हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
[ ३६ ]
में रखकर कहने लगे "हम लोग अब अवश्य सीधे दिल्ली की ओर बढ़ेंगे और यवन राज्य की जड़ से उखाड़ देंगे। ऐ हिन्दू शूरवीरो ! तुम यहां खड़े होकर क्यों आगा-पीछा सोच रहे हो। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, "हिन्दू-पद-पादशाही" स्थापित करने का समय आ गया है। क्या ऐसा करना असम्भव है ? नहीं, नहीं, कभी नहीं । मैंने अपनी तलवार शत्रुओं की तलवार से नाप ली है-उनकी शक्ति का पता लगा लिया है।" फिर वह छत्रपति को सम्बोधित करते हुए कहने लगे-“ऐ महाराज छत्रपति शाहू जी ! मैं आप से अधिक धन या जन की याचना नहीं करता हूं, केवल आप मुझे आज्ञा दें और साथ ही यह आशीर्वाद भी दें कि मैं सीधे दिल्ली जाऊं और उस हानिकारक वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ी चला कर उसे शाखाओ सहित नष्ट कर दूं"। बाजीराव के उत्साहपूर्ण तथा पवित्र आन्तरिक भावों से भरे हुए वाक्यों को सुनकर छत्रपति शाहू जी का शरीर रोमांचित हो गया, और उन्हें अनुभव होने लगा कि उनकी नसों में शिवा जी का रक्त प्रवाहित होने लग पड़ा है, और जोश भरे शब्दों में उन्ह ने उत्तर दिया-“ऐ मेरी प्रजा के प्रमुख शूरवीरो ! जाओ, जिधर चाहो, मेरी सेना को विजय-पर-विजय प्राप्त कराते हुए ले जाओ और दिल्ली ही क्या, इस गेरुआ वस्त्र की ध्वजा को, विजय लाभ कराते हुए, हिमालय की चोटी और यदि होसके उसके परे किन्नर खण्ड पर स्थापित कर दो।" यह गेरुआ ध्वजा सोन- चांदी के काम से सुशोभित नहीं थी, बल्कि उन वैरागियों और संन्यासियों के गेरुआ रंग में रंगी हुई थी, जो सांसारिक माया के त्याग, ईश्वर- भक्ति तथा लोक-सेवा की ओर मनुष्यों को ले जाता है। शाहू जी की आज्ञा पाकर मरहठे उस गेरुआ ध्वजा के पीछे चल पड़े। यह गेरुआ ध्वजा उन्हे धार्मिक कर्त्तव्यों का स्मरण कराने तथा उनको सत्पथ पर ले जाने के लिये दी गयी थी । इसी ध्वजा के सहारे मरहठे अपने उच्च आदर्श पर आरूढ़ रह कर धर्म और जाति
[ ४० ] के रक्षक बने तथा शत्रुओं की पराधीनता से उन्होंने अपने देश को मुक्त कराया । तलवार ही मरहठों की पूज्या भवानी थी और भगवे रंग का था उनका झण्डा । उस झण्डे को महात्मा रामदास जी ने उठाया था, वीर शिवा उसी गेरुए झंडे की छाया में लड़ेथे और इसे सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर ले जाकर उन्होंने स्थापित किया था। उसी को उनके पौत्र शाहू जी तथा उनके वंशजों ने किन्नर खण्ड की सीमा पर गाड़ने का दृढ़ निश्चय किया । इस प्रकार सभा समाप्त हुई और महाराष्ट्र मंडल का इतिहास सारे भारतवर्ष का आदर्श इतिहास बन गया । ८. दिल्ली की ओर प्रस्थान ❀ "अरे बघतां काय ! चला जोरानें चाल करून ! हिन्दूपादशाहीस आतां उशीर काय !" —बाजी रावो बाजीराव और उस के साथियों की शिवाजी की स्वायत्त में पूर्ण रूप से कैसी शिक्षा दीक्षा हुई थी तथा उन्होंने अपने महान नेता की राजनैतिक विद्या तथा युद्धकला का कितनी सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया था—इन दोनों बातों का स्पष्टीकरण शाहूजी के सभापतित्व में दिये गए बाजीराव के भाषण से भली भांति हो जाता है । बाजीराव ने महाराष्ट्र के नेताओं को संबोधित करते हुए अपने वक्तृत्व में कहा— "जिस समय शिवा जी दक्षिण में हिन्दू जाति की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए प्रयत्न कर रहे थे वह समय अत्यंत ही विकट और आपत्तियों से परिपूर्ण था । पर उस समय की अपेक्षा आज परिस्थिति हमारे अधिक ❀ अरे देखते क्या हो । शक्तिशाली बनो । हिन्दू-पद-पादशाही की स्थापना के लिए अब क्या देर है ।
[ ४१ ]
अनुकूल है। ऐसा सुअवसर मिलने पर, हम लोग उन के वंशज होते हुए भी उत्तरीय भारत में लड़ाई ठानने का साहस करने के स्थान पर नाना प्रकार की शंकाओं और विचारों में पड़े हुए हैं। इस समय हम निज़ाम, बंगश तथा मुग़ल सेनाओं पर बड़ी सफलता के साथ धावा बोल सकते हैं। सर्वप्रथम हमें निज़ाम के विरोध को नष्ट करना चाहिये क्योंकि वर्तमान काल में मुसलमानों में वही सब से सुयोग्य सेनापति और राजनीतिज्ञ है'। बाजीराव ने जिस प्रकार अपनी ओजस्विनी वाग् शक्ति द्वारा अपना मनोरथ सफलता पूर्वक महाराष्ट्र मण्डल के सामने प्रकट किया उसी प्रकार कर्मक्षेत्र में भी अपने आपको अपने कर्त्तव्य द्वारा शिवाजी का एक सुयोग्य शिष्य और अनुयायी प्रमाणित कर दिया। ७ अगस्त, सन् १७२७ ईस्वी को, जबकि मूसलाधार वर्षा हो रही थी, बाजीराओ अपनी शिक्षित सेना को लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़ा और औरंगाबाद में प्रवेश करके उस पर विजय प्राप्त कर ली। उसके पश्चात् निज़ाम के अधीनस्थ जलना तथा आस पास के जिलों से अपने बाहुबल से लड़ाई खर्च का चन्दा वसूल करना आरम्भ कर दिया। ज्योंही निज़ाम की सेना इवाज़खां की अध्यक्षता में उसका मुक़ाबिला करने के लिये पहुंची बाजीराओ ने उन्हें अपनी चतुरता से थोड़ी देर तक निरुत्साहिता प्रकट करते हुए फंसाये रक्खा और फिर अचानक ही अपने दुश्मनों की सेना को छोड़ कर माहुर की ओर कूच कर दिया। फिर वहां से औरंगाबाद की तरफ बढ़ गया और यह बात फैला दी कि उस नगर से भी चन्दा वसूल किया जायगा। निज़ाम ने जब यह सुना तो वह उस धनी देश को बचाने के लिये, इवाज़खां के साथ सम्मिलित होने के उद्देश्य से शीघ्रता से उसी ओर बढ़ा। जब बाजीराओ ने अपनी इस चाल में सफलता देखी और देखा कि निज़ाम इस धोखे में आ गया है तो उसने खानदेश को छोड़कर गुजरात में प्रवेश किया और वहां के मुग़ल वायसराय को, विकट हंसी करते हुए, सूचना दे दी कि मैं इस देश पर निज़ाम की आज्ञा पा कर चढ़ाई कर रहा हूं।
[ ४२ ]
निज़ाम बड़ी तेज़ी के साथ औरङ्गाबाद की तरफ जा रहा था । उसे यह सुन कर बड़ी निराशा हुई कि वह जिस शत्रु से औरङ्गाबाद की रक्षा करने जा रहा है, वह शत्रु तो गुजरात में पहले ही पहुंच चुका है। बाजीराव्रो की इस चाल पर निज़ाम को बड़ा क्रोध आया और उसने भी उसी की नीति का अनुकरण करके अपनी चालाकी से बाजीराव्रो पर विजय प्राप्त करने का विचार निश्चित किया अर्थात् निज़ाम ने सोचा कि जिस समय बाजीराव्रो पूना की राजधानी में न रहे, उस समय अचानक धावा करके पूना को लूट लेना चाहिये । परन्तु बाजीराव्रो की इस युद्ध- कला को सीखने में भी निज़ाम पीछे ही रहा, क्योंकि बाजीराव्रोने इसकी यह सब बातें जानकर पहिले ही गुजरात छोड़ दिया और बड़ी शीघ्रता से निज़ाम राज्य में फिर आ पहुंचा ।
जब निज़ाम पूना लूटने के विचार से बड़ी तेज़ी से उस ओर आ रहा था, और सोच रहा था कि वह एक शानदार वीरतापूर्ण कार्य करने जा रहा है, तब उसे यह सुनकर बड़ा दुःख हुआ कि बाजीराव्रो के पूना लूटने के पहले ही उसका सारा राज्य बाजीराव्रो द्वारा लूट लिया गया है। इसलिये वह पूना लूटने की आयोजना को त्याग कर बाजीराव्रो से गोदावरी के किनारे पर मुक़ाबला करने के लिए शीघ्रता से लौटा । इस चक्कर में पड़कर निज़ाम की सेना बड़ी थक गई थी । यद्यपि निज़ाम की इच्छा उस समय, अपनी सेना की दशा देखकर, सामना करने की न थी तथापि बाजीराव्रो ने उसे युद्ध करने के लिये हठात् विवश कर दिया और पहले की भांति भागने तथा सामना न करने की अपेक्षा ऐसी चालाकी तथा बुद्धिमानी दिखाई कि उसके फेर में पड़कर निज़ाम की सेना बाजी- राव्रो की इच्छानुसार पालखेद् नामक स्थान पर जा डटी । बाजीराव्रो ने अब सहसा उन पर आक्रमण कर दिया । इससे पहले वह निज़ाम से टक्कर लेने में हिचकता रहा था ।
यद्यपि निज़ाम के पास बड़ी २ तोपें और बन्दूकें मौजूद थीं, तथापि
[ ४१ ] वह बड़ी बुरी तरह फँस गया । उसे अब दृढ़ विश्वास होगया कि अब मरहठों से छुटकारा पाना असम्भव है । वह विषाद सागर में डूब गया । अब उसके सामने दो ही रास्ते थे या तो वह अपनी सारी सेना को बरबाद करा लेता या बाजीराव की इच्छानुसार संधि करता । बड़ी उधेड़बुन के बाद निज़ाम ने अपने हृदय में बाजीराव से संधि करने का विचार निश्चित किया और शाहूजी को महाराष्ट्र का स्वतन्त्र राजा मान लिया और जितनी चौथ और 'सरदेशमुखी' बाकी थी सब पाई पाई देना स्वीकार कर लिया तथा इस शर्त को भी मान लिया है कि उसके राज्य में पुनः मरहठे 'कर' वसूल करने के लिये नियुक्त किये जायेंगे । इस प्रकार दोनों में संधि हो गई । इस उपरोक्त लड़ाई का विस्तारपूर्वक वर्णन यहां इसलिए किया गया हैक्योंकि यह मरहठा युद्धकला का आदर्श-स्वरूप उदाहरण है और इसमे यह भी प्रकट होता है कि महाराज शिवाजी ने अपनी जाति को जिन जिन शिक्षाओं से भली प्रकार शिक्षित किया था, उनके वंशजों ने उन्हे आज तक उसी प्रकार स्मरण ही नहीं रक्खा वरन् उन शिक्षाओं को और भी उन्नत किया तथा समयानुकूल घोर लड़ाइयों में प्रायः उन गुणों से बहुत ही काम लेकर विशेष सफलता के साथ विजय प्राप्त करते रहे । मालवा का मुगल वायसराय भी दक्खिन के मुगल वायसराय से किसी दशा में उत्तम सिद्ध नहीं हुआ । सन् १६६८ से लेकर, जबकि उदाजी पवार ने मालवा पर आक्रमण किया था और मण्डबा में अपना खेमा गाड़ दिया था, मरहठे लोग हर तरफ से मुगलों की सेना पर धावा करते रहे और उन्हें सुख की नींद न सोने दिया । उस प्रान्त के हिन्दू, जो मुसलमानों के अन्यायपूर्ण शासन से पीड़ित थे, अपने धर्म की रक्षा के लिये हर तरह विधर्मियों से सताये जाते थे । उन लोगों का भी, शिवाजी के उठाये हुये धार्मिक आन्दोलन के प्रति भाव बदला और वे अनुभव
[ ४४ ]
करने लगे कि वास्तव में मरहटों का यह आन्दोलन प्रान्तीय या व्यक्ति- गत नहीं है, वरन् धार्मिक और सार्वजनिक है। इस कारण वहां के हिन्दू, जिनके नैसर्गिक नेता वहां के जमींदार, ठाकुर और उनके पुरोहित थे, उक्त आंदोलन के पक्षपाती हो गये और इस कार्य को सब ने अपना मुख्य कर्त्तव्य समझ लिया। उनमें मरहटों के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई और उन्हें पूर्णरूप से ज्ञान हो गया कि मरहटों की यह विशाल शक्ति ही केवल देश और धर्म को विदेशियों के पंजे से मुक्त कराने का उस समय एकमात्र सर्वश्रेष्ठ साधन है। भाग्यवश मालवा के हिन्दुओं को वहां प्रसिद्ध तथा प्रभावशाली राज- कुमार मिला हुआ था जो कि हिन्दू-स्वतन्त्रता का बहुत ही समर्थक था। उसका शुभ नाम सवाई जयसिंह था। था वह जयपुर का राजा। महा- राज छत्रसाल ने जब अनुभव किया कि हम अपने छोटे से राज्य को विदेशियों के आक्रमण से रक्षा करने में पूर्णतया असमर्थ हैं तो उन्होंने देशभक्ति से प्रेरित होकर तथा प्रान्तीय भेदभाव को त्याग कर हिन्दू स्वतन्त्र राज्य के आन्दोलन से सहानुभूति रखना पसन्द किया और इस बात की परवाह नहीं की कि इस आन्दोलन के जन्मदाता कौन हैं। चाहे मरहठे हों या राजपूत हों, चाहे भिल अथवा कोई अन्य हिन्दू सम्प्रदाय क्यों न हो, उन्होंने दिल्ली के 'मुसलमानी राज्य के सामने सिर झुका कर जीना पसन्द नहीं किया। वह इसी विचार पर अटल भी रहा। छत्रसाल के इसी उत्तम विचार का अनुकरण जयसिंह ने भी किया। जयसिंह ने बड़ी वीरता के साथ मालवानिवासी पीड़ित हिन्दुओं का पक्ष ग्रहण किया। वे क्षत्रिय, ब्राह्मण तथा अन्य जातिवाले मुसलमानों द्वारा नियुक्त शासकों के अन्यायपूर्ण करों से पीड़ित हो रहे थे। वे लूटमार तथा अपने जाति और धर्म की अवनति तथा अपमान से विह्वल हो रहे थे। यह सब कुछ सहन करना उनकी शक्ति से बाहर हो रहा था। उन सबको जयसिंह ने अपने पास बुलाकर अपनी सम्मति दी कि सभी
[ ४५ ] मालवा-निवासी मिलकर मरहठों को बुलायें ताकि वे इनको स्वतन्त्र करा सकें और हिन्दू राज्य की स्थापना कर सकें। क्योंकि इस समय सिवाय मरहठों के हिन्दूधर्म का रक्षक दूसरा कोई दिखाई नहीं दिया तब उसके सामने दो परिस्थितियां उपस्थित हुईं, या तो वह मरहठों से सहा- यता मांग कर उनके अधीन होकर रहता या वह विदेशी यवनों के अधीन होकर फलता फूलता। उस समय उस विचारशील राजकुमार ने भली भांति समझ लिया था कि इस समय भारतवर्ष में जितने हिन्दू-शासक हैं, उनमें से केवल महाराष्ट्र-मंडल ही एक ऐसी सुसंगठित शक्ति है, जो मुसलमानों का उचित रूप से सामना करके रणक्षेत्र में उन्हे नीचा दिखा सकती है और हिन्दुओं को एकत्रित करके एक सूत्र में बांध सकती है। उसने सोचा कि यदि मैं अग्रसर होकर अपने बाहुबल से इस पीड़ित हिन्दू-जाति को मुसलमानों के अन्याय से मुक्त नहीं करा सकता, तो मेरा अपनी जाति के प्रति अवश्य यह कर्त्तव्य होना चाहिये कि अपनी सारी इच्छा, आशा और तृष्णा को त्याग कर, अपने सर्व नीच विचारों को तथा पारस्परिक वैर-भाव को तिलांजलि देकर उन महापुरुषों का सहायक बनूं जो हिन्दू- जाति को स्वतन्त्र बना सकते हैं और बनायेंगे। प्रभावशाली ठाकुर नंदलाल मांडवी ने उक्त राजकुमार के विचारों का सादर अनुमोदन किया और बड़े हर्ष-पूर्वक मालवा निवासी हिन्दुओं की ओर से अपनी जाति एवं धर्म की मान रक्षा के लिए तथा म्लेच्छों को मार भगाने के लिए मरहठों को पत्र द्वारा आमन्त्रित किया। मरहठों ने, जिनका जीवन ही धर्म की रक्षा के लिये हुआ है, मालवा निवासी अपने सहधर्मियों के निमंत्रण-पत्र को पाकर बड़ी प्रसन्नता के साथ शीघ्र ही चिम्माजी (बाजीराव के भाई) की अध्यक्षता में सारे प्रांत पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया। उधर मुग़ल वायसराय ने यह समाचार पाकर एक बड़ी संख्या में अपनी सेना एकत्रित की, लेकिन मरहठे लड़ाई के समय उनकी तनिक भी परवाह न करके तिल भर भी रण-क्षेत्र से न हटे
[ ४६ ] प्रत्युत् सुअवसर पाते ही मुसलमानी सेना पर अचानक टूट पड़े और देवास की लड़ाई में वायसराय का काम तमाम कर दिया । किन्तु मुग़ल सम्राट मालवा जैसे धनशाली प्रान्त को, इस प्रकार सहज ही अपने हाथ से खो देने के लिये कदापि तैयार न था, इसलिये उसने मरहठों का सामना करने के लिए एक नया वायसराय मालवा भेजा । उधर महरठों से सहानुभूति रखने वाले सभी मालवा निवासी मरहठा फ़ौज में शामिल हो गये । नये मुग़ल अधिनायक ने अपनी विशाल सेना के साथ एक भयंकर उपाय सोचकर मरहठों का मांडव घाट के दरों तथा अन्य दूसरी घाटियों में नाश करने का विचार किया। लेकिन मरहठों ने मालवा निवासी हिन्दुओं की सहायता से चिम्माजी अप्पा तथा पिलाजी की संरक्षता में, मुग़ल सेना को तिराल नामक स्थान पर, एक घमासान लड़ाई करके पूर्णरूप से पराजित किया और उनके नये वायसराय को भी मार डाला तथा मुगलों को मालवा से बिलकुल निराश कर दिया । इस प्रकार दूसरी बार विजय के समाचारः को सुनकर मालवा के हिन्दुओं की प्रसन्नता की सीमा न रही । वे आनन्दसागर में निमग्न हो गये । आज उनके लिये एक महान् गौरव का दिन सामने आया। सैंकड़ों वर्ष की हार और पराजय के पश्चात् अब फिर उन्होंने विजय के साथ हिन्दू-ध्वजा को स्वतन्त्र फहराते हुए देखा । उस ध्वजा की छाया से उन की नसों में जीवन रक्त का संचार होने लगा । उनका हृदय देशभक्ति, जातीय प्रेम तथा धार्मिक भावों से भर गया । उनके मुक्ति-दाता मरहठे जिस ओर जाते थे, बड़ी धूम-धाम से उनका स्वागत करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताते थे । स्वयं जयसिंह ने भी एक मानपूर्वक पत्रद्वारा सारे मरहठे सेना- पतियों को, जिन्होंने लड़ाई में अपूर्व साहस तथा वीरता का परिचय दिया था, इस अद्भुत सफलता पर बहुत २ बधाई देते हुए तथा उनका
[४७]
सहस्रवार धन्यवाद करते हुए लिखा कि आप की विजय अति शोभापूर्ण है। आपने मुसलमान शत्रुओं को मालवा प्रान्त से निकाल कर, मालवा निवासी हिन्दुओं को यवनों की दास्ता की बेड़ी से मुक्त करा के हिन्दू- धर्म के साथ जो उपकार किया है, उसके लिये हम लोग आजन्म आपके ऋणी हैं और जो कुछ आपके प्रति कहा जाय, सब कुछ थोडा है। केवल सहस्रों धन्यवाद देकर ही मैं अपने आपको कृतकृत्य समझता हूं। मरहठे सरदारों ने शीघ्र ही देश मे शान्ति स्थापित कर दी और मुगल-प्रतिनिधियों को मालवा से निकाल कर उस पर महाराष्ट्र के एक सूबे की भांति, शासन करने लगे। इतने पर भी, दिल्ली का बादशाह पूर्ण निराशा में भी आशा की किरण ढूंढने का प्रयत्न करने लगा। उसने पुनः एक नये वायसराय को भेजा जिस का नाम मुहम्मदखां बंगश था। वह एक बहादुर शेरदिल रुहेला पठान था। उसने लड़ाइयों में अपनी वीरता से मुसलमानी सेना के अन्दर बड़ा नाम पैदा किया हुआ था। उसे मुगल बादशाह की तरफ से पुरस्कार में 'रणसिंह' की उपाधि मिली हुई थी। दिल्ली-दरबार की ओर से उसे सब मे पहिले बुन्देला-सरदार छत्रसाल की बढ़ती हुई शक्ति का नाश करने और तत्पश्चात् मालवा से मरहठों का नामोनिशान मिटा देने का भार सौंपा गया। बुन्देला-सरदार छत्रसाल, कुछ दिनों से मुसलमानों की गुलामी की बेड़ी को अपने परिश्रम से तोड़ कर, स्वतन्त्र राजनैतिक जीवन व्यतीत कर रहा था। छत्रसाल शिवाजी का एक अनन्य भक्त था, शिवाजी की आदर्शपूर्ण शिक्षा ने उसके हृदय मे स्वतन्त्रता की नींव रखी थी। उसने यौवन काल से ही शिवाजी को अपना गुरु तथा पथ- दर्शक स्वीकार किया हुआ था। तब से ही वह शिवाजी की सम्मति अनुसार बुन्देलखण्ड के हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये प्रयत्नशील रहा और अंत में बड़ी सफलतापूर्वक उसने अपने देश और धर्म को स्वतन्त्र
[Page 48]
बना लिया । इसी कारण इसकी सारी प्रजा इसको 'हिन्दू-धर्म की ढाल' के नाम से बुलाने लगी थी । मुहम्मद बंगश ने एक बड़ी भारी सेना के साथ बुन्देलों के छोटे से राज्यपर, बादशाह की आज्ञानुसार, आक्रमण कर दिया । वृद्ध बुन्देले सरदार ने जब देखा कि मुझ जैसे छोटे राज्य को विध्वंस करने की शाही-आज्ञा लहर मार रही है तो वह कुछ चिन्तित हुआ । पर शिवाजी जैसे गुरु तथा रामदास और प्राणनाथ प्रभु जैसे महात्माओं की हिन्दू-पद- पादशाही की शिक्षाओं से पूर्णतया प्रभावित छत्रसाल का ध्यान अपने गुरुभाई बाजीराओं की ओर गया । बाजीराओ के रक्त में न केवल शिवाजी का उत्साह ही भरा हुआ था बल्कि उनमें अपने पूर्वजों के उद्देश्य की पूर्ति की लगन भी लगी हुई थी । छत्रसाल ने एक करुणा-पूर्ण पत्र बाजीराओ के नाम लिखा, जिस में उनके पूर्वजों की कीर्ति तथा उच्च ध्येय का दिग्दर्शन कराते हुए उनके कर्त्तव्यों का स्मरण दिलाया और अपनी इस संकटापन्न अवस्था में सहायता पाने के लिये प्रार्थना की । छत्रसाल की बुद्धिमत्ता तथा लेखन-शक्ति ऐसी थी, कि उसके इस पत्र ने प्रत्येक हिन्दू के हृदय में भ्रातृभाव उत्पन्न कर दिया । मैं उसके पत्र का सार अंकित करता हूं, जो उसकी श्रद्धा का द्योतक है। “जिस प्रकार विष्णु भगवान् ने गजराज के आर्तनाद को सुनकर नंगे पावों जाकर दुष्ट ग्राह के हाथ से उसकी रक्षा की थी उसी प्रकार “ऐ हिंदू-कुल-कमल-दिवाकर बाजीराओ ! आप भी आइये और मुझ दीन को विधर्मियों के भयंकर आक्रमण से बचाइये ।” महाराज शिवाजी के एक पुराने शिष्य तथा मित्र के इस प्रकार मुसलमानों के आक्रमण द्वारा धर्मसंकट में पड़ने परतथा एक हिन्दू के नाते मरहठों से सहायता मांगने पर भला मरहठे इसकी पुकार को कैसे अन- सुना कर सकते थे । उनका तो अस्तित्व ही धर्म की रक्षा के लिए था । पत्र पाते ही मरहठों का उत्साह देशभक्ति के लिये उबलने लगा और तत्काल
ही बाजीराओ, मल्हरराओ, चिम्माजी अप्पा तथा अन्य मरहठे सरदारों ने जितनी शीघ्रता हो सकी, उतनी शीघ्रता से सत्तर हज़ार सेनाओ के साथ कूच कर दिया और महाराज छत्रसाल से धामोराह के स्थान पर जा मिले । छत्रसाल भी अपनी बची बचाई बुन्देला-सेना एकत्रित कर, उनके साथ रवाना हो गये । यद्यपि उस समय मूसलाधार वृष्टि हो रही थी तथापि रणमद में मत्त मरहठों ने इसकी कुछ भी परवह न की । मुहम्मदखां अपनी असंख्य सेना के साथ, एक छोटे से हिन्दू- राज्य पर विजय प्राप्त करके तथा राजा छत्रमाल को उसकी राजधानी से निकाल कर, अपनी वीरता पर बहुत गर्वित हो रहा था । उसने वर्षा- काल में आराम करने का विचार किया । जिस समय मुग़ल-अधिपति इस प्रकार मूर्खों के स्वर्ग में विचर रहा था उसी समय भयानक वर्षाकाल की तनिक भी परवाह न करते हुए धर्मवीर हिन्दू सेनाओं ने मरहठों की छत्र-छाया में अपनी जान हथेली पर रख कर, सघन वनों, दुर्जय पर्वतों तथा विकट मार्गों को पार करके अचानक मुहम्मदखां बंगश पर चढ़ाई कर दी और सन् १७२६ ईसवी में जैतपुर की लड़ाई में उसे भली भांति परास्त कर दिया । उससे जीते हुए राज्य को पुनः छीन लिया । सुख-स्वप्न देखने वाले 'रणसिंह' ने अब अपने आप को शत्रुओं से घिरा हुआ पाया । जान जाने के भय से वह बड़ी नीचता पूर्वक रणक्षेत्र से पीठ दिखा कर भागा और दिल्लीराज से मिली हुई 'लड़ाई के शेर' की उपाधि को अक्षरशः सत्य बनाकर मुसल- मानों का मुख उज्ज्वल किया ! इस प्रकार सारा मालवा व बुन्देल- खण्ड पुनः हिन्दुओं के हाथ आ गया । वृद्ध बुन्देले-सरदार छत्रमाल ने पुनः बड़ी धूमधाम से अपनी राजधानी में प्रवेश किया । नगरनिवासी अपने बिछुड़े हुए सरदार के शुभागमन से कृतकृत्य हुए और उन्होंने आन्तरिक हृदय से उन का स्वागत किया । सारा नगर मरहठों की तोपों की ध्वनि से गूंज उठा ।
[ ५० ] वृद्ध छत्रसाल मरहठों के इतने कृतज्ञ हुए कि उन्होंने बाजीराव को अपना तृतीय पुत्र बना लिया। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके राज्य का तीसरा भाग बाजीराव के हवाले कर दिया गया। बुन्देलों का यह अनु- पम कार्य, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मरहठों के सिद्धान्त और आदर्श, जिन पर कि उनका निस्वार्थ कार्य निर्भर था, बहुत उच्च थे। इसी कारण से बाजीराव के वंशजों में प्रान्तीय तथा व्यक्तिगत भेद-भाव लेशमात्र भी न बचा, और सभी लोग अपने आपको एक खून, एक जाति तथा एक ही धर्म-सूत्र में बंधा हुआ समझने लग गये। इन ही उच्च आदर्शों ने सबके हृदयों को हिन्दू स्वतन्त्रता प्राप्त करने और एक सुविशाल हिन्दुसाम्राज्य स्थापित करने के पवित्र भावों से भर दिया। तीसरे मुसलमान वायसराय मुहम्मदखां बंगश के मालवा और बुन्देलखण्ड से भाग जाने पर मरहठे सारे देश के स्वामी बन गये। वह स्थान उनके लिये बड़ा ही उपयुक्त सिद्ध हुआ। यहीं से उन्होंने हिन्दू- स्वतन्त्रता की लड़ाई मुगल राज्य के ठीक केंद्र में आरम्भ करने की ठान ली। जिस समय मालवा और बुन्देलखण्ड में ये लड़ाइयां हो रही थीं उसी समय मरहठे गुजरात प्रान्त में अच्छी सफलता प्राप्त कर रहे थे। सेनापति पिलाजी गायकवाड़, कन्थाजी वान्दे और अन्त में स्वयं चिम्मा जी अप्पा ने क्रमशः गुजरात-प्रान्त में मुसलमानी सेनाओं को ऐसा नीचा दिखाया कि विवश होकर मुगल वाइसराय ने "चौथ" और "सरदेश- मुखी" देने की शर्त पर सन्धि कर ली। परन्तु मुगल-बादशाह, मरहठों की ऐसी गर्वपूर्ण विजय पर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने सेनापति अभयसिंह को मरहठों को गुजरात से शीघ्र बाहर करने का भार सौंप कर भेजा। अभयसिंह, जयसिंह से बिल्कुल प्रतिकूल प्रकृति का पुरुष था। उसकी आत्म-प्रतिष्ठा और आत्मिक स्वार्थ ने उसे ऐसा अन्धा
[ ५१ ] बना दिया था कि वह किसी प्रकार भी हिन्दू स्वतन्त्रता की लड़ाई मे जान निछावर करने वाले हिन्दुओं का पक्ष ग्रहण करने के लिए तय्यार न था। यहां तक कि हिन्दू-आन्दोलन में भाग न लेने वाले हिन्दू भी उसमें हज़ार अंशों में अच्छे गिने जाते थे। इस समय केवल महाराष्ट्र-मंडल ही हिंदुओं की एक अपूर्व संगठित शक्ति थी जो इस महान् कार्य्य को सफल बनाने के योग्य थी। जाति और धर्म का शत्रु, मुगलों का गुलाम, स्वार्थी, नीच, कुल- घातक अभयसिंह मरहठों से लड़ने के लिये गुजरात गया। वहां वह मरहठों की अपूर्व शक्ति तथा वीरता को देखकर चकित होगया और लड़ाई से डर कर सुलह करने के बहाने मरहठा सरदार पिलाजी गायकवाड को डाकोर नामक पवित्र स्थान पर बुलाया। डाकोर हिन्दुओं का धर्म स्थान है। इसलिए तीर्थ की पवित्रता तथा क्षत्रियों के वचन पर विश्वास करके शुद्ध चित्त पिला जी ने वहां जाने में कोई आपत्ति न की। पर जैसा पिला का अनुमान था वैसा न हुआ। उस नीच, कुल-कलंकी, स्वार्थ-परायण, मुग़ल-गुलाम अभयसिंह ने धोखा दिया और पिलाजी को मरवा अपनी नीचता का पूर्ण परिचय दिया। लेकिन शीघ्र ही उसे ज्ञात हो गया कि वह केवल एक खून करने का ही अपराधी ही नहीं है, वरन् उससे एक बड़ी भारी भूल भी हो गई है। मरहठे ऐसे कायर न थे जो अपने एक सरदार की मृत्यु से हताश होकर अपने उद्देश्य को अधूरा छोड़ देते या डर कर लड़ाई बन्द कर देते। युद्ध और मृत्यु उनके बचपन के साथी थे। उनका तो पालन पोषण ही इन्हीं परिस्थितियों में हुआ था। ऐसे मरहठों के किसी एक नेता या सेनापति को यदि कोई धोके से मार कर उनकी जाति पर अपना प्रभाव जमाना चाहे या उनको अपने वश में करना चाहे तो यह उसकी निरी मूर्खता ही समझनी चाहिये। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जिस प्रकार मालवा व बुन्देल-
[ ५२ ] खण्ड-वासियों ने महाराष्ट्र-मंडल को प्रार्थना पत्र भेज कर अपनी सहायता के लिये बुलाया और उनके आने पर उनका साथ दिया एवं उनके आन्दोलन के हृदय से पक्षपाती बने, उसी प्रकार गुजरात वासियों ने भी मरहठों को बुलाया और उनके साथ मिल गये। तथा उनके साथ सर्वदा सहानुभूति रक्खी और उनके पक्ष में लड़ते भी रहे। पिला जी की अन्याय-पूर्ण हत्या का समाचार सुन कर गुजरात के कोल, भील, बाघड़ी और अन्यान्य सैनिक जातियां अत्यन्त क्रोधित हुईं। मुगलों से इस हत्या का बदला लेने का भाव, उनके हृदय में भर आया। इसलिये मरहठे हर तरफ से टूट पड़े और गोलाबारी करके १७३२ ईस्वी में वड़ौदा राज्य को लेकर उसे ऐसा सुगठित बना लिया कि वह आज तक मरहठों की एक प्रसिद्ध राजधानी बना हुआ है। लड़ाई में अभयसिंह के पैर बिल्कुल उखड़ गये, वह अपने पाप और नीचता के कारण पवित्र, धर्मिष्ठ मरहठों का तनिक भी सामना न कर सका। उधर दामाजी गायकवाड़ ने अभयसिंह की राजधानी जोधपुर पर चढ़ाई कर दी। यह सुन अभयसिंह के होश-हवास उड़ गये, अन्त में विवश होकर लड़ाई से मुंह मोड़ वह अपनी पैतृक राजधानी जोधपुर की रक्षा के लिये शीघ्र लौटने पर विवश हो गया। इधर धामाजी भी उसके लौटने का समाचार सुनकर मुड़ा और अहमदाबाद पर चढ़ाई करके उसको ले लिया और मुग़ल सेना व उसके प्रतिनिधि को चक्कर में डाल दिया और उसकी ऐसी परिस्थिति बना दी कि उसके अहमदाबाद को मरहठों से लौटा लेने की बात तो दूर रही उनका पुनः गुजरात में आना ही असम्भव बना दिया गया। इस प्रकार १७३५ ईस्वी में, मुग़ल राज्य का यह सारा सूबा उनके हाथ से निकल गया और उनकी लहलहाती हुई आशा लता का सत्यानास हो गया।
[ ५३ ] ९. हिन्द-सागर की ओर ❄ आरमार स्वतन्त्र एक राज्यांगच आहे. ज्याचे जवळ आरमार त्याचा समुद्र... जलदुर्गवेष्टित होते त्यास नूतनच जलदुर्ग करून पराभविले”। —रामचन्द्र पन्त आमात्य—राजनीति । भारत-भूमि को स्वतन्त्र करने के लिये, जिस समय मरहठे मुगल-राज्य के ठीक केन्द्र में लड़ाई छेड़े हुए थे, उसी समय हिंद- महासागर को भी विदेशियों से स्वतन्त्र कराने के लिये प्रयत्नशील थे; क्योंकि उन का अनुमान था कि जैसे मुसलमान स्थल के अधिपति हो कर हिन्दू राज्य के लिये जितने बाधक हो रहे हैं वैसे ही युरोपीय सौदागर भी, जिन के जहाज़ इस समय व्यापार के लिए हिन्द-महासागर में आ जा रहे हैं, भारत के अधिकारी होकर उतने ही बाधक सिद्ध होंगे । शिवाजी तथा उन के वंशज युरोपीय सौदागरों की कामना, आशा तथा लोभ का नाश करने तथा उन के कार्य को असफल बनाने मे किस प्रकार दत्तचित्त थे—इस का पूरा दिग्दर्शन, प्रसिद्ध नेता और राजनीतिज्ञ रामचन्द्र पंत के बनाए तथा मरहठा मंत्रिमंडल द्वारा लोगों का ज्ञान बढ़ाने के लिये प्रकाशित “स्टेट-पॉलिसी” नामक ग्रन्थ के पढ़ने से होता है । शिवा जी समयानुकूल अपनी वीरता से यथाशक्ति समुद्रतट की विदेशियों से रक्षा करते रहे । यहां तक कि उन्हों ने केवल हिन्द- ❄ स्वतन्त्र सामुद्रिक बेड़ा राज्य का एक आवश्यक अंग है । जिस के पास सामुद्रिक बेड़ा होता है वही समुद्र का स्वामी बन सकता है । जिन शत्रुओं के पास जलदुर्ग हैं उनको हराने के लिए नवीनतम जलदुर्गों की आवश्यकता होती है ।
[ ५४ ] सागर की स्वतन्त्रता के लिये एक अलग सेना की नींव डाली और इस की सहायता के लिये एक नया सुसज्जित दृढ़ सामुद्रिक दुर्गों का बेड़ा भी बनवाया। इस के द्वारा, लगभग सौ वर्ष तक, हिन्द-महासागर स्वतन्त्र तथा सुरक्षित रहा। राजाराम के समय में, जब औरङ्गज़ेब ने सारे दक्षिण प्रान्त पर विजय प्राप्त कर ली और मरहठे संगठित होकर उनका मुक़ाबला करने के योग्य न रहे, तब उन्हें जहां कहीं भी उनका शत्रुओं से सामना हुआ, वहीं वे अलग अलग बड़ी शूरता के साथ लड़ते रहे। परन्तु मुग़ल सेना को, समुद्रतट से भगाने का भार प्रधान-सेनापति कान्होजी आंगरे, गुजरास तथा अन्य मरहठे नौ-सैनिकों के सिर पड़ा। व अपने कर्त्तव्य को इस योग्यता से निबाहते रहे कि अंग्रेज़, पुर्तगेज़, डच, सिद्दी और मुग़लों में, किसी का भी व्यक्तिगत अथवा संगठित रूप में साहस न हुआ कि मरहठों की उन्नतिशील सामुद्रिक शक्ति को दबा सके। अंग्रेज़ों को विशेष हानि उठानी पड़ी क्योंकि खाण्डेरी द्वीप, बम्बई की बन्दरगाह से केवल १६ मील की दूरी पर था। वह द्वीप प्रसिद्ध नौ-सेना- नायक कान्होजी आंगरे के आधिपत्य में था। वे समझते थे कि यदि जंजीरा के सिद्दी की मुसलमानी शक्ति से मरहटे-जनरल स्वतन्त्र रहे तो वे अवश्य हमारा शक्ति का नाश कर देंगे और साथ-ही-साथ पश्चिमी किनारे के पूरे शक्तिशाली पुर्तगेज़ी सौदागरों का भी नाश कर देंगे। अपनी शक्ति को शत्रुओं से सुरक्षित रखने के लिये कान्होजी आंगरे को एक बड़ी सेना रखने के लिये बाध्य होना पड़ा, जिस के खर्च की पूर्ति के लिये, अरब सागर के व्यापारियों के जहाज़ों पर “चौथ” लगा दी गई। मरहठों का, हिन्द-महासागर पर आधिपत्य स्थापित करने तथा उन पर चलने वाले विदेशियों के जहाज़ों पर “चौथ” लगाने का अधिकार उचित ही नहीं, बल्कि यथार्थ भी था। लेकिन अंग्रेज़ तथा अन्य विदेशी
[ ५५ ] सौदागरों ने उनके इस अधिकार का पूर्ण विरोध किया। इसके फलस्वरूप कान्हों जी ने विवश होकर उन्हें दण्ड देने के लिये उनके जहाज़ों को, नौकरों तथा सामान-सहित उस समय तक रोके रक्खा जब तक कि वे "चौथ" अदा न करें। सन् १७१५ ईस्वी में चार्ल्स बून जब बम्बई का गवर्नर नियुक्त हो कर आया तो उसने आंगरे के सामुद्रिक किले को विध्वंस कर देने का दृढ़ निश्चय किया। उसे अपनी वीरता पर पूर्ण अभिमान था और वह सर्वदा अपनी वीरता की डींगें मारा करता था। उसने दुर्ग के विजय करने के लिये एक बड़ी सेना का निर्माण किया, और विजय दुर्ग की बन्दरगाह पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज़ क्रोध से लाल हो रहे थे। उन्हों ने अपने जंगी जहाज़ों के नाम क्रमशः "हन्टर" अर्थात् शिकारी, "हॉक" अर्थात् बाज़, "रिवेंज" अर्थात् बदला लेने वाला और "विक्ट्री" अर्थात् विजय रक्खे। इन लोगों का एक संगठित पैदल दल भी था जिस में सहस्रों ही चुने हुए अंग्रेज़ योद्धा थे। यह दल मरठ्ठों के सामुद्रिक किले के नाश करने वाली सेना की सहायता के लिए तैयार किया गया था। इस प्रकार चार्ल्स बून ने अपनी जाति के महान् गौरव को दिखाने के लिये एक शक्तिशाली सेना के साथ मरहठों के सुदृढ़ किले पर एक ओर से धावा कर दिया और शीघ्र ही दूसरी ओर से उपर्युक्त विशेष नामधारी पैदल दल ने स्थल की ओर से धावा बोला। १७ अप्रैल सन् १७१७ ई० को क्रोधित अङ्गरेज़ी सेना ने मरहठों के विजय दुर्ग पर गोलाबारी प्रारम्भ कर दी। लेकिन उनकी लहलहाती आशा लता पर शीघ्र ही तुषार पड़ गया। उन्हें विदित हो गया कि यह किला मोम का बना हुआ नहीं है, जो उन के गोलों की गरमी से शीघ्र ही पिघल जाता, बल्कि यह विशाल किला दृढ़ तथा सब प्रकार से सुरक्षित बनाया गया है, जिस के चारों ओर तोपखाना लगा हुआ है। इस पर भी वीर अङ्गरेज़
[ ५६ ] सैनिकों ने किले की दीवार को पार करने के लिये अनेकों प्रयत्न किये, पर दीवार से लगी हुई तोपों ने उनके सारे प्रयत्नों को निष्फल कर दिया। इस प्रकार अपनी हार होते देखकर गोरे बहादुर अत्यन्त क्रोधित होउठे और जी खोल कर लड़े। पर वाह रे मरहठे बीरो ! तुम ने उनकी सारी आशाओं को धूल में मिला कर उन्हें पीछे हटा दिया । जब अंगरेज़ों के पांव रणक्षेत्र से उखड़ गए, तब मरहठे अपनी सारी शक्तियों को लगा कर अन्धाधुन्ध गोले बरसाने लगे, इस से अङ्गरेज़ सिपाहियों ने जितनी शीघ्रता से किले पर आक्रमण किया था उन से भी अधिक शीघ्रता भागने में दिखाई। दूसरे साल, गवर्नर बून ने पुनः पूरी तैयारी के साथ खाण्डेरी द्वीप पर आक्रमण किया, पर फिर भी उसे मरहठों से पराजित होकर भागना पड़ा। इस प्रकार मरहठों की वीरता ने उन्हें ऐसा नीचा दिखाया कि उनके हृदय में उन का डर बैठ गया, इस पर गवर्नर ने इङ्गलैण्ड के राजा का पत्र द्वारा एक पूर्ण जहाज़ी बेड़ा तैयार करने के लिये विवश किया। बून के कथनानुसार इङ्गलैण्ड के राजा ने प्रसिद्ध सेनापति कोमोडोर मैथ्यू की अध्यक्षता में एक बड़ा भारी जंगी बेड़ा, जिस के साथ चार अन्य जंगी जहाज़ थे, रवाना किया और साथ ही साथ मरहठों पर विजय पाने के लिये पुर्तगीज़ों को भी युद्ध के लिये निमन्त्रित किया। इस सुअवसर को पाकर पुर्तगेज़ भी बड़ी प्रसन्नता के साथ मरहठों के विरुद्ध लड़ाई करने के लिये चल पड़े। सन् १७२१ ईस्वी में मरहठों को इस युरोप की मिश्रित शक्तियों ने सामना करने के लिये उठना पड़ा और वे ऐसी बुद्धिमानी और वीरता
[ [ ५७ ] ]
के साथ लड़े कि युरोपीय शक्तियों को मरहठों के किले की दीवार तक पहुँचना असम्भव हो गया । यह देख सेनापति कोमोडोर मैथ्यू क्रोध से आगबगोला हो गया और अपनी सेना को उत्साहित करता हुआ, स्वयं सब से आगे बढ़ कर किले पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा । उसी समय एक मरहठे सिपाही ने दौड़ कर अपनी सङ्गीन उसकी जांघ में घुसेड़ दी, पर वीर कोमोडोर इस आघात से तनिक भी भयभीत न हुआ, वरन उसने बड़ी शीघ्रता से उस सिपाही का पीछा किया और उस पर पिस्तौल के दो फ़ायर किये, लेकिन क्रोध और शीघ्रता में वह पिस्तौल भरना भूल गया था इसी कारण दोनों फ़ायर निरर्थक गये । इस मित्र सेना की भी वही दशा हुई जो उनके सेनापति की हुई थी । जब मित्र सेना जान हथेली पर रख, जी तोड़ कोशिश करके जैसे तैसे किले के पास पहुँच गई, इसी समय मरहठों ने बड़ी बुद्धिमानी और उत्साह से इसका सामना किया और मित्र सेना चीखती हुई भाग निकली । ठीक उसी समय मरहठों की एक दूसरी संगठित रिज़र्व सेना, अचानक ही पीछे से आकर पुर्तगीज़ों की बाहरी सेना पर टूट पड़ी, इससे भयभीत हो सेना अपनी जान लेकर भागने लगी और तत्काल अङ्गरेजी सेना ने भी उनका साथ दिया—अर्थात् दोनों तितर-बितर होकर भाग गई । उनका बहुत-सा लड़ाई का सामान मरहठों के हाथ लगा । विजय का डङ्का बजने लगा और मरहठे इस सफलता से अत्यन्त आनन्दित हुये । उधर मित्र-सेनाओं के हृदय में जो कुछ लड़ाई की इच्छा शेष रह गई थी, उसकी पूर्णाहुति के लिये आपस में दोनों वाग्-युद्ध करने लग गई अर्थात् तात्कालिक लड़ाई की हार तथा भारी हानि का उत्तरदायित्व एक दूसरे के मत्थे मढ़ने लगीं । इस प्रकार द्वन्द्व युद्ध करती हुई अपना- सा मुँह लेकर दोनों ने अपनी अपनी राह ली । पुर्तगीज़ों ने चाऊल का
[ ५८ ]
रास्ता लिया और अङ्गरेजों ने बम्बई के लिये अपने जहाज तय्यार किये। इस लड़ाई के पश्चात् बहुत दिनों तक अङ्गरेज सौदागर अपने सौदागरी के जहाजों के साथ एक जंगी जहाज भी लेकर आते रहे, क्योंकि उन्हें इस बात का भय रहता था कि कदाचित् मरहठे उन्हें "चौथ" के लिये न पकड़ लें। अन्त में ऐसा ही हो गया अर्थात् कुछ दिनों के बाद अङ्गरेजों के 'विक्टरी' (विजय) और 'रिवेञ्ज' (बदला लेने वाले) नामी जहाजों को मरहठों ने पकड़ कर रोक लिया। सन् १७२४ ईस्वी में डचों को भी जाना पड़ा। उन्होंने पूरी तैयारी के साथ अर्थात् सात जंगी जहाजों, दो बम मारने वाले जहाजों और एक अच्छी सेना लेकर मरहठों के विजय-दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। परन्तु इतनी तैयारी करने पर भी मरहठों के साहस तथा वीरता पर किसी प्रकार का धब्बा लगाने में असफल हुये। अब मरहठा जल सेनापति हिन्द-महासागर में स्वच्छन्द घूमने लगे। इस बड़ी भारी सफलता प्राप्त करने के साथ साथ मरहठे कोंकण में मुसलिम सिद्दी से हैदराबाद में निज़ाम से, गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड में मुग़लों के साथ भी लड़ते रहे। कान्होजी आंगरे का सन् १७२६ ई० में देहान्त हो गया, ठीक उसी समय एक दूसरे ऐतिहासिक व्यक्ति ने राजनैतिक रंग स्थल में प्रवेश किया। उसने शीघ्र ही महाराष्ट्र-मण्डल के नेताओं के हृदयों पर अपनी वीरता की धाक बिठा दी। निस्सन्देह वह एक बड़ा तेजस्वी वीर था। उसने मरहठा जाति को उसके महान् उद्देश्य से किसी प्रकार से भी च्युत नहीं होने दिया। इस महान् व्यक्ति का नाम था ब्रह्मेन्द्र स्वामी। वे शाहूजी, बाजीराव, चिम्माजी, आंगरे आदि अन्य सहस्रों वीरों के गुरू थे। उनका जीवन देशभक्ति की महान् और श्रेष्ठ भावनाओं तथा आदर्शों से प्रोत्साहित था। वे सदा अपनी जाति के सम्मुख सरल रीति से आध्यात्मिक तथा धार्मिक पहलु तथा 'स्वधर्म' और 'स्वराज्य' के महान्