हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
[ १२५ ] हुये उन्होंने रण-यज्ञ में अपनी आहुतियां डाल दीं । अब मैं किस प्रकार रणक्षेत्र छोड़ कर अपनी जाति और नाना साहेब को मुँह दिखलाने के लिये जीवित रह सकता हूँ ? मारो, मारो और मृत्यु पर्य्यन्त शत्रुओं का संहार करो । यही मेरी अन्तिम आज्ञा है ।” मुकुन्द शिन्डे ने सेनापति को प्रणाम किया और उसकी इस अंतिम आज्ञानुसार घोड़े से कूद कर 'हर-हर महादेव' का जयघोष करता हुआ अन्धाधुन्ध शत्रुओं के मध्य में टूट पड़ा । नवयुवक जनकोजी, यशवन्त- राव पवार आदि सभी वीरों ने उसी का अनुसरण किया । और भाऊ ? उस पर तो मानो युद्ध का भूत सवार था, वह भी अन्धाधुन्ध शत्रु-सेना पर जा टूटा और सेना के बीच ऐसे स्थान पर जा घुसा जहाँ भयंकरतम युद्ध हो रहा था । अपने शब्दों को सत्य में परिणत करता हुआ, आखिरी दम तक शत्रुओं का वध करता हुआ तथा जातीय झण्डे की रक्षा करता हुआ वह वीर गति को प्राप्त हो गया । अन्तिम समाचार जो संसार के लोगों के पास उस वीर हिन्दू- सेनापति के सम्बन्ध में पहुँचा, वह यह था कि पानीपत की लड़ाई में जो हिन्दू-जाति की मुख्य हानि हुई, उसकी उसने वीरता और कर्त्तव्यपरा- यणता की आध्यात्मिक महिमा से क्षति-पूर्ति कर दी । १५ पराजय जिसने विजेता को भी नष्ट कर दिया ! ❀ “दन्तच्छेदोहि नागानाम् श्लाघ्यो गिरिविदारणे” पानीपत की लड़ाई से मरहठों की भयंकर हानि हुई, क्योंकि जिस समय भाऊ और उसके शूरवीर साथी अपने राष्ट्रीय झण्डे के चारों ओर अपूर्व युद्ध लड़ रहे थे, उस समय मरहठे सब मोर्चों से खदेड़े जा रहे थे और शत्रु बड़े उत्साह से उनका पीछा कर रहे थे । सहस्रों ❀ पर्वतों को उखाड़ने के लिये हाथियों के दांत ही समर्थ होते हैं ।
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वीर धराशायी हो गये और सहस्रों को विजयी मुसलमान कैदी बनाकर अपने खैमों में ले गये और प्रातःकाल उन्हें कतार में खड़ा कराकर बड़ी निर्दयतापूर्वक कत्ल कर डाला । इस लड़ाई में पठानों के हाथ लूट का माल भी बहुत आया । किन्तु मर्हठों ने अपने दुश्मनों से इसकी जो कीमत वसूल की वह इससे कहीं अधिक थी । पठानों ने विजय लाभ की पर इसके लिए उन्हें बहुत कीमत देनी पड़ी। अन्तिम दिवस पर ही यवनों के चालीस हजार सिपाही काम आये थे । गोविन्दपन्त का सिर काटने वाले सेनापति अताईखां, उस्मान तथा अन्यान्य मुस्लिम-नेताओं का वध किया गया । नज़ीबखां भी बुरी तरह ज़ख्मी हुआ । इसके अति- रिक्त मुसलमान भी यह अनुभव करने लगे कि उनकी जीत शक्ति और सेनापतित्व के कारण इतनी अधिक नहीं हुई जितना कि संयोगवश । मरहठे युद्ध में हार गये, परन्तु शत्रु पर इतनी कड़ी चोट लगाई कि वह सदा के लिये युद्ध में विजय प्राप्त करने के अयोग्य बन गया । यदि पानीपत में हार हो हुई तो क्या हुआ ? पानीपत में मर्हठे नष्ट हो गये थे, पर महाराष्ट्र में अब भी ज़िन्दा थे । प्रत्येक घर को अपने किसी-न-किसी सम्बन्धी के लिये, जो कि पानीपत की लड़ाई में शहीद हुआ था, शोक करना पड़ा था । इस पर भी उस समय महाराष्ट्र में ऐसा विरला ही कोई घर बचा होगा जिस ने अपनी राष्ट्रीय मर्यादा को पुनः स्थापित करने और अपने सिपाहियों के बलिदान को सार्थक बनाने तथा उस उद्योग को, जिसे के लिये उन्होंने अपने प्राण गंवाये थे, फलीभूत करने की प्रतिज्ञा न की हो । अब्दाली की कार्य्य-क्रमावली को रोकने के लिये पेशवा ५०,००० सेना के साथ पहले ही नर्मदा पार कर चुका था । अपनी जनता और मुख्यतः अपने परिवार पर आये हुए विपत्ति-समाचार को सुन कर, नाना ने पानीपत की दुर्घटना पर विचार किये बिना, आगे बढ़ कर अब्दाली की शक्ति को नष्ट-भ्रष्ट
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करने का दृढ निश्चय कर लिया ताकि वह उत्तर भारत स्थित मरहठा सेना की पराजय और उससे उत्पन्न बुराइयों का लाभ न उठा सके। यद्यपि उसका व्यक्तिगत शोक सचमुच असहनीय था और उसका स्वास्थ्य पहले ही से खराब था, तो भी अपनी जाति और सम्बन्धियों के बदला लेने और अब्दाली को हराने के भाव ने उसे चैन न लेने दिया। उसने समस्त उत्तर-भारत के हिन्दू-राजाओं को बड़े जोरदार शब्दों में पत्र लिखे जिनमें उसने लिखा कि आप लोगों ने युद्ध से अलग रह कर तमाशा देखने की जो आत्मघातिनी नीति ग्रहण की है उस पर धिक्कार है। और शत्रुओं की ओर उनका ध्यान दिलाते हुए लिखा कि आप के धर्म के शत्रु तथा हिन्दुत्व के विरोधी सब मिलकर हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के नाश करने के लिये सुसंगठित उद्योग कर रहे हैं, अतः आप लोगों का युद्ध से अलग हाथ पर हाथ धरे रहना ठीक नहीं है। उस ने लोगों को हिन्दू धर्म की स्वतन्त्रता के युद्ध में अपनी सहायता करने के लिये निमन्त्रित किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि यद्यपि हमें पानीपत के युद्ध में हार हुई तो भी मैं मुग़लों के नष्ट राज्य के स्थान पर अब्दाली का दूसरे मुसलिम-राज्य के स्थापित करने की महत्वाकांक्षा को निष्फल कर दूंगा। उस ने लिखा, "यह सत्य है कि मेरा नवयुवक राजकुमार विश्वासराव अभिमन्यु की तरह युद्ध करता हुआ स्वर्गगामी हुआ। मेरे भाई भाऊ और वीर जानकोजी के विषय में किसी को मालूम नहीं कि उनके साथ क्या बनी। इसके साथ कई अन्य सेना पति और सरदार भी मारे गये। लेकिन इन बातों की कोई चिंता नहीं करनी चाहिये। आख़िर यह युद्ध है। हार और जीत का प्रश्न बहुधा संयोग और ईश्वरेच्छा पर निर्भर रहता है। अतः इस का विशेष नहीं। इन सब के होते हुए भी हम इस के लिये प्रयत्न करेंगे।" इस अक्षय दृढ़ता तथा डटे रहने के गुण ने, जिसे मरहठों ने इस विकट जातीय नाश के समय भी प्रकट किया, उन्हें हिन्दुस्तान का
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स्वामी बना दिया। अब्दाली अपने शत्रुओं के स्वभाव से भली-भांति परिचित था और उनकी योग्यता का भी उसे पूर्ण ज्ञान था। ज्यों ही पानीपत में विजय प्राप्त हुई, अब्दाली ने सोचा कि यदि मैं शीघ्र अपने देश को न लौटा तो जो थोड़ा सा लाभ प्राप्त हुआ है, वह भी मुझे विवश होकर खो देना पड़ेगा। नाना साहब ने पानीपत के युद्ध में बचे हुए सरदारों और आदमियों को इकट्ठे कर लिया था। मल्हारराव होल्कर, विट्ठल शिवदेव, नरोशङ्कर, जानोजी भोंसले तथा अन्यान्य मरहठे- सरदार अपनी-अपनी सेनाओं के साथ ग्वालियर में एकत्र होने लगे और उनके साथ नानासाहब दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा। मरहठों के इस विचार को जान कर शुजा और नजीबखां भी कांप उठे, उन्हें निश्चय हो गया कि पानीपत के युद्ध में विजय प्राप्त करने का यह अर्थ नहीं है कि मरहठों पर विजय प्राप्त कर ली है। अतएव उन्होंने स्वतन्त्र रूप से सुलह की बात-चीत करनी प्रारम्भ की और नाना साहब के पास, जो ग्वालियर तक आ पहुँचा था, चापलूसी-भरे पत्र भेजने लगे। शुजा इस तथ्य को भली-भांति जानता था कि अब्दाली न ही अकेले, और न ही औरों की सहायता से हिन्दुओं को कुचल सकता है और न ही मुगल राज्य के लड़खड़ाते भवन को गिरने से बचा ही सकता है। अतः मुसलमानों की सेनाओं में भगदड़ मच गई। प्रत्येक सेना अपने बचाओ का उपाय सोचने लगी। इसलिये शुजा ने भी अब्दाली का साथ छोड़ दिया। अब्दाली दिल्ली लौट आया और वहां एक-दो सप्ताह ठहरा। नाना साहब ५०,००० सेना लेकर दिल्ली की ओर बड़ी तेज़ी के साथ आ रहा था। जब यह समा- चार पहुँचा कि अब्दाली के देश पर फारस वालों ने आक्रमण किया है तो अब्दाली का ध्यान उसी ओर गया और चिन्तित हो दिल्ली और दिल्ली के राज्य को छोड़ कर सन् १७६१ ई० में मार्च के महीने में सिन्ध को पार कर के जल्दी से वह अपने देश को लौट गया। इस प्रकार जिन इच्छाओं से प्रेरित होकर उसने सिन्ध पर आक्रमण किया
[ १२६ ] था, वे सारी मिट्टी में मिल गईं और वह जैसे खाली हाथ आया था उसी प्रकार वापिस चला गया । विदेशी स्वधर्मियों की सहायता द्वारा दिल्ली-राज्य को, हिन्दुओं के आक्रमण से बचाने के लिये भारतीय मुसलमानों का यह अन्तिम प्रयत्न था। उन्होंने पानीपत की लड़ाई को जीता; किन्तु इस जीत के परिणाम स्वरूप उनकी महाराष्ट्र मंडल की हिन्दू शक्ति को नष्ट करने या मरहठों की प्राणविनाशक पकड़ से मुसलमानी राज्य के गले को छुड़ा कर उसकी रक्षा करने के अन्तिम अवसर का भी अन्त हो गया । इसके बाद कभी विदेशीय पठान दिल्ली न पहुँच सके। उन्होंने शीघ्र ही सिंध नदी पार करना बंद कर दिया । पानीपत के नाश के पश्चात् हिन्दुओं की एक दूसरी प्रबल शक्ति का भी पंजाब में बड़ी शीघ्रता से विकास हुआ। यह शक्ति सिक्ख-मंडल की थी। इन शूरवीरों ने अपनी धार्मिक संस्था को धीरे २ स्थापित किया, जिसे उन्होंने शहीदों के रक्त से सींच कर शीघ्र ही एक शक्तिशाली राज्य में परिणत कर दिया। दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी तथा वीर योद्धा और अपने धर्म पर बलि देने वाले बन्दा बहादुर की अध्यक्षता में सिख लोग हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये पंजाब में लड़े इन दोनों महा- पुरुषों की पूजा हिन्दुस्तान के जातीय हिन्दू-शूरवीरों की श्रेणी में सदैव होती रहेगी । बन्दा की अध्यक्षता में कुछ समय तक वे अपने देश के कुछ भाग को स्वतन्त्र करने में सफल हुए किन्तु पंचनद के अन्तर्गत देश को हिन्दू राज्य के भीतर लाने का काम अब भी मरहठों के लिये ही सुरक्षित पड़ा था । इस कठिन काम को उन्होंने सम्पूर्ण किया और यद्यपि मरहठा वीर अपने घरों से सुदूर लड़ रहे थे और शेर को उसकी नींद में ही ललकार रहे थे तो भी उन्होंने हिन्दू-ध्वजा को सीधे अटक तक पहुँचा ही दिया । पृथ्वीराज के पश्चात् यह पहला ही मौका था जब हिन्दुओं की ध्वजा वहां तक पहुँची । जिस समय वे मुसलमानों तथा उनके सहायक नादिरशाह और अब्दाली के मुग़ल राज्य के
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पुनरुत्थान के प्रयत्न को अपनी वीरता और साहस द्वारा असफल बना रहे थे, उन्हीं दिनों सिक्खों को अपने तईं एक शक्तिशाली मंडल में संगठित करने का अवकाश मिल गया। पानीपत के युद्ध में इतनी बड़ी हानि उठा कर अब्दाली ने पंजाब के राज्य को अपने राज्य में मिलाने का जो थोड़ा बहुत सुख स्वप्न देखा था इस नई शक्ति ने उसमें भी से वंचित कर दिया। अब पंजाब महाराष्ट्रीय हिन्दुओं के हाथ से निकल जाने पर भी मुसलमानों के हाथ में न रह सका। अब्दाली के प्रस्थान करते ही पंजाब के हिन्दुओं ने उनके मोर्चों पर आक्रमण कर दिया और यद्यपि वह दोबारा सिंध पार करके आया तो भी उन्होंने अपनी मातृ-भूमि को स्वतन्त्र करा ही लिया। शीघ्र ही मरहठों ने भी दिल्ली में प्रवेश किया और एक बार फिर वे सम्पूर्ण भारतवर्ष की सर्वश्रेष्ठ राज्य-शक्ति बन गये। सिक्खों ने भी सोचा कि वे कभी भी अपना शासन अपने प्रांत की सीमाओं के पार, पूर्व की ओर दिल्ली तक न बढ़ा सकेंगे तो भी वे इतने शक्तिशाली हो गये थे कि अपनी रक्षा बाहर से आने वाले शत्रुओं से भलीभांति कर सकते थे। अतः फिर कभी भयानक हठधर्मी तथा लोभी पठानों या तुर्कों की इच्छा सिन्धु पार करने की न हुई। उलटे सिक्खों ने ही सिन्धु नदी पार कर के अपनी जातीय ध्वजा को बड़ी धूमधाम से काबुल नदी के किनारे तक पहुंचा कर शत्रुओं को नतमस्तक होने पर विवश किया। उनके आतंक से मुसलमान इतने भयभीत हो गये थे कि पठानों के घरों में सिक्खों का नाम लेकर छोटे २ बच्चों को डराया जाता था। पान-हिन्दू-दृष्टि से देखा जाये तो मुसलमान सर्वथा अपना स्वार्थ सिद्ध करने में असमर्थ रहे। उन्होंने पानीपत की लड़ाई में विजय तो अवश्य प्राप्त की पर इस विजय में वे उस युद्ध में हार गये जिसे उन्होंने हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने वालों के विरुद्ध उठाया था, और पानीपत के साथ साथ उन्हें सारे हिन्दुस्तान अर्थात् अटक से लेकर समुद्र तक के सारे प्रदेश को हिन्दुओं के अधीन छोड़ना पड़ा।
[ १३१ ] पर उन्हीं दिनों जब कि हिन्दू इस बड़ी लड़ाई को उत्तर भारत में अपने यवन विरोधियों के साथ लड़ रहे थे, एक तीसरा लड़ाका इस भीषण तमाशे को देखता रहा और धूर्तता से धीरे २ लड़ने वालों की श्रेणी में आने का प्रबन्ध करने लगा । पानीपत की लड़ाई से इन्हें ही सब से अधिक प्रसन्नता हुई क्योंकि पानीपत की लड़ाई से हिन्दू और मुसलमान दोनों शक्तिहीन हो रहे थे । अतः मरहठों को बंगाल पर आक्रमण करने के निश्चय को किसी अन्य समय के लिये उठाना पड़ा । पानीपत की लड़ाई के वास्तविक विजेता न हिन्दू थे और न मुसलमान- वरन ये धूर्त षड्यन्त्रकारी अँग्रेज थे जो कि उस युद्ध को ध्यानपूर्वक देखते रहे और उन दोनों की दुर्बलताओं का लाभ उठाते रहे । यद्यपि यह बात सत्य है कि पानीपत की लड़ाई ने ईस्ट इण्डिया- कम्पनी को कुछ दिनों के लिये और जीवन-प्रदान कर दिया और मरहठों को विवश किया कि वे अँग्रेज़ों के साथ अपना अंतिम हिसाब- किताब करने के विचार को स्थगित कर दें, तथापि यह सोचना भूल है कि केवल इस लड़ाई से ही अंग्रेज़ों को कोई बड़ा स्थायी लाभ हुआ हो क्योंकि हम आगे देखेंगे कि मरहठों ने शीघ्र ही पानीपत की क्षति को पूरा कर लिया था । यदि मरहठों में घरेलू झगड़े न उत्पन्न हुए होते तथा उनके सुयोग्य नेताओं की असामयिक मृत्युएं न हुई होती तो पानीपत में हार होने पर भी उन्होंने अंग्रेज़ों को भी जीत लिया होता । अंग्रेज़ों की सफलता मरहठों के पानीपत में हारने के कारण उतनी अधिक न हुई जितनी कि अन्त समय उनमें आपस में लड़ाई हो जाने के कारण हुई । इस विषय में मेजर इवानमब्राल लिखता है—"पानीपत की लड़ाई भी मरहठों के लिये गौरव और विजय ही सिद्ध हुई । मरहठे हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों के लिये लड़े, पर उनके हार जाने पर भी विजयी
[ १३२ ] अफ़गानों को अपने देश को लौट जाना पड़ा और इसके पीछे उन्होंने कभी हिन्दुस्तान के कामों में हाथ न डाला।" जब अब्दाली के शीघ्र लौट जाने का समाचार और शुजा तथा नजीबखां के प्रार्थना-पत्र मरहठों के पास पहुँचे तो उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहा। नारोशंकर ने पानीपत की लड़ाई के दो महीने पश्चात् लिखा था—"ईश्वर का धन्यवाद है कि धर्म के स्तम्भ मरहठे हरिभक्तों की सेना अब भी हिन्द की स्वामिनी है।" सेनापति का यह वीरता-पूर्ण अंतिम वाक्य क्रमशः एक के पश्चात् दूसरे मरहठे की ज़बान से सुनाई देने लगा और सभी कहने लगे 'इसकी कोई चिन्ता नहीं, आखिर यह युद्ध है, हम इसके लिये पुनः प्रयत्न करेंगे।" इसी बीच में नानासाहब का स्वास्थ्य क्रमशः शोचनीय होता गया क्योंकि अन्तिम दो वर्षों से उनका शरीर शिथिल होता जा रहा था और इसी समय पानीपत का दुःखद समाचार उनको मिला। उन्होंने शूरवीरों की भांति इसे सहन करने का प्रयत्न किया, अपनी व्यक्तिगत दुःख-वेदना को छिपाकर अपनी जाति को इतना उत्साहित और इस योग्य बनाया कि वह अपनी पराजय का बदला ले सकें और बढ़कर एक शक्तिशाली और विजयी जाति बन जायें। किन्तु उसके हृदय में विश्वास, भाऊ तथा बहादुर सैनिकों और सिपाहियों की मृत्यु का दुःख ऐसा बैठ गया था कि कोई भी वस्तु उन्हें सांत्वना प्रदान न कर सकी। इनका स्वास्थ्य पहले ही से बिगड़ता जाता था, इस चिन्ता ने दशा और भी शोचनीय बना दी और अन्त में वे २३ जून सन् १७६१ ईस्वी को इस असार संसार से चल बसे। उस समय उनकी अवस्था केवल ४१ वर्ष की थी। इस प्रकार मरहठों के एक वीर नेता की असामयिक मृत्यु ने सारी प्रजा को दुःख सागर में डुबो दिया। उनकी योग्यता और उनके चरित्र के सम्बन्ध में यहां कुछ लिखना व्यर्थ है। उन्हें उनके कार्य, शब्दों की अपेक्षा अधिक बतला सकते हैं।
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उनका राज्य-प्रबन्ध भी न्यायपूर्ण और सर्वप्रिय था । उनके शासन-काल को मरहठे अब भी धन्यवादपूर्वक स्मरण करते हैं । महाराज शिवाजी के हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने के उद्देश्य को कार्य-रूप में परिणत करने का कार्य उन्हीं के करने के लिये सुरक्षित पड़ा था । वास्तव में उन्होंने ही सारे भारतवर्ष को यवनों के पंजे से मुक्त कराया । उनके राज्य काल में, पृथ्वीराज की पराजय के बुरे दिन के छः सौ वर्ष पश्चात, आज हिन्दू-गौरव सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच पाया था । निस्सन्देह यदि वे संसार मे अपने समय के सबसे बड़े आदमी नहीं, तो भी महान् व्यक्तियों में से अवश्य थे । बालाजी-उपनाम नानासाहब-की असामयिक मृत्यु से जो राष्ट्र को हानि हुई वह पानीपत की लड़ाई की हानि से यदि अधिक न थी तो उस से किसी अंश में कम भी न थी । ये दो बड़े भयानक आघात इस जाति पर एक साथ पड़े । इन घटनाओं से जो राष्ट्र को धक्का लगा उसकी क्षति-पूर्ति के लिए कुछ समय लगा ।
१६ धर्मवीर माधोराव ॐध्रुवमधिपतिर्बालावद्गोप्यत्वं परिचितुम् । न खलु वयसा नात्येवायं स्वकार्य सहोद्भरः ॥ नानासाहब की मृत्यु के पश्चात् मरहठों को नेताविहीन देखकर और यह विचार करके कि पानीपत की लड़ाई में हार होने के कारण महाराष्ट्र-मण्डल नष्ट हो जाएग, शत्रु लोगों ने सिर उठाया और चारों ओर से उसे घेर लिया । हैदरअली को अवसर मिल गया और उसने मैसूर के राज्य को हिन्दू-राजा के हाथ से छीन लिया तथा मरहठों के दक्खिन राज्य पर आक्रमण किया । निजाम
ॐयह व्यक्ति बालक होता हुआ भी स्वामी बनकर राज्य को संभाल सकता है । यद्यपि इसकी आयु छोटी है तो भी यह स्वभाव से ही अपने राज्य का कार्य भार उठा सकता है ।
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हैदराबाद अपनी उद्गिर की हार का बदला लेने के लिये बड़े ज़ोर से तय्यारी करने लगा। अंग्रेज़ भी यथाशक्ति नोच-खसोट करने का प्रयत्न करने लगे। उत्तर में मुसलमान ही नहीं, बल्कि राजपूत, जाट और दूसरे राजे भी मरहठों के द्रोही बन गये। हर एक का यही प्रयत्न था कि अपने राज्य को जितना अच्छा हो सके, बना लें। ठीक उसी समय जब कि मरहठों के शत्रु उनको चारों ओर से घेर कर नष्ट करना चाहते थे, तथा उनके हिन्दू-स्वातन्त्र्य के महान् उद्देश्य को मिट्टी में मिलाने का प्रयत्न कर रहे थे, रघुनाथ अपनी नीच इच्छा से प्रेरित होकर महाराष्ट्र-मण्डल को, बलवाइयों का एक दल बनाकर, लड़ाई करके अपने अधिकार में लाना चाहता था। ऐसे समय में राज्य की भारी जिम्मेदारी तथा ऐसे कठिन समय में राज्य का सारा उत्तरदायित्व बालाजी के द्वितीय पुत्र माधोराव के सिर पर पड़ा। उस समय उसकी अवस्था अभी केवल १७ वर्ष की थी। हिन्दू-जाति के सौभाग्य से उसमें अपूर्व गुण और सम्मोहन-शक्ति विद्यमान थी और वह हिन्दू-पद-पादशाही में, जिसके लिये उसके पूर्वज अपना लहू बहा चुके थे, इतने अनुरक्त थे कि उनकी अध्यक्षता में महाराष्ट्र-जाति ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पाई और अपने राजनैतिक अस्तित्व को शत्रुओं के विरोधों के होते हुए भी बनाये रखा सब से पहले निज़ाम हैदराबाद ने अपने भाग्य को आज़माया उसने यह अनुमान करके कि मरहठों की शक्ति नष्ट हो गई है, सीधे पूना के लिये यात्रा आरंभ कर दी। मरहठों का, जो हिन्दू धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाये हुए थे, परिहास करने के लिये उसने टोंक के हिन्दू-मन्दिर को अपवित्र और नष्ट कर दिया लेकिन जब मरहठे अपनी राजधानी को बचाने के लिये ८० हज़ार वीरों की सेना लेकर उसके मुक़ाबले में आ डटे तो वह निराश हो गया। उसको उगली पर भारी हार हुई और दुम दबाकर वह पीछे भाग गया। लेकिन रघुनाथ राव बड़ा नीच व्यक्ति था। उसने षड्यन्त्र रचकर अपने ही नव-
[ १२५ ] युवक भतीजे माधोराव के विरोध में मरहठों के दो दल कर दिये। ठीक इसी समय निज़ाम मरहठों का नाश करने के लिये एक बड़ी भारी सेना लेकर दूसरी बार आया। भोंसले और दूसरे मरहठे-सरदार वास्तव में उसके पक्षपाती हो गये थे। महाराष्ट्र का इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है कि कई बार लोगों में स्वार्थपरता तथा राष्ट्र विरोध की भावनायें फैलीं; किन्तु जब कभी जातीय गौरव के भंग होने की सम्भावना दिखाई पड़ती, वे जातीय प्रतिष्ठा को बचाने के लिए अपनी शत्रुताओं को भूल जाते जिससे स्वार्थपरता तथा राष्ट्र-विरोधी भावनायें स्वतः मिट जाया करती थीं और लोग शीघ्र ही महाराष्ट्र-मंडल के पक्षपाती बनकर, उसके उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते थे। यह गुण मरहठों में बहुत काल तक विद्यमान रहा। इस बार भी ऐसा ही हुआ। मरहठे सरदारों ने, जो गृह-कलह के कारण पेशवा के विरुद्ध निज़ाम के पक्षपाती हो गये थे, उसका साथ छोड़ दिया और मरहठा-दल में सम्मिलित हो गये। निज़ाम बड़ी भयानक परिस्थिति में पड़ गया। सन् १७६३ ई० में राक्षसभुवन में एक बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, जिसमे मरहठों की बड़ी शानदार विजय हुई। निज़ाम का दीवान मारा गया। उसके २० सरदार घायल हुए और पकड़े गये। उसकी तोपें और युद्ध की सारी सामग्री मरहठों के हाथ लगी। उद्गीर की हार का बदला लेने के लिये और पूना में करभरी नियत करने के अधिकार को जताने के लिये उसने आक्रमण किया था किन्तु उल्टे उसे मरहठों को अपने राज्य का कुछ भाग देना पड़ा, जिस की वार्षिक आय ८२ लाख रुपये से कम न थी। यह पहली लड़ाई थी, जिस में नवयुवक पेशवा ने वीरता दिखाई और विजय प्राप्त करके यश प्राप्त किया। इस विजय के कारण सब लोगों को विश्वास हो गया कि इस नवयुवक पेशवा में नेता बनने के सारे गुण वर्तमान हैं अतः यह उनकी जाति का भलीभाँति नेतृत्व कर सकता है और आपत्तियों से राष्ट्र को सुरक्षित रख सकता है। निज़ाम हैदराबाद के मन में यह बात बिठा कर कि मरहठे
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पानीपत की लड़ाई में पराजित होने पर भी शक्तिहीन नहीं हुए हैं, माधोराव साहसी हैदरअली को दण्ड देनेके लिये आगे बढ़ा। हैदरअली पानीपत की लड़ाई का लाभ उठाकर मैसूर के पुराने हिन्दूराज्य को विध्वंस करके वहां का नवाब बन बैठा था और उसने मरहठों के भी कृष्णा नदी तक के राज्य पर धावा कर दिया था। सन १७६४ ई० में माधोराव ने हैदरअली पर आक्रमण किया। मरहठोंने पुनः धारवाड़ को ले लिया। घोरपडे, विंचूरकर, पटवर्धन और दूसरे मरहठे सेनापतियों ने हैदरअली को चारों ओर से घेर लिया। यद्यपि हैदरअली बड़ा चतुर सेनापति था, तथापि रत्तीहल्ली के मैदान में जी तोड़ कर लड़ने के पश्चात् उसे अनुभव हो गया कि वह शत्रुओं के सामने अब अधिक नहीं टिक सकता। यह विचार दृढ़ होते ही वह बड़ी चालाकी के साथ पीछे हट जाने के विचार से अपनी राजधानी की ओर लौटा किन्तु बिदनूर के पास माधोराव ने उसे आगे से रोक लिया। एक भयङ्कर लड़ाई हुई जिसमें मुसलमानों की बड़ी भारी हानि हुई। इस लड़ाई में कमान माधोराव के हाथ थी। उन्होंने ऐसा भयंकर आक्रमण किया कि यवनों के छक्के छुड़ा दिये। हैदरअली के साथ फ्रांसीसियों द्वारा शिक्षित बड़ी अच्छी सेना भी थी फिर भी वह बुरी प्रकार हार गया और उसके हजारों घोड़े, ऊंट, तोपें विजयी मरहठों के हाथ लगीं। हैदरअली ने सुलह के लिये प्रार्थना की जिसको मरहठों ने स्वीकार कर लिया। इस सुलहनामे के अनुसार जो देश मरहठों ने जीते उन्हीं के पास रहे और २२ लाख रुपया 'कर' और '"चौथ" का बकाया वसूल किया। यदि माधोराव की इच्छानुसार कार्य हुआ होता तो उसने हैदरअली को इस शर्तपर भी न छोड़ा होता लेकिन रघुनाथराव का नीच लालच मरहठों के लिये हैदरअली और नजीबखां की अपेक्षा अधिक हानिकारक सिद्ध हुआ। जब कि पेशवा रणभूमि में हिन्दू शक्ति के विरोधियों का मुकाबला कर रहा था ठीक उसी समय उसने कई बार नवयुवक पेशवा
के विरुद्ध बगावत की। संसार की कोई वस्तु रघुनाथराव की शक्तिशाली होने की इच्छा को नहीं दबा सकती थी और जिस पद के लिये वह प्रयत्न कर रहा था, उस के लिये वह सर्वथा अयोग्य था। उसने स्वतन्त्र रूप से अपने भतीजे के विरुद्ध विधर्मियों के राजा की सहायता करने के नीच उपाय का अवलम्बन किया और जब कभी लड़ाई मे हारकर पकड़ा जाता और कैद किया जाता तो अन्न-जल छोड़ भूखों मर जाने की धमकी देता तथा इसी प्रकार की और बातें करता रहता। मुग़ल- राज्य के इस प्रकार के आपत्तिजनक दावेदार के भाग्य का निर्णय एक क्षण में ही, एक बूंद ज़हर देकर या उसके बदन में हंसी हंसी में एक तीखी तलवार घुसेड़कर अथवा पेशवा के दो अश्रुबिंदुओं के कारण हो सकता था। किन्तु यह नवयुवक ब्राह्मण-राजकुमार सज्जनता और धर्म की मूर्ति था। उसने अपने चचा रघुनाथराव को, उसके राज्य के बांट देने के प्रस्ताव पर, यहा तक लिख दिया कि,-"चचा ! आप राज्य बांटने के लिये कहते हैं, किन्तु सोचिये कि इस बड़े राज्य का मालिक कौन है ? क्या यह किसी की निजी सम्पत्ति है ? सहस्रों शूरवीर तथा राजनीतिज्ञों ने इसे इतना बड़ा और प्रभावशाली बनाने के लिये प्राण- पण से कार्य किया है। राज्य की बागडोर सदैव एक पथ-प्रदर्शक के हाथ में रहनी चाहिये। लेकिन यदि इसे बांटकर खण्ड-खण्ड करके भिन्न- भिन्न राज्य बना दिये जाय तो क्या ये राज्य इस प्रकार अपने प्रभाव और शक्ति को अक्षुण्ण रख सकेंगे ? मैं सोचता हूँ कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। इसको बांटकर शक्तिहीन बनाने की अपेक्षा मैं यह अधिक अच्छा समझता हूँ कि मैं अपने आप को इससे बिल्कुल पृथक् करलूं और आप को बिना किसी प्रतिद्वन्द्विता के इस राष्ट्र-मण्डल का नेता बना दूं। मैं अधिनायक के दावे को सर्वथा त्यागकर आप की सेना में एक सिपाही के रूप मे भर्ती हो जाऊंगा। जो कुछ आप मुझे निर्वाह के लिये दोगे उसी पर अपना निर्वाह करूंगा; किन्तु मैं आनेवाली सन्तान के सामने अपनी गणना ऐसे व्यक्तिके रूपमें नहीं कराना चाहता जिसने अपने
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निजी स्वार्थ के लिये महाराष्ट्र साम्राज्य का बलिदान कर दिया हो । किन्तु मरहठों के कुल में रघुनाथ जैसा दूसरा कोई अयोग्य और चंचल प्रकृति का पुरुष पैदा नहीं हुआ था । इसलिये महाराष्ट्रवासी बल- वान, न्यायशील तथा गम्भीर पेशवाके रहते हुए कभी भी रघुनाथराव को अपना नेता न मान पाते भले ही वह इस पद को ग्रहण कर लेता ।
१७ पानीपत की लड़ाई का बदला
“मरहठे अपनी भलाई करने वालों के प्रति सर्वदा कृतज्ञ और अपने शत्रुओं के प्रति निर्दयी होते हैं । यदि उनका कोई अपमान करे तो वे उसका बदला लेने के लिये अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं ।”—ह्यूँ सांग जिन लोगों ने पानीपत की लड़ाई में मरहठों के विपक्ष में भाग लिया था, उनको उचित दण्ड देने के परम कर्त्तव्य को मरहठे, घरेलू झगड़ों तथा आपस की फूट तथा हैदरअली और टीपू की नई शक्तियों का सामना करते हुए भी, किसी प्रकार न भुला सके । नानासाहब के मरने के पीछे कुछ समय तक दो मरहठा-सरदार होल्कर और शिन्दे उत्तरी- भारत में मरहठों के अधिकारों की रक्षा अपनी शक्ति अनुसार बड़ी उत्तमता से करते रहे । जब घरेलू लड़ाइयां तथा रघुनाथराव के षड्यन्त्रों का उचित प्रबन्ध हो गया तब माधवराव ने सन् १७६६ ई० में विपक्षियों को दण्ड देने के लिये एक सेना बिनीवाले की अध्यक्षता में उत्तरी भारत- वर्ष की ओर भेजने का निश्चय किया तथा उत्तरमें रहने वाले सारे मरहठे- सेनापतियों को आज्ञा दी कि वे इससे मिल जांय । हिन्दू-राज्य के प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने और उसकी आज्ञाओं का पालन कराने के दृढ़ उद्देश्य से, तथा जिन छोटे २ हिन्दू-राज्यों ने सन् १७६१ ई० के पीछे मरहठा-राज्य को नाश करने का उद्योग और उपाय किया था, उन सब को शक्तिहीन बनाने के लिये, मरहठों की शक्तिशाली सेना नर्मदा नदी
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पार करके बुन्देलखण्ड में जा पहुँची और छोटे छोटे विद्रोहों को दबाती हुई तथा हठी और धनी राजाओं तथा ताल्लुकेदारों को दण्ड देती हुई यह सेना बिना किसी विशेष विरोध के चम्बल नदी पर पहुँच गई। जाट लड़ने को तैयार हो गये और आगग इत्यादि दुर्गों को, जिनको कि इन लोगों ने पानीपत की लड़ाई के समय से हड़प कर रखा था, वापिस करने को इन्कार कर दिया। भरतपुर के पास एक घमसान की लड़ाई हुई। जाट बड़ी शूरता और वीरता के साथ मरहठों से लड़े, किन्तु अन्त में मरहठों के आक्रमण को रोकने में असमर्थ होकर, लड़ाई में अपने सहस्रों मरे हुये साथियों, अपने खेमों, अपने हाथी घोड़े और लड़ाई के सामान को छोड़ कर भाग गये। यह सारी सामग्री मरहठों के हाथ लगी। इसके पश्चात् शीघ्र ही उनके नेता नवलसिंह ने मरहठों का दबाया हुआ भाग लौटा कर और ६५ लाख रुपया उपहार रूप में देकर उनसे सुलह कर ली। अब मरहठों की सेना दिल्ली के दरवाज़ों की ओर बढ़ी। उन्हें यह आशा थी कि उनके शत्रु उनका वहां सामना करेंगे। लेकिन उस मक्कार और बूढ़े नजीबखां ने जब मरहठों के विजय करते हुये आने का समा- चार सुना तब उसने बड़ी नम्रता और दीनता के साथ मरहठों के शिविर में आकर उनसे प्राण-भिक्षा मांगी। इसके अतिरिक्त वह और भी सब कुछ करने को उद्यत था। जो कुछ द्वाबा में लूटा था, मरहठों के हवाले कर दिया और उनके लिये दिल्ली का मार्ग अबाधित बना दिया। वह चाहता था कि किसी प्रकार जान बच जाय, ताकि वह पुनः उचित समय पर उनके विरुद्ध षड्यन्त्र रच सके। पर इस बार उस पानीपत की लड़ाई के रचने वाले मक्कार को मरहठों की प्रतिहिंसा की अग्नि से कोई सुरक्षित न रख सकता यदि मृत्यु बीच में आकर उन मनुष्यों के क्रोध से—जिनकी पानीपत में हार हुई थी—उसकी रक्षा न करती। मरहठों ने दिल्ली में प्रवेश किया। पर अकबर और औरंगजेब की राजधानी में कोई भी उनका सामना करने वाला न निकला। अहमदशाह
[ १४० ] अब्दाली ने जिसकी बुद्धि अन्तिम लड़ाई के अन्त में ठीक हो गयी थी और पेशवा से पहिले ही से पत्र-व्यवहार करने लगा था, अपने राजदूत को पुना भेजा । बहुत वाद-विवाद के पश्चात् दोनों पक्ष एक समझौते पर पहुँचे जिसके अनुसार अहमदशाह अब्दाली ने प्रसन्नता-पूर्वक सन्धि के नियमों को स्वीकार किया कि अब वह हिन्दुस्तान के राजनैतिक कार्यों में कभी भाग न लेगा और साथ ही उसने मरहटों को भारतवर्ष का संरक्षक भी मान लिया । इस प्रकार पानीपत के विजयी ने स्वयं अपनी विजय और उन इच्छाओं की तुच्छता स्वीकार कर ली जिनसे प्रेरित होकर उसने लड़ाई ठानी थी, और साथ ही मरहटों की शक्ति को भारत- वर्ष की सबसे महान् शक्ति मान लिया । अफ़ग़ानों की जड़ को इस प्रकार भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्रसे खोद और दिल्लीपर अधिकार करके मरहटों ने अब पठानों और रुहेलों का भी विच्छेद कर दिया । वास्तव में दोनों ही मुसलमान शक्तियों के केन्द्र थे । भारत के शासन की बागडोर हिन्दुओं के हाथ में जाने से रोकने के लिये ये अब तक भी जान तोड़ कर लड़ने के लिये तैयार थे । लेकिन उनकी परीक्षा का भी दिन आ गया । जो अपमान और अत्याचार रुहेले और पठानों ने पानीपत की लड़ाई में मरहटों के साथ किये थे उनका स्मरण करके ही उन्होंने बदला लेने के लिये तलवारें उठाई थीं । इन अपमानों तथा अत्याचारों के स्मरण से जो प्रतिहिंसा की शक्तियां उभरती थीं वे शायद नष्ट होने पर ही शान्त हो सकती थीं, अन्यथा उनको भुलावे में नहीं डाला जा सकता था । इस बात को रुहेले और पठान भी अच्छी तरह जानते थे । अतः वे अपने पुराने अनुभवी नेता हाफ़िज़ रहमत और अहमदखां बंगश की अध्यक्षता में मिल गये और उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि वे मरहटों का हर प्रकार से मरते दम तक सामना करेंगे । इन दोनों ही नेताओं को पानीपत के युद्ध का विशेष अनुभव था । कुछ दिन दिल्ली में रह कर मरहटे दोआबे में पहुँचे । उन्हें वहां यह मालूम हुआ कि शत्रुओं की सेना बहुत ही विशाल है । उस समय ७०
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हजार हथियारबन्द मुसलमान-सेना तैयार थी। परन्तु मरठों ने उनकी संख्या पर कुछ भी ध्यान न दिया, और घमसान की लड़ाइयां छिड़ ग जिनमें बड़ी निर्दयता के साथ पठान और रुहेले काटे गये। तत्पश्चात क़िले-पर-क़िला, शहर-पर-शहर शत्रुओं के हाथ से छीनते गये और द्वाबे को पठानों से साफ कर दिया। और आगे बढ़ कर रुहेलखण्ड आक्रमण कर दिया और रुहेलों का भी—पठानों की तरह बड़ी [..] से नाश कर दिया। मृत्यु ने नजीबखां को मरठों की क्रोधाग्नि से लिया था, लेकिन उसका पुत्र जवेथखां अभी तक अपने पिता के अपने पापों का प्रायश्चित् करने को बचा हुआ था। उसने शुक्रताल के क़िले की अभेद दीवारों के पीछे शरण ली। मरठों ने सीधा क़िले पर आक्रमण किया और उस पर भयंकर गोलाबारी करनी आरम्भ दी। उन्होंने क़िले के भीतर के सैनिक विभाग को ऐसे नष्ट किया कि जवेथखां उसकी रक्षा करने में असमर्थ हुआ। अन्त को एक रात चुपके से भाग निकला और गंगा को पार करके बिजनौर पहुँच गया। यह समाचार पाकर मरठों की बदला लेने वाली सेना भी बिजनौर ओर चल पड़ी और गंगा को पार करती हुई बिजनौर पहुँची। यहाँ जवेथखां के क़िले की रक्षा के लिये तोपखाने नियुक्त थे। ये मरठों पर गोलियां बरसाने लगे परन्तु मरठों ने तोपखाने पर कर लिया और उन दोनों शक्तिशाली सेनाओं को, जो उन्हें रोकने कर रहीं थी, परास्त किया और हज़ारों रुहेलों को मौत के पार उतारत हुये बिजनौर में जा घुसे। सारा ज़िला उनके घोड़ों की टापों से [..] जाने लगा। जवेथखां भाग कर नजीबगढ़ पहुँचा। मरठों ने वहां तक उसका पीछा किया और फतेहगढ़ पर भी अधिकार कर लिया। यहां पर उन्हें अपार प्रसन्नता हुई, क्योंकि मरठों का जो सामान पानीपत की लड़ाई में पठान और रुहेलों के हाथ चला गया था, वह सब अब पुनः विजयी मरठों के हाथ आ गया। अब उनको पूर्णरूप से विजय प्राप्त हो गई थी। जवेथखां की स्त्री और बच्चों को भी मरठों ने पकड़ लिया।
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जैसा पाशविक अत्याचार निर्दयी रुहेलों द्वारा मरहठे स्त्रियों और बच्चों पर पानीपत के मैदान में किया गया था, यदि उसी प्रकार की निर्दयता और अत्याचार मरठे नजीबखां और जबेथखां के परिवार के साथ करते तो अन्याय नहीं कहा जा सकता था; किन्तु शान्ति-प्रिय हिन्दुओं के परम्परागत नियम के अनुसार मरहठे न तो किसी के धर्म को छुड़ाते थे और न उनको अपने खेमे में लाकर क़त्ल ही करते थे। हिन्दू-वीरों ने यद्यपि इस राक्षसी कार्य पर कभी हाथ नहीं उठाया, फिर भी उनका डर सारे रुहेलों और पठानों के दिलमें ऐसा बैठगया था कि मरहठा अश्वारोही को देखते ही सारा गांव-का-गांव ही घर छोड़ कर भागना प्रारम्भ कर देता था। रुहेलों के जो सेनापति जीवित रहे, तराई के घने जंगलों में भाग गये। वर्षाकाल प्रारम्भ हो जाने के कारण ही वे प्रतिहिंसा-ज्वाला से बच रहे अन्यथा उन्हें भी मृत्यु का आस्वादन करा दिया जाता। इस प्रकार मरहठों ने पानीपत की हार का ब्याज-सहित शत्रुओं से बदला लिया। धर्म-ध्वजा को तराई के वनों की सीमा तक पहुँचा कर तथा अपने शत्रुओं को भयभीत करके मरहठे पीछे लौटे। सन् १७७१ ई० में मरहठों की सेना दिल्ली को वापिस लौट पड़ी। वहां पर महाराष्ट्र के राजनैतिक पुरुष अपने अपने सेनापतियों की विजय का लाभ पहिले ही से उठा रहे थे और शाह आलम को, जोकि मुग़ल साम्राज्य का उत्तराधिकारी था-अपने हाथ में लेकर भारत में सर्वश्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करने के जो-जो उपाय अंग्रेजों और शुजा ने मिलकर सोचे थे, उन्हें निष्फल कर दिया। उन्होंने शाह आलम को विवश किया कि वह हिन्दुस्थान के राज्य चलाने तथा रक्षा करने के अधिकार तथा उत्तर- दायित्व का सारा भार मरहठों के हवाले कर दे। इसके बदले में उन्होंने उसे हिन्दुस्तान का नाम-मात्र का सम्राट् मानना स्वीकार कर लिया। उसे नाम-मात्रका सम्राट् मानने के लियेभी मरहठे तबतक तैयार न हुये जबतक
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वह पानीपत की लड़ाई के दिन से आज तक की शेष नोचखस करने और नये विजित राज्य को बराबर-बराबर बाँट लेने के लिये सहमत न हुआ। यद्यपि यह कार्य एक बार सन् १७६१ ई० में हो चुका था लेकिन सन् १७७१ ई० में पूर्ण रीति से हो गया। रुहेले और पठानों की इस भयानक हार के पश्चात मुसलमानों का कोई ऐसा राज्य न रह गया जो हिन्दुओं के सारे हिन्दुस्तान के महाराज होने के विरुद्ध आवाज उठाता। मानो उसी साल मुसलमानों की स्वतन्त्रता, शक्ति और सारी इच्छाओं का अन्तिम संहार हो गया। मुग़ल, तुर्क, अफ़गान, पठान, रुहेले, फारसी तथा उत्तरी और दक्षिणी मुसलमानों के सारे सम्प्रदायों ने लड़कर बदला लेने वाले हिन्दुओं के हाथ से मुसलमानी राज्य को छुड़ाने का प्रयत्न किया, लेकिन मरहठों ने उनके सभी प्रयत्नों को निष्फल कर दिया। इस प्रकार उन्होंने भारत साम्राज्य के संरक्षक के शाही अधिकार को ५० वर्ष से अधिक अपने हाथों में रक्खा तथा जो इसके लिये लड़ा, उसे नीचा दिखाया। सन् १७७१ ई० के बाद मुसलमानों की शक्ति भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्र में न रही। इस प्रकार हिन्दुओं ने उनकी शक्ति का अन्त करके अटक से समुद्र तक फिर अपना स्वतन्त्रता प्राप्त की। अब केवल एक ही दावेदार था, जिसके विरुद्ध उन्हें संघर्ष और लड़ाई करनी थी। यह दावेदार मुसलमान नहीं था, पर वह ऐसा था जिसका कि स्वभाव, ढंग और मानसिक शक्ति मुसलमानों से बिलकुल भिन्न थी, वह था अंग्रेज़।
यदि मरहठों की दो सेनाओं के महाराष्ट्र से उत्तर में चले जाने के पश्चात शूरवीर हैदरअली अपने भाग्य को पुनः आजमाने के लिये न उठा होता और मरहठों के प्रभुत्व को दक्खिन में अस्वीकार न करता तो यह एक बड़ी अद्भुत बात हुई होती। माधोराव तुंगभद्रा नदी को पार करता हुआ एक शक्तिशाली सेना के साथ दुर्ग के पीछे दुर्ग जीतता और शत्रुओं को हर जगह हराता हुआ बढ़ता गया। एक दूसरी सेना हैदरअली को
[Header] [ १४४ ] भयभीत करने के लिये जबकि वह अनावदी के जंगलों में घुस गया स्था- पित की गई । एक रात जब यह सेना मट्टू के पास खेमा डाले पड़ी थी, हैदरअली अपने बीस हज़ार चुने वीरों के साथ जंगल से निकल पड़ा और शेर की भाँति अचानक मरहठा-सेना पर टूट पड़ा। किन्तु सौभाग्य- वश हैदरअली की तोप की पहिले ही गरज पर मरहठा सेनापति गोपालराव जाग उठा । उसने तत्काल ही खतरे को ताड़ लिया । उसने सोचा कि यदि मैं तनिक भी हिचकूंगा तथा दुर्बलता प्रकट करूँगा तो सारी सेना जगनेके पहिले ही मार डाली जायगी । वह अपने घोड़ेपर कूद कर सवार हो गया और अपने झण्डे को लहराते हुए अपनी जगह पर खड़े होकर आज्ञा दी कि खतरे का डंका बजाओ । इस भयानक शब्द को सुनकर सारे सिपाही उठ बैठे और बिछौनों को छोड़ कर रण-क्षेत्र में आ डटे । अब शत्रुओं की भयंकर अग्नि भड़की, घमासान की लड़ाई होने लगी । घुड़सवार सैनिक घायल हो होकर पृथ्वी पर गिरने लगे । हैदर- अली की तोपों की गरज और उसके गोलों की बाढ़ ने मरहटों को पीछे हटा दिया, लेकिन गोपालराव निर्भयता-पूर्वक अपनी जगह पर डटा रहा और ललकारते हुये अपना झण्डा फहराता रहा । लड़ाई के खतरे वाला डंका अब तक बज रहा था । सेनापति का सहायक पास ही खड़ा था । एक तोप का गोला लगा और उसका सिर टुकड़े २ हो गया । लोहू फुहारे की भाँति निकलने लगा जिससे मरहठा सेनापति लोहू से भीग गया । फिर परशुराम भाऊ घोड़े पर सवार हुआ और अपने स्थान पर डट गया । उसके घोड़े के एक गोली लगी और वह मर गया, तब वह दूसरे घोड़े पर चढ़ा । ज्यों ही उस पर गया, त्यों ही वह घोड़ा भी तोप का गोला लगने से मर गया । इस पर सेनापति चंचल हो उठा । वह फिर तीसरे घोड़े पर चढ़ा और मृत्यु के मुँह में खड़ा रहा। यदि वह भय और घबराहट से ज़रा भी पीछे हटता तो शत्रु अचानक आक्रमण कर देते और सारी सेना विजयी शत्रुओं के हाथ में फंस जाती, किन्तु सेना- पति के साहस को देखकर सारी सेना में फिर साहस आ गया । मरहटों