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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

धवलगृह में प्रभाकरवर्धन की परिचर्या २६६ रुग्णावस्था में प्रभाकरवर्धन का वर्णन २६९ प्रभाकरवर्धन का पुत्र-प्रेम २७२ रसायन का पावक-प्रवेश २७८ राजभवन में अशुभ-सूचक महोत्पात २८० वेलाप्रतीहारी का पहुँचकर हर्ष को यशोमती के सती होने की तैयारी की सूचना देना २८३ यशोमती सतीवेश में २८५ यशोमती के अन्तिम वाक्य २८९ हर्ष को प्रभाकरवर्धन की सान्त्वना २९३ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु २९५ राजा की और्ध्वदेहिक क्रिया २९६ हर्ष की चिन्ता २९७ राजा की चिन्ता में भृत्य, मित्र, सचिवों का गृह-त्याग ३०१ हर्ष को राज्यवर्धन की चिन्ता ३०४ षष्ठ उच्छ्वास ( राजप्रतिज्ञावर्णन ) राज्यवर्धन का लौटना ३०८ राज्यवर्धन का हर्ष को समझाना और निर्वेद की बात करना ३१४ हर्ष का चिन्ता करना ३१८ मालवराज द्वारा ग्रहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री को कारावास दिए जाने का समाचार ३२१ राज्यवर्धन का क्रोध करना और युद्ध के लिए प्रस्थान करना ३२२ हर्ष का दुःस्वप्न देखना ३२७ राज्यवर्धन के वध का समाचार ३२९ हर्ष का प्रचण्ड क्रोध ३३० सेनापति सिंहनाद ३३३ सिंहनाद का उपदेश ३३५ हर्ष की दिग्विजयप्रतिज्ञा ३४२ हर्ष का प्रदोपस्थान और शयनगृह में जाना ३४५ गजसेना के अध्यक्ष स्कन्दगुप्त ३४७ स्कन्दगुप्त का राजाओं के छल-कपट का वर्णन करना ३५० अपशकुन-वर्णन ३५५

( ३९ ) सप्तम उच्छ्वास ( छत्रलब्धि ) दण्डयात्रालग्न का निश्चय, ब्राह्मणों को दान देना ३५९ छावनी में सैनिकप्रयाण की कलकल ३६२ सैनिक-प्रयाण से जनता को कष्ट ३७२ हर्ष द्वारा सेना का निरीक्षण ३८० हंसवेग का आगमन ३८२ छत्र की विशेषता ३८३ छत्रवर्णन ३८४ भास्करवर्मा के भेजे हुए अन्य उपहार ३८६ हंसवेग द्वारा संदेश-कथन ३९१ सरकारी नौकरों पर फवतियाँ ३९५ भण्डि का आगमन ४०२ राज्यश्री का समाचार ४०४ राज्यश्री की खोज में हर्ष का प्रयाण और विन्ध्याटवी के समीप आ जाना ४०६ विन्ध्याटवी वर्णन ४०६ अष्टम उच्छ्वास ( विन्ध्याद्रिनिवेशन ) हर्ष का विन्ध्याटवी में प्रवेश और आटविक सामन्त शरभकेतु ४१३ शबरयुवक निर्घात का वर्णन ४१३ निर्घात की हर्ष से बातें ४१७ विभिन्न वृक्षों का वर्णन ४१८ दिवाकरमित्र का वर्णन ४२२ दिवाकरमित्र द्वारा हर्ष का सत्कार ४२६ हर्ष द्वारा आगमन-प्रयोजन का निवेदन ४२९ एक भिक्षु द्वारा राज्यश्री की दशा का वर्णन ४३० हर्ष का राज्यश्री के समीप जाना ४४० स्त्रियों के आलाप ४४० हर्ष का राज्यश्री से मिलन ४४४ दिवाकर द्वारा हर्ष को एकावली की भेंट ४४८ राज्यश्री को दिवाकरमित्र का उपदेश ४५३ राज्यश्री को हर्ष द्वारा सौपना ४५८ सूर्यास्त-चन्द्रोदय-वर्णन ४६० परिशिष्ट : बाण-प्रशस्ति ४६३

द्वितीय संस्करण प्रथम संस्करण में जो त्रुटियाँ रह गई थीं, उन्हें इसमें जहाँ तक हो सका है, दूर करने का प्रयत्न किया गया है। आशा है, हर्षचरित के मूल अर्थ तक पहुँचने में यह अनुवाद प्रामाणिक रूप में सहायक होगा। इधर बिहार के कुछ विद्वानों में महाकवि बाणभट्ट के जन्म-स्थान को लेकर बहुत दिनों से विवाद चला आ रहा है। कुछ लोग शाहाबाद के किसी स्थान को बाणभट्ट की जन्मभूमि सिद्ध करते हैं, तो कुछ लोग गया जिले के किसी स्थान को। अनुकूल तर्क अपने-अपने अनुसार दोनों पक्षों के लोग उपस्थित करते हैं। अस्तु, बाणभट्ट ने 'हर्षचरित' में अपने ग्राम का नाम 'प्रीतिकूट' निर्दिष्ट किया है, जो शोणभद्र के तट पर था। —जगन्नाथ पाठक

॥ श्रीः ॥ हर्षचरितम् 'सङ्केत'-संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम् प्रथम उच्छ्वासः १नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्भाय शम्भवे ॥ १ ॥ ॐ सङ्केतः ॐ श्च्योतन्मदाम्बुभरनिर्भरचण्डगण्डशुण्डाग्रशौण्डपरिमण्डितभूरिभृङ्गान् । विघ्नानिवानवरतं चलगण्डतालैरुत्सारयञ्जयति जातघृणो गणेशः ॥ शङ्करनामा कश्चिच्छ्रीमत्पुण्याकरात्मजो व्यलिखत् । शिष्टोपरोधवशतः सङ्केतं हर्षचरितस्य ॥ 'सर्वकर्माणि कुर्वीत प्रणिपत्येष्टदेवताम् इति शिष्टाचारमनुपालयन् 'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेद्ं परिवर्तते ॥' इति काव्यलक्षणामपूर्वां सृष्टि स्थिरां प्रवर्तयंन्नेष कविः शिवं बहुशक्तियुतमपि नियतशक्त्या- त्मकमेव स्तौति—नमस्तुङ्गेत्यादिना । न क्वचित्प्रणतो यो मूर्धा तत्स्पर्शो चन्द्र एव सितवालतुल्यप्रभाप्रसरतया स्वेदाविनाश्याद्विशिष्टस्यानस्थितश्च चामरम् । त्रैलोक्यमेव नानाभङ्गिशोभित्वात्नगरं तदारम्भे मूलस्तम्भः । नगरारम्भे हि मूलस्तम्भो भवति । त्रिभुवनरूपी नगर के निर्माण-आरम्भ के मूलस्तम्भ; (जिनके) उन्नत (कहीं भी न झुकने वाले) मस्तक पर चन्द्र के चँवर की शोभा है (उन) भगवान् शङ्कर को नमस्कार है† ॥ १ ॥ † कवि ने भगवान् शंकर को त्रिभुवन-नगर के निर्माण-आरम्भ का मूलस्तम्भ- १. जीवानन्दपाठे प्रथमः श्लोकः— चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूमम । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २ हर्षचरितम् 'हरकण्ठग्रहानन्दमीलिताक्षीं नमाम्युमाम् । कालकूटविषस्पर्शजातमूर्च्छागमामिव ॥ २ ॥ लग्नं च पट्टबन्धादिवदुत्प्रेक्षणानन्तरमुन्नते पृष्ठदेशे चन्द्रतुल्यं श्वेतं चामरं क्रियत इति स्थितिः । केचित्पुनः—त्रैलोक्यनगरस्यारम्भे मूलं मूलकारणं परमाणवस्तेषामुपाय- श्रयेण मूलकारणत्वात्स्तम्भ इव । ते हि तद्वशात्कार्यमारभन्ते । तस्य निमित्त- कारणत्वादित्याहुः । 'स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः' इति नामसहस्रे दृष्टत्वाद्धरेः, 'शम्भु- र्ब्रह्मत्रिलोचनो' इत्यभिधानकोशदर्शनाच्च ब्रह्मणोऽपि नमस्कारोऽयमित्यन्ते वदन्ति । व्याकुर्वते च हरिपक्षे—त्रैलोक्याक्रमणकाले । यद्वा—'यस्याग्निरास्यं द्योर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ मही' इत्यभिप्रायेण तुङ्गमूच्छ्रितं शुभलक्षणं यच्छिरस्तच्चुम्बिचन्द्र एव चामरं तेन चारवे । ब्रह्मपक्षे—चन्द्रः स्वर्णं तन्मयं चामरमिव चामरं केशकलापा 'हिरण्यकेशो हि ब्रह्मा त्रैलोक्यादीनि शेषं सर्वत्र तुल्यमिति ॥ १ ॥ हरेत्यादिना । प्रियं प्रति गाढस्नेहादि सौकुमार्यं चोपमयोच्यते । कालकूटविषेति अर्थसार्थः सामान्यपदप्रयोगो मेरुमहीधरचूतवृक्षादिवत् । आग्रमः प्रारम्भः ॥ २ ॥ उमा को प्रणाम करता हूँ, जिनकी आँखें शिव के कण्ठालिङ्गन के आनन्द से मूँद गई हैं, मानों शिव के गले में स्थित कालकूट विष के स्पर्श हो जाने से उन्हें मूर्च्छा आ गई हो ॥ २ ॥ कहा है, जिस प्रकार शङ्कर के उन्नत मस्तक पर चन्द्र की शोभा है उसी प्रकार प्राचीन वास्तुकला के अनुसार पहले मूलस्तम्भों पर चन्द्राकृति चँवर बनाये जाते थे, जो स्तम्भ के उपरिभाग में लगे होते थे । चन्द्र के साथ चँवर का अभेद इस अंश में भी है कि दोनों श्वेतवर्ण एवं श्रमापहारक हैं, चन्द्र की किरणों के समान ही चँवर के उजले केश-जाल छिटके रहते हैं । किसी के अनुसार ईश्वर (शिवजी) जगत् के निमित्त कारण होने से त्रिभुवन रूपी नगर के आरम्भ में मूल अर्थात् मूलकारण (उपादान कारण) परमाणुओं के आधार हैं, स्तम्भ हैं। किसी ने इस श्लोक को ब्रह्माजी और विष्णु के पक्ष में भी लगाया है । विष्णु के वामनावतार में त्रैलोक्य को लांघने के समय उनके सिर से चन्द्र का चँवर लग गया, अथवा आकाश रूप उनके सिर से चँवर रूप चन्द्र लगा रहता है । और ब्रह्माजी हिरण्यकेश होने के कारण स्वर्णमय केशकलाप वाले हैं। इस पक्ष में चन्द्र का अर्थ हिरण्य या सुवर्ण है । पाठान्तरम्—१. हरकण्ठाग्रहानन्द । २. स्पर्शाज्जात । CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

प्रथम उच्छ्वासः ३ नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ ३ ॥ संप्रत्युत्कृष्टकवित्वाभिमानेन तादृशमेव कविवरं स्तौति—नमः सर्वस्येत्यादिना । सर्वा वेदादिका विद्या गीतादिकलाश्च वेत्ति यस्तस्मै । तदुक्तम्—'नासौ शब्दो न तद्वाच्यं न सा विद्या न सा कला । जायते यत्र काव्याङ्गमहो भारो महाकवेः ॥' इति कविरेव वेधाः । उक्तं च—'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः' । कवीनां वेधाः । कविशब्दोऽत्रोपचारात्कविबुद्धिषु वर्तते । तेन कविबुद्धीनां श्रेष्ठ इत्यर्थः । तथा चाह मुनिः—इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः' इति । यद्वा व्युत्पत्यु- त्पादनद्वारेण कवय एवंभूताः सन्तः क्रियन्ते । मुख्य एव कविशब्दस्यार्थः । यदु- क्तम्—'इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते' इति । पुण्यं पावनम् । यदुक्तम्— 'भारताध्ययनात्पुण्यादपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापानि देहिनः ॥' इति । सरस्वती वाणी, तस्या लतया इव पुष्पादिहेतुत्वाद्वर्षं वृष्टिमिव । वर्षं वा स्थानविशेषः । 'यतोऽसौ तत्रास्ते । यदुक्तम्—'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्' । भरतानधिकृत्य कृतो ग्रन्थो भारतस्तम् । यद्वा—भारतं वर्षमिव । भरतः कश्चिद्राजा तस्य निवासं भारतं वर्षं भूभागैकदेशस्तदिव । उक्तं च— 'स्याद्वृष्टयां लोकधात्र्यंशे वत्सरे वर्षमस्त्रियाम्' इति । यद्वा—भारतवर्षान्तरस्था मावा मनुष्येषु सुलभास्तद्वन्महाभारतस्था सरस्वती । एतदपि सरस्वत्याख्यया पुण्यम् ॥ ३ ॥ समस्त ( विद्याओं और कलाओं को ) जानने वाले और कवियों के प्रजापति महर्षि व्यास को प्रणाम है, जिन्होंने सरस्वती ( नदी ) से पवित्र ( भारत ) वर्ष की भाँति (अपनी) सरस्वती ( वाणी ) से भारत ( महाभारत ग्रन्थ ) का निर्माण किया। ॥ ३ ॥ † जिस प्रकार कालिदास के आदर्श थे—महर्षि वाल्मीकि, उसी प्रकार महर्षि व्यास को सम्भवतः इन्होंने अपना आदर्श माना था । यह चयन बाण के स्वभाव के अनुकूल था । बाण अपनी कृति के द्वारा सर्व जगत् को 'बाणोच्छिष्ट' कर लेना चाहते थे, जैसा महर्षि व्यास ने भी कहा है—'जो जो यहां ( महाभारत में ) है, वह अन्यत्र है और जो-जो यहां नहीं है, वह कहीं नहीं है।' इसी प्रकरण के नवम पद्य में स्वयं बाण ने कवि की उस वाणी को सराहा है जो महाभारत की कथा के समान सभी प्रकार के वृत्तान्तों से युक्त होकर तीनों जगत् में व्याप्त नहीं हो जाती है अर्थात् अपनी व्याप्ति में सबको समेट नहीं लेती है ।

४ हर्षचरितम् प्रायः कुकवयो लोके रागाधिष्ठितदृष्टयः १। कोकिला इव जायन्ते वाचालाः २कामकारिणः ॥ ४ ॥ सन्ति श्वान इवासंख्या जातिभाजो गृहे-गृहे । एवं सर्वज्ञतागुणकथनेन कविप्रशंसां कृत्वा काव्यप्रशंसामाह-प्राय इत्यादिना । काव्यमेतं नाम स्वभावसुभगम् । येनेदृशा अपि कवयः प्रायः प्राचुर्येण कोकिला इव जायन्ते वल्गुवाचः सम्पद्यन्ते, किं पुनः संविशिष्टा न जायेरन् । केचित्पुनर्भूयसा कुत्सिताः कवयो जायन्त इति कुकविनिन्देवैयमिति व्याख्यातवन्तः । रागो द्वेषपूर्व- कोऽनर्थाभिनिवेशस्तेनाधिष्ठिता दृष्टिवुद्धिर्येषाम् । वाचाला असंबद्धप्रलापिनः । कामेन स्वेच्छया, न त्वलंकारकृद्दर्शितनीत्या कुर्वन्ति ये ते । कोकिलपक्षे-कुकन्ति गृह्णन्ति चेतांसीति कुकाः, ते च ते वयो मयूरप्रवराः पक्षिणः, रागो लोहित्यम् । दृष्टिश्चक्षुः । वाचा भारत्या । आला आ समन्ताल्लान्त्यावर्जयन्ति यतस्तादृशाः सन्तः । कामं व्यसनं कुर्वन्ति तच्छीलाः । कामोद्दीपनविभावतां यान्तीत्यर्थः । यद्वा—अवा- चालाः । अकारप्रश्लेषोऽत्र ॥ ४ ॥ सन्तीत्यादि । असंख्या अगणनार्हाः । जाति स्वरूपवर्णनामात्त्ररूपां वक्रोक्तिशून्यां भजन्ते । 'गतोऽस्तमर्को भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः' इत्यादिवत् । श्वानोऽप्य- संख्याः । नास्ति संख्यं संग्रामो येषां ते । जातिशब्देनात्र श्वजातिसमवेता अमेध्यभक्ष- णादयो गृहीताः । यद्वा—श्वत्वं नाम जातिस्तत्प्रतिपादनं प्रयोजनान्तरशून्यतामावेद- राग (लाली) से युक्त दृष्टि वाले कोकिल जिस प्रकार वाचाल एवं कामोद्दीपक होते हैं उसी प्रकार संसार में प्रायः कुकवि राग (द्वेषपूर्वक अनर्थाभिनिवेश) से युक्त दृष्टि वाले होकर असम्बद्ध प्रलाप करते हैं और स्वेच्छानुसार काम करते हैं (न कि आलङ्कारिकों द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलते हैं) ॥ ४ ॥ कुत्तों के समान घर-घर में केवल जन्म लेनेवाले† कवि असंख्य हैं, जो स्वरूप मात्र का वर्णन करते हैं। शरभों के समान उत्पादक‡ अर्थात् नव निर्माण करने वाले कवि † जातिभाजः, अर्थात् वे कवि जो केवल जाति (स्वभाव वर्णना मात्र) करने वाले, वक्रोक्तिशून्य हैं। ‡ उठे पैरों वाले। शरभ एक प्राणी है जिसके आठ पैर होते हैं और सब ऊपर की ओर उठे रहते हैं। १. मूर्त्तयः । २. कामचारिणः ।

प्रथम उच्छ्वासः ५ उत्पादका न बहवः कवयः शरभा इव ॥ ५ ॥ अन्यवर्णपरावृत्त्या बन्धचिह्ननिगूहनैः । अनाख्याताः सतां मध्ये कविश्चोरो विभाव्यते ॥ ६ ॥ श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडेम्बरम् ॥ ७ ॥ यति । उत्पादना नवनिर्माणकारिणः, ऊर्ध्वपादाश्च । शरभा हि प्राणिभेदाः । अष्ट- पादा एते । श्वजातीया इति केचित् ॥ ५ ॥ अन्येति । कविश्चोरः सहृदयानां मध्येऽनाख्यातः न कथितोऽपि ज्ञायते । न आ समन्तात्ख्यातः, अपि तु किञ्चित्प्रथितो वा । अन्ये पूर्वकविनिबद्धविलक्षणा ये वर्णा अक्षराणि तेषां रचनेन बन्धचिह्नं श्रीलक्ष्मीप्रभृतिरचनालिङ्गम् । अन्ये तु भाषा- लंकारप्रभृतिबन्धचिह्नमाहुः । अथ च सतां साधूनां मध्ये चौरो लक्ष्यते । कीदृक् ? न ना अना कापुरुषः अख्यातोऽप्रसिद्धः । केन ? अन्यः प्राक्तनच्छायाव्यतिरिक्त- स्त्रासकृतः पाण्डिमादिवर्णो मुखरागविशेषस्तत्परिवर्तनेन । यद्वा—शूद्रत्वे सति द्विजादिवर्णाश्रयेण । स्वजात्युचितस्य स्वभावस्य त्यक्तुमशक्यत्वाद्भावप्रकटनमवश्य- मेव भवति । यतो बन्धः शृङ्खलादिकृतो ग्रन्थिस्तच्चिह्नं त्वग्दूषणादि ॥ ६ ॥ श्लेषेत्यादि । मात्रकपदेन श्लेषयमकाद्यलंकारशून्यत्वं दर्शयति । अक्षरेत्यादि- नार्थविशेषाभावं प्रसादादिगुम्फनाभावं चाख्याति । एतदुक्तं भवति—क्वचित्कश्चिद् गुणोऽपि भवति । स च भवन्नपि न सहृदयजनावर्जक इति । अमुनैवाभिप्रायेण नव इत्यादीनि प्रत्येकं विशेषणपदानि वक्ष्यति ॥ ७ ॥ जगत् में बहुत नहीं हैं ॥ ५ ॥ सहृदय जनों के बीच अप्रसिद्ध कवि दूसरे कवि के वर्णों को बदल देने से एवं निर्माण के चिह्नों को छिपाने से चोर समझा जाता है, क्योंकि चोर भी लोगों के बीच मुख के अक- स्मात् फीके पड़ जाने से और हाथों पर लगे हुए बेड़ी के दागों को छिपाने से पहचान लिया जाता है ॥ ६ ॥ उत्तरी क्षेत्र के कवियों की रचना श्लेष-प्रधान होती है । पश्चिमी क्षेत्र के कवि प्रधान रूप से अर्थाडम्बर में लगे रहते हैं । दाक्षिणात्य कवि उत्प्रेक्षा करने में निपुण होते हैं और गौड़- देशीय ( प्राच्य ) कवियों की रचना में अक्षरमात्र का प्राचुर्य रहता है ॥ ७ ॥ १. डम्बरः ।

नवोऽर्थो जातिरग्राम्या¹ श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुतो रसः । ²विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुष्करम् ॥ ८ ॥ किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी । कथेव भारती यस्य न ³व्याप्नोति जगत्त्रयम् ॥ ९ ॥ उच्छ्वासान्तेऽप्यखिन्नास्ते येषां वक्त्रे सरस्वती ।

नव इत्यादि । नव आद्यैः कविभिरनिबद्धः, चमत्कारी च । जातिः स्वभा- वोक्तिः । अग्राम्येति । न तु 'गतोऽस्तमर्कः' इत्यादिरूपा । सधर्मेषु तन्त्रप्रयोगः श्लेषः । अक्लिष्टः सम्यगनेकार्थप्रतिपादनक्षमः । स्फुटो दुर्बोधमङ्गवागादिभिरदूषितः। रसः शृङ्गारादिः । विकट उदारतालक्षणबन्धगुणयुक्तः । यत्र सति नृत्यन्तीव पदानि प्रतिभासन्ते ॥ ८ ॥ किमित्यादि । वृत्तानि वर्णमात्रागणसमाधंसमविषमरूपाणि तदन्तगमनं तद्वि- रचनक्षमत्वम् । भारती वाणी । व्याप्नोति । अदृष्टमपि दृष्टमिव जगत्त्रयं प्रतिमानव- शाद्व्युत्पत्तेश्च तथात्वेन प्रकाशयति । यद्वा—जगत्त्रयप्रथिता भवतीति स्फुट एवार्थः । भरतानधिकृत्य ग्रथिता भारती कथेव । सापि सर्वे ये वृत्तान्ताः सत्पुरुषचरितान्यु- पाख्यानानि च तान्गमयति बोधयति । तथा सर्वत्र ज्ञेया भवति । तथा च— ‘नारदोऽश्रावयद्देवानसितो देवलः पितॄन् । गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः ॥' इत्युक्तम् ॥ ९ ॥ अधुना स्वगुरुतः स्वप्रभृतिभिः कृतानाख्यायिकादीन्काव्यभेदान्स्तुवन्नोद्धत्यार्थं सर्वत्र नमस्कारमाह—उच्छ्वासान्त इति । उच्छ्वास इवोच्छ्वासो विश्रान्तिस्थानं सर्गादिवत्कथासन्धिरतस्यान्तेऽप्यखिन्ना उच्छ्वासान्तरकरणक्षमाः । अविच्छिन्नप्रति- माना इति यावत् । गुरुत्वादबहुवचनम् । 'नान्त्यन्ते ह्याम्बुघेर्वक्त्रम्' इति वक्त्रलक्षणम्' ।

नवीन अर्थ (जिसे अबतक किसी कवि ने नहीं लिखा हो, अर्थात् चमत्कारी), अग्राम्य जाति (अर्थात् स्वभावोक्ति) अक्लिष्ट (बिना माथापच्ची के ही समझ में आ जाने वाली) श्लेष, सुबोध रस एवं आकर्षक शब्दों का संचयन—इन सब गुणों का एकत्र (किसी काव्य में) होना कठिन है ॥ ८ ॥ उस कवि के काव्य से क्या, जिसकी वाणी सब प्रकार के वृत्तान्तों वाली महाभारत की कथा के समान तीनों जगत् में व्याप्त नहीं होती ॥ ९ ॥ जो उच्छ्वास के बाद भी नहीं थकते और जिनके मुख में सरस्वती विराजमान है

१. अग्राम्याः । २. विकटो । ३. प्राप्नोति दिगन्तरम् ।

प्रथम उच्छ्वासः कथमाख्यायिकाकारा न ते वन्द्याः कवीश्वराः ॥ १० ॥ कवीनामगलद्दर्पो नूनं वासवदत्तया । शक्त्येव पाण्डुपुत्राणां गतया कर्णगोचरम् ॥ ११ ॥ पदबन्धोज्ज्वलो³ हारी कृतवर्णक्रमस्थितिः । भट्टारहरिश्चन्द्रस्य गद्यबन्धो³ नृपायते ॥ १२ ॥ वक्त्रे सरस्वती । वृत्तविशेषयोगिनीत्यर्थः । एतस्मिन्नाख्यायिकाङ्गिर्भाविवस्तुसंस्- चनाय वाग्विरच्यते । तथा चाह भामहः—'वक्त्रं चापरवक्त्रं च काव्ये काव्यार्थ- शंसिनि' इति । आख्यायिकाः कुर्वन्तीत्याख्यायिकाकाराः । यद्वा—आख्यायिकैवा- कारो येषाम् । अथ 'कविं पुराणम्' इति न्यायेन कवयश्च त ईश्वरा हरिहरब्रह्माणः । उच्छ्वसन्ति भूतान्यस्मिन्नित्युच्छ्वासः कल्पस्तदन्ते संहारेऽपि तेऽखिन्नाः कल्पान्तर- जननोद्योगिनस्तेषां मुखे वागीशी । उक्तं च—सरस्वतीवाग्बलमुत्तमोऽनिलः’ इत्यादि । आख्यायिकाभिराख्यानैराकारो येषाम् । सर्वस्य हि शास्त्रागमसमधि- गम्याः, न पुनः प्रत्यक्षलक्ष्याः । ते च वन्द्याः सर्वस्य ॥ १० ॥ कवीनामिति । वासवदत्ता कथा, वासवेन शक्रेण दत्ता च । कर्णः श्रवणं, राधेयश्च । कवीनां काव्यकर्तॄणां, द्रोणादीनां च ॥ ११ ॥ पदेत्यादि । पदानां सुप्तिङन्तानां बन्धः प्रकृष्टा रचना । रीतिरित्यर्थः । स्वमण्डलावष्टम्भश्च । हारी हृद्यः, हारयुक्तश्च । अहारीति वा । न कस्यचिदपि यो हरति । कृता वर्णानामक्षराणां क्रमेण भामहादिप्रदर्शितनीत्या स्थितिरवस्थां यत्र, कृतयुगवर्द्धर्णानां द्विजादीनां क्रमेण मन्वादिस्मृतिकारप्रकाशितमार्गेण स्थितिः पालनं यस्मिन्सतीति च । भट्टारेति पूजावचनम् ॥ १२ ॥ ऐसे आख्यायिकाओं का निर्माण करने वाले कवि क्यों नहीं वन्दनीय हैं ? ॥ १० ॥ निश्चय ही सुबन्धु की रचना 'वासवदत्ता' के कानों तक पहुँचते ही कवियों का अभि- मान उस प्रकार चूर्ण हो गया जिस प्रकार इन्द्र द्वारा प्राप्त 'शक्ति' नामक अस्त्र विशेष को कर्ण के पास देखते ही द्रोण आदि का गर्व बिल्कुल नहीं रहा ॥ ११ ॥ आर्य हरिश्चन्द्र द्वारा निर्मित गद्यकाव्य राजा के समान है, उसमें शब्दों की रचना निर्मल है, वह मनोहर है एवं उसमें आलंङ्कारिकों के मतानुसार अक्षरों की एक क्रम से संघटना है । (राजा भी अपने पद या मण्डल पर जम कर रहता है, हार धारण करता है, या 'अहारी' पाठ के अनुसार किसी का हरण नहीं करता एवं ब्राह्मण आदि वर्णों की क्रमानुसार स्थिति रखता है) ॥ १२ ॥ १. पुत्रस्य । २. पदबद्धोज्ज्वलो हारिकृतकण्ठक्रमस्थितिः । ३. पद्य ।

८ हर्षचरितम् १अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः । विशुद्धजातिभिः कोशं रत्नैरिब सुभाषितैः ॥ १३ ॥ कीर्तिः प्रवरसेनस्य प्रयाता कुमुदोज्ज्वला । सागरस्य परं पारं कपिसेनेव सेतुना ॥ १४ ॥ सूत्रधारकृतारम्भैर्नाटकैर्बहुभूमिकैः । सपताकैर्यशो लेभे ३भासो देवकुलैरिव ॥ १५ ॥ ४निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु । अविनाशिनमित्यादि । अविनाशिनं प्रसिद्धम्, अनश्वरं । च अग्राम्यं वैदग्ध्य- युक्तम्, अग्राममवं च । जातिः स्वभावोक्तिरूपोऽलङ्कारः । कोशः समुच्चयः, शब्दज्ञश्च । सुभाषितैः सूक्तिभिः, शोभनं च भाषितं प्रभाववर्णनं येषां तैः ॥ १३ ॥ कीर्तिरत्यादि । प्रवरसेन कश्चित्कविः प्रवे प्लुते रसो येषां ते प्रवरसा वानरा- स्तेषामिनः स्वामी, प्रवरा च सेना यस्य स सुग्रीवश्च । कुमुदवत्कैरववत् । यद्वा—कुमु- मिस्तस्या मुत् प्रहर्षस्तद्येति, कुमुदेन वानरसेनापतिना च । सेतुः प्राकृतकाव्यग्रन्थः, सेतुश्च ॥ १४ ॥ सूत्रेत्यादि । सूत्रधारः पूर्वरङ्गस्य प्रवक्ता याञ्चिक्यः' स्थपतिश्च । भूमिकाः पात्राणि रामाद्यनुकार्यावस्थाभूमयः, उपभोगनिमित्तान्युत्पत्तिस्थानानि । पताका अर्थप्रकृतिः । उक्तं च—'बीजं बिन्दुः पताका च प्रकरी कार्यमेव च । अर्थप्रकृतयो ह्येताः पञ्च सर्वप्रयोगाः ॥' इति । 'यदवृत्तं तु परार्थं स्यात्प्रधानस्योपकारकम् । प्रधान वच्च कल्पेत सा पताकेति कीर्त्यते ॥' इति वैजयन्ती च पताका ॥ १५ ॥ निर्गतास्विति । निर्गता उच्चारितमात्राः । आस्तां तावदर्थविगतिः, आपात एव सातवाहन ने निर्दोष गुणालङ्कारयुक्त सुभाषितों का एक संग्रह तैयार किया जो विशुद्ध जाति के रत्नों के कोष के समान कभी विनष्ट नहीं होने वाला, वैदग्ध्यपूर्ण हुआ ॥ १३ ॥ प्रवरसेन नामक कवि की कुमुद के समान उज्ज्वलकीर्ति सेतु (बन्ध) नामक प्राकृत काव्य के द्वारा पार कर गई, जैसे कुमुद नाम के एक बानर-सेनापति से शोभित वानरों की सेना सेतु के द्वारा समुद्र पार पहुँच गई थी ॥ १४ ॥ भास ने देवमन्दिरों के समान अपने नाटकों से लोक में ख्याति प्राप्त की जिनका आरंभ सूत्रधार करता है, जिनमें पात्रों की भूमिकायें (अवस्थायें) और सहायक कथायें (पताका) रहती हैं ॥ १५ ॥ नई उगती हुई मंजरियों के समान मधुर एवं सरस कालिदास की सूक्तियों में १. कुविनाशिनम् । २. भूपिकैः । ३. भासा । ४. निसर्गसूरवंशस्य ।

प्रथम उच्छ्वासः ९ प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥ १६ ॥ समुद्दीपितकन्दर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा ॥ १७ ॥ गीतध्वनिवत्किमपि श्रोत्रहारिणः । यदुक्तम्—'अपर्यालोचितेऽप्यर्थे बन्धसौन्दर्य- संपदा । गीतवद्धृदयाह्लादं तद्विदां विदधाति यत् ॥ तत्काव्यम्' इत्यादि । तथा निर्गताः सर्वदेशप्रतीताः, अन्यत्र—निर्गता अभिनवोद्भिन्नाः न वा कस्येत्यनेनैतदुक्तम् । आस्तां तावत्काव्यतत्त्वविदः सहृदया विवेक्तारः येऽपि शास्त्रप्रहितबुद्धयो दुरूह- मत्सरप्रायास्तेषामपि या हृदयमाह्लादयन्ति । तथा चोक्तम्—'असुणिअ परमंथाण वि हरेइ वाआमआणं कइम्माण । आणणजकुवलअवणमलद्धगंधाण वि सुहाइ ॥', इति । मधुराश्च ताः सान्द्राः सरसाः । अन्यत्र—मधुना मकरन्देन जलकेन रसेन सान्द्राः सुगन्धयः ॥ १६ ॥ समुदित्यादि । बृहत्कथा कस्य न विस्मयाय । अपि तु सर्वस्यैव गर्वविनाशाय भवतीत्यर्थः । अद्भुतकथावर्णनादाश्चर्याय । समुद्दीपितो वृद्धिं नीतः कंदर्पो यस्याम् । कामजनानां बहूनां वृत्तान्तानां वर्णनादुद्बोधितः स्मरो ययेति वा । काव्यसेवया हि शृङ्गाररसः समुद्भवति । तथा चोक्तम्—'ऋतुमाल्यालंकारप्रियजनगान्धर्वकाव्य- सेवाभिः । उपवनगमनविहारैः शृङ्गाररसः समुद्भवति ॥' यद्वा समुद्दीपितः ख्यातिं नीतः कन्दर्पो नरवाहनदत्तो यस्यामिति । स हि कामांश इत्यागमः । कृतं गौर्या विद्याभेदस्याराधनं यस्याम् । सा हि नरवाहनदत्तेनेशारूपाराधितेति तत्रोक्तम् । यद्वा—गौरीं प्रति पूरयति गौरप्रः । साधनपरिकरबन्धो यथा प्रस्तावो यस्मात् । गौरीप्रेरितेन हि हरेण तथा तस्यां परिकरबन्धः कृतो यथा सातीव पिप्रिये । हर- लीलापि समुत् सहर्षा, दग्धकामा च । कृतं गौर्याः प्रसाधनं मण्डनं यस्याम् । क्व कामं प्रति तादृग्द्वेषः, क्व च कान्तां प्रति प्रसाधनमिति कृत्वा विस्मयमाश्चर्यम् ॥ १७॥ उच्चारमात्र से ही किसे आनन्द नहीं आता ? ॥ १६ ॥ जैसे कामदेव को जलाकर भस्म करना और पार्वती का शृङ्गार करना आदि परस्पर विरुद्ध बातों से शिव की लीला किसे नहीं विस्मित करती, उसी प्रकार वर्णनों द्वारा कन्दर्प (कामदेव या नरवाहनदत्त) को प्रकाशित करने वाली एवं पार्वती के प्रति आराधना से युक्त (गुणाढ्य की) बृहत्कथा किसे नहीं विस्मय-विमुग्ध करती ? ॥ १७ ॥

१० | हर्षचरितम् 'आढ्यराजकृतोत्साहैर्हृदयस्थैः स्मृतैरपि । जिह्वान्तःकृष्यमाणेव न कवित्वे प्रवर्तते ॥ १८ ॥ तथापि नृपतेर्भक्त्या भीतो निर्वहणाकुलः । करोम्याख्यायिकाम्भोदौ जिह्वाप्लवनचापलम् ॥ १९ ॥ सुखप्रबोधललिता सुवर्णघटनोज्ज्वलैः । शब्दैराख्यायिका भाति शय्येव प्रतिपादकैः ॥ २० ॥ आढ्येति । आढ्यराजः कश्चित्कविः । उत्साहो नृत्ते तालविशेषः । उदीर्यमाणऽ- गीत्याधारभूतपदोपचारात्काव्यमप्युत्साह इति केचित् । यत्र पूर्वं श्लोकेनार्थ उपक्षि- प्यते, पश्चात्स एव गद्येन वितन्यते, मध्ये वृत्तानिबन्धश्च भवति, स परिसमाप्तार्थ उत्साह उच्यत इत्यन्ये । अपिः समुच्चये । यद्वा—आढ्यराजहृदयस्था अप्यन्तर्जिह्वां नाकर्षयन्ति, तत्कथा त एव स्मृता इत्यपि शब्दार्थः ॥ १८ ॥ एवमनौद्धत्यमुक्तवाह—तथेत्यादि । तथापीत्थं जानन्नपि जिह्वाप्लवनलक्षणं चापलं करोमि । यतो नृपतेर्भक्त्याहमभि इतः समन्ताद्युक्तः । निर्वहणे समाप्ता- वाकुलः । जिह्वा चाम्भावकालवातस्तत्र वहन्त्यां कश्चिद्यथा प्लवनरूपं चापलं करोति । अत्र पक्षे—अभीतोऽत्रस्तः निर्वहणं पारप्राप्तिः । 'कृत्ये च' इति णत्वम् ॥ १९ ॥ सुखेत्यादि । सुखेन जायासम्मितत्वेन हृदयाह्लादनपूर्वम्, न तु वेदितहासादि- वत्, यः प्रबोधः प्रकृष्टं बोधनं धर्मादिसाधनव्युत्पत्तिः । उक्तं च—'कटुकोषधि- आढ्यराज के उत्साह या महान् कार्य को हृदयस्थ करके स्मरण करने पर मानो मेरी जीभ मुँह के भीतर की ओर खिंची जा रही है और कविता करने में प्रवृत्त नहीं हो रही है (निष्कर्ष यह कि आढ्यराज के सामने मैं कवि बनने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ) ॥ १८ ॥ ऐसा जानता हुआ भी मैं सम्राट् के प्रति अपने असाधारण अनुराग से प्रेरित होकर आख्यायिका रूपी समुद्र को पार करने में आकुलता और भय का अनुभव करते हुए भी अपनी जीभ (अर्थात् वाणी द्वारा) के चप्पू द्वारा तैरने की चपलता कर रहा हूँ ॥ १९ ॥ बिना किसी आयास के सुखपूर्वक समझ में आ जाने से सुन्दर लगने वाली और आकर्षक रचना वाले एवं विवक्षित अर्थ को व्यक्त करने वाले शब्दों से आख्यायिका उस शय्या के समान शोभित है जिसपर सुखपूर्वक नींद तोड़ी जाती है और जो सोने से मढ़े पायों से चमकती है ॥ २० ॥ १. आद्य । २. घटनोज्ज्वला; घटिटोज्ज्वला ।

जयति¹ ज्वलत्प्रतापज्वलनप्राकारकृतजगद्रक्षः² । सकलप्रणयिमनोरथसिद्धिश्रीपर्वतो हर्षः ॥ २१ ॥ वत्काव्यमविद्याव्याधिभेषजम् । आह्लाद्यमृतवत्काव्यमविवेकगदापहम् ॥' इति । सुवर्णघटना शोभनाक्षररचना । प्रतिपादकैर्विवक्षिताभिधायकैः । शय्यापक्षे-सुखं यः प्रबोधः स्वापादुरुत्थानम् । सुवर्णघटना हेमयोजना । प्रतिपादकैः खट्वाया उत्थापकैः । तदा पादानां प्रतिच्छन्दाः प्रतिपादकाः पुरुषयत्नोत्थापिताः पादमुद्रास्तैः । अत्र च शोभनो वर्णोऽलक्तादिकृतः ॥ २० ॥ इदानीं यमुद्दिश्येयमाख्यायिका क्रियते तस्य 'तथापि नृपतेर्भक्त्या' इत्यनेन नृपतिशब्देन सामान्येन निर्देशं कृत्वा विशेषेणाह—जयतीत्यादि । ज्वलन्दोप्रतया प्रसरन्, प्रताप एव ज्वलनस्तं प्राति पूरयति य आकारस्तेन कृता जगति रक्षा येन सः । सकलानां प्रणयिनां ये मनोरथास्तत्सिद्धौ श्रियां पर्वतो गिरिः । श्रियस्तत्र कटी- भूता इव स्थिता इति यावत् । यद्वा—यथा पर्वतस्थः कश्चिद्दुरभिभवः, तद्वद्वक्षस्या श्रीरिति । अथ च श्रीपर्वताख्यो गिरिरोहगेव । तथा च ज्वलत्प्रकृष्टतापो यो ज्वलनो 'जठराग्निः स एव निषेधकत्वात्प्राकारः सालस्तेन कृता मुक्तेर्विघ्नहेतुतया जगतो भूलोकस्य रक्षा येन सः । अन्यत्रोत्सादनं तद्यावत् । अन्ये तु—त्रिपुरदाहे यो विघ्नमकरोद्गणेशस्तदा हरेण ज्वलत्प्रकृष्टतापो ज्वलनप्रकारो निर्मितः । तेन तत्र रक्षा विधीयत इत्याहुः । ज्वलनप्राकारश्च द्वौ मुद्रारूपौ मन्त्रविशेषौ स्तः, ताभ्यां कृतजगद्रक्ष इति केचित् । प्रणयिनः सिद्धिकामाः । हर्षः कथानायकः । इतरत्र- हर्षकारितया हर्षः । सर्वत्र च परमार्थतो हर्ष एव जयति । तस्यैवाभिलषणीय- त्वात्स एव काव्येन क्रियत इति ध्वनयति ॥ २१ ॥ सम्राट् हर्ष की विजय हो, जो चारों ओर प्रज्वलित प्रतापाग्नि की दीवार बनाकर सारे जगत् की रक्षा करते हैं और जो समस्त प्रियजनों के मनोरथ सिद्ध करने में †श्रीपर्वत के सदृश हैं ॥ २१ ॥ † श्रीपर्वत—यह आन्ध्र के गुण्टूर जिले का एक पर्वत है जो छठी-सातवीं शताब्दियों में मन्त्र-तन्त्र के लिए प्रसिद्ध था । मन्त्रयान का जन्मस्थान यही था । मालतीमाधव और कादम्बरी में भी इसका उल्लेख है । इसके सम्बन्ध में तत्कालीन समाज में यह प्रसिद्धि थी कि यहाँ हर प्रकार के मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं । मालतीमाधव की एक भिक्षुणी सौदामिनी मन्त्र-तन्त्र सीखने श्रीपर्वत पर गई थी और कादम्बरी के जरद्द्राविड़ धार्मिक को भी श्रीपर्वत से सम्बन्धित अचम्भों की बहुत बातें याद थीं । १. जयत्युज्ज्वलप्र० जयज्ज्वलप्र० । २. प्रकार ।

१२ हर्षचरितम् एवमनुश्रूयते—पुरा किल भगवान्स्वलोकमधितिष्ठन्परमेष्ठी विका- सिनि पद्मविष्टरे समुपविष्टः ^१सुनासीरप्रमुखैर्गीर्वाणैः^२ परिवृतो ^३ब्रह्मोद्याः कथाः कुर्वन्नन्याश्च निरवद्या विद्यागोष्ठीर्भावयन्कदाचिदा- साञ्चक्रे। तथासीनं च तं त्रिभुवनप्रतीक्ष्यं मनुदक्षचाक्षुषप्रभृतयः प्रजापतयः सर्वे च सप्तर्षिपुरःसरा ^४महर्षयः सिषेविरे। केचिदृचः स्तुतिचतुराः समुदचारयन्। ^५केचिदपचितिभाञ्जि यजूंष्यपठन्। केचित्प्रशंसासामानि^६ सामानि जगुः। अपरे ^७विवृतक्रतुक्रियातन्त्रा- एवमिति। अनुश्रूयते पारम्पर्येणाकर्ण्यते। किलेत्यत एवागमसूचनाय। भग- वानिति केवलनिर्देश उल्लुण्ठनपरिहारार्थम्। ब्रह्मलोकमित्युक्ते सत्युत्कर्षदायिन्या- त्मीयताप्रतिपत्तिर्न स्यादिति स्वग्रहणं साभिप्रायम्। अधितिष्ठन्बहुमानेन तद्योग- क्षेमादिकमुद्वहन्। परमे पदे तिष्ठतीति परमेष्ठी। विकासिनीति नित्ययोग इनिः। विष्टरमासनम्। सुनासीरः इन्द्रः। गिरः स्तुतिरूपा वर्णयन्ति भजन्तीति गीर्वाणा देवाः। गीरेव बाणः शरो येषामिति वा, परिवृतश्चतुर्दिक्कं वृतः परिवलितः। तस्य चतुर्मुखत्वात्। ब्रह्म वदन्तीति ब्रह्मोद्याः। 'वदः सुपि क्यप् च'। ब्राह्मणा वेदेन, ब्रह्माणि परमात्मनि वा वेदितव्या ब्रह्मोद्याः। उक्तं च--'ब्रह्मोद्या सा कथा यस्या- मुच्यते ब्रह्म शाश्वतम्' इति। सामान्यविशेषभावेन 'उष्ट्रासिकामासते' इतिवत्। ब्रह्मवदनरूपा वा कथास्तासां वक्ष्यमाणगोष्ठ्यभिप्रायेण प्राधान्यात्स्वयं करणम्। निरवद्या दोषरहिताः। तथा च वात्स्यायनः--'या गोष्ठी लोकविद्विष्टा या च स्वैर- विसर्पिणी। परहिंसात्मिका या च न तामवतरेद्बुधः॥ लोकचित्तानुवर्तिन्या क्रीडा- मात्रैककार्यया। गोष्ठ्या सह चरन्विद्वांल्लोकसिद्धिं नियच्छति॥' समानविद्या- ऐसा सुना जाता है—बहुत पहले की बात है, भगवान् ब्रह्मा अपने ब्रह्मलोक में शासन कर रहे थे। किसी विकसित कमल के आसन पर विराजमान हो इन्द्रप्रमुख देवताओं के बीच घिरे हुए शाश्वत ब्रह्म के विषय में चर्चा कर रहे थे और अन्य दोषरहित विद्यागोष्ठियों में भाग ले रहे थे। उस प्रकार बैठे हुए तीनों लोकों के पूजनीय भगवान् ब्रह्मा की सेवा में मनु, दक्ष, चाक्षुष आदि प्रजापति और सप्तर्षि आदि सब महर्षि संलग्न थे। स्तुति में चतुर उनमें कुछ ने ऋचाओं का पाठ किया। कुछ ने पूजन के यजुर्वेदीय मन्त्र पढ़े। कुछ ने प्रशंसामूलक सामों को १. शुनासीर। २. गीर्वाणगणैः। ३. ब्रह्मोदिताः। ४. महामुनयः। ५. अपि विभाञ्जि। ६. सामानि। ७. विततक्रतु०।

Digitized by Arya Samaj Dayanand Ashram Chennai and eGangotri १३ न्मन्त्रान्व्याचचक्षिरे । विद्याविसंवादकृताश्च तत्र तेषामन्योन्यस्य १विवादाः प्रादुरभवन् । अथातिरोषणः प्रकृत्या महातपा मुनिरत्रेस्तनयस्तारापतेर्भ्राता नाम्ना दुर्वासा द्वितीयेन मन्दपालनाम्ना मुनिना सह कलहायमानः २सामगायन्क्रोधान्धो विस्वरमकरोत् । सर्वेषु च तेषु ३शापभयप्रति- पन्नमौनेषु मुनिष्वन्यालापलीलया चावधीरयति४ कमलसम्भवे, भगवती कुमारी किञ्चिदुन्मुक्तबालभावे भूषितनवयौवने वयसि५ वित्तशीलवृद्धिवयसामनुरूपैरालापैरेकत्रासनबन्धो गोष्ठी । प्रतीक्ष्यः पूज्यः सम्यगु- दात्तादिभ्रैश्चर्यादिप्राधान्यादुदचारयञ्जगुः । अपचितिः पूजा । सामानि जगुरिति साम्नां गानमेवोचितम् । विद्याविसंवादकृता इति, न तु मात्सर्यादिना । प्रादुरभव- न्नित्यनौचित्यशङ्कया तत्कर्तृत्वपरिहारः । प्रकृत्येति । अन्यथा ब्रह्मसन्निधानेन कथमीदृगाक्षेपः । कथमीदृशोऽवकाश इत्याह—महातपा इति । मुनिरित्यनेनास्य ज्ञानप्राधान्यात्तुल्यतोद्भासनमतीवोप- कारः । अत्रेस्तनय इति न केवलं महातपस्वेन यावदत्रितनयत्वेन ब्रह्मलोकप्राप्ति- रस्य । ततस्तारापतेरित्यादिना तथाभूतपरमप्रजापतिसम्बन्धयोग्यत्वमस्याख्यायते । द्वितीयेनेति तत्समत्वमुच्यते । कथं सामगानेऽप्यनवहित इत्याह—क्रोधान्ध इति । सर्वेष्वित्यादौ देवी सरस्वती श्रुत्वा जहासेति क्रियाप्रतिपत्तिरस्य मा भूदित्युत्त मप्रकृति- त्वादन्येत्याद्युक्तम् । अन्येन सहा लापलीलाकथाक्रीडया । कुमारीति । कुमारीत्वेनास्या गान किया। अन्य लोगों ने यज्ञक्रियाआ के उपयोग में आनेवाले मन्त्रों की व्याख्या की। वहाँ उन लोगों के बीच मत-मतान्तर को लेकर परस्पर विद्याविषयक विवाद उठ खड़े हुए। तब स्वभाव से अत्यन्त क्रोधी, महातपस्वी, अत्रि का पुत्र, तारापति (चन्द्र) का भ्राता दुर्वासा का मुनि मन्दपाल नाम के दूसरे मुनि के साथ झगड़ा कर बैठा और सामगान करते हुए क्रोध से अन्धा होकर स्वर-भङ्ग कर दिया। शाप न दे दे, इस डर से सबके सब मुनि चुप हो गए और दूसरों के साथ बात करने के बहाने ब्रह्माजी ने भी (उस विस्वर साम- गान की) उपेक्षा की। पर कुमारी सरस्वती (वहीं उपस्थित थी)। वह कुछ-कुछ बालभाव छोड़ नये यौवन को सुशोभित करने वाली उम्र में आ पहुँची थी। १. विद्याविवादाः । २. सामगायः । ३. शापभवास्त्र । ४. अवधीरयति । ५. नवे वयसि । CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

१४ हर्षचरितम् वर्तमाना, गृहीतचामरप्रचलद्भुजलता पितामहमुपवीजयन्ती, निर्भर्त्सनताडनजातरागाभ्यामिव १स्वभावारुणाभ्यां पादपल्लवाभ्यां समुद्भासमाना, शिष्यद्वयेनेव पदक्रममुखरेण नूपुरयुगलेन वाचालित- चरणयुगला, धर्मनगरतोरणस्तम्भविभ्रमं बिभ्राणा जङ्घाद्वितयम्२, सलीलमुत्कलहंस३कुलकलालापप्रलापिनि मेखलादाम्नि४ विन्यस्त- वामहस्तकिसलया, विद्वन्मानसनिवासलग्नेन गुणकलापेनेवांसाव५- लम्बिना ६ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकाया, भास्वन्मध्यनायकमनेकमक्ता- नुयातमपवर्गमार्गमिव ७हारमुद्वहन्ती, वदनप्रविष्टसर्वविद्यालक्तक- हास्यादिकं नानुचितमिति दर्शयति । भूषितेत्यनेन दर्शनीयत्वमाह- पितामहमिति । सर्वप्राधान्यमनेनोक्तम् । निर्भर्त्सनं ताडनं तेन तदर्थं वा यत्ताडनं रोषादमुमिहननं तद्वशाच्च जातरागाभ्यामिव पादपल्लवाभ्यामित्येनेनारुणत्वं सौकुमार्यं चाह । अत एव गाढताडनेन रक्तत्वमुत्प्रेक्षितम् । ताडितो वायं ताडितस्तत्तुल्यो रागो जातो ययोरिति व्याख्येयम् । पदक्रमं पादन्यासपरिपाटी । अन्यत्र च—पदानि च क्रमश्च तत्पदक्रमम्, चरणौ पादौ चरणाश्च विशिष्टशाखापाठकता वाचालिताः शोभिता ययेति । उत्का उत्सुकाः । मेखलादाम्नि रशनागुणे । मानसं चित्तं, सरोविशेषश्च । चँवर पकड़ कर भुजलता को हिलाते हुए पितामह (ब्रह्माजी) पर झल रही थी। दुर्वासा के प्रति झुंझलाइट के कारण भूमि पर पटकने से मानो लाल हुए स्वाभाविक लाल अपने पादपल्लवों से शोभित हो रही थी। पदन्यास से मुखरित होने वाले नूपुरों से उसके दोनों चरण वाचाल हो रहे थे, मानो पदपाठ और क्रमपाठ के अभ्यास में मुखर दो शिष्य अपने चरण अर्थात् शाखा का स्वाध्याय कर रहे हों। उसकी दोनों जाँघें धर्मनगर के तोरणस्तम्भ का अनुकरण कर रही थीं। उत्सुक कलहंस की भाँति अव्यक्त शब्द करती हुई करधनी (मेखलादाम) पर वह लीला के साथ बायें हस्त-किसलय को रखे हुए खड़ी थी। विद्वानों के मानस (चित्त या मानस सरोवर) में हमेशा निवास करने से संक्रान्त हुए गुणों (श्लेष से तन्तुओं) के रूप में कंधे पर लटकते हुए ब्रह्मसूत्र से उसका शरीर पवित्र हो रहा था। वह चमकते हुए मध्यमणि युक्त और अनेक मोतियों से गुम्फित हार को पहने थी, जो सूर्य के मध्य से ले जाने वाले और अनेक मोक्षगामी जीवों द्वारा अनुसृत मोक्षमार्ग की तरह था। मुख में प्रविष्ट समस्त विद्याओं के चरण- १. स्वभावारुणपाद। २. द्वितीयम्। ३. कुलकल, कुलाकलालापप्र । ४. धाम्नि । ५. नेवांशाव । ६. सहजब्रह्म । ७. हारमुरसासमु ।

रसेनेव पाटलेन१ स्फुरता दशनच्छदेन विराजमाना, संक्रान्तकमला- सनकृष्णाजिनप्रतिमां २मधुरगीताकर्णनावतीर्णशशिहरिणामिव कपोल- स्थलीं दधाना, तिर्यक्सौवज्ञनुन्नमितैकभ्रूलता, श्रोत्रमेकं विस्वरश्रवण- कलुषितं प्रक्षालयन्तीवा४पाङ्गनिर्गतेन लोचनाश्रुजलप्रवाहेणेतरश्रवणेन च विकसितसितसिन्धु५वारमञ्जरीजुषा हसतेव प्रकटितविद्यामदा, श्रुतिप्रणयिभिः प्रणवैरिव कर्णवतंस६कुसुममधुकरकुलैरूपास्यमाना, सूक्ष्मविमलेन प्रज्ञाप्रतानेनेवांशुकैनाच्छादितशरीरा,७ वाङ्मयमिव

गुण अपि भास्वान्दोषो मध्यनायकः पदकं यत्र तत् । अथ च भास्वतो मध्यं तेन नयनि सः । यदुक्तम्—‘परिव्राड्योगयुक्तश्च शूरश्चाभिमुखे हतः । द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥’ इति । मुक्ता मौक्तिकानि, मोक्षगामिनश्च । हारं मुक्ता- कलापं च, अपवर्गमपि । हारं हरसम्बन्धिनं तत्प्रसादप्राप्यत्वात् । ‘अलक्तरसेनेव पाटलेन’ इति वा पाठः । स्फुरतेति रोषात् । भगवतीकपोले शशिहरिणस्यैवावतारः सम्भाव्यत इति शशिपदम् । अत्र हि कपोले ब्रह्मकृष्णाजिनसंक्रान्तिः, तत्र काम- सम्भावना सामान्यहरिणस्यावतरणे । कलुषितं प्रक्षालयन्तीवेति । सलिलस्य क्षालन- मेव युक्तमिति समुचितेयमुक्तिः । श्रुतिप्रणयिभिरिति । श्रूयते इति श्रुतिर्ध्वनिस्तया प्रणवः प्रशंसातिशयो येषां तैः यद्वा = श्रुतौ श्रोत्रे तत्कर्तृकः प्रणयः प्रार्थना मधुरः ध्वनित्वाद्येषां तैः । कर्णसम्बन्धैरिति व्याख्याने तु कर्णवतंसेत्यादिना पुनरुक्त्यम- परिहार्यम् । श्रुतिर्वेदोऽपि । सूक्ष्मार्थदर्शित्वात्सूक्ष्मस्तीक्ष्णः विमलस्तत्त्वग्राही । अन्यत्र—सूक्ष्मं तनु, विमल शुक्ल्म् । प्रतानः प्रसारः ।

के आलते मे मानों पाटल हुए (क्रोध से) फड़कते ओठ उसे सुशोभित कर रहे थे । उसके कपोलों पर ब्रह्माजी के काले मृगचर्म की छाया पड़ रही थी; मानो उसके मीठे गीतों को सुनने के लिए चन्द्रमा का मृग ही वहाँ उतर कर आ गया हो । उसकी एक भौंह कुछ तिरस्कार का भाव लिये हुए टेढ़ी और ऊपर की ओर उठी हुई थी । आँख के कोने से निकलते हुए आँसू की धारा से मानो वह भ्रष्ट पाठ के श्रवण करने से कलुषित अपने एक कान को धो रही थी और उसके दूसरे कान पर खिले हुए श्वेत सिन्धुवार की मञ्जरी हँस रही थी जिसमें उसका विद्यामद प्रकट हो रहा था । उसके कान पर लगे कर्नफूल पर भौंरे छाये हुए थे, मानों वह श्रुति (वेद) से प्रेम करने वाले अनेक प्रणवों (‘ओँ’ अक्षरों) से उपासित हो रही थी । प्रज्ञा के प्रतान की तरह बहुत बारीक तन्तुओं से बना और उज्ज्वल

१. पाटलेनेव च । २. साममधुर; समम; प्रतिबिम्बां मधुर । ३. सावर्णमु । ४. तीवाङ्गवनि । ५. सिन्दु । ६. संसक्तमधु; वतंसमधु । ७. तनुलता ।

१६ हर्षचरितम् निर्मलं दिक्षु दशनज्योत्स्नालोकं विकिरन्ती १ देवी सरस्वती श्रुत्वा जहास । दृष्ट्वा तु तां तथा हसन्तीं स मुनिः 'आः पापकारिणि, दुर्गृहीत- विद्यालवावलेपदुर्विदग्धे, मामुपहससि' इत्युक्त्वा शिरःकम्पशीर्य- माणबन्धविशरारोरुन्मिषत्पिङ्गलिम्नो जटाकलापस्य २ रोचिषा ३ सिञ्च- न्निव रोषदहनद्रवेण दश दिशः, कृतकालसन्निधानामित्रांन्धकारित- ४ ललाटपट्टाष्टापदामन्तकान्तःपुरमण्डनपत्रभङ्गमकरिकां भ्रुकुटिमाबध्नन्, अतिलोहितेन चक्षुषाऽमर्षदेवतायै स्वरुधिरोपहारमिव प्रयच्छन्, दृष्ट्वेत्यादौ । स मुनिस्तां तथा हसन्तीं दृष्ट्वा शापजलं जग्राहेति सम्बन्धः । तथेति पादताडनभ्रूक्षेपादिपूर्वम् । स मुनिरिति प्राग्वर्णितस्वरूपः । आ इत्यक्षमायाम् । मामिति योऽहं त्रैलोक्यप्रख्यातरौषणस्तमेवेति । समीप एव विशीर्यंते तच्छीलो विश- रारुरितश्चामुतश्च । अत एवोन्मिषत्पिङ्गलिमा । रोचिषा दीप्त्या । रोषदहनो द्रवो रस इव, द्रवत्वं च यद्यपि विशिष्टस्यैव तेजसः सुवर्णादि सम्भवति, तथाप्यत्रोप- चारात्साहश्यम् । कालः कृष्णो गुणो यमश्च । अन्धकारितं संकुचितत्वाददर्शनीयमेव चकितं ललाटपट्टमेवाष्टापदम् । यथा प्रतिपङ्क्ति अष्टौ पदान्यस्येत्यष्टापदं चतुरङ्गफलकम् । अत एवानेन भ्रूसमुन्नमनमव्यक्तीकृतरखेवत्तया विस्पष्टव्यलीक- मेतत् । 'ललाटमुपगीयते । भ्रुवोर्मूलसमुत्क्षेपादभ्रुकुटिं परिचक्षते' । सुशब्द्ः सुतरां अंशुक उसका शरीर ढँक रहा था। वह वाङ्मय के समान निर्मल अपने दाँतों से चाँदनी का आलोक दिशाओं में छिटका रही थी। (दुर्वासा के स्वरहीन पाठ को) सुन कर वह हँस पड़ी। दुर्वासा ने सरस्वती को उस प्रकार हँसते देखकर 'ओ पाप करने वाली, निम्न रूप से प्राप्त विद्या के लेश पर अभिमान से भरी ओ दुर्विदग्धे ! तू मेरा उपहास कर रही है?' यह कह कर बार-बार शिरःकम्प के कारण बंधन के शिथिल हो जाने पर इधर उधर खुले हुए पीताभवर्ण की चमक से युक्त, जटा-समूह के तेज से मानो क्रोधाग्नि के द्रव से समस्त दिशाओं को सींचने लगे। भौंहें चढ़ने लगीं, यमराज का सन्निधान प्राप्त कर चुकी थीं, उनके ललाटरूपी शतरंज खेल के पट्टे को मानो अपनी कालिमा से मलिन १. किरन्ती । २. जटासञ्चयस्य । ३. शोचिषा । ४. ललाटाष्टापदां, ५. अन्तर्केमण्डन ।

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम उच्छ्वासः १७ निर्दयदष्टदशनच्छदभयपलायमानामिव वाचं रुन्धन्दन्तांशुच्छलेन, ¹अंसा- वस्रंसिनः शापशासनपट्टस्येव ग्रथ्नन्ग्रन्थिमन्यथा कृष्णाजिनस्य, ²स्वेद- कणप्रतिबिम्बितैः ³शापशङ्काशरणागतैरिव सुरासुरमुनिभिः प्रतिपन्न- सर्वावयवः, कोपकम्पतरलिताङ्गुलिना करेण ⁴प्रसादनलग्नामक्षरमा- लामिवाक्षमालामाक्षिप्य कामण्डलवेन वारिणा ⁵समुपस्पृश्याचम्य शापजलं जग्राह । अत्रान्तरे स्वयम्भुवोऽभ्याशे⁶ समुपविष्टा देवी मूर्तिमती पीयूषफेन- नैरपेक्ष्यसूचनाय वा चोभयसम्बन्धः । अंसावस्रंसिन इति । संरम्भाच्छासनपट्टः शुक्लत्वाल्लिपिकार्ष्ण्याच्च सितासितवर्णसंवलितमध्यः पर्यन्तशुक्लश्च भवति । अत एव ते बिन्दुचित्रत्वादुपान्तशुक्लत्वाच्च कृष्णाजिनमुत्प्रेक्षते । यथा शासनपट्टे सति क्वचिद्ग्रामादावधिकारो भवति, तद्वच्च जनसमूहः प्रार्थनां करोति । स हस्तपादा- दिके सर्वस्मिन्नङ्गे गलति । कोपेत्यादौ कम्पग्रहणम् । रोषः शरीरं बाधत इति यावत् । सन्निवेशसाधर्म्यादुक्तम्—अक्षरमालामिवेति । सरस्वतीसम्बन्धितया चोक्तम्—प्रसादनलग्नामिति । विक्षिप्यन्ते । यश्च विरुद्धपक्षः प्रसादयति स विक्षि- प्यते तिरस्क्रियते । कामण्डलवेन मुनिकरकमवेन । समुपस्पृश्याचम्य । अत्रान्तर इत्यादौ मूर्तेश्चतुर्भिर्वेदैः सह सावित्रो समुत्तस्थ्याविति सम्बन्धः । कर रही हो और जैसे वे यमराज के अन्तःपुर की पत्रभङ्गमकरिकाएँ हों। आँखें अत्यन्त लाल हो गईं, मानो वे अमर्ष देवता के लिए अपने ही रुधिर का उपहार भेंट कर रहे थे । बड़ी बेदर्दी से ओठ कट जाने के भय से मानों भागती हुई वाणी को वे अपने दांतों की प्रभा के बहाने मानों रोक रहे थे । शाप के शासनपट्ट की भाँति कंधे गिरते हुए कृष्ण मृगचर्म की गांठ दूसरे प्रकार से बाँधने लगे । शाप के भय से शरण में आये हुए की तरह सुर, असुर और मुनि उनके स्वेदकणों से भरे समस्त अङ्गों में प्रतिबिम्बित हो रहे थे । क्रोध से उत्पन्न काँपकँपी के कारण चंचल अंगुलियों वाले हाथ से उन्होंने मानो प्रसन्न करने के लिए लगी हुई अक्षरमाला की भाँति अपनी अक्षमाला को फेंक दिया और कमण्डलु के जल- से आचमन करके शाप देने के लिए जल उठाया । इस अवसर पर देवी सावित्री ब्रह्माजी के समीप सदेह बैठी थी। वह अमृत के फेन १. असंस्रंसिनः । २. स्वेदंप्रति । ३. शापभयाच्छरण । ४. प्रसादलग्नामक्षमालां विक्षिप्य; अक्षरावलिकामिवाक्षरमाला । ५. स समुप । ६. अभ्यासे । २ ह० CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.