गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१२३ बालकाण्ड मनभाता हुआ देख साथकी सहेलियाँ भी गीत गाती तुलसीदासके प्रभुका चित्त चुराकर राजभवनको चली गयीं ॥ ४ ॥ रंगभूमिमें [ ७३ ] रंगभूमि आए दसरथके किसोर हैं। पेखनो सो पेखन चले हैं पुर-नर-नारि, बारे-बूढ़े, अंध-पंगु करत निहोर हैं ॥ १ ॥ नील पीत नीरज कनक मरकत घन दामिनि-बरन तनु, रूपके निचोर हैं। सहज सलोने, राम-लषन ललित नाम, जैसे सुने तैसेई कुंवर सिरमौर हैं ॥ २ ॥ चरन-सरोज, चारु जंघा जानु ऊरु कटि, कंधर बिसाल, बाहु बड़े बरजोर हैं। नीकेकैं निषंग कसे, करकमलनि लसै बान-बिसिखासन मनोहर कठोर हैं ॥ ३ ॥ काननि कनकफूल, उपवीत अनुकूल, पियरे दुकूल बिलसत आछे छोर हैं। राजिव नयन, बिधुबदन, टिपारे सिर, नख-सिख अंगनि ठगौरी ठौर ठौर हैं ॥ ४ ॥ सभा-सरवर लोक-कोकनद-कोकगन प्रमुदित मन देखि दिनमनि भोर हैं। अबुध असैले मन-मैले महिपाल भये, कछुक उलूक कछु कुमुद चकोर हैं ॥ ५ ॥
गीतावली १२४ भाईसों कहत बात, कौसिकहि सकुचात बोल घन घोर-से बोलत थोर थोर हैं। सनमुख सबहि, बिलोकत सबहि नीके, कृपासों हेरत हँसि तुलसीकी ओर हैं॥ ६ ॥ 'रंगभूमिमें दशरथजीके पुत्र पधारे हैं'—यह सुनकर नगरके स्त्री, पुरुष सभी तमाशा देखनेके लिये चल पड़े, बालक और वृद्ध तथा अन्धे और पंगु भी [अपनेको ले चलनेके लिये] निहोरा कर रहे हैं॥ १॥ दोनों भाई नीले और पीले कमल, सुवर्ण एवं मरकतमणि तथा मेघ और बिजलीके-से वर्णवाले और रूपके सारस्वरूप ही हैं। वे स्वभावतः ही सुन्दर हैं, उनके राम और लक्ष्मण—ये मनोहर नाम हैं तथा जैसे सुने गये थे वैसे ही राजकुमारोंमें सिरमौर हैं ॥ २ ॥ उनके चरण कमलके समान हैं; जंघा, जानु और कटिप्रदेश बड़े सुन्दर हैं तथा कन्धे विशाल और भुजाएँ बड़ी बलशालिनी हैं। वे अति सुन्दर तरकस कसे हुए हैं तथा उनके करकमलोंमें अति मनोहर और कठोर धनुष-बाण शोभित हैं ॥ ३ ॥ उनके कानोंमें सोनेके कर्णफूल, गलेमें सुन्दर यज्ञोपवीत तथा शरीरमें अच्छे-अच्छे छोरोंवाले पीताम्बर सुशोभित हैं। उनके नयन कमलके तथा मुख चन्द्रमाके समान हैं, सिरपर चौतनी टोपियाँ हैं तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त प्रत्येक अङ्गमें ठौर-ठौरपर ठगौरी है। [अर्थात् प्रत्येक अङ्ग चित्तको ठग लेनेवाला है] ॥ ४ ॥ सभा श्रेष्ठ सरोवरके समान है तथा वहाँ एकत्र हुए लोग कमल एवं चकवा-चकवीतुल्य हैं। वे राम अज्ञानी और द्वेष माननेवाले राजाओंके चित्त, जिनमेंसे कुछ उल्लूके
१२५ बालकाण्ड समान और कुछ कुमुद एवं चकोरवत् जान पड़ते हैं, मैले हो रहे हैं ॥ ५ ॥ भगवान् राम जब भाईसे बातें करते हैं तो विश्वामित्रजीसे सकुचाकर और मेघके समान गम्भीर शब्द बोलते हैं तथा अधिक नहीं बोलते । प्रभु सभीके सम्मुख [अनुकूल] हैं, सभीको अच्छी दृष्टिसे देखते हैं तथा तुलसीदासकी ओर भी कृपापूर्वक हँसकर देख रहे हैं ॥ ६ ॥ [ ७४ ] एई राम-लषन जे मुनि-सँग आये हैं । चौतनी-चोलना काछे, सखि ! सोहैं आगे-पाछे, आछे हुँते आछे, आछे आछे भाय भाये हैं ॥ १ ॥ सांवरे गोरे सरीर, महाबाहु, महाबीर, कटि तून तीर धरे, धनुष सुहाये हैं । देखत कोमल, कल अतुल बिपुल बल, कौसिक कोदंड-कला कलित सिखाये हैं ॥ २ ॥ इन्हहीं ताड़का मारी, गौतमकी तिय तारी, भारी भारी भूरि भट रन बिचलाये हैं । ऋषि-मख रखवारे, दसरथके दुलारे रंग-भूमि पगु धारे, जनक बुलाये हैं ॥ ३ ॥ इन्हके बिमल गुन गनत पुलकि तनु सतानंद-कौसिक नरेसहि सुनाये हैं। प्रभुपद मन दिये, सो समाज चित्त किये हुलसि हुलसि हिये तुलसिहुँ गाये हैं ॥ ४ ॥ [पुर-नारियाँ कहती हैं—] 'जो विश्वामित्र मुनिके साथ आये हैं वे राम लक्ष्मण ये ही हैं। सखि ! देखो, ये चौतनी टोपी और
गीतावली १२६ अँगरखा पहने आगे-पीछे चलते बड़े शोभायमाम जान पड़ते हैं। ये अच्छोंसे भी अच्छे हैं और अच्छे भावोंसे भाते हैं (सुशोभित हैं) ॥ १ ॥ इनके शरीर श्याम एवं गौर वर्ण हैं, ये महाबाहु और महान् वीर हैं तथा इनके कटिप्रदेशमें बाणयुक्त तरकस और हाथोंमें धनुष शोभायमान है। ये देखनेमें बड़े ही कोमल, सुन्दर और अतुलित बलशाली हैं। इन्हें विश्वामित्रजीने अति सुन्दर ढंगसे धनुर्विद्या सिखायी है ॥ २ ॥ इन्होंने ताड़काको मारा है और अहल्याका उद्धार किया है तथा इन्होंने बड़े-बड़े शूरवीरोंको युद्धमें विचलित कर दिया है। इस समय विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षा करनेवाले ये दशरथराज कुमार जनकजीके बुलानेसे रङ्गभूमिमें पधारे हैं ॥ ३ ॥ शतानन्द और विश्वामित्रजीने पुलकित शरीर हो इनके पवित्र गुणोंको गिनकर महाराज जनकको सुनाया है।' तुलसीदासने भी प्रभुके चरणकमलोंमें चित्त लगा, उस समाजको हृदयमें धारण कर आनन्दसे उमँग-उमँग कर उनका गान किया है ॥ ४ ॥ राग कान्हरा [ ७५ ] सीय स्वयंबरु, माई, दोउ भाई आए देखन। सुनत चलीं प्रमदा प्रमुदित मन, प्रेम पुलकि तनु मनहुँ मदन मंजुल पेखन ॥ १ ॥ निरखि मनोहर तांई सुख पाई कहैं एक-एक सों 'भूरिभाग हम धन्य, आलि ! ए दिन, एखन ।' तुलसी सहज सनेह सुरंग सब सो समाज चित चित्रसार लागी लेखन ॥ २ ॥
१२७ बालकाण्ड 'हे माई ! देखो, दोनों भाई सीताजीका स्वयंवर देखने आये हैं'—यह सुनते ही सब स्त्रियाँ शरीरमें पुलकित हो मानो मनोहर कामदेवको निहारनेके लिये प्रसन्न चित्तसे जा रही हैं ॥ १ ॥ उनकी सुन्दरता देखकर वे चित्तमें सुख पाकर एक दूसरीसे कहती हैं— 'अरी आली ! आज इस समय तो हम बड़ी भाग्यशालिनी और धन्य हैं।' तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे सब सहज प्रेमरूप सुन्दर रङ्गसे अपने चित्तरूप चित्रशालामें उस समाजका चित्र खींचनेमें लग गयीं ॥ २ ॥ राग गौरी [ ७६ ] राम-लषन जब दृष्टि परे, री। अवलोकत सबलोगजनकपुर मानो बिधि बिबिध बिदेह करे, री ॥ १ ॥ धनुषजग्य कमनीय अवनि-तल कौतुकही भए आय खरे, री। छबि-सुर सभा मनहु मनसिजके कलित कलपतरु रूप फरे, री ॥ २ ॥ सकल काम बरषत मुख निरखत, करषत चित हित हरष भरे, री। तुलसी सबै सराहत भूपहि भलैं पैंत पासे सुढर ढरे, री ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! जबसे राम लक्ष्मण दृष्टिगोचर हुए हैं तबसे उन्हें देखनेवाले जनकपुरके लोगोंकी दशा ऐसी हो गयी है, मानो विधाता- ने अनेक विदेह बनाये हैं ॥ १ ॥ इसी समय धनुषयज्ञकी सुरम्य भूमिमें कौतुकसे ही दोनों भाई आ खड़े हुए, मानो छबिरूप देव- सभामें कामदेवके दो मनोहर कल्पवृक्ष सौन्दर्यरूपी फलसे फलित हुए हों ॥ २ ॥ अरी ! इनका मुख देखते ही सारी कामनाओंकी
गीतावली १२८ वृष्टि करता है और चित्तमें प्रीति तथा आनन्द भरकर उसे आकर्षित कर लेता है।' तुलसीदास कहते हैं—सभी लोग महाराज जनककी प्रशंसा करते हैं कि इस समय महाराजको अच्छा दाँव हाथ लगा, उनके पासे बहुत अच्छे पड़े ॥ ३ ॥ [ ७७ ] नेकु, सुमुखि, चित लाइ चितौ, री। राजकँवर-मूरति रचिबेकी रुचिसुबिरंचिश्रम कियो है कितौ, री ॥ १ ॥ नख-सिख-सुंदरता अवलोकत कह्यो न परत सुख होत जितौ, री। साँवर रूप-सुधा भरिबे कहँ नयन-कमल कल कलस रितौ, री ॥ २ ॥ मेरे जान इन्हें बोलिबे कारन चतुर जनक ठयो ठाट इतौ, री। तुलसी प्रभु भंजिहैं संभु-धनु, भूरिभाग सिय-मातु-पितौ, री ॥ ३ ॥ 'अरी सुमुखि ! तनिक चित्त लगाकर देख तो, इन राजकुमारों- की मनोहर मूर्ति रचनेकी रुचि करके विधाताने कितना परिश्रम किया है ? ॥ १ ॥ अरी ! नखसे सिखतक इनकी सुन्दरता देखकर जितना सुख होता है वह कहा नहीं जाता। इस श्याम-छबिरूप अमृतको भरनेके लिये तुम अपने नेत्रकमलरूप कलशोंको खाली करो ॥ २ ॥ मेरे विचारसे तो इन्हें बुलानेके लिये ही जनकजीने इतना ठाट-बाट रचा है।' तुलसीदास कहते हैं, 'सीताजीके माता- पिताका बड़ा भाग्य है, भगवान् निश्चय ही धनुष तोड़ेंगे' ॥ ३ ॥ राग सारंग [ ७८ ] जबतें राम-लषन चितए, री। रहे इकटक नर-नारि जनकपुर, लागत पलक कलप बितए, री ॥ १ ॥ प्रेम-बिबस माँगत महेस सों, देखत ही रहिए नित ए, री।
१२६ बालकाण्ड कै ए, सदा बसहु इन्ह नयनन्हि, कै ए नयन जाहु जित ए, री ॥ २ ॥ कोउ समुझाइ कहै किन भूपहि, बड़े भाग आप इत ए, री । कुलिस-कठोर कहाँ संकर-धनु, मृदुमूरति किसोर कित ए, री ॥ ३ ॥ बिरचत इन्हहिं बिरंचि भुवन सब सुंदरता खोजत रित ए, री । तुलसिदास ते धन्य जनम जन, मन-क्रम-बच जिन्हके हित ए, री ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! जबसे राम-लक्ष्मणको देखा है तबसे जनकपुरके नर-नारी एकटक रह गये हैं; उन्हें पलक मारनेमें मानो कई कल्प बीत जाते हैं ॥ १ ॥ वे सब प्रेमके वशीभूत हो महादेवजीसे यही मांगते हैं कि नित्य इन्हें ही देखते रहें, या तो सर्वदा ये ही इन नेत्रोंमें बसे रहें या जिधर वे जायें उधर ही ये नेत्र भी चले जायें ॥ २ ॥ भला कोई व्यक्ति राजाको समझाकर ऐसा क्यों नहीं कहता कि ये बड़े भाग्यसे इधर आये हैं [अतः प्रण त्याग कर इन्हें ही सीताजी विवाह दें] । भला कहाँ तो वज्रसे भी कठोर श्रीमहादेवजीका धनुष और कहाँ ये अति मृदुल किशोर-मूर्ति ? ॥ ३ ॥ इन्हें रचते समय विधाताने सुन्दरताकी खोज करते-करते सारे भुवन खाली कर दिये थे । तुलसीदास कहते हैं, जिन्हें मन, वचन और कर्मसे ये प्रिय हैं उन लोगोंके जन्म धन्य हैं ॥ ४ ॥ [ ७९ ] सुनु सखि, भूपति भलोई कियो, री । जेहि प्रसाद अवधेस-कुँवर दोउ नगर लोग अवलोकि जियो, री ॥ १ ॥ मानि प्रतीति कहे मेरे तैं कत संदेह-बस करति हियो, री । तौलौं है यह संभु सरासन, श्रीरघुबर जौलौं न लियो, री ॥ २ ॥ जेहि बिरंचि रचि सीय सँवारी, औ रामहि ऐसो रूप दियो, री । तुलसिदास तेहि चतुर बिधाता निजकर यह संजोग सियो, री ॥ ३ ॥ गी० ६—
गीतावली १३०
॥ 'अरी सखि ! सुन, महाराज जनकने बड़ा ही अच्छा कियां है। देखौं, उनकी कृपासे ही महाराज दशरथके इन दोनों कुमारोंको देखकर नगरनिवासी जीवन धारण कर रहे हैं ॥ १ ॥ मेरे कहनेसे विश्वास कर, चित्तको सन्देहवश क्यों करती है ! यह महादेवजीका धनुष तभीतक दीखता है जबतक रघुनाथजी इसे नहीं लेते ॥ २ ॥ जिसे विधाताने सीताजीको सँवारकर रचा है और रामको ऐसा रूप दिया है—तुलसीदास कहते हैं—उस चतुर विधाताने ही अपने हाथसे यह संयोग मिलाया है' ॥ ३ ॥
[ ८० ] अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं। नीलकंठ कारुन्यसिंधु हर दीनबन्धु दिनदानि हैं ॥ १ ॥ जो पहिले ही पिनाक जनक कहँ गए सौंपि जिय जानि हैं। बहुरि त्रिलोचन लोचनके फल सबहि सुलभ किये आनि हैं ॥ २ ॥ सुनियत भव-भावते राम हैं, सिय भावति-भवानि हैं। परखत प्रीति प्रतीति, पयज-पनु रहे काज ठटु ठानि हैं ॥ ३ ॥ भये बिलोकि बिदेह नेहबस बालक, बिनु पहिचानि हैं। होत हरे होने बिरबनि दल सुमति कहति अनुमानि हैं ॥ ४ ॥ देखियत भूप भोरके-से उडुगन, गरत गरीब गलानि हैं। तेज प्रताप बढ़त कुँवरनको, जदपि संकोची बानि हैं ॥ ५ ॥ बय किसोर, बरजोर, बाहुबल-मेरु मेलि गुन तानि हैं। श्रवसि राम राजीव-बिलोचन संभु-सरासन भानि हैं ॥ ६ ॥ देखिहैं ब्याह-उछाह नारि-नर, सकल-सुमंगल-खानि हैं। भूरिभाग तुलसी तेऊ, जे सुनिहैं, गाइहैं, बखानि हैं ॥ ७ ॥
[Page Header: १३१ बालकाण्ड]
'महाराज जनकको श्रीमहादेवजी अनुकूल हैं। वे नीलकण्ठ, करुणासागर शिवजी दीनबन्धु और निरन्तर दान करनेवाले हैं ॥ १ ॥ जो सब बातोंको हृदयमें जानकर पहलेहीसे जनकजीको धनुष सौंप गये थे, उन्हीं भगवान् त्रिनयनने इन राजकुमारों को लाकर इस समय हम सबको नेत्रोंका फल सुलभ कर दिया है ॥ २ ॥ सुना जाता है, राम भगवान् शङ्करको प्रिय हैं और जानकी पार्वतीजीको भाती हैं। इस समय वे [राम-जानकीकी] प्रीति-प्रतीति और [राजा जनककी] टेक एवं प्रणकी परीक्षा कर रहे हैं, इसीलिये कार्यके ठाट ठटकर उसमें विलम्ब कर रहे हैं ॥ ३ ॥ इन बालकोंको बिना पहचाने केवल देखनेसे ही जनकजी स्नेहवश हो गये हैं [इससे जान पड़ता है कि इनके साथ उनका सम्बन्ध अवश्य होनेवाला है], मैं तो अपनी बुद्धिसे अनुमान करके कहती हूँ कि होनहार वृक्षोंके पत्ते हरे होते हैं ॥ ४ ॥ यद्यपि इन बालकोंका स्वभाव सङ्कोची है, तो भी इनके सामने अन्य नृपतिगण प्रातःकालीन तारागणके समान तेजहीन दिखायी पड़ते हैं और बेचारे ग्लानिसे गले जाते हैं तथा इनका तेज और प्रताप निरन्तर बढ़ रहा है ॥ ५ ॥ यद्यपि अभी इनकी किशोरावस्था है तथापि ये धनुषको अपने प्रबल बाहुबलरूप मेरुमें रखकर उसका रौंदा चढ़ा देंगे। हमारे विचारसे तो कमल- नयन राम निश्चय ही इस महादेवजीके धनुषको तोड़ डालेंगे ॥ ६ ॥ इनके इस सकल सुमङ्गलखानि विवाहोत्सवको सब नर-नारी देखेंगे।' तुलसीदासजी कहते हैं, जो लोग इसका श्रवण, गान और बखान करेंगे वे भी बड़े ही भाग्यवान् हैं ॥ ७ ॥
गीतावली १३२ राग केदारा [ ८१ ] रामहि नीके कै निरखि, सुनैनी ! मनसहु अगम समुझि, यह अवसरु कत सकुचति, पिकबैनी ॥ १ ॥ बड़े भाग मख-भूमि प्रगट भई सीय सुमंगल-ऐनी। जा कारन लोचन गोचर भइ मूरति सब सुखदैनी ॥ २ ॥ कुलगुर-तियके मधुर बचन सुनि जनक-जुवति मति, पैनी। तुलसी सिथिल देह-सुधि-बुधि करि सहज सनेह-बिषैनी ॥ ३ ॥ [शतानन्दजीकी स्त्री जानकीजीकी मातासे कहती हैं—] 'हे सुनयनी ! तू रामचन्द्रजीको अच्छी तरह देख ले। अरी पिकभाषिणा! उन्हें तू मनसे भी अगम समझ। इस अवसरपर तू सकुचाती क्यों है ? ॥ १ ॥ जिसके कारण यह सब प्रकारके सुख देनेवाली मधुर मूर्ति हमारे नेत्रोंका विषय हुई है, वह सब प्रकारके सुमङ्गलोंकी आश्रयभूता सीता हमारे परम सौभाग्यसे ही यज्ञभूमिमें प्रकट हुई हैं' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—अपने कुलगुरुकी स्त्रीके ये मधुर वचन सुनकर कुशाग्रबुद्धि जनकप्रिया शरीरकी सुध-बुध भूलकर भगवान्की ओर स्वाभाविक स्नेहसे देखने लगीं ॥ ३ ॥ [ ८२ ] मिलो बरु सुंदर सुंदरि सीतहि लायकु, साँवरो सुभग, सोभाहूँको परम सिंगारु। मनहूँको मन मोहै, उपमाको को है ? सोहै सुखमासागर संग अनुज राजकुमारु ॥ १ ॥ ललित सकल अंग, तनु धरे कै अनंग, नैननिको फल कैधौं, सियको सुकृत-सारु।
१३३ बालकाण्ड सरद-सुधा-सदन-छबिहि निंदै बदन, अरुन आयत नवनलिन-लोचन चारु ॥ २ ॥ जनक-मनकी रीति जानि बिरहित प्रीति, ऐसी औ मूरति देखे रह्यो पहिलो बिचारु । तुलसी नृपहि ऐसो कहि न बुझावै कोउ, 'पन औ कुँवरदोऊ प्रेमकी तुला धौं तारु' ॥ ३ ॥ 'अरी सखी ! शोभाका भी परम शृंगाररूप यह अति सुन्दर साँवला वर तो सीताहीके लायक है । यह तो सुन्दरी सीताको ही मिलना चाहिये । यह मनका भी मन मोह लेते हैं । इनकी उपमाके योग्य और कौन हो सकता है ? इनके साथ इनका अनुज यह सुषमासागर राजकुमार सुशोभित है ॥ १ ॥ इनके सब अङ्ग अति सुन्दर हैं, यह देहधारी कामदेव, नेत्रोंका फल अथवा सीताके सुकृतोंका सार ही तो नहीं है ? इनका मुखचन्द्र शरत्कालीन सुधाकरकी छबिकी निन्दा करता है तथा इनके अरुण और विशाल नयन नवीन कमलदलके समान सुन्दर हैं ॥ २ ॥ यदि ऐसी मनो- मोहिनी मूर्तिको देखकर भी जनकजीका पहला (धनुर्भङ्गके प्रणका) विचार बना हुआ है तो उनके चित्तकी रीति प्रीतिसे रहित है ।' तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय राजा जनकको कोई ऐसा कहकर नहीं समझाता कि अपने प्रण और इन दोनों राजकुमारोंको प्रेमकी तराजूमें रखकर तौलो तो ॥ ३ ॥ [ ८३ ] देखि देखि री ! दोउ राजसुवन । गोर स्याम सलोने लोने, लोयननि, जिन्हकी सोभा तें सोहै सकल भुवन ॥ १ ॥
गीतावली १३४ इन्हहीं ताड़का मारी, मग मुनि-तिय तारी, ऋषिमख राख्यो, रन दले हैं दुवन। तुलसी प्रभुको अब जनकनगर-नभ, सुजस-बिमल-बिधु चहत उवन ॥ २ ॥ 'अरी सखी ! इन दोनों राजकुमारोंको तो देख । देख, इनके अति सुन्दर लावण्यमय श्याम-गौर शरीर हैं तथा लुभावने नयन हैं, जिनकी शोभासे सारे भुवन शोभायमान हो रहे हैं ॥ १ ॥ इन्हींने ताड़काको मारा है और मार्गमें मुनि-पत्नीका उद्धार किया है तथा इन्हींने विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा कर युद्धमें सुबाहु आदि दुष्टोंका दलन किया है।' तुलसीदास कहते हैं, अब शीघ्र ही जनकपुरीमें प्रभुका सुयशरूप निर्मल चन्द्र उदित होना चाहता है ॥ २ ॥ राग तोड़ी [ ८४ ] राजा रंगभूमि आज बैठे जाइ जाइकैं। अपने अपने थल, अपने अपने साज, अपनी अपनी बर बानिक बनाइकैं ॥ १ ॥ कौसिक सहित राम-लषन ललित नाम, लरिका ललाम लोने पठए बुलाइकैं। दरसलालसा-बस लोग चले भाय भले, बिकसित-मुख निकसत धाइ धाइकैं ॥ २ ॥ सानुज सानंद हिये आगे ह्वै जनक लिये, रचना रुचिर सब सादर देखाइकैं। दिये दिब्य आसन सुपास सावकास अति, आछे आछे बीछे-बीछे बिछौनी बिछाइकें ॥ ३ ॥
२. अयोध्या एवं अरण्यकाण्ड: वन-गमन, चित्रकूट-निवास एवं शूर्पणखा प्रसंग
१३५ बालकाण्ड भूपतिकिसोर दुहुँ ओर, बीच मुनिराउ, देखिबेको दाउँ, देखौ देखिबो बिहाइकै । उदय-सैल सोहैं सुंदर कुँवर जोहैं, मानो भानु भोर भूरि किरनि छिपाइकै ॥ ४ ॥ कौतुक कोलाहल निसान-गान पुर, नभ बरषत सुमन बिमान रहे छाइकै । हित-अनहित, रत-बिरत बिलोकि बाल, प्रेम-मोद-मगन जनम-फल पाइकै ॥ ५ ॥ राजाकी रजाइ पाइ सचिव-सहेली धाइ, सतानंद ल्याए सिय सिबिका चढ़ाइकै । रूप-दीपिका निहारि मृग-मृगी नर-नारि, बिथके बिलोचन-निमेषै बिसराइकै ॥ ६ ॥ हानि, लाहु, अनख, उछाहू, बाहुबल कहि बंदि बोले बिरद अकस उपजाइकै । दीप दीपके महीप आपु सुनि पैज पन, कीजै पुरुषारथको अवसर भौ आइकै ॥ ७ ॥ आनाकानी, कंठ-हँसी मुँहा-चाही होन लगी, देखि दसा कहत बिदेह बिलखाइकै । घरनि सिधारिए, सुधारिए आगिलो काज, पूजि पूजि धनु कीजै बिजय बजाइकै ॥ ८ ॥ जनक-बचन छुए बिरवा लजारु के से बीर रहे सकल सकुचि सिर नाइकै । तुलसी लखन माषे, रोषे, राखे रामरुख, भाषे मृदु परुष सुभायन रिसाइकै ॥ ६ ॥
गीतावली १३६ आज राजा लोग अपने-अपने साज और अपने-अपने सुन्दर वेष बनाकर रङ्गभूमिमें अपने-अपने स्थानोंपर जाकर बैठ गये हैं ॥ १ ॥ इसी समय महाराज जनकने, जिनके अति सुन्दर राम और लक्ष्मण नाम हैं, उन महामनोहर बालकोंको विश्वामित्रजीके सहित बुला भेजा। उनके दर्शनोंकी लालसासे पुरवासी लोग भले भावसे प्रसन्नवदन होकर अपने-अपने घरोंसे निकल-निकलकर दौड़ पड़े ॥ २ ॥ तब जनकजीने अपने छोटे भाई कुशध्वजके सहित आनन्दित हो आगे आकर उनका स्वागत किया तथा आदरपूर्वक धनुर्यज्ञकी समस्त रुचिर रचना दिखाकर उन्हें दिव्य आसन दिये, जिनपर सब प्रकारका सुपास और सावकाश था तथा अलग-अलग अच्छे-अच्छे बिछौने बिछे हुए थे ॥ ३ ॥ [दर्शकगण कहते हैं—] 'अहा ! दोनों ओर राजकुमार हैं और बीचमें मुनिराज विश्वामित्रजी विराजमान हैं। यह इन्हें देखनेका बड़ा अच्छा अवसर है; इसलिये और सब देखना छोड़कर इन्हींका दर्शन करो। ये दोनों सुन्दर राजकुमार ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उदयाचलपर प्रातःकालीन सूर्य अपनी सहस्र किरणोंको छिपाकर उदित हुआ हो ॥ ४ ॥ जनकपुर- में बड़ा कौतुक तथा निशान और गानका कोलाहल हो रहा है तथा आकाशमें देवताओंके विमान छाये हुए हैं, जिनसे फूलोंकी वर्षा हो रही है मित्र-शत्रु, रागी-विरागी—ये सब इन बालकोंको देखकर अपना जन्मफल पाकर प्रेम और आनन्दमें मग्न हो रहे हैं ॥ ५ ॥ फिर महाराज जनककी आज्ञा पा मन्त्रिवर्ग और सहेलियाँ दौड़ीं तथा शतानन्दजी सीताजीको पालकीपर चढ़ाकर ले आये । श्रीजानकीजीके सौन्दर्यरूपी दीपकको निहारकर सब नर-नारी नेत्रोंके
१३७ | बालकाण्ड निमेष भूलकर मृग और मृगियोंके समान चकित-से रह गये ॥ ६ ॥ इसी समय बन्दीजन [धनुष न टूटनेसे] हानि, [धनुर्भङ्गसे सीताजी- की प्राप्तिरूप] लाभ, [बहुत बल करनेपर भी धनुर्भङ्ग न कर सकनेके कारण राजाओंको हुआ,] अनख, [जो धनुष तोड़ेगा उसे सीताजी मिलेंगी—ऐसा कहकर] उत्साह तथा [रावण-बाणासुरादि विश्वविजयी योद्धाओंके भी दाँत खट्टे करनेवाले धनुषको जो तोड़ेगा उसके] बाहुबलका बखान करके प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करते हुए विरुदावली कहने लगे और बोले, 'इस समय महाराज जनककी दृढ़ प्रतिज्ञा सुनकर द्वीप-द्वीपान्तरके राजा लोग आये हुए हैं; सो उसे पूरी करें; अब पुरुषार्थका समय उपस्थित हो गया है' ॥ ७ ॥ उसे सुनकर राजाओंमें परस्पर आनाकानी, कण्ठ-हँसी (भीतर-ही-भीतर हँसना) तथा कानाफूसी होने लगी। इस दशाको देखकर महाराज जनक बिलखकर कहने लगे—'हे नृपतिगण ! आप अपने घरोंको जाइये और अपना अगला कार्य तो सँभालिये [यह कार्य तो आपलोगों से हो चुका], अब आप धनुषकी पूजाकर अपनी विजयका घोष कीजिये' ॥ ८ ॥ जनकजीके ये वचन सुन वे सब वीर लज्जावती (छुईमुई) के पौधोंके समान संकोचवश सिर झुकाकर रह गये। तुलसीदासजी कहते हैं, इन वाक्योंसे लक्ष्मणजी भी खीझ गये, किन्तु रामचन्द्रजीका रुख देखकर, अपने स्वभावके अनुकूल रोष करते हुए कुछ मधुर और कुछ कठोर वचन बोले ॥ ९ ॥ [ ८५ ] भूपति बिदेह कही नीकियै जौ भई है। बड़े ही समाज आजु राजनिकीं लाज-पति हाँकि झाँक एक ही पिनाक छीनि लई है ॥ १ ॥
गीतावली १३८ मेरो अनुचित न कहत लरिकाई-बस, पन परमिति और भाँति सुनि गई है। नतरु प्रभु-प्रताप उतरु चढ़ाय चाप देतो पै देखाइ बल, फल पापमई है ॥ २ ॥ भूमिके हरैया उखरैया भूमिधरनके, विधि बिरचे प्रभाउ जाको जग जई है। बिहँसि हिये हरषि हटके लषन राम, सोहत सङ्कोच सील नेह नारि नई हैं ॥ ३ ॥ सहमी सभा सकल, जनक भए बिकल राम लखि कौसिक असीस-आग्या दई है। तुलसी सुभाय गुरुपाँय लागि रघुराज ऋषिराजकी रजाइ माथे मानि लई है ॥ ४ ॥ लक्ष्मणजी बोले—'महाराज जनकने जो कुछ कहा है वह सब बहुत ठीक है। इस बहुत बड़े समाजमें आज राजाओंकी सारी लाज और इज्जत इस अकेले धनुषने चुनौती देकर छीन ली है ॥ १ ॥ मैं अपने लड़कपनसे कुछ कहता हूँ, उसे अनुचित न मानें, इस धनुर्भङ्गका फल और ही प्रकारसे सुना गया है; नहीं तो प्रभुके प्रतापसे इस धनुषको चढ़ाकर ही मैं जनकजीको उत्तर देता । मैं अपना बल अवश्य दिखा देता; परन्तु [करूँ क्या ?] इससे प्राप्त होनेवाला फल पापमय है [क्योंकि जगज्जननी सीताजी तो मेरी माताके समान हैं] ॥ २ ॥ इस समय विधाताने इस धनुषका 'प्रभाव भूमिका हरण करनेवाले बाणासुरादि तथा पर्वतोंके उखाड़ने- वाले रावणादिके सहित सम्पूर्ण जगत्को जीतनेवाला बना दिया है। [ परन्तु मैं तो इसे कुछ भी नहीं समझता ]।' यह सुनकर
१३६ बालकाण्ड रघुनाथजीने हृदयमें हँसकर लक्ष्मणजीको रोक दिया। उस समय वे शील, संकोच और स्नेहवश झुकी हुई ग्रीवासे सुशोभित होने लगे ॥ ३ ॥ इससे सारी सभा सहम गयी, जनकजी प्रेमविह्वल हो गये तथा विश्वामित्रजीने रामचन्द्रजीकी ओर देखकर उन्हें आशीर्वाद और धनुर्भङ्गके लिये आज्ञा दी। तुलसीदास कहते हैं, फिर स्वभावसे ही गुरुके चरणोंमें गिरकर रघुनाथजीने ऋषिराजकी आज्ञा सिरपर धारण कर ली ॥ ४ ॥ [ ८६ ] सोचत जनक पोच पेच परि गई है। जोरि कर कमल निहोरि कहैं कौसिकसों, आयसु भौ रामको सो मेरे दुचितई है ॥ १ ॥ बान, जातुधानपति, भूप दीप सातहूके, लोकप बिलोकत पिनाक भूमि लई है। जोतिलिंग कथा सुनि जाको अंत पाये बिनु आए बिधि हरि हारि सोई हाल भई है ॥ २ ॥ आपुही बिचारिये, निहारिये, सभाकी गति, बेद-मरजाद मानौ हेतुबाद हई है। इन्हके जितौहैं मन, सोभा अधिकानी तन, मुखनकी सुखमा सुखद सरसई है ॥ ३ ॥ रावरो भरोसो बल, कै है कोऊ कियो छल, कैधों कुलको प्रभाव, कैधों लरिकई है ? । कन्या, कल कीरति, बिजय बिस्वकी बटोरि कैधों करतार इन्हहींको निरमई है ॥ ४ ॥ पनको न मोह, न बिसेष चिंता सीताहूकी, लुनिहै पै सोई सोई जोई जेहि बई है।
गीतावली १४० रहे रघुनाथकी निकाई नीकी नीके नाथ, हाथ सो तिहारे करतूति जाकी नई है ॥ ५ ॥ कहि 'साधु' साधु, गाधि-सुवन सराहे राउ, 'महाराज ! जानि जिय ठीक भली दई है' । हरषे लखन, हरखाने बिलखाने लोग, तुलसी मुदित जाको राजा राम जई है ॥ ६ ॥ जनकजी सोचते हैं—'बड़ा बुरा पेंच आ पड़ा है।' वे श्रीविश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर निहोरा करते हुए कहने लगे— 'भगवन् ! आपने जो रामको आज्ञा दी है, उसके सम्बन्धमें मुझे सन्देह हो रहा है। बाणासुर, राक्षसराज रावण, सातों द्वीपोंके नृपतिगण और लोकपालोंके देखते ही इस धनुषने मानो पृथ्वीको पकड़ लिया है। जिस प्रकार ज्योतिर्लिङ्गकी कथा सुनकर [उसका अन्त पानेके लिये स्वर्ग और पातालमें जानेपर भी] ब्रह्मा और विष्णु अन्तमें उसका पार न पाकर लौट आये थे, वही हाल इस धनुषका भी हुआ है ॥ १-२ ॥ आप ही विचारिये और इस समय सभाकी गति देखिये। ऐसा जान पड़ता है। मानो हेतुवाद (तर्कवाद) ने वेदकी मर्यादा नष्ट कर दी हो। इन बालकोंका तो, जैसा मन प्रसन्न है वैसी ही शरीरकी शोभा बढ़ी हुई है तथा इनके मुखोंकी सुन्दरता भी अति सुखदायिनी जान पड़ती है ॥ ३ ॥ इनकी जो प्रसन्नता है वह या तो आपके भरोसेका बल है, या ये कोई छल किये हुए देवता हैं, या इनके कुछ (सूर्यवंश) का प्रभाव है, या केवल बालकपन है अथवा विधाताने मेरी कन्या सीता तथा विश्वव्यापिनी कीर्ति और विजयको बटोरकर कहीं इन्हींके लिये तो
१४१ बालकाण्ड नहीं रचा है ? ॥ ४ ॥ मुझे अपने प्रणका मोह नहीं है और न सीता- हीकी विशेष चिन्ता है, क्योंकि जिस पुरुषने जो कुछ बोया है वह वही काटेगा ! [ मैं तो यही चाहता हूँ कि] रघुनाथजीकी नीकी निकाई नीकी ही बनी रहे, इसलिये हे प्रभो ! यह तो आपहीके हाथ है, जिनकी कि बड़ी विचित्र करतूत है' ॥ ५ ॥ तब विश्वा- मित्रजीने साधु-साधु कहकर महाराज जनककी प्रशंसा की और कहा—'राजन् ! आपने अपने हृदयमें उचित जानकर बहुत ठीक बात निश्चय कर रक्खी है। [ राजा जनकका भाव जानकर ] लक्ष्मणजी प्रसन्न हुए और हृदयमें बिलखते हुए पुरवासीलोग भी आनन्दमग्न हो गये । जिसके राजा महाराज राम विजयी हैं, वह तुलसीदास भी अत्यन्त प्रसन्न है ॥ ६ ॥ [ ८७ ] सुजन सराहें जो जनक बात कही है। रामहि सोहानी जानि, मुनिमनमानी सुनि, नीच महिपवली दहन बिनु दही है ॥ १ ॥ कहैं गाधिनंदन मुदित रघुनंदनसों, नृपगति अगह, गिरा न जाति गही है। देखे-सुने भूपति अनेक झूठे झूठे नाम सांचे तिरहुतिनाथ, साखि देति मही है ॥ २ ॥ रागऊ बिराग, भोग जोग जोगवत मन, जोगी जागबलिक प्रसाद सिद्धि लही है। ताते न तरनितें, न सीरे सुधाकरहूतें सहज समाधि निरुपाधि निरबही है ॥ ३ ॥
गीतावली १४२ ऐसे अगाध बोध रावरे सनेह-बस, बिकल बिलोकति, दुचितई सही है। कामधेनु-कृपा हुलसानी तुलसीस उर, पन-सिसु हेरि, मरजाद बाँधी रही है ॥ ४ ॥ इस समय जनकजीने जो बात कही उसकी साधु पुरुषोंने सराहना की तथा उसे रामचन्द्रजीको प्रिया और विश्वामित्रजीको अभिमत जान अन्य नीच राजाओंकी पंक्ति बिना आगके ही जल गयी ॥ १ ॥ तब गाधिनन्दन विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर रघुनाथजी से कहा—'महाराज जनककी गति बड़ी अग्राह्य है, वह वाणीसे ग्रहण नहीं की जा सकती। राजा तो अनेक देखे सुने हैं, किन्तु वे सब झूठे और नाममात्रके ही हैं। सच्चे तो एकमात्र तिरहुतनाथ महाराज जनक ही हैं—इस विषयमें सारी पृथ्वी साक्ष्य दे रही है ॥ २ ॥ इनका चित्त रागी होनेपर भी विरागी तथा भोग भोगनेयोग्य होकर भी योगयुक्त है। इन्होंने योगी याज्ञवल्क्यकी कृपासे सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर ली है। ये न तो सूर्यसे संतप्त होते हैं और न चन्द्रमासे शीतल ही होते हैं। इन्होंने तो उपाधिरहित सहज समाधिका निर्वाह कर लिया है ॥ ३ ॥ ऐसे अगाधबोधसम्पन्न होकर भी तुम्हारे स्नेहवश ये ऐसे व्याकुल दिखायी देते हैं, मानो अत्यन्त चिन्ता सहन की हो। [गुरुजीका यह कथन सुन] तुलसीदासजीके प्रभुके हृदयमें कृपारूप कामधेनु महाराज जनकके प्रणरूप वत्सको देखकर अति हुलसित हुई। किन्तु [गुरुकी आज्ञारूप] मर्यादामें बँधी रह गयी [अर्थात् उन्होंने गुरुजीकी आज्ञाके बिना धनुर्भङ्ग नहीं किया] ॥ ४ ॥ [ ८८ ] ऋषिराज ! राजा आजु जनक समान को ? आपु यहि भाँति प्रीति सहित सराहित, रागी औ बिरागी बड़भागी ऐसो आन को ? ॥ १ ॥