गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५७ विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे। विरही-निकृन्तन-कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥५ ॥ माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ। मुनि-मनसामपि मोहन-कारिणि तरुणाकारणबन्धौ— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥६ ॥ स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित चूते। वृन्दावन-विपिने परिसर-परिगत-यमुनाजलपूते— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥७ ॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमुदयतु हरिचरणस्मृतिसारं । सरस-वसन्त-समय वनवर्णनमनुगत मदन-विकारम्— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥८ ॥ अब यहाँ नीचे प्रत्येक पद्य, पद्यका अन्वय, श्लोकानुवाद, पद्यानुवाद तथा बालबोधिनी व्याख्या दी जा रही है— ललित-लवङ्गलता-परिशीलन-कोमल-मलय-समीरे मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज कुटीरे— विहरति हरिरिह सरस-वसन्ते नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहि-जनस्य दुरन्ते ॥१॥ध्रुवम् अन्वय—अयि सखि, ललित-लवङ्गलता-परिशीलन-कोमल- मलय-समीरे ललितानां मनोहराणां लवङ्गलतानां परिशीलनेन संसर्गेण कोमलः मृदुः सुरभिश्च मलयसमीरः मलयवायुः येन तादृशे; लतानारी-संस्पर्शात् कोमलत्वेन मान्द्यं, पुष्पसम्बन्धात् सौगन्ध्यं, यमुनाजलसम्बन्धात् शैत्यम्, अचेतनापि लता कान्तमन्तरेण चेत् स्थातुं न शक्नोति तर्हि चेतनानां का कथेति भावः); मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-
५८ श्रीगीतगोविन्दम् कुञ्जकुटीरे (मधुकराणां भ्रमराणां निकरैः समूहैः करम्बिताः मिश्रिताः ये कोकिलाः तैः कूजितं मुखरितं कुञ्जकुटीरं यत्र तथाभूते); [तथा] विरहि-जनस्य दुरन्ते (निपीड़के) [सरसोऽपि वसन्तोऽयं विरहिणां दुःखदत्वात् दुरन्त इत्यर्थः]; इह सरस-वसन्ते (रसमये वसन्ते) [रसोऽत्र शृङ्गारः]; हरिः (मनोहरणशीलः अतोऽस्य विरहो दुःसहः) युवति-जनेन (कयाचित् तरुण्या) समं (सह) विहरति (क्रीडति) नृत्यति च॥१॥ अनुवाद—प्रिय सखि! राधे! हाय! यह वसन्तकाल विरही जनोंके लिए अतीव दुःखदायी है। देखो न! इसके आगमनपर मलय समीर सुकोमल मनोज्ञ लताओंको पुनः-पुनः आदरके साथ आलिङ्गनकर कैसी मनोहर शोभा प्रकट कर रहा है। देखो! कुञ्ज-कुटीरमें भ्रमरोंके मँडरानेसे उत्पन्न गुञ्जारसे तथा कोयलोंकी सुमधुर कुहुध्वनिसे दिग्दिगन्त परिपूरित हो गये हैं और वे श्रीकृष्ण इस कुञ्ज कुटीरमें किसी भाग्यवती युवतीके साथ विहार कर रहे हैं और प्रेमोत्सवमें मग्न होकर नृत्य भी कर रहे हैं। पद्यानुवाद— ललित लवङ्गलता परिचुम्बित कोमल मलय समीर मधुकर-निकर कलित कोकिलसे कुजित कुंज-कुटीर लहर उठता रमणीका चीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥१॥ बालबोधिनी—जब मलय समीरके सम्पर्कसे वृक्षावलियोंमें नवजीवनका सञ्चार होने लगता है, बेली, चमेली आदि पुष्पोंके खिलनेसे भौंरे गुञ्जार करने लगते हैं, आम्रके मुकुलित होनेसे कोयलें कूजन करने लगती हैं और वे कन्दर्प-मत्त-मातङ्गके समान मोरपंखकी पगड़ी धारणकर सबके मनको विमोहित करते हैं। वसन्तके समयमें वसन्त-राग होता है। यति-तालमें लघु और द्रुतकी त्रिपुटी रहती है। सखी-इस पदसे सुहृदत्व सूचित हो रहा है।
प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ५९ सरसवसन्ते-सरस विशेषणके द्वारा वसन्त ऋतुकी रसमयता और आस्वाद्यता सूचित की गई है। विरहि जनस्य दुरन्ते-विरहीजन इस सरस वसन्तमें बड़े दुःखके साथ अपने समयको बिताते हैं। श्रीहरि अपने मधुर लीलाओंके द्वारा सबके चित्त, मन और प्राणोंका हरण कर लेते हैं और फिर उनका विरह अतिशय कष्टदायी और असहनीय होता है। ललित लवङ्गलता परिशीलन कोमल मलय समीरे-श्रीकृष्ण जहाँ विराजमान हैं, उस स्थानकी विशेषता बतलाते हुए कहते हैं कि मनोहर लवङ्गलताओंके संस्पर्शसे यहाँकी मलय वायु मृदुल बन गयी है, यों तो मलय समीर शीतल, मन्द और सुगन्धित होता है, किन्तु लवङ्ग-लताओंके संस्पर्शसे वह और भी कोमल और सुगन्धित बन गया है। मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज-कुटीरे-इस पदका विग्रह है-मधुकराणां यो हि निकर स्तेन करम्बिताः मिश्रिताः ये कोकिला स्तैः कूजितः यः कुञ्ज कुटीरः तत्र। अर्थात् नृत्य स्थान अमर समुदाय एवं कोकिला समूहसे कूजित कुञ्जकी कुटीर है। इस प्रकार किसी सहचरीके द्वारा विरह उत्कण्ठिता श्रीराधाके समीप वसन्तकालीन वृन्दावनकी शोभाका वर्णन किया गया है। मनोहर लवङ्ग-लताके द्वारा वृक्षका आलिङ्गन किये जानेसे, मलय पवनके संस्पर्शसे, पुष्पोंकी सुगन्धसे, यमुना जलकी शीतलतासे, लताओंकी कमनीयतासे, नारियोंके सुकोमल अङ्गके स्पर्शसे यह वसन्त, कान्तके मिलनमें जितना सुखदायी होता है, विरहमें उतना ही दुःखदायी भी होता है। जब वसन्त विलास होनेसे अचेतन लता भी कान्तके बिना नहीं रह सकती, तब चेतनस्वरूपा स्त्रीलता कान्तके बिना कैसे रह सकती है? इसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन,
६० श्रीगीतगोविन्दम् कोयलोंका कूजन और भी हृदय विदारक हो जाता है। जब माधवी और बेली पुष्पोंके सौरभसे मुनियोंका मन भी आकर्षित हो जाता है, तब कामी-कामिनियोंकी तो बात ही क्या ? पुनः माधवकी स्फूर्ति प्राप्त होनेपर सखी कहती है—माधवी-लता जब आम्र वृक्षका आलिङ्गन करती है, तो मञ्जरियाँ पुलकित हो उठती हैं। जैसे किसी वर सुन्दरीके द्वारा किसी पुरुषको आलिङ्गन किये जानेसे वह पुलकित हो जाता है, वैसे ही आज श्रीहरि यमुना जलसे व्याप्त वृन्दाविपिनमें वसन्तकालकी शोभासे मुग्ध होकर युवतियों द्वारा आलिङ्गन परायण होकर विहार कर रहे हैं। इस श्लोकमें शृङ्गारके उद्दीपन विभागोंका वर्णन है। इन विभागोंसे विप्रलम्भ-शृङ्गारकी पुष्टि होती है ॥१॥ उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधूजन-जनित-विलापे । अलिकुल-संकुल-कुसुम-समूह-निराकुल-बकुल-कलापे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥२॥ अन्वय—उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधूजन-जनित-विलापे (उद्गतो मदो यस्य तेन गर्वस्फीतेन मदनेन मनोरथो येषां तेषां पथिकवधूजनानां जनितो विलापो येन तस्मिन्) [तथा] अलिकुल-सङ्कुल-कुसुम-समूह-निराकुल-बकुल-कलापे (अलि- कुलेन भ्रमरनिकरेण सङ्कुलः आकीर्णो यः कुसुम-समूहः तेन निराकुलः नितरामाकुलः व्याप्तः इति यावत् वकुलकलापः यस्मिन् तादृशे) [सरस वसन्ते इत्यादि] ॥२॥ अनुवाद—प्रिय सखि ! प्रवासमें गये हुए पतियोंके विरहका अनुभवकर विरहिणियाँ केवल विलाप करती रहती हैं। तुम देखो तो ! इस वसन्त ऋतुमें मालती वृक्षोंमें पुष्पोंको समा लेनेके लिए कोई रिक्त स्थान ही नहीं है। राशि-राशि बकुल
प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६१ पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं और इनपर श्रेणीबद्ध होकर असंख्य भ्रमर गुञ्जार कर रहे हैं और उधर श्रीकृष्ण युवतियोंके साथ विहार तथा नृत्य कर रहे हैं। हाय ! कैसे धैर्य धारण करूँ ॥२॥ पद्यानुवाद- काम-पीड़िता पांथ-वधू का व्यापित बहुल विलाप, अलिकुल संकुल सुमन मनोहर पादप बकुल कलाप। नहीं धरते हैं विरही धीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥२॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत श्लोकमें वसन्तकी दुरन्तता और उन्मादकताका चित्रण करते हुए सखी श्रीराधारानीसे कहती है कि यह समय विरहीजनोंके लिए अति दुष्कर है, इस समय मद तथा काम आविर्भूत हो जाते हैं। प्रियतमके द्वारा प्रवास हेतु चले जानेपर नानाप्रकारके मनोरथोंके द्वारा प्रचालित होकर नायिकाएँ विरह विलाप करती रहती हैं। चहुँदिशि मौलश्री आदि कुसुमसमूहके द्वारा सुगन्ध विकीर्ण करनेपर आमोदित भ्रमरकुल जैसे विकल होकर गुञ्जन करते हैं ॥२॥ मृगमद-सौरभ-रभसवशंवद नवदलमाल-तमाले। युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज-नखरुचि-किंशुकजाले- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥३॥ अन्वय-मृगमद-सौरभ-रभस-वशंवद-नव-दलमाल-तमाले (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः यः सौरभ-रभसः सौरभ-वेगः सौगन्ध्यातिशय इति यावत् तस्य वशंवदा वशवर्त्तिनी अनुकारिणीति भावः, नव-दल-माला किशलयसमूहः येषु तादृशः, तमालाः यस्मिन् तथा-भूते); [तथा] युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज- नखरुचि-किंशुक-जाले (युवजनानां तरुणानां हृदय-विदारणाः हृदयभेदकराः मनसिजस्य मदनस्य ये नखाः तेषां रुचिः
६२ श्रीगीतगोविन्दम् शोभाइव रुचिः शोभा येषां तथाभूतानां किंशुकानां पलाश-कुसुमानां जालं समूहः यस्मिन् तादृशे) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥३॥ अनुवाद—तमाल वृक्षावली नूतन पल्लवोंसे विभूषित हो मानो कस्तूरीकी भाँति चारों ओर सौरभका विस्तार कर आमोदित हो रही है। देखो, देखो सखी ! इन प्रफुल्लित ढाक (पलाश) के पुष्पोंकी कान्ति कामदेवके नखके समान दिखायी दे रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मदनराजाने मानो युवक युवतियोंके वक्षस्थलको विदीर्ण कर दिया है॥३॥ पद्यानुवाद— मृगमद-सौरभ सम विस्तारित परिमल मधुर तमाल; युवजन मन-बेधक मनसिज-कर नखरुचि किंशुक जाल। हृदयमें उठती रह रह पीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—समस्त दिशाओंमें तमाल वृक्षके नवीन पल्लव सुशोभित हो रहे हैं और उनकी सुगन्ध कस्तुरीके समान चतुर्दिशि व्याप्त हो रही है। प्रस्फुटित पलाश कुसुम- समूहको देखकर लगता है कि वे मानो विरही युवक युवतियोंके हृदयको विदीर्ण करनेके साधनभूत मदनदेवके नखरे-नख रूपी आयुध विशेष हैं। अर्थात् श्रीमाधवका अङ्गसौरभ चारों ओर आमोदित हो रहा है, परन्तु उनका विरह अति असहनीय हो गया है। उनके विरहमें युवतियोंका हृदय विदीर्ण हो गया है। यह बड़ा ही कठोर है। मदन-महीपति-कनक-दण्डरुचि-केशर-कुसुम-विकासे। मिलित-शिलीमुख-पाटल-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥४॥ अन्वय—मदन-महीपति-कनक-दण्ड-रुचि-केशर-कुसुम विकाशे (मदनमहीपतेः मदन-राजस्य यः कनकदण्डः स्वर्णमययष्टिः तस्य रुचिरिव रुचैर्यस्य तादृशः केसर-कुसुमानां
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६३ नागकेसरपुष्पाणां विकासो यस्मिन् तथोक्ते); [तथा] मिलित- शिलीमुख-पाटलि-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे (मिलिताः समवेताः शिलीमुखाः भ्रमराः येषु तादृशैः पाटलिपटलैः पाटलाकुसुमनिकरैः कृतः सम्पादितः स्मरस्य कामस्य यः तूणस्तस्य विलासः चेष्टितं यस्मिन् तादृशे; पाटलिः पारुलफुल इति भाषा; पाटलिपुष्पस्य तूणाकारत्वात् शिलीमुखशब्दस्य च श्लिष्टत्वात् साम्यं) [सरसवसन्ते इत्यादि] ॥४॥ अनुवाद—अब वनके विकसित पुष्प-समुदाय ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो मदनराजके हेमदण्ड हैं और भ्रमरावलिसे परिवेष्टित पाटलि (नागकेशर) पुष्पसमूह ऐसे दिखायी दे रहे हैं, मानो कामदेवके तूणीर हों। पद्यानुवाद— मदनराजके कनक-दण्ड-सा केसर-कुसुम-विकास, पाटल पर भौरोंकी छविका अङ्कित मधुर विलास। जुड़ी है मधु-रसिकोंकी भीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—सखि ! मदन-महीपतिके सुवर्ण छत्रकी विशिष्ट कान्तिके समान नागकेशर पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं। उसमें भी भ्रमरावलीके तीक्ष्ण दन्तरूपी वाणोंसे बिद्ध यह वसन्तकाल विरहीजनोंके हृदयको भेद रहा है ॥४॥ विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे । विरही-निकृन्तन-कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥५॥ अन्वय—विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे (विगलितं दूरं गतं लज्जितं लज्जा येषां [वसन्तस्य निरतिशयोद्दीपकत्वात् त्यक्तलज्जानामिति भावः] तादृशानां जगतां जगद्वासिनाम् अवलोकनेन दर्शनेन तरुणैः नवविकसित- पुष्पैरित्यर्थः करुणैः तदाख्यवृक्षैः [करुणानेवु इति भाषा] कृतः पुष्पविकाशरूप-हासः यत्र तादृशे); यूनामेव कामाभिज्ञतया
६४ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ श्रीगीतगोविन्दम् हास्यस्योपयुक्तत्वे श्लिष्टार्थस्य तरुणशब्दस्योपादानम्) [तथा] विरहि-निकृन्तन कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे (विरहिणां वियोगिनां निकृन्तनाः संहारकाः ये कुन्ताः अस्त्रविशेषाः तेषां मुखानामाकृतिरिव आकृति-येषां तादृशैः केतकिभिः तन्नामक-कुसुमविशेषैः (केयाफुल इति भाषा) दन्तुरिताः कृतदन्तविकाशाः परिव्याप्ता इति यावत् आशाः दिशः यत्र तादृशे) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अरी सखि ! वसन्तके प्रतापसे ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण जगत निर्लज्ज हो गया है। यह देखकर तरुण करुण पादपसमूह (वृक्षराजि) प्रफुल्लित सुमनोंके व्याजसे हँस रहे हैं। देखो, विरहीजनोंके हृदयको विदीर्ण करनेके लिए बरछीकी नोकके समान आकारवाले केतकी (केवड़ा) प्रसून चहुँदिशि प्रफुल्लित विलसित विकसित हो रहे हैं। इनके संयोगसे दिशाएँ भी प्रसन्न हो रही हैं। पद्यानुवाद— लज्जा गलित विश्वका करता तरुण करुण उपहास, बिद्ध केतकी कुन्तमुखोंसे विरही मन-आवास। हार जाते हैं पलमें वीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है—प्यारी सखि ! और क्या कहूँ, इस वसन्तकालमें जगतके विरहीजन लाजका त्यागकर प्रियतमके विरहमें रोदन कर रहे हैं। सम्पूर्ण जगतमें प्राणीमात्रकी ही लज्जा पूर्णरूपेण समाप्त हो गयी है। जगतकी इस दशाका अवलोकन करके तरुण करुण विटपावली खिले एवं द्युतिमान पुष्पोंके बहानेसे हास्यसुधा बिखेर रही हैं। अथवा विलासिनी स्त्रियोंके हृदयकी कामवासनाको जानकर नवतरुण पुरुष हास्यामृतको प्रकाशित कर रहा है। करुणा और हास्य दोनों किस प्रकार सम्भव है?
प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६५ करुणा इसलिए कि कण्ठाश्लेष प्रणयीजनोंके वियोगमें इनकी बड़ी दीन दशा होती है और हास्यका कारण है, विरहीजनोंकी अधीरता। खिले केतकी पुष्पोंके अग्रभागको देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे विरहियोंके हृदयका विदारण करने हेतु बरछी हों। माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ। मुनि-मनसामपि मोहन-कारिणि तरुणाकारणबन्धौ- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥६॥ अन्वय-माधविका-परिमल-ललिते (माधविकायाः परिमलेन आमोदेन ललिते मनोहरे) [तथा] नवमालिकया (नवमालिका- कुसुमेन) अतिसुगन्धौ (अतिसुरभित) [अतएव] मुनि-मनसामपि (तापस-चित्तानामपि; का वार्त्ता कामिनाम् इत्यपेरर्थः) मोहन-कारिण (मोहकरे) [तथाच] तरुणाकारणवन्धौ (एकशेषस्तरुणशब्दः; तरुणानां तरुणीनाञ्चेत्यर्थः; अकारणवन्धौ अकृत्रिमसुहृदि; हेतुं विनापि हितकारिणीत्यर्थः) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥६॥ अनुवाद-यह वसन्त मास वासन्ती पुष्पोंके मकरन्दसे अतिशय ललित एवं मनोहर हो रहा है तथा नवमालिका (जूही) पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित हो रहा है। इसकालमें तो मुनियोंके मनमें भी विकार उत्पन्न हो जाता है, वे मुग्ध हो उठते हैं। यह वसन्त युवावर्गका अकारण बन्धु है॥ पद्यानुवाद- माधविका-मालती-गन्ध अब रही दिशामें व्याप। मोहित मुनि-मन विकल तरुण जन खिंचते अपने आप॥ दिखाये कैसे हियको चीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी-माधवी लताके पुष्पोंके परागसे यह वसन्त ऋतु मनोहर हो गया है और वातावरण नवमालिका (जूही) की सुगन्धसे सुवासित हो गया है। यह सुवासितता मुनिजनोंके
६६ श्रीगीतगोविन्दम् मनमें कामविकारको उत्पन्न करा देती है; फिर साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या की जाय? जब ऐसा वसन्त समय होता है, तब अचेतन लता कान्त (वृक्ष) के बिना नहीं रह सकती है, तो चेतनस्वरूपा हम जैसी स्त्री-लताएँ कान्तके बिना कैसे रह सकती हैं? उसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन, कोयलोंका कूजन और भी हृदयविदारक हो जाता है। ऐसी स्थितिमें वह वसन्त तरुण-तरुणियोंका अकारण बन्धु है॥६॥ स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित चूते। वृन्दावन-विपिने परिसर-परिगत-यमुनाजलपूते— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥७॥ अन्वय—स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित-चूते (स्फूरन्तीनां आकम्पितानाम् अतिमुक्तलतानां माधवीलतानां परिरम्भणेन आलिङ्गनेन पुलकिताः जातरोमाञ्चाः इव मुकुलिताः ईषद्विकसितमुकुलाः चूताः रसालाः यत्र तादृशे) [यथा कश्चित् वराङ्गनालिङ्गितः जातरोमाञ्चो भवति तथेति भावः]; [तथा] परिसर-परिगत-यमुना-जलपूते (परिसरेषु पर्यन्तभूमिषु प्रान्तेषु इत्यर्थः परिगता प्राप्ता या यमुना तस्याः जलैः पूते पवित्रीकृते सुशोभिते इति तात्पर्यार्थः) वृन्दावन-विपिने (वृन्दावन-कानने) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥७॥ अनुवाद—हे सखि! चपल मुक्तालताके आलिङ्गनसे युक्त मुकुलित (मञ्जरियोंसे पूर्ण) तथा रोमाञ्चित आम्रवृक्षोंसे युक्त वृन्दाविपिनके सन्निकट प्रवाहमाना यमुनाके पावन जलमें श्रीहरि युवतियोंके साथ परस्पर मिलित होकर विहार कर रहे हैं॥७॥ पद्यानुवाद— वायु चञ्चलित लता माधवीसे आलिङ्गित आम, परिपुष्पित है; पूत जमुन-जलसे वृन्दावन-धाम॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६७ समाया उसमें सागर क्षीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—इस वासन्तिक कालमें चेतनके साथ जड़ पदार्थ भी कामसे विकृत देखे जा सकते हैं। समीरणके वश हुई अतिमुक्तालता (माधवीलता) ने जब आम्रवृक्षका आलिङ्गन किया तो वह मुकुलित और रोमाञ्चित हो गया। सन्निकटमें प्रवाहित होनेवाली यमुनाके जलसे पवित्र वृन्दाविपिनमें श्रीकृष्ण केलिक्रीड़ा कर रहे हैं ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमुदयतु हरिचरणस्मृतिसारं । सरस-वसन्त-समय वनवर्णनमनुगत मदन-विकारम्— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-भणितम् (जयदेवोक्तं) इदम् अनुगत- मदनविकारं (अनुगतं अनुसृतं मदनस्य कामस्य विकारो विक्रिया येन तत् कामादीपकमित्यर्थः) हरि-चरण-स्मृतिसारं (हरिचरणयोः स्मृतिः स्मरणमेव सारः परमार्थो यस्य तथाभूतं) सरस-वसन्तमय-वनवर्णनं (सरसः यः वसन्तसमयः तत्र वनवर्णनम्) उदयतु (भक्तहृदये वृद्धिं गच्छतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण-विरहजनित उत्कण्ठिता श्रीराधाके मदनविकारसे सम्बलित इस वसन्त समयकी वनशोभाका चित्रणरूप यह सरस मङ्गलगीत अति उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुआ है। यह वासन्तिक काल कामविकारोंसे अनुस्यूत है जो श्रीहरिके चरणकमलकी स्मृतिको उदित कराता है ॥८॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव काव्य केवल हरि-चरण-स्मृतिका सार, सरस वसन्त समय वन-वर्णन अनुगत मदन-विकार।
६८ श्रीगीतगोविन्दम् लहर उठता रमणीका चीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥८॥ बालबोधिनी—कवि श्रीजयदेव इस गीतका उपसंहार करते हुए इसके उत्कर्षका वर्णन करते हैं। इस मङ्गलगीतमें हरिचरण स्मृतिसाररूप शृङ्गार-रसके पोषक वसन्तकालके वनविहारका अभिव्यञ्जन है। इस गीतकी जय हो। जिसका मदनविकार हुआ है, ऐसे निकटवर्त्ती जन ही इसका श्रवण करें, जिससे उनके विकार दूर हो जायेंगे। यह मङ्गलगीत अष्टपदीय है, जिसमें जाति नामक अलङ्कार है। इसमें वर्णित श्रीराधा मध्या नायिका हैं। इसमें श्रीकृष्ण दक्षिण नायकके रूपमें हैं। इसमें शृङ्गार रसका विप्रलम्भ भाव है। इसमें प्रयुक्त छन्दका नाम लय है। इस तृतीय प्रबन्धका नाम "माधवोत्सव कमलाकर" है। दर-विदलित-मल्ली-वल्लि-चञ्चत्-पराग- प्रकटित-पटवासैर्वासयन् काननानि। इह हि दहति चेतः केतकी-गन्ध-बन्धुः प्रसरदसमबाण-प्राणवद्-गन्धबाहः ॥९॥ अन्वय—[अथ वसन्तवायु वर्णयति कवि:]—इह (वसन्ते) केतकीगन्धवन्धुः (केतकीनां गन्धस्य वन्धुः नित्यसहचरः अत्यागसहनइत्यर्थः) [तथा] प्रसरदसमवाण-प्राणवत् (प्रसरन् प्रतिदिशं सञ्चरन् तरुणचेतसि प्रवृद्धिं गच्छन् यः असमवाणः पञ्चवाणः मदन इत्यर्थः मदनोऽत्र नृपत्वेन निरूपितः तस्य प्राणवत् प्राणसदृशं अतिप्रिय इत्यर्थः; अस्य निरतिशय- मदनोद्दीपकत्वादिति भावः) गन्धवाहः (दक्षिणानिलः) [सख्युराज्ञा पालनीया इत्यालोच्य] दर-विदलितमल्ली-वल्लि- चञ्चत्पराग- प्रकटित-पट-वासैः (दर-विदलितानाम् ईषद्- विकसितानां मल्लीनां मल्लिकानां या वल्लयः लताः तासां चञ्चन्तः प्रसरन्तः ये परागाः पुष्परेणवः ते एव प्रकटिताः स्फुटीकृताः
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६९ पटवासाः सुगन्धचूर्णविशेषाः तैः) काननानि वासयन् (सुरभीकुर्वन्) चेतः [वियोगिनामिति शेषः] दहति हि (नितरां सन्तापयत्येव) ॥१॥ अनुवाद—हे सखि! देखो, अर्द्ध प्रस्फुटित मल्लिकालताके मकरन्दके श्वेतचूर्णसे वनस्थली श्वेत पटवास द्वारा समाच्छादित हो गयी है। केतकी कुसुमोंके सुगन्धसे मलयपवन आमोदित हो रहा है, यह पवन कामदेवके बाणके समान उसका प्राणसखा बन विरहीजनोंके हृदयको दग्ध कर रहा है॥१॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीके सम्मुख वसन्तकालमें प्रवहमाना मलयवायुकी उद्दीपनाका वर्णन करती हुई कह रही है कि पवन विरहीजनोंके हृदयको तापित कर रहा है। यदि यह पूछा जाय कि किस अपराधके कारण वायु चित्तको दग्ध कर रही है तो इसके उत्तरमें कहते हैं, यह पवन कामदेवका प्राणतुल्य है, अतः अपने सखाके आदेशका पालन करते हुए विरहीजनोंके हृदयको तपाने लगता है। इस वसन्तकालमें मल्लिका-लता ईषत् रूपसे विकसित हो गयी है, उसके उड्डीयमान परागपुञ्ज ही पटवास बन गये हैं और केतकी प्रसूनोंके इस परिमल-चूर्णसे वायु सुगन्धसे परिपूर्ण हो गयी है, कामदेवके समान यह पवन भी विरहीजनोंको सन्तप्त कर रहा है। अतएव यह समीरण कामदेवके प्राणके समान है। प्रस्तुत श्लोक मालिनी छन्दका है, समासोक्ति तथा वर्णानुप्रास अलङ्कारोंकी संसृष्टि है॥१॥ अद्योत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशादिवेशाचलं प्रालेय-प्लवनेच्छयानुसरति श्रीखण्डशैलानिलः। किञ्च स्निग्ध-रसाल-मौलि-मुकुलान्यालोक्य हर्षोदया- दुन्मीलन्ति कुहूः कुहूरिति कलोत्तालाः पिकानां गिरः ॥२॥ अन्वय—अद्य (अधुना) श्रीखण्डशैलानिलः (श्रीखण्डशैलस्य मलयाचलस्य अनिलः वायुः) उत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशात् इव (उत्सङ्गे क्रोड़े वसन्तः ये भूजङ्गाः सर्पाः तेषां कवलेन
७० श्रीगीतगोविन्दम् ग्रासेन यः क्लेशः तस्मात्); [भुजङ्गाः पवनाशनाः इति लोके प्रसिद्धमेव तस्य; भुजङ्गकवलेन विषव्याप्तदेहत्वादिति भावः] प्रालेय-प्लवनेच्छया (प्रालेयेषु हिमेषु प्लवनेच्छया अवगाहनाशया विषज्वालायाः शान्तये इति भावः) ईशाचलं (ईशस्य महादेवस्य अचलः पर्वतः हिमाचलस्तं) अनुसरति (गच्छति); [चन्दनतरु कोटरस्थ-विषधर-कवल-सन्तप्तोवायुः हिमस्नानेच्छया हिमाचलं यातीव; वसन्ते दक्षिणदिग्वर्त्तिनो मलयाचलात् वायेरुत्तरत्र गमनात् उत्तरे च हिमाचलस्य अवस्थानात् इयमुत्प्रेक्षा]। [किञ्च] स्निग्ध-रसाल-मौलिमुकुलानि (स्निग्धानि कोमलानि रसालानां चूततरूणां मौलिषु शिखरेषु यानि मुकुलानि तानि) आलोक्य (दृष्ट्वा) हर्षोदयात् (आनन्दोदयात्) पिकानां (कोकिलानां) कुहुः कुहूरिति कलोत्तालाः (कला अव्यक्तमधुरा उत्ताला अत्युच्चाः), गिरः (ध्वनयः) उन्मीलन्ति (उद्गच्छन्ति) ॥२॥ अनुवाद—अरी सखि! सुना है श्रीखण्डशैल (मलय पर्वत) में बहुतसे सर्प निवास करते हैं, वहाँका पवन भुजङ्गोंके विषसे निश्चित ही जर्जर हो गया है, इससे ऐसा लगता है कि वह उस विष ज्वालासे जलकर हिम सलिलमें स्नान करनेके लिए हिमालयकी ओर प्रवाहित होने लगा है। देखो! देखो! सखि! मधुर, मनोहर, स्निग्ध रसालमौलि मुकुलों (मञ्जरियों) को देखकर हर्षसे विभोर कोकिल कुहु-कुहुकी मधुर वाणीमें उच्चस्वरसे कूजन कर रही है। पद्यानुवाद— सतत सर्प पीड़ासे तापित, मलय पवन हिमदेश बहनेको आतुर रहता है, निशिदिन कोमल वेश। मधुर आमके वोरोंसे या बढ़ता जाता मिलने जो कोकिलकी कुहु कुहु सुन मदसे लगते खिलने ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें सखीने शृङ्गार रसके दोनों विभावोंका चित्रण किया है। इस मधुमासमें मलयाचलकी वायु हिमदेशकी ओर आ रही है। रातदिन मलयगिरिमें
प्रथमः सर्गः–सामोद-दामोदरः ७१ चन्दनके वृक्षोंपर जहरीले साँप अवस्थित रहते हैं। इसी कारण वह हवा हिमालयकी ओर प्रस्थान कर रही है। सर्पोंके दंशनके कारण मलयाचलमें सन्ताप उत्पन्न हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने उस सन्तापके कारण ही हवा हिमालयकी शीत हवाका आनन्द प्राप्त करनेके लिए हिमदेशको जा रही है। इस समय रसाल तरुवरोंमें मञ्जरियाँ भी उद्भूत हो जाती हैं। इन आमकी बौरोंको देखकर कोकिल समुदाय हर्षसे आह्लादित होकर उच्चस्वरसे कुहु-कुहुका स्वर आलाप करने लगा है। इस तरहकी उन्मादिनी प्रोन्मादिनी वेलामें श्रीकृष्णसे तुम्हारा डरना उचित नहीं है, राधे! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, अनुप्रास तथा उपमा अलंकार, वैदर्भी रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गारका सूचक रति नामक स्थायी भाव है॥२॥ उन्मीलनमधुगन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चूताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैरुद्गीर्णकर्णज्वराः। नीयन्ते पथिकैः कथंकथमपि ध्यानावधानक्षण- प्राप्त-प्राणसमा-समागम-रसोल्लासैरमी वासराः॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीय सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं चिरविरहिणः प्रियासङ्गं विना दिनयापनं दुर्घटमित्याह]–उन्मीलनमधु-गन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चुताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैः (उन्मीलत्सु प्रसरत्सु मधुगन्धेषु मकरन्दगन्धेषु लुब्धैः लोलुपैः मधुपैः भ्रमरैः व्याधूताः कम्पिताः ये चूतांकुराः आम्रमुकुलानि तेषु क्रीडतां कोकिलानां काकलीकलकलैः सूक्ष्ममधुरी-स्फुटध्वनिभिः) उद्गीर्णकर्णज्वराः (उद्गीर्णाः उद्भूताः कर्णज्वराः श्रोत्रपीडाः येषु तथोक्ताः)
७२ श्रीगीतगोविन्दम् ध्यानावधान-क्षणप्राप्तप्राणसमा-समागम-रसोल्लासैः (ध्यानं कान्तायाश्चिन्तनं तत्र यत् अवधानम् अभिनिवेशः तस्य क्षणे प्राप्तः अनुभूतः प्राणसमायाः प्रणयिन्याः समागमरसेन सङ्गसुखेन उल्लासः आनन्दः यैः तादृशैः सद्भिः) पथिकैः (विरहिभिः) अमी वासराः (वसन्तदिवसाः) कथंकथमपि (अतिकृच्छ्रेण) नीयन्ते (अतिबाह्यन्ते) ॥३॥ अनुवाद—हे सखि ! देखो ! उन्मीलित आम्र मुकुलके पुष्प किञ्जल्कके मधुगन्धके लुब्ध भ्रमरोंसे प्रकाशित मञ्जरियों पर कोयलें क्रीड़ा करती हुई कुहु-कुहु रवसे मधुर ध्वनि कर रही हैं और इस कोलाहलसे विरहीजनोंको कर्णज्वर हो रहा है। वसन्त ऋतुके वासरोंमें विरहीजन अतिशय कठोर विरह यातनाके कारण प्राणसम प्रेयसियोंका चिन्तन करने लगते हैं। तब उनके मुखमण्डलके ध्यानसे, उनके समागम जनित आनन्दके आविर्भूत हो जानेसे क्षणिक सुख लाभ करते हुए वे अति कष्टपूर्वक समयको अतिवाहित करते हैं॥३॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है कि विरहीजनोंका प्रिय विरह भी अति दुःसह होता है। श्रीकृष्ण-विरहमें मलय पवन ही केवल पीड़ाप्रद होता है, ऐसा नहीं, आम्रवृक्षमें बैठनेवाली कोयलोंकी कुहु-कुहु अति मधुर एवं अस्फुट ध्वनि चारों ओर गुञ्जन करने लगती है, जिसमें विरहीजनोंका हृदय अतिशय रूपसे अनुतप्त होता है। ये क्रीड़ापरायण कोयलें कलध्वनिसे कर्णज्वर प्रादुर्भूत कर रही हैं। जब कोयलका स्वर सुनकर विरही प्रियतमाका स्मरण करते हैं तो उन्हें लगता है कि प्राणसमा प्रियतमाका समागम हो गया है। यह समय अति कष्टपूर्वक अतिवाहित होता है। इस श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। इनमें काव्यलिङ्ग नामक अलङ्कार, गौड़ीया रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गार रस है। ‘वासराः’ पदमें बहुवचनका प्रयोग औचित्ययुक्त है॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीयः सन्दर्भः।
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७३ चतुर्थः सन्दर्भः अनेक-नारी-परिरम्भ-सम्भ्रम- स्फुरन्मनोहारि-विलास-लालसम्। मुरारिमारादुपदर्शयन्त्यसौ सखीसमक्षं पुनराह राधिकाम् ॥१॥ अन्वय—[ततश्च तयोः श्रीकृष्णानुसन्धान-चेष्टा सफला सञ्जाता। श्रीकृष्णः तयोर्नेत्रपथवर्ती वभुव एवं समये] असौ (पूर्वोक्ता श्रीराधायाः सखी) आरात् (अनतिदूरे) [समवस्थितमिति शेषः] अनेकनारी-परिरम्भ-सम्भ्रम-स्फुरन्मनोहारि-विलासलालसम् (अनेकानां नारीणां गोपतरुणीनां परिरम्भे निर्भरालिङ्गने यः सम्भ्रमः आवेगः तेन स्फुरन् निरतिशयस्फूर्त्तिशाली अतएव मनोहारी चित्ताकर्षणकारी यः विलासः केलिः तत्र लालसा एकान्तौत्सुक्यं यस्य तादृशं) मुरारिं समक्षं (अक्ष्णोः समीपे) उपदर्शयन्ती (अङ्गुलीसङ्केतेन प्रदर्शयन्ती) पुनः राधिकाम् आह ॥१॥ अनुवाद—अनन्तर श्रीराधिकाजीकी सखीने बड़ी चतुरतासे श्रीकृष्णका अनुसन्धान कर लिया। सखीने देखा कि अति सान्निध्यमें ही श्रीकृष्ण गोप-युवतियोंके साथ प्रमोद विलासमें निमग्न आदरातिशयताको प्राप्त कर रहे हैं। उन रमणियोंके द्वारा आलिङ्गनकी उत्सुकता दिखाये जाने पर श्रीकृष्णके मनमें मनोज्ञ मनोहर विलासकी लालसा जाग उठी है। सखी अन्तरालसे (आड़में छिपकर) राधाजीको दिखलाती हुई पुनः यह बोली— पद्यानुवाद— परिरम्भ मदिर रस मातल प्रमदा परिवेशित हरिको। दिखला, राधासे आली बोली पी कर मधु छबिको॥
७४ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—वनशोभाके चित्रण आदिके द्वारा कविने श्रीराधाजीके सुदीप्त भावको प्रकाशित किया है। कोई सखी श्रीराधाजीके समीप उपस्थित होकर श्रीकृष्णके अभिप्रायको साक्षात् रूपसे दिखलाती हुई कहती है (अनेक नारी इति श्लोकके द्वारा)—सखि देखो ! मुरारि इस समय क्या कर रहे हैं? वे इस समय इतनी तरुणियोंका आलिङ्गन प्राप्त करके भी तृप्त नहीं हो सके हैं, इसलिए अति मनोहारिणी श्रीराधाजीसे मिलनकी उत्सुकता प्रकट करने लगे हैं और विलासकी लालसासे उत्कण्ठित हो गये हैं। श्रीकृष्णका लीलाविलास नित्य है, इसलिए यह प्रत्यक्ष भी है। विरहमें स्मरण, स्फूर्ति तथा आविर्भाव—ये तीन वैशिष्ट्य परिलक्षित होते हैं। अतः यहाँ विलासका स्फुरित होना युक्तिसङ्गत है। इसमें वंशस्थविला छन्द, अनुप्रास अलङ्कार एवं दक्षिण नायक हैं॥१॥ गीतम् ॥४॥ रामकिरीरागेण यतितालेन च गीयते। चन्दन-चर्चित-नील-कलेवर पीतवसन-वनमाली केलिचलन्मणि-कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे विलासिनी विलसति केलिपरे ॥१॥ध्रुवम्॥ पीन-पयोधर-भार-भरेण हरिं परिरभ्य सरागं। गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चित-पञ्चम-रागम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥२॥]
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७५ कापि विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजं। ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदन-वदन-सरोजम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥३॥] कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले। चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥४॥] केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमुं यमुनावनकुले। मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥५॥] करतल-ताल-तरल-वलयावलि-कलित-कलस्वन-वंशे। रासरसे सहनृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशंससे— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥६॥] श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामां। पश्यति सस्मित-चारुतरमपरामनुगच्छति बामां॥७॥ [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥७॥] श्रीजयदेव-भणितमिदमद्भुत-केशव-केलि-रहस्यं । वृन्दावन-विपिने ललितं वितनोतु शुभानि यशस्यम् ॥ [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥८॥] नीचे प्रत्येक पद्य, अन्वय, श्लोकानुवाद, पद्यानुवाद तथा बालबोधिनी व्याख्या दी जा रही है— चतुर्थ प्रबन्धके श्लोक रामकिरी राग तथा यति तालसे गाये जाते हैं। चन्दन-चर्चित-नील-कलेवर पीतवसन-वनमाली केलिचलन्मणि-कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे विलासिनी विलसति केलिपरे ॥१॥ध्रुवम् ॥
७६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—अयि विलासिनि (विलासवति) केलि-चलन्मणि- कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली (केलिना क्रीडारसेन चलन्ती ये मणिकुण्डले रत्नमय-कर्णभूषणे ताभ्यां मण्डितं शोभितं गण्डयुगं कपोलयुगलं यस्य सः; तथा स्मितेन मृदुहासेन शालते शोभते इति स्मितशाली, स चासौ स चेति तथा) चन्दन-चर्चित-नीलकलेवर-पीतवसन-वनमाली (चन्दनैः चर्चितम् अनुलिप्तं नीलं कलेवरं यस्य सः; तथा पीत वसनं यस्य तथोक्तः; तथा वनमाली वनकुसुम-मालाधरः; स चासौ स चासौ स चासौ स चेति तथा) हरिः इह (अस्मिन्) केलिपरे (क्रीडासक्ते) मुग्धवधूनिकरे (सुन्दरी-समूहे) विलसति (विहरति) [अहो श्रीकृष्णस्य अकृत-वेदित्वम् ! त्वद्दत्त-चन्दन-वनमाला-भूषित स्त्वद्वर्णवसनावृताङ्गयष्टिरेव विलसतीत्यवलोकय] ॥१॥ अनुवाद—हे विलासिनी श्रीराधे! देखो! पीतवसन धारण किये हुए, अपने तमाल-श्यामल-अङ्गोंमें चन्दनका विलेपन करते हुए, केलिविलासपरायण श्रीकृष्ण इस वृन्दाविपिनमें मुग्ध वधुटियोंके साथ परम आमोदित होकर विहार कर रहे हैं, जिसके कारण दोनों कानोंमें कुण्डल दोलायमान हो रहे हैं, उनके कपोलद्वयकी शोभा अति अद्भुत है। मधुमय हासविलासके द्वारा मुखमण्डल अद्भुत माधुर्यको प्रकट कर रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— चन्दन चर्चित नील कलेवर पीत वसन वनमाली केलि चञ्चला मणि कुण्डल गति स्मितमुख शोभाशाली। काम मोहिता, रूप गर्विता, गोपीजन कर साधे विलस रहे हैं श्रीहरि आतुर, निरखि विलासिनि राधे ॥ बालबोधिनी—इस गीतका राग रामकरी तथा झम्पा ताल है। रस-मञ्जरीकारने यहाँ रूपक ताल माना है। जब कान्ता नीलवसन धारणकर प्रभातकालीन आकाशकी भाँति स्वर्णिम आभूषण पहनकर अपने कान्तके प्रति उन्नत