गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१४१ बालकाण्ड नहीं रचा है ? ॥ ४ ॥ मुझे अपने प्रणका मोह नहीं है और न सीता- हीकी विशेष चिन्ता है, क्योंकि जिस पुरुषने जो कुछ बोया है वह वही काटेगा ! [ मैं तो यही चाहता हूँ कि] रघुनाथजीकी नीकी निकाई नीकी ही बनी रहे, इसलिये हे प्रभो ! यह तो आपहीके हाथ है, जिनकी कि बड़ी विचित्र करतूत है' ॥ ५ ॥ तब विश्वा- मित्रजीने साधु-साधु कहकर महाराज जनककी प्रशंसा की और कहा—'राजन् ! आपने अपने हृदयमें उचित जानकर बहुत ठीक बात निश्चय कर रक्खी है। [ राजा जनकका भाव जानकर ] लक्ष्मणजी प्रसन्न हुए और हृदयमें बिलखते हुए पुरवासीलोग भी आनन्दमग्न हो गये । जिसके राजा महाराज राम विजयी हैं, वह तुलसीदास भी अत्यन्त प्रसन्न है ॥ ६ ॥ [ ८७ ] सुजन सराहें जो जनक बात कही है। रामहि सोहानी जानि, मुनिमनमानी सुनि, नीच महिपवली दहन बिनु दही है ॥ १ ॥ कहैं गाधिनंदन मुदित रघुनंदनसों, नृपगति अगह, गिरा न जाति गही है। देखे-सुने भूपति अनेक झूठे झूठे नाम सांचे तिरहुतिनाथ, साखि देति मही है ॥ २ ॥ रागऊ बिराग, भोग जोग जोगवत मन, जोगी जागबलिक प्रसाद सिद्धि लही है। ताते न तरनितें, न सीरे सुधाकरहूतें सहज समाधि निरुपाधि निरबही है ॥ ३ ॥
गीतावली १४२ ऐसे अगाध बोध रावरे सनेह-बस, बिकल बिलोकति, दुचितई सही है। कामधेनु-कृपा हुलसानी तुलसीस उर, पन-सिसु हेरि, मरजाद बाँधी रही है ॥ ४ ॥ इस समय जनकजीने जो बात कही उसकी साधु पुरुषोंने सराहना की तथा उसे रामचन्द्रजीको प्रिया और विश्वामित्रजीको अभिमत जान अन्य नीच राजाओंकी पंक्ति बिना आगके ही जल गयी ॥ १ ॥ तब गाधिनन्दन विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर रघुनाथजी से कहा—'महाराज जनककी गति बड़ी अग्राह्य है, वह वाणीसे ग्रहण नहीं की जा सकती। राजा तो अनेक देखे सुने हैं, किन्तु वे सब झूठे और नाममात्रके ही हैं। सच्चे तो एकमात्र तिरहुतनाथ महाराज जनक ही हैं—इस विषयमें सारी पृथ्वी साक्ष्य दे रही है ॥ २ ॥ इनका चित्त रागी होनेपर भी विरागी तथा भोग भोगनेयोग्य होकर भी योगयुक्त है। इन्होंने योगी याज्ञवल्क्यकी कृपासे सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर ली है। ये न तो सूर्यसे संतप्त होते हैं और न चन्द्रमासे शीतल ही होते हैं। इन्होंने तो उपाधिरहित सहज समाधिका निर्वाह कर लिया है ॥ ३ ॥ ऐसे अगाधबोधसम्पन्न होकर भी तुम्हारे स्नेहवश ये ऐसे व्याकुल दिखायी देते हैं, मानो अत्यन्त चिन्ता सहन की हो। [गुरुजीका यह कथन सुन] तुलसीदासजीके प्रभुके हृदयमें कृपारूप कामधेनु महाराज जनकके प्रणरूप वत्सको देखकर अति हुलसित हुई। किन्तु [गुरुकी आज्ञारूप] मर्यादामें बँधी रह गयी [अर्थात् उन्होंने गुरुजीकी आज्ञाके बिना धनुर्भङ्ग नहीं किया] ॥ ४ ॥ [ ८८ ] ऋषिराज ! राजा आजु जनक समान को ? आपु यहि भाँति प्रीति सहित सराहित, रागी औ बिरागी बड़भागी ऐसो आन को ? ॥ १ ॥
१४३ बालकाण्ड भूमि-भोग करत अनुभवत जोग-सुख मुनि-मन-अगम अलख गति जान को ? गुर-हर-पसे-नेहु, गेह बसि भी बिदेह, अगुन-सगुन-प्रभु-भजन-सयान को ? ॥ २ ॥ कहनि रहनि एक, बिरति बिबेक नीति, बेद-बुध-संमत पथी न निरबानको ? गाँठि बिनु गुनकी कठिन जड़-चेतनकी, छोरी अनायास, साधु सोधक अपानको ॥ ३ ॥ सुनि रघुबीरकी बचन-रचनाकी रीति, भयो मिथिलेस मानो दीपक बिहानको । मिट्यो महामोह जीको, छूट्यो पोच सोच सीको, जान्यो अवतार भयो पुरुष पुरानको ॥ ४ ॥ सभा, नृप, गुर, नर-नारि पुर, नभ सुर सब चितवत मुख करुनानिधानको । एकै एक कहत प्रगट एक प्रेम-बस तुलसीस तोरिए सरासन इसानको ॥ ५ ॥ [भगवान् राम बोले-] 'हे ऋषिराज ! आज जनकजीके समान और कौन राजा है ? जिनकी आप इस प्रकार प्रीतिपूर्वक सराहना कर रहे हैं ? अहा ! इनके समान रागी एवं साथ ही विरागी दूसरा कौन भाग्यवान् होगा ? ॥ १ ॥ ये पृथ्वीका भोग करते हुई योगसुखका भी अनुभव करते हैं। इनकी गति अलक्षित और मुनियोंके भी मनको अगम है, उसे कौन जान सकता है ? इनका श्रीगुरु और भगवान् शङ्करके चरणोंमें प्रेम है, ये घरमें रहते हुए भी विदेहभावको प्राप्त हो गये हैं। इनके समान निर्गुण तथा सगुण
गीतावली १४४ प्रभुका भजन करनेमें भी भला कौन कुशल है ? ॥ २ ॥ इनका कथन और रहन-सहन एक समान हैं। ये वैराग्य, विवेक, नीति तथा निर्वाणपदके बुधजनसम्मत पथिक हैं। इन्होंने बिना रस्सीकी जड़चेतनकी कठिन ग्रन्थिको अनायास ही खोल दिया है। इनके समान अपने स्वरूपका अच्छी प्रकार शोधन करनेवाला और कौन है ? ॥ ३ ॥ रघुनाथजीकी वाक्यरचनाकी रीति सुनकर उससे सकुचाकर जनकजी प्रातःकालीन दीपकके समान हतप्रभ हो गये। उनके चित्तका महामोह मिट गया, सीताजीकी ओरसे उनकी क्षुद्र चिन्ता दूर हो गयी और उन्हें विदित हो गया कि पुराणपुरुषका अवतार हुआ है ॥ ४ ॥ इस समय सभा, महाराज जनक, गुरु, नगरके नर-नारी और आकाशस्थित देवगण—ये सब करुणानिधान भगवान् रामका मुख निहारने लगे और एक-दूसरेसे प्रेमवश प्रकटरूप से कहने लगे—'हे तुलसीश ! आप भगवान् शङ्करका धनुष तोड़िये' ॥ ५ ॥ राग मारू [ ८९ ] सुनो भैया भूप सकल दै कान। बज्ररेख गजदसन जनक-पन बेद-बिदित, जग जान ॥ १ ॥ घोर कठोर पुरारि-सरासन, नाम प्रसिद्ध पिनाकु । जो दसकंठ दियो बाँवों जेहि हर-गिरि कियो है मनाकु ॥ २ ॥ भूमि भाल भ्राजत, न चलत सो, ज्यों बिरंचिको आँकु । धनु तोरै सोइ बरै जानकी, राउ होइ कि राँकु ॥ ३ ॥ सुनि आमरषि उठे अवनीपति, लगै बचन जनु तीर । टरै न चाप, करैं अपनी सौ महा महा बलधीर ॥ ४ ॥
१४५ बालकाण्ड नमित-सीस सोचहिं सलज्ज सब श्रीहत भए सरीर। बोले जनक बिलोकि सीय तन दुखित सरोष अधीर॥ ५॥ सप्त दीप नव खंड भूमिके भूपतिबृन्द जुरे। बड़ो लाभ कन्या-कीरतिको, जहँ-तहँ महिप मुरे॥ ६॥ डग्यौ न धनु, जनु बीर बिगत महि, किधौं कहुँ सुभट दुरे। रोषे लखन बिकट भृकुटी करि, भुज अरु अधर फुरें॥ ७॥ सुनहु भानुकुल-कमल-भानु! जो अब अनुसासन पावौं। का बापुरो पिनाकु, मेलि गुन मंदर मेरु नवावौं॥ ८॥ देखो निज किंकरको कौतुक, क्यों कोदंड चढ़ावौं। लै धावौं, भंजौं मृनाल ज्यों, तौ प्रभु-अनुग कहावौं॥ ६॥ हरषे पुर-नर-नारि, सचिव, नृप कुंवर कहे बर बैन। मृदु मुसुकाइ राम बरज्यो प्रिय बंधु नयनकी सैन॥ १०॥ कौसिक कह्यो, उठहु रघुनंदन, जगबंदन, बलऐन। तुलसिदास प्रभु चले मृगपति ज्यों निज भगतनि सुख दैन॥ ११॥ [बन्दीजन कहने लगे—] 'अरे भैया! सब राजा लोगो! कान देकर सुनो। राजा जनकका प्रण वज्ररेखा और हाथीके दाँतोंके समान [अमिट एवं पीछेको न लौटनेवाला] है। वह वेदमें प्रसिद्ध है और उसे सारा जगत् जानता है॥ १॥ श्री- महादेवजीका यह 'पिनाक' नामसे प्रसिद्ध धनुष बड़ा ही घोर और कठोर है; इसने उस रावणको भी नीचा दिखा दिया है, जिसने कैलास पर्वतको भी तुच्छ कर दिखलाया था॥ २॥ यह पृथ्वीके मस्तकपर विराजमान है और विधाताके लेखके समान तनिक भी नहीं टलता। परन्तु राजा हो या रङ्क, जो कोई इस धनुषको तोड़ेगा वही जानकीजीको वरेगा'॥ ३॥ यह सुनकर सब राजा लोग गी० १०—
गीतावली १४६ उत्तेजित होकर उठ खड़े हुए; उन्हें जनकजीके ये वचन तीरके समान लगे। ये बड़े-बड़े बलधारी अपनी-अपनी-सी कर रहे हैं। परन्तु धनुष तनिक भी नहीं टलता॥४॥ तब सब लोग सलज्जभावसे सिर झुकाकर सोच करने लगे और उनके शरीर श्रीहीन हो गये। इस समय महाराज जनकने सीताजीकी ओर देखकर दुःखित, रुष्ट और अधीर होकर कहा—॥५॥ 'अहो! सातों द्वीपों और नवों खण्डोंके राजा लोग एकत्र हुए। उन्हें कन्या और कीर्तिका बड़ा भारी लाभ भी प्राप्त हो सकता था, किन्तु वे सभी जहाँ-तहाँ धनुषके सामनेसे मुड़ गये॥६॥ उनसे धनुष तनिक भी नहीं डिगा। पृथ्वी मानो वीरहीन हो गयी है अथवा सारे वीर कहीं छिप तो नहीं गये हैं?' यह सुनकर लक्ष्मणजी भृकुटियोंको टेढ़ी कर बड़े क्रुद्ध हुए तथा उनकी भुजा और अधर फड़कने लगे॥७॥ [वे बोले—] 'हे सूर्यकुलकमलदिवाकर! सुनिये, यदि इस समय आपकी आज्ञा मिले तो बेचारा धनुष तो क्या, मन्दराचल और सुमेरुको भी डोरी चढ़ाकर झुका दूँ!॥८॥ आप तनिक अपने सेवकका खेल देखिये तो कि मैं किस प्रकार इस धनुषको चढ़ाता हूँ, यही क्यों, मैं तो इसे लेकर दौड़ूँ और कमल- नालके समान तोड़ डालूँ, तभी आपका दास कहलाऊँगा'॥९॥ यह सुनकर नगरके सकल नर-नारी तथा मन्त्रिवर्ग और राजालोग प्रसन्न हुए और कहने लगे, 'राजकुमारने बड़े ही सुन्दर वचन कहे हैं।' किन्तु रघुनाथजीने मधुर-मधुर मुसकराते हुए नेत्रोंके इशारेसे अपने प्रिय बन्धुको रोक दिया॥१०॥ तब विश्वामित्रजीने कहा, 'हे जगद्वन्द्य बलधाम रघुनाथजी! उठिये।' तुलसीदासजी कहते
१४७ बालकाण्ड हैं, यह सुनकर प्रभु अपने भक्तोंको सुख देनेके लिये मृगराजके समान चले ॥ ११ ॥ [ ९० ] जबहिं सब नृपति निरास भए। गुरुपद-कमल बंदि रघुपति तब चाप-समीप गए ॥ १ ॥ स्याम-तामरस-दाम-बरन बपु, उर-भुज-नयन बिसाल। पीत बसन कटि, कलित कंठ सुंदर सिंधुर-मनिमाल ॥ २ ॥ कल कुंडल, पल्लव प्रसून सिर चारु चौतनी लाल। कोटि-मदन-छबि-सदन बदन-बिधु, तिलक मनोहर भाल ॥ ३ ॥ रूप अनूप बिलोकत सादर पुरजन राजसमाज। लषन कह्यो थिर होहु धरनिधरु, धरनि, धरनिधर आज ॥ ४ ॥ कमठ, कोल, दिग-दंति सकल अँग सजग करहु प्रभु-काज। चहत चपरि सिव-चाप चढ़ावन दसरथको जुवराज ॥ ५ ॥ गहि करतन, मुनि, पुलक सहित, कौतुकहि, उठाइ लियो। नृपगन-मुखनि समेत नमित करि संजि सुख सबहि दियो ॥ ६ ॥ आकर्ष्यो सिय-मन समेत हरि, हरष्यो जनक-हियो। भंज्यौ भृगुपति-गरब सहित, तिहुँ लोक-बिमोह कियो ॥ ७ ॥ भयो कठिन कोदंड-कोलाहल प्रलय-पयोद समान। चौंके सिव, बिरंचि, दिसिनायक, रहे मूंदि कर कान ॥ ८ ॥ सावधान ह्वै चढ़े बिमाननि चले बजाइ निसान। उमगि चल्यो आनंद नगर, नभ जयधुनि, मंगलगान ॥ ९ ॥ बिप्र-बचन सुनि सुखी सुआसिनि चलीं जानकिहि ल्याइ। कुँवर निरखि, जयमाल मेलि उर कुंवरि रही सकुचाइ ॥ १० ॥ बरषहिं सुमन, असीसहिं सुर-मुनि प्रेम न हृदय समाइ। सीय-रामकी सुंदरतापर तुलसिदास बलि जाइ ॥ ११ ॥
गीतावली १४८ जिस समय सब राजालोग निराश हो गये, उसी समय श्री- रघुनाथजी गुरुवर विश्वामित्रके चरणकमलोंकी वन्दना कर धनुषके समीप आये ॥ १ ॥ प्रभुका नीलकमलकी मालाके समान श्याम शरीर है, उनके हृदय, भुजा और नेत्र विशाल हैं, कमरमें पीताम्बर तथा कलित कण्ठमें गजमुक्ताओंकी मनोहर माला है ॥ २ ॥ कानों- में सुन्दर कुण्डल हैं तथा सिरपर पत्र-पुष्प एवं लाल रङ्गकी मनोहर चौतनी टोपी है, उनका मुखचन्द्र करोड़ों कामदेवोंकी छबिका आश्रय है और उनके माथेपर मनोहर तिलक है ॥ ३ ॥ पुरजन और सम्पूर्ण राजसमाज आदरपूर्वक उनके अनूप रूपको निहार रहे हैं। इसी समय लक्ष्मणजी कहने लगे—'हे शेष, पृथ्वी एवं पर्वत- गण ! आज तुम निश्चल हो जाओ ॥ ४ ॥ हे कूर्म ! हे वाराह ! हे दिग्गजगण ! तुम सब अङ्गोंसे सावधान होकर प्रभुका कार्य निष्पन्न करो । इस समय महाराज दशरथके युवराज सहसा शिवजीका धनुष चढ़ाना चाहते हैं' ॥ ५ ॥ तब भगवान् रामने, मुनियोंको पुलकित करते हुए उस धनुषको हाथसे पकड़कर खेलहीमें उठा लिया और राजाओंके मुखोंके सहित उसे झुकाकर सभीको सुख दिया ॥ ६ ॥ फिर श्रीहरिने उसे सीताजीके हृदयसहित आकर्षित किया । इससे जनकजीका हृदय बड़ा प्रसन्न हुआ । इस प्रकार परशुरामजीके गर्वसहित उसे तोड़ डाला और तीनों लोकोंको मोह- हीन कर दिया ॥ ७ ॥ इससे प्रलयकालीन बादलोंके गर्जनके समान धनुषका बड़ा भारी कोलाहल हुआ । उससे शिव, ब्रह्मा और सकल दिक्पालगण चौंक पड़े तथा कान मूंदकर रह गये ॥ ८ ॥ फिर वे सावधान होकर विमानोंमें चढ़कर नगाड़े बजाते हुए चले । इससे
१४६ बालकाण्ड सम्पूर्ण नगरमें आनन्द उमड़ चला तथा आकाश में जयध्वनि और मङ्गलगान होने लगा ॥ ९ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञा सुन सुवासिनी सखियाँ जानकीजीको साथ लेकर चलीं। उस समय राजकुमारी जानकीजी दशरथनन्दन रामको देख उनके गलेमें जयमाल डाल सकुचाकर रह गयीं ॥ १० ॥ तब देवता और मुनिजन फूलोंकी वर्षा कर आशीर्वाद देने लगे। उनके हृदयमें प्रेम समाता नहीं था। श्रीसीता और रामजीकी उस सुन्दरतापर तुलसीदास बलिहारी है ॥ ११ ॥ राग मलार [ ९१ ] जब दोउ दसरथ-कुँवर बिलोके। जनक-नगर नर-नारि मुदित मन निरखि नयन पल रोके ॥ १ ॥ बय किसोर, घन-तड़ित-बरन तनु, नखसिख अंग लोभारे। द्वै चित, कै हित, लै सब छबि-बित बिधि निज हाथ सँवारे ॥ २ ॥ संकट नृपहि, सोच अति सीतहि, भूप सकुचि सिर नाए। उठे राम रघुकुल-कुल-केहरि, गुर-अनुसासन पाए ॥ ३ ॥ कौतुक ही कोदंड खंडि प्रभु, जय अरु जानकि पाई। तुलसिदास कीरति रघुपतिकी मुनिन्ह तिहूँ पुर गाई ॥ ४ ॥ जिस समय जनकपुरके नर-नारियोंने उन दोनों राजकुमारोंको देखा, उस समय उन्होंने उन्हें देखकर मनमें प्रसन्न हो अपने नेत्रोंकी पलकें गिराना रोक लिया अर्थात् एकटक दर्शन करने लगे ॥ १ ॥ उनकी किशोर अवस्था है, मेघ और विद्युत्के समान श्याम एवं गौर शरीर हैं तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त सभी अङ्ग लुभानेवाले हैं,
गीतावली १५० मानो विधाताने संसारके छविरूप धनको लेकर अपना चित्त और प्रेम लगाकर अपने हाथोंसे ही उनकी रचना की है ॥ २ ॥ (प्रतिज्ञा और प्रेमकी खींचातानीमें पड़कर) महाराज जनक बड़े संकटमें पड़े हुए हैं, सीताजीको अति संकोच हो रहा है और राजालोग [यह जानकर कि ये अवश्य धनुष तोड़ डालेंगे] संकोचवश सिर झुकाये हुए हैं, इसी समय गुंरुजीकी आज्ञा पा रघुकुलकेशरीप्रवर भगवान् राम उठे ॥ ३ ॥ प्रभुने खेलहीमें धनुषको तोड़कर जय और जानकी प्राप्त कर ली। तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीकी उस कीर्तिकी मुनियोंने तीनों लोकोंमें गाया है ॥ ४ ॥ राग टोड़ी [ १२ ] मुनि-पदरेनु रघुनाथ माथे धरी है। रामरुख निरखि, लषनकी रजाइ पाइ, धरा धरा-धरनि सुसावधान करी है ॥ १ ॥ सुमिरि गनेस-गुर, गौरि-हर भूमिसुर, सोचत सकोचत सकोची बानि घरी है। दीनबंधु, कृपासिंधु, साहसिक, सीलसिंधु, सभाको सकोच कुलहूकी लाज परी है ॥ २ ॥ पेखि पुरुषारथ, परखि पन, पेम, नेम, सिय-हियकी बिसेषि बड़ी खरभरी है। दाहिनो दियो पिनाकु, सहमि भयो मनाकु, कहाब्याल बिकल बिलोकि जनु जरी है ॥ ३ ॥ सुर हरषत, बरषत फूल बार बार, सिद्ध-मुनि कहत, सगुन, सुभ घरी है।
१५१ बालकाण्ड रामबाहु-बिटप बिसाल बोंड़ी देखियत, जनक-मनोरथ कलपबेलि फरी है॥ ४॥ लख्यौ न चढ़ावत, न तानत, न तोरत हू घोर धुनि सुनि सिवकी समाधि टरी है। प्रभुके चरित चारु तुलसी सुनत सुख, एक ही सुलाभ सबहीकी हानि हरी है॥ ५॥ रघुनाथजीने मुनिके चरणकमलोंकी रज मस्तकपर धारण की तथा रामचन्द्रजीका रुख देख और लक्ष्मणजीकी आज्ञा पा पृथ्वीने अपने धारण करनेवाले [शेष, कूर्म, वराह आदि] को सावधान कर दिया ॥ १ ॥ जानकीजी गणेश, गुरु शतानन्द, पार्वती, शङ्कर और ब्राह्मणोंका स्मरण कर सोच एवं संकोच करने लगीं, संकोचमय स्वभाव-धारणकी उनकी बान ही है। [फिर वे श्रीरघुनाथजीसे भी मन-ही-मन कहने लगीं कि] आप तो दीनबन्धु, कृपासागर, साहसी और शीलसमुद्र हैं। इस समय [धनुष और पिताके प्रणकी दृढ़ता देखकर] मुझे सभाका संकोच हो रहा है तथा कुलकी लज्जा भी है ही ॥ २ ॥ उस समय राजाओंके पुरुषार्थ, जनकजीके प्रण तथा विशेषकर अपने प्रति सीताजीके प्रेम और ऐसे नियमको देखकर कि [मेरी शरण लेनेपर भी] उनके हृदयमें बड़ी खलबली पड़ी हुई है, भगवान्ने धनुषको दाहिना दिया (प्रदक्षिणाकी)। ऐसा करते ही वह धनुष सहमकर अत्यन्त लघु हो गया, जैसे किसी जड़ीको देखकर महासर्प व्याकुलतापूर्वक (सिकुड़कर) छोटा हो जाता है ॥ ३ ॥ [ऐसा प्रभाव देखकर] देवतालोग प्रसन्न हो गये और बार-बार फूलोंकी वर्षा करने लगे। सिद्ध और मुनिजन कहते हैं कि
गीतावली १५२ यह घड़ी बड़ी शुभ है और सगुन भी बड़े अच्छे हैं। रामचन्द्रजीके विशाल भुजारूप सुन्दर वृक्षपर छायी हुई, मानो जनकजीकी मनोरथ- रूप कल्पलता फल आयी है ॥ ४ ॥ उस धनुषको चढ़ाते, तानते और तोड़ते हुए भगवान्को कोई न देख सका। उसकी ध्वनिको सुनकर शिवजीकी भी समाधि टूट गयी। तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये मनोहर चरित्र सुनकर सबको आनन्द प्राप्त हुआ और इस एक ही सुन्दर लाभसे एक साथ सभीकी हानियाँ दूर हो गयीं ॥ ५ ॥ राग सारङ्ग [ ९३ ] राम कामरिपु-चाप चढ़ायो। मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ निरखि निसान बजायो ॥ १ ॥ जेहि पिनाक बिनु नाक किए नृप, सबहि बिषाद बढ़ायो। सोइ प्रभु कर परसत टूट्यो, जनु हुतो पुरारि पढ़ायो ॥ २ ॥ पहिराई जयमाल जानकी, जुवतिन्ह मंगल गायो। तुलसी सुमन बरषि हरषे सुर, सुजस तिहू पुर छायो ॥ ३ ॥ जिस समय रघुनाथजीने शङ्करका धनुष चढ़ाया उस समय मुनिवरको पुलकावली हो आयी, नगरमें आनन्द छा गया तथा देवतालोग देखकर आकाशमें बाजे बजाने लगे ॥ १ ॥ जिस धनुषने सभी राजाओंको बिना नाकका कर दिया था (अपमानित कर रक्खा था) और सभीका विषाद बढ़ाया था, वही प्रभुके हाथका स्पर्श होते ही टूट गया, मानो उसे महादेवजीने ऐसा ही पढ़ा रक्खा था ॥ २ ॥ तदनन्तर जानकीजीने जयमाला पहनायी तथा युवतियोंने मङ्गलगांन किया। तुलसीदास कहते हैं, सभी देवगण पुष्पोंकी वर्षा कर हर्षित हो गये और भगवान्का सुयश तीनों लोकोंमें छा गया ॥ ३ ॥
१५३ बालकाण्ड राग तोड़ी [ ९४ ] जनक मुदित मन टूटत पिनाकके । बाजे हैं बधावने, सुहावने मंगल-गान, भयो सुख एकरस रानी राजा राँकके ॥ १ ॥ दुंदुभी बजाइ, हरषि बरषि फूल, सुरगन नाचैं नाच नायकहू नाकके । तुलसी महीस देखे दिन रजनीस जैसे, सूने परे सून-से मनो मिटाए आँकके ॥ २ ॥ धनुषके टूटते ही जनकजी मनमें प्रसन्न हो गये। इससे सुहावने बधावे बजने लगे तथा मंगलगान आरम्भ हो गया। उस समय राजा, रानी और रङ्कको एक समान आनन्द हुआ ॥ १ ॥ देवता और स्वर्गके अधिपति भी दुन्दुभी बजाते और आनन्दसे गाते हुए फूलोंकी वर्षा कर नाचने लगे। तुलसीदास कहते हैं, उस समय वे मानो दिनके चन्द्रमाके समान ( मलिन ) जान पड़ते थे। वे मानो अङ्कके मिटा देनेपर शून्यके समान सूने-से ( नगण्य ) हो गये थे ॥ २ ॥ [ ९५ ] लाज तोरि, साजि साज राजा राढ़ रोषे हैं। कहा भौ चढ़ाए चाप, ब्याह ह्वै है बड़े खाए, बोलैं, खौलैं सेल, असि चमकत चोखे हैं ॥ १ ॥ जानि पुरजन त्रसे, धीर दै लषन हँसे, बल इनको पिनाक नीके नापे-जोखे हैं।
गीतावली १५४ कुलहि लजावैं बाल, बालिस बजावैं गाल, कैधौं क्रूर कालबस, तमकि त्रिदोषे हैं ॥ २ ॥ कुँवर चढ़ाइँ भौंहैं, अब को बिलोकैं सोहैं, जहँ तहँ भे अचेत, खेतके-से धोखे हैं। देखे नर-नारि कहैं, साग खाइ जाए माइ; बाहु पीन पाँवरनि पीना खाइ पोखे हैं ॥ ३ ॥ प्रमुदित-मन लोक-कोक-नद कोकगन, रामके प्रताप-रबि सोच-सर सोखे हैं। तबके देखैया तोषे, तबके लोगनि भले, अबके सुनैया साधु तुलसिहु तोषे हैं ॥ ४ ॥ निकम्मे राजा लज्जा त्याग कर युद्धका साज सजा रणके लिये रोषमें भर गये और कहने लगे—‘अरे ! धनुष चढ़ा लेनेसे ही क्या होता है, अभी विवाह तो बहुत कुछ खानेपर (बड़ी कठिनाईसे) होगा !’ ऐसा कहकर वे भाले निकालते हैं और तलवारोंको खूब चमकाते हैं ॥ १ ॥ यह जानकर पुरवासी तो भयभीत हो गये, किन्तु लक्ष्मणजी उन्हें धैर्य बंधाकर हँसने लगे और बोले—‘अरे ! इनका बल तो इस धनुषने अच्छी तरह जाँच लिया है। ये मूर्ख अपने कुलको लजाते और व्यर्थ गाल बजाते हैं अथवा क्रूर कालके वशीभूत हो तमककर—त्रिदोषमें पड़कर बकवाद कर रहे हैं?’ ॥ २ ॥ ऐसा कह राजकुमार लक्ष्मणने भौंहें चढ़ा लीं। अब उनको सामनेसे कौन देख सकता था ? खेतके धोखोंके* समान सब जहाँ-तहाँ अचेत हो गये। उन्हें देखकर नगरके स्त्री-पुरुष कहने *जो मनुष्यका-सा आकार बनाकर खेतोंमें मृग एवं पक्षियोंको डरानेके लिये खड़े कर दिये जाते हैं।
१५५ बालकाण्ड लगे 'इनकी माताओंने शाक खाकर इन्हें जना है और इन पामरोंकी मोटी-मोटी भुजाएँ भी खली खा-खाकर ही पुष्ट हुई हैं' ॥ ३ ॥ इस प्रकार रामके प्रतापरूप सूर्यके उदित होते ही सम्पूर्ण लोकरूप कमल एवं चकवा-चकवी प्रसन्नचित्त हो गये तथा शोकरूप सरोवर सूख गये । उस समयके ये सब चरित्र देखनेवाले भले लोग सन्तुष्ट हुए तथा इस समय ये सब बातें सुननेवाले साधुजन एवं तुलसीदास भी सन्तुष्ट हुए हैं ॥ ४ ॥ [ ९६ ] जयमाल जानकी जलजकर लई है। सुमन सुमंगल सगुनकी बनाइ मंजु, मानहु मदनमाली आपु निरमई है ॥ १ ॥ राज-रुख लखि गुर भूसुर सुआसिनिन्हि, समय-समाजकी ठवनि भली ठई है। चलीं गान करत, निसान बाजे गहगहे, लहलहे लोयन सनेह सरसई है ॥ २ ॥ हनि देव दुंदुभी हरषि बरषत फूल, सफल मनोरथ भौ, सुख-सुचितई है। पुरजन-परिजन, रानी-राउ प्रमुदित, मनसा अनूप राम-रूप-रंग रई है ॥ ३ ॥ सतानंद-सिष सुनि पाँय परि पहिराई, माल सिय पिय-हिय, सोहत सो भई है। मानसतें निकसि बिसाल सुतमालपर, मानहुँ मरालपाँति बैठी बनि गई हैं ॥ ४ ॥
गीतावली १५६ हितनिके लाहकी, उछाहकी, बिनोद-मोद, सोभाकी अवधि नहिं अब अधिकई है। याते बिपरीत अनहितनकी जानि लीबी गति, कहे प्रगट, खुनिस खासी खई है॥ ५ ॥ निज निज बेदकी सप्रेम जोग-छैम-मई, मुदित असीस बिप्र बिदुषनि दई है। छबि तेहि कालकी कृपालु सीतादूलहकी हुलसति हिये तुलसीके नित नई है॥ ६ ॥ जानकीजीने अपने करकमलमें जयमाल ली है, जिस मनोहर मालाका—मानो मंगलमय पुष्प और सुन्दर डोरीसे गूंथकर कामदेव- रूप मालीने स्वयं ही निर्माण किया है ॥ १ ॥ राजाका रुख जान गुरु शतानन्दजी, ब्राह्मणलोग और सुवासिनी स्त्रियोंने समय और समाजके अनुरूप सुन्दर साज सजा. [सीताजीको आगे कर] सब सखियाँ मङ्गलगान करती हुई चलीं। उस समय उत्साह बढ़ानेवाले बाजे बजने लगे तथा श्रीराम और सीताके पारस्परिक दर्शनके लिये उतावले हुए नेत्रोंमें स्नेह सरसाने लगा ॥ २ ॥ देवतालोग दुन्दुभी बजाकर प्रसन्नतासे फूल बरसाने लगे। अपना मनोरथ सफल हो जानेसे उन्हें बड़े सुख और शान्तिका अनुभव हो रहा है। पुरवासी, परिजन तथा रानी और राजा अति आनन्दित हैं और मन-ही-मन रामके अनूप रूप-रङ्गमें रँग गये हैं ॥ ३ ॥ फिर गुरु शतानन्दजीकी शिक्षा सुन सीताजीने पैरों पड़कर अपने प्रियतमके गलेमें माला पहना दी। वह ऐसी शोभायमान हो रही है, मानो हंसोंकी पंक्ति मानसरोवरसे निकलकर किसी सुन्दर तमालवृक्षपर बैठकर सज रही हो ॥ ४ ॥ भगवान्के प्रेमियोंके लिये तो इससे
अधिक लाभ, उत्साह, मोद, विनोद और शोभाकी अवधि और कोई है ही नहीं। किन्तु प्रभुसे द्वेष करनेवालोंकी गति इससे विपरीत समझनी चाहिये। प्रकटरूपमें यह कह सकते हैं कि उन्हें तो मानो क्रोध और ईर्ष्याने भलीभाँति ग्रस लिया है ॥ ५ ॥ तब विद्वान् ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक अपने-अपने वेदोंका योग-क्षेममय आशीर्वाद दिया। दयामय सीतापतिकी उस समयकी छबि तुलसी- दासके हृदयमें नित्य नयी होकर हुलस रही है ॥ ६ ॥ राग केदारा [ ९७ ] लेहु री लोचननिको लाहु। कुँवर सुंदर साँवरो, सखि सुमुखि ! सादर चाहु ॥ १ ॥ खंडि हर-कोदंड ठाढ़े, जानु-लंबित-बाहु। रुचिर उर जयमाल राजति, देत सुख सब काहु ॥ २ ॥ चित चित हित-सहित नखसिख अंग-अंग निबाहु। सुकृत निज, सियराम-रूप, बिरंचि-मतिहि सराहु ॥ ३ ॥ मुदित मन बरबदन-सोभा उदित अधिक उछाहू। मनहु दूरि कलंक करि ससि समर सूझो राहू ॥ ४ ॥ नयन सुखमा-अयन हरत सरोज-सुंदरताहु। बसत तुलसीदास-उरपुर जानकीकौ नाहु ॥ ५ ॥ अरी सुमुखि सखि ! तनिक नेत्रोंका लाभ तो ले। साँवले कुँवर बड़े ही सुन्दर हैं, इन्हें तनिक आदरपूर्वक देख ले ॥ १ ॥ देख; ये महादेवजीका धनुष तोड़कर जानुपर्यन्त बाहु लटकाये खड़े हैं। इनके गलेमें मनोहर जयमाल सुशोभित है, जो सभीको आनन्द
गीतावली १५८ देती है ॥ २ ॥ इन्हें हार्दिक प्रेमसहित देख । नखसे शिखापर्यन्त इनका प्रत्येक अङ्ग यथायोग्य रूपसे सुशोभित है । इन्हें देखकर अपने पुण्य, सीतारामके रूप तथा [इन मूर्तियोंको रचनेवाले] विधाताकी बुद्धिकी सराहना कर ॥ ३ ॥ प्रसन्न मनके कारण सुन्दर मुखमण्डलकी शोभापर और भी अधिक उत्साह उदित हो रहा है, मानो चन्द्रमाने अपना कलङ्क दूर कर युद्धमें राहुको मार डाला हो ॥ ४ ॥ इनके सुषमासदन नयन कमलकी भी सुन्दरताको हर लेते हैं । ऐसे ये जानकीपति तुलसीदासके हृदयरूप पुरमें विराजते हैं ॥ ५ ॥ राग सारङ्ग [ ९८ ] भूपके भागकी अधिकाई । टूट्यौ धनुष, मनोरथ पूज्यौ, बिधि सब बात बनाई ॥ १ ॥ तबतें दिन-दिन उदय जनकको जबतें जानकी जाई । अब यहि ब्याह सफल भयो जीवन, त्रिभुवन बिदित बड़ाई ॥ २ ॥ बारहि बार पहुनई ऐहैं राम लषन दोउ भाई । एहि आनंद मगन पुरबासिन्ह देहदसा बिसराई ॥ ३ ॥ सादर सकल बिलोकत रामहि, काम-कोटि छबि छाई । यह सुख समउ समाज एक मुख क्यों तुलसी कहै गाई ॥ ४ ॥ [कोई सखी कहती है—] 'यह महाराज जनकके भाग्यकी अधिकता ही है कि धनुष टूट गया, मनोरथ पूर्ण हो गया और विधाताने सारी बात बना दी ॥ १ ॥ जबसे जानकीका जन्म हुआ है तबसे जनकजीकी दिनोंदिन उन्नति हो रही है । अब इसका
१५६ बालकाण्ड विवाह करके तो इनका जीवन ही सफल हो गया है। इस समय तीनों लोकोंमें इनकी बड़ाई प्रकट हो गयी है ॥ २ ॥ अहा ! अब ये राम-लक्ष्मण दोनों भाई बारम्बार पाहुने होकर आया करेंगे।' इस प्रकार आनन्दमें मग्न होकर पुरवासियोंने अपने देहकी सुधि भुला दी ॥ ३ ॥ सब लोग आदरपूर्वक रामचन्द्रजीको देख रहे हैं, जिनपर करोड़ों कामदेवोंकी छवि छायी हुई है। उस सुख, समय और समाजका तुलसीदास एक ही मुखसे कैसे बखान कर सकता है ? ॥ ४ ॥ विवाहकी तैयारी राग सोरठ [ ९९ ] मेरे बालक कैसे धौं मग निबहहिंगे ? भूख, पियास, सीत, श्रम सकुचनि क्यों कौसिकहि कहहिंगे ॥ १ ॥ को भोर ही उबटि अन्हवैहै, काढ़ि कलेऊ दैहै ? को भूषन पहिराइ, निछावरि करि लोचन-सुख लैहै ? ॥ २ ॥ नयन निमेषनि ज्यों जोगवैं नित पितु-परिजन-महतारी । ते पठए ऋषि साथ निसाचर मारन, मख रखवारी ॥ ३ ॥ सुंदर सुठि सुकुमार सुकोमल, काकपच्छ-धर दोऊ । तुलसी निरखि हरषि उर लैहौं बिधि ह्वै है दिन सोऊ ? ॥ ४ ॥ [ इधर कौसल्याजी चिन्ता कर रही हैं— ] 'मेरे बालक किस प्रकार मार्गमें निर्वाह करेंगे ? वे संकोचवश अपनी भूख, प्यास, शीत और श्रम आदिके विषयमें विश्वामित्रजीसे भी क्यों कहेंगे ? ॥ १ ॥ उन्हें प्रातःकाल होते ही उबटन मलकर कौन स्नान करावेगा, कौन
गीतावली १६० कलेवा निकाल कर देगा और कौन आभूषण पहनाकर निछावर करते हुए नेत्रोंका आनन्द लूटेगा ! ॥ २ ॥ जिन्हें पिता, परिजन और माताएँ सर्वदा नेत्रोंकी पलकोंके समान सँभाल रखती थीं, उन्हें राजाने यज्ञकी रखवाली और निशाचरोंका संहार करनेके लिये विश्वामित्रजीके साथ भेज दिया ! ॥ ३ ॥ हे विधाता ! क्या कभी वह दिन आवेगा जब मैं उन अति सुन्दर, सलोने, सुकुमार, सुकोमल और काकपक्षधारी दोनों बालकोंको देखकर हर्षित हो हृदयसे लगाऊँगी ?' ॥ ४ ॥ [ १०० ] ऋषि नृप-सीस ठगौरी-सी डारी । कुलगुर, सचिव, निपुन नेवनि अवरेब न समुझि सुधारी ॥ १ ॥ सिरिस-सुमन-सुकुमार कुँवर दोउ, सूर सरोष सुरारी । पठए बिनहि सहाय पयादेहि केलि-बान-धनुधारी ॥ २ ॥ अति सनेह-कातरि माता कहै, सुनि सखि ! बचन दुखारी । बादि बीर-जननी-जीवन जग, छत्रि-जाति-गति भारी ॥ ३ ॥ जो कहिहै फिरे राम-लषन घर करि मुनिमख-रखवारी । सो तुलसी प्रिय मोहिं लागिहै ज्यौं सुभाय सुत चारी ॥ ४ ॥ 'ऋषिवर विश्वामित्रजीने तो राजाके मस्तकपर कुछ जादू-सा कर दिया । इस विपरीत स्थितिका कुलगुरु, मन्त्री और निपुण नायकोंने भी बुद्धिपूर्वक सुधार नहीं किया ! ॥ १ ॥ देखो, दोनों कुमार तो सिरसके फूलके समान सुकुमार हैं और राक्षसलोग बड़े शूरवीर तथा क्रोधी हैं । फिर भी क्रीडाके धनुष-बाण लिये उन्हें बिना किसी प्रकारकी सहायताके पैदल ही भेज दिया' ॥ २ ॥