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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

[Page Header: १३१ बालकाण्ड]

'महाराज जनकको श्रीमहादेवजी अनुकूल हैं। वे नीलकण्ठ, करुणासागर शिवजी दीनबन्धु और निरन्तर दान करनेवाले हैं ॥ १ ॥ जो सब बातोंको हृदयमें जानकर पहलेहीसे जनकजीको धनुष सौंप गये थे, उन्हीं भगवान् त्रिनयनने इन राजकुमारों को लाकर इस समय हम सबको नेत्रोंका फल सुलभ कर दिया है ॥ २ ॥ सुना जाता है, राम भगवान् शङ्करको प्रिय हैं और जानकी पार्वतीजीको भाती हैं। इस समय वे [राम-जानकीकी] प्रीति-प्रतीति और [राजा जनककी] टेक एवं प्रणकी परीक्षा कर रहे हैं, इसीलिये कार्यके ठाट ठटकर उसमें विलम्ब कर रहे हैं ॥ ३ ॥ इन बालकोंको बिना पहचाने केवल देखनेसे ही जनकजी स्नेहवश हो गये हैं [इससे जान पड़ता है कि इनके साथ उनका सम्बन्ध अवश्य होनेवाला है], मैं तो अपनी बुद्धिसे अनुमान करके कहती हूँ कि होनहार वृक्षोंके पत्ते हरे होते हैं ॥ ४ ॥ यद्यपि इन बालकोंका स्वभाव सङ्कोची है, तो भी इनके सामने अन्य नृपतिगण प्रातःकालीन तारागणके समान तेजहीन दिखायी पड़ते हैं और बेचारे ग्लानिसे गले जाते हैं तथा इनका तेज और प्रताप निरन्तर बढ़ रहा है ॥ ५ ॥ यद्यपि अभी इनकी किशोरावस्था है तथापि ये धनुषको अपने प्रबल बाहुबलरूप मेरुमें रखकर उसका रौंदा चढ़ा देंगे। हमारे विचारसे तो कमल- नयन राम निश्चय ही इस महादेवजीके धनुषको तोड़ डालेंगे ॥ ६ ॥ इनके इस सकल सुमङ्गलखानि विवाहोत्सवको सब नर-नारी देखेंगे।' तुलसीदासजी कहते हैं, जो लोग इसका श्रवण, गान और बखान करेंगे वे भी बड़े ही भाग्यवान् हैं ॥ ७ ॥

गीतावली १३२ राग केदारा [ ८१ ] रामहि नीके कै निरखि, सुनैनी ! मनसहु अगम समुझि, यह अवसरु कत सकुचति, पिकबैनी ॥ १ ॥ बड़े भाग मख-भूमि प्रगट भई सीय सुमंगल-ऐनी। जा कारन लोचन गोचर भइ मूरति सब सुखदैनी ॥ २ ॥ कुलगुर-तियके मधुर बचन सुनि जनक-जुवति मति, पैनी। तुलसी सिथिल देह-सुधि-बुधि करि सहज सनेह-बिषैनी ॥ ३ ॥ [शतानन्दजीकी स्त्री जानकीजीकी मातासे कहती हैं—] 'हे सुनयनी ! तू रामचन्द्रजीको अच्छी तरह देख ले। अरी पिकभाषिणा! उन्हें तू मनसे भी अगम समझ। इस अवसरपर तू सकुचाती क्यों है ? ॥ १ ॥ जिसके कारण यह सब प्रकारके सुख देनेवाली मधुर मूर्ति हमारे नेत्रोंका विषय हुई है, वह सब प्रकारके सुमङ्गलोंकी आश्रयभूता सीता हमारे परम सौभाग्यसे ही यज्ञभूमिमें प्रकट हुई हैं' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—अपने कुलगुरुकी स्त्रीके ये मधुर वचन सुनकर कुशाग्रबुद्धि जनकप्रिया शरीरकी सुध-बुध भूलकर भगवान्‌की ओर स्वाभाविक स्नेहसे देखने लगीं ॥ ३ ॥ [ ८२ ] मिलो बरु सुंदर सुंदरि सीतहि लायकु, साँवरो सुभग, सोभाहूँको परम सिंगारु। मनहूँको मन मोहै, उपमाको को है ? सोहै सुखमासागर संग अनुज राजकुमारु ॥ १ ॥ ललित सकल अंग, तनु धरे कै अनंग, नैननिको फल कैधौं, सियको सुकृत-सारु।

१३३ बालकाण्ड सरद-सुधा-सदन-छबिहि निंदै बदन, अरुन आयत नवनलिन-लोचन चारु ॥ २ ॥ जनक-मनकी रीति जानि बिरहित प्रीति, ऐसी औ मूरति देखे रह्यो पहिलो बिचारु । तुलसी नृपहि ऐसो कहि न बुझावै कोउ, 'पन औ कुँवरदोऊ प्रेमकी तुला धौं तारु' ॥ ३ ॥ 'अरी सखी ! शोभाका भी परम शृंगाररूप यह अति सुन्दर साँवला वर तो सीताहीके लायक है । यह तो सुन्दरी सीताको ही मिलना चाहिये । यह मनका भी मन मोह लेते हैं । इनकी उपमाके योग्य और कौन हो सकता है ? इनके साथ इनका अनुज यह सुषमासागर राजकुमार सुशोभित है ॥ १ ॥ इनके सब अङ्ग अति सुन्दर हैं, यह देहधारी कामदेव, नेत्रोंका फल अथवा सीताके सुकृतोंका सार ही तो नहीं है ? इनका मुखचन्द्र शरत्कालीन सुधाकरकी छबिकी निन्दा करता है तथा इनके अरुण और विशाल नयन नवीन कमलदलके समान सुन्दर हैं ॥ २ ॥ यदि ऐसी मनो- मोहिनी मूर्तिको देखकर भी जनकजीका पहला (धनुर्भङ्गके प्रणका) विचार बना हुआ है तो उनके चित्तकी रीति प्रीतिसे रहित है ।' तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय राजा जनकको कोई ऐसा कहकर नहीं समझाता कि अपने प्रण और इन दोनों राजकुमारोंको प्रेमकी तराजूमें रखकर तौलो तो ॥ ३ ॥ [ ८३ ] देखि देखि री ! दोउ राजसुवन । गोर स्याम सलोने लोने, लोयननि, जिन्हकी सोभा तें सोहै सकल भुवन ॥ १ ॥

गीतावली १३४ इन्हहीं ताड़का मारी, मग मुनि-तिय तारी, ऋषिमख राख्यो, रन दले हैं दुवन। तुलसी प्रभुको अब जनकनगर-नभ, सुजस-बिमल-बिधु चहत उवन ॥ २ ॥ 'अरी सखी ! इन दोनों राजकुमारोंको तो देख । देख, इनके अति सुन्दर लावण्यमय श्याम-गौर शरीर हैं तथा लुभावने नयन हैं, जिनकी शोभासे सारे भुवन शोभायमान हो रहे हैं ॥ १ ॥ इन्हींने ताड़काको मारा है और मार्गमें मुनि-पत्नीका उद्धार किया है तथा इन्हींने विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा कर युद्धमें सुबाहु आदि दुष्टोंका दलन किया है।' तुलसीदास कहते हैं, अब शीघ्र ही जनकपुरीमें प्रभुका सुयशरूप निर्मल चन्द्र उदित होना चाहता है ॥ २ ॥ राग तोड़ी [ ८४ ] राजा रंगभूमि आज बैठे जाइ जाइकैं। अपने अपने थल, अपने अपने साज, अपनी अपनी बर बानिक बनाइकैं ॥ १ ॥ कौसिक सहित राम-लषन ललित नाम, लरिका ललाम लोने पठए बुलाइकैं। दरसलालसा-बस लोग चले भाय भले, बिकसित-मुख निकसत धाइ धाइकैं ॥ २ ॥ सानुज सानंद हिये आगे ह्वै जनक लिये, रचना रुचिर सब सादर देखाइकैं। दिये दिब्य आसन सुपास सावकास अति, आछे आछे बीछे-बीछे बिछौनी बिछाइकें ॥ ३ ॥

२. अयोध्या एवं अरण्यकाण्ड: वन-गमन, चित्रकूट-निवास एवं शूर्पणखा प्रसंग

१३५ बालकाण्ड भूपतिकिसोर दुहुँ ओर, बीच मुनिराउ, देखिबेको दाउँ, देखौ देखिबो बिहाइकै । उदय-सैल सोहैं सुंदर कुँवर जोहैं, मानो भानु भोर भूरि किरनि छिपाइकै ॥ ४ ॥ कौतुक कोलाहल निसान-गान पुर, नभ बरषत सुमन बिमान रहे छाइकै । हित-अनहित, रत-बिरत बिलोकि बाल, प्रेम-मोद-मगन जनम-फल पाइकै ॥ ५ ॥ राजाकी रजाइ पाइ सचिव-सहेली धाइ, सतानंद ल्याए सिय सिबिका चढ़ाइकै । रूप-दीपिका निहारि मृग-मृगी नर-नारि, बिथके बिलोचन-निमेषै बिसराइकै ॥ ६ ॥ हानि, लाहु, अनख, उछाहू, बाहुबल कहि बंदि बोले बिरद अकस उपजाइकै । दीप दीपके महीप आपु सुनि पैज पन, कीजै पुरुषारथको अवसर भौ आइकै ॥ ७ ॥ आनाकानी, कंठ-हँसी मुँहा-चाही होन लगी, देखि दसा कहत बिदेह बिलखाइकै । घरनि सिधारिए, सुधारिए आगिलो काज, पूजि पूजि धनु कीजै बिजय बजाइकै ॥ ८ ॥ जनक-बचन छुए बिरवा लजारु के से बीर रहे सकल सकुचि सिर नाइकै । तुलसी लखन माषे, रोषे, राखे रामरुख, भाषे मृदु परुष सुभायन रिसाइकै ॥ ६ ॥

गीतावली १३६ आज राजा लोग अपने-अपने साज और अपने-अपने सुन्दर वेष बनाकर रङ्गभूमिमें अपने-अपने स्थानोंपर जाकर बैठ गये हैं ॥ १ ॥ इसी समय महाराज जनकने, जिनके अति सुन्दर राम और लक्ष्मण नाम हैं, उन महामनोहर बालकोंको विश्वामित्रजीके सहित बुला भेजा। उनके दर्शनोंकी लालसासे पुरवासी लोग भले भावसे प्रसन्नवदन होकर अपने-अपने घरोंसे निकल-निकलकर दौड़ पड़े ॥ २ ॥ तब जनकजीने अपने छोटे भाई कुशध्वजके सहित आनन्दित हो आगे आकर उनका स्वागत किया तथा आदरपूर्वक धनुर्यज्ञकी समस्त रुचिर रचना दिखाकर उन्हें दिव्य आसन दिये, जिनपर सब प्रकारका सुपास और सावकाश था तथा अलग-अलग अच्छे-अच्छे बिछौने बिछे हुए थे ॥ ३ ॥ [दर्शकगण कहते हैं—] 'अहा ! दोनों ओर राजकुमार हैं और बीचमें मुनिराज विश्वामित्रजी विराजमान हैं। यह इन्हें देखनेका बड़ा अच्छा अवसर है; इसलिये और सब देखना छोड़कर इन्हींका दर्शन करो। ये दोनों सुन्दर राजकुमार ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उदयाचलपर प्रातःकालीन सूर्य अपनी सहस्र किरणोंको छिपाकर उदित हुआ हो ॥ ४ ॥ जनकपुर- में बड़ा कौतुक तथा निशान और गानका कोलाहल हो रहा है तथा आकाशमें देवताओंके विमान छाये हुए हैं, जिनसे फूलोंकी वर्षा हो रही है मित्र-शत्रु, रागी-विरागी—ये सब इन बालकोंको देखकर अपना जन्मफल पाकर प्रेम और आनन्दमें मग्न हो रहे हैं ॥ ५ ॥ फिर महाराज जनककी आज्ञा पा मन्त्रिवर्ग और सहेलियाँ दौड़ीं तथा शतानन्दजी सीताजीको पालकीपर चढ़ाकर ले आये । श्रीजानकीजीके सौन्दर्यरूपी दीपकको निहारकर सब नर-नारी नेत्रोंके

१३७ | बालकाण्ड निमेष भूलकर मृग और मृगियोंके समान चकित-से रह गये ॥ ६ ॥ इसी समय बन्दीजन [धनुष न टूटनेसे] हानि, [धनुर्भङ्गसे सीताजी- की प्राप्तिरूप] लाभ, [बहुत बल करनेपर भी धनुर्भङ्ग न कर सकनेके कारण राजाओंको हुआ,] अनख, [जो धनुष तोड़ेगा उसे सीताजी मिलेंगी—ऐसा कहकर] उत्साह तथा [रावण-बाणासुरादि विश्वविजयी योद्धाओंके भी दाँत खट्टे करनेवाले धनुषको जो तोड़ेगा उसके] बाहुबलका बखान करके प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करते हुए विरुदावली कहने लगे और बोले, 'इस समय महाराज जनककी दृढ़ प्रतिज्ञा सुनकर द्वीप-द्वीपान्तरके राजा लोग आये हुए हैं; सो उसे पूरी करें; अब पुरुषार्थका समय उपस्थित हो गया है' ॥ ७ ॥ उसे सुनकर राजाओंमें परस्पर आनाकानी, कण्ठ-हँसी (भीतर-ही-भीतर हँसना) तथा कानाफूसी होने लगी। इस दशाको देखकर महाराज जनक बिलखकर कहने लगे—'हे नृपतिगण ! आप अपने घरोंको जाइये और अपना अगला कार्य तो सँभालिये [यह कार्य तो आपलोगों से हो चुका], अब आप धनुषकी पूजाकर अपनी विजयका घोष कीजिये' ॥ ८ ॥ जनकजीके ये वचन सुन वे सब वीर लज्जावती (छुईमुई) के पौधोंके समान संकोचवश सिर झुकाकर रह गये। तुलसीदासजी कहते हैं, इन वाक्योंसे लक्ष्मणजी भी खीझ गये, किन्तु रामचन्द्रजीका रुख देखकर, अपने स्वभावके अनुकूल रोष करते हुए कुछ मधुर और कुछ कठोर वचन बोले ॥ ९ ॥ [ ८५ ] भूपति बिदेह कही नीकियै जौ भई है। बड़े ही समाज आजु राजनिकीं लाज-पति हाँकि झाँक एक ही पिनाक छीनि लई है ॥ १ ॥

गीतावली १३८ मेरो अनुचित न कहत लरिकाई-बस, पन परमिति और भाँति सुनि गई है। नतरु प्रभु-प्रताप उतरु चढ़ाय चाप देतो पै देखाइ बल, फल पापमई है ॥ २ ॥ भूमिके हरैया उखरैया भूमिधरनके, विधि बिरचे प्रभाउ जाको जग जई है। बिहँसि हिये हरषि हटके लषन राम, सोहत सङ्कोच सील नेह नारि नई हैं ॥ ३ ॥ सहमी सभा सकल, जनक भए बिकल राम लखि कौसिक असीस-आग्या दई है। तुलसी सुभाय गुरुपाँय लागि रघुराज ऋषिराजकी रजाइ माथे मानि लई है ॥ ४ ॥ लक्ष्मणजी बोले—'महाराज जनकने जो कुछ कहा है वह सब बहुत ठीक है। इस बहुत बड़े समाजमें आज राजाओंकी सारी लाज और इज्जत इस अकेले धनुषने चुनौती देकर छीन ली है ॥ १ ॥ मैं अपने लड़कपनसे कुछ कहता हूँ, उसे अनुचित न मानें, इस धनुर्भङ्गका फल और ही प्रकारसे सुना गया है; नहीं तो प्रभुके प्रतापसे इस धनुषको चढ़ाकर ही मैं जनकजीको उत्तर देता । मैं अपना बल अवश्य दिखा देता; परन्तु [करूँ क्या ?] इससे प्राप्त होनेवाला फल पापमय है [क्योंकि जगज्जननी सीताजी तो मेरी माताके समान हैं] ॥ २ ॥ इस समय विधाताने इस धनुषका 'प्रभाव भूमिका हरण करनेवाले बाणासुरादि तथा पर्वतोंके उखाड़ने- वाले रावणादिके सहित सम्पूर्ण जगत्‌को जीतनेवाला बना दिया है। [ परन्तु मैं तो इसे कुछ भी नहीं समझता ]।' यह सुनकर

१३६ बालकाण्ड रघुनाथजीने हृदयमें हँसकर लक्ष्मणजीको रोक दिया। उस समय वे शील, संकोच और स्नेहवश झुकी हुई ग्रीवासे सुशोभित होने लगे ॥ ३ ॥ इससे सारी सभा सहम गयी, जनकजी प्रेमविह्वल हो गये तथा विश्वामित्रजीने रामचन्द्रजीकी ओर देखकर उन्हें आशीर्वाद और धनुर्भङ्गके लिये आज्ञा दी। तुलसीदास कहते हैं, फिर स्वभावसे ही गुरुके चरणोंमें गिरकर रघुनाथजीने ऋषिराजकी आज्ञा सिरपर धारण कर ली ॥ ४ ॥ [ ८६ ] सोचत जनक पोच पेच परि गई है। जोरि कर कमल निहोरि कहैं कौसिकसों, आयसु भौ रामको सो मेरे दुचितई है ॥ १ ॥ बान, जातुधानपति, भूप दीप सातहूके, लोकप बिलोकत पिनाक भूमि लई है। जोतिलिंग कथा सुनि जाको अंत पाये बिनु आए बिधि हरि हारि सोई हाल भई है ॥ २ ॥ आपुही बिचारिये, निहारिये, सभाकी गति, बेद-मरजाद मानौ हेतुबाद हई है। इन्हके जितौहैं मन, सोभा अधिकानी तन, मुखनकी सुखमा सुखद सरसई है ॥ ३ ॥ रावरो भरोसो बल, कै है कोऊ कियो छल, कैधों कुलको प्रभाव, कैधों लरिकई है ? । कन्या, कल कीरति, बिजय बिस्वकी बटोरि कैधों करतार इन्हहींको निरमई है ॥ ४ ॥ पनको न मोह, न बिसेष चिंता सीताहूकी, लुनिहै पै सोई सोई जोई जेहि बई है।

गीतावली १४० रहे रघुनाथकी निकाई नीकी नीके नाथ, हाथ सो तिहारे करतूति जाकी नई है ॥ ५ ॥ कहि 'साधु' साधु, गाधि-सुवन सराहे राउ, 'महाराज ! जानि जिय ठीक भली दई है' । हरषे लखन, हरखाने बिलखाने लोग, तुलसी मुदित जाको राजा राम जई है ॥ ६ ॥ जनकजी सोचते हैं—'बड़ा बुरा पेंच आ पड़ा है।' वे श्रीविश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर निहोरा करते हुए कहने लगे— 'भगवन् ! आपने जो रामको आज्ञा दी है, उसके सम्बन्धमें मुझे सन्देह हो रहा है। बाणासुर, राक्षसराज रावण, सातों द्वीपोंके नृपतिगण और लोकपालोंके देखते ही इस धनुषने मानो पृथ्वीको पकड़ लिया है। जिस प्रकार ज्योतिर्लिङ्गकी कथा सुनकर [उसका अन्त पानेके लिये स्वर्ग और पातालमें जानेपर भी] ब्रह्मा और विष्णु अन्तमें उसका पार न पाकर लौट आये थे, वही हाल इस धनुषका भी हुआ है ॥ १-२ ॥ आप ही विचारिये और इस समय सभाकी गति देखिये। ऐसा जान पड़ता है। मानो हेतुवाद (तर्कवाद) ने वेदकी मर्यादा नष्ट कर दी हो। इन बालकोंका तो, जैसा मन प्रसन्न है वैसी ही शरीरकी शोभा बढ़ी हुई है तथा इनके मुखोंकी सुन्दरता भी अति सुखदायिनी जान पड़ती है ॥ ३ ॥ इनकी जो प्रसन्नता है वह या तो आपके भरोसेका बल है, या ये कोई छल किये हुए देवता हैं, या इनके कुछ (सूर्यवंश) का प्रभाव है, या केवल बालकपन है अथवा विधाताने मेरी कन्या सीता तथा विश्वव्यापिनी कीर्ति और विजयको बटोरकर कहीं इन्हींके लिये तो

१४१ बालकाण्ड नहीं रचा है ? ॥ ४ ॥ मुझे अपने प्रणका मोह नहीं है और न सीता- हीकी विशेष चिन्ता है, क्योंकि जिस पुरुषने जो कुछ बोया है वह वही काटेगा ! [ मैं तो यही चाहता हूँ कि] रघुनाथजीकी नीकी निकाई नीकी ही बनी रहे, इसलिये हे प्रभो ! यह तो आपहीके हाथ है, जिनकी कि बड़ी विचित्र करतूत है' ॥ ५ ॥ तब विश्वा- मित्रजीने साधु-साधु कहकर महाराज जनककी प्रशंसा की और कहा—'राजन् ! आपने अपने हृदयमें उचित जानकर बहुत ठीक बात निश्चय कर रक्खी है। [ राजा जनकका भाव जानकर ] लक्ष्मणजी प्रसन्न हुए और हृदयमें बिलखते हुए पुरवासीलोग भी आनन्दमग्न हो गये । जिसके राजा महाराज राम विजयी हैं, वह तुलसीदास भी अत्यन्त प्रसन्न है ॥ ६ ॥ [ ८७ ] सुजन सराहें जो जनक बात कही है। रामहि सोहानी जानि, मुनिमनमानी सुनि, नीच महिपवली दहन बिनु दही है ॥ १ ॥ कहैं गाधिनंदन मुदित रघुनंदनसों, नृपगति अगह, गिरा न जाति गही है। देखे-सुने भूपति अनेक झूठे झूठे नाम सांचे तिरहुतिनाथ, साखि देति मही है ॥ २ ॥ रागऊ बिराग, भोग जोग जोगवत मन, जोगी जागबलिक प्रसाद सिद्धि लही है। ताते न तरनितें, न सीरे सुधाकरहूतें सहज समाधि निरुपाधि निरबही है ॥ ३ ॥

गीतावली १४२ ऐसे अगाध बोध रावरे सनेह-बस, बिकल बिलोकति, दुचितई सही है। कामधेनु-कृपा हुलसानी तुलसीस उर, पन-सिसु हेरि, मरजाद बाँधी रही है ॥ ४ ॥ इस समय जनकजीने जो बात कही उसकी साधु पुरुषोंने सराहना की तथा उसे रामचन्द्रजीको प्रिया और विश्वामित्रजीको अभिमत जान अन्य नीच राजाओंकी पंक्ति बिना आगके ही जल गयी ॥ १ ॥ तब गाधिनन्दन विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर रघुनाथजी से कहा—'महाराज जनककी गति बड़ी अग्राह्य है, वह वाणीसे ग्रहण नहीं की जा सकती। राजा तो अनेक देखे सुने हैं, किन्तु वे सब झूठे और नाममात्रके ही हैं। सच्चे तो एकमात्र तिरहुतनाथ महाराज जनक ही हैं—इस विषयमें सारी पृथ्‍वी साक्ष्य दे रही है ॥ २ ॥ इनका चित्त रागी होनेपर भी विरागी तथा भोग भोगनेयोग्य होकर भी योगयुक्त है। इन्होंने योगी याज्ञवल्क्यकी कृपासे सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर ली है। ये न तो सूर्यसे संतप्त होते हैं और न चन्द्रमासे शीतल ही होते हैं। इन्होंने तो उपाधिरहित सहज समाधिका निर्वाह कर लिया है ॥ ३ ॥ ऐसे अगाधबोधसम्पन्न होकर भी तुम्हारे स्नेहवश ये ऐसे व्याकुल दिखायी देते हैं, मानो अत्यन्त चिन्ता सहन की हो। [गुरुजीका यह कथन सुन] तुलसीदासजीके प्रभुके हृदयमें कृपारूप कामधेनु महाराज जनकके प्रणरूप वत्सको देखकर अति हुलसित हुई। किन्तु [गुरुकी आज्ञारूप] मर्यादामें बँधी रह गयी [अर्थात् उन्होंने गुरुजीकी आज्ञाके बिना धनुर्भङ्ग नहीं किया] ॥ ४ ॥ [ ८८ ] ऋषिराज ! राजा आजु जनक समान को ? आपु यहि भाँति प्रीति सहित सराहित, रागी औ बिरागी बड़भागी ऐसो आन को ? ॥ १ ॥

१४३ बालकाण्ड भूमि-भोग करत अनुभवत जोग-सुख मुनि-मन-अगम अलख गति जान को ? गुर-हर-पसे-नेहु, गेह बसि भी बिदेह, अगुन-सगुन-प्रभु-भजन-सयान को ? ॥ २ ॥ कहनि रहनि एक, बिरति बिबेक नीति, बेद-बुध-संमत पथी न निरबानको ? गाँठि बिनु गुनकी कठिन जड़-चेतनकी, छोरी अनायास, साधु सोधक अपानको ॥ ३ ॥ सुनि रघुबीरकी बचन-रचनाकी रीति, भयो मिथिलेस मानो दीपक बिहानको । मिट्यो महामोह जीको, छूट्यो पोच सोच सीको, जान्यो अवतार भयो पुरुष पुरानको ॥ ४ ॥ सभा, नृप, गुर, नर-नारि पुर, नभ सुर सब चितवत मुख करुनानिधानको । एकै एक कहत प्रगट एक प्रेम-बस तुलसीस तोरिए सरासन इसानको ॥ ५ ॥ [भगवान् राम बोले-] 'हे ऋषिराज ! आज जनकजीके समान और कौन राजा है ? जिनकी आप इस प्रकार प्रीतिपूर्वक सराहना कर रहे हैं ? अहा ! इनके समान रागी एवं साथ ही विरागी दूसरा कौन भाग्यवान् होगा ? ॥ १ ॥ ये पृथ्वीका भोग करते हुई योगसुखका भी अनुभव करते हैं। इनकी गति अलक्षित और मुनियोंके भी मनको अगम है, उसे कौन जान सकता है ? इनका श्रीगुरु और भगवान् शङ्करके चरणोंमें प्रेम है, ये घरमें रहते हुए भी विदेहभावको प्राप्त हो गये हैं। इनके समान निर्गुण तथा सगुण

गीतावली १४४ प्रभुका भजन करनेमें भी भला कौन कुशल है ? ॥ २ ॥ इनका कथन और रहन-सहन एक समान हैं। ये वैराग्य, विवेक, नीति तथा निर्वाणपदके बुधजनसम्मत पथिक हैं। इन्होंने बिना रस्सीकी जड़चेतनकी कठिन ग्रन्थिको अनायास ही खोल दिया है। इनके समान अपने स्वरूपका अच्छी प्रकार शोधन करनेवाला और कौन है ? ॥ ३ ॥ रघुनाथजीकी वाक्यरचनाकी रीति सुनकर उससे सकुचाकर जनकजी प्रातःकालीन दीपकके समान हतप्रभ हो गये। उनके चित्तका महामोह मिट गया, सीताजीकी ओरसे उनकी क्षुद्र चिन्ता दूर हो गयी और उन्हें विदित हो गया कि पुराणपुरुषका अवतार हुआ है ॥ ४ ॥ इस समय सभा, महाराज जनक, गुरु, नगरके नर-नारी और आकाशस्थित देवगण—ये सब करुणानिधान भगवान् रामका मुख निहारने लगे और एक-दूसरेसे प्रेमवश प्रकटरूप से कहने लगे—'हे तुलसीश ! आप भगवान् शङ्करका धनुष तोड़िये' ॥ ५ ॥ राग मारू [ ८९ ] सुनो भैया भूप सकल दै कान। बज्ररेख गजदसन जनक-पन बेद-बिदित, जग जान ॥ १ ॥ घोर कठोर पुरारि-सरासन, नाम प्रसिद्ध पिनाकु । जो दसकंठ दियो बाँवों जेहि हर-गिरि कियो है मनाकु ॥ २ ॥ भूमि भाल भ्राजत, न चलत सो, ज्यों बिरंचिको आँकु । धनु तोरै सोइ बरै जानकी, राउ होइ कि राँकु ॥ ३ ॥ सुनि आमरषि उठे अवनीपति, लगै बचन जनु तीर । टरै न चाप, करैं अपनी सौ महा महा बलधीर ॥ ४ ॥

१४५ बालकाण्ड नमित-सीस सोचहिं सलज्ज सब श्रीहत भए सरीर। बोले जनक बिलोकि सीय तन दुखित सरोष अधीर॥ ५॥ सप्त दीप नव खंड भूमिके भूपतिबृन्द जुरे। बड़ो लाभ कन्या-कीरतिको, जहँ-तहँ महिप मुरे॥ ६॥ डग्यौ न धनु, जनु बीर बिगत महि, किधौं कहुँ सुभट दुरे। रोषे लखन बिकट भृकुटी करि, भुज अरु अधर फुरें॥ ७॥ सुनहु भानुकुल-कमल-भानु! जो अब अनुसासन पावौं। का बापुरो पिनाकु, मेलि गुन मंदर मेरु नवावौं॥ ८॥ देखो निज किंकरको कौतुक, क्यों कोदंड चढ़ावौं। लै धावौं, भंजौं मृनाल ज्यों, तौ प्रभु-अनुग कहावौं॥ ६॥ हरषे पुर-नर-नारि, सचिव, नृप कुंवर कहे बर बैन। मृदु मुसुकाइ राम बरज्यो प्रिय बंधु नयनकी सैन॥ १०॥ कौसिक कह्यो, उठहु रघुनंदन, जगबंदन, बलऐन। तुलसिदास प्रभु चले मृगपति ज्यों निज भगतनि सुख दैन॥ ११॥ [बन्दीजन कहने लगे—] 'अरे भैया! सब राजा लोगो! कान देकर सुनो। राजा जनकका प्रण वज्ररेखा और हाथीके दाँतोंके समान [अमिट एवं पीछेको न लौटनेवाला] है। वह वेदमें प्रसिद्ध है और उसे सारा जगत् जानता है॥ १॥ श्री- महादेवजीका यह 'पिनाक' नामसे प्रसिद्ध धनुष बड़ा ही घोर और कठोर है; इसने उस रावणको भी नीचा दिखा दिया है, जिसने कैलास पर्वतको भी तुच्छ कर दिखलाया था॥ २॥ यह पृथ्वीके मस्तकपर विराजमान है और विधाताके लेखके समान तनिक भी नहीं टलता। परन्तु राजा हो या रङ्क, जो कोई इस धनुषको तोड़ेगा वही जानकीजीको वरेगा'॥ ३॥ यह सुनकर सब राजा लोग गी० १०—

गीतावली १४६ उत्तेजित होकर उठ खड़े हुए; उन्हें जनकजीके ये वचन तीरके समान लगे। ये बड़े-बड़े बलधारी अपनी-अपनी-सी कर रहे हैं। परन्तु धनुष तनिक भी नहीं टलता॥४॥ तब सब लोग सलज्जभावसे सिर झुकाकर सोच करने लगे और उनके शरीर श्रीहीन हो गये। इस समय महाराज जनकने सीताजीकी ओर देखकर दुःखित, रुष्ट और अधीर होकर कहा—॥५॥ 'अहो! सातों द्वीपों और नवों खण्डोंके राजा लोग एकत्र हुए। उन्हें कन्या और कीर्तिका बड़ा भारी लाभ भी प्राप्त हो सकता था, किन्तु वे सभी जहाँ-तहाँ धनुषके सामनेसे मुड़ गये॥६॥ उनसे धनुष तनिक भी नहीं डिगा। पृथ्वी मानो वीरहीन हो गयी है अथवा सारे वीर कहीं छिप तो नहीं गये हैं?' यह सुनकर लक्ष्मणजी भृकुटियोंको टेढ़ी कर बड़े क्रुद्ध हुए तथा उनकी भुजा और अधर फड़कने लगे॥७॥ [वे बोले—] 'हे सूर्यकुलकमलदिवाकर! सुनिये, यदि इस समय आपकी आज्ञा मिले तो बेचारा धनुष तो क्या, मन्दराचल और सुमेरुको भी डोरी चढ़ाकर झुका दूँ!॥८॥ आप तनिक अपने सेवकका खेल देखिये तो कि मैं किस प्रकार इस धनुषको चढ़ाता हूँ, यही क्यों, मैं तो इसे लेकर दौड़ूँ और कमल- नालके समान तोड़ डालूँ, तभी आपका दास कहलाऊँगा'॥९॥ यह सुनकर नगरके सकल नर-नारी तथा मन्त्रिवर्ग और राजालोग प्रसन्न हुए और कहने लगे, 'राजकुमारने बड़े ही सुन्दर वचन कहे हैं।' किन्तु रघुनाथजीने मधुर-मधुर मुसकराते हुए नेत्रोंके इशारेसे अपने प्रिय बन्धुको रोक दिया॥१०॥ तब विश्वामित्रजीने कहा, 'हे जगद्वन्द्य बलधाम रघुनाथजी! उठिये।' तुलसीदासजी कहते

१४७ बालकाण्ड हैं, यह सुनकर प्रभु अपने भक्तोंको सुख देनेके लिये मृगराजके समान चले ॥ ११ ॥ [ ९० ] जबहिं सब नृपति निरास भए। गुरुपद-कमल बंदि रघुपति तब चाप-समीप गए ॥ १ ॥ स्याम-तामरस-दाम-बरन बपु, उर-भुज-नयन बिसाल। पीत बसन कटि, कलित कंठ सुंदर सिंधुर-मनिमाल ॥ २ ॥ कल कुंडल, पल्लव प्रसून सिर चारु चौतनी लाल। कोटि-मदन-छबि-सदन बदन-बिधु, तिलक मनोहर भाल ॥ ३ ॥ रूप अनूप बिलोकत सादर पुरजन राजसमाज। लषन कह्यो थिर होहु धरनिधरु, धरनि, धरनिधर आज ॥ ४ ॥ कमठ, कोल, दिग-दंति सकल अँग सजग करहु प्रभु-काज। चहत चपरि सिव-चाप चढ़ावन दसरथको जुवराज ॥ ५ ॥ गहि करतन, मुनि, पुलक सहित, कौतुकहि, उठाइ लियो। नृपगन-मुखनि समेत नमित करि संजि सुख सबहि दियो ॥ ६ ॥ आकर्ष्यो सिय-मन समेत हरि, हरष्यो जनक-हियो। भंज्यौ भृगुपति-गरब सहित, तिहुँ लोक-बिमोह कियो ॥ ७ ॥ भयो कठिन कोदंड-कोलाहल प्रलय-पयोद समान। चौंके सिव, बिरंचि, दिसिनायक, रहे मूंदि कर कान ॥ ८ ॥ सावधान ह्वै चढ़े बिमाननि चले बजाइ निसान। उमगि चल्यो आनंद नगर, नभ जयधुनि, मंगलगान ॥ ९ ॥ बिप्र-बचन सुनि सुखी सुआसिनि चलीं जानकिहि ल्याइ। कुँवर निरखि, जयमाल मेलि उर कुंवरि रही सकुचाइ ॥ १० ॥ बरषहिं सुमन, असीसहिं सुर-मुनि प्रेम न हृदय समाइ। सीय-रामकी सुंदरतापर तुलसिदास बलि जाइ ॥ ११ ॥

गीतावली १४८ जिस समय सब राजालोग निराश हो गये, उसी समय श्री- रघुनाथजी गुरुवर विश्वामित्रके चरणकमलोंकी वन्दना कर धनुषके समीप आये ॥ १ ॥ प्रभुका नीलकमलकी मालाके समान श्याम शरीर है, उनके हृदय, भुजा और नेत्र विशाल हैं, कमरमें पीताम्बर तथा कलित कण्ठमें गजमुक्ताओंकी मनोहर माला है ॥ २ ॥ कानों- में सुन्दर कुण्डल हैं तथा सिरपर पत्र-पुष्प एवं लाल रङ्गकी मनोहर चौतनी टोपी है, उनका मुखचन्द्र करोड़ों कामदेवोंकी छबिका आश्रय है और उनके माथेपर मनोहर तिलक है ॥ ३ ॥ पुरजन और सम्पूर्ण राजसमाज आदरपूर्वक उनके अनूप रूपको निहार रहे हैं। इसी समय लक्ष्मणजी कहने लगे—'हे शेष, पृथ्वी एवं पर्वत- गण ! आज तुम निश्चल हो जाओ ॥ ४ ॥ हे कूर्म ! हे वाराह ! हे दिग्गजगण ! तुम सब अङ्गोंसे सावधान होकर प्रभुका कार्य निष्पन्न करो । इस समय महाराज दशरथके युवराज सहसा शिवजीका धनुष चढ़ाना चाहते हैं' ॥ ५ ॥ तब भगवान् रामने, मुनियोंको पुलकित करते हुए उस धनुषको हाथसे पकड़कर खेलहीमें उठा लिया और राजाओंके मुखोंके सहित उसे झुकाकर सभीको सुख दिया ॥ ६ ॥ फिर श्रीहरिने उसे सीताजीके हृदयसहित आकर्षित किया । इससे जनकजीका हृदय बड़ा प्रसन्न हुआ । इस प्रकार परशुरामजीके गर्वसहित उसे तोड़ डाला और तीनों लोकोंको मोह- हीन कर दिया ॥ ७ ॥ इससे प्रलयकालीन बादलोंके गर्जनके समान धनुषका बड़ा भारी कोलाहल हुआ । उससे शिव, ब्रह्मा और सकल दिक्पालगण चौंक पड़े तथा कान मूंदकर रह गये ॥ ८ ॥ फिर वे सावधान होकर विमानोंमें चढ़कर नगाड़े बजाते हुए चले । इससे

१४६ बालकाण्ड सम्पूर्ण नगरमें आनन्द उमड़ चला तथा आकाश में जयध्वनि और मङ्गलगान होने लगा ॥ ९ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञा सुन सुवासिनी सखियाँ जानकीजीको साथ लेकर चलीं। उस समय राजकुमारी जानकीजी दशरथनन्दन रामको देख उनके गलेमें जयमाल डाल सकुचाकर रह गयीं ॥ १० ॥ तब देवता और मुनिजन फूलोंकी वर्षा कर आशीर्वाद देने लगे। उनके हृदयमें प्रेम समाता नहीं था। श्रीसीता और रामजीकी उस सुन्दरतापर तुलसीदास बलिहारी है ॥ ११ ॥ राग मलार [ ९१ ] जब दोउ दसरथ-कुँवर बिलोके। जनक-नगर नर-नारि मुदित मन निरखि नयन पल रोके ॥ १ ॥ बय किसोर, घन-तड़ित-बरन तनु, नखसिख अंग लोभारे। द्वै चित, कै हित, लै सब छबि-बित बिधि निज हाथ सँवारे ॥ २ ॥ संकट नृपहि, सोच अति सीतहि, भूप सकुचि सिर नाए। उठे राम रघुकुल-कुल-केहरि, गुर-अनुसासन पाए ॥ ३ ॥ कौतुक ही कोदंड खंडि प्रभु, जय अरु जानकि पाई। तुलसिदास कीरति रघुपतिकी मुनिन्ह तिहूँ पुर गाई ॥ ४ ॥ जिस समय जनकपुरके नर-नारियोंने उन दोनों राजकुमारोंको देखा, उस समय उन्होंने उन्हें देखकर मनमें प्रसन्न हो अपने नेत्रोंकी पलकें गिराना रोक लिया अर्थात् एकटक दर्शन करने लगे ॥ १ ॥ उनकी किशोर अवस्था है, मेघ और विद्युत्‌के समान श्याम एवं गौर शरीर हैं तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त सभी अङ्ग लुभानेवाले हैं,

गीतावली १५० मानो विधाताने संसारके छविरूप धनको लेकर अपना चित्त और प्रेम लगाकर अपने हाथोंसे ही उनकी रचना की है ॥ २ ॥ (प्रतिज्ञा और प्रेमकी खींचातानीमें पड़कर) महाराज जनक बड़े संकटमें पड़े हुए हैं, सीताजीको अति संकोच हो रहा है और राजालोग [यह जानकर कि ये अवश्य धनुष तोड़ डालेंगे] संकोचवश सिर झुकाये हुए हैं, इसी समय गुंरुजीकी आज्ञा पा रघुकुलकेशरीप्रवर भगवान् राम उठे ॥ ३ ॥ प्रभुने खेलहीमें धनुषको तोड़कर जय और जानकी प्राप्त कर ली। तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीकी उस कीर्तिकी मुनियोंने तीनों लोकोंमें गाया है ॥ ४ ॥ राग टोड़ी [ १२ ] मुनि-पदरेनु रघुनाथ माथे धरी है। रामरुख निरखि, लषनकी रजाइ पाइ, धरा धरा-धरनि सुसावधान करी है ॥ १ ॥ सुमिरि गनेस-गुर, गौरि-हर भूमिसुर, सोचत सकोचत सकोची बानि घरी है। दीनबंधु, कृपासिंधु, साहसिक, सीलसिंधु, सभाको सकोच कुलहूकी लाज परी है ॥ २ ॥ पेखि पुरुषारथ, परखि पन, पेम, नेम, सिय-हियकी बिसेषि बड़ी खरभरी है। दाहिनो दियो पिनाकु, सहमि भयो मनाकु, कहाब्याल बिकल बिलोकि जनु जरी है ॥ ३ ॥ सुर हरषत, बरषत फूल बार बार, सिद्ध-मुनि कहत, सगुन, सुभ घरी है।