गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली १७८ (माता कौसल्या कहने लगी—) 'बेटा राम ! मैं किस प्रकार घरमें रह सकूँगी; मैं बारंबार अंक भरकर गोदमें ले किससे 'लाल' कहकर बोलूँगी; ॥ १ ॥ मेरे लाल ! तुम जो बहुत-से बालकोंको साथमें लेकर इस आँगनमें विहार किया करते थे सो हे बेटा ! तुम्हारी उन बहुत-सी बाललीलाओंको याद कर-करके मेरे प्राण कैसे रह सकेंगे; ॥ २ ॥ जिन कानोंसे तुम्हारे सुन्दर बोल सुन-सुनकर मैं स्नेहमें डूब जाती थी, आज उन्हींसे तुम्हारे वनगमनका समाचार सुन रही हूँ। भला, मुझसे अधिक अभागिनी और कौन होगी ॥ ३ ॥ हे राम ! तुम्हारा मुखारविन्द न देखनेपर तो मुझे एक-एक निमेष युगके समान बीतता है; अब यदि (चौदह) वर्ष बीतनेपर भी यह शरीर रह गया तो बेटा ! बलिहारी जाऊँ, इसकी तुम्हारे प्रति क्या प्रीति समझी जायगी;' ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, माताको इस प्रकार व्याकुल देख श्रीहरि प्रेम से अधीर हो गये। उनका कण्ठ भर आया, नेत्रों से जल बहने लगा और उन्होंने बार-बार शीघ्र ही लौट आनेके लिये कहा ॥ ५ ॥ राग बिलावल [ ५ ] रहहु भवन हमरे कहे, कामिनि । सादर सासु-चरन सेवहु नित, जो तुम्हरे अति हित, गृह-स्वामिनि ॥१॥ राजकुमारि ! कठिन कंटक मग, क्यों चलिहौ मृदु पद गजगामिनि । दुसह बात, बरषा, हिम, आतप कैसे सहिहौ अगनित दिन जामिनि ॥२॥ हौं पुनि पितु-आग्या प्रमान करि ऐहौं बेगि सुनहु द्युति-दामिनि । तुलसिदास प्रभु-बिरह-बचन सुनिसहिन सकी, मुरछित भई भामिनि ॥३॥
१७६ अयोध्याकाण्ड [फिर सीताजीको साथ चलनेके लिये हठ करती देख भगवान् रामने कहा—] हे प्रिये ! हमारे कहनेसे तुम घर ही रहो । हे गृहस्वामिनी ! तुम सासके चरणोंकी सर्वदा आदरपूर्वक सेवा करो, यह तुम्हारे लिये अत्यन्त भली बात होगी ॥ १ ॥ हे राजकुमारि ! वनका मार्ग बड़ा ही कठिन और कण्टकाकीर्ण हैं। हे गंजगामिनि ! तुम अपने कोमल चरणो से उसपर कैसे चल सकोगी ; अगणित दिन और रात्रियों तक तुम दुःसह वायु, वर्षा शीत और घाम कैसे सहन कर सकोगी ; ॥ २ ॥ हे विद्युत्कान्तिमयि ! मैं भी पिताजीकी आज्ञाका पालन कर शीघ्र ही लौट आऊँगा।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये वियोगसूचक वचन सुनकर सीताजी उन्हें सह न सकीं और मूर्च्छित हो गयीं ॥ ३ ॥ [ ६ ] कृपानिधान सुजान प्रानपति, संग बिपिन ह्वै आवौंगी। गृहतेँ कोटि-गुनित सुख मारग चलत, साथ सचु पावौंगी ॥ १ ॥ थाके चरनकमल चापौंगी, श्रम भए बाउ डोलावौंगी। नयन-चकोरनि मुखमयंक-छबि सादर पान करावौंगी ॥ २ ॥ जौ हठि नाथ राखिहौ मोकहँ, तौ सँग प्रान पठावौंगी। तुलसिदास प्रभु बिनु जीवत रहि क्यों फिरि बदन देखावौंगी ? ॥ ३ ॥ [सीताजी कहने लगीं—] 'मैं अपने कृपानिधान सुजान- शिरोमणि प्राणनाथके साथ वनमें रह आऊँगी। मार्गमें आपके साथ चलते हुए सचमुच घरसे भी करोड़ों गुना सुख पाऊँगी ॥ १ ॥ जब आप थक जायँगे तो मैं आपके चरणकमल दबाऊँगी और श्रम मालूम होनेपर हवा करूँगी तथा अपने नेत्ररूप चकोरोंको आपके
गीतावली १८९ मुखचन्द्रकी छवि आदरपूर्वक पान कराऊँगी ॥ २ ॥ और हे नाथ ! यदि आप हठपूर्वक मुझे यहीं छोड़ जायँगे तो मैं लाचार होकर अपने प्राणोंको ही आपके साथ भेज दूँगी; क्योंकि आपके चले जानेपर फिर प्रभुके बिना जीवित रहकर मैं अपना मुख कैसे दिखाऊँगी;' ॥ ३ ॥ [ ७ ] कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काजु ? बिपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो पै पिय परिहरयो राजु ॥ १ ॥ बलकल बिमल दुकूल मनोहर, कंद-मूल-फल अमिय नाजु । प्रभुपद कमल बिलोकिहैं छिन छिन, इहितें अधिक कहा सुख-समाजु ? ॥ २ ॥ हौं रहौं भवन भोग लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनिको साजु । तुलसिदास ऐसे बिरह-बचन सुनि कठिन हियो बिहरो न आजु ॥ ३ ॥ 'कहिये, भला आपके बिना इस घरमें मेरा क्या काम है; जब प्रियतमने राज्य त्याग दिया तब मेरे लिये वन ही करोड़ों स्वर्गलोकोंके समान है ॥ १ ॥ मुझे तो वल्कल ही अति मनोहर और निर्मल दुकूल होगा और कन्द-मूल-फल ही अमृतमय अन्न होगा । अहा ! मेरे नेत्र क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंका दर्शन करेंगे—इससे अधिक और क्या सुखकी सामग्री होगी; ॥ २ ॥ हाय ! मैं तो भोगकी लालसासे राजभवनमें रहूँ और पतिदेव वनमें मुनियोंके ठाटसे निवास करें—ऐसे विरहसूचक वचनोंको सुनकर भी आज मेरा कठोर हृदय क्यों विदीर्ण नहीं हो जाता;' ॥ ३ ॥ [ ८ ] प्रिय निठुर बचन कहे कारन कवन ? जानत हौ सबके मनकी गति, मृदुचित परम कृपालु, रवन ! ॥१॥
अयोध्याकाण्ड १८१ प्राननाथ सुंदर सुजानमनि, दीनबंधु, जग-आरति-दवन । तुलसिदास प्रभु-पदसरोज तजि रहि हौं कहा करौंगी भवन ? ॥२॥ 'हे प्राणनाथ ! आज आपने ऐसे कठोर वचन किस कारणसे कहे ; हे रमण ! आप मृदुचित और परम कृपालु हैं; आप सबके मनकी गति जानते हैं ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! हे सुन्दर ! हे सुजान- शिरोमणि ! हे दीनबन्धु ! हे जगत्का दुख दूर करनेवाले ! आपके चरणकमलोंको त्यागकर मैं घरमें रहकर क्या करूँगी ; ॥ २ ॥ [ ९ ] मैं तुमसों सतिभाव कही है । बूझति और भाँति भामिनि कत, कानन कठिन कलेस सही है ॥१॥ जौ चलिहौ तौ चलो चलिकै बन, सुनि सिय मन अवलंब लही है । बूड़त बिरह-बारिनिधि मानहु नाह बचनमिस बाँह गही है ॥२॥ प्राननाथके साथ चलीं उठि, अवध सोकसरि उमगि बही है । तुलसी सुनी न कबहुँ काहु कहूँ, तनु परिहरि परिछाँहि रही है ॥३॥ [भगवान् राम बोले—] 'प्रिये ! मैंने तो तुमसे सच्चे मनसे कहा है; तुम इस प्रकार और तरह क्यों समझती हो ; वनमें सच- मुच ही बहुत क्लेश है ॥ १ ॥ यदि तुम चलना ही चाहती हो तो चलो, वनके लिये तैयार हो जाओ ।' यह सुनकर सीताजीके चित्तको सहारा मिल गया, मानो विरहरूप समुद्रमें डूबते-डूबते इस वचनके मिषसे ही पतिदेवने उनकी बाँह पकड़ ली ॥ २ ॥ वे उठकर प्राणनाथके साथ चल दीं । इस समय अयोध्यामें शोककी सरिता उमड़कर बहने लगी । तुलसीदास कहते हैं, यह तो कभी किसीने कहीं नहीं सुना कि शरीरको छोड़कर परछाईं रही हो
गीतावली १८२ (फिर इस समय भगवान् रामको छोड़कर श्रीसीताजी कैसे रह सकती थीं ? ! ॥ ३ ॥ [ १० ] जबहि रघुपति-सँग सीय चली। बिकल-बियोग लोग-पुरतिय कहैं, अति अन्याउ, अली ॥ १ ॥ कोउ कहै, मनिगन तजत काँच लगि, करत न भूप भली। कोउ कहै, कुल कुबेलि कैकेयी दुख-बिष-फलनि फली ॥ २ ॥ एक कहैं, बन जोग जानकी ! बिधि बड़े बिषम बली। तुलसी कुलिसहुकी कठोरता तेहि दिन दलकि दली ॥ ३ ॥ जिस समय भगवान् रामके साथ सीताजी भी चलीं उस समय नगर के नर-नारी वियोगव्यथासे व्याकुल होकर कहने लगे—'अरी आली ! यह तो बड़ा अन्याय हो रहा है' ॥ १ ॥ कोई कहने लगे— 'राजा ने अच्छा नहीं किया। वे काँचके लिये मणियोंको त्याग रहे हैं।' कोई बोले—'कैकेयी कुलके लिये कुवेल (बुरी बेल) रूप है, जो इस समय दुःखरूप विषमय फलोंसे फली है' ॥ २ ॥ किसीने कहा—'विधाता भी बड़ा ही विषम और बलवान् है। भला ! जानकी क्या वनके योग्य हैं ;' तुलसीदासजी कहते हैं, उस दिन तो वज्रकी कठोरता भी तड़ककर नष्ट हो गयी ॥ ३ ॥ [ ११ ] ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे। उर धकधकी, न कहत कछुसकुचनि,प्रभु परिहरतसबनि तृन तोरे ॥ १ ॥ कृपासिंधु अवलोकि बंधु तन, प्रान-कृपान बीर-सी छोरे। तात बिदा माँगिए मातुसों, बनि है बात उपाइ न औरे ॥ २ ॥
१८३ अयोध्याकाण्ड जाइ चरन गहि आयसु जांची, जननि कहत बहुभांति निहोरे । सिय-रघुबर-सेवा सुचि ह्वैहौ तौ जानिहौं, सही सुत मोरे ॥३॥ कीजहु इहै बिचार निरंतर, राम समीप सुकृत नंहि थोरे । तुलसी सुनि सिष चले चकित-चित उड़यो मानो बिहग बधिक भए भोरे ॥४॥ श्रीलक्ष्मणजी करकमल जोड़े हुए खड़े हैं। उनके हृदयमें धकधकी लगी हुई है, संकोचवश कुछ कहते नहीं। बस, यही सोचते हैं—] 'हाय ! इस समय तो प्रभु सभीको तृण तोड़कर त्याग रहें हैं [न जाने, इस सेवकको भी साथ लेंगे या नहीं ; ] ॥ १ ॥ कृपासागर भगवान् रामने भाईको वीरोंके समान प्राणरूप कृपाण निकाले हुए देख [अर्थात् वीर जैसे तलवार खोले खड़े रहते हैं इसी तरह लक्ष्मणजीको प्राण निछावर करनेके लिये उद्यत देख । ] उनसे कहा—'भैया ! मातासे विदा माँग आओ, इसके सिवा किसी और तरह बात नहीं बन सकेगी' ॥ २ ॥ जब लक्ष्मणने जाकर माताके चरण पकड़कर उनसे आज्ञा माँगी, तब माताने लक्ष्मणजीसे बहुत निहोरा करके कहा—'यदि तुम राम और सीताकी सेवा करके पवित्र होगे तभी मैं तुम्हें अपना सच्चा पुत्र जानूंगी ॥ ३ ॥ तुम बारम्बार यह विचार करना कि रघुनाथजीके पास रहना कोई कम पुण्यकी बात नहीं है।' तुलसीदास कहते हैं, माता की शिक्षा सुन लक्ष्मणजी इस प्रकार चकितचित्त होकर चले जैसे वधिकको असावधान देखकर पक्षी उड़ जाता है ॥ ४ ॥ राग सोरठा [ १२ ] मोको बिधुबदन बिलोकन दीजै । राम लषन मेरी यहैं भेंट, बलि, जाउ, जहाँ मोहि मिलि लीजै ॥१॥
गीतावली १८४ सुनि पितु-बचन चरन गहे रघुपति, भूप अंक भरि लीन्हें। अजहुँ अवनि बिदरत दरार मिस सो अवसर सुधि कीन्हें ॥२॥ पुनि सिर नाइ गवन कियो प्रभु, मुरछित भयो भूप न जाग्यो। करम-चोर नृप-पथिक मारि मानो राम-रतन लै भाग्यो ॥३॥ तुलसी रबिकुल-रबि रथ चढ़ि चले तकि दिसि दखिन सुहाई। लोग नलिन भए मलिन अवध-सर, बिरह विषम हिम पाई ॥४॥ [ भगवान्को वनकी ओर जाते सुन महाराज दशरथ कहने लगे—] 'हे राम-लक्ष्मण ! मुझे अपना मुखचन्द्र देख लेने दो। अब मेरा तो यहाँकी अन्तिम भेंट है। मैं बलिहारी जाता हूँ, जहाँ भी जाओ, मुझसे मिलकर जाना' ॥ १ ॥ पिताके ये वचन सुन रघुनाथजीने उनके चरण पकड़ लिये। तब राजाने भी उन्हें छातीसे लगा लिया। उस अवसरकी याद आनेपर तो आज भी पृथ्वी दरारके मिससे विदीर्ण हो जाती है ॥ २ ॥ फिर प्रभुने सिर नवाकर वनके लिये प्रस्थान किया। उस समय महाराज मूर्च्छित हो गये और उन्हें फिर चेतना न हुई, मानो कर्मरूप चोर राजारूप पथिकको मारकर उसका रामरूप रत्न लेकर भाग गया ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, तदनन्तर भानुकुल-भानु भगवान् राम रथपर आरूढ़ हो अति सुहावनी दक्षिणदिशाको चले। उस समय प्रभुका विरहरूप विषम हिम पाकर आयोध्यारूप सरोवरके पुरजनरूप कमल मुरझा गये ॥ ४ ॥ वनके मार्गमें राग बिलावल [ १३ ] कहौँ सो बिपिन हैं धौं केतिक दूरि। जहाँगवनकियो, कुँवरकोसलपति, बूझतिसिय पिय पतिहि बिसूरि ॥१॥
१८५ अयोध्याकाण्ड प्राननाथ परदेस पयादेहि चले सुख सकल तजे तृन तूरि । करौं बयारि, बिलंबिय बिटपतर, झारौं हौं चरन-सरोरुह-धूरि ॥२॥ तुलसिदास प्रभु प्रियाबचन सुनि नीरजनयन नीर आए पूरि । कानन कहां अबहिं सुनु सुंदरि, रघुपति फिरि चितए हित भूरि ॥३॥ (मार्गमें थक जानेसे) श्रीजानकीजी चिन्तित होकर भगवान् रामसे पूछती हैं—'हे कोसलराजकुमार ! आपने जहांके लिये प्रस्थान किया है वह वन यहाँसे कितनी दूर है; ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! आपने सब सुखोंको तृण तोड़कर त्याग दिया (सुखोंसे एकदम सम्बन्ध त्याग कर दिया) और अब परदेशको पैदल ही जा रहे हैं। (आप थक गये होंगे) कुछ देर इस वृक्षके नीचे विश्राम कीजिये; मैं आपको हवा करूँगी और चरणकमलोंकी धूलि झाड़ूँगी' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, प्रियाके ये वचन सुनकर प्रभुके नेत्रकमलोंमें जल भर आया; और 'अरि सुन्दरि ! अभी वन कहाँ ;' ऐसा कहकर उनकी ओर अत्यन्त प्रीतिपूर्वक निहारा ॥ ३ ॥ [ १४ ] फिरि फिरि राम सीय तनु हेरत । तृषित जानि जल लेन लषन गए, भुज उठाइ ऊँचे चढ़ि टेरत ॥१॥ अवनि कुरंग, बिहंग द्रुम-डारन रूप निहारत पलक न प्रेरत । मगन न डरत निरखि कर-कमलनि सुभग सरासन सायक फेरत ॥२॥ अवलोकत मग-लोग चहुँ दिसि, मनहु चकोर चंद्रमहि घेरतः । ते जन भूरिभाग भूतलपर तुलसी राम-पथिक-पद जे रत ॥३॥ भगवान् राम मुड़-मुड़कर सीताजीकी ओर देखते हैं। उन्हें प्यासी जानकर लक्ष्मणजी जल लेने गये, तब भगवान् ऊँचे टीलेपर
गीतावली १८६ चढ़कर उन्हें भुजा उठाकर पुकारते हैं ॥ १ ॥ पृथ्वीपर मृग और वृक्षोंकी डालियोंपर पक्षी प्रभुका रूप-लावण्य देख रहे हैं—वे पलक भी नहीं मारते और प्रभुको अपने धनुष-बाणपर कर-कमल फेरते देखकर भी भय नहीं मानते—प्रेममें मग्न हो रहे हैं॥ २ ॥ मार्गमें लोग चारों दिशाओंसे देख रहे हैं, मानो चकोर पक्षी चन्द्रमाको घेरे हुए हों। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग बटोही रामके चरणोंमें रत हैं, वे पृथ्वीपर बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ३ ॥ [ १५ ] नृपति-कुंवर राजत मग जात । सुंदर बदन, सरोरुह-लोचन, मरकत-कनकबर न मृदु गात ॥१॥ अंसनि चाप, तून कटि मुनि पट, जटामुकुट बिच नूतन पात । फेरत पानि सरोजनि सायक, चोरत चितहि सहज मुसुकात ॥२॥ संग नारि सुकुमारि सुभग सुठि, राजति बिन भूषन नव सात । सुखमा निरखि ग्राम-बनितनिके नलिन-नयन बिकसित मनो प्रात ॥३॥ अंग-अंग अगनित अनंग-छबि, उपमा कहत सुकबि सकुचात । सिय समेत नित तुलसिदास चित, बसत किसोर पथिक दोउ भ्रात ॥४॥ मार्गमें जाते हुए राजकुमार बड़े ही शोभायमान हो रहे हैं। उनका सुन्दर मुखमण्डल है, कमलके समान नेत्र हैं तथा मरकतमणि और सुवर्णके-से रंगके मृदुल शरीर हैं ॥ १ ॥ वे कन्धोंपर धनुष रखे हुए हैं, कमरमें तरकस और मुनिजनोचित वस्त्र हैं, सिरपर जटा-जूटका मुकुट है, जिसमें बीच-बीचमें नवीन पत्ते खोंसे हुए हैं। वे धनुषपर अपना करकमल फेर रहे हैं और स्वभावसे मुसकराते ही चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २ ॥ उनके साथमें सोलहों शृङ्गार किये
१८७ अयोध्याकाण्ड बिना ही एक अति सुन्दरी सुकुमारी स्त्री शोभायमान है। उनकी शोभा देखते ही ग्रामीण स्त्रियोंके नेत्रकमल प्रातःकालीन कमलोंके समान खिल उठते हैं॥ ३॥ उनके अङ्ग-अङ्गमें अगणित कामदेवोंकी शोभा है, उसकी उपमा कहनेमें अच्छे-अच्छे कवि भी संकोच मानते हैं। तुलसीदासके हृदयमें तो सीताजीके सहित वे किशोर अवस्थावाले बटोही दोनों भाई सर्वदा विराजमान रहते हैं॥ ४॥ [ १६ ] तू देखि देखि री ! पथिक परम सुंदर दोऊ। मरकत-कलधौत-बरन, काम-कोटि-कांतिहरन, चरन-कमल कोमल अति, राजकुँवर कोऊ ॥ १ ॥ करसर-धनु, कटि निषंग, मुनिपट सोहैं सुभग अंग, संग चंद्रबदनि बधू, सुंदरि सुठि सोऊ। तापस बर बेष किए, सोभा सब लूटि लिए, चितके चोर, बय किसोर, लोचन भरि जोऊ ॥ २ ॥ दिनकर-कुलमनि निहारि प्रेम-मगन ग्राम-नारि, परस्पर कहैं, सखि ! अनुराग ताग पोऊ। तुलसी यह ध्यान-सुधन जानि मानि लाभ सघन, कृपिन ज्यों सनेह सो हिये-सुगेह गोऊ ॥ ३ ॥ [कोई ग्रामीण स्त्री कहती है—] 'अरी सखि ! तू देख तो ये दोनों पथिक बड़े ही सुन्दर हैं। ये मरकत और सुवर्णके समान स्याम एवं गौरवर्ण हैं, करोड़ों कामदेवोंकी कान्तिको हरनेवाले हैं तथा इनके चरण-कमल अत्यन्त कोमल हैं। जान पड़ता है—ये कोई राजकुमार हैं ॥ १ ॥ इनके हाथोंमें धनुष-बाण हैं, कमरमें
गीतावली १८८ तरकस है तथा सुन्दर शरीरमें मुनिजनोचित वस्त्र शोभायमान है। इनके साथ एक चन्द्रमुखी स्त्री है, वह भी बड़ी ही सुन्दरी है। इन्होंने तपस्वियोंका-सा सुन्दर वेष धारणकर मानो सारी शोभा लूट ली है। इस किशोर अवस्थावाले चित्तचोरोंको तनिक नेत्र भरकर देख ले' ॥ २ ॥ तब सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामको देख- कर सब ग्राम-नारियाँ प्रेममें मग्न हो गयीं और आपसमें कहने लगीं— 'अरि सखि ! इन मणियोंको प्रेमरूप तागेमें पिरो लो'। तुलसीदास कहते हैं, इस ध्यानको शुभ धन जानकर और इसे ही बड़ा भारी लाभ समझकर तू कृपणके समान प्रेमपूर्वक अपने हृदयरूप घरमें छिपाकर रख ॥ ३ ॥ [ १७ ] कुँवर साँवरो, री सजनी ! सुंदर सब अंग। रोम रोम छबि निहारि आलि वारि फेरि डारि, कोटि भानु-सुवन सरद-सोम, कोटि अनंग ॥ १ ॥ बाम अंग लसत चाप, मौलि मंजु जटा-कलाप, सुचि सर कर, मुनिपट कटि-तट कसे निषंग। आयत उर-बाहु नैन, मुख-सुखमाको लहै न, उपमा अवलोकि लोक, गिरामति-गति भंग ॥ २ ॥ यों कहि भईं मगन बाल, बिथकीं सुनि जुवति-जाल, चितवत चले जात संग, मधुप-मृग-बिहंग। बरनौं किमि तिनकी दसहि, निगम-अगम प्रेम-रसहि, तुलसी मन-बसन रँगे रुचिर रूपरंग ॥ ३ ॥ 'अरि सखि ! यह साँवला कुमार तो सभी अङ्गोंसे सुन्दर है। अरी आली ! इनकी रोम-रोम की छवि देखकर इनपर करोड़ों
१८६ अयोध्याकाण्ड अश्विनीकुमार, शरद्ऋतुके चन्द्रमा और कामदेव निछावर कर दे॥१॥ इनके वामभागमें धनुष शोभायमान है, सिरपर मनोहर जटाजूट है, हाथमें सुन्दर बाण है तथा कटिप्रदेशमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस कसे हुए हैं। इनके वक्षःस्थल, भुजाएँ और नेत्र विशाल हैं तथा मुखकी शोभा तो कोई भी नहीं पा सकता। संसारमें इनकी उपमा देखते-देखते तो सरस्वतीकी बुद्धिकी भी गति नष्ट हो गयी है'॥२॥ ऐसा कहकर ग्रामकी बालाएँ भगवान्की रूपराशिमें डूब गयीं तथा उनकी बातें सुनकर नवयुवतियाँ थकी-सी रह गयीं। भौंरे, मृग और पक्षिगण तो प्रभुको निहारते हुए उन्हींके संग हो लिये। तुलसीदास कहते हैं, उनके शरीरकी दशा तथा वेदके लिये भी अगम्य प्रेमरसका मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके मनरूप वस्त्र प्रभुके अति रुचिर रूप-रंगमें रँग गये ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ १८ ] देखु, कोऊ परम सुंदर सखि ! बटोही । चलत महि मृदु चरन अरुन-बारिज-बरन, भूपसुत रूपनिधि निरखि हौं मोही ॥ १ ॥ अमल मरकत स्याम, सील-सुखमा-धाम, गौरतनु सुभग सोभा सुमुखि जोही । जुगल बिच नारि सुकुमारि सुठि सुंदरी, इंदिरा इंदु-हरि मध्य जनु सोही ॥ २ ॥ करनि बर धनु तीर, रुचिर कटि तूनीर, बीर, सुर-सुखद, मरदन अवनि-द्रोही ।
गीतावली १६० अंबुजायत नयन, बदन-छबि बहु मयन, चारु चितवनि चतुर लेति चित पोही ॥ ३ ॥ बचन प्रिय सुनि श्रवन राम करुनाभवन, चितए सब अधिक हित सहित कछु ओही । दास तुलसी नेह-बिबस बिसरी देह, जानि नहि आपु तेहि काल धौं को ही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! देख तो कोई बड़े ही सुन्दर बटोही राजकुमार अपने अरुणकमलवत् कोमल चरणोंसे पृथ्वीपर पैदल जा रहे हैं ; उन रूपनिधानको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ अरी सुमुखि ! मैंने उनके शील और सुषमाके आगार, स्वच्छ मरकतमणि- के समान श्याम तथा अति सुन्दर गोरे शरीरोंकी शोभा देखी है । उन दोनोंके बीचमें एक परम लावण्यमयी और सुन्दरी सुकुमारी नारी है, मानो चन्द्रमा और श्रीहरिके मध्यमें साक्षात् लक्ष्मीजी ही विराजमान हों ॥ २ ॥ उनके करकमलोंमें मनोहर धनुष-बाण हैं और कमरमें सुन्दर तरकस है । वे बड़े ही धीर, देवताओंको सुख देनेवाले और पृथ्वीके द्रोहियोंका दमन करनेवाले हैं । उनके नयन कमलदलके समान विशाल और मुखकी कान्ति अनेकों कामदेवोंके सदृश है तथा वे परम चतुर अपनी चारु चितवनसे सबके चित्तोंको आकर्षित कर लेते हैं' ॥ ३ ॥ उनके ये प्रिय वचन कानोंमें पड़ते ही करुणा-अयन भगवान् रामने उनकी ओर कुछ और भी अधिक प्रीतिसे देखा । तुलसीदासजी कहते हैं, तब प्रेमसे अधीर हो जानेके कारण उन्हें अपनी शरीरकी सुधि जाती रही और उस समय किसीको अपना भी ज्ञान न रहा ॥ ४ ॥
१६१ अयोध्याकाण्ड राग केदारा [ १९ ] सखि ! नीके कै निरखि, कोऊ सुठि सुंदर बटोही । मधुर मूरति मदनमोहन जोहन-जोग, बदन सोभासदन, देखि हौं मोही ॥ १ ॥ साँवरे-गोरे किसोर, सुर-मुनि-चित्त-चोर, उभय-अंतर एक नारि सोही। मनहु बारिद-बिधु बीच ललित अति, राजति तड़ित निज सहज बिछोही ॥ २ ॥ उर धीरजहि धरि, जनम सफल करि, सुनहि सुमुखि ! जनि बिकल होही। को जाने, कौने सुकृत लह्यो है लोचन-लाहु, ताहितैं बारहि बार कहति तोही ॥ ३ ॥ सखिहि सुसिख दई, प्रेम-मगन भई, सुरति बिसरि गई आपनी ओही। तुलसी रही है ठाढ़ी पाहन गढ़ी-सी काढ़ी, कौन जाने, कहाँतें आई, कौनकी कोही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! तनिक अच्छी तरह देख, कोई बड़े ही सुन्दर बटोही जा रहे हैं । देख, कामदेवको भी लुभानेवाली इनकी मधुर मूर्ति देखने ही योग्य है । इनके शोभामय मुखमण्डलको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ ये साँवरे-गोरे किशोरवयस्क बालक देवता और मुनियोंके भी चित्तको चुरानेवाले हैं। इन दोनोंके बीचमें एक सुन्दरी बाला सुशोभित है, मानो मेघ और चन्द्रमाके मध्यमें अति ललित विद्युत् अपना स्वभाव (चंचलता) छोड़कर विराज रही
गीतावली १६२ हो ॥ २ ॥ अरी सखि ! मैं जो कुछ कहती हूँ वह सुन, व्याकुल मत हो और चित्तमें धैर्य धारण कर अपना जन्म सफल कर ले। कौन जाने, आज किस पुण्यके प्रतापसे हमें यह नेत्रोंका लाभ मिला है; इसीसे मैं तुझसे बारंबार कह रही हूँ ॥ ३ ॥ इस प्रकार सखीको सुशिक्षा दे वह प्रेममें डूब गयी और उसे अपनी सुधि जाती रही। तुलसीदास कहते हैं, फिर तो वह पत्थरमें गढ़कर काढ़ी हुई (मूर्ति) के समान ज्यों-की-त्यों खड़ी रह गयी। फिर यह कौन जाने कि वह कहाँसे आयी थी और किसकी कौन लगती थी ? ॥ ४ ॥ [ २० ] माई ! मनके मोहन जोहन-जोग जोही। थोरी ही बयस गोरे-सांवरे सलोने लोने, लोयन ललित, बिधुबदन बटोही ॥ १ ॥ सिरनि जटा-मुकुट मंजुल सुमनजुत, तैसिये लसति नव पल्लव खोही। किये मुनि-बेष बीर, घरे धनु-तून-तीर, सोहैं मग, को हैं, लखि परै न मोही ॥ २ ॥ सोभाको सांचो सँवारि रूप जातरूप, ढारि नारि बिरची बिरंचि, संग सोही। राजत रुचिर तनु सुंदर धमके कन, चाहे चकचौंधी लागे, कहौं का तोही ? ॥ ३ ॥ सनेह-सिथिल सुनि बचन सकल सिया, चितई अधिक हित सहित ओही। तुलसी मनहु प्रभु-कृपाकी मूरति फिरि हेरि कै हरषि हिये लियो है पोही ॥ ४ ॥
१६३ अयोध्याकाण्ड अरी माई ! वे मनमोहन वे देखने ही योग्य हैं; आज मैंने उन्हें देखा है। उनकी थोड़ी ही अवस्था है और वे परम सुन्दर साँवले- गोरे, सुन्दर नेत्रवाले, चन्द्रमुख बटोही नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले हैं ॥ १ ॥ उनके सिरपर सुन्दर पुष्पोंके सहित जटाओंका मुकुट है और वैसे ही नवीन पत्तोंकी खोही (पत्तोंका बना हुआ छाता) भी है। वे वीरश्रेष्ठ मुनियोंका वेष बनाये, धनुष-बाण और तरकस धारण किये मार्गमें शोभायमान हैं। वे हैं कौन—यह मैं नहीं जानती ॥ २ ॥ विधाताने शोभाका साँचा और रूपका सुवर्ण बनाकर जो एक स्त्री ढाली है वही उनके साथ शोभायमान है। उनके सुन्दर शरीरपर पसीनेकी सुहावनी बूंदें विराजती हैं। तुझसे क्या कहूँ, उन्हें देखकर आँखोंमें चकाचौंध हो जाती है ॥ ३ ॥ उसके ये सारे वचन सुन सीताजी स्नेहसे शिथिल हो गयीं और उसकी ओर विशेष प्रेमसे देखा। तुलसीदास कहते हैं, मानो प्रभुकृपाकी मूर्तिने उसकी ओर घूमकर प्रसन्नतापूर्वक देखकर उसका हृदय अपनेमें ही अटका लिया है (जिससे अब वह अन्यत्र नहीं जा सकता) ॥ ४ ॥ [ २१ ] सखि ! सरद-बिमल-बिधुबदनि बधूटी । ऐसी ललना सलोनी न भई, न है, न होनी, रत्यो रची बिधि जो छोवत छबि छूटी ॥ १ ॥ साँवरे गोरे पथिक बीच सोहति अधिक, तिहुँ त्रिभुवन-सोभा मनहु लूटी । तुलसी निरखि सिय प्रेमबस कहैं तिय, लोचन-सिसुन्ह देहु अमिय घूटी ॥ २ ॥ गी० १३—
गीतावली १६४ 'अरी सखि ! यह बहू तो शरत्कालीन निर्मल चन्द्र के समान सुन्दर मुखवाली है। ऐसी सुन्दर स्त्री तो न पहले हुई, न है और न आगे ही होगी। विधाताने रतिको भी, इसे सुधारते समय जो छबि रह गयी थी, उसीसे रचा है ॥ १ ॥ यह इन साँवले-गोरे पथिकोंके बीचमें और भी अधिक शोभायमान होती है, मानों इन तीनोंने मिलकर तीनों लोकोंकी शोभा लूट ली हो।' तुलसीदासजी कहते हैं, सीताको देखकर स्त्रियाँ प्रेमके वशीभूत होकर कहती हैं— 'अरी ! अपने नेत्ररूप बालकों यह अमृतमयी घुट्टी पिलाओ' ॥ २ ॥ [ २२ ] सोहैं साँवरे पथिक, पाछे ललना लोनी। दामिनि-बरन गोरी, लखि सखि तृन तोरी, बीती हैं बय किसोरी, जोबन होनी ॥ १ ॥ नीके कै निकाई देखि, जनम सफल लेखि, हम-सी भूरि-भागिनि नभ न छोनी। तुलसी-स्वामी-स्वामिनि जोहे मोही हैं भामिनि, सोभा-सुधा पिए करि अँखिया दोनी ॥ २ ॥ साँवले पथिकके पीछे यह अति सुन्दरी ललना शोभायमान है। यह बिजलीके समान गौरवर्ण है। देखकर सखियाँ तृण तोड़ती और कहती हैं—'इसकी किशोरावस्था तो बीत चुकी है, अब यौवन आनेवाला है। ॥१॥ इसकी सुन्दरताको अच्छी तरह देखकर अपना जन्म सफल समझो। हमारे समान बड़भागिनी स्त्रियाँ तो स्वर्गमें अथवा पृथ्वीपर कहीं भी नहीं हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, स्वामी और स्वामिनीजीको देखकर ग्रामोंकी स्त्रियाँ उनके सौन्दर्य- सुधा-को नेत्ररूप दोनोंसे पीकर मोहित हो रही हैं ॥ २ ॥
१६५ अयोध्याकाण्ड [ २३ ] पथिक गोरे-सांवरे सुठि लोने। संग सुतिय, जाके तनुतें लही है द्युति सोन सरोरुह सोने॥ १ ॥ बय किसोर-सरि-पार मनोहर बयस-सिरोमनि होने। सोभा-सुधा आलि ! अँचवहु करि नयन मंजु मृदु दोने॥ २ ॥ हेरत हृदय हरत, नहि फेरत चाह बिलोचन कोने। तुलसी प्रभु किधौं प्रभुको प्रेम पढ़े प्रगट कपट बिनु टोने॥ ३ ॥ 'ये सांवले-गोरे पथिक बड़े ही सुन्दर और सुहावने हैं इनके साथ एक सुन्दर स्त्री है जिसके शरीरसे अरुणकमल और सुवर्णने भी कान्ति पायी है॥ १ ॥ किशोरावस्थारूप सरिताको पाकर अब 'ये आयुशिरोमणि युवावस्थामें प्रवेश करनेवाले हैं। अरी आली ! अपने नेत्रोंको मनोहर और मृदुल दोनों बनाकर इनकी छबिरूप अमृतका पान करो॥ २ ॥ ये देखते ही हृदय हर लेते हैं और मनोहर नेत्र कोने नहीं फेरते।' तुलसीदास कहते हैं कि प्रभु अथवा प्रभुका प्रेम तो किसी प्रकारका दुराव न रखकर स्पष्ट ही टोना पढ़ता है॥३॥ [ २४ ] मनोहरताके मानो ऐन। स्यामल-गोर किसोर पथि दोउ, सुमुखि ! निरखु भरि नैन॥ १ ॥ बीच बधू बिधुबदनि बिराजति, उपमा कहुँ कोऊ है न। मानहु रति ऋतुनाथ सहित मुनिबेष बनाए है मैन॥ २ ॥ किधौं सिंगार-सुखमा-सुप्रेम मिलि चले जग-चित-बित लैन। अदभुत त्रयी किधौं पठई है बिधि मग-लोगन्हि सुख दैन॥ ३ ॥ सुनि सुचि सरल सनेहु सुहावने ग्रामबधुन्हके बैन। तुलसी प्रभु तरु तर बिलंबे, किये प्रेम कनौड़े कें न ? ॥ ४ ॥
'अरी सखि ! तनिक नेत्र भरकर देख, ये दोनों श्याम-गौर किशोर-वयस्क पथिक तो मानो मनोहरताके आश्रय ही हैं ॥ १ ॥ इनके बीचमें एक चन्द्रमुखी स्त्री विराज रही है, जिसकी कहीं कोई भी उपमा नहीं है, मानो रति और ऋतुराज बसन्तके सहित साक्षात् कामदेव ही मुनिवेश धारण किये हों ॥ २ ॥ अथवा शृङ्गार, सुन्दरता और सुप्रेम ही आपसमें मिलकर संसारका चित्तरूप धन हरण करने- के लिये तो नहीं चले, किंवा विधाताने अद्भुतत्रयी (वशीकरण, आकर्षण और मोहनी) को ही मार्गस्थ लोगोंको सुख देनेके लिये भेजा है' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ग्रामवधुओंके ये पवित्र, सरल, स्नेहमय, सुहावने वचन सुनकर प्रभु एक वृक्षके नीचे ठहर गये, क्योंकि प्रेम करनेपर वे किसके कनौड़े नहीं हो जाते ॥ ४ ॥ [ २५ ] बय किसोर गोरे साँवरे धनुबान धरे हैं। सब अँग सहज सोहावने, राजिव जिते नैननि-बदननि बिधु निदरे हैं॥ १ ॥ तून - सुमुनिपट कटि कसे, जटामुकुट करे हैं। मंजु मधुर मृदुमूरति, पानह्रों न पायनि, कैसे धौं पथ बिचरे हैं॥ २ ॥ उभय बीच बनिता बनी, लखि मोहि परे हैं। मदन सप्रिया सप्रिय सखा मुनि-बेष बनाए लिए मन जात हरे हैं॥ ३ ॥ सुनि जहँ तहँ देखन चले अनुराग भरे हैं। राम-पथिक छवि निरखि कैं, तुलसी, मग-लोगनि धाम- काम बिसरे हैं॥ ४ ॥
१६७ अयोध्याकाण्ड 'कुमारोंकी किशोरावस्था है, श्याम ओर गौरवर्ण हैं और धनुष- बाण धारण किये हैं। उनके सभी अङ्ग सहज शोभायुक्त हैं, नेत्रोंने कमलोंको जीत लिया है और मुख चन्द्रमाका निरादर करता है ॥ १ ॥ वे कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र तथा तरकस कसे हुए हैं और सिरपर जटाओंका मुकुट बनाये हैं। उनकी अति मञ्जुल और मधुर मृदुल मूर्ति है, पैरोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, न जाने ये किस प्रकार मार्गमें चलकर आये हैं ॥ २ ॥ दोनोंके बीचमें एक स्त्रीरत्न है, उन्हें देखकर हम तो मोहित हो गयी हैं, मानो साक्षात् कामदेव ही अपनी प्रिया रति और प्रिय सखा बसन्तके साथ मुनिवेष बनाकर हमारे चित्तको हरे लिये जाता है' ॥ ३ ॥ यह सुनकर सब लोग जहाँ-तहाँ प्रेमसे भरकर उन्हें देखनेके लिये चल दिये । तुलसीदास कहते हैं, बटोही रामकी छबि देखकर मार्गके लोग अपने घरके धंधोंको भी भूल गये हैं ॥ ४ ॥ [ २६ ] कैसे पितु-मातु, कैसे ते प्रिय-परिजन हैं ? जगजलधि ललाम, लोने लोने, गोरे-स्याम, जिन पठाए हैं ऐसे बालकनि बन हैं ॥ १ ॥ रूपके न पारावार, भूपके कुमार मुनिबेष, देखत लोनाई लघु लागत मदन हैं। सुखमाकी मूरति-सी साथ निसिनाथ-मुखी, नखसिख अंग सब सोभाके सदन हैं ॥ २ ॥ पंकज-करनि चाप, तीर-तरकस कटि, सरद-सरोजहुतें सुंदर चरन हैं।