भारतकोश
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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

[ १०४ ] मालोजी तथा अन्यान्य मरहठे-सेनापति वीरता के साथ अपार शत्रु सेना का सामना करते हुये शहीद हो गये । दुश्मन मिल गये और एक दूसरे का साथ देने लगे । संयोगवश मरहठों की ध्वजा रुहेला और पठान सेना के बीच में घिर गई, जिसे बचाने के लिये मरहठे आगे बढ़े और घमसान का युद्ध होने लगा । दत्ताजी और जनकोजी झण्डे को खतरे में देखकर आपे से बाहर हो गये । दोनों ही टूट पड़े और लगे शूरवीरता दिखाने । एकाएक बहादुर जनकोजी को गोली लगी और वह घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा । दत्ताजी ने इसे देखा, पर किसी रक्षित जगह पर जाकर लड़ने के बजाय सीधे आगे बढ़ा । जो शत्रु सामने आया माग गया, और अपने अनुयायियों के साथ दत्ताजी आगे बढ़ता ही गया, और शत्रु सेना में उलझ गया ! आखिर होनी होकर ही रही । दत्ताजी को भी एक गोली लगी, जिसमें घायल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । नजीबखां के धर्मगुरु और पठान षड्यन्त्र के एक उत्साही कार्य- कर्त्ता कुतुबशाह ने मरहठा-सेनापति को गिरते देखा और वहां जाकर इस प्रकार व्यङ्गपूर्ण शब्दों में पूछा “पटेल, क्या हम लोगों से फिर लड़ोगे ?” मरते हुये जनरल ने निर्भीक उत्तर दिया, “हाँ, अगर बचा तो मैं फिर लड़ूंगा ।” इन शब्दों का उस वीर के मुख से निकलना था कि उस नीच और कायर का क्रोध भड़क उठा । उसने घायल योद्धा को पैर की ठोकर मारी और तलवार खींच कर बड़े गर्व के साथ विजयरूप में उसका सिर काट कर ले गया । इस प्रकार दत्ताजी का अन्त हुआ । संसार-भर में आज तक इस मरहठा वीर की तरह किसी भी सिपाही ने ऐसी सच्चाई, ईमानदारी के साथ अपनी राष्ट्रीय पताका को न बचाया होगा और न ही उसकी रक्षा में ऐसी वीरता-पूर्वक अपना बलिदान दिया होगा । इस वीर की मृत्यु और मरते हुये इस योद्धा के प्रति किये गये कायरतापूर्ण अपमान का समाचार महाराष्ट्र में पहुँचा । प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में प्रतिहिंसा की अग्नि धधक

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उठी और सारे मनुष्यों ने एक स्वर हो बदला लेने की आवाज़ उठायी। बालाजी और भाऊ ने अभी इसी सप्ताह उद्गीर के स्थान पर शानदार विजय प्राप्त की थी और चाहते थे कि हैदरअली को कुचल कर दक्खिन स्वतन्त्र करने का काम सम्पूर्ण कर दें। ठीक उसी समय दत्ताजी की पराजय और उनका मृत्यु-समाचार उनको मिला। उन लोगों ने समयोचित कार्य करने की तैयारी में एक क्षण भी देर नहीं की। यद्यपि उसी सप्ताह उन्होंने दक्षिण में एक बड़ा युद्ध किया था, तो भी एक दिन भी विश्राम न लेकर, अपने सेनापतियों और मन्त्रियों को पटदूर में इकट्ठे होने की आज्ञा दी और इस गम्भीर प्रश्न पर भली-भाँति विचार करके अब्दाली का सामना करने और उसके मालवा पहुँचने से पहले ही उससे लड़ने के लिये एक शक्तिशाली सेना भेजने का निश्चय किया। महाराष्ट्र- नवयुवक सेना में भरती हो गये। शमशेर बहादुर, विट्ठल शिवदेव, मानाजी घैरडे, अन्ताजी मनकेश्वर, मने, निम्बालकर तथा बहुत से अन्यान्य पुराने योद्धा और सेनापतियों ने फिर अपनी-अपनी बागडोर सम्भाली। उद्गीर-विजेता भाऊ सेनापति बनाया गया और बालाजी के ज्येष्ठ पुत्र नवयुवक राजकुमार विश्वासराव भी भाऊ के साथ गये। यह राजकुमार अभी उद्गीर में ख्याति पा चुका था और अपनी जाति का आशा-प्रदीप था। उस समय का विख्यात इब्राहीमखां गारदी, तोप- खाने का अध्यक्ष बनाया गया। दामाजी गायकव ड़ और सन्तोजी बाघ तथा अन्यान्य सेनापति क्रमशः आगे मिलाते गये। कई उत्तर भारतीय राजपूत राजाओं के यहां भी दूत और पत्र भेजे गये कि वे हिन्दुत्व के विरोधी तथा मथुरा गोकुल नष्ट करने वाले विधर्मियों के साथ युद्ध में उनको सहायता करें। विन्ध्याटवी और नर्मदा नदियों को पार करके मरहठा सेना चम्बल तक जा पहुँची। मरहठों की इस विशाल सेना और शक्ति को देखकर समस्त उत्तर भारत भयभीत और स्तम्भित हो गया। शत्रु भाव रखने वाले सब राव, राने, नवाब और खां साहबान हर

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गये; किसी को मरहटों की ओर उंगली उठाने का भी साहस न हुआ । शीघ्र ही जनकोजी शिन्धे भी अपनी सेना के साथ भाऊ से आ मिला। सारी महाराष्ट्र-सेना ने उस नौजवान और सुन्दर शूरवीर राजकुमार का बड़े उत्साह और प्रेम से स्वागत किया और 'बदान' के युद्ध में वीरगति प्राप्त उसके चाचा दत्ताजी की पुण्यस्मृति की प्रतिष्ठा उसी के प्रति प्रदर्शित की। भाऊ ने उस शूरवीर राजकुमार के उपलक्ष में, जिसने केवल १७-१८ वर्ष की अवस्था में ही कई लड़ाइयों में विजय प्राप्त की थी, और अपनी सेना तथा धर्म-रक्षा के लिये कितनी ही भयानक चोटें खाई थीं, एक वृहत् सभा की, और उसको सर्वसाधारण के सामने बहुत से बहुमूल्य उपहार तथा वस्त्रादि भेंट किये। जिस समय वीर विश्वासराव, जो बालाजी की अनुपस्थिति में महाराष्ट्र जाति का अतिप्रिय नेता था, जनकोजी से मिलने के लिये आगे बढ़ा, तब उस विशाल जातीय सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का हृदय तरंगित हो गया। ये दोनों ही नव- युवक एक से एक सुन्दर, बहादुर और अपनी जाति वालों के आदर्श और अभिलाषा को पूर्ण करने वाले तथा हिन्दू-जाति की उठती हुई आशा की सजीव मूर्ति थे। नजीबखां को धर्मपुत्र बनाने और दत्ताजी की सहायता के लिये आने में असावधानी करके भयंकर भूल करने वाले मल्हारराव होल्कर भी अपने किये का फल भुगत कर यानी दत्ताजी की पराजय के पश्चात् स्वयं अब्दाली से पराजित होकर भाऊ से आ मिले। अब भाऊ की इच्छा यमुना पार करके अब्दाली को नदी-तट पर पहुँचने से पहले ही हराने की हुई। उसने गोविन्द पन्त बुन्देला को आज्ञा दी कि तुम सुअवसर पाते ही अब्दाली की फ़ौज के पिछले भाग पर आक्रमण करो और उसकी रसद पहुँचनी बन्द कर दो। पर नदी में बाढ़ आई हुई थी और इतनी शत्रु सेना उसके दूसरी ओर पड़ा था, इसलिये उसका पार करना अत्यन्त दुष्कर था; इसलिये भाऊ ने दिल्ली जाकर उसे अब्दाली के पंजे से छुड़ाने का निश्चय किया। उत्तर भारत के समस्त राजाओं में केवल

[ १०७ ] जाट ही मरहठों की सहायता के लिये आये । भाऊ ने स्वयं आगे कर बड़ी प्रतिष्ठा के साथ उनका स्वागत किया और दोनों ने पवित्र जल स्पर्श करके अन्त तक शत्रु से युद्ध करने की शपथ खाई। अब सब की आँखें दिल्ली की ओर फिरीं । हिन्दू और दोनों ही ऐतिहासिक राजधानी दिल्ली को अधीन करने का महत्व करने लगे। भाऊ ने सिन्धिया, होल्कर और बलवन्तराव मेहेंदडाले सेनाओं को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा । पठानों ने, इस पर अधिकार जमाये बैठे थे, बड़े उत्साह के साथ सामना किया- मरहठों के साथ देर तक लड़ने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने में शहर को मरहठों के हाथ सुपुर्द कर दिया। शहर विजय मरहठा-सेना ने किले पर आक्रमण किया । मुसलमानों ने किले की के लिये बड़ी वीरता दिखलाई, पर मरहठों के सामने एक न चली उनकी भयंकर शक्तिशाली तोपों ने मुसलमानों के किले पर उनका अधि- कार रखना असम्भव कर दिया । मुसलमानी सेना ने हार मान ली राजधानी और किला हाथ आ जाने का समाचार सुनकर, हिन्दू-आन्दो- लन के पक्षपाती सभी मनुष्यों ने बड़ी खुशी मनाई । मरहठी-सेना ने बड़ी धूमधाम से दिल्ली में प्रवेश किया और ने मरहठी ध्वजा पाण्डवों की राजधानी में गाड़ दी। पृथ्वीराज के हिन्दू या दृग्भक्त सेना के लिये यह पहला ही अवसर था जबकि एक स्वतन्त्र झण्डे के तले इस उत्सव के साथ दिल्ली में प्रविष्ट हुई। आखिरकार पठानों, रुहेलों, मुगलों, तुर्कों, शेखों और सैयदों के प्रयत्न करने पर भी मुसलमानी हलाली झण्डा हिन्दुस्तान की राजधानी पर स्थिर न रह सका और उसके स्थान पर हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा लहराने लगा। शक्तिशाली मुस्लिम फ़ौज के साथ यमुना के दूसरे किनारे पर पड़ा हुआ अब्दाली कुछ भी न कर सका। सदाशिवराव अनुभव करने लगा कि चाहे एक ही दिन के लिये

[ १०८ ] क्यों न हो, हिन्दू-पद-पादशाही का स्वप्न मेरी आँखों के सामने पूर्ण हो ही गया। यदि कोई जाति अपनी वीरता से एक दिन के लिये भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर सके, तो वह दिन सचमुच उसकी नसों में जीवन का रक्त प्रवाहित होने का ज्वलन्त प्रमाण है। ऐसा भाग्यशाली दिन, अपनी अल्प आयु में भी, अपनी विकसित शोभा में शताब्दियों की सफलताओं, सत्कर्मों, प्रसन्नताओं और आपत्तियों तथा कठिनाइयों को आँखों के सामने ला देता है। एक उसी दिन ने भली-भाँति साबित कर दिया कि सात सौ वर्ष के मुसलमानों के अन्याय हिन्दुओं की आत्माओं या उनके फिर युवावस्था प्राप्त करने के विचार को कुचल न सके। उन्होंने केवल अपने आपको उनके बराबर ही साबित नहीं किया, प्रत्युत उन पर विजय भी प्राप्त की। भाऊ यदि चाहता तो विश्वासराव को सारे भारतवर्ष का महा- राजाधिराज बना देता और इस प्रकार उसने हिन्दू-पद-पादशाही का आरम्भ कर दिया होता। लेकिन इस बात में शीघ्रता न करके उसने राजनैतिक बुद्धिमत्ता का पर्याप्त परिचय दिया। उसने सोचा कि मरहटों के डर से हिचकने वाले मुसलमान ही नहीं, बल्कि ऐसा करने से उत्तर- भारत के सारे हिन्दू-राजे भी शत्रु बन जायेंगे; तो भी उसने सब लोगों की परीक्षा करने और इस अद्वितीय शुभ अवसर का दुश्मन और दोस्त दोनों पर समयोचित प्रभाव डालने का निश्चय कर लिया। इसलिये इस महान् कार्य के उपलक्ष में उसकी आज्ञा से एक शाही दरबार किया गया जिसमें विश्वासराव ने सभापति का आसन ग्रहण किया। उसमें महाराष्ट्र के प्रत्येक भाग के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इतना ही नहीं, बल्कि शूर- वीरता, वैभव, राजनीति, कुशलता और विद्वत्ता सब वहां सुशोभित थीं। दरबार आरम्भ हुआ। अश्वारोही सेना और तोपखाने, सहस्रों घोड़े और हाथी तथा कई हज़ार सिपाही और योद्धा जो हिन्दू-झण्डे को उत्तर में गोदावरी से सिन्ध तक और दक्षिण में समुद्र-तट तक ले गये थे; सहस्र नरसिंगों, तुरहियों, बन्दूकों और फ़ौजी ढोलों के साथ विजय की

[ १०६ ] सलामी देने को टूट पड़े। तथ सेनापति के पीछे सेनापति, सरदार, गवर्नर और वाइसराय नम्रतापूर्वक आगे बढ़े और अपने राजकुमार का हार्दिक अभिनन्दन किया, ठीक उसी प्रकार जैसा कि जाति का सभापतित्व ग्रहण करने वाले बादशाह का करते हैं, उसका विजेता के रूप में आदर किया। उस अद्भुत दृश्य के वालों ने उसका अर्थ समझ लिया। इसमें भाग लेने वाले प्रत्येक ने अनुमान किया कि यह उस बड़े राज्य-तिलक दरबार का पूर्व (रिहर्सल) है, जिसमें, अगर ईश्वर ने चाहा तो, इस नवयुवक • कुमार को सारे भारतवर्ष के महाराजाधिराज-पद से विभू- किया जायगा। १४ पानीपत मुसलमान भी दिल्ली की इस महान् कार्यवाही का अर्थ समझने से वञ्चित न रहे। यह समाचार अग्नि की तरह चारों ओर गया कि मरहठों ने अपने राजकुमार को समस्त भारतवर्ष का महा- राजाधिराज अभिषिक्त किया है। नजीबखां और दूसरे मुसलमान- नेताओं ने इन कार्यों की ओर इशारा करके अपने डर को न्यायोचित सिद्ध किया और मुसलमानों को इस गम्भीर परिस्थिति का बोध कराने का उद्योग किया। उन्होंने जोरदार शब्दों में घोषणा की कि हिन्दू- पद-पादशाही ही नहीं, “ब्राह्मण-पद-पादशाही' भी स्थापित हो गयी है, इसलिए प्रत्येक मुसलमान, जो अपने नबी का सच्चा भक्त है काफिरों की सेना से लड़ने के लिए रणक्षेत्र में उतर आये। परन्तु नजीबखां और अन्यान्य मौलवियों की तरंगभरी, जोश में लाने वाली, इस्लाम के नाम पर की गई वक्तृताओं की अपेक्षा, शुजां और दूसरे मुसलमानों के स्वार्थ-भाव का पलड़ा अधिक भारी रहा।

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रुहेले जैसे कट्टर हठधर्मियों की आंखें भी खुलने लगीं। अब्दाली के होते हुए भी जो सफलता मरहटों ने प्राप्त की थी, उससे प्रभावित हो, लोगों को विश्वास हो गया कि अब्दाली मरहटों को रोकने में असमर्थ है। शुजा ने भाऊ को पत्र लिखा कि अब्दाली से मिल जाने पर वस्तुतः मैंने भूल की थी जिसका स्मरण करके मुझे बड़ा दुख हो रहा है। भाऊ ने भी उसे मिला लेने में ही बुद्धिमत्ता समझी और अपने राजदूत द्वारा यह कहला भेजा कि मरहठे मुगल-राज्य को उलटना नहीं चाहते। अगर शुजा अब्दाली का साथ छोड़ दे तो हम उसी को प्रसन्नतापूर्वक शाहआलम का, जिसे कि वे शाहन्शाह मानते हैं, वज़ीर बना देंगे। रुहेलों ने भी आगा-पीछा सोचने और अब्दाली का साथ छोड़ने की बातचीत प्रारम्भ कर दी। यह देखकर कि किस प्रकार सारी परिस्थिति उसके प्रतिकूल बन रही है, अब्दाली ने भी मरहटों के के साथ सन्धि की बातचीत करने का निश्चय किया और राजदूत शर्तों पर विचार करने के लिए भेज दिया। लेकिन उसकी शर्तों के मुताबिक़ पंजाब छोड़ने के लिये भाऊ तैयार न था, साथ ही वह बहसों के धोखे में पड़कर इस सुअवसर को, जिससे वह बहुत कुछ प्राप्त सकता था, हाथ से न जाने देना चाहता था इसलिये ऊपरी चित्त से सुलह की बातचीत कुछ अंशों में जारी होते हुये भी उसने उत्तर की ओर बढ़कर अब्दाली को कुंजपुर में एक बड़े महत्वपूर्ण स्थान से, हटा देने का विचार किया। एक बड़ी सेना, जिसका सेनापति समदखां था, उस स्थान की रक्षा कर रही थी। क़ुतुबशाह भी वहीं था। ज्यों ही उन्हें मालूम हुआ कि मरहटे आक्रमण करना चाहते हैं, वे खूब तैयारी करने लगे। अब्दाली ने भी समदखां और क़ुतुबशाह को यमुना के दूसरे पार से आज्ञा भेजी, कि जैसे भी हो, क़िले की रक्षा करो, और उन्हें यह विश्वास भी दिलाया कि मैंने सहायता के लिये और सेना भी रवाना कर दी है।

[ १११ ] दिल्ली छोड़ने पर भाऊ को उचित जान पड़ा कि अपना कोष पूर्ण कर लूँ। उसे आशा थी कि गोविन्दपन्त बुन्देला अब्दाली की रसद पहुँचनी बन्द कर देगा और उसके पिछले भाग पर आक्रमण करेगा, तथा शुजा और रुहेलों के सूबों पर चढ़ाई करके उन्हें परेशान करता रहेगा, पर गोविन्दपन्त अपने सभी कामों को पूर्ण करने में असफल रहा। बुन्देले से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता न पाने पर भाऊ कोषपूर्ति का और ही उपाय सोचने लगा, क्योंकि कोष ही उसकी लड़ाई का मूल था। उसका ध्यान शाही सिंहासन के ऊपर की चांदी की छत की ओर आकर्षित कराया गया जिसकी कीमत क़रीब १२ लाख रुपये से अधिक थी। उसने उसे तोड़कर टकसाल में भेज देने की आज्ञा दी। उस समय गुलामी और मिथ्याविश्वास ने फिजूल शोर मचाना प्रारम्भ किया। कहा जाता है कि जाट भी यह सोचकर रुष्ट हो गये कि शक्तिशाली मुगलों के शाही तख्त को, जिन्हें कि भगवान् ने हिन्दुस्तान का महाराज बनने के लिए उत्पन्न किया है, इस प्रकार अपमानित करना देव स्वत्व-अपहरण है। यदि ऐसा मान भी लिया तो जाटों को सोचना चाहिये था कि अगर प्रत्येक सफल कार्य जिसमें सफल-अपहरण भी सम्मिलित है, ईश्वर की इच्छानुसार ही है और इसके कारण ही वह पवित्र और ईश्वरीय बन जाता है, शिवाजी द्वारा स्थापित रायगढ़ भी एक सफल कार्य था, उसे ईश्वरीय समझा जाना चाहिए था। रायगढ़ की स्थापना का उद्देश्य धार्मिक अन्याय या अत्याचार करना न था, बल्कि उसका अस्तित्व तो जातीय स्वतन्त्र जीवन बिताने तथा आत्मरक्षा और स्वतन्त्रता की भावना से परिपूर्ण था। लेकिन जब औरङ्गजेब अग्नि और तलवार तथा धर्मान्धता और अशान्ति की सारी सेनाओं के साथ दक्षिण में हिन्दुओं के जातीय जीवन को कुचलने और इस प्रकार नवीन हिन्दू- राज्य को मिटा देने के लिये आया, तो क्या उसने शिवाजी के सिंहासन

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को टुकड़े टुकड़े करने में आनाकानी की थी ? फिर वे क्यों मुगलसिंहा- सन के लिये इतने चिंतित हो रहे थे जो समस्त हिन्दुओं के लिये जिनमें जाट भी सम्मिलित हैं-केवल एक शैतानी शक्ति का चिन्ह था। जो सहस्रों हिन्दू-शहीदों के खून से लिप्त तथा उनके मन्दिरों और घरों को नष्ट करके बनाया गया था और जिसका अस्तित्व ही हिन्दुओं की जातीय और राज- नैतिक मृत्यु थी। औरङ्गजेब ने हिन्दुत्व के शाही तख्त को टुकड़े टुकड़े करने के लिये अपना फौलादी पंजा उठाया था, उस समय न्यायशील देवता तथा हिन्दुस्तान के रक्षक स्वर्गीय दूत ने उसके हाथ से हथौड़ा छीन लिया—और देखो, आज उसी का शाही तख्त इसके नीचे टुकड़े- टुकड़े होकर पड़ा है । सिपाहियों की तनख्वाह चुकाने के बाद, भाऊ कुंजपुर के लिये आगे बढ़ा । शिन्दे, होल्कर और विठल शिवदेव सेनापति थे । पठान बड़ी वीरता से लड़े । क़िला और शहर अपनी मज़बूती के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन अच्छी तोपों तथा सिंधिया और अन्यान्य सेनापतियों द्वारा संचालित महाराष्ट्र-फौज का मुसलमान देर तक सामना न कर सके । मुसलमानी सेना के बीच कुछ शिगाफ़ होते ही दामाजी गायकवाड़ ने 'हर हर' जयघोष के बीच अपनी सेना को आगे बढ़ने की आज्ञा दी और उसकी सेना अन्धा-धुन्ध घोड़े दौड़ाती हुई उसके बीच कूद पड़ी । भीषण युद्ध हुआ जिसमें खून की नदियां बहीं । सहस्रों पठान मारे गये । क़िला ले लिया गया । मुसलमानों के खेमे लूट लिये गये और उनके सैंकड़ों आदमी पकड़ लिये गये । उनका सेनापति समदखां भी मरहटों के हाथों में गिरफ्तार हो गया । वह एक बार पहले भी पिछले युद्ध में रघुनाथराव द्वारा बन्दी किया गया था, पर मरहटों ने रुपया लेकर उसे छोड़ दिया था । छूटने के पश्चात् उसने जान की परवाह न करके मरहटों का विरोध किया और एक फिर उनके हाथ में पड़ गया । युद्ध-समाप्ति पर भाऊ खड़ा २ होल्कर और सिंधिया को कुछ

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आज्ञाएं दे रहा था, और हिन्दू-सेना के बलकी प्रशंसा कर रहा था जिसने उस काम को तीन दिन में पूरा कर लिया था, जिसकी पूर्ति में शत्रुओं को अगर उतने महीने नहीं, तो कम से कम उतने सप्ताह जरूर लगने की आशा थी। ठीक उसी समय हाथी पर सवार दो युद्ध के प्रसिद्ध कैदी लाये गये। उनमें से एक था, पठानों की कुंजपुर फौज का सेनापति समद खां और दूसरा था, नजीब का शिक्षक, पठान षड्यन्त्र- कारियों का नेता तथा मरते हुये वीर दत्ताजी को लात मारने वाला और नीचतापूर्वक 'काफिर' इत्यादि कह कर उसका अपमान करने वाला कुतुबशाह । कुतुबशाह को देखते ही मरहठा-खून खौलने लगा। दत्ताजी का बदला लेने का ख्याल उसकी आँखों के सामने आया। “क्या तुमने ही मरते हुये हमारे दत्ताजी को काफिर कहते हुये लात मारी थी?” कुतुब शाह ने जवाब दिया—“हां, हमारे धर्म में मूर्तिपूजक को मारना और उसके साथ काफिर की तरह घृणा करना पुण्य कार्य माना गया है।” “तब कुत्ते की मौत मरो”—भाऊ ने गर्ज कर कहा। सिपाही उस अपराधी को थोड़ी दूर एक तरफ ले गये और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। दत्ताजी का बदला पूर्ण रूप से ले लिया गया और समद खां की भी वही गति हुई। नजीबखां का परिवार भी, उसके दामाद और अन्य लोगों के साथ, मरहठों के हाथ पड़ गया। लेकिन उन लोगों के साथ कुतुबशाह जैसी सख्ती नहीं बरती गई। सच तो यह है कि युद्ध करते हुए जो लोग बन्दी किये गये थे, वे यदि मार भी डाले जाते तो भी अब्दाली को किसी प्रकार भी उनके मनुष्यत्व पर टीका करने का कोई अधिकार न था क्योंकि वह और उसके सहायक मुस्लिम-बादशाह ऐसे निष्ठुर

महापापों के स्वयं अपराधी थे । उन्होंने पंजाब, बढ़ान तथा अन्य स्थानों में रण-भूमि में हारे हुये मरहटों की नाकें काट ली थीं और उनके सिरों को काट कर शाही खैमे के सामने ढेर लगा दिये थे और उसी भयंकर चिता को उन्होंने जय-स्तम्भ समझा था । मरहठे भी इन पाशविक कार्यों का अनुकरण कर सकते थे, पर उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । और न ही उन लोगों ने मसजिदों को ढाकर, कुरान को जला कर और पवित्र स्थानों पर लूट मचा कर अपने को प्रसिद्ध किया । अब्दाली, औरंगजेब, नादिर और मुसलमानों ने सिद्धान्ततः ऐसे दुराचार किये थे ! कुंजपुर में हारने के कारण अब्दाली की प्रतिष्ठा और भी कम होने लगी । मरहठे उसकी सेना को, जो दस हज़ार के लगभग थी, बुरी तरह से पराजित करके उसकी आंखों के सामने ही विजयदशमी या विजय का दिन बड़ी धूमधाम से मना रहे थे । चूंकि वह एक योग्य सेनापति था, उसने फौरन सोच लिया कि यदि कोई बड़ा खतरा उठा कर मैं कोई साहसिक कार्य करके न दिखा दूंगा तो मेरा काम बिगड़ जायगा । उसी समय उसने किसी प्रकार भी यमुना पार करके बागपट के स्थान पर पहुँच कर कुंजपुर स्थित मरहठी फ़ौज को उनके आधारभूत दिल्ली से काटने का दृढ़ निश्चय कर लिया । अपने इस कार्य में वह सफल हुआ और एक लाख मनुष्यों की सेना, मरहटों और उनकी देहली लाइन के बीच खड़ी कर दी । इसी समय उसे एक और मौक़ा हाथ आ गया, जो पीछे चल कर उसके लिये अपनी सैनिक शक्तियों से अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ । वह यह था कि यद्यपि मरहटों का सम्बन्ध अपनी आधार फ़ौज से कट गया था तो भी अब्दाली का सम्बन्ध शुजा और रुहेलों के देश से नहीं छूटा था । पर इसके कारण उसे इतना लाभ नहीं पहुँचा जितना कि गोविन्दपन्त के भाऊ की, रसद बन्द करने वाली, आज्ञा न पालन कर सकने के कारण पहुँचा । अब्दाली ने मरहटों को सामना करने के लिये भलीभांति सुस- ज्जित पाया । बागपट पर ज्यों ही उसने यमुना पार की, उसी समय

[ ११५ ] भाऊ युद्ध करने के लिये विख्यात कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ा और उसने पानीपत में खेमा लगा दिया। मरहठों को पूर्ण विश्वास था कि यदि गोविन्दपन्त और गोपाल गणेश ने अपना कार्य्य अच्छी प्रकार से किया और शत्रुओं की रसद बन्द करके उसके पिछले भाग पर आक्रमण किया तो वे अब्दाली को पीस डालेंगे। पर गोविन्दपन्त उस काम के करने में बुरी तरह असफल रहा। आवश्यक आज्ञा, धमकियां—भाऊ ने सभी का आश्रय लिया, पर गोविन्दपन्त ने इतना भी उद्योग नहीं किया जितना वह कर सकता था। जाटों ने पहले ही मरहठों का साथ छोड़ दिया था और वे एक सुरक्षित दूरस्थ स्थान भरतपुर की राजधानी से युद्ध का तमाशा देख रहे थे। तो भी उनकी यह प्रशंसनीय बात उल्लेखनीय है कि उन्हों ने कभी कभी मरहठों की रसद आदि द्वारा सहा- यता की थी। लेकिन राजपूतों ने तो उतना भी नहीं किया। उनमें कोई भी मरहठों का मुक़ाबिला करने का साहस नहीं रखता था, और बहुतेरे चाहते थे कि वे नष्ट हो जांय। इन हिन्दू-राजाओं की आत्मघातिनी आशा कहां तक सफल हुई, यह भविष्य का इतिहास बतलायेगा। इस लिए यद्यपि दोनों दलशत्रु के यातायात का रास्ता काटकर उसे भूखोँ मारने का विकट प्रयत्न करके उस पर आक्रमण करना चाहते थे, तोभी ज्यों ज्यों दिन बीतते गये, अब्दाली की अपेक्षा मरहठे कहीं अधिक क्षुधापीड़ित होने लगे। आखिरकार २२ नवम्बर को जनकोजी सिंधिया ने अपने पड़ाव से चल कर मुस्लिम-फौज पर आक्रमण कर दिया। सारे मुहाज पर बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। नवयुवक महाराष्ट्र-सेनापति तथा उसके पुराने तजुर्बेकार योद्धाओं की अनुपम वीरता के सामने डटे रहने में असमर्थ मुस्लिम-सेना शाम को पीछे भागी और मरहठों ने सरगर्मी के साथ उसे भगाकर उसका पड़ाव तक पीछा किया। यदि अन्धेरा न हो गया होता तो उसी दिन मुसलमानों की पूर्ण पराजय हो जाती।

[ ११६ ] मरहटों ने अपने शूरवीरों का विजय की सलामी के साथ स्वागत किया। अपने सिपाहियों के मस्तिष्क से पराजय के उत्साहहीन करने वाले प्र- असर को निकालने के लिये अब्दाली ने १४ दिन बाद चुनी हुई से- को आज्ञा दी कि वह अंधेरा होते ही रवाना हो जाये और मराठी से- के मध्य भाग पर रात के समय अन्धेरे में आक्रमण करे। लेकिन आगे बढ़ने पर जब इन लोगों ने बलवन्तराव मेहेन्डले को ५० हज़ार फ़ौ- के साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत आते देखा, तो इन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। पठानों ने फ़ौरन अपनी तोपें मरहटों पर चलानी आरम्भ कर दीं। पर चूंकि मरहठे तोपें नहीं लाये थे; इसलिये उनकी अधिक हानि हुई। शीघ्र ही ऐसा आभास होने लगा कि मरहटे डगमगा जायेंगे। लेकिन उनका सेनापति बिजली की तरह घोड़ा आगे दौड़ा लाया और अपनी सेना को ललकारते हुये उसने कहा कि झण्डे को अपमानित न होने देना। उन्हें चारों ओर से बटोर कर व्यूहबद्ध किया और अपनी तलवार को भयङ्कर रूप से ऊँची उठा कर एक दम आक्रमण करने की आज्ञा दी। मरहठे दौड़ कर शत्रुओं पर टूट पड़े, उनकी तोप को शांत कर दिया और मौत के मुंह में आ गये। सबसे आगे उनका वीर सेनापति बलवन्तराव मेहेन्डले था। घमासान का रण छिड़ पड़ा। एक गोली आकर सेनापति को लगी और वह वहीं गिर कर ढेर हो गया। यह देख कर मुसलमान उसका सिर विजय के चिन्ह के रूप में काट कर ले जाने के लिए उस पर टूट पड़े, परन्तु निम्बालकर ने उनकी तलवारों और सेनापति की लाश के बीच में अपने को डाल दिया और गहरी चोट खाने पर भी उसके मृत शरीर को उस समय तक ढाँपे रक्खा, जब कि मरहटों- ने आकर उसे शत्रुओं से छुड़ा न लिया। इस समय तक हज़ारों पठान काम आ चुके थे और मुसलमानों ने और डटा रहना कठिन समझा। इसलिये पहले तो वे लोग भागने से झिझके, फिर बुरी तरह पराजित होकर पीठ दिखा कर हज़ारों साथियों को मरहटों के सामने रणभूमि में छोड़ कर अपने पड़ाव की ओर भाग गये। मरहटों ने एक घड़ी

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विजय प्राप्त की, परन्तु एक योग्य और महान् सेनापति से हाथ धो बैठे । उसकी लाश बड़ी प्रतिष्ठा के साथ छावनी में लायी गई और उसके स्मारक में एक विजयी को सैनिक मान से सम्मानित किया गया । भाऊ को औरों की अपेक्षा उसकी मृत्यु पर अधिक शोक हुआ और स्वयं उसकी अन्त्येष्टि-क्रिया में सम्मिलित हुआ । उस वीर की धर्मपत्नी ने, जो अपने पति से कम बहादुर न थी, भाऊ के अत्यन्त आग्रह करने पर भी उसके साथ चिता में सती होकर अपने को बलिदान कर देने का दृढ़ निश्चय किया । समस्त सेना अपने वीर शहीद के प्रति अन्तिम अत्यन्त प्रेम भरा सम्मान प्रदर्शित करने को आई । हजारों मनुष्य भक्तिपूर्वक चिता को घेर कर प्रसिद्ध शहीद तथा वीर मरहठा कन्या की, जो अग्नि की शिखाओं में अपने प्रिय मृतक के सिर को हिफ़ाज़त से गोद में रक्खे बैठी थी, भक्तिपूर्ण अभ्यर्थना करते हुये खड़े रहे । इस प्रकार अब्दाली दो लड़ाइयां लड़ा और दोनों में ही उसको मुँह की खानी पड़ी । लेकिन इसमें भी मरहठा के भूखों मरने का प्रश्न हल न हो सका । इसमें कोई सन्देह नहीं कि यद्यपि गोविन्दपन्त की निद्रा अब भंग हुई और उसने अब्दाली की रसद पहुँचानी बन्द कर दी थी; तथापि अब बहुत देर हो चुकी थी । और साथ ही वह अधिक दिनों तक इस काम को जारी भी न रख सका क्योंकि अताई खाँ ने दस हजार फौज के साथ बनावटी झंडे के नीचे गोविन्दपन्त पर आक्रमण कर दिया । मरहठों ने होल्कर का झंडा देख कर आगे बढ़ते हुए पठानों को तब तक मित्र ही समझा जब तक कि उन्होंने सच- मुँच उनको काटकर गिराना शुरू न कर दिया । आखिरकार गोविन्द- पन्त भी काट डाला गया, और उसने वह जीवन खो दिया, जिसे अगर वह भाऊ के आज्ञानुसार चार महीने पहले खतरे में डालता तो बहुत संभव था कि वह अपनी जाति और अपने आप को भी एक बड़ी विपत्ति से बचा लेता । पठानों ने गोविन्दपन्त का शिर काट लिया और

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अब्दाली ने बड़ी ही कृपा करके उसे बहुत सी डींगों से भरे हुए पत्र के साथ भाऊ के पास भेज दिया। सैनिक दृष्टि से अब भी अब्दाली को परास्त करने की बहुत सम्भावना थी, क्योंकि इतना चौकस पहरा होते हुये भी मरहठों की विपत्ति का समाचार दक्षिण में जा पहुँचा और बालाजी अनुमानतः ५०,००० मनुष्यों की शक्तिशाली सेना के साथ, अपने आदमियों की सहायता के लिये रवाना हो पड़ा। अगर मरहठे एक महीना और डटे रह सकते तो दोनों सेनाओं के बीच अब्दाली पिस जाता। परन्तु फ़ाके का क्या उपाय हो सकता था? सैंकड़ों बोझ ढोने वाले पशु तथा घोड़े प्रतिदिन भूख से मरने लगे। उनके सड़ने की दुर्गन्धि सैनिकों के स्वास्थ्य के लिये फ़ाकों के समान ही भयावह होने लगी। अब केवल एक ही उपाय उस समय युद्ध प्रारम्भ करने का था। उमंग भरी सेना प्रतिदिन भाऊ के खेमे पर इकट्ठी हो करुणामय प्रार्थना करने लगी कि हमें भूख और दुर्गन्धि से प्राण त्याग करने की अपेक्षा रणभूमि में जाकर मरने की आज्ञा दीजिये। लेकिन क्या भूखों मरने से बचने के लिये अब भी एक और मार्ग न था अर्थात् “बिना- शर्त हिन्दू-महान्-कार्य से त्याग-पत्र दे देना”, जिसके लिये कि उनके पूर्वजों की कई पीढ़ियां जीवित रहीं तथा उसी कार्य को करते हुए मरीं थीं? तो क्या वे ऐसा करके तथा अब्दाली को शाहंशाह मान कर स्वतन्त्रता से त्याग-पत्र दे दें? नहीं, किसी प्रकार भी नहीं। कोई मरहठा इसके लिये राय देने को तय्यार न था। आपत्तिग्रसित और क्षुधातुर होते हुए भी उन्होंने भयंकर विषमता का ध्यान न करते हुये इस बुद्धिमानी से शत्रु का सामना करने का निश्चय किया कि चाहे युद्ध में उनके मनोरथ सफल न हों तो भी विपक्ष की सफलता धूल में मिल जाय। इस श्रेणी के मनुष्यों के बीच भाऊ अजेय साहस और बल से कभी भी विचलित न होते हुए खड़ा था। उसने निर्भय होकर प्रतिज्ञा कर ली कि मैं हार कभी न मानूंगा और न कोई ऐसा कार्य्य ही करूंगा जिस से जातीय प्रतिष्ठा पर धब्बा लगे, और विजय प्राप्त करने के लिये

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चाहे कैसा भी दुःख क्यों न उठाना पड़े—और विजय भी चाहे प्राप्त न हो—तो भी कम-से-कम हार ऐसा हो जो हमारी आने वाली सन्तति को सर्वदा उत्साह और स्वाभिमान से भरती रहे। यह हार बहुत-सी सफलताओं की अपेक्षा श्रेष्ठ है। एक आवश्यक सैनिक सभा निमंत्रित की गई जिस में यह निश्चय हुआ कि पूर्ण रूप से युद्ध के लिये सन्नद्ध हो दिल्ली की तरफ प्रस्थान किया जाय और यदि अब्दाली सामना करे तो उस पर आक्रमण किया जाय और उसको पीठ को काट कर उससे युद्ध किया जाय। 'अगर' की शर्त अनावश्यक थी क्योंकि अब्दाली उन्हें बच जाने देने वाला आदमी था। हजारों वीर "हरिभक्तों" की सेना उसी 'जरीपताका' या सुनहले गेरुवा झंडे के आगे ओर एकत्रित हो गई। शीघ्र ही उनका सेना-नायक, नेताओं द्वारा निर्धारित भविष्य कार्य क्रम की घोषणा करने को उठ खड़ा हुआ। ज्यों ही उन लोगों को शत्रु से युद्ध करने का फ़ैसला बतलाया गया, उस बृहत् शस्त्रधारी जमघट ने उच्च ध्वनि से इसका समर्थन किया। सब कार्य-क्रम समझाया गया इस महान् नेता ने प्रतिष्ठित जातीय झंडे की ओर संकेत करते हुए, जिसके नीचे सब लोग खड़े थे, अपने मनुष्यों के सामने एक सारगर्भित वक्तृता दी; जिसमें उसने बतलाया कि किस प्रकार मौन वाणी द्वारा यह भगवा अपना सुविख्यात इतिहास बतला रहा है कि किस प्रकार रामदास ने इसे शिवाजी को हिन्दू-पद-पादशाही के 'स्वधर्म-राज्य' के वृहत् कार्य के लिये चेतावनी-स्वरूप दिया था; किस तरह हमारे पूर्वज और अमर शहीदों ने विजय-पर-विजय प्राप्त कर के समस्त हिन्दुस्तान को अटक से श्वणकोट और समुद्र पर्यन्त इसके अधीन सम्मिलित किया; और किस प्रकार हिन्दुत्व के विरोधियों ने जब कभी सर उठा, तो या तो उन्होंने इस के सामने सिर झुकाया या नष्ट हो गये। क्या अब हम इसे शत्रुओं को सौंप दें ? झुका दें ? या जिस संदेश का यह परिचायक है, उस महान् कार्य के लिये लड़ते २ जान दे दें ?

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एक लाख शूरवीरों ने 'हर-हर महादेव' का जय घोष किया और अपनी- अपनी तलवार निकाल कर जातीय झण्डे, उनके बतलाये हुये कार्य्य तथा अपने सेनापति के प्रति, जिसने विजय-पर-विजय प्राप्त करने में उनका पथ प्रदर्शन किया था, भक्ति रखने की प्रतिज्ञा की। १५ जनवरी की सुबह को सारी मरहठा फ़ौज व्यूहबद्ध होकर निकल पड़ी। भाऊ और विश्वासराव सेना के मध्य भाग के संचालक बने। जनकोजी उनके दाहिनी ओर खड़े हुए। तथा मल्हरराव होल्कर सेना के आगे हुए। दामाजी गायकवाड़, यशवन्तराव पवार, अंताजी मानकेश्वर, विट्ठल शिवदेव, और शमशेर बहादुर - ये सब बाईं ओर से सेना की रक्षा के लिए नियुक्त किये गये। अपने उत्तम तोपखाने को वीर इब्राहीम गार्दी की अध्यक्षता में, जो मुसुलमान होते हुये भी अपने मालिकों का मरते दम तक नमकहलाल रहा, सबसे आगे रखा। इस प्रकार भयङ्कर रीति से व्यूहबद्ध महाराष्ट्र- सेना ने अपना शिविर छोड़ा और सहस्रों नरसिंगों, नक्कारों, नफ़रियों और युद्ध-वाद्यों को बजाते हुये उन्होंने कूच का डंका बजा दिया। ज्यों ही अब्दाली को मरहठों के आने की सूचना मिली वह भी मुक़ाबिला करने के लिये निकल खड़ा हुआ। उसकी सेना के मध्य भाग का संचालन उसका वज़ीर शाहनवाज़खाँ कर रहा था। उसकी दाईं ओर रुहेले तथा बायें भाग में नजीबखां और शुजा थे। उसने भी अपनी तोपें सेना के आगे रक्खीं। शीघ्र ही दोनों सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। बन्दूकों और तोपों ने अपना भीषण कार्य्य आरम्भ कर दिया। उन बड़ी सेनाओं के चलने से उठी हुई धूल और तोपों के धुएं के कारण आकाश में अन्धकार छा गया। दिन निकलने के बहुत देर बाद तक सूर्य दिखाई न दिया। जब शत्रुओं ने भलीभांति एक-दूसरे को देखा तो यशवंतराव पवार और विट्ठल शिवदेव ने पहले पहल आक्रमण किया। घमसान का युद्ध होने लगा। मरहठों ने एक ही झपट में रुहेलों को पीछे हटने पर विवश कर

३. पेशवा बाजीराव प्रथम व उत्तर भारत में हिन्दू पताका

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दिया और उनके ८००० आदमियों को मार डाला। भारी प्रहार को न सह कर यवन-सेना का दाहिना भाग लड़खड़ाने लगा और पीछे हटा। मुसलमानों की सेना के मध्य भाग पर भाऊ और नवयुवक वीर विश्वास- राव ने इस ज़ोर से आक्रमण किया कि सेनायें मौत के मुख में आ पड़ीं। पठान भी घटये दर्जे के शत्रु न थे। दूसरी ओर भाऊ तथा नवयुवक राज- कुमार विश्वासराव जैसे असाधारण पुरुषों द्वारा संचालित महाराष्ट्र-सेना भी सम्भवतः पीछे हटना नहीं जानती थी। एक घण्टे के भयंकर युद्ध के बाद भाऊ और विश्वासराव ने स्वयं वज़ीर द्वारा संचालित और लोहे की तरह मजबूत पठानों के अग्रभाग की पंक्ति को तोड़ दिया। सहस्रों मुसलमान रणमें मरकर धराशायी हुए। वज़ीर का लड़का मारा गया और वह स्वयं घोड़े से वंचित हो गया। मुसलमानों का मध्य भाग टूटने और छिन्न-भिन्न होने लगा। शत्रुओं के मोर्चे पर मोर्चे को तोड़ते हुये भाऊ और विश्वासराव आगे बढ़े। यह देखकर वज़ीर को बचाने के लिये नजीबखां शीघ्रता से आगे बढ़ा। पर उसके पीछे भाऊ की सहा- यता और उसकी स्थिति मजबूत करने के लिये वीर जनकोजी भी अपने अनुभवी योद्धाओं के साथ तेज़ी से आ पहुँचा। इतनी भयंकर लड़ाई होने लगी जितनी पहले कभी नहीं हुई थी। समस्त सेना में द्वन्द- युद्ध होना आरम्भ हो गया। अब्दाली को स्पष्ट प्रतीत हो गया कि उसकी सेना का दाहिना, बायां और मध्य—अर्थात् सारी सेना पीछे हट गई है, और शीघ्र ही तितर-बितर होना चाहती है। जल्द ही उसके सिपाही भागने लगे। पर वह अटल खड़ा रहा। उसने अपनी ही फ़ौज को आज्ञा दी कि जो लोग अपना स्थान छोड़ कर भागते हैं, उन्हें मार दो। प्रातः ८ बजे युद्ध प्रारम्भ हुआ था और अब दो बज चुके थे। पर उस समय से लेकर अब तक यह भयंकर युद्ध एक क्षण के लिये भी न रुका। रणक्षेत्र में लहू की नदी बह निकली। मरते हुओं और घायलों की भयानक चिल्लाहट और कराहने की आवाज़, मारू बाजों तथा

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बन्दूकों और वीरों के जयकारों के घोष के साथ मिलकर चारों ओर व्याप्त हो गई। दो बज चुके थे। मरहठों की वीरता तथा अटल बाधा का मुसल- मान शत्रुओं पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। अब्दाली भी, जो एक अनुभवी योद्धा तथा सेनापति था, मैदान छोड़ कर यमुना के दूसरी पार जाने की सोचने लगा। लेकिन उसने बड़ी चतुराई से १०००० मनुष्यों की एक सहायक सेना अलग रख छोड़ी थी। यह सोच कर कि इससे अच्छा अवसर फिर न मिलेगा उसने उन्हें स्वयं भाऊ पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। यह ताज़ादम सेना बिजली की गति से मरहठों पर जा टूटी। सुबह से थके भाऊ और उनके सिपाही इससे भी नहीं डगमगाये। मरहठों ने उनकी इस ताज़ादम फ़ौज की इस टक्कर का बड़ी निर्भीकता से सामना किया। एक बार फिर स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि मरहठों ने युद्ध को क़रीब क़रीब जीत लिया है। अब्दाली अपनी अन्तिम चालाकी चल चुका था। ठीक उसी समय एक सनसनाती हुई गोली यमदूत की तरह आई और वीर राजकुमार विश्वासराव को लगी जिससे घायल होकर वह हौदे पर गिर पड़ा। ऐसा सुन्दर और साहसी नवयुवक वीर, जिस पर समस्त जाति आँखें लगाये बैठी थी, प्राणघातक चोट लगने के कारण बेहोश हौदे पर लेटा पड़ा था। यह समाचार भाऊ के पास पहुँचा, जो अपनी सेना का अध्यक्ष था और उन्हें प्रोत्साहित करता हुआ तथा पथ- प्रदर्शित करता हुआ ऐसा अद्वितीय युद्ध कर रहा था जिसे संसार ने अभी तक अनुभव नहीं किया था। आकाश से वज्र की भाँति वह ख़बर भाऊ पर पड़ी। सेनापति अपने प्रिय भतीजे के पास जल्दी से गया और देखा कि उसे प्राणघातक घाव लगा है और वह अपने शाही हौदे में खून से लथपथ पड़ा है। उद्गिर-विजेता का पत्थर-सा कलेजा भी थोड़ी

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देर के लिये टूट गया और उसकी गालों पर आंसू ढुलकने लगे ! दुःख से उसका गला रुंध गया और वह सिसकते २ पुकारने लगा "विश्वास ! विश्वास !!" मरते हुए नवयुवक ने आँखें खोलीं और धीरोचित शब्दों में उत्तर दिया—"प्यारे चाचा, मेरे पास क्यों रुके हुये हो ? अपने सेनापति के दूर रहने के कारण शायद हमारी पराजय हो सकती है।" मृत्यु का कष्ट भी उस वीर मरहठा-राजकुमार से उसके कर्त्तव्य को भुला न सका । अब भी उसके मन में युद्ध का विचार ही था और वह चाहता था कि मैं मर भी जाऊँ, पर युद्ध में हमें विजय प्राप्त हो । उसकी उत्तेजना से भाऊ फिर उत्साहित हो गया और होश सम्भालकर बोल उठा—"इसकी क्या परवाह है, मैं स्वयं ही शत्रु को पराजित करूँगा।" ऐसा कह कर वह फिर अपनी शक्तिशाली सेना को व्यूहबद्ध करने दौड़ पड़ा । सत्य- वादी और शूरवीर अब भी अपने स्थान पर डटे थे और विजयश्री अब भी मरहठों के हाथ थी । पर विश्वासराव की मृत्यु का समाचार जंगल की आग की भाँति समस्त महाराष्ट्र-सेना में फैल गया, जिससे उन पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा । उसी समय दूसरी आपत्ति आई । दो हज़ार मुसलमानों ने एक या दो महीने पहले मन्दाजी की नौकरी छोड़ दी थी और भाऊ ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया था । युद्ध में उन्हें शत्रुओं से भिन्न पहचानने के लिये उनके सिर पर मरहठा गेरुआ झण्डा की पट्टी बंधवा दी गई थी । शायद पहले ही से तै कर लेने के कारण, उन्होंने एकाएक मरहठा-निशान उतार फेंका और विश्वासराव की मृत्यु की अफ़वाह और झूठा भय फैलाते हुये पीछे की ओर मुड़े, जहाँ कैम्पों के रक्षक खड़े थे, और आक्रमण करके वहां लूट-मार शुरू करदी। सेना के पिछले भाग में पठानों को देखकर मराठे किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये, और जो लोग आगे की ओर लड़ रहे थे यह सोच कर कि शत्रुओं ने पीछे की ओर विजय प्राप्त कर ली है, पंक्ति तोड़ कर भाग निकले ।