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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

३८५ उत्तरकाण्ड [यहाँ भगवान्‌का मुख चन्द्रमा है, केशकलाप सर्पबालक हैं, उनमें गूँथे हुए फूल उनकी मणियाँ हैं और कानोंके कुण्डल दो मोर हैं] ॥ ३ ॥ उनकी भ्रूकुटि अत्यन्त सुन्दर है, माथेपर तिलक शोभायमान है तथा चिबुक, अधर और दन्तावली बड़ी ही सरस हैं। उनकी हँसी बड़ी ही मनमोहिनी तथा कपोल और नासिका बड़े ही सुघड़ हैं। ऐसा जान पड़ता है मानो [नेत्ररूप] कमलों- पर [भ्रूकुटिरूप] दो भौंरे बैठे हैं; तथा [मुखरूप] पङ्कजपर [अलकावलीरूप] भ्रमरोंको लड़ते देख [नासिकारूप] शुकने उनका बीच-बचाव किया हो ॥ ४ ॥ भगवान्‌के शरीरपर अति सुन्दर और विशद पीताम्बर तथा हृदयमें तुलसी एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे अनेक प्रकारसे बनायी हुई वनमाला शोभायमान है। जो ऐसी मालूम होती है मानो [श्यामशरीररूप] तमालवृक्षके बीचमें [वनमाला-रूप] तिरंगे शुकपक्षियोंकी मनोहर पंक्ति हो और वह [पीताम्बररूप] सुवर्णपाशके भीतर पड़ जानेसे उड़ न सकती हो ॥ ५ ॥ जो रामरूप भ्रमर श्रीशंकरके हृदयकमलमें अहर्निश निवास करते हैं और जो छलहीन पुरुषोंके मनमन्दिरमें निरन्तर बसे रहते हैं, वे सकल तापापहारी अवधविभूषण परमानन्दमूल श्रीरघुनाथजी तुलसीदासपर सर्वदा प्रसन्न रहें ॥ ६ ॥ [ ४ ] राजत रघुबीर धीर, भंजन भव-भीर, पीर- हरन सकल सरजूतीर निरखहु, सखि ! सोहैं। संग अनुज मनुज-निकर, दनुज-बल-बिभंग-करन अंग अंग छबि अनंग अगनित मन मोहैं ॥ १ ॥ गी० २५—

गीतावली ३८६ सुखमा-सुख-सील-अयन नयन निरखि निरखि नील कुंचित कच, कुंडल कल, नासिका चित पोहैं। मनहु इंदुबिंब मध्य कंज-मीन-खंजन लखि मधुप-मकर-कीर आए तकि तकि निज गौहैं॥ २ ॥ ललित गंड-मंडल, सुबिसाल भाल तिलक झलक मंजुतर मयंक-अंक, रुचिर बंक भौंहैं। अरुन अधर मधुर बोल, दसन-दमक दामिनि दुति, हुलसति हिय हँसनि चारु, चितवन तिरछैहैं। ३ ॥ कंबुकंठ, भुज बिसाल उरसि तरुन तुलसिमाल, मंजुल, मुकतावलि जुत जागति जिय जोहैं। जनु कलिंद-नंदनि मनि-इन्द्रनील-सिखर परसि धँसति लसति हंससेनि-संकुल अधिकौहैं॥ ४ ॥ दिब्यतर दुकूल भव्य नब्य रुचिर चंपक चय, चंचला-कलाप, कनक-निकर अलि ! किधौं हैं। सज्जन-चष-झष-निकेत, भूषन-मनिगन समेत, रूप-जलधि-बपुष लेत मन-गयंद बोहैं॥ ५ ॥ थकनि बचन-चातुरी, तुरीय पेखि प्रेम-मगन पग न परत इत उत, सब चकित तेहि समो हैं। तुलसिदास यह बुधि नहि कौनकी, कहाँतें आई, कौन काज, काके ढिग कौन ठाउ को हैं॥ ६ ॥ 'अरी सखि ! देख, संसारके दुःखको दूर करने सर्वतापा- पहारी धीर-वीर रघुनाथजी सरयूतटपर शोभायमान हैं। उनके साथ छोटे भाई और बहुत-से लोग-बाग हैं, वे स्वयं भी शत्रुओंकी सेनाको छिन्न-भिन्न करनेवाले हैं तथा उनके अङ्ग-अङ्गकी शोभा अगणित

३८७ उत्तरकाण्ड. कामदेवोंका मन मोह रही है ॥ १ ॥ उनके सुषमा, शील और आनन्दके भण्डार मनोहर नेत्र देखो तथा काली और घुंघराली अलकें निहारो । अहा ! इनके मनोहर कुण्डल और नासिका तो हमारे चित्तोंको अपनेमें लगाये लेते हैं; मानो चन्द्रबिम्बके मध्यमें कमल, मत्स्य और खञ्जन पक्षीको देखकर उन्हें अपने सजातीय जान भ्रमर, मकर और शुक पक्षी आये हों [यहाँ मुख चन्द्रमण्डल है, नेत्र कमल, मत्स्य और खञ्जन पक्षी हैं, अलकें भ्रमर हैं, कुण्डल मकर हैं तथा नासिका शुक है ] ॥ २ ॥ भगवान्‌के बड़े ही मनोहर कपोल हैं; अत्यन्त विशाल भालपर तिलक झलक रहा है तथा [मुखचन्द्रपर] चन्द्रमाके चिह्न [मेचकताई] के समान अत्यन्त मनोहर बाँकी भ्रुकुटियाँ हैं। प्रभुके अरुण अधर, सुमधुर बोल, विद्युच्छटाके समान दांतोंकी दमक, मनोहर मुसकान तथा तिरछी चितवन चित्तको उल्लसित कर देती हैं ॥ ३ ॥ भगवान्‌का कण्ठ शंखके समान है, भुजाएँ लंबी-लंबी हैं तथा हृदयमें मनोहर मुक्ता- वलीके सहित नवीन तुलसीकी माला शोभायमान है । उस छबिको योगिजन हृदयमें इस प्रकार देखते हैं, मानो हंसोंकी पंक्तिके सहित कलिन्दनन्दिनी यमुनाजी इन्द्रनीलमणिके शिखरको स्पर्श करती हुई नीचेको गिरती हुई अत्यन्त शोभा पा रही हों [यहाँ मोतियोंकी माला हंसोंकी पंक्ति है, तुलसीकी माला कालिन्दी है और भगवान्‌का कंधा इन्द्रनीलमणिका शिखर है] ॥ ४ ॥ अरी आली ! प्रभुका जो महामनोहर नवीन एवं दिव्य दुकूल (उपरना) है वह सुन्दर चम्पक पुष्पोंका समूह तो नहीं है । अथवा वह विद्युत् कलाप किंवा सुवर्णका समूह है । भगवान्‌का सौन्दर्यसमुद्र शरीर, जो

गीतावली ३८८ सत्पुरुषोंके नेत्ररूप मकरोंका निवास-स्थान एवं भूषणरूप रत्नराशिसे सम्पन्न है, हमारे मनरूप मतंगको अपने अन्दर डुबोये लेता है ॥५॥ उस सखीकी यह वाक्चातुरी देखकर तथा तुरीयरूप भगवान् रामको निहारकर सब सखियाँ प्रेममें डूब गयीं। उनके पैर न तो आगे पड़ते थे और न पीछे; उसय सब-की-सब चकित हो रही थीं। तुलसीदासजी कहते हैं, उन्हें यह सुवि न रही कि कौन किसकी है ? कहाँसे आयी है ? उसका क्या काम है ? किसके पास खड़ी है ? और कौन किस जगह है ? ॥ ६ ॥ [ ५ ] देखु सखि ! आजु रघुनाथ-सोभा बनी । नील-नीरद-बरन बपुष भुवनाभरन, पीत-अंबर-धरन हरन दुति-दामिनी ॥ १ ॥ सरजु मज्जन किए, संग सज्जन लिए, हेतु जापर हिये, कृपा कोमल घनी । सजनि ! आवत भवन मत्त-गजवर, गवन, लंक मृगपति ठवनि, कुँवर कोसलधनी ॥ २ ॥ सघन चिककन कुटिल चिकुर बिलुलित मृदुल, करनि बियरत चतुर, सरस सुषमा जनी । ललित अहि-सिसु-निकर मनहु ससि सन समर लरत, घरहरि करत रुचिर जनु जुग फनी ॥ ३ ॥ भाल भ्राजत तिलक, जलज लोचन, पलक, चारु भ्रू, नासिका सुभग सुक-आननी । चिबुक सुंदर, अधर अरुन, द्विज-दुति सुघर, बचन गंभीर, मृदुहास भव-भाननी ॥ ४ ॥

३८६ उत्तरकाण्ड श्रवन कुंडल बिमल गंड मंडित चपल कलित कलकांति अति भांति कछु तिन्ह तनी । जुगल कंचन-मकर मनहु बिधुकर मधुर पियत पहिचानि करि सिंधुकीरति अनी ॥ ५ ॥ उरसि राजत पदक, ज्योति रचना अधिक, माल सुबिसाल चहुँ पास बनि गजमनी । स्याम नव जलदपर निरखि दिनकर कला कौतुकी मनहुँ रही घेरि उडुगन-अनी ॥ ६ ॥ मंदिरनिपर खरी नारि आनंद-भरी, निरखि बरषहिं बिपुल कुसुम कुंकुम-कनी । दास तुलसी राम परम करुनाधाम काम-सतकोटि-मद हरत छबि आपनी ॥ ७ ॥ अरी सखि ! देख, आज रघुनाथजीकी कैसी शोभा बनी है ! उनका शरीर नीलमेघके समान कान्तिमान् तथा सम्पूर्ण लोकोंका आभूषण है, वे बिजलीकी छटाको छीननेवाला सुन्दर पीताम्बर पहने हुए हैं ॥ १ ॥ अरी सजनी ! देख, कोसलराजकुँवर रघुनाथजी सरयूमें स्नान कर साथमें बहुत-से साधुजनोंको लिये मत्त गजराजकी चालसे राजमहलको आ रहे हैं । उनके हृदयमें दीनोंके प्रति प्रेम, कृपा और अत्यन्त कोमलता है तथा उनकी कटि और ठवनि सिंहके समान है ॥ २ ॥ उनके मुखमण्डलपर घने, चिकने, टेढ़े और मुलायम बाल बिखरे हुए हैं; उन्हें परम चतुर रघुनाथजी हाथोंसे सँवारते हैं। उससे ऐसी सरस शोभा उत्पन्न होती है, मानो मनोहर सर्पशिशुओंका समूह चन्द्रमासे अमृतके लिये झगड़ रहा हो

गीतावली ३६० और उसे दो बड़े सर्प समझाते हों ॥ ३ ॥ प्रभुके मस्तकपर तिलक शोभायमान है, उनके नेत्र कमलके समान हैं, पलक तथा भ्रुकुटी बड़ी मनोहर हैं, सुन्दर नासिका साक्षात् तोतेकी चोंचके समान है, ठोड़ी बड़ी सुन्दर है, अधर अरुणवर्ण हैं, दाँतोंकी कान्ति बड़ी सुहावनी है, वाणी गम्भीर है तथा मृदुल मुसकान संसृति-संतापका शमन करनेवाली है ॥ ४ ॥ भगवान्‌के कानोंमें कुण्डल हैं, उन्होंने निर्मल कपोलोंको विभूषित कर उनपर एक और ही प्रकारकी चञ्चल और मनोहर कान्ति फैला दी है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो दो सुनहरे मकर चन्द्रमाकी सुमधुर किरणोंका पान करते हों और उससे परिचय प्राप्तकर समुद्रकी कीर्ति गा रहे हों [क्योंकि समुद्र मकरोंका निवास-स्थान और चन्द्रमाका उत्पत्तिस्थान है ] ॥ ५ ॥ देखो, इनके वक्षःस्थलपर पदिक सुशोभित है, उसकी ज्योति खूब फैली हुई है। उसके चारों ओर गजमुक्ताओंकी सुविशाल माला विराजमान है, मानों नवीन श्याममेघपर सूर्यकी कला देखकर उसे कौतुकवश नक्षत्रमालाने घेर लिया हो [यहाँ शरीर श्याममेघ है, पदिक सूर्यकला है और गजमुक्तामाल नक्षत्रगण हैं। मेघपर सूर्य- कलाका दिखायी देना तथा सूर्यको नक्षत्रोंका घेरना अघटितघटनाका ही कौतुक है] ॥ ६ ॥ इस समय अपने-अपने घरोंपर खड़ी हुई पुरनारियाँ प्रभुको देखकर आनन्द पूर्ण हो उनपर बहुतसे फूल और केसर के परागकी वर्षा कर रही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय परम कल्याणधाम भगवान् राम अपनी छबिसे अरबों कामदेवों का मानमर्दन करते हैं ॥ ७ ॥

३६१ उत्तरकाण्ड [ ६ ] आजु रघुबीर-छबि जात नहिं कछु कहीं । सुभग सिंघासनासीन, सीतारवन, भुवन-अभिराम, बहु काम सोभा सही ॥ १ ॥ चारु चामर-व्यजन, छत्र-मनिगन बिपुल, दाम-मुकुतावली-जोति जगमगि रही। मनहुँ राकेस सँग हंस-उडुगन-बरहि मिलन आए हृदय जानि निज नाथ ही ॥ २ ॥ मुकुट सुंदर सिरसि, भालबर, तिलक-भ्रू, कुटिल कच, कुंडलनि परम आभा लही । मनहुँ हरडर जुगल मारध्वजके मकर लागि श्रवननि करत मेरुकी बतकही ॥ ३ ॥ अरुन-राजीव-दल-नयन करुना-अयन, बदन सुषमासदन, हास त्रय-तापही । बिबिध कंकन हार, उरसि गजमनि-माल, मनहुँ बाग-पाँति जुगमिलि चली जलवही ॥ ४ ॥ पीत निरमल चैल, मनहुँ मरकत सैल, पृथुल-दामिनि रही छाइ तलि सहजही । ललित सायक-चाप पीन भुज बल अतुल मनुजतनु दनुजबन-दहन, मंडन-मही ॥ ५ ॥ जासु गुन-रूप नहि कलित निरगुन सगुन, संभु, सनकादि, सुक भगति दृढ़ करि गही । दास तुलसी राम-चरन-पंकज सदा बचन मन करम चहै प्रीति नित निरबही ॥ ६ ॥

गीतावली ३६२ आज रघुनाथजीकी छविका कुछ वर्णन नहीं किया जाता। वे त्रिभुवनसुन्दरसीतारमण भगवान् राम सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हैं। वे सचमुच अनेकों कामदेवोंके समान शोभा सम्पन्न हैं॥ १ ॥ सुन्दर चँवर, व्यजन, छत्र, अनेकों मणिगण तथा मुक्तामालाओंकी लड़ियोंकी ज्योति जगमगा रही है, मानो अपने प्रभुको हृदयमें पहचानकर [छत्ररूप] चन्द्रमाके सहित [चँवररूप] हंस [मणिगणरूप] तारे और [व्यजनरूप] मोर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये आये हैं॥ २ ॥ प्रभुके सिरपर सुन्दर मुकुट है, ललित ललाटपर तिलक और भ्रुकुटियाँ शोभायमान हैं तथा घुँघराली अलकोंके पास कुण्डलोंकी बड़ी शोभा हो रही है। वे ऐसे जान पड़ते हैं, मानों कामदेवकी ध्वजाके दो मकर भगवान् शंकरके भयसे [प्रभुको उनके स्वामी जान] कानोंसे लगाकर मेलकी बातचीत कर रहे हैं॥ ३ ॥ भगवान्‌के अरुण कमलदलके समान नेत्र करुणाके भण्डार हैं। उनका मुख सुषमाका आश्रय तथा हास तीनों तापोंको नष्ट करनेवाला है। वे हाथोंमें तरह-तरहके कंकण तथा हृदयमें हार और गजमुक्ताओंकी माला धारण किये हैं, मानो दो बगुलोंकी पंक्तियाँ मिलकर मेघकी ओर जा रही हों ॥ ४ ॥ वे अति स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हैं, मानो मरकतमणिके पर्वतपर बहुत-सी बिजली अपने स्वभावको छोड़कर छायी हुई हों। उनके हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण हैं तथा पुष्ट भुजाओंमें अतुलित बल है। उनका यह मनुष्य-शरीर दैत्यवनको जलानेवाला तथा पृथ्वीका आभूषण है । ५ ॥ जो निर्गुण होते हुए भी सगुण हैं तथा जिनके गुण और रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता; अतः शिव, सनकादि तथा

३६३ उत्तरकाण्ड शुकदेवजीने भी जिनके भक्तिभावको ही दृढ़ करके पकड़ा है, उन भगवान् रामके चरणकमलोंमें तुलसीदास मन, वचन और कर्मसे सदा प्रीति ही निर्वाह चाहता है ॥ ६ ॥ [ ७ ] राव राजराजमौलि मुनिवर-मन-हरन, सरन- लायक, सुखदायक रघुनायक देखी री। लोक-लोचनाभिराम, नीलमणि-तमाल-स्याम, रूप-सील-धाम, अंग छबि अनंग को री ? ॥ १ ॥ लसत सिर मुकुट पुरट-निरमित मनि रचित चारु, कुंचित कच रुचिर परम, सोभा नहिं थोरी। मनहुँ भँवरीक-पुंज कंजवृन्द प्रीति लागि गुंजत कल गान तान दिनमणि रिझयो री ॥ २ ॥ अरुनकंज दल-बिसाल लोचन, भ्रू-तिलकभाल, मंडित स्रुति कुंडल बर सुंदरतर जोरी। मनहुँ संबरारि मारि, ललित मकर-जुग बिचारि, दीन्हें ससिकहँ पुरारि भ्राजत दुहुँ ओरी ॥ ३ ॥ सुंदर नासा-कपोल, चिबुक, अधर अरुन बोल मधुरे, दसन राजत जब चितवत मुख मोरी। कंज-कोस भीतर जनु कंजराज-सिकर-निकर, रुचिर रचित बिधि बिचित्र तड़ित-रंग-बोरी ॥ ४ ॥ कंबुकंठ उर बिसाल तुलसिका नवीन माल, मधुकर बर-बास-बिबस, उपमा सुनु सो री। मनु कलिंदजा सुनील सैलतें धसी समीप, फेन-वृन्द बरसत छबि मधुर घोरि घोरी ॥ ५ ॥

निरमल अति पीत चेल, दामिनि जनु जलद नील राखी निज सोभाहित बिपुल बिधि निहोरी। नयनन्हिको फल बिसेष ब्रह्म अगुन सगुन बेष, निरखहु तजि पलक, सफल जीवन लेखौ री ॥ ६ ॥ सुंदर सीतासमेत सोभित करुनानिकेत, सेवक सुख देत, लेत चितवत चित चोरी। बरनत यह अमित रूप थकित निगम-नागभूप, तुलसिदास छबि बिलोकि सारद भइ भोरी ॥ ७ ॥ अरी सखिया ! मुनियोंके मनोंको हरनेवाले तथा शरणके योग्य सुखदायक राजाधिराजशिरोमणि भगवान् रामकी ओर तो देखो। वे सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले, नीलमणि और तमाल वृक्षके समान श्यामवर्ण तथा रूप और शीलके आश्रय हैं। उन- के अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें जो छवि है उसके आगे कामदेव भी क्या है ?॥१॥ उनके सिरपर अति सुन्दर मणिजटित सुवर्णमय मुकुट शोभायमान है तथा उनके नीचे अति मनोहर कुटिल अलकावली है। उसकी शोभा भी कुछ कम नहीं है। [ वे ऐसे मालूम होते हैं ] मानो [मुख एवं नेत्ररूप] कमलोंकी प्रसन्नताके लिये गूंजते हुए भौरोंने अपने सुन्दर गानकी तानसे [मुकुटरूप] सूर्यको रिझा लिया हो ॥ २ ॥ उनके नेत्र अरुण कमलदलके समान विशाल हैं, माथेपर भ्रुकुटि तथा तिलक शोभायमान हैं तथा कानोंमें श्रेष्ठ कुण्डलोंकी अत्यन्त सुन्दर जोड़ी सुशोभित है, मानो श्रीमहादेवजीने कामदेवको मार उसकी ध्वजाके दो मकरोंको सुन्दर जान उन्हें (मुखरूप) चन्द्रमाको दे दिया हो और वे उसके दोनों ओर शोभायमान हों ॥ ३ ॥ प्रभुकी नासिका, कपोल, ठोढ़ी और अरुण अधर बड़े ही

३६५ उत्तरकाण्ड सुन्दर हैं तथा उनके बोल अत्यन्त मीठे हैं। जिस समय वे मुख मोड़कर निहारते हैं, उस समय उनके दाँत ऐसे शोभायमान होते हैं जैसे किसी कमलकोशके भीतर विधाताद्वारा बिजलीके रंगमें डुबोकर रचे हुए अतिसुन्दर पद्मरागके शिखर विराजते हों॥ ४॥ अरी सखि! प्रभुके कम्बुकण्ठ तथा विशाल वक्षःस्थलपर जो नवीन तुलसीकी माला है और उसकी सुहावनी सुगन्धके वशीभूत होकर उसपर जो भौंरे गुंजार रहे हैं, उनकी उपमा तो सुन । [ वे ऐसे जान पड़ते हैं] मानो किसी नीलशिखरसे गिरी हुई कालिन्दीके समीप मेघवृन्द गरज-गरजकर मधुर छवि बरसा रहे हों [यहाँ भगवान्‌का श्याम शरीर नीलशिखर है, तुलसीकी माला कालिन्दी है, उसपर गुंजारते हुए भौंरे मेघ हैं, उनका शब्द गर्जन है तथा उनके मुखसे जो फूलोंका पराग झड़ता है वही छविकी वर्षा करता है] ॥ ५ ॥ प्रभुके श्याम शरीरपर अत्यन्त निर्मल पीताम्बर सुशोभित है, मानो किसी नीलमेघने अपनी शोभाके लिये बहुत अनुनय-विनय करके बिजलीको रख छोड़ा हो। अरी ! इस सगुण वेषमें प्रकट हुआ यह निर्गुण ब्रह्म नेत्रोंका परम लाभ है, तुम पलक मारना छोड़कर इसे देखो और अपने जीवनको सफल हुआ समझो ॥ ६ ॥ देखो, सुन्दरी सीताके सहित शोभायमान करुणाधाम भगवान् राम अपने सेवकोंको सुख देते हैं और अपनी दृष्टि डालते ही चित्तको चुरा लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, इस अमित रूपका वर्णन करते-करते श्रुति और शेषजी भी थकित हो गये हैं तथा इनकी छविको देखकर शारदाकी बुद्धि भी चकित हो गयी है ॥ ७॥

गीतावली ३६६ राग केदारा [ ८ ] सखि ! रघुनाथ-रूप निहारु । सरद-बिधु रवि-सुवन मनसिजमानभंजनिहारु ॥ १ ॥ स्याम सुंदर सरीर जन-मन-काम-पूरनिहारु । बासचंदन मनहु मरकत-सिखर लसत निहारु ॥ २ ॥ रुचिर उर उपवीत राजत पदिक गजमनि-हारु । मनहु सुरधनु नखतगन बिच तिमिर-भंजनिहारु ॥ ३ ॥ विमल पीत दुकूल दामिनि-दुति-विनिंदनिहारु । बदन सुषमासदन सोभित मदन-मोहनिहारु ॥ ४ ॥ सकल अंग अनूप, नहिं कोउ सुकवि बरननिहारु । दासतुलसी निरखतहि सुख लहत निरखनिहारु ॥ ५ ॥ अरी सखि ! भगवान् रामका शरच्चन्द्र, अश्विनीकुमार तथा कामदेवका मान-मर्दन करनेवाला रूप देख ॥ १ ॥ भक्तोंकी मनो- कामना पूर्ण करनेवाले भगवान्‌के श्यामसुन्दर शरीरपर जो चन्दनका लेप हो रहा है, वह ऐसा जान पड़ता है, मानो मरकतमणिके शिखरपर कुहरा सुशोभित हो ॥ २ ॥ भगवान्‌के मनोहर वक्षःस्थलमें यज्ञोपवीत, पदिक और गजमुक्ताओंका हार शोभायमान है, मानो इन्द्रधनुष और नक्षत्रगणके बीचमें साक्षात् सूर्यदेव विराजमान हों ॥ ३ ॥ प्रभुका निर्मल पीताम्बर बिजलीकी कान्तिका तिरस्कार करनेवाला है तथा उनका सौन्दर्यपूर्ण मुखमण्डल कामदेवको भी मोहित करनेवाला है ॥ ४ ॥ भगवान्‌के सभी अङ्ग अनुपम हैं । उनका वर्णन कर सकनेवाला कोई सुकवि नहीं है । तुलसीदासजी

३६७ उत्तरकाण्ड कहते हैं, उसका दर्शन करनेवाले उसे देखते ही सुखी हो जाते हैं॥५॥ 【 ९ 】 सखि ! रघुबीर-मुखछबि देखु । चित्त-भीति सुप्रीति-रंग सुरूपता अवरेख ॥ १ ॥ नयन-सुषमा निरखि नागरि ! सफल जीवन लेखु । मनहुँ बिधि जुग जलज बिरचे ससि सुपूरन मेखु ॥ २ ॥ भ्रुकुटि भाल बिसाल राजत रुचिर-कुंकुम-रेखु । अमर द्वै रबिकिरनि ल्याए करन जनु उनमेखु ॥ ३ ॥ सुमुखि ! केस सुदेस सुंदर सुमन, संजुत पेखु । मनहुँ उडुगन-निबह आए मिलन तम तजि द्वेषु ॥ ४ ॥ श्रवन कुण्डल मनहु गुरु-कबि करत बाद बिसेषु । नासिका, द्विज, अधर जनु रह्यो मदनु करि बहु बेषु ॥ ५ ॥ रूप बरनि न सकत नारद-संभु, सारद-सेषु । कहै तुलसीदास क्यों मतिमंद सकल मरेषु ॥ ६ ॥ अरी सखि ! तू रघुनाथजीके मुखकी छवि देख । तू उनकी उस सुन्दरताको अपनी चित्तरूप भित्तिपर सम्यक् प्रीतिरूप रंगसे अंकित कर ले ॥ १ ॥ अरी आली ! प्रभुके नेत्रोंकी सुन्दरता देख- कर तू अपने जीवनको सफल जान । वे तो ऐसे जान पड़ते हैं, मानो मेषराशिके पूर्णिमाके चन्द्रमामें विधाताने दो कमल बना दिये हों ॥ २ ॥ भगवान्‌के भ्रुकुटियुक्त विशाल भालपर कुंकुमकी रेखाएँ [तिलक] शोभायमान हैं, मानो भ्रमरगण [नेत्ररूप कमलोंके विकासके लिये ] सूर्यकी दो किरणें ले आये हों ॥ ३ ॥ अरी सुमुखि ! प्रभुके मनोहर मस्तकपर सुन्दर फूलोंके सहित उनका

गीतावली ३६८ केशकलाप देख, मानो [पुष्परूप] तारे [केशरूप] अन्धकारसे द्वेष त्यागकर मिलनेके लिये आये हैं ॥ ४ ॥ उनके कानोंमें जो कुण्डल हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो बृहस्पति और शुक्र विशेष वाद- विवाद कर रहे हों तथा नासिका, दाँत और अधर तो ऐसे शोभायमान हैं मानो कामदेव ही कई प्रकारके वेष बनाकर बस गया हो ॥ ५ ॥ प्रभुके रूपका तो श्रीशंकर, शेष, शारदा और नारद भी वर्णन नहीं कर सकते; फिर सम्पूर्ण मन्दमतियोंका राजा [अत्यन्त मन्दमति] तुलसीदास ही उसे किस प्रकार कह सकता है ? ॥ ६ ॥ राग जैतश्री [ १० ] देखौ, राघव-बदन बिराजत चारु । जात न बरनि, बिलोकत ही सुख, मुख किधौं छबिबर नारि सिंगारु रुचिर चिबुक, रद-ज्योति अनूपम, अधर अरुन सित हास निहारु । मनो ससिकर बस्यो चहत कमल महँ प्रगटत, दुरत, न बनत बिचारु नासिक सुभग मनहुँ सुक सुंदर चितवत चकि आचरज अपारु । कल कपोल, मृदु बोल मनोहर रीझि, चित चतुर अपनपौ वारु ॥ नयन सरोज, कुटिल कच, कुण्डल, भ्रुकुटि, सुभाल तिलक सोभा-सारु मनहुँ केतुके मकर, चाप सर गयो, बिसरि भयो मोहित मारु ॥४॥ निगम सेष, सारद, सुक, संकर, बरनत रूप न पावत पारु । तुलसिदास कहै, कहौं, धौं कौन बिधि अति लघुमति जड क्रूर गंवारु देखो, रघुनाथजीका सुन्दर मुखमण्डल कैसा शोभायमान है। इसका वर्णन नहीं किया जा सकता, इसे देखनेसे ही बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । यह मनोहर मुख है अथवा छबिरूप सुन्दरी स्त्रीका शृंगार है ॥ १ ॥ प्रभुकी ठोड़ी सुन्दर है तथा दांतोंकी ज्योति

३६४ उत्तरकाण्ड अनुपम है, उनके लाल-लाल ओठोंमें श्वेत हासकी आभा तो देखो [वह तो ऐसी जान पड़ती है] मानो चन्द्रमाकी किरण कमलमें निवास करना चाहती हो; किन्तु उसका विचार निश्चित न होनेके कारण वह बार-बार प्रकट होती एवं छिप जाती हो ॥ २ ॥ प्रभुकी सुघड़ नासिका मानो तोतेकी सुन्दर चोंच है। उसे देखकर चित्त अपार आश्चर्यचकित हो जाता है। अरे चतुर चित्त ! उनके अमोल कपोल तथा महामधुर और मनोहर बोलोंपर रीझकर तू अपनेको निछावर कर दे ॥ ३ ॥ देखो, इनके नेत्रकमल, कुटिल केश, कुण्डल, भ्रुकुटि और सुन्दर ललाटपर तिलक शोभाके सार हैं। मानो कामदेव प्रभुके रूपपर मोहित हो जानेके कारण अपनी ध्वजा- के मकर, धनुष और बाण भूलकर चला गया हो ॥ ४ ॥ भगवान्‌के रूपका वेद, शेष, शारदा, शुकदेव और भगवान् शंकर भी वर्णन करते- करते पार नहीं पाते। फिर कहो, अत्यन्त मन्दमति, मूर्ख, कठोरहृदय और गँवार तुलसीदास उसे किस प्रकार कह सकता है ? ॥ ५ ॥ राग ललित [ १९ ] आज रघुपति-मुख देखत लागत सुख । सेवक सुरूप, सोभा सरद-ससि सिहाई । दसन-बसन लाल, बिसद हास रसाल मानो हिमकर-कर राखे राजीव मनाई ॥ १ ॥ अरुन नैन बिसाल, ललित भ्रुकुटि, भाल तिलक, चारु कपोल, चिबुक-नासा सुहाई । बिथुरे कुटिल कच, मानहु मधु लालच अलि, नलिन-जुगल ऊपर रहे लोभाई ॥ २ ॥

गीतावली ४०० श्रवन सुंदर, सम कुंडल कल जुगम, तुलसिदास अनूप, उपमा कही न जाई। मानो मरकत सीप सुंदर ससि समीप कनक करजुत बिधि बिरची बनाई ॥ ३ ॥ आज रघुनाथजीका मुख देखनेसे आनन्द होता है। कारण कि वह सेवकोंपर सुरुख अर्थात् अनुकूल हैं; शरच्चन्द्र भी उस शोभाको देखकर सिहाता है। उनके ओठ लाल-लाल हैं तथा विशद मुसकान बड़ी ही मधुर है। मानो हासरूप चन्द्रमाकी किरणोंको होंठरूप कमलोंने मनाकर रख लिया है ॥ १ ॥ प्रभुके अरुणवर्ण एवं विशालनेत्र, मनोहर भ्रूकुटि, ललाटपरका तिलक मनोहर कपोल, चिबुक और नासिका बड़ी ही सुन्दर हैं। उनकी कुटिल अलकें बिखरी हुई हैं, मानो मधुके लालचसे दो कमलोंके ऊपर भौंरे लुभा- कर रह गये हों ॥ २ ॥ उनके सुन्दर कानोंमें एक-से मनोहर कुण्डलोंकी जोड़ी है। तुलसीदासजी कहते हैं, वे तो अनुपम हैं, उनकी उपमा कही नहीं जाती, मानो विधाताने [मुखरूप] सुन्दर चन्द्रमाके समीप [कुण्डलरूप] सुवर्णकी मछलियोंके सहित [कर्णरूप] मरकतमणिकी सीपियोंको रचकर बनाया हो ॥ ३ ॥ राग भैरव [१९] प्रातकाल रघुबीर-बदन-छबि चितै, चतुर चित मेरे। होंहिं बिबेक बिलोचन निरमल सुफल सुसीतल तेरे ॥ १ ॥ भाल बिसाल बिकट भ्रुकुटी बिच तिलक-रेख रुचि राजै। मनहुँ मदन तन तकि मरकत-धनु जुगुल कनक सर साजै ॥ २ ॥

४०१ उत्तरकाण्ड रुचिर पलक लोचन जुग तारक स्याम, अरुन सित कोए । जनु अलि नलिन-कोस महँ बंधुक-सुमन सेज सजि सोए ॥ ३ ॥ बिलुलित ललित कपोलनिपर कच मेचक कुटिल सुहाए । मनो बिधुमहँ बनरुह बिलोकि अलि विपुल सकौतुक आए ॥ ४ ॥ सोभित श्रवन कनक-कुंडल कल लंबित बिबि भुजमूले । मनहुँ केकि तकि गहन चहत जुग उरग इंदु प्रतिकूले ॥ ५ ॥ अधर अरुनतर, दसन-पांति बर, मधुर मनोहर हासा । मनहुँ सोन सरसिज महँ कुलिसनि तड़ित सहित कृत बासा ॥ ६ ॥ चारु चिबुक, सुकतुंड बिनिंदक सुभग सुउन्नत नासा । तुलसिदास छबिधाम राममुख सुखद, समन भवत्रासा ॥ ७ ॥ ऐ मेरे चतुर चित्त ! तू प्रातःकाल होते ही रघुनाथजीके मुख- की शोभा निहारा कर । इससे तेरे विवेकरूप नेत्र निर्मल, सफल और शीतल हो जायेंगे ॥ १ ॥ भगवान्‌के विशाल भालपर बांकी भ्रुकुटियां हैं और उनके बीचमें तिलककी मनोहर रेखा विराजमान है, मानों कामदेवने [अलकावलीरूप] अन्धकारको ताककर [भ्रुकुटियुगलरूप] मरकतमणिके धनुषपर [तिलकरूप] दो सुवर्ण- मय-बाण चढ़ाये हों ॥ २ ॥ सुन्दर पलकयुक्त नेत्रोंमें दो श्यामवर्ण तारे तथा श्वेत रक्तवर्ण कोये हैं, मानो कमलकोषमें मुंदे हुए दो भौंरे बन्धूकपुष्पकी शय्या बनाकर उसपर शयन कर रहे हों ॥ ३ ॥ प्रभुके मनोहर कपोलोंपर लटकती हुई काली और घुंघराली अलकें ऐसी शोभायमान हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमामें [नेत्ररूप] कमलकुसुम देखकर कुतूहलवश बहुत से भौंरे इकट्ठे हो गये हों ॥४॥ भगवान्‌के कानोंमें दोनों भुजाओंके मूलभागतक लटकते हुए सुवर्णके गी० २६—

गीतावली ४०२ कुण्डल सुशोभित हैं, मानो [मुखरूप] चन्द्रमाके प्रतिकूल हुए [भुजारूप] दो सर्पोंको देखकर उन्हें [कुण्डलरूप] दो मयूर पकड़ना चाहते हैं ॥ ५ ॥ भगवान्‌के अधर खूब लाल-लाल हैं, दन्तावली बड़ी सुन्दर है तथा हास्य बड़ा मधुर और मनोहर है, मानो किसी सोनेके कमलमें बिजलीके सहित वज्र बसे हुए हों ॥ ६॥ उनकी ठोढ़ी बड़ी मनोहर है तथा सुन्दर और उठी हुई नासिका तोतेकी चोंचको भी लजानेवाली है। तुलसीदासजी कहते हैं, छविधाम भगवान् रामका मुख बड़ा सुखदायक और जन्म-मरणरूप भय को शान्त करनेवाला है ॥ ७ ॥ राग केदारा [ १३ ] सुमिरत श्रीरघुबीर की बाहें । होत सुगम भव-उदधि अगम अति, कोउ लांघत, कोउ उतरत थाहैं सुंदर-स्याम-सरीर-सैलतें धँसि जनु जुग जमुना अवगाहें । अमित अमल जल-बल परिपूरन, जनु जनमोसिंगार सविता हैं ॥ २ ॥ धारैं बान, कूल धनु, भूषन जलचर, भँवर सुभग सब खाँहैं । बिलसति बीचि बिजय-बिरदावलि, कर-सरोज सोहत सुषमाहैं ॥ ३ ॥ सकल-भुवन-मंगल-मंदिरके द्वार बिसाल सुहईं साहैं । जे पूजी कौसिक-मख ऋषियनि, जनक-गनप, संकर-गिरिजा हैं ॥ ४ ॥ भवधनु दलि जानकी बिबाही, भए बिहाल नृपाल त्रपा हैं । परसुपानि जिन्ह किये महामुनि जे वितए कबहू न कृपा हैं ॥ ५ ॥ जातुधान-तिय जानि बियोगिनि दुखई सीय सुनाइ कुचाहैं । जिन्ह रिपु मारि सुरारि-नारि तेइ सीस उघारि दिबाई धाहैं ॥ ६ ॥

४०३ उत्तरकाण्ड दंसमुख-बिबस तिलोक लोकपति बिकल बिनाए नाक चना हैं। सुबस बसे गावत जिन्हकें जस अमर-नाग-नर सुमुखि सना हैं॥ ७॥ जे भुज बेद-पुरान, सेष-सुक-सारद सहित सनेह सराहें। फलपलताहुकी कलपलता बर, कामदुहहुकी कामदुहा हैं॥ ८॥ सरनागत-आरत-प्रनतनिको दै दें अभयपद ओर निबाहैं। करि आईं, करिहैं, करतीं हैं तुलसिदास दासनिपर छाहैं॥ ९॥ श्रीरघुनाथजीकी भुजाओंका स्मरण करते ही संसारसमुद्र, जो कि बड़ा ही दुर्गम है, सुगम हो जाता है, फिर कोई तो उसे लांघ जाते हैं और कोई थहाकर पार कर लेते हैं॥ १॥ [वे भुजाएँ भगवान्‌के शरीरमें ऐसी शोभित हैं] मानो अति सुन्दर श्यामशरीररूप पर्वतसे दो यमुनाजीकी धाराएँ निकली हैं, जो बलरूप अथाह एवं निर्मल जलसे भरी हुई हैं तथा श्रृंगाररूप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं ॥२॥ बाण उनकी धाराएँ हैं, धनुष ही किनारा है, आभूषण जलचर जन्तु हैं और छाइयाँ (अँगुलियोंके बीचके सन्धिस्थान) भँवर हैं। विजयकी विरुदावली ही उसमें तरंगरुपसे शोभायमान है तथा उसमें कररूप कमलोंकी शोभा हो रही है ॥ ३ ॥ वे मानो सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणरूप भवनके द्वारकी दो विशाल और शोभायमान खड़ी लकड़ियां [खंभे अर्थात बाजू] हैं, जो विश्वामित्रके यज्ञमें ऋषियोंद्वारा पूजित हुई तथा जिन्होंने जनकजी, गणेशजी, भगवान् शंकर और पार्वतीसे पूजित होकर सबकी कामनाएँ पूर्ण की हैं ॥ ४॥ इन्हींने महादेवजीका धनुष तोड़कर जानकीजीसे विवाह किया, जिससे सब राजालोग मारे शर्मके बेहाल हो गये तथा जिन्होंने कृपाकी ओर कभी दृष्टिपात भी नहीं किया, उन परशुराम-

गी तावली ४०४ जीको जिन्होंने महामुनि [मुनीश्वरोंके समान क्षमाशील] बना दिया है ! ॥ ५ ॥ जब राक्षसियोंने सीताजीको वियोगिनी जानकर बहुत-सी अप्रिय बातें कहकर उन्हें व्यथित किया, तब उन भुजाओंने शत्रुओंका संहार कर उन असुरपत्नियोंके सिर उघाड़कर उन्हें धाड़ मारकर रुलाया ॥ ६ ॥ रावणने तीनों लोकोंको विवश करके लोक- पालोंको व्याकुल कर उनसे नाकों चने बिनवाये थे । [उसी रावणके मारे जानेसे ] देवता, नाग और मनुष्यगण अपने-अपने धामोंमें सुखपूर्वक बसकर अपनी पत्नियोंके सहित जिन भुजाओंका सुयश गान करते हैं ॥ ७ ॥ जिन भुजाओंकी वेद, पुराण, शेष, शारदा और शुकदेव भी स्नेहपूर्वक सराहना करते हैं, जो कल्पलताकी भी श्रेष्ठ कल्पलता तथा कामधेनुकी भी कामधेनु हैं ॥ ८ ॥ तथा जो अपने शरणागत दीन एवं प्रणत पुरुषोंको अभयपद देकर अन्ततक उनका निर्वाह करती हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, भगवान्‌की वे हीं भुजाएँ अपने दासोंपर सदा छाया करती आयी हैं, अब भी करती हैं और आगे भी करती रहेंगी ॥ ९ ॥ राग भैरव [ १४ ] रामचंद्र-करकंज कामतरु बामदेव-हितकारी । तियसनेह-बर बेलि-ललित बर-प्रेम बंधु बर बारी ॥ १ ॥ मंजुल मंगल-मूल मूल तनु, करज मनोहर साखा । रोम परन, नख सुमन सुफल सब काल सुजन-अभिलाषा ॥ २ ॥ अबिचल अमल,अनामय,अबिरल, ललित, रहित छल छाया । समन सकल संताप-पाप-रुज-मोह-मान-मद-माया ॥ ३ ॥