श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
इकसठवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
इकसठवाँ अध्याय गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना तथा देवताओंकी प्रार्थनापर पुनः अनुग्रह करना, चन्द्रमाद्वारा वरद विनायककी स्थापना
ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! एक बार मैं गिरिशायी भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलासपर्वतपर गया हुआ था। वहाँ सभाके मध्यमें बैठे हुए मैंने नारदजीको आते हुए देखा। उन्होंने शंकरजीको एक अद्वितीय फल निवेदित किया, तब उस (फल)-के विषयमें गणेश और कुमार कार्तिकेय—दोनोंने शम्भुसे याचना की ॥ १-२ ॥ उस समय भगवान् शंकरने 'यह फल मुझे किसे देना चाहिये'—ऐसा मुझसे भी पूछा। तब मैंने उनसे कहा कि कुमार बालक हैं, अतः उन्हें यह फल दे दीजिये ॥ ३ ॥ तब शिवजीने उस फलको कुमारको दे दिया, [इसपर] गणेशजी क्रुद्ध हो गये। तदनन्तर जब मैंने अपने निवास ब्रह्मलोकमें जाकर सृष्टि करनेकी इच्छा की तो विघ्नकर्ता [उन] गणेशजीने एक अत्यन्त अद्भुत विघ्नकी सृष्टि कर दी, और वे उग्ररूप धारणकर मुझे भयभीत करने लगे ॥ ४-५ ॥ [उस रूपको देखकर] मेरे भ्रमित हो जानेपर चन्द्रमा गजानन गणेशजीके क्रूरतर रूपको देखकर अपने गणोंसहित हँस पड़े। तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने चन्द्रमाको शाप दे दिया कि मेरे वचनानुसार [अब] तुम तीनों लोकोंमें अदर्शनीय हो जाओगे ॥ ६-७ ॥ कदाचित् यदि कोई तुम्हें देख लेगा तो वह महापातकी हो जायगा। इस प्रकार शाप देकर वे देवाधिदेव अपने गणोंके साथ अपने धामको चले गये। चन्द्रमा भी मलिन, दीन और चिन्ता-समुद्रमें लीन हो गये कि अणिमादि सिद्धियोंसे समन्वित, जगत्के कारणके भी कारण उन भगवान् गणेशके प्रति अज्ञानवश बालककी भाँति मैंने दुष्टता क्यों की; जिसके कारण मैं सभीके लिये अदर्शनीय, विवर्ण और मलिन हो गया हूँ!॥ ८-१०॥ अब मैं [पुनः] कैसे स्वरूपवान्, वन्दनीय और अपनी कलाओंसे देवताओंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला बनूँगा ? इसी बीचमें देवताओंने चन्द्रमाको प्राप्त महान् शापके विषयमें सुना। तब अग्नि, इन्द्र आदि [देवता] वहाँ गये, जहाँ गजानन गणेशजी थे। उन देवगणोंने सम्पूर्ण विघ्नोंका प्रवर्तन एवं हरण करनेवाले गणेशजीसे प्रार्थना की— ॥ ११-१२ ॥ देवताओंने कहा—हे देवाधिदेव ! आप सम्पूर्ण संसारके लिये वन्दनीय हैं। हे ईश! आप अपनी इच्छासे इस संसारका सृजन, पालन और संहार करते हैं। हे त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश)-के स्वामी! आप निर्गुण [स्वरूप] होते हुए भी गुणवानोंके गुणोंके कर्ता हैं। हे देव ! आज हम आपकी ही शरणमें आये हैं ॥ १३ ॥ हे ईश ! सम्पूर्ण जगत् आपके शापसे भयभीत है, आप हमारी रक्षा करें। चन्द्रमाके अपराधके कारण हम सबपर यह महान् कष्ट कैसे आ गया है? हे जगदीश ! हे भुवनेश ! अतः आप ऐसा विधान करें, जिससे हम सब, यह सम्पूर्ण संसार और चन्द्रमा भी शान्ति प्राप्त कर सकें ॥ १४ ॥ हे प्रभो ! चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेसे यह संसार कष्टमें पड़ गया है, इसलिये आप इन चन्द्रमापर अनुग्रह करके तीनों लोकोंपर कृपा करें ॥ १५ ॥ [हे प्रभो!] आपके जिस स्वरूप और महिमाको वेदत्रयी भी नहीं जान सकती, उसका स्तवन कोई कैसे कर सकता है, तथापि हम सभी आपकी स्तुति कर रहे हैं। आपका दर्शन करके और आपसे सम्भाषण करके हम सब कृतकृत्य हो गये। हे शरणागतोंके कष्टका हरण करनेवाले अविनाशी [प्रभु!] हम सब आपकी शरणमें आये हैं ॥ १६-१७ ॥ [तब] उनके इस प्रकारके वचन सुनकर और उनके द्वारा किये हुए स्तवनसे अत्यन्त प्रसन्न हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाले गजानन गणेशजी बोले— ॥ १८ ॥
१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विकट* (गणेशजी) बोले—हे देवताओ! मैं आप सबकी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ; आप लोग अपना मनोऽभिलषित वर माँगें। यदि वह तीनों लोकोंमें महान् असाध्य होगा, तो भी उसे आप लोगोंको प्रदान करूँगा॥ १९॥ देवताओंने कहा—[हे प्रभो!] हम सब लोग अमृतमयी किरणोंवाले चन्द्रमापर आपका अनुग्रह चाहते हैं, आपके द्वारा उसे अनुगृहीत किये जानेपर हम सबपर आपका अनुग्रह हो जायगा॥ २०॥ गणेशजी बोले—एक वर्ष या उसका आधा यानी छः मास या उस आधेका आधा तीन मासतक चन्द्रमा अदर्शनीय हो जाय। हे देवताओ! अब आप लोग कोई दूसरा वर भी माँगें॥ २१॥ तदनन्तर उन सबने गजानन गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया [शापनिवारणकी प्रार्थना की]। तब उन प्रणतजनोंसे गणेशजीने भावपूर्वक कहा—अहो! आश्चर्य है कि मैं अपने ही वचनको अप्रमाणित करनेके लिये कैसे उद्यत हो गया हूँ? शरणमें आये हुए प्रपन्नजनोंका त्याग करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं हो रही है, जबकि चाहे सुमेरुपर्वत चलायमान हो जाय (अपना स्थान छोड़ दे), सूर्य [आकाशसे पृथ्वीपर] गिर पड़े, अग्नि शीतल हो जाय, समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे, परंतु मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता, फिर भी हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरे द्वारा कही जा रही बातोंको सुनो। [मैं अपने शापको सीमित कर रहा हूँ, मात्र] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको ज्ञानमें अथवा अज्ञानमें भी जो अभिशप्त चन्द्रको देख लेगा, वह महान् दुःखका भाजन होगा। उनके इस प्रकारके वचन सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये। उन सब देवताओंने [स्वीकारसूचक] 'ओम्' शब्दका उच्चारणकर उनके चरणोंमें प्रणिपात किया और उनपर पुष्पवृष्टि की तथा उनसे अनुज्ञा लेकर चन्द्रमाके पास चले गये॥ २२—२७॥ [वहाँ जाकर] उन सबने [चन्द्रमाको उलाहना देते हुए] उनसे कहा कि तुम बड़े मूर्ख हो, जो तुम गजानन गणेशजीपर हँसे। श्रेष्ठोंके प्रति अपराध करनेवाले तुमने तीनों लोकोंको संकटमें डाल दिया॥ २८॥ तुमने तीनों लोकोंके स्वामी, तीनों लोकोंके विधाता, अविनाशी, निर्गुण, नित्य, परम ब्रह्मस्वरूप, अखिलगुरु भगवान् गजानन गणेशजीके प्रति अपराध किया है, अतः सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले गणेशजीने तुम्हें दण्डित किया था॥ २९-३०॥ हम लोगोंके द्वारा अत्यन्त कष्टपूर्वक वे परमात्मा प्रसन्न किये गये। [तदनन्तर उन्होंने कहा—] भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको तुम कभी दर्शनीय नहीं होगे। [अतः हे चन्द्र!] तुम भी उन देवाधिदेव गजाननकी शरणमें जाओ। उनकी कृपासे तुम शुद्ध शरीरवाले होकर परम ख्यातिको प्राप्त करोगे॥ ३१-३२॥ देवताओंके इस प्रकारके हितकारी वचनको सुनकर चन्द्रमा शिव आदि देवताओंद्वारा वन्दित शरणागतवत्सल देवेश्वर भगवान् गजानन गणेशजीकी शरणमें गये और पापोंका नाश करनेवाले श्रेष्ठ एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे॥ ३३-३४॥ इन्द्रद्वारा उपदिष्ट [मन्त्रका जप करते हुए] चन्द्रमाने परम समाधिमें स्थित होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली गंगाजीके दक्षिणी किनारेपर बाईस वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया। तब [उनकी तपस्यासे] प्रसन्न होकर भगवान् गजानन उनके सम्मुख आये॥ ३५-३६॥ [वे भगवान् गणेश] लाल रंगके पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे। उनके शरीरमें लाल चन्दनका आलेप लगा हुआ था। चार भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले उनका श्रीविग्रह सिन्दूरसे लिप्त होनेके कारण अरुण वर्णका था॥ ३७॥ करोड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रभाववाले वे अपनी आभासे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रहे थे। उस तेजःपुंजको देखकर चन्द्रमा अत्यन्त [भयभीत होकर]
- मुद्गलपुराणके अनुसार कामासुरका पराभव करनेके लिये गणेशजीने 'विकट' नामका अवतार लिया था।
उ०ख०-अ०६१ ] * गणेशजीद्वारा चन्द्रमाको शाप देना * १९५ कम्पायमान हो उठे ॥ ३८ ॥ तदनन्तर वे अत्यन्त धैर्य धारण करके उनके सम्मुख हाथ जोड़कर मनमें यह विचार करने लगे कि ये गजानन गणेशजी ही हैं, जो मुझे वर देनेके लिये यहाँ आये हैं—ऐसा मानकर उन्होंने उन्हें नमन किया और अपनी परमभक्तिसे उन देवाधिदेव गजानन गणेशजीको प्रसन्न किया ॥ ३९-४० ॥ चन्द्रमा बोले—मैं उन भगवान् गजानन गणेशजीको प्रणाम करता हूँ, जो लोगोंके सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करते हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और कामकी उपलब्धि कराते हैं, उन विघ्नविनाशकको नमस्कार है ॥ ४१ ॥ हे कृपानिधान ! हे विश्वका विधान करनेमें दक्ष ! आप ब्रह्ममय, विश्वात्मा, विश्वके बीजरूप, जगन्मय, त्रैलोक्यका संहार करनेवाले हैं; हे देव ! आपको नमस्कार है। वेदत्रयीस्वरूप, अखिल बुद्धिदाता, बुद्धिप्रदीप, सुरेश्वर, नित्य, सत्य, नित्यबुद्ध, नित्य निष्काम आपको नित्य नमस्कार है ॥ ४२-४३ ॥ हे महात्मन् ! मैंने अज्ञानदोषके कारण जो अपराध किया है, दया करनेवाले आप उसे क्षमा करें। मुझपर दया कीजिये; क्योंकि शरणागतके त्यागसे आपको भी दोष होगा ॥ ४४ ॥ ब्रह्माजी बोले—चन्द्रमाके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन देवाधिदेवने चन्द्रमाके स्तवन और नमस्कारसे सन्तुष्ट होकर उन्हें अनेक वरदान दिये ॥ ४५ ॥ गजानन बोले—[हे चन्द्र !] तुम्हारा स्वरूप जैसे पहले था, वैसा ही हो जायगा; परंतु भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिको जो मनुष्य तुम्हें देखेगा, उसे निश्चय ही अभिशाप और पाप लगेगा। उसे हानि और मूर्खताकी प्राप्ति होगी। जैसा कि मैंने देवताओंके साथ वार्तालापमें पहले ही कह दिया है, तुम उस [चतुर्थी तिथि]-को अदर्शनीय होओगे ॥ ४६-४७ ॥ [भाद्रपदमासके] कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको मनुष्योंद्वारा जो व्रत किया जायगा, उसमें तुम्हारे उदय होनेपर ही मेरी पूजा होगी और तुम भी प्रयत्नपूर्वक पूजे जाओगे। उस तिथिपर तुम प्रयत्नपूर्वक दर्शनीय होओगे, इसके विपरीत होनेपर व्रत (संकष्टचतुर्थी) व्यर्थ हो जायगा। हे शशि! तुम मुझे प्रसन्न करनेवाले हो, अतः तुम अपनी एक कलासे मेरे ललाटपर स्थित रहो। तुम प्रतिमासकी [शुक्लपक्षकी] द्वितीया तिथिको सबके लिये प्रणम्य होओगे ॥ ४८-४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर इस प्रकार वर प्राप्त करके चन्द्रदेव पहलेकी ही भाँति [स्वरूपवान्] हो गये। उन्होंने देवताओं और ऋषियोंके साथ वरद विनायक नामक मूर्तिकी स्थापना की। देवताओं और मुनियोंने उस मूर्तिका 'भालचन्द्र' यह नाम रखा ॥ ५०-५१ ॥ चन्द्रमाने उस मूर्तिके लिये रत्नजटित स्वर्णमन्दिरका निर्माण कराया और आदरपूर्वक उसका षोडश उपचारोंसे पूजन किया ॥ ५२ ॥ सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंने भी उस मूर्तिका पूजन किया और यह वरदान दिया कि संसारमें यह स्थान सिद्धक्षेत्रके रूपमें विख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवालोंके लिये यह स्थान सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला होगा ॥ ५३१/२ ॥ तदनन्तर उन देवताओं और मुनियोंने गजानन गणेशजीको नमस्कार किया और प्रसन्न मनसे अपने- अपने स्थानको हर्षपूर्वक चले गये। उन देवताओं और मुनियोंके चले जानेपर देवाधिदेव गणेशजीने भी अपने शरीरको अन्तर्धान कर लिया ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर उन भालचन्द्र गणेशजीके अन्तर्धान हो जानेपर चन्द्रमा भी अपने तेजको प्राप्तकर प्रसन्न मनसे अपने धामको चले गये ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चन्द्रशापानुग्रहवर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥
बासठवाँ अध्याय
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१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बासठवाँ अध्याय भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] कृतवीर्यके पिताने पूछा—[हे ब्रह्मन्!] 'भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको चन्द्रमाके उदय होनेपर ही गणेशजीकी पूजा क्यों की जाती है'—यह मैंने आपसे पूछा था, जिसे आपने निरूपित किया। अब मैं उन गणेशजीको दूर्वांकुरके अर्पणका कारण सुनना चाहता हूँ, बताइये कि गणेशजीको दूर्वांकुर क्यों प्रिय हैं?॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजीको दूर्वांकुर- समर्पणका जो फल होता है, उसे कहता हूँ, सुनो॥ ३॥ दक्षिण देशमें जाम्ब नामकी एक नगरी थी, वहाँ सुलभ नामका क्षत्रिय रहता था, जो अत्यन्त गुणवान्, दानशील, धनवान्, बलशाली, विवेकसमपन्न, सम्मान्य जनोंका सम्मान करनेवाला, शान्त, इन्द्रियजित्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थको जाननेवाला और सभी वेदोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता था॥ ४-५॥ वह विकट नामवाले गणेशजीके प्रति नित्य भक्तिमान् और स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिमें रत रहता था। उसकी पत्नी सुमुद्रा नामसे अत्यन्त विख्यात थी॥ ६॥ वह अत्यन्त सुन्दरी और पतिव्रता थी। उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे अप्सराओंको भी पराभूत कर दिया था। वह देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियोंकी सेवामें रत रहनेवाली और पतिके मनोभावोंके अनुकूल आचरण करनेवाली थी॥ ७॥ हे नृप! वह सम्पूर्ण पतिव्रताओंमें सर्वमान्य और श्रेष्ठतम थी। एक दिन वे दोनों दम्पती स्नानसे निर्मल हो जब पुराणार्थकी विवेचनामें मन लगाये बैठे थे, तभी मधूसूदन नामक एक ब्राह्मण वहाँ आया॥ ८-९॥ निरन्तर परमेश्वरका चिन्तन करते रहनेवाला वह भिक्षाका अभिलाषी था। दारिद्र्यके कारण उसने मलिन वस्त्र धारण कर रखे थे। वस्त्र धारण किये होनेपर भी वह प्रायः दिगम्बर ही था॥ १०॥ सुलभने उसे देखकर प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार किया,
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] तत्पश्चात् उन [मलिन वस्त्रधारी] श्रेष्ठ द्विजको देखकर वह सहसा अज्ञानवश हँस पड़ा॥ ११॥ [यह देखकर] उन मुनिके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे, ऐसा लगता था, मानो वे तीनों लोकोंको जला डालेंगे। उन्होंने अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसे शाप देते हुए कहा—'हे दुर्बुद्धि! तुम दाँत निकालकर मुझपर हँस रहे थे, अतः प्रतिदिन हलमें जोते-जानेवाले बैल हो जाओ और नित्य दुखी रहो'॥ १२-१३॥ पतिके प्रति दिये गये शापको सुनकर सुमुद्रा क्रोधसे मूर्च्छित हो गयी। पदाघातसे घायल सर्पिणीकी भाँति क्रुद्ध होकर उसने उस ब्राह्मणको शाप दिया—हे दुष्ट ब्राह्मण! तुमने जो अविवेकपूर्ण ढंगसे मेरे पतिको शाप दिया है, अतः तुम भी विष्ठाको भोजनरूपमें ग्रहण करनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेवाले गधे बनोगे॥ १४-१५॥ इस प्रकार दिये गये क्रूर शापको सुनकर उस ब्राह्मणने भी उसे शाप दिया कि स्त्री होनेपर भी तुमने मुझे शाप दिया, अतः तुम चाण्डाली होओगी; साथ ही तुम दरिद्र, अनेक दोषोंसे युक्त, मल-मूत्रका भोजन करनेवाली और अशुभ कार्य करनेवाली होगी। इस प्रकार परस्पर शाप देकर उन्होंने अपने अतिदुर्लभ शरीरोंका त्याग कर दिया॥ १६-१७॥ [तदनन्तर] सुलभ वृषभके रूपमें उत्पन्न हुआ और हल खींचनेका दुःख भोगता रहा। ब्राह्मणके शापके कारण उसे एक क्षणके लिये भी विश्राम नहीं मिलता था। वह ब्राह्मण मधूसूदन भी गर्दभयोनिमें उत्पन्न हुआ और सुमुद्रा प्राणियोंकी हिंसा करनेवाली दुष्ट चाण्डाली हुई॥ १८-१९॥ [वह] पिशाचवृत्तिवाली, दरिद्र, विष्ठा और मूत्रका भक्षण करनेवाली, अत्यन्त शुष्क शरीरवाली, बाहर निकले दाँतोंसे युक्त विकराल मुखवाली थी। किसी समय भ्रमण करते हुए उसने नगरके दक्षिण भागमें स्थित गणेशजीके परम अद्भुत मन्दिरको देखा॥ २०-२१॥
उ०ख०-अ०६२ ] * भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन * १९७
वह अनेक प्रकारके वृक्षों और लताजालोंसे आच्छादित | श्रवणकर निद्रामें लीन लोग भी जग गये। सावधान तथा अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे युक्त था। वहाँपर कुछ | होकर उन्होंने दण्ड, मुष्टिका और कुहनीका प्रहारकर योगीश्वर सदा अनुष्ठानमें रत रहते थे॥ २२॥ | उन्हें बाहर भगा दिया॥ ३३-३४॥ वहाँ गणेशजीकी उपासना करनेवाले लोग [शास्त्रोक्त] | भागनेके लिये तत्पर उस चाण्डालीपर भी लोगोंने नियमोंका पालन करते हुए निवास कर रहे थे। [उनमेंसे] | कंकड़-पत्थरोंसे प्रहार किया। चाण्डाली और गधेद्वारा कुछ मनोरथपूर्तिकी इच्छावाले और कुछ पुत्र, कुछ मोक्ष | [गणेशप्रतिमाके] स्पर्शकी शंकासे आकुल लोगोंने और कुछ धनप्राप्तिकी इच्छावाले थे। किसी समय | अभिमन्त्रित तीर्थजलसे गजानन गणेशजीको स्नान कराया भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको उस नगरके प्रत्येक घरमें | तथा अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका अनेक बार पूजन गणेश-महोत्सवका आयोजन हो रहा था॥ २३-२४॥ | किया॥ ३५-३६॥ उसी समय महाप्रलयकी-सी सूचना देनेवाली | उस अत्यन्त दुष्टा चाण्डाली और गर्दभ एवं अतिवृष्टि प्रारम्भ हो गयी, वह चाण्डाली भी उस वृष्टिसे | वृषभको लोगोंने पुनः लाठी, कुहनी और थप्पड़ोंसे भयभीत होकर जिस-जिस घरमें जाती, वहीं-से लोगोंद्वारा | पीटा। मन्दिरका द्वार बन्द होनेसे वे भागकर बाहर भी मार-पीटकर भगा दी जाती, तब वह हाथमें अग्नि लेकर | नहीं जा सकते थे। दौड़ते और दारुण स्वरमें क्रन्दन करते मन्दिरके अन्दर चली गयी॥ २५-२६॥ | उन तीनोंके स्वरसे देवाधिदेव गणेशजीका मन उनकी तब वहाँ भी कुछ लोग उसे मारने-पीटने लगे, परंतु | ओर आकृष्ट हो गया॥ ३७-३८ १/२॥ योगियोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। तब वह | [गणेशजी सोचा कि अहो!] इन्हीं (चाण्डाली, चाण्डाली [दूबके] तिनकोंको अग्निमें जलाकर उससे | वृषभ और गर्दभ)-के कारण मेरी पुनः पूजा हुई है। अपने शरीरको सेंकने लगी॥ २७॥ | इन्होंने दूर्वांकुरोंद्वारा मेरी एक बार पूजा भी कर दी। अकस्मात् वायुके वेगसे उड़ा हुआ एक दूर्वांकुर | यद्यपि ये तीनों दुष्ट हैं, फिर भी इन्होंने मेरी बहुत-सी दैवयोगसे गणनायक गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़ा॥ २८॥ | प्रदक्षिणा भी कर ली। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी उसी समय वह गर्दभ भी शीतसे भयातुर होकर | तिथिको जो मुझे एक भी दूर्वा समर्पित करता है और उस देवालयमें चला आया। तत्पश्चात् वह वृषभ भी | मेरी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे लिये मान्य और पूज्य हलसे मुक्त होकर दैवयोगसे वहीं गणेशजीके मन्दिरमें | होता है॥ ३९-४१॥ भावीवश चला आया और उन दोनोंने उस चाण्डालीके | इसलिये मैं इन सबको विमानसे अपने धामको भेज तृणोंका भक्षण कर लिया॥ २९-३०॥ | देता हूँ, ऐसा सोचकर उन्होंने एक विमान भेजा, जो वहाँ लोगोंके सो जानेपर गजानन गणेशजीके | उनके गणोंसे युक्त था। वे गण गणेशजीके जैसे समीप ही उन दोनों (वृषभ और रासभ)-में सींग और | स्वरूपवाले थे और गन्धर्वों एवं अप्सराओंके समूहसे पाद-प्रहारसे युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ३१॥ | घिरे हुए थे। वह विमान विविध वाद्ययन्त्रों एवं उस समय उन दोनोंके मुखसे निकलकर दूर्वाके | परागसमन्वित पुष्पोंसे युक्त था॥ ४२-४३॥ अंकुर गणेशजीकी सूँड़ तथा उनके पैरपर गिर गये, | वह विमान दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण और ध्वज- जिससे गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ३२॥ | पताकाओंसे शोभायमान था। गणेशजीके स्वरूपवाले वे तदनन्तर वह चाण्डाली लाठी लेकर गणेशजीकी | गण दिव्य देहसम्पन्न और प्रसन्न मनवाले उन (तीनों)- प्रतिमाके समीप आयी और उसने गर्दभ एवं वृषभको | को उस विमानमें बैठाकर गजानन गणेशजीकी आज्ञासे खूब पीटा तथा पूजामें अर्पित नैवेद्यको स्वयं खा गयी। | उनके धामको शीघ्रतापूर्वक ले गये॥ ४४-४५॥ उन दोनों [गर्दभ और वृषभ]-के खुरोंके शब्दोंको | यह घटना सब लोगोंके देखते-देखते घटित हुई,
१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इससे सभीके हृदयमें आश्चर्यका भाव भर गया। वे लोग | प्राप्त हुई-यह हमसे बतलाइये ॥ ४८ ॥ कहने लगे कि इन (तीनों)-को [न जाने किस] | हम सब भी अपने अनुष्ठानका त्याग करके शीघ्र पूर्वपुण्यसे इस प्रकारकी गति प्राप्त हुई ॥ ४६ ॥ | ही उसका आचरण करेंगे; क्योंकि असंख्य कालावधि तब कुछ योगीश्वर ध्यानका त्यागकर गणोंके पास | बीत जानेपर भी हमें उन देवाधिदेवका दर्शन नहीं गये और उनसे पूछा कि इन तीनोंकी ऐसी पुण्यमयी ध्रुव | हुआ ॥ ४९ ॥ सद्गति कैसे हुई-यह बतलाइये ॥ ४७ ॥ | केवल वायुका भक्षणकर अनुष्ठानमें लगे रहनेवाले हे निष्पाप गणो! इन अत्यन्त पापियोंका लेशमात्र | हम विरक्तजनोंको गणेशजीके धामकी प्राप्ति कब भी पुण्य नहीं था, फिर यह अत्यन्त दुर्लभ गति इन्हें कैसे | होगी ?-यह हमें बतलाइये ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वोपाख्यान' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥
तिरसठवाँ अध्याय गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन
गणेशजीके गण बोले-हे योगिजनो! आप | मुनि बोले-[हे देवेन्द्र !] उत्तम दूर्वा-माहात्म्य सभी अपने चंचल मनको स्थिरकर श्रवण करें। | जैसा मुझे ज्ञात है, वह मैं कहता हूँ। पूर्वकालमें स्थावर [गणेशजीकी] जिस महिमाका कथन करनेमें [सहस्रमुख] | नामक नगरमें कौण्डिन्य नामवाले एक महामुनि हुए थे। वे शेष तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, उसका | गणेशजीके उपासक और तपोबलसे सम्पन्न थे। नगरके वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है, फिर भी हम | दक्षिण भागमें उन मुनिका अत्यन्त रमणीय महान् आश्रम शक्तिके अनुसार उसका वर्णन करते हैं ॥ १ १/२ ॥ | था, जो लताओं और वृक्षोंसे समन्वित था ॥ ८-१० ॥ ब्रह्मा और शिव आदि जिनका सर्वदा स्तवन करते | उसमें अत्यन्त विशाल सरोवर थे, जो पुष्पित हैं, उन गणनांथ गणेशजीकी महिमाका स्पष्ट वर्णन कौन | कमलोंसे युक्त थे, उनपर भ्रमर बैठे रहते थे तथा [उन कर सकता है ? तथापि हे निष्पाप [योगिजन !] उनकी | सरोवरोंमें] हंस, बत्तख, चकवा, बगुला, कच्छप और इस प्रकारकी लीलाका श्रवण करो ॥ २-३॥ | जलमुर्गे क्रीडा करते थे। वहाँ उन कौण्डिन्यमुनिने उत्कट दूर्वांकुरोंकी महिमा मुनियों और देवताओंको भी | तप करना प्रारम्भ किया ॥ ११-१२ ॥ ज्ञात नहीं है। [देवाधिदेव गणेशजीको दूर्वादिसे अर्चनका | वे अपने सम्मुख गणेशजीकी चतुर्भुज स्वरूपवाली, जो पुण्य प्राप्त होता है;] वह यज्ञ, दान, तप, व्रत और | अत्यन्त प्रसन्न मुखमुद्रावाली, सुन्दर, वरद मुद्रावाली, हवनसे भी नहीं प्राप्त होता। इस विषयमें यहाँ एक | दूर्वासे युक्त और सुपूजित महामूर्तिकी स्थापनाकर भगवान् प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें इन्द्र | गणेशजीको प्रसन्नता प्रदान करनेवाले षडक्षर परम और महात्मा नारदके संवादका वर्णन है ॥ ४-५ ॥ | मन्त्रका जप करने लगे। तब उनकी आश्रया नामवाली एक बार नारदजी इन्द्रको देखनेकी इच्छासे | पत्नीने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा- ॥ १३-१४॥ [स्वर्गलोकमें] आये। वहाँ [उनके द्वारा] परम भक्तिसे | आश्रया बोली-हे स्वामिन् ! आप भगवान् पूजित होकर आसन ग्रहण कर लेनेपर बलसूदन इन्द्रने | गजाननको दूर्वाका भार क्यों चढ़ाते हो ? क्योंकि घासके आदरपूर्वक मुनिसे दूर्वाका माहात्म्य पूछा ॥ ६ १/२ ॥ | तिनकोंसे तो कोई प्रसन्न होता नहीं। यदि इससे कोई इन्द्र बोले-हे ब्रह्मन् ! हे मुने ! यह बतलाइये कि | पुण्य होता हो तो आप कृपया मुझसे कहिये ॥ १५ १/२ ॥ देवाधिदेव महात्मा गणेशजीको दूर्वांकुर विशेष रूपसे | कौण्डिन्य बोले-हे प्रिये ! सुनो, मैं दूर्वाके उत्तम क्यों प्रिय हैं ? ॥ ७ १/२ ॥ | माहात्म्यको कहता हूँ ॥ १६ ॥
उ०ख०-अ०६३ ] * गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन * १९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पूर्वकालकी बात है, धर्मराजके नगरमें एक उत्तम उत्सव हो रहा था। उसमें सभी देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, यक्ष और राक्षस आमन्त्रित किये गये थे। वहाँ नृत्य करती हुई तिलोत्तमाका उत्तरीय भूमिपर गिर पड़ा, [जिससे] यमने उसके सुन्दर और विशाल स्तनयुगलको देख लिया। [इससे] वे काम- सन्तप्त, बेचैन और लज्जाहीन-से हो गये॥ १७-१९॥ उन्होंने उसके आलिंगन आदिकी इच्छा की। तदनन्तर [बोध होनेपर] वे धर्मराज लज्जासे मुख नीचे करके सभासे बाहर निकल गये। जाते समय उनका तेज स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा; उससे एक विकृत मुखवाला पुरुष उत्पन्न हुआ, जो ज्वालामालाओंसे युक्त था। वह अपने क्रूर दंष्ट्रारव (दाँत पीसनेकी आवाज)- से तीनों लोकोंको भयभीत कर रहा था, सम्पूर्ण पृथ्वीको जलाये डाल रहा था तथा अपनी जटाओंसे आकाशका स्पर्श कर रहा था॥ २०-२२॥ उसके [भयंकर] नादसे तीनों लोकोंके प्राणियोंके मन अत्यन्त कम्पित हो उठे, तब सभी सभासद् [भगवान्] विष्णुके पास गये। उन सबने अपनी-अपनी मतिके अनुसार अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनका स्तवन किया और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे उनकी प्रार्थना की॥ २३-२४॥ [तब] वे भगवान् विष्णु उन सबके साथ अनामय गणेशजीके पास गये। उस (यमपुत्र)-की मृत्यु उन्हींके हाथसे जानकर उन सबने उन्हें प्रसन्न किया॥ २५॥ देवता और मुनि बोले-आप विघ्नस्वरूपके लिये नमस्कार है, आप विघ्नहारीके लिये नमस्कार है, आप सर्वरूपके लिये नमस्कार है; हे सर्वसाक्षी! आपको नमस्कार है। महान् देवताके लिये नमस्कार है, जगत्के आदि कारण आपके लिये नमस्कार है; हे कृपानिधान! आप जगत्का पालन करनेवाले हैं, आपके लिये नमस्कार है॥ २६-२७॥ पूर्ण तमोगुणारूप आपको नमस्कार है, आप सर्वसंहारकारीको नमस्कार है, हे भक्तवरद! आपको नमस्कार है, सर्वदाताके लिये बारम्बार नमस्कार है॥ २८॥
[दायाँ स्तम्भ] हे अनन्यशरण! हे समस्त कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले! आपको नमस्कार है। वेदके ज्ञाता आपको नमस्कार है, वेदके कर्ता आपको नमस्कार है॥ २९॥ [आपको छोड़कर] हम किस दूसरेकी शरणमें जायें? कौन दूसरा हमारे भयको दूर कर सकता है? [आपकी] प्रजा [हम सब]-पर अकालमें ही प्रलय कैसे आ गयी ? हा देवेश्वर गजानन ! हा विघ्नहर ! हा अव्यय ! हम सब मृत्युको प्राप्त होने जा रहे हैं, आप हमारी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?॥ ३०-३१॥ उनका इस प्रकारका वचन सुनकर शत्रुभयका नाश करनेवाले करुणासागर भगवान् गजानन उन सबके सम्मुख शिशुरूपमें प्रकट हो गये॥ ३२॥ उनके नेत्र कमलके समान थे तथा उनके मुखकी आभा सैकड़ों चन्द्रमाओंकी आभाके समान थी। उनके श्रीविग्रहकी आभा करोड़ों सूर्योंके आभासमूहके समतुल्य थी तथा उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यको पराभूत करनेवाला था॥ ३३॥ उनके दाँत कुन्दकी कलीकी और अधर बिम्बाफलकी शोभाको जीतनेवाले थे। उनकी नासिका उन्नत, भृकुटी और नेत्र सुन्दर तथा कण्ठ शंखके समान था॥ ३४॥ उनका वक्षःस्थल विशाल था, दोनों भुजाएँ घुटनोंतक विस्तृत थीं, उदरप्रदेश गम्भीर नाभिसे सुशोभित था, उनका कटिप्रदेश अत्यन्त सुन्दर था तथा वे बलशाली थे। उनकी स्थूल जंघाएँ केलेके तनेकी शोभासे प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। सुन्दर घुटनों, जंघा और एड़ीसे उनके चरण-कमल सुशोभित हो रहे थे॥ ३५-३६॥ वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और महामूल्यवान् वस्त्र धारण किये हुए थे। इस प्रकारके [रूप-सौन्दर्यवाले] उन भगवान् गणेशको अपने सम्मुख उस नगरकी भूमिपर प्रकट हुआ देखकर देवता और मुनिगण जय-जयकार करते हुए उठकर खड़े हो गये। तदनन्तर उन सबने उनको वैसे ही भूमिपर लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया, जैसे देवगण इन्द्रको प्रणाम करते हैं॥ ३७-३८॥ देवता और ऋषि बोले-हे विभो! आप कौन
२०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हैं ? कहाँसे आये हैं ? क्या कार्य है ? हमसे कहिये। हम पराक्रमको नहीं जानते हैं ॥ ४४-४५ ॥ लोग तो यही जान रहे हैं कि बालकका रूप धारण किये क्या ईश्वरने ही इसका वध करनेके लिये और आप दुष्टसंहारक परम ब्रह्म परमात्मा हैं, जो अनलासुरके पीड़ित तीनों लोकोंकी रक्षा करनेके लिये बालकके रूपमें सन्त्राससे अपने कर्मोंका त्यागकर बैठे हुए हम लोगोंको अवतार लिया है ? ऐसा कहकर उन सबने उन्हें सादर त्राण देनेके निमित्त प्रकट हुए हैं ॥ ३९-४० ॥ प्रणाम किया। उसी समय कालानलका स्वरूप धारण उनके इस प्रकारके वचन सुनकर शिशुरूपधारी किये वह अनलासुर दसों दिशाओंको जलाता हुआ, गजानन गणेशजीने प्रसन्नमुख होकर हँसते हुए उन मनुष्य-लोकका भक्षण करता हुआ वहाँ आया। उस देवताओं और मुनियोंसे इस प्रकार कहा - ॥ ४१ ॥ समय वहाँ क्रन्दन करते हुए मनुष्योंका महान् कोलाहल बालक [ -रूपधारी गणेशजी ]-ने कहा- हे व्याप्त हो गया ॥ ४६-४८ ॥ देवताओ एवं ऋषियो! आप लोग ज्ञानसम्पन्न हैं। आप उसे देखते ही सभी मुनिगण भागनेको उद्यत हो लोगोंने जो कहा, वह सत्य ही है। मैं उस परपीडाकारी गये। उन सबने बालरूपधारी उन गणेशजीसे भी कहा (दूसरोंको कष्ट देनेवाले) दुष्टके वधके लिये अपनी कि 'शीघ्र पलायन करो, नहीं तो यह अत्यन्त प्रचण्ड इच्छासे बालकका रूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक आया अनलासुर निश्चित ही आज वैसे ही तुम्हारी हिंसा कर हूँ। हे पुण्यात्माओ ! मैं उसके वधका जो उपाय बताता देगा, जैसे तिमिंगल नामक मत्स्य छोटी मछलियोंकी हूँ, तुम लोग उसे करो ॥ ४२-४३ ॥ और गरुड़ सर्पोंकी [हिंसा कर देते हैं] ॥ ४९-५० ॥ उसे देखकर आप सब मुझे प्रयत्नपूर्वक प्रेरित उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालकरूपधारी करना, तब उसके और मेरे महान् आचरणको कौतुकपूर्वक परमात्मा गजानन गणेशजी हिमालयपर्वतकी भाँति अचल देखियेगा। उनके इस प्रकारके कृपापूर्ण वाक्य सुनकर वे होकर वहाँ खड़े हो गये। देवता और ऋषि उन सब हर्षमें भरकर आपसमें कहने लगे कि हम सब इनके बालरूपधारी गणेशजीको वहीं छोड़कर दूर चले गये ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वांकुरमाहात्म्यके अन्तर्गत अनलासुरोत्पत्ति' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ चौंसठवाँ अध्याय गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा आश्रया बोली- हे महामुनि! देवताओं और सहित चलायमान हो गयी ॥ ३-४ ॥ ऋषियोंके पलायन कर जानेपर जब बालकरूपधारी आकाशमें बादलोंके गरजनेके समान ध्वनि होने गणेशजी पर्वतके समान स्थित रहे, तब उस बालक और लगी। वृक्षोंकी शाखाओंसे पक्षियोंके समूह भूतलपर गिर अनलासुरके मध्य कौन-सी आश्चर्यजनक घटना घटित पड़े। समुद्र जलहीन हो गये, वृक्ष जड़से उखड़ गये। हुई; उसे मुझसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये ? ॥ १ १/२ ॥ कम्पनकी प्रबलताके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा नारदजी बोले- हे शचीपति ! उसके इस प्रकार रहा था ॥ ५-६ ॥ प्रश्न करनेपर मुनिश्रेष्ठ कौण्डिन्यने जो कहा, वह मैं उसी क्षण बालकरूपधारी भगवान् गजाननने उस बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २१/२॥ अनलरूप धारण किये दैत्यको मायाबलसे पकड़ लिया बालरूपधारी गजाननके पृथ्वीपर पर्वतकी भाँति और सबके देखते-देखते उसे वैसे ही निगल गये, जैसे स्थिर हो जानेपर वह अनलासुर दुर्दमनीय कालाग्निकी अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया था। तदनन्तर उन भाँति वहाँ आया; उस समय अचला पृथ्वी भी पर्वतों परमात्मा गणेशजीने विचार किया कि यदि यह दैत्य मेरे
उ०ख०-अ०६४ ] * गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा * २०९ उदरमें चला गया तो मेरे उदरमें स्थित तीनों भुवनोंको जला डालेगा, जिनका कि मैंने रक्षण किया है। [इसके कारण] सभी ब्रह्माण्डोंका नाश हो जायगा, इसलिये मैं इसको कण्ठमें ही रख लेता हूँ। इसी बीचमें देवाधिदेव गणपति की परमाश्चर्यमयी लीलाको देखनेके लिये अग्नि, इन्द्र आदि देवगण वहाँ आ पहुँचे। तब इन्द्रने उस अग्नि (-रूप असुरके दाह)-को शान्त करनेके लिये चन्द्रमाको उन्हें प्रदान किया॥ ७-१०॥ तब उस चन्द्रमाको मस्तकपर धारण किये हुए भगवान् गणेशका देवताओं और मुनियोंने भी 'भालचन्द्र' इस नामसे स्तवन किया, परंतु फिर भी कण्ठके मध्य भागमें स्थित वह अग्नि शान्त नहीं हुई॥ ११॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने उनको सिद्धि-बुद्धि नामवाली दो मानस कन्याएँ प्रदान कीं। वे केलेके सदृश जंघावाली, कमलनयनी, शैवलसदृश सघन केशोंवाली, चन्द्रमुखी, अमृतसदृश मधुरभाषिणी, कूपसदृश गम्भीर नाभिवाली, सरिताओंसदृश त्रिवलीसे युक्त, कमलनालसदृश मध्यभागवाली (कटिप्रदेशवाली), प्रवालके सदृश अरुणम आभासे युक्त हाथोंवाली और [उत्तापको] शीतल करनेमें समर्थ थीं ॥ १२-१३॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने [गणेशजीसे] कहा कि इन दोनोंका सम्यक् रूपसे आलिंगन करनेसे तुम्हारे कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो जायगी। परंतु उन दोनोंका आलिंगन करनेपर भी गणेशजीकी कण्ठस्थित अग्नि कुछ ही शान्त हुई। तत्पश्चात् कमलापति भगवान् विष्णुने उन्हें एक अत्यन्त कोमल कमल पुष्प प्रदान किया। तबसे वे [भगवान् गजानन] देवताओं और मनुष्योंद्वारा 'पद्मपाणि' कहे जाने लगे॥ १४-१५॥ तब भी अग्निके शान्त न होनेपर वरुणने शीतल जलसे उनको सिंचित किया और गिरिशायी भगवान् शंकरने उन्हें सहस्र फणवाला नाग प्रदान किया॥ १६॥ उससे उदरको बाँधनेके कारण वे 'व्यालबद्धोदर' नामवाले हुए, परंतु तब भी उनका अग्नियुक्त कण्ठ शीतल नहीं हुआ ॥ १७॥ तदनन्तर अठ्ठासी सहस्र मुनिजन उनके समीप आये और उनमेंसे प्रत्येकने इक्कीस-इक्कीस दूर्वाएँ उनके मस्तकपर रखीं, जो अमृतके तुल्य [गुणकारी] थीं। इससे उनके कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो गयी। तब दूर्वांकुरोंके भारसे अर्चित वे परमात्मा गणेशजी भी प्रसन्न हो गये॥ १८-१९॥ [गणेशजी दूर्वांकुरसे प्रसन्न होते हैं—] ऐसा जानकर उन सभी [देवताओं और मुनियों]-ने अनेक दूर्वांकुरोंसे उन गजानन गणेशजीका पूजन किया, जिससे वे गजानन हर्षित हुए ॥ २० ॥ उन्होंने देवताओं और मुनियोंसे कहा कि भक्तिपूर्वक की गयी मेरी पूजा चाहे अल्प हो या महान्, किंतु वह दूर्वांकुरोंके बिना व्यर्थ है ॥ २१ ॥ बिना दूर्वांकुरोंके की गयी पूजाका फल किसीको भी नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिये मेरे भक्तको उषाकालमें की गयी पूजामें एक या इक्कीस दूर्वा चढ़ानी चाहिये ॥ २२ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित की गयी दूर्वा जो महान् फल देती है, [वह फल] सैकड़ों यज्ञों, दानों, व्रतों और अनुष्ठानसमूहोंसे नहीं प्राप्त हो सकता॥ २३ ॥ हे देवताओ और मुनिगण! करोड़ों जन्मोंतक की गयी उग्र तपस्या और नियम-पालनसे भी उतना पुण्य फल नहीं उपार्जित होता, जितना कि दूर्वा समर्पित करनेसे प्राप्त होता है॥ २४॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले—[हे प्रिये!] गणेशजीके इस प्रकारके वचन सुनकर देवताओंने देवाधिदेव परमात्मा गजाननका पुनः दूर्वांकुरोंसे अर्चन किया॥ २५॥ तब उन गणेशजीने पृथ्वी और आकाशको निनादित करते हुए उच्च स्वरसे आनन्दयुक्त गर्जन किया। तदनन्तर हर्षित हुए सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों और मनुष्योंको भी अनेक वरदान देकर वे बालरूपधारी गणेशजी अन्तर्हित हो गये। तब उन सभीने उन गणेशजीका 'कालानल- प्रशमन'—यह नाम रखा। [तत्पश्चात्] उन सबने वहाँ मन्दिरका निर्माणकर उसमें गजानन गणेशजीकी मूर्तिकी स्थापना की और देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका 'विघ्नहर्ता'—यह नाम रखा ॥ २६-२८ ॥ इन विघ्नहर्ता गणेशजीकी कृपासे वहाँ किये हुए
२०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
स्नान, दान, तप और अनुष्ठानसे अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ॥ २९ ॥ वहाँपर गणेशजीने [कालानलपर] विजय प्राप्त की थी, इसलिये वह नगर विजयनगर नामसे प्रसिद्ध हुआ और वहाँपर [गणेशजीने] सभीके विघ्नोंका नाश किया था, इसलिये वे [स्वयं] 'विघ्नहर्ता' नामसे विख्यात हुए ॥ ३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे प्रिये ! दूर्वाके उत्तम माहात्म्यसे सम्बन्धित यह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह दिया; इसके श्रवण और पठनसे सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जाता है। अब मैं एक अन्य पुरातन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, उसका श्रवण करो ॥ ३१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वामाहात्म्यवर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥
पैंसठवाँ अध्याय गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन
[मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे देवि ! किसी समय गजानन गणेशजी सुखासनमें बैठे हुए थे। [उसी समय] नारदमुनि उनका दर्शन करनेके लिये आये। वे बहुत दिनोंके पश्चात् उनके पास आये थे ॥ १ ॥ उन्होंने [उन्हें] साष्टांग प्रणामकर कहा—'हे गजानन ! हमारा जन्म सफल हो गया, जो पुण्य-समूहों [-के उदय] -के फलस्वरूप आपका दर्शन हुआ है ॥ २ ॥ ऐसा कहकर मुनि हाथ जोड़कर उनके सम्मुख स्थित हो गये, तब महाभाग गजाननने उन महान् भाग्यशाली महामुनि नारदजीका हाथ पकड़कर आसनपर बैठाया। गणेशजीद्वारा किये हुए उस सत्कारसे मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी प्रसन्न हो गये ॥ ३-४ ॥ तदनन्तर नारदजीने उन गणाधिपति गणेशजीसे कहा कि 'मेरे हृदयमें जो आश्चर्य व्याप्त है, उसे निवेदन करनेके लिये मैं आया हूँ, तत्पश्चात् आपको प्रणामकर मैं पुनः चला जाऊँगा ॥ ५ ॥ गजानन बोले— [हे मुनिवर !] तुमने कौन-सा आश्चर्य देखा है ? तुम्हारे हृदयमें क्या है ? उसे तुम विशेष रूपसे बतलाओ; तदनन्तर अपने आश्रमको चले जाना ॥ ६ ॥ नारदजी बोले—हे देव ! मिथिलापुरीमें जनक नामके एक श्रेष्ठ राजा हैं; वे अत्यन्त प्रतिष्ठासम्पन्न, दानी तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् हैं ॥ ७ ॥ वे नित्य अन्नदानमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंका अनेक प्रकारके अलंकारों, वस्त्रों और दक्षिणाओंसे पूजन करते हैं। वे दीन-दुखियों, अन्धों और दरिद्रोंको बहुत- सा धन प्रदान करते हैं। याचक उनसे जो-जो माँगते हैं, वे वह सब कुछ उनको प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥ फिर भी उन महान् आत्मावाले [राजा]-का धन समाप्त नहीं होता ! क्या गजानन गणेशजीकी कृपासे ही उनका धन बढ़ रहा है ? इस महान् आश्चर्यको देखनेके लिये मैं उनके राजभवन गया, [परंतु] उन्होंने ब्रह्मज्ञानके अभिमानसे मेरा अपमान किया ॥ १०-११ ॥ मैंने उनसे इस प्रकार कहा कि हे नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, [तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर] भगवान् गजानन तुम्हारे द्वारा चिन्तित वस्तुको तुम्हें प्रदान करते हैं। तब उन्होंने गर्वसे कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं ही त्रिलोकीका ईश्वर हूँ। मैं ही दान देनेवाला और मैं ही दान दिलानेवाला हूँ; मैं ही भोक्ता तथा मैं ही पालनकर्ता हूँ। मेरे स्वरूपसे [मुझसे] अतिरिक्त त्रिभुवनमें दूसरा कुछ है ही नहीं। कर्ता, कारण और कार्यका साधनस्वरूप- सब कुछ मैं ही हूँ' ॥ १२-१४ ॥ नारदजी बोले—[हे गजानन !] मैंने उनके इस प्रकारके वचन सुनकर क्रोधपूर्वक कहा—'ईश्वरके अतिरिक्त जगत्का कर्ता अन्य कोई नहीं है ॥ १५ ॥ हे राजन् ! तुम यह धर्मका दम्भपूर्ण आचरण क्यों कर रहे हो? हे पुण्यात्मन् ! थोड़े ही समयमें मैं तुम्हें इसका प्रमाण दिखला दूँगा।' हे गजानन ! उनसे इस प्रकार कहकर मैं आपके पास चला आया ॥ १६१/२ ॥
उ०ख०-अ०६५ ] * गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन * २०३ [मुनि] कौण्डिन्य बोले- [हे प्रिये !] नारद मुनिके इस प्रकारके वचन सुनकर उन परमात्मा गणेशजीने अर्घ्य, अलंकार और चन्दनसहित दिव्य पुष्पोंसे उनका पूजन किया। मुनि भी उनसे आज्ञा लेकर वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके पास चले आये ॥ १७-१८ ॥ [उधर] गजानन गणेशजी सर्वज्ञ होते हुए भी राजा जनककी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये निन्दनीय वेश धारणकर मिथिला गये। उनका अमांगलिक शरीर अनेक प्रकारके घावोंसे संयुक्त था और उनमेंसे रक्तस्राव हो रहा था। वे मक्खियोंके समूहसे आक्रान्त, दन्तहीन और अत्यन्त आतुर प्रतीत हो रहे थे ॥ १९-२० ॥ उन्हें मार्गमें जाते देखकर कुछ लोग नाक दबा लेते थे, कुछ लोग कपड़ेसे मुख ढक लेते थे और कुछ लोग इधर-उधर थूकने लगते थे ॥ २१ ॥ [इस प्रकार] लड़खड़ाते, गिरते-पड़ते, मूर्च्छित होते तथा पुनः उठकर चलते हुए वे [कुत्सित वेशधारी गणेशजी] बालकोंकी टोलियोंके साथ राजभवनके द्वारपर पहुँचकर द्वारपालोंसे बोले- हे दूतो ! राजासे जाकर निवेदन करो कि मैं वृद्ध भूखा ब्राह्मण अतिथि इच्छानुकूल भोजनकी आकांक्षासे आया हूँ ॥ २२-२३ ॥ तब उन दूतोंने उनके इस तरहके वचनको सुनकर राजा जनकके पास जाकर उन वचनोंको वैसे ही कह सुनाया। तब वे राजा जनक [दूतोंसे] बोले- 'हे दूतो ! उन्हें ले आओ, मैं उन कौतुकी ब्राह्मणको देखना चाहता हूँ।' तब उन दूतोंने उस मलिन वस्त्रधारी और मलिन शरीरवाले ब्राह्मणको राजा जनकके पास पहुँचा दिया। राजाने दूरसे ही देखा कि वह मक्खियोंसे घिरा हुआ काँप रहा है ॥ २४-२५ ॥ पसीनेसे भीगे और घावोंसे रक्त स्रवित होते वृद्ध ब्राह्मणको देखकर राजा जनकने मनमें विचार किया कि क्या ये स्वयं परमात्मा ही हैं, जो मुझे छलनेके लिये ऐसा रूप धारण करके आये हैं। यदि मेरा पुण्य होगा तो मैं इनका मनोवांछित समाधान करूँगा, नहीं तो जो कुछ भविष्यमें होनेवाला है, वह अन्यथा नहीं होता ॥ २६-२७ ॥ नृपश्रेष्ठ जनकजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने द्वारपालोंके साथ उस ब्राह्मणको अपने सम्मुख [कक्षमें] प्रवेश करते देखा ॥ २८ ॥ ब्राह्मण बोला- हे राजन् ! चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश तुम्हारी उज्ज्वल कीर्ति सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। मुझे भोजन प्रदान कीजिये, मैं चिरकालसे अत्यन्त क्षुधित हूँ। हे नरेश्वर ! जबतक मेरी तृप्ति न हो जाय, तबतक अन्न प्रदान करते रहिये, इससे तुम्हें सौ यज्ञ करनेका पुण्यफल प्राप्त होगा ॥ २९-३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले- उन ब्राह्मणदेवताके इस प्रकारके वचन सुनकर राजाने उन्हें अपने राजभवनके भीतर ले जाकर उनका सम्यक् प्रकारसे विधिवत् पूजनकर [उनके लिये] स्वादिष्ट अन्नका परिवेषण किया ॥ ३१ ॥ उनके द्वारा दिया गया [वह अन्न] वे तत्काल उनके सम्मुख ही भक्षण कर गये। [तब] असंख्य पात्रोंमें [उन ब्राह्मणरूपी गजाननके भोजनार्थ] पकनेके लिये उत्तम प्रकारके चावल डाले गये ॥ ३२ ॥ [इस प्रकार] जो भी पका हुआ चावल उनके सामने परिवेषित किया गया, उस सबका वे [ब्राह्मण देवता] भक्षण कर जाते। तब प्रजाजनोंने राजासे कहा- [हे राजन्!] यह तो राक्षस प्रतीत होता है। इसे इतना अधिक [अन्न] क्यों दिया जा रहा है? [क्योंकि] राक्षसोंको [अन्नादि] प्रदान करनेसे किंचिन्मात्रकी भी पुण्यप्राप्ति नहीं होती ॥ ३३-३४ ॥ कुछ लोगोंने कहा- हे राजन्! त्रैलोक्यका भक्षण कर लेनेपर भी इसकी परम तृप्ति नहीं हो सकती। इसलिये इसे अब धान्य* (अनाज) प्रदान करें ॥ ३५ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण ग्रामों और नगरोंसे, घरों तथा भूमिके नीचे दबाकर रखे गये समस्त धान्यको उस सर्वभक्षी द्विजरूपधारी अतिथि-पुरुषके सम्मुख लाकर डाल दिया गया, परंतु उन धान्योंको खा लेनेपर भी उसे
- शस्यं क्षेत्रगतं प्राहुः सतुषं धान्यमुच्यते । आमान्नं वितुषं प्रोक्तं सिद्धमन्नं प्रकीर्तितम् ॥ अर्थात् खेतमें जो भी तैयार फसल खड़ी है, उसे शस्य कहते हैं। तुष (छिलका)-युक्त अनाजको धान्य कहते हैं। छिलकारहित अनाजको आमान्न (कच्चा अन्न) तथा आगमें पके हुए अनाजको सिद्ध अन्न कहते हैं। Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Front
२०४ * पुराणे हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तृप्तिकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ ३६-३७ ॥ तत्पश्चात् दूतोंने राजासे कहा कि [ हे राजन् !] धान्य भी कहीं नहीं प्राप्त हो रहा है। दूतोंके इस प्रकारके वचन सुनकर राजा जनकके मुखके नीचे कर लेनेपर वे ब्राह्मणदेवता 'स्वस्ति' कहकर वहाँसे चले गये। वे तृप्त नहीं हुए थे, अतः घर-घर जाकर 'अन्न दीजिये'—ऐसा लोगोंसे कहने लगे। इसपर लोगोंने उनसे कहा— 'हे ब्रह्मन् ! हम सबके घरका सारा धान्य राजाने मँगवा लिया और उस सम्पूर्ण धान्यका आपने भक्षण कर लिया, इसलिये अब आपकी जहाँ रुचि हो, वहाँ आप जायें' ॥ ३८-४० ॥ ब्राह्मण बोले—मैंने लोगोंसे इस राजाकी इस प्रकारकी कीर्ति सुनी थी कि 'राजा जनकसे श्रेष्ठ दानी कोई नहीं है।' अतः तृप्तिकी कामनासे मैं यहाँ आया हूँ, बिना तृप्त हुए कैसे चला जाऊँ ? ॥ ४१ ॥ [ कौण्डिन्य बोले— हे प्रिये ! ]— लोगोंके मौन हो जानेपर भ्रमण करते हुए उन द्विजश्रेष्ठने विरोचना और त्रिशिरा नामक ब्राह्मण-दम्पतीके सुन्दर भवनको देखा ॥ ४२ ॥ [ गणेशजीके गणोंने कहा— ] हे श्रेष्ठ [योगिजनो!] [तदनन्तर] वे [द्विजरूपधारी भगवान् गजानन] सभी प्रकारके गृहोपकरणोंसे रहित और धातुपात्रोंसे हीन उस भवनमें गृहस्वामीकी भाँति प्रविष्ट हुए ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'जनकके सत्त्वका हरण' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ छाछठवाँ अध्याय कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रदत्त दूर्वाङ्कुरमात्रसे तृप्त होना कौण्डिन्य बोले— [हे प्रिये !] उन दोनों (द्विजदम्पती)-के लिये पृथ्वी ही आसन (बिछावन) और आकाश ही ओढ़ना था। सभी प्रकारकी धातुओंके स्पर्शतकसे रहित उन दोनोंके लिये दिशाएँ ही वस्त्र थीं। द्विजरूपधारी [गजानन]-ने देखा कि वे दोनों अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये बिना याचनाके जो मिल जाय, वही खानेवाले और जलमात्रसे ही सभी धार्मिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेवाले थे ॥ १-२ ॥ उनका घर चारों ओरसे मच्छर और मक्खियोंके समूहोंसे भरा हुआ था। उन्होंने देखा कि उन दोनों (द्विजदम्पती)-के द्वारा अनन्य भक्तिभावसे गणेशजीकी मूर्तिकी पुष्पों और पल्लवोंसे पूजा की गयी है तथा वे दोनों उनकी भक्तिमें निरत हैं। तब उन्होंने उन दोनोंसे कहा— 'हे निष्पाप [द्विज-दम्पती !] जो बात मैं कह रहा हूँ, उसे सुनो ॥ ३-४ ॥ मिथिलाधिपति [महाराज जनक]-की [दान- विषयक] कीर्ति सुनकर मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण तृप्तिकी कामनासे यहाँ आया था, किंतु उन्होंने मुझे तृप्त नहीं किया। दम्भपूर्ण कार्योंसे सत्त्व (धर्म)- की रक्षा नहीं होती। तुम्हारे घरमें मेरे लिये कुछ तृप्तिकर हो तो दो' ॥ ५-६ ॥ [ द्विज-] दम्पती बोले— [राजा जनक] जो चक्रवर्ती सम्राट् थे, जब वे आपकी तृप्ति न कर सके तो हम दोनों दरिद्र आपको तृप्तिकारक क्या दे सकेंगे ? ॥ ७ ॥ जो समुद्र असंख्य नदियों और नदोंके जलसे भी पूर्ण नहीं होता, भला बताओ कि वह बिन्दुमात्र जलसे कैसे पूर्ण होगा ? ॥ ८ ॥ द्विज [-रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक दिया हुआ अत्यन्त अल्प पदार्थ भी मुझे बहुत तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है, जबकि बिना भक्तिके अथवा दिखावेके लिये बहुत अधिक मात्रामें दिया हुआ भी व्यर्थ होता है ॥ ९ ॥ उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे द्विज- श्रेष्ठ ! हम शपथपूर्वक कहते हैं कि हमारे घरमें कुछ भी नहीं है। गणेशजीकी पूजाके लिये हम लोग प्रातःकाल दूर्वांकुर लाये थे। हमने उनसे गणेशजीकी पूजा की थी। उन्हींमेंसे एक दूर्वा बची हुई है ॥ १० १/२ ॥ द्विज [ रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Back
उ०ख०-अ०६६ ] * कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना * २०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
दिया हुआ एक दूर्वांकुर भी मेरे लिये तृप्तिकारक होगा, अतः उसे ही दे दीजिये ॥ ११ ॥ कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] तब [द्विजपत्नी] विरोचनाने उनके इस कथनको सुनकर उस एक दूर्वांकुरको उनको भक्तिपूर्वक प्रदान कर दिया, जिससे वे द्विज तृप्त हो गये ॥ १२ ॥ विरोचनाने उस दूर्वांकुरमें शालि चावल और गोदुग्धसे निर्मित खीर, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, व्यंजनों तथा चाटकर एवं चूसकर खाये जानेवाले विभिन्न भोज्य पदार्थोंकी भावना करके उन्हें उसे दिया था, उसे ग्रहण करके उन ब्राह्मण [-श्रेष्ठ]-ने उसका परम प्रसन्नतासे भक्षण किया ॥ १३-१४॥ [विरोचनाके द्वारा] भक्तिपूर्वक दिये हुए उस एक दूर्वांकुरसे उन द्विज [श्रेष्ठ]-की जठराग्नि तत्क्षण शान्त हो गयी। उन्हें तत्काल परम शान्तिकी प्राप्ति हो गयी। तदनन्तर तृप्त हुए उन द्विजने हर्षपूर्वक त्रिशिराको गले लगा लिया ॥ १५-१६॥ [तत्पश्चात्] उन द्विजने अपना वह कुत्सित रूप त्याग दिया और गजानन गणेशजीके रूपमें प्रकट हो गये। उनका वह स्वरूप चार भुजाओंसे युक्त, कमलके समान नेत्रवाला और दण्डसदृश सूँड़से सुशोभित था ॥ १७ ॥ उन्होंने अपने हाथोंमें कमल, परशु, माला और दाँत धारण कर रखा था। उनके सिरपर महामूल्यवान् मुकुट सुशोभित हो रहा था और उनके कान स्वर्ण-कुण्डलोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनका श्रीविग्रह दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त था। प्रसन्न मनवाले उन गजानन गणेशजीने उन दोनों द्विजदम्पतीसे कहा कि 'जो-जो तुम्हारे मनमें इच्छित कामनाएँ हों, उनके लिये शीघ्र वर माँग लो' ॥ १८-१९ १/२ ॥ उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे देव! हम दोनोंका जहाँ भी जन्म हो, वहाँ [हमारी] आपमें दृढ़ भक्ति बनी रहे अथवा हमें इस अत्यन्त दुस्तर संसार- सागरसे मुक्ति प्रदान कर दीजिये। हे गजानन ! हम दोनोंके
[दायाँ स्तम्भ]
मनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है ॥ २०-२१॥ कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] उन द्विज- दम्पतीके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने 'तथास्तु' कहा और प्रसन्नतापूर्वक [अपने] भक्त त्रिशिराका पुनः आलिंगन करके अन्तर्धान हो गये ॥ २२ ॥ हे आश्रये ! असंख्य व्यंजनोंका भक्षण करनेपर भी जो परमात्मा तृप्त नहीं हुए, उन्हें एक दूर्वांकुरमात्रसे परम तृप्तिकी प्राप्ति हो गयी। इसी कारणसे मेरे द्वारा गणेशजीको दूर्वाका भार (इक्कीस दूर्वांकुर) अर्पित किया जाता है। इस प्रकार मैंने दूर्वांकुरसमर्पण-सम्बन्धी मंगलमयी महिमाका तुमसे सम्यक् रूपसे वर्णन कर दिया, जिसका श्रवण सम्पूर्ण मनोभिलषितोंको प्रदान करनेवाला है। जो इस आख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह इहलोकमें पुत्र, धन एवं मनोभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति करता है और परलोकमें भी आनन्दित रहता है तथा गणेशजीकी भक्ति प्राप्त करता है। निष्काम भक्त मुक्तिकी प्राप्ति करता है ॥ २३-२६ ॥ [गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो !] इस आख्यानका श्रवण करनेपर भी आश्रयाके हृदयमें पुनः सन्देह उत्पन्न हुआ, जिसे जानकर [मुनिवर] कौण्डिन्यने पुनः कहा—हे आश्रये ! अपने सन्देहका निवारण करनेहेतु मेरे कथनका श्रवण करो। हे निष्पाप [प्रिये !] तुम्हारे हृदयमें जो [संशय] स्थित है, वह मुझे ज्ञात है, उसीके [निराकरणके] विषयमें कहता हूँ—एक दूर्वांकुर लेकर तुम शीघ्र इन्द्रके पास चली जाओ। पहले तुम उन्हें आशीर्वाद दो, तत्पश्चात् उनसे सुवर्णकी याचना करो ॥ २७-२९ ॥ दूर्वांकुरसे तौलकर उस स्वर्णको ग्रहणकर यहाँ ले आओ। हे शुभानने ! उस (दूर्वांकुर)-के भारसे न तो कम और न ही अधिक सुवर्ण ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥ [गणेशजीके] गणोंने कहा—[हे योगीश्वरो !] तदनन्तर मुनिवर कौण्डिन्यके इस कथनका श्रवणकर पतिके वचनका पालन करनेवाली आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर शतक्रतु इन्द्रके पास गयी ॥ ३१ ॥
[पाद-टिप्पणी / समापन]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वाके माहात्म्यका वर्णन' नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥
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सड़सठवाँ अध्याय
२०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सड़सठवाँ अध्याय दूर्वाङ्कुरकी महिमाके प्रति संशयग्रस्त आश्रयाको कौण्डिन्यमुनिका इन्द्रके पास दूर्वाङ्कुरके भारके बराबर स्वर्ण लानेके लिये भेजना और एक दूर्वाङ्कुरपर त्रैलोक्यकी सम्पदाका भी न्यून होना
[गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो!] उन मुनि कौण्डिन्यके द्वारा आज्ञा दिये जानेपर अपने अभिप्रायकी सिद्धिके लिये आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर इन्द्रके पास गयी और उनसे कहा—‘हे शक्र! हे सुरेश्वर! मैं अपने पतिकी आज्ञासे तुम्हारे पास याचना करने आयी हूँ; मुझे शुद्ध स्वर्ण प्रदान कीजिये’॥ १-२॥ इन्द्र बोले—[हे साध्वि!] तुम यहाँ क्यों आयी हो? तुम्हारे पतिकी जो आज्ञा थी, उसे तुम मुझे प्रेषित कर देती तो मैं अपनी शक्तिके अनुसार तुमको स्वर्ण भिजवा देता॥ ३॥ आश्रया बोली—हे देव! हे शचीपते! मैं [इस] दूर्वाङ्कुरकी तौलभर ही स्वर्ण लूँगी, न उससे कम और न ही उससे अधिक॥ ४॥ इन्द्र बोले—हे दूत! तुम इन्हें शीघ्र ही कुबेरके भवनमें ले जाओ। वे [इस] दूर्वाङ्कुरके परिमाणभर शुद्ध स्वर्ण दे देंगे॥ ५॥ [गणेशजीके] गण बोले—तदनन्तर देवराज इन्द्रकी आज्ञासे वह देवदूत आश्रयाके साथ कुबेरके भवन गया॥ ६॥ दूत बोला—[हे धनाधिपति!] इन साध्वी मुनिपत्नीको इन्द्रने मेरे साथ भेजा है, मैंने इन्हें आपके भवन पहुँचा दिया। इन्हें आप [इस] दूर्वांकुरके परिमाणभर स्वर्ण प्रदान कर दें। हे देव! आपको नमस्कार है, अब मैं जाता हूँ॥ ७१/२॥ कुबेर बोले—[हे दूत!] मैं अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गया हूँ कि मुनि कौण्डिन्य, इन्द्र तथा आश्रया भी अज्ञानके वशीभूत हो गये; वे यह नहीं जानते कि दूर्वांकुरका परिमाण कितना होगा? उतने सोनेमें क्या होगा? उन्होंने अधिक स्वर्णकी माँग क्यों नहीं की?॥ ८-९॥ [गणेशजीके] गण बोले—[इस प्रकार कहकर] कुबेरने उसे बहुत-सा स्वर्ण दे दिया, परंतु आश्रयाने पतिके भयसे उस स्वर्णको ग्रहण नहीं किया; क्योंकि उसे शंका थी कि यह सुवर्ण [दूर्वांकुरके परिमाणसे] कम या अधिक हो सकता है॥ १०॥ उसने [उस] दूर्वांकुरको स्वर्णकारकी तुलापर रखा, परंतु [कुबेरप्रदत्त] वह स्वर्ण उसके तौलके बराबर न हुआ। तदनन्तर वणिक्-तुला लायी गयी, फिर भी [स्वर्ण और दूर्वांकुरकी] समतुल्यता नहीं हुई। तब तैलकारकी तुलाद्वारा तोलनेका कार्य किया गया, परंतु फिर भी स्वर्ण और दूर्वांकुरकी समतुल्यता नहीं हो सकी॥ ११-१२॥ तत्पश्चात् वहाँ धट (बड़ा तराजू) बाँधा गया। उसके एक पलड़ेमें स्वर्ण रखा गया और दूसरे पलड़ेपर दूर्वांकुर रखा गया। यहाँपर भी दूर्वांकुरवाला पलड़ा भारी होनेके कारण नीचे चला गया। तब कुबेरने अन्य बहुत- सा स्वर्ण [स्वर्णवाले पलड़ेपर] रखा, परंतु वह भी उस दूर्वांकुरके समतुल्य नहीं हो पाया॥ १३-१४॥ तब उन्होंने अपने कोशका पर्वतराज हिमालयकी भाँति [बृहदाकार] सम्पूर्ण द्रव्य दे दिया, फिर भी उस द्रव्यसे दूर्वांकुरकी समता न हो सकी॥ १५॥ तदनन्तर आश्चर्यचकित कुबेरने पत्नीको बुलाया और उनसे कहा कि हे शुभ्रु! मेरे आदेशसे पहले तुम इस धट [-के पलड़े]-पर चढ़ो, यदि तब भी यह दूर्वांकुरके समतुल्य नहीं हुआ, तो अपने सत्त्वकी रक्षाके लिये मैं भी इसपर आरूढ़ हो जाऊँगा। तब वह पतिव्रता पतिकी आज्ञासे उस धट [-के पलड़े]-पर चढ़ गयी॥ १६-१७॥ जब वह भी उस दूर्वांकुरकी समतुल्यता न कर सकी, तो कुबेरने स्वयंसहित अपनी सम्पूर्ण (अलका)- पुरीको उस धटके (पलड़ेके) मध्यमें रखवा दिया, परंतु
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उ०ख०-अ०६७ ] * दूर्वांकुरकी महिमा * २०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
फिर भी वह दूर्वांकुरवाला पलड़ा ऊपर न उठा ॥ १८ ॥ [इस आश्चर्यमयी घटनाका] दूतके मुखसे वृत्तान्त सुनकर इन्द्र गजारूढ़ हो वहाँपर आये और अपने द्रव्यसहित स्वयं भी घट [-के पलड़े]-पर चढ़ गये ॥ १९ ॥ तब भी वह दूर्वांकुर ऊपरकी ओर नहीं उठा। [यह देख] इन्द्र यह सोचते हुए कि यह क्या हो रहा है ? चिन्तित हो गये। उन्होंने [लज्जित होकर] अपना मुख नीचे कर लिया ॥ २० ॥ उन्होंने उस तराजूके पलड़ेपर चढ़नेके लिये विष्णु और शिवका स्मरण किया। तब वे दोनों [महान् देवता] भी अपने-अपने नगरोंसहित वहाँ आ गये और उन दोनोंने भी उस घटपर आरोहण किया ॥ २१ ॥ परंतु तब भी वह दूर्वांकुर स्पष्ट रूपसे ऊपर नहीं उठा। तब वे—शिव, विष्णु, धनाधिपति कुबेर, वरुण, इन्द्र, अग्नि और वायु आदि देवता उस घटसे उतर आये तथा कौण्डिन्यमुनिके पास गये। सभी देवता, देवर्षि, सिद्धगण, विद्याधर और नाग उन मुनिके पास वैसे ही पहुँचे, जैसे दिनकी समाप्तिपर सायंकालमें पक्षी अपने घोंसलेमें पहुँच जाते हैं। [तदनन्तर] उद्विग्न चित्तवाले उन सबने मुनिको नमस्कारकर कहा— ॥ २२-२४ ॥ सभी [देवता, ऋषि आदि] बोले— हे मुने ! हमारे पूर्वजन्मोंके पुण्योंका उदय हुआ है, जो आपका दर्शन हुआ। इससे हमारे सारे पाप नष्ट हो गये और अब हमारा कल्याण हो जायगा ॥ २५ ॥ आपकी पत्नीने हम सबके सत्त्व (बल)-का आज हरण कर लिया है—यह स्पष्ट रूपसे प्रकट है। दूर्वांकुरकी उत्पत्ति और उसकी महिमाको हम नहीं जानते ॥ २६ ॥ आपके द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित और गणेशजीके सिरपर स्थित एक ही दूर्वांकुरकी समतुल्यता तीनों लोक भी नहीं कर सकते ॥ २७ ॥ दूर्वांकुरकी महिमाको सम्यक् रूपसे कौन जान सकता है; यज्ञ, दान, व्रत, तप और स्वाध्याय भी उसकी समता नहीं कर सकते ॥ २८ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
निरन्तर जप और तपमें लीन रहनेवाले गजानन गणेशजीके एकनिष्ठ भक्त आपकी भी महिमाको सम्पूर्ण प्राणियोंमें भला कौन जान सकता है ? ॥ २९ ॥ इस प्रकार कहकर उन सबने पहले गणेशजीका पूजनकर तदनन्तर भार्यासहित मुनिका गीत, नृत्य और स्तवन [आदि]-से पूजन किया ॥ ३० ॥ [तदनन्तर गणेशजीका स्तवन करते हुए उन सबने कहा—] हे देव ! आपका स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञात है, आपकी महिमाको ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वायु, अग्नि, सूर्य, यम, शेष, सम्पूर्ण (षोडश) कलाओंसे युक्त चन्द्रमा, वरुण, अश्विनीकुमारद्वय, बृहस्पति, गरुड़, यक्षराज कुबेर और देवी सरस्वती भी नहीं जानते हैं ॥ ३१ ॥ इस प्रकार देवाधिदेव गजानन गणेशजीका स्तवनकर उन सबने मुनि कौण्डिन्यकी आज्ञा लेकर अपने-अपने निवास-स्थानके लिये प्रस्थान किया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर आश्रया भी दूर्वाके उत्तम माहात्म्यको जानकर पतिके वचनोंके प्रति विश्वस्त होकर उन विघ्नेश्वर गणेशजीका पूजन करने लगी, जो सभी देवताओंके भी देवता हैं और सभीके द्वारा दूर्वांकुरोंसे अर्चित हैं। अत्यन्त निर्मल चित्तसे उसने अपने पति कौण्डिन्यमुनिको प्रणाम किया और अपने-आपकी अत्यन्त निन्दा करते हुए कहने लगी— ॥ ३३-३४१/२ ॥ आश्रया बोली— हे स्वामिन् ! मुझ-जैसी कोई दुष्टा नहीं है, जिसने आपके भी वचनोंपर संशय किया। आप विशेष ज्ञानवालोंसे भी अधिक विशेष ज्ञानवाले हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंपर दयाभाव रखनेवाले हे प्रभो ! आपने उचित ही किया। [मैंने जो आपके वचनोंपर अविश्वास किया,] मेरे उस अपराधको अब आप क्षमा करें। मैं आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ३५-३६१/२ ॥ तदनन्तर दूर्वाके उत्तम माहात्म्यको जानकर उन दोनोंने प्रातःकाल शीघ्र उठकर और दूर्वा लाकर स्नान करके सम्यक् प्रकारसे गणेशजीका पूजनकर अनन्य भक्तिभावसे दूर्वांकुरका अर्पण किया ॥ ३७-३८ ॥ वे दोनों यज्ञ, व्रत, दान आदिका त्याग करके
हमने] दूर्वाके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो
सायं-प्रातः निरन्तर देवाधिदेव गणेशजीका ही पूजन करते थे। यह जानकर परम दयालु भगवान् गजानन गणेशजीने उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया॥ ३९१/२॥ [गणेशजीके] गण बोले- [हे मुनीश्वरो! हमने] दूर्वाके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो अगाध है। जिसके एक पत्रकी तुलना तीनों लोक नहीं कर सकते, उस दूर्वांकुरकी सम्पूर्ण महिमाका वर्णन करनेमें न तो [सहस्र मुखवाले] शेषनाग समर्थ हैं, न ही विष्णु और शिव ॥ ४०-४१॥ दूर्वाके स्मरणमात्रसे त्रिविध पाप नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि उसका स्मरण करनेपर भगवान् गजाननका भी स्मरण हो जाता है। इस प्रकार चिन्तामणिक्षेत्रके माहात्म्यका स्पष्ट रूपसे वर्णन किया गया, जिसके श्रवण, कीर्तन और ध्यान करनेसे भोग और मोक्षरूपी फलकी प्राप्ति होती है ॥ ४२-४३॥ इसी कारण उन तीनों (रासभ, वृषभ और चाण्डाली)-के लिये सुन्दर विमान भेजा गया था। गधे और बैलके मुखसे [निकलकर] दूर्वा भगवान् गणेशजी [के मस्तक]-पर पहुँची थी। चाण्डालीद्वारा तृणोंका भार शीतनाशके लिये लाया गया था। प्रबल वायुके झोंकेसे [उड़कर उसमेंसे] एक दूर्वा गजानन गणेशजी [के मस्तक]-पर पहुँच गयी; क्योंकि दूर्वा उनको प्रिय है, इसलिये वे विनायक उससे प्रसन्न हो गये और उन तीनोंके निष्पाप हो जानेके कारण उन्होंने उन्हें अपना सान्निध्य प्रदान किया ॥ ४४-४६॥ दूर्वाके गन्धमात्रसे वे प्रभु प्रसन्न हो जाते हैं, भक्तिपूर्वक उसकी चर्चा करनेसे प्रसन्न हो जाते हैं, तो फिर मस्तकपर दूर्वाके अर्पणसे होनेवाली उनकी प्रसन्नताका भला क्या कहना ? ॥ ४७ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी !] इस प्रकार [गणेशजीके] गणोंद्वारा कही गयी दूर्वाकी महिमाका राजा [कृतवीर्यके पिता]-ने श्रवण किया, जिसे मुनियोंने भी [कभी] न देखा था, न सुना था ॥ ४८ ॥ तदनन्तर राजाने स्नानकर दूर्वांकुरोंको लेकर [उनसे] भगवान् विनायकका पूजन किया, तत्पश्चात् उसके सेवकोंने भी दूर्वांकुरोंसे श्रीगजाननका अर्चन किया ॥ ४९ ॥ [इससे] वे सभी दिव्य शरीरवाले और तेजसे सूर्यसदृश कान्तिमान् हो गये। उन सबने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनके अंगोंमें दिव्य चन्दनका लेप लगा था। देवताओंद्वारा बजाये जा रहे वाद्योंकी अनेक प्रकारकी ध्वनियोंका श्रवण करते हुए वे एक श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले गये और उनमेंसे कुछने उनका रूप धारण कर लिया अर्थात् उन्हें सारूप्य मुक्ति प्राप्त हो गयी ॥ ५०-५१ ॥ उस [गणेश]-महोत्सवको देखनेके लिये कुछ नागरिक जन भी आये थे, उन्होंने भी गणेशजीके पृथक्- पृथक् इक्कीस नामों* से दूर्वांकुरार्चन किया ॥ ५२ ॥ वे सभी समस्त भोगोंका भोगकर गणेशजीके धामको चले गये और उनके पुण्यसमूहके प्रभावसे विमान भी ऊर्ध्वगामी हो गया ॥ ५३॥ इसलिये गणेशजीके भक्तको दूर्वांकुरोंसे उनका अर्चन करना चाहिये। जो मनुष्य प्रमादवश दूर्वांकुरोंसे उनका अर्चन नहीं करता, उसे चाण्डाल जानना चाहिये। वह अनेक नरकोंमें जाता है। मनुष्यको कभी भी उसका मुख नहीं देखना चाहिये ॥ ५४-५५ ॥ उन देवदेव गजाननका जो व्यक्ति दूर्वांकुरोंसे अर्चन करता है, उसके दर्शनसे अन्य पापी व्यक्ति भी शुद्धिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ५६ ॥ यदि बहुत-से दूर्वांकुरोंकी प्राप्ति न हो सके तो एक दूर्वासे ही पूजन करे, उस एक दूर्वासे भी की गयी पूजा [बिना दूर्वाके की गयी पूजासे] करोड़ों गुना फल देती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५७॥
पाद-टिप्पणी (Footnote): * १. गणाधिपाय नमः, २. उमापुत्राय नमः, ३. अघनाशनाय नमः, ४. एकदन्ताय नमः, ५. इभवक्त्राय नमः, ६. मूषकवाहनाय नमः, ७. विनायकाय नमः, ८. ईशपुत्राय नमः, ९. सर्वसिद्धिप्रदाय नमः, १०. लम्बोदराय नमः, ११. वक्रतुण्डाय नमः, १२. मोदकप्रियाय नमः, १३. विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः, १४. विश्ववन्द्याय नमः, १५. अमरेशाय नमः, १६. गजकर्णाय नमः, १७. नागयज्ञोपवीतिने नमः, १८. भालचन्द्राय नमः, १९. परशुधारिणे नमः, २०. विघ्नाधिपाय नमः, २१. विद्याप्रदाय नमः। (श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड ६९। ३५)
उ०ख०-अ०६८ ] * कृतवीर्यके पिताका कृतवीर्यको स्वप्नमें दर्शन देना * २०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूप (Transcription) है:
२१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- कीजिये और हमसे बताइये कि शोक करनेका क्या कारण है ? आपको [इस प्रकार] शोकग्रस्त देखकर हमें भी तीव्र शोक हो रहा है ॥ १५-१६ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन!] मन्त्रियोंकी बात सुनकर कृतवीर्यने उनसे कहा कि मैंने स्वप्नमें पिताजीको देखा, इसीलिये मेरा मन विह्वल है ॥ १७ ॥ संकटचतुर्थीव्रतका बोध करानेवाली पुस्तक मेरे हाथमें देकर वे उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥ उनके वियोगमें मैं वैसे ही शोकाकुल हूँ, जैसे हाथमें आये हुए धनके चले जानेपर निर्धन व्यक्ति शोकाकुल होता है। उन्होंने मुझसे यह वचन कहा कि पुत्रकी कामनासे तुम यह व्रत करो ॥ १९ ॥ हे मन्त्रिगण ! जब मैं प्रबुद्ध हुआ (जगा), तब मैंने [अपने] हाथमें पुस्तक देखी। उसी समयसे मैं आश्चर्य, हर्ष और शोकसे आँसू बहा रहा हूँ, इसके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है ॥ २० ॥ मन्त्री बोले—[हे राजन्!] जो मनुष्य, सर्प और राक्षसोंसहित समस्त लोकोंके पिता हैं, उन्हीं गजानन गणेशजीने पितृरूपमें तुमसे सन्तानप्राप्तिका उपाय कहा है; अन्यथा हे नृपश्रेष्ठ ! स्वप्नकालिक उपलब्धि वास्तविक कैसे होती और स्वप्नमें देखी हुई पुस्तक प्रत्यक्ष कैसे उपस्थित हो जाती ! बिना उनकी कृपाके स्वप्न भी विपरीत फल ही देनेवाले होते हैं ॥ २१-२२१/२ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन !] मन्त्रियोंके इस प्रकारके वचन सुनकर सावधानचित्त होकर राजाने पण्डितों और सुहृज्जनोंको बुलाकर उनसे पूछा कि हे द्विजगण ! गणेशजीकी कृपासे प्राप्त इस पुस्तकका अर्थ बतलाइये। तब उन सबने उस पुस्तकको देखकर सम्पूर्ण सभाको उसका अर्थ बतलाया ॥ २३-२४१/२ ॥ द्विज बोले—हे राजन् ! इसमें आप कृतवीर्यके पिता और ब्रह्माजीका महान् संवाद वर्णित है ॥ २५ ॥ इसमें सम्पूर्ण संकटोंका नाश करनेवाले [गणेश] चतुर्थीव्रतका निरूपण हुआ है। चन्द्रमाके उदय होनेपर की जानेवाली गणेशजीकी पूजा इसमें विस्तारपूर्वक कही गयी है ॥ २६ ॥ इसमें अंगारकचतुर्थीकी महिमाका बार-बार वर्णन हुआ है तथा चतुर्थी तिथि, भगवान् गणेश और चन्द्रमाको दिये जानेवाले अर्घ्यका मन्त्रसहित वर्णन है। इक्कीस ब्राह्मणोंको भोजन कराने, उनका पूजन करने और उन्हें अनेक प्रकारके दान देनेका इसमें निरूपण है ॥ २७-२८ ॥ गणेशजीको दूर्वा समर्पण करनेके फलका तथा श्वेत दूर्वा समर्पित करनेके फलका इसमें पृथक् रूपसे वर्णन है। हे निष्पाप महाभाग ! यह व्रत बड़े ही भाग्यसे आपको प्राप्त हुआ है ॥ २९ ॥ इससे पहले संसारमें इस व्रतको करते न तो किसीको देखा गया था, न ही इसके विषयमें सुना गया था। यह भविष्यमें लोगोंके लिये उपकारी होगा। इसके [माहात्म्यके] श्रवण और स्मरणसे भी मनुष्योंके संकटोंका हरण होगा ॥ ३० ॥ इन्द्र बोले—[हे राजा शूरसेन!] पण्डितोंके मुखसे [संकटचतुर्थीविषयक] वह वर्णन सुनकर राजा कृतवीर्य और अन्य सभी लोग आश्चर्यमिश्रित हर्षसे भर गये। तदनन्तर राजाने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन किया तथा उन्हें बहुत-से वस्त्र, अलंकरण, रत्न और धन- धान्य प्रदान किये। तत्पश्चात् राजा कृतवीर्यने अपने कुलगुरु अत्रिको बुलाकर उनका तथा भगवान् विनायक गणेशजीका यथाविधि पूजनकर शुभ मुहूर्तमें [गणेशजीके] शुभ फलदाता एकाक्षर मन्त्रको ग्रहण किया ॥ ३१-३३ ॥ तदनन्तर राजाने जितेन्द्रियतापूर्वक गणेशजीका ध्यान करते हुए अनन्य भक्तिसे उनके मन्त्रका जप किया और गणाधिपति गणेशजीकी प्रसन्नता एवं पुत्र-प्राप्तिके लिये उस संकटनाशनव्रतको सम्पन्न किया ॥ ३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'व्रतनिरूपण' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥
उनहत्तरवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०६९] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २११ उनहत्तरवाँ अध्याय देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना [ राजा] शूरसेन बोले— [हे देवराज ! सिद्धि प्रदान करनेवाले तथा] हितकर उत्तम संकटचतुर्थी व्रतका ब्रह्माजीने कृतवीर्यके पिताको किस प्रकार उपदेश किया था ? वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥ इन्द्र बोले—हे राजन् ! राजा कृतवीर्यके पिताने सत्यलोकमें जाकर सुखपूर्वक बैठे हुए सर्वज्ञ चतुर्मुख ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा ॥ २ ॥ कृतवीर्यके पिता बोले—प्रणतजनोंके कष्टोंका निवारण करनेवाले, जगत्को धारण करनेवाले हे देवाधिदेव ! मेरे हृदयमें जो प्रश्न है, उसे मैं आपसे पूछता हूँ, आप [कृपया] उसके विषयमें बतलाइये ॥ ३ ॥ हे प्रभो ! आपत्तियोंसे घिरे हुए, व्याकुल चित्तवाले, चिन्तासे व्यग्र मनःस्थितिवाले, सुहृज्जनोंसे वियुक्त, दुर्लभ लक्ष्यप्राप्तिकी कामनावाले मनुष्यको कार्यकी सिद्धि कैसे हो ? उसे नित्य अर्थसिद्धिकी प्राप्ति कैसे हो तथा पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्तिकी प्राप्ति कैसे हो ? समस्त संकटोंके नाशके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये ? ॥ ४-५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! सुनो, मैं तुमसे सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले व्रतको कहता हूँ, जिसके अनुष्ठानमात्रसे मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओंकी प्राप्ति कर लेता है। व्रतके दिन औषधियों और सफेद तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। तत्पश्चात् [व्रतका] संकल्प करे। भगवान् गजाननका सम्यक् प्रकारसे ध्यानकर भक्तिपूर्वक आगमोक्त मन्त्रोंसे कृष्णपक्षकी चतुर्थीतिथिको रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर गणेशजीका पूजन करे ॥ ६-८ १/२ ॥ कृतवीर्यके पिता बोले—हे ब्रह्मन् ! देवाधिदेव | गणेशजीका पूजन कैसे करना चाहिये ? प्रेमपूर्वक पूछनेवाले मुझसे आप विस्तारपूर्वक कहें ॥ ९ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—नित्यकर्मका समापनकर रात्रिमें चन्द्रमाके उदित होनेपर पवित्र स्थानमें गोबरसे लीपकर छोटा-सा मण्डप बनाये। वहींपर गणेशजीके पूजनहेतु पीठकी स्थापनाकर कुंकुमयुक्त अक्षतोंसे उसका पूजन करे। तदनन्तर उसपर पंचरत्न१ समन्वित कलशकी स्थापना करे। [और] उस कलशके ऊपर स्वर्णनिर्मित पात्र रखे ॥ १०-१२ ॥ सुवर्णके अभावमें चाँदी, ताँबा या बाँसका बना पात्र स्थापित करे और उसमें रेशमी या अपनी शक्तिके अनुसार वस्त्र रखे। तत्पश्चात् उस [वस्त्र] - के ऊपर आगमोंमें वर्णित विधानके अनुसार गणेशयन्त्रकी रचना करे और उसपर शुभ लक्षणोंसे युक्त गणेशजीकी सोनेकी मूर्ति प्रतिष्ठापित [ करके उन भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान करते हुए इस प्रकार पूजा] करनी चाहिये - ॥ १३-१४ ॥ [उपासक सर्वप्रथम निम्नोक्त मन्त्रोंसे गजाननदेवका ध्यान करे-] ध्यान- जिनका वर्ण प्रतप्त स्वर्णके सदृश प्रभावाला है, जो विशाल शरीर और एक दाँतवाले हैं; जिनका उदर विशाल है, जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें दहकती हुई अग्निके समान हैं, जो मूषक [-रूपी वाहन]-के पृष्ठदेशपर सम्यक् रूपसे आरूढ़ हैं तथा [अपने] गणोंद्वारा चँवर डुलाये जा रहे हैं, शेषनागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण किये हुए-ऐसे गजानन गणेशजीका ध्यान करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥ आवाहन२—हे देवाधिदेव ! आप आइये और मुझे संकटसे उबारिये। जबतक मेरा व्रत सम्पूर्ण न हो जाय, तबतक आप [इस मूर्तिमें] विराजमान रहें ॥ १७ ॥ [इस १-कनकं कुलिशं मुक्ता पद्মরাगं च नीलकम् । एतानि पञ्चरत्नानि सर्वकार्येषु योजयेत् ॥ अर्थात् सोना, हीरा, मोती, पद्মরাग और नीलम-ये पंचरत्न कहे जाते हैं। २-कतिपय विद्वान् इन आवाहनादि सभी उपचारोंका समर्पण 'ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय हुं फट् स्वाहा' -इस मन्त्रके द्वारा करनेका निर्देश करते हैं।
२१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सहस्रशीर्षा० १'—इस वैदिक ऋचासे आवाहन करे। आसन— हे गणाधिपति ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! आपको नमस्कार है। हे देव! आप आसन ग्रहण करें और मुझे संकटसे उबारें ॥ १८ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पुरुष एव० २' इस वैदिक ऋचासे आसन प्रदान करे। पाद्य— हे उमापुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मोदकप्रिय ! नमस्कार है। हे देवेश्वर ! [इस] पाद-प्रक्षालनहेतु दिये गये जलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ १९ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'एतावानस्य ० ३' इस वैदिक ऋचासे पाद्य-समर्पण करे। अर्घ्य— हे लम्बोदर ! आपको नमस्कार है, हे देवेश्वर ! रत्नसे युक्त और फलसे समन्वित इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २० ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'त्रिपादूर्ध्व० ४' इस वैदिक ऋचासे अर्घ्य-समर्पण करे। आचमन— [हे प्रभो !] गंगा आदि सभी तीर्थोंसे लाये गये उत्तम जलको आचमनहेतु ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २१ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'ततो विराड० ५' इस वैदिक ऋचासे आचमनके लिये जल प्रदान करे। पंचामृतस्नान— [हे प्रभो !] दूध, दही, घी, शर्करा और शहदसे युक्त इस पंचामृतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २२ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पञ्च नद्यः० ६' आदि वैदिक मन्त्रोंसे पंचामृतस्नान कराये।
[दायाँ स्तम्भ] स्नान— [हे देव !] नर्मदा, चन्द्रभागा [आदि पुण्यदायिनी नदियों] तथा गंगा-संगमके जलसे आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्नान कराये गये हैं, आप मेरे संकटका निवारण करें ॥ २३ ॥ 'यत्पुरुषेण ० ७' इस वैदिक ऋचासे [शुद्धोदक] स्नान कराये। वस्त्र— हे गजानन ! आपको नमस्कार है। हे परमात्मन् ! इस वस्त्रयुगल (धोती और उत्तरीय)-को ग्रहण कीजिये। हे गणाध्यक्ष ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २४ ॥ 'तं यज्ञम् ० ८' इस वैदिक ऋचासे वस्त्र समर्पित करे। यज्ञोपवीत— हे विनायक ! आपको नमस्कार है। हे परशुधारिन् ! आपको नमस्कार है, इस उपवीतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २५ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम् ० ९' इस वैदिक ऋचासे यज्ञोपवीत समर्पित करे। आभूषण— [हे गजानन !] केयूर, कटक, मुद्रिका, अंगद आदि इन अलंकारोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २६ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'स हि रत्नानि' इस वैदिक ऋचासे अलंकार अर्पण करे। गन्ध— हे ईशपुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मूषकवाहन ! आपको नमस्कार है। हे देव! [इस] चन्दनको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २७ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः ० १०' इस वैदिक ऋचासे चन्दन समर्पित करे। अक्षत— हे देव! घृत और कुंकुमसे युक्त सुन्दर मनोहर चावलोंको अक्षतके रूपमें आपको समर्पित किया है, [इन्हें ग्रहण कीजिये और] मेरे संकटका निवारण
पाद-टिप्पणी (वैदिक मन्त्र): १. सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिग्ंसर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (यजु० ३१ । १) २. पुरुष एवेदग्ं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (यजु० ३१ । २) ३. एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (यजु० ३१ । ३) ४. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ (यजु० ३१ । ४) ५. ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (यजु० ३१ । ५) ६. पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः । सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥ (यजु० ३४ । ११) ७. यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१ । १४) ८. तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ९) ९. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ६) १०. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ (यजु० ३१ । ७)