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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

१११ बालकाण्ड [महाराज जनक पूछते हैं—] ये कौन हैं और कहांसे आये हैं? ये नीले और पीले कमलके समान श्याम एवं गौर-वर्ण, अत्यन्त मनमोहन और स्वभावसे ही शोभायमान हैं ॥ १ ॥ ये बालक कोई मुनिपुत्र हैं या राजकुमार अथवा परब्रह्म और जीव (हिरण्यगर्भ) ही जगत्‌में उत्पन्न हो गये हैं। ये दोनों लालन रूपसमुद्रके रत्न अथवा छबिरूप रमणीके सुललित लोचन तो नहीं हैं? ॥ २ ॥ अथवा ये दोनों अश्विनीकुमार, कामदेव और ऋतुराज बसन्त अथवा श्रीविष्णु और महादेव ही [मनुष्यका] वेष धरकर आ गये हैं? अथवा आपने अपने सुकृतरूप कल्पतरुके सुन्दर फल ही पा लिये हैं? ॥ ३ ॥ ऐसा कहकर जनकजी स्नेहवश विदेह हो गये। अपने शरीर- की सुधि भूल गये। उनका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें आनन्द नहीं अँटता था तथा नेत्रोंमें जल छा गया ॥ ४ ॥ जनकजीके मृदुल, मनोहर और भक्तिरस भरे सुमधुर वचन विश्वामित्रजीको बड़े ही प्रिय लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, तब विश्वामित्रजीने हृदयमें आनन्दसे अत्यन्त उमगकर राम-लक्ष्मणके गुण गाये ॥ ५ ॥ [ ६६ ] कौसिक कृपालहूको पुलकित तनु भौ। उमगत अनुराग, सभाके सराहे भाग, देखि दसा जनककी कहिबेको मनु भौ ॥ १ ॥ प्रीतिके न पातकी, दियेहू साप पाप बड़ो, मख-मिस मेरो तब अवध-गवनु भौ। प्रानहूते प्यारे सुत माँगे दिये दसरथ, सत्यसिंधु सोच सहे, सूनो सो भवनु भौ ॥ २ ॥

गीतावली ११२ काकसिखा सिर, कर केलि-तून-धनु-सर, बालक-बिनोद जातुधाननिसों रनु भो। बूझत बिदेह अनुराग-आचरज-बस, ऋषिराज जाग भयो, महाराज अनु भो ॥ ३ ॥ भूमिदेव, नरदेव, सचिव परस्पर कहत, हमहिं सुरतरु सिवधनु भो। सुनत राजाकी रीति, उपजी प्रतीति-प्रीति, भाग तुलसीके, भले साहेबको जनु भो ॥ ४ ॥ [जनकजीके ये वचन सुनकर] परम कृपालु विश्वामित्रजीका शरीर भी पुलकित हो गया। उनके हृदयमें अनुराग उमँगने लगा। उन्होंने सभाके भाग्यकी सराहना की। जनकजीकी दशा देखकर उनका चित्त कहनेके लिये प्रवृत्त हुआ ॥ १ ॥ [ वे कहने लगे— 'राक्षस लोग मेरे यज्ञमें विघ्न डालते थे, मैंने सोचा ] ये पापी हैं, इनसे प्रीति करना तो उचित नहीं और शाप देनेमें भी बड़ा पाप लगता है, अतः यज्ञरक्षाके मिषसे ही मेरा अयोध्यापुरीमें जाना हुआ। मैंने दशरथजीसे उनके प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र माँगे; सत्यसन्ध दशरथ- जीने मुझे तत्काल इन्हें दे दिया। यद्यपि [ इनमें अधिक स्नेह होनेके कारण ] उन्होंने बड़ा शोक सहा और उनका घर सूना-सा हो गया ॥ २ ॥ उस समय इनके मस्तकपर काकपक्ष, हाथमें खेलके तरकस और धनुष-बाण थे। तब बालकेलिके रूपमें ही इनका राक्षसोंसे युद्ध हुआ।' यह सुनकर जनकजी प्रेम और आश्चर्यवश पूछने लगे, 'महाराज ! तो क्या फिर आपका यज्ञ पूर्ण हो गया ?' (विश्वामित्रजीने कहा—) 'आप स्वयं अनुभव कर लीजिये' ॥ ३ ॥

११३ बालकाण्ड तब ब्राह्मणलोग, महाराज जनक और मन्त्रिगण आपसमें कहने लगे- 'हमको तो शिवजीका धनुष कल्पवृक्ष हो गया।' राजा जनककी रीति सुन तुलसीदासके मनमें भी प्रतीति और प्रीति उत्पन्न हुई। उसके बड़े भाग्य हैं कि वह ऐसे स्वामीका [ जिनके दर्शन पाकर ब्रह्मज्ञानी जनकजी भी प्रेमविभोर हो गये थे ] सेवक हुआ ॥ ४ ॥ [ ६७ ] चार्यो भले बेटा देव दसरथ रायके। जैसे राम-लषन, भरत-रिपुहन तैसे, सील-सोभा-सागर, प्रभाकर प्रभायके ॥ १ ॥ ताड़का सँहारि मख राखे, नीके पाले व्रत, कोटि कोटि भट किये एक एक घायके। एक बान बेगही उड़ाने जातुधान-जात, सूखि गये गात हैं, पतौंगा भये बायके ॥ २ ॥ सिलाछोर छुवत अहल्या भई दिव्यदेह, गुन पेखे पारसके पंकरुह पायके। रामके प्रसाद गुर गौतम खसम भये, रावरेहु सतानंद पूत भये मायके ॥ ३ ॥ प्रेम-परिहास-पोख बचन परस्पर कहत सुनत सुख सब ही सुभायके। तुलसी सराहें भाग कौसिक जनकजूके, बिधिके सुढर होत सुढर सुदायके ॥ ४ ॥ महाराज दशरथके चारों ही पुत्र बड़े सुन्दर हैं। जैसे राम- लक्ष्मण हैं वैसे ही भरत और शत्रुघ्नजी भी शील और शोभाके समुद्र तथा प्रभावके सूर्य हैं ॥ १ ॥ इन्होंने ताड़काका संहार कर मेरे यज्ञकी गी० ८-

गीतावली ११४ भलीभांति रक्षा और अपनी प्रतिज्ञाका पालन किया। इन्होंने करोड़ों शूरवीरोंको अपने एक-एक ही वारसे धराशायी कर दिया। इनके एक ही बाणके वेगसे अनेक राक्षससमूह उड़ गये। उनके शरीर सूखकर मानो हवामें उड़नेवाले पत्ते ही हो गये ॥ २ ॥ शिलाके छोरका स्पर्श करते ही अहल्या दिव्य देहमयी हो गयी। इस प्रकार इनके चरणकमलोंमें पारसकागुण देखा गया है। इस प्रकार रामचन्द्रजी की कृपासे [अहल्याका उद्धार हुआ और आपके पुरोहित शतानन्दजीके पिता] गुरु गौतमजी सपत्नीक हुए तथा शतानन्दजी अपनी माताके पुत्र हुए [अर्थात् इन्हें फिरसे अहल्या मिल गयीं] ॥ ३ ॥ इस प्रकार आपसमें प्रेम और परिहाससे पोषित वचन कहते-सुनते सबको स्वाभाविक ही सुख मिला। तुलसीदास कहते हैं कि विश्वामित्रजी महाराज जनकके सौभाग्यकी सराहना करते हैं और कहते हैं, विधाताके दायें होनेपर अच्छे दांवके पासे भी पड़ने लगते हैं ॥ ४ ॥ [ ६७ ] ये दोऊ दसरथके बारे। नाम राम घनस्याम, लखन लघु, नखसिख अँग उजियारे ॥ १ ॥ निज हित लागि मांगि आने मैं धरमसेतु-रखवारे। धीर बीर बिरुदैत, बाँकुरे महाबाहु बल भारे ॥ २ ॥ एक तीर तकि हती ताड़का, किये सुर-साधु सुखारे। जग्य राखि, जग साखि, तोषि ऋषि, निदरि निसाचर मारे ॥ ३ ॥ मुनितिय तारि स्वयंबर पेखन आये सुनि बचन तिहारे। एउ देखिहैं पिनाकु नेकु, जेहि नृपति लाज-ज्वर जारे ॥ ४ ॥ सुनि सानंद सराहि सपरिजन, बारहि बार निहारे। पूजि सप्रेम, प्रसंसि कौसिकहि भूपति सदन सिधारे ॥ ५ ॥

· ११५ बालकाण्ड सोचत सत्य-सनेह-बिबस निसि, नृपहि गनत गये तारे। पठये बोलि भोर, गुरके सँग रंगभूमि पगु धारे ॥ ६ ॥ नगर-लोग सुधि पाइ मुदित, सब ही सब काज बिसारे। मनहु मघा-जल उमगि उदधि-रुख चले नदी-नद-नारे ॥ ७ ॥ ए किसोर, धनु घोर बहुत, बिलखात बिलोकनिहारे। टरघो न चाप तिन्ह तें, जिन्ह सुभटनि कौतुक कुधर उखारे ॥ ८ ॥ ए जाने बिनु जनक जानियत करि पन भूप हँकारे। नतरु सुधासागर परिहरि कंत कूप खनावत खारे ॥ ९ ॥ सुखमा सील-सनेह सानि मनो रूप बिरंचि सँवारे। रोम-रोमपर सोम-काम सत कोटि बारि फेरि डारे ॥ १० ॥ कोउ कहै, तेज-प्रताप-पुंज चितये नहिं जात, भैया रे। छुअत सरासन-सलभ जरैगो ए दिनकर-बंस-दिया रे ॥ ११ ॥ एक कहै, कछु होउ, सुफल भये जीवन-जनम हमारे। अवलोके भरि नयन आजु तुलसीके प्रानपियारे ॥ १२ ॥ ये दोनों दशरथजीके पुत्र हैं। इनमें जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं उनका नाम राम है और जिनके नखसे शिखतक सारे अङ्ग उज्ज्वलवर्ण हैं वे छोटे भाई लक्ष्मणजी है ॥ १ ॥ इन धर्ममर्यादा- की रक्षा करनेवालोंको मैं अपने हितके लिये माँग लाया था। ये बड़े ही धीर, वीर, यशस्वी, रणबाँकुरे, महाबाहु और बलशाली हैं ॥ २ ॥ इन्होंने एक तीर छोड़कर ही ताड़काको मार डाला और सब देवता तथा साधुजनोंको सुखी कर दिया। इस प्रकार यज्ञकी रक्षा कर मुनियोंको सन्तुष्ट किया तथा राक्षसोंका तिरस्कारपूर्वक वध किया— इस विषयमें सारा जगत् साक्षी है ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् ऋषि-पत्नीका उद्धार कर आपकी प्रतिज्ञा सुन यहाँ स्वयंवर देखनेके लिये पधारे

गीतावली ११६ हैं। आपके जिस धनुषने राजाओंको लज्जारूप ज्वरसे सन्तप्त कर दिया है, उसे तनिक ये भी देखेंगे ॥ ४ ॥ मुनीश्वरके ये वचन सुन जनकजीने अपने कुटुम्बियोंके सहित उनकी आनन्दपूर्वक सराहना की और बारम्बार प्रभुकी ओर देखकर तथा उनकी पूजा कर, विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते अपने घरको चले गये ॥ ५ ॥ सत्य स्नेहवश (अपनी प्रतिज्ञाकी कठिनता देखकर) वे विचारमें पड़ गये। इस प्रकार सारी रात महाराजको तारे गिनते बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर राजाने उन्हें बुलावा भेजा। तब प्रभुने गुरुजीके साथ रङ्ग- भूमिमें पदार्पण किया ॥ ६ ॥ भगवान्‌के पधारनेका समाचार पाकर नगरके लोग प्रसन्न हो गये और सभीने सारे काम भुला दिये, मानो मघा नक्षत्रकी जलवृष्टिसे समस्त नदी, नद और नाले उमड़कर समुद्रकी ओर चले हों ॥ ७ ॥ सभी दर्शकगण यह सोचकर कि ये तो किशोर अवस्थाके हैं और धनुष बड़ा सुदृढ़ है, दुःखी हो गये। [ उन्होंने सोचा ] यह धनुष तो उन योद्धाओंसे भी विचलित नहीं हुआ, जिन्होंने खेलहीमें बड़े-बड़े पर्वतोंको उखाड़ डाला था [ फिर इन सुकुमार बालकोंसे यह कैसे उठ सकेगा ? ] ॥ ८ ॥ मालूम होता है, महाराज जनकने इन्हें न जाननेके कारण ही इस प्रकारका प्रण करके अन्य राजाओंको बुला लिया था, नहीं तो भला अमृत-समुद्रको छोड़कर खारी कुआं कौन खुदवावेगा ? ॥ ९ ॥ ब्रह्माजीने सुन्दरता, शील और स्नेहको सानकर ही मानो इनके रूप रचे हैं। इनके रोम-रोमपर अरबों चन्द्रमा और कामदेव वारकर फेंक दिये हैं ॥१०॥ कोई कहते हैं—'भैया रे ! ये तेज और प्रतापके पुञ्ज हैं, इसीसे इनकी ओर देखा नहीं जाता। ये सूर्यवंशके दीपक हैं, इनके स्पर्श

११७ बालकाण्ड करते ही धनुषरूप पतङ्ग भस्म हो जायगा ॥११॥ अन्य लोग बोले, 'भाई ! कुछ भी हो, हमारे तो जीवन और जन्म आज सुफल हो गये, क्योंकि आज हमने नयन भरकर तुलसीदासके प्राणप्यारेका दर्शन किया है' ॥१२॥ [ ६९ ] जनक बिलोकि बार बार रघुबरको । मुनिपद सीस नाय, आयसु-असीस पाय, एई बातें कहत गवन कियो घरको ॥ १ ॥ नींद न परति राति, प्रेम-पन एक भाँति, सोचत, सकोचत बिरंचि-हरि-हरको । तुम्हते सुगम सब देव ! देखिबेको अब जस हंस किए जोगवत जुग परको ॥ २ ॥ ल्याए संग कौसिक, सुनाए कहि गुनगन, आए देखि दिनकर कुल-दिनकरको । तुलसी तेऊ सनेहको सुभाउ बाउ मानो चलदलको सो पात करै चित चरको ॥ ३ ॥ जनकजी बार-बार रघुनाथजीको देखकर, मुनिवरके चरणोंमें सर नवा, उनकी आज्ञा और आशीर्वाद पा, ये ही बातें करते अपने घरको गये ॥ १ ॥ रघुनाथजीका प्रेम ओर धनुष तोड़नेको प्रतिज्ञा—ये दोनों ही समान हैं, अतः इनके लिये उन्हें बड़ा सोच हो रहा है और रात्रिमें निद्रा भी नहीं पड़ती । [अपनी कार्यसिद्धिके लिये प्रार्थना कर] वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवको भी संकोचमें डालते हैं और यह कहते हुए कि 'हे देव ! तुम्हारी कृपासे सब कुछ देखना सुगम है' वे अपने सुयशको हंसरूप किये उसके [ प्रेम

गीतावली ११८ और प्राणरूप ] दोनों परोंकी सँभाल करते हैं ॥ २ ॥ इसी समय श्रीविश्वामित्रजी दोनों भाइयोंको साथ ले आये और उनके गुणगण कह सुनाये । तुलसीदास कहते हैं—सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रको आया देख महाराज जनकका चित्त स्नेहकी स्वाभाविक वायुके झकोरेसे पीपलके पत्तेके समान चञ्चल हो गया ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ७० ] रंग-भूमि भोरे ही जाइकै । राम-लषन लखि लोग लूटिहैं लोचन-लाभ आघइकै ॥ १ ॥ भूप-भवन, घर घर, पुर बाहर, इहै चरचा रही छाइकै । मगन मनोरथ-मोद नारि-नर, प्रेम-बिबस उठैं गाइकै ॥ २ ॥ सोचत बिधि-गति समुझि, परस्पर कहत बचन बिलखाइकै । कुंवर किसोर, कठोर सरासन, असमंजस भयो आइकै ॥ ३ ॥ सुकृत सँभारि, मनाइ पितर-सुर, सीस ईसपद नाइकै । रघुबर-कर धनु-भंग चहत सब अपनो-सो हितु चितु लाइकै ॥ ४ ॥ लेत भरत कनसुई सगुन सुभ, बूझत गनक बोलाइ कै । सुनि अनुकूल, मुदित मन मानहु धरत धीरजहि धाइ कै ॥ ५ ॥ कौसिक-कथा एक एकनिसों कहत प्रभाउ जनाइ कै । सीय-राम-संजोग जानियत, रच्यो बिरंचि बनाइकै ॥ ६ ॥ एक सराहि सुबाहु-मथन बर बाहु, उछाह बढ़ाइकै । सानुज राज-समाज बिराजिहैं राम पिनाक चढ़ाइकै ॥ ७ ॥ बड़ी सभा बड़ो लाभ, बड़ो जस, बड़ी बड़ाई पाइकै । को सोहिहै, औरको लायक रघुनायकहि बिहाइकै ? ॥ ८ ॥ भवनिहैं गँवाहि गवाँइ गरब गृह नृपकुल बलहि लजाइकै । भलीभाँति साहब तुलसीके चलिहैं ब्याहि बजाइकै ॥ ९ ॥

११६ बालकाण्ड 'कल प्रातःकाल होते ही रङ्गभूमिमें पहुँचकर लोग राम और लक्ष्मणको देख जी खोलकर नेत्रोंका लाभ लूटेंगे' ॥ १ ॥ महाराजके महल तथा नगरके बाहर-भीतर घर-घरमें यही चर्चा फैली हुई है। सब नर-नारी अपनी मनोरथसिद्धिसे आनन्दित हो प्रेमवश यही गाने लगते हैं ॥ २ ॥ विधाताकी गति समझकर सब लोग सोच करते हैं और आपसमें बिलखकर ऐसे वचन कहते हैं—'भाई ! बड़ा असमञ्जस आ पड़ा है, बालकोंकी तो किशोर अवस्था है और धनुष बड़ा ही कठोर है' ॥ ३ ॥ इस प्रकार सभी लोग अपने-अपने सुकृतोंका स्मरण कर, चित्तमें अपना-सा ही हित जान, पितृगण, देवता और शिव- विष्णु आदि ईश्वरोंके चरणोंमें सिर नवा रघुनाथजीके हाथसे धनुर्भंग होनेकी अभिलाषा करते हैं ॥ ४ ॥ स्त्रियां कनसुई* लेती फिरती हैं और [पुरुष] गणक (ज्योतिषी) बुलाकर शकुन पूछते हैं। उनसे अनुकूल उत्तर सुनकर वे प्रसन्न मनसे दौड़कर धैर्य धारण करते हैं ॥ ५ ॥ महाराज जनक एक-एकसे श्रीविश्वामित्रजीका प्रभाव बतलाकर उनकी कथा सुनाते हैं और कहते हैं कि जान पड़ता है, विधाताने सीता और रामका संयोग निश्चय करके रचा है ॥ ६ ॥ कोई उत्साह बढ़ाकर सुबाहुका मथन करनेवाली भगवान् रामकी भुजाओंकी सराहना कर करते हैं—'भाई ! रघुनाथजी निश्चय ही धनुष चढ़ाकर भाई लक्ष्मणसहित राजसभा में विराजमान होंगे ॥ ७ ॥ क्योंकि इस बड़ी सभामें रघुनाथजीको छोड़कर और ऐसा कौन योग्य *शकुनविचारकी एक रीति, जिसमें स्त्रियां गोबरकी गौरी बनाकर चलनीमें रख पृथ्वीपर फेंकती हैं। यदि वह सीधी गिरे तो शुभ और उलटी या आड़ी गिरे तो अशुभ मानी जाती है।

गीतावली १२० है जो [सीतामिलनरूप] बड़ा लाभ, बड़ा यश और बड़ी बड़ाई पाकर सुशोभित हो सके ? ॥ ८ ॥ अब अन्य राजालोग धनुषके ऊपर अपना गर्व गँवाकर तथा अपने बलको लज्जित कर घर लौट जायँगे और तुलसीदासके प्रभु गाजे-बाजे के साथ अपना विवाह कर प्रस्थान करेंगे ॥ ९ ॥ पुष्पवाटिकामें राग तोड़ी [ ७१ ] भोर फूल बीनबेको गये फुलवाईं हैं । सीसनि टिपारे, उपबीत, पीत पट कटि, दोना बाम करनि सलोने मे सवाई हैं ॥ १ ॥ रूपके अगार, भूपके कुमार, सुकुमार, गुरके प्रानअधार संग सेवकाई हैं । नीच ज्यों टहल करें, राखें रुख अनुसरें, कौसिक-से कोही बस किये दुहुँ भाई हैं ॥ २ ॥ सखिन सहित तेहि औसर बिधिके संजोग गिरिजाजू पूजिबेको जानकीजू आई हैं । निरखि लषन-राम जाने ऋतुपति-काम, मोहि मानो मदन मोहनी मूड नाई हैं ॥ ३ ॥ राघौजू-श्रीजानकी-लोचन मिलिबेको मोद कहिबेको जोगु न, मैं बातें-सी बनाई हैं । स्वामी, सीय, सखिन्ह, लखन तुलसीको तैसो तैसो मन भयो जाकी जैसिये सगाई हैं ॥ ४ ॥ प्रातःकाल होते ही राम और लक्ष्मण फूल बीननेके लिये फुलवाड़ीमें पधारे हैं। उनके सिरोंपर चौतनी टोपी, [गलेमें] यज्ञोप-

१२१ बालकाण्ड बीत और कमरमें पीताम्बर तथा बायें हाथमें फूलोंके दोने शोभायमान हैं, जिनसे उनकी सुन्दरता सवायी हो गयी है ॥ १ ॥ दोनों भाई [स्वभावसे ही] रूपके भण्डार हैं, तिसपर भी राजकुमार, सुकुमार शरीर, गुरुके प्राणाधार और उनके साथ सेवाभावसे उपस्थित हैं। वे नीचके समान गुरुजीकी टहलमें लगे रहते हैं; उनका रुख देखकर परिचर्या करते हैं, इससे उन्होंने विश्वामित्र-जैसे क्रोधी मुनीश्वरको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २ ॥ दैववश इसी समय पार्वतीजीका पूजन करनेके लिये सखियोंके सहित श्रीसीताजी आ गयीं। वहाँ उन्होंने राम और लक्ष्मणको देखा और उन्हें साक्षात् ऋतुराज वसन्त और कामदेव ही समझा। उन्हें देखकर वे ऐसी मोहित हो गयीं मानो कामदेवने उनके मस्तकपर मोहिनी डाल दी हो ॥ ३ ॥ भगवान् राम और सीताजीके दृष्टिमिलापका जो आनन्द हुआ वह कहने योग्य नहीं है, मैंने तो कुछ बातें-सी बना दी हैं। उस समय भगवान् राम, सीता, सखीजन, लक्ष्मणजी और तुलसीदास—इनमेंसे जिनका जैसी सम्बन्ध है उनका वैसा ही चित्त हो गया ॥ ४ ॥ [ ७२ ] पूजि पारबती भले भाय पांय परिकै । सजल सुलोचन, सिथिल तनु पुलकित, आवै न बचन, मन रह्यो प्रेम भरिकै ॥ १ ॥ अंतरजामिनि भवभामिनि स्वामिनिसों हौं, कही चाहौं बात, मातु, अंत तौ हौं लरिकै । मूरति कृपालु मंजु माल दै बोलत भई, पूजो मन कामना भावतो बरु बरिकै ॥ २ ॥

गीतावली १२२ राम कामतरु पाइ, बेलि ज्यौं बौंड़ी बनाइ, मांग-कोषि तोषि पोषि, फैलि-फूलि-फरिकै । रहौगी, कहौगी तब, सांची कही अंबा सिय, गहे पांय द्वै, उठाय, माथे हाथ धरिकै ॥ ३ ॥ मुदित असीस सुनि, सीस नाइ पुनि पुनि, बिदा भईं देवीसों जननि डर डरिकै । हरषीं सहेली, भयो भावतो, गावतीं गीत, गवनी भवन तुलसीस-हिया हरिकै ॥ ४ ॥ श्रीसीताजीने बड़े भावसे चरणोंमें पड़कर पार्वतीजीका पूजन किया। उनके नेत्र सजल हो गये, शरीर शिथिल और पुलकित हो गया, मुखसे वचन नहीं निकलता तथा मन प्रेमसे भर गया ॥ १ ॥ [वे कहने लगीं-] 'मैं शङ्करप्रिया अन्तर्यामिनी और सम्पूर्ण जगत्‌की स्वामिनी आपसे अपने हृदयकी बात कहना चाहती हूँ [आप क्षमा करें]; क्योंकि हे मातः ! आखिर मैं लड़की ही तो हूँ।' तब कृपामयी भवानीकी मूर्ति अपनी मनोहर माला देकर बोली, 'सीते ! अपना मनचाहा वर वरण करके अपनी सब कामनाएँ पूर्ण करो ॥ २ ॥ तुम रामरूप कल्पवृक्षको पाकर, उसे बेलके समान अपना आश्रय बना, सुहाग और कोखसे सन्तुष्ट हो, फैल-फूलकर फलोगी । हे सीते ! उस समय तुम कहोगी कि 'अम्बाजीने ठीक ही कहा था।' तब सीताजीने उनके दोनों चरण पकड़ लिये और उन्होंने माथेपर हाथ रखकर उन्हें उठा लिया ॥ ३ ॥ देवीका आशीर्वाद सुन सीताजी परम आनन्दित हो उन्हें पुनः-पुनः मस्तक नवा, [विलम्ब हो जानेके कारण] माताका भय मानकर उनसे विदा हुईं और अपना

१२३ बालकाण्ड मनभाता हुआ देख साथकी सहेलियाँ भी गीत गाती तुलसीदासके प्रभुका चित्त चुराकर राजभवनको चली गयीं ॥ ४ ॥ रंगभूमिमें [ ७३ ] रंगभूमि आए दसरथके किसोर हैं। पेखनो सो पेखन चले हैं पुर-नर-नारि, बारे-बूढ़े, अंध-पंगु करत निहोर हैं ॥ १ ॥ नील पीत नीरज कनक मरकत घन दामिनि-बरन तनु, रूपके निचोर हैं। सहज सलोने, राम-लषन ललित नाम, जैसे सुने तैसेई कुंवर सिरमौर हैं ॥ २ ॥ चरन-सरोज, चारु जंघा जानु ऊरु कटि, कंधर बिसाल, बाहु बड़े बरजोर हैं। नीकेकैं निषंग कसे, करकमलनि लसै बान-बिसिखासन मनोहर कठोर हैं ॥ ३ ॥ काननि कनकफूल, उपवीत अनुकूल, पियरे दुकूल बिलसत आछे छोर हैं। राजिव नयन, बिधुबदन, टिपारे सिर, नख-सिख अंगनि ठगौरी ठौर ठौर हैं ॥ ४ ॥ सभा-सरवर लोक-कोकनद-कोकगन प्रमुदित मन देखि दिनमनि भोर हैं। अबुध असैले मन-मैले महिपाल भये, कछुक उलूक कछु कुमुद चकोर हैं ॥ ५ ॥

गीतावली १२४ भाईसों कहत बात, कौसिकहि सकुचात बोल घन घोर-से बोलत थोर थोर हैं। सनमुख सबहि, बिलोकत सबहि नीके, कृपासों हेरत हँसि तुलसीकी ओर हैं॥ ६ ॥ 'रंगभूमिमें दशरथजीके पुत्र पधारे हैं'—यह सुनकर नगरके स्त्री, पुरुष सभी तमाशा देखनेके लिये चल पड़े, बालक और वृद्ध तथा अन्धे और पंगु भी [अपनेको ले चलनेके लिये] निहोरा कर रहे हैं॥ १॥ दोनों भाई नीले और पीले कमल, सुवर्ण एवं मरकतमणि तथा मेघ और बिजलीके-से वर्णवाले और रूपके सारस्वरूप ही हैं। वे स्वभावतः ही सुन्दर हैं, उनके राम और लक्ष्मण—ये मनोहर नाम हैं तथा जैसे सुने गये थे वैसे ही राजकुमारोंमें सिरमौर हैं ॥ २ ॥ उनके चरण कमलके समान हैं; जंघा, जानु और कटिप्रदेश बड़े सुन्दर हैं तथा कन्धे विशाल और भुजाएँ बड़ी बलशालिनी हैं। वे अति सुन्दर तरकस कसे हुए हैं तथा उनके करकमलोंमें अति मनोहर और कठोर धनुष-बाण शोभित हैं ॥ ३ ॥ उनके कानोंमें सोनेके कर्णफूल, गलेमें सुन्दर यज्ञोपवीत तथा शरीरमें अच्छे-अच्छे छोरोंवाले पीताम्बर सुशोभित हैं। उनके नयन कमलके तथा मुख चन्द्रमाके समान हैं, सिरपर चौतनी टोपियाँ हैं तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त प्रत्येक अङ्गमें ठौर-ठौरपर ठगौरी है। [अर्थात् प्रत्येक अङ्ग चित्तको ठग लेनेवाला है] ॥ ४ ॥ सभा श्रेष्ठ सरोवरके समान है तथा वहाँ एकत्र हुए लोग कमल एवं चकवा-चकवीतुल्य हैं। वे राम अज्ञानी और द्वेष माननेवाले राजाओंके चित्त, जिनमेंसे कुछ उल्लूके

१२५ बालकाण्ड समान और कुछ कुमुद एवं चकोरवत् जान पड़ते हैं, मैले हो रहे हैं ॥ ५ ॥ भगवान् राम जब भाईसे बातें करते हैं तो विश्वामित्रजीसे सकुचाकर और मेघके समान गम्भीर शब्द बोलते हैं तथा अधिक नहीं बोलते । प्रभु सभीके सम्मुख [अनुकूल] हैं, सभीको अच्छी दृष्टिसे देखते हैं तथा तुलसीदासकी ओर भी कृपापूर्वक हँसकर देख रहे हैं ॥ ६ ॥ [ ७४ ] एई राम-लषन जे मुनि-सँग आये हैं । चौतनी-चोलना काछे, सखि ! सोहैं आगे-पाछे, आछे हुँते आछे, आछे आछे भाय भाये हैं ॥ १ ॥ सांवरे गोरे सरीर, महाबाहु, महाबीर, कटि तून तीर धरे, धनुष सुहाये हैं । देखत कोमल, कल अतुल बिपुल बल, कौसिक कोदंड-कला कलित सिखाये हैं ॥ २ ॥ इन्हहीं ताड़का मारी, गौतमकी तिय तारी, भारी भारी भूरि भट रन बिचलाये हैं । ऋषि-मख रखवारे, दसरथके दुलारे रंग-भूमि पगु धारे, जनक बुलाये हैं ॥ ३ ॥ इन्हके बिमल गुन गनत पुलकि तनु सतानंद-कौसिक नरेसहि सुनाये हैं। प्रभुपद मन दिये, सो समाज चित्त किये हुलसि हुलसि हिये तुलसिहुँ गाये हैं ॥ ४ ॥ [पुर-नारियाँ कहती हैं—] 'जो विश्वामित्र मुनिके साथ आये हैं वे राम लक्ष्मण ये ही हैं। सखि ! देखो, ये चौतनी टोपी और

गीतावली १२६ अँगरखा पहने आगे-पीछे चलते बड़े शोभायमाम जान पड़ते हैं। ये अच्छोंसे भी अच्छे हैं और अच्छे भावोंसे भाते हैं (सुशोभित हैं) ॥ १ ॥ इनके शरीर श्याम एवं गौर वर्ण हैं, ये महाबाहु और महान् वीर हैं तथा इनके कटिप्रदेशमें बाणयुक्त तरकस और हाथोंमें धनुष शोभायमान है। ये देखनेमें बड़े ही कोमल, सुन्दर और अतुलित बलशाली हैं। इन्हें विश्वामित्रजीने अति सुन्दर ढंगसे धनुर्विद्या सिखायी है ॥ २ ॥ इन्होंने ताड़काको मारा है और अहल्याका उद्धार किया है तथा इन्होंने बड़े-बड़े शूरवीरोंको युद्धमें विचलित कर दिया है। इस समय विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षा करनेवाले ये दशरथराज कुमार जनकजीके बुलानेसे रङ्गभूमिमें पधारे हैं ॥ ३ ॥ शतानन्द और विश्वामित्रजीने पुलकित शरीर हो इनके पवित्र गुणोंको गिनकर महाराज जनकको सुनाया है।' तुलसीदासने भी प्रभुके चरणकमलोंमें चित्त लगा, उस समाजको हृदयमें धारण कर आनन्दसे उमँग-उमँग कर उनका गान किया है ॥ ४ ॥ राग कान्हरा [ ७५ ] सीय स्वयंबरु, माई, दोउ भाई आए देखन। सुनत चलीं प्रमदा प्रमुदित मन, प्रेम पुलकि तनु मनहुँ मदन मंजुल पेखन ॥ १ ॥ निरखि मनोहर तांई सुख पाई कहैं एक-एक सों 'भूरिभाग हम धन्य, आलि ! ए दिन, एखन ।' तुलसी सहज सनेह सुरंग सब सो समाज चित चित्रसार लागी लेखन ॥ २ ॥

१२७ बालकाण्ड 'हे माई ! देखो, दोनों भाई सीताजीका स्वयंवर देखने आये हैं'—यह सुनते ही सब स्त्रियाँ शरीरमें पुलकित हो मानो मनोहर कामदेवको निहारनेके लिये प्रसन्न चित्तसे जा रही हैं ॥ १ ॥ उनकी सुन्दरता देखकर वे चित्तमें सुख पाकर एक दूसरीसे कहती हैं— 'अरी आली ! आज इस समय तो हम बड़ी भाग्यशालिनी और धन्य हैं।' तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे सब सहज प्रेमरूप सुन्दर रङ्गसे अपने चित्तरूप चित्रशालामें उस समाजका चित्र खींचनेमें लग गयीं ॥ २ ॥ राग गौरी [ ७६ ] राम-लषन जब दृष्टि परे, री। अवलोकत सबलोगजनकपुर मानो बिधि बिबिध बिदेह करे, री ॥ १ ॥ धनुषजग्य कमनीय अवनि-तल कौतुकही भए आय खरे, री। छबि-सुर सभा मनहु मनसिजके कलित कलपतरु रूप फरे, री ॥ २ ॥ सकल काम बरषत मुख निरखत, करषत चित हित हरष भरे, री। तुलसी सबै सराहत भूपहि भलैं पैंत पासे सुढर ढरे, री ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! जबसे राम लक्ष्मण दृष्टिगोचर हुए हैं तबसे उन्हें देखनेवाले जनकपुरके लोगोंकी दशा ऐसी हो गयी है, मानो विधाता- ने अनेक विदेह बनाये हैं ॥ १ ॥ इसी समय धनुषयज्ञकी सुरम्य भूमिमें कौतुकसे ही दोनों भाई आ खड़े हुए, मानो छबिरूप देव- सभामें कामदेवके दो मनोहर कल्पवृक्ष सौन्दर्यरूपी फलसे फलित हुए हों ॥ २ ॥ अरी ! इनका मुख देखते ही सारी कामनाओंकी

गीतावली १२८ वृष्टि करता है और चित्तमें प्रीति तथा आनन्द भरकर उसे आकर्षित कर लेता है।' तुलसीदास कहते हैं—सभी लोग महाराज जनककी प्रशंसा करते हैं कि इस समय महाराजको अच्छा दाँव हाथ लगा, उनके पासे बहुत अच्छे पड़े ॥ ३ ॥ [ ७७ ] नेकु, सुमुखि, चित लाइ चितौ, री। राजकँवर-मूरति रचिबेकी रुचिसुबिरंचिश्रम कियो है कितौ, री ॥ १ ॥ नख-सिख-सुंदरता अवलोकत कह्यो न परत सुख होत जितौ, री। साँवर रूप-सुधा भरिबे कहँ नयन-कमल कल कलस रितौ, री ॥ २ ॥ मेरे जान इन्हें बोलिबे कारन चतुर जनक ठयो ठाट इतौ, री। तुलसी प्रभु भंजिहैं संभु-धनु, भूरिभाग सिय-मातु-पितौ, री ॥ ३ ॥ 'अरी सुमुखि ! तनिक चित्त लगाकर देख तो, इन राजकुमारों- की मनोहर मूर्ति रचनेकी रुचि करके विधाताने कितना परिश्रम किया है ? ॥ १ ॥ अरी ! नखसे सिखतक इनकी सुन्दरता देखकर जितना सुख होता है वह कहा नहीं जाता। इस श्याम-छबिरूप अमृतको भरनेके लिये तुम अपने नेत्रकमलरूप कलशोंको खाली करो ॥ २ ॥ मेरे विचारसे तो इन्हें बुलानेके लिये ही जनकजीने इतना ठाट-बाट रचा है।' तुलसीदास कहते हैं, 'सीताजीके माता- पिताका बड़ा भाग्य है, भगवान् निश्चय ही धनुष तोड़ेंगे' ॥ ३ ॥ राग सारंग [ ७८ ] जबतें राम-लषन चितए, री। रहे इकटक नर-नारि जनकपुर, लागत पलक कलप बितए, री ॥ १ ॥ प्रेम-बिबस माँगत महेस सों, देखत ही रहिए नित ए, री।

१२६ बालकाण्ड कै ए, सदा बसहु इन्ह नयनन्हि, कै ए नयन जाहु जित ए, री ॥ २ ॥ कोउ समुझाइ कहै किन भूपहि, बड़े भाग आप इत ए, री । कुलिस-कठोर कहाँ संकर-धनु, मृदुमूरति किसोर कित ए, री ॥ ३ ॥ बिरचत इन्हहिं बिरंचि भुवन सब सुंदरता खोजत रित ए, री । तुलसिदास ते धन्य जनम जन, मन-क्रम-बच जिन्हके हित ए, री ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! जबसे राम-लक्ष्मणको देखा है तबसे जनकपुरके नर-नारी एकटक रह गये हैं; उन्हें पलक मारनेमें मानो कई कल्प बीत जाते हैं ॥ १ ॥ वे सब प्रेमके वशीभूत हो महादेवजीसे यही मांगते हैं कि नित्य इन्हें ही देखते रहें, या तो सर्वदा ये ही इन नेत्रोंमें बसे रहें या जिधर वे जायें उधर ही ये नेत्र भी चले जायें ॥ २ ॥ भला कोई व्यक्ति राजाको समझाकर ऐसा क्यों नहीं कहता कि ये बड़े भाग्यसे इधर आये हैं [अतः प्रण त्याग कर इन्हें ही सीताजी विवाह दें] । भला कहाँ तो वज्रसे भी कठोर श्रीमहादेवजीका धनुष और कहाँ ये अति मृदुल किशोर-मूर्ति ? ॥ ३ ॥ इन्हें रचते समय विधाताने सुन्दरताकी खोज करते-करते सारे भुवन खाली कर दिये थे । तुलसीदास कहते हैं, जिन्हें मन, वचन और कर्मसे ये प्रिय हैं उन लोगोंके जन्म धन्य हैं ॥ ४ ॥ [ ७९ ] सुनु सखि, भूपति भलोई कियो, री । जेहि प्रसाद अवधेस-कुँवर दोउ नगर लोग अवलोकि जियो, री ॥ १ ॥ मानि प्रतीति कहे मेरे तैं कत संदेह-बस करति हियो, री । तौलौं है यह संभु सरासन, श्रीरघुबर जौलौं न लियो, री ॥ २ ॥ जेहि बिरंचि रचि सीय सँवारी, औ रामहि ऐसो रूप दियो, री । तुलसिदास तेहि चतुर बिधाता निजकर यह संजोग सियो, री ॥ ३ ॥ गी० ६—

गीतावली १३०

॥ 'अरी सखि ! सुन, महाराज जनकने बड़ा ही अच्छा कियां है। देखौं, उनकी कृपासे ही महाराज दशरथके इन दोनों कुमारोंको देखकर नगरनिवासी जीवन धारण कर रहे हैं ॥ १ ॥ मेरे कहनेसे विश्वास कर, चित्तको सन्देहवश क्यों करती है ! यह महादेवजीका धनुष तभीतक दीखता है जबतक रघुनाथजी इसे नहीं लेते ॥ २ ॥ जिसे विधाताने सीताजीको सँवारकर रचा है और रामको ऐसा रूप दिया है—तुलसीदास कहते हैं—उस चतुर विधाताने ही अपने हाथसे यह संयोग मिलाया है' ॥ ३ ॥

[ ८० ] अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं। नीलकंठ कारुन्यसिंधु हर दीनबन्धु दिनदानि हैं ॥ १ ॥ जो पहिले ही पिनाक जनक कहँ गए सौंपि जिय जानि हैं। बहुरि त्रिलोचन लोचनके फल सबहि सुलभ किये आनि हैं ॥ २ ॥ सुनियत भव-भावते राम हैं, सिय भावति-भवानि हैं। परखत प्रीति प्रतीति, पयज-पनु रहे काज ठटु ठानि हैं ॥ ३ ॥ भये बिलोकि बिदेह नेहबस बालक, बिनु पहिचानि हैं। होत हरे होने बिरबनि दल सुमति कहति अनुमानि हैं ॥ ४ ॥ देखियत भूप भोरके-से उडुगन, गरत गरीब गलानि हैं। तेज प्रताप बढ़त कुँवरनको, जदपि संकोची बानि हैं ॥ ५ ॥ बय किसोर, बरजोर, बाहुबल-मेरु मेलि गुन तानि हैं। श्रवसि राम राजीव-बिलोचन संभु-सरासन भानि हैं ॥ ६ ॥ देखिहैं ब्याह-उछाह नारि-नर, सकल-सुमंगल-खानि हैं। भूरिभाग तुलसी तेऊ, जे सुनिहैं, गाइहैं, बखानि हैं ॥ ७ ॥