखोंको उसी प्रकार फड़फड़ाने | से आश्रमों तथा वृक्षोंको चूर-चूर करते हुए गिरा। तब लगा, जैसे कि किसी मनुष्यके द्वारा हाथमें पकड़ा हुआ | माता अपने पुत्रको पकड़कर वहाँसे ले गयी और उस बाज पक्षी अपने पंख फड़फड़ाने लगता है। वह | बालकको गोदमें बैठाकर अपना स्तनपान कराया तथा शलभासुर अपने पैरोंके प्रहारसे बालकको पीड़ित करने | भोजन कराया। उस बालक गुणेशको तथा उस प्रकारके लगा। उस समय वह असुर अपनी विकराल आँखोंको | विस्तृत शरीरवाले मरे हुए दैत्यको देखकर उन पर्वतराजपुत्री फाड़-फाड़कर उस शिशु गुणेशको देखने लगा। वह | पार्वतीसे सखियाँ कहने लगीं—बहुत अच्छा हुआ, बहुत बालक गुणेश उसको छोड़ दे रहा था, फिर पकड़ ले | अच्छा हुआ। तदुपरान्त पार्वतीने अपने भवनमें प्रवेश किया रहा था ॥ २७-२८ ॥ | और वे सखियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने घरोंको वह उसे अपनी माताको दिखाता था और फिर | गयीं। देवी पार्वतीकी आज्ञामें रहनेवाले गणोंने उस दैत्यको धरतीपर पटक दे रहा था। उसको देखकर दयाके | दूर ले जाकर फेंक दिया। उस समय देवगणोंने उस बालक वशीभूत हो पार्वती उस समय कठोर हुए मनवाले उस | गुणेशके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ३२-३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शलभासुरके वधका वर्णन' नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८९ ॥ ন্দ্ৰ नब्बेवाँ अध्याय बालक गुणेशके द्वारा बारहवें मासमें नूपुर तथा अविपुत्र नामक दैत्योंका वध ब्रह्माजी बोले— बारहवें मासकी बात है। एक | शब्दोंका उच्चारण करते हुए नृत्य करने लगे ॥ २-३ ॥ दिन देवी पार्वती विविध अलंकरणोंसे अलंकृत करके | बालक गुणेशके उस प्रकारके शब्दको सुनकर अपने अद्भुत पुत्र बालक गुणेशको गोदमें लेकर अपनी | भगवान् शिव भी नृत्य करनेके लिये वहाँ आ पहुँचे। सखियोंके साथ बैठी हुई थीं ॥ १ ॥ | भगवान् शिवको नृत्य करते हुए देखकर श्रीविष्णु स्वयं उस समय गुणेशकी आभा करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे | भी नृत्य करने लगे। तदनन्तर इन्द्र आदि सभी देवता भी सम्पन्न थी और वे करोड़ों आभूषणोंसे विभूषित थे। उस | नृत्यकी अभिलाषासे वहाँ आ पहुँचे। वह बालक जिस समय माताको पुत्रके नृत्यके दर्शनकी महान् उत्कण्ठा | प्रकारसे नृत्य कर रहा था, उसी प्रकारसे वे सब भी हुई। अन्य बालकों तथा भगवान् शिवकी भी नृत्य- | नाचने लगे ॥ ४-५ ॥ दर्शनकी इच्छा जानकर वे गिरिजापुत्र गुणेश 'थेयि थेयि' | वह गुणेश जिस भावको प्रकट कर रहा था, वे