भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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बाजीराव हिन्दू-सेना लेकर इस भयानक विदेशी को रोकने के लिये निर्भयतापूर्वक कटिबद्ध न हुआ होता, तो ऐसा होने में कुछ सन्देह भी न था। दबने या भयभीत होने के स्थान पर बाजीराव की कल्पना शक्ति जाति के इस बड़े संकटपूर्ण समय पर और भी ऊंची उड़ने लगी। नादिरशाह के आने पर उसे एक बहुत उत्तम अवसर दिखाई देने लगा। वह सोचने लगा कि जो हिन्दू-इतिहास सौ वर्ष में पूरा होता, वह अब केवल एक वर्ष में ही संपूर्ण जायगा। उसके योग्य राजदूत उत्तर भारत के भिन्न भिन्न राजदरबारों में बड़ी चतुरता और उत्साह के साथ कार्य कर रहे थे और सेनापति रणक्षेत्रों में ख्याति प्राप्त कर रहे थे। जिस प्रकार पोवार, शिण्डे, गूजर, ऐङ्गरे और दूसरे मरहठों-जनरलों ने युद्धविद्या में नाम और सफलता प्राप्त की थी, वैसे ही व्यांकोजी राव, विश्वासराव, दादा जी, गोविन्दनारायण, सदाशिव, बालाजी, बाबूराव, मल्हार और महादेव भट्ट हिजने राजनैतिक विषयों के पण्डित समझे जाते थे और उन लोगों ने उतनी ही सफलता भी प्रप्त की थी। वास्तव में इन महाराष्ट्र-राजनीति विशारद पुरुषों ने ही इस हिन्दू- आन्दोलन के उच्च आदर्श और राजनीतिक सिद्धान्त को उचित रीति से स्थिर रक्खा। वे बड़ी योग्यता से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करते रहे जिस से मरहटे सैनिक सफलतापूर्वक कार्य करने में अग्रसर रहें। इन राज- नीतिज्ञ पुरुषों के पत्र-व्यवहार अब छपे हुए मिलते हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक मरहटा राजनीतिज्ञों, कूटनीतिज्ञों, योद्धाओं तथा मल्लाहों की आयो- जनाओं, आशाओं और आश्चर्यजनक प्रयत्नों के महत्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। उनके ये प्रयत्न केवल एक, और एक ही आशा तथा उद्देश्य लिये थे वह यह कि एक ऐसा दृढ़ हिन्दू-राज्य स्थापित हो, जो हिन्दू-जाति की राजनैतिक स्वतन्त्रता का रक्षक और पोषक हो। मरहठों की इसी आयोजना को नष्ट करने के लिये, औरङ्गजेबी शिक्षा प्राप्त मुसलमान-राजनीतिज्ञों ने नादिरशाह को बुलाया, क्योंकि वे मरहठों

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के उत्कर्प˙ को नहीं देख सकते थे। वे प्रत्यक्ष तथा गुप्त दोनों रीतियों से उसे सहायता भी देते रहे जिससे वह मरहठों के कुचलने में समर्थ हो सकें। लेकिन नादिरशाह को फौरन ही मालूम हो गया कि उसे मई सन् १७३६ ई० मे ऐसी हिन्दू-शक्ति का सामना करना है, जो इससे बिलकुल ही भिन्न है, जिसका सामना सन् ११२०—११२४ के बीच मुहम्मद गजनवी को करना पड़ा था। कूटनीति, राजनीति, देशभक्ति, उत्साह, सैनिक और संगठन शक्ति के साथ-साथ मरहठों में आत्म- बलिदान का सर्वोच्च भाव भी मौजूद था। पर आत्म-बलिदान तथा इसी प्रकार की अन्य चतुराईयां केवल उस अवस्था में ही की जाती थीं जब उन्हें यह विश्वास हो जाता था कि ऐसे बलिदान से मरहठों की अपेक्षा शत्रुओं को ही अधिक हानि होगी। महाराष्ट्र के हिन्दू जब से अपनी मातृ-भूमि, अपने धर्म और जाति के नाम पर उठे थे तब से हर प्रकार से मुसलमानों से श्रेष्ठ सिद्ध हुए थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि इन लड़ाइयों से हम भगवान् राम और कृष्ण की इच्छाओं को पूर्ण कर रहे हैं। वे नादिरशाह से नहीं डरते थे। मरहठा राजदूतों और कूटनीतिज्ञों ने बाजीराव को बड़े जोरदार शब्दों में लिखा— “नादिरशाह कोई ईश्वर नहीं है। वह सारी सृष्टि का नाश नहीं कर सकता। वह किसी को अपने से अधिक शक्ति-शाली जान लेने पर अवश्य सन्धि कर लेगा; बल की परीक्षा हो जाने पर ही मित्रता की बात आरम्भ हो सकती है। शान्ति सर्वदा युद्ध के पश्चात् ही होती है। इसलिये मरहठा-सेना को आगे बढ़ने दो। यदि केवल राजपूत और दूसरे हिन्दू आप (बाजीराव) के नेतृत्व में साहस के साथ सामना करें तो बड़े २ कार्य सम्पादन हो सकते हैं। निजाम की सहायता पा लेने पर नादिरशाह लौट जाने वाला पुरुष नहीं है, बल्कि वह सीधे हिन्दू राज्यों पर चढ़ाई कर देगा। सारे हिन्दू राजों महाराजों तथा सवाई जयसिंह बड़ी उत्सुकता से आप (बाजी-

[ ७४ ] राश्रो) के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि आप हमारे मरहटों का नेतृत्व करें तो हिन्दू सीधे दिल्ली पर चढ़ाई कर सकते हैं और मुसलमान बादशाह को गद्दी से उतार कर महाराणा उदयपुर को वहां के राज- सिंहासन पर बिठा सकते हैं”। वसीन की चढ़ाई अभी तक जारी थी। मरहठी सेना कर्नाटक से लेकर कटक और इलाहाबाद तक युद्ध कर रही थी। लेकिन बाजी- राव ने एक क्षण की भी देर न की और इन मरहठी आशाओं को जिन्हें कि उनके प्रतिनिधियों ने उत्तर भारत के हिन्दुओं के हृदयों में उत्पन्न किया था, तथा उनके बड़े उत्तरदायित्व के भार को जिसे उन्होंने अपने ऊपर लिया था तनिक भी हतोत्साहित न होने दिया। जब बाजीराव के कुछ साथी भिन्न-भिन्न प्रकार की रायें प्रकट करने लगे तो उसने ऊँची आवाज़ में कहा—'ऐ मेरे शूरवीरो ! शंका में पड़ कर क्या सोच रहे हो ? संगठिन होकर आगे बढ़ो। हिन्दू-पद- पादशाही का दिन बहुत समीप है। मैं अपनी सेना नर्मदा से चम्बल तक फैला दूंगा और तब देखूंगा कि किस तरह नादिरशाह दक्षिण की तरफ बढ़ने का साहस करता है।” बदला लेने वाली इस हठी मरहठा प्रवृत्ति ने फारस देश के विजयी की हिन्दुओं के नाश करने वाली इच्छा को दबा दिया और उसे हतोत्साह करके नष्ट कर दिया। नादिरशाह ने बाजीराव को मुस्लिम धर्म का अनुयायी प्रकट करके एक लम्बा और हास्यास्पद पत्र लिखा और स्वयं चतुरता पूर्वक वापिस लौट गया। पत्र में उसने लिखा था—"मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं कि दिल्ली के मुग़ल बादशाहों की आज्ञा मानो, अन्यथा बृजवाइयों की तरह दण्ड मिलेगा।' यह पत्र रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया और महाराज शाहूजी ने खुले शब्दों में १४ जून सन् १७३६ ई० को शाही दरबार में घोषित किया—'मरहटों के डर से नादिरशाह देश छोड़ कर भाग गया”। नादिरशाह के इस प्रकार दुम दबा कर भाग जाने के कारण निज़ाम

[ ७५ ] विपत्ति-सागर में डूब गया। नादिरशाह के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध भाग लेने और भूपाल की सन्धि की शर्तों को पूरा करने में हीला-हवाला करने पर उसे यथेष्ट दण्ड देने के लिये मरहठे दिल्ली की तरफ बढ़े। ठीक उसी समय उनका सब से बड़ा अधिनायक बाजीराव २२ अप्रैल सन् १७४० ई० को, इस असार संसार से नाता तोड़ कर चल बसा। बाजीराव की मृत्यु के पश्चात् कोई भी दूसरा व्यक्ति हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये उससे अधिक ईमानदारी और सफलता के साथ प्रयत्न न कर पाया। जब वह अभी बालक ही था, तभी से उसने अपनी जाति और धर्म के शत्रुओं के विरुद्ध तलवार उठायी थी और मरते दम तक उसे मयान में न डाला था। हिन्दू-धर्म के शत्रुओं का सामना करने के लिये सेना ले जाते समय खेमे में ही उनकी मृत्यु हुई। सभी बड़ी बड़ी कठिन चढ़ाइयों में जो उसने रुहेलों, सिङ्गो, मुगलों और पूर्तगेजों पर की थीं; कभी हार नहीं खाई थी। हिन्दू-पद-पादशाही के आदर्श को शीघ्रतम प्राप्त करने के लिये उसने जो अविश्रांत परिश्रम किया था वही उसकी अकाल मृत्यु का कारण हुआ। नादिरशाह की अंधड़जंन चढ़ाइयों से जितना धक्का हिन्दू-धर्म के आन्दोलन को लगता, उससे कहीं अधिक इस एक असाम- यिक मृत्यु के कारण लगा। ११ नाना तथा भाऊ ॐ "दशरथ देउनि राज्यश्रीस रामलक्ष्मणांच्या करीं "प्रभाततारा देउनि जाई कांति आपुली सूर्यकरों "तशीच बाजीरावे हिंदु स्वातंत्र्याची ध्वजा दिली "या नरवीर नानांच्या या भाऊंच्या दुर्दात करीं" - महाराष्ट्र भाट

  • जिस प्रकार दशरथ ने राम लक्ष्मण के हाथों में राज्य लक्ष्मी को दे दिया, तथा जिस प्रकार प्रभात-तारा अपनी ज्योति सूर्य को समर्पण करके विलीन हो जाता है उसी प्रकार बाजीरावों ने हिन्दू-स्वतन्त्रता की ध्वजा नरवीर नाना और भाऊ के शक्तिशाली हाथों में दे दी।

२. संताजी-धनाजी का युद्ध व मुगलों का पराभव

[ ७६ ] यद्यपि बाजीराव का देहान्त हो गया लेकिन जो उत्साह वह लोगों के हृदय में भर गया था, वह न मरा । इसके पश्चात् वे और भी दृढ़ होते गये। बाजीराव के पुत्र 'बालाजी' उर्फनाम 'नानासाहब' और बर्सीन के विजेता चिम्नाजी के पुत्र 'भाऊसाहब' की अध्यक्षता में मरहठे अधिक सफलता प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे । बालाजी की अवस्था केवल १८ वर्ष की ही थी, तो भी वह अपने पिता के समय से ही युद्ध-क्षेत्र देख चुका था । उसने लोगों को दिखला दिया कि नेता होने के सारे गुण उसमें वर्तमान हैं। शाहूजी सदैव उसके गुणों की प्रशंसा किया करते थे और बाजीराव के मर जाने पर बालाजी को प्रधान मन्त्री बनाने में उसने तनिक भी आगा-पीछा न देखा। उक्त मन्त्री नियुक्त करने की प्रथा बड़ी धूम-धाम से की गई । उत्सव समाप्त होने पर महाराज शाहूजी ने इस नवयुवक को शिक्षा देते हुये एक पत्र अर्पण किया, जिसमें उत्साह- वर्धक शब्दों द्वारा मरहठों के उन उद्देश्यों का वर्णन किया था जिनके लिये वे इस बड़े आन्दोलन में अपना बलिदान देते आ रहे थे । पत्र में राजा ने लिखा था- “तुम्हारे पिता बड़ी भक्तिपूर्वक अपने कार्य का सम्पादन करते रहे और उन्हें बड़ी सफलता भी प्राप्त हुई। उनकी इच्छा थी कि हिन्दू-शासन हिन्दुस्तान की अन्तिम सीमा तक फैले । तुम अपने पिता के सुयोग्य पुत्र हो, तुम्हें उनके आदर्श की ओर ध्यान देना चाहिये, उनकी जो हार्दिक अभिलाषा थी उसे पूर्ण करना चाहिये । अपने घुड़- सवारों को अटक के पार ले जाओ ।” राजाज्ञा मानने वाले नाना और भाऊ साहब ने अपने प्राणों को खतरे में डाल कर भी शिवाजी द्वारा आरम्भ किये गये कार्य को सफल बनाने का प्रयत्न किया । ऐसा करने के लिये तो उन्हें किसी उपदेश की आवश्यकता ही न थी, क्योंकि बाल्यकाल से ही उनका एकमात्र उद्देश्य हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करना ही था, यही उनकी यौवनावस्था की उत्कट अभिलाषा थी जिसके लिये अपना सर्वस्व निछावर करने में भी उन्हें किञ्चिन् मात्र हिचकिचाहट न हुई । शाहूजी ने अपने कारागार के दिन

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दिल्ली में बिताये थे। उस समय शाही परिवार के लोग कभी कभी उस पर कृपादृष्टि डालते रहे थे, इसी कारण वह मुग़ल-दरबार की चापलूसी किया करते थे तथा उनके प्रति अपनी राजभक्ति दिखाया करते थे। उनकी ये बातें भी ये लोग घृणा की दृष्टि से देखते थे। मंत्रित्व ग्रहण करते ही शाहूजी ने बालाजी को पूना भेज दिया और राघोजी भोंसले को दक्खिन पर चढ़ाई करने के लिये आज्ञा दी। शाहूजी के लौटने पर मरहटों में गृह-कलह आरम्भ हो गई, जिस से लाभ उठा कर सादातउल्ला जनरल की अधीनता में प्रायद्वीप के सारे दक्खिन-पूर्वी भाग को जीत कर मुसलमानों ने मुसलमानी-राज्य में मिला लिया और तंजौर के छोटे मरहठा-राज्य को दबाने लगे। तंजौर के महाराज प्रतापसिंह ने शाहूजी से सहायता मांगी। सादातउल्ला सन् १७३२ ई० में मर गया और उसका भतीजा दोस्तमुहम्मद आरकाट का नवाब बना। यह एक शक्तिशाली सरदार और मरहटों का कट्टर शत्रु था। १६ मई १७४० ई० को प्रातःकाल ही मरहटों ने तंग पहाड़ी रास्ते को पार करके दोस्त-मुहम्मद की सेना पर दक्खिन की ओर बढ़ कर आगे पीछे और बगल से हमला कर दिया। थोड़े ही घण्टों की लड़ाई में मुसलमानी फ़ौज नष्ट हो गई और दोस्तमुहम्मद मारा गया। मुसलमानी- राज्य के अन्याय से पीड़ित हिन्दू, अपने सहधर्मियों की इस विजय से बड़े प्रसन्न हुये और मरहटों के ध्येय को अपना ध्येय बना लिया। राघोजी नगरों और ग्रामों से लड़ाई के व्यय का भारी चन्दा वसूल करता हुआ अरकोट की ओर बढ़ा। सफ़दरअली और चंदासाहब, जो क्रमशः दोस्तमुहम्मद के बेटे और दामाद थे, विलोर और त्रिचनापल्ली में बड़ी- भारी फ़ौज लिये पड़े थे। राघोजी ने यह बात उड़ा दी, कि क्योंकि इस युद्ध में मरहटों को बहुत आर्थिक हानि उठानी पड़ी है इसलिये उसने अरकाट छोड़ने का विचार किया है। वह सचमुच त्रिचनापल्ली से ८० मील हट आया। चन्दासाहब, जो एक बड़ा कार्यकुशल और चतुर पुरुष था, मरहटों की इस चाल में आ गया और उसने १० हज़ार आदमियों की फ़ौज लेकर

[ ७८ ] हिन्दुओं के तीर्थ-स्थान मदुरा पर चढ़ाई कर दी। हिन्दू-सेनापति मुसल- मानों को इस तरह फन्दे में फंसा देख लौट पड़े और त्रिचनापल्ली में तेजी के साथ जा पहुँचे। बड़े साहब ने, जो हिन्दुओं से बदला लेने के लिये तथा उनके तीर्थ-स्थान मदूरा को लूटने के लिये भेजा गया था, जल्दी से अपने भाई को सहायता पहुँचानी चाही पर राघोजी ने अपनी सेना का एक भाग भेज कर उसे बीच में ही रोक लिया। एक बड़ी भीषण लड़ाई हुई, जिसमें बड़ा साहब मर कर अपने हाथी से गिर पड़ा। मुसलमानों की पूर्ण हार हुई और उनके सरदार की लाश राघो जी के खेमे में लाई गई, जहां उसे कीमती कपड़े में लपेट कर राघो जी ने उसके भाई चन्दासाहब के पास भिजवा दिया। त्रिचनापली का घेरा महीनों तक जागे रहा। मुसलमानों ने अत्यन्त वीरता-पूर्वक मुक़ाबला किया पर उनसे कुछ न बन सका। अन्त में उन्हें उन हिन्दुओं से परा- जित होना पड़ा जिन्हें वे बड़ी घृणा की दृष्टि से देखा करते थे। राघोजी ने चन्दासाहब को क़ैद कर लिया और उसे सितारा भेज दिया और मुरारराव घोरपाड़े को १४ सहस्त्र सेना के साथ त्रिचनापली का प्रबन्ध करने के लिये नियत कर दिया। सफ़दरअली ने पहले ही मरहठों के सामने हथियार डाल दिये थे और उन्होंने इस शर्त पर उसे अरकाट का नवाब बनाना स्वीकार किया कि वह एक करोड़ रुपया मरहठों को दे; और उसके बाप ने सन् १७३६ में जिन हिन्दू-राजाओं को गद्दी से उतार दिया था, उन्हें फिर से राजा बनावे। जिस समय राघोजी दक्षिण में ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर रहे थे उन्हीं दिनों बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासक अलीवर्दीखां से उसकी गवर्नमैंट की मुठभेड़ प्रारम्भ हो गई थी। मीर हबीब ने अलीवर्दी खां के खिलाफ मरहठों से सहायता मांगी और राघोजी के दीवान भास्करपन्त कोल्हाटकर ने, जो बंगाल की मुसलमानी शक्ति को नीचा दिखाने के सुअवसर की ताक में था, और चाहता था कि हिन्दू-राज्य की सीमा पूर्व में दूर तक बढ़ाई जाय, इस निमन्त्रण को प्रसन्नता-पूर्वक

[ ७६ ] स्वीकार किया। १० हज़ार मरहठी घुड़सवार सेना मुस्लिम प्रतिष्ठा को धूल में मिलाती हुई बिहार पार करके बंगाल में जा पहुँची। अलीवर्दी खां ने, जो किसी प्रकार से भी निकृष्ट नेता नहीं था, ज्योंही उन लोगों पर चढ़ाई की, मरहठों ने उसे बड़ी बुरी स्थिति में डाल दिया। उसकी रसद बन्द कर दी और फौज को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और उसे वापस लौट जाने पर विवश कर दिया। मीरहबीब अली ने भास्करपन्त से प्रार्थना की कि वह अपने विचार बदल दें, बरसात-भर बङ्गाल में रहें और लड़ाई के हरजाने का चन्दा शत्रुओं से वसूल करें। इसके बाद मरहठे मुर्शिदाबाद पर चढ़ दौड़े जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने हुगली, मिदन पुर, राजमहल अर्थात् मुर्शिदाबाद को छोड़ कर, व २ गंगा के पश्चिम में स्थित बङ्गाल के सभी जिलों पर अधिकार कर लिया। मरहठों ने बङ्गाल में विधर्मियों को नीचा दिखाया और हिन्दुओं ने सफलता प्राप्त की। इसलिये धूमधाम के साथ काली की पूजा करना निश्चित किया गया। ठीक उसी समय अलीवर्दी खां ने हुगली नदी को पार कर के एकाएक मरहठों पर चढ़ाई कर दी और बङ्गाल की सीमा तक उनका पीछा किया। पर यह केवल थोड़े समय के लिये ही था, क्योंकि राघो जी शीघ्र ही लौट आया। बालाजी भी एक दूसरी मरहठी सेना का सेनापति होकर बिहार में आ पहुँचा। देखने में तो वह शाही जनरल की हैसियत से आया था, पर उसका वास्तविक उद्देश्य अपने लिये कर लगाना तथा राघोजी भोंसले के साथ अपना हिसाब-किताब तय करना था। राघोजी और बालाजी में समझौता होते ही बालाजी हट गया और भास्करपन्त ने युद्ध की क्षतिपूर्ति और चौथ मांगी। अलीवर्दी खां ने अपने आपको उसके साथ लड़ने में असमर्थ समझ कर एक नई मक्कारी की युक्ति सोच निकाली। उसने हरजाने के प्रश्न पर विचार करने के लिये एक मेहमान और राजदूत की तरह भास्करपन्त को अपने खेमे में बुला भेजा, और ऐसे हत्यारों को खेमे में छुपा रखने का प्रबन्ध किया जो अलीवर्दी

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खां के मुँह से "काफ़िर को मारो" की ध्वनि निकलते ही उनपर हमला कर दें। उस भयंकर दिन राघोजी गायकवाड़ को छोड़ कर लगभग २० मरहठे अफ़सर मारे गये और राघोजी मरहठों की घबराई हुई सेना को लेकर शत्रुराज्य से भाग गया। किन्तु विजयानन्द में मग्न मुसलमानी सेना उसे नाश करने के लिये बार बार उस पर आक्रमण करती रही। लेकिन मरहठों के उस आन्दोलन को, जिसे औरङ्गजेब की शाही शक्ति भी न दबा सकी थी, भला यह अचानक आक्रमण और हत्या क्योंकर दबा सकती ? अलीवर्दी खां ने राघोजी को एक हास्य तथा मूर्खतापूर्ण पत्र में लिखा था, "परमात्मा को धन्यवाद है, धर्मात्माओं के घोड़े अधर्मियों से नहीं डरते और इस्लाम के शेर के इस प्रकार कार्य्य- रत रहते हुये मूर्ति-पूजक राक्षस उसका कुछ नहीं कर सकते। अतएव अब हमारी दया के प्रार्थी बनो, क्षमा-याचना करो, तभी सुलह हो सकेगी, अन्यथा नहीं।" राघोजी ने इस मूर्खतापूर्ण पत्र का जवाब देते हुये लिखा कि जब मैं हजारों मील की यात्रा करके इस्लाम के शेर से लड़ने के लिये गया उस समय तो वह सौ मील चल कर भी युद्ध करने का साहस न करसका। और ऐसी शब्दाडम्बर की लड़ाई बन्द करके अली- वर्दीखां के निमन्त्रण को अस्वीकार करते हुये उसने मरहठे घुड़सवारों को बर्दवान और उड़ीसा पर चढ़ाई करने तथा उन पर कर लगाने की आज्ञा दी। मरहठे वर्षों तक अलीवर्दी खां को परेशान करते रहे और जहाँ- कहीं पहुँचे, उचित मालगुज़ारी लगा दी या मालगुज़ारी न लगा सकने पर युद्ध-व्यय का भारी चन्दा ही लगा दिया। वे सारे जिलों में फैल कर चारों ओर घूमने लगे और समयानुकूल कभी लड़ते, कभी भागते। अन्त में बङ्गाल, बिहार और उड़ीसा के सूबोंमें मुसलिम-शासक के लिये राज्य चलाना असम्भव कर दिया। मरहठे हार के डरसे रुकने वाले न थे और न नाश का ख्याल ही उन्हें निराश कर सकता था। उन्हें तो एकमात्र चौथ की ही चाह थी। अन्त में 'इस्लाम के शेर' अलीवर्दी खां को सन् १७५० ई० में इन

[ ८१ ] “मूर्तिपूजक राक्षसों” से पूरा काम पड़ा, और ऐसा भीषण सामना हुआ कि लाचार होकर उसे क्षमा मांगनी पड़ी और भास्करपन्त को मारने के बदले उड़ीसा का राज्य, तथा बङ्गाल और बिहार पर १० लाख सालाना चौथ देने का भी वायदा करना पड़ा । इस प्रकार इस धर्म-रक्षकों को आखिर- कार मूर्तिपूजक-विधर्मियों से इस प्रकार क्षमा-याचना करनी ही पड़ी। क्या उन्होंने उस दिन भी अल्लाह का धन्यवाद किया होगा ? दूसरे मरहठा-सेनापति भी उत्तर भारत की दृढ़ मुसलिम-शक्ति को उसी समय अत्यन्त सफलतापूर्वक छिन्न-भिन्न कर रहे थे, जिस समय राघोजी भोंसले बङ्गाल में । हठी रुहेले और पठान जो अब तक यमुना से नेपाल तक की भूमि के स्वामी थे और जिन्होंने संगठित होकर एक शक्तिशाली सेना भी एकत्रित कर ली थी, मुगलों के विरुद्ध डटे हुए थे । मुगल-बादशाह के वज़ीर को डर था कि वे मुगलों का नाश करके भारत में पुनः पठान राज्य स्थापित करेंगे । उनकी इस अभिलाषा को धूल में मिलाने के लिए उसने मरहठों से सहायता मांगी ताकि वे उनको समूले नष्ट कर दें । मुगल राज्य का नाश स्वयं चाहते हुये भी मरहठों को यह पसन्द नहीं था कि उनके लाभ को कोई दूसरी मुसलिम-शक्ति उड़ा ले जाय । यही कारण था कि उन लोगों ने वज़ीर के निमन्त्रण को सहर्ष स्वीकार किया और उनके नेता मल्हरराव होल्कर और जयाजीराव शिन्दे यमुना नदी को पार करके कादिरगंज की ओर बढ़े । यहीं पठानों की सेना पड़ी थी । पठान बड़ी वीरता से लड़े पर उन्हें पराजित होना पड़ा । एक भारी विजय के साथ साथ मरहठों ने मुसलिम-सेना का नाश कर दिया और दूसरे पठान-सरदार अहमदखां को, जो बड़ी शीघ्रता से अपने कादिरगंज के मित्रों को सहयता पहुंचाने आ रहा था, घेर लिया । अहमद खां फर्रुखा- बाद में जा घुसा और उसकी मरहठों के साथ हफ्तों तक लड़ाई होती रही, पर उसकी शक्ति का ह्रास न हो सका क्योंकि उसको गङ्गा की दूसरी तरफ से रुहेलों की निरन्तर सहायता मिलती रही । अब मरहठों ने नाव का एक पुल बनाया और फ़ौरन कुछ सेना, जो फर्रुखाबाद को

घेरे हुये थी, पीछे छोड़कर गंगा पार उतर गए और मुख्य सेना ने पठानों और रुहेलों की ३० हज़ार संयुक्त-सेना पर आक्रमण करके एक भीषण संग्राम के बाद उसे धूल में मिला दिया । उधर अहमदख़ां ने फ़र्रुखाबाद से भाग जाने तथा उस बची हुई मरहठा सेना को जीतने का निष्फल प्रयत्न किया । मरहठों ने उसका पीछा किया और मुसलमान सेना को तितर बितर कर दिया । खेमों, हाथियों घोड़ों और ऊंटों के साथ-साथ उनका सारा सामान लूट लिया गया । इस बार उनके हाथ बड़ा धन लगा और वीरता तथा सफलता-दोनों दृष्टियों से इस आक्रमण का वस्तुतः ही अत्युत्तम फल हुआ । मरहठों से द्वेष रख और धर्मान्धता का जामा पहन कर पठानों ने काशी पर आक्रमण करके हिन्दू-मन्दिरों और पंडितों के साथ बड़ा अन्याय किया था। वे डींगें मार रहे थे कि काफ़िर कभी पठानों का सामना नहीं कर सकते; क्योंकि ईश्वर उनकी (पठानों की) ओर है । बहुत हद तक यह बात ठीक भी थी क्योंकि मरहठों को कभी उनका सामना करने का सौभाग्य ही न प्राप्त हो सका था; क्योंकि जब कभी कोई खुली लड़ाई होने लगती तभी पठान पीठ दिखाकर भाग जाते थे । आखिरकार मुसलमानों की भारी हार हुई और दूर तक बुरी तरह खदेड़े गये, जिससे हिन्दुओं को अपने मन्दिर और घरों की अप्रतिष्ठा का पूरा-पूरा बदला मिल जाने से संतोष हो गया। उस समय का हिन्दू-साहित्य विजय-गाथा से परिपूर्ण है । उस समय के पत्र इस विजय ध्वनि में लिखे दिखाई पड़ते हैं— 'पठानों ने काशी और प्रयाग की अप्रतिष्ठा की थी, पर अंत में हरिभक्तों की ही विजय हुई····· शत्रुओं ने काशी में हवा का बीज बोया, पर ईश्वर की कृपा से फ़र्रुखाबाद में उसे आंधी के रूप में काट लिया गया।' धार्मिक सफलता के साथ साथ राजनैतिक सफलता भी कुछ कम न हुई क्योंकि मुसलमान-बादशाह ने डर कर मरहठों को अपने राज्य में चौथ वसूल करने की आज्ञा दे दी। मुग़ल राज्य का यही भाग

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शेष था, जहां मरहठे चौथ न लगा सके थे। इस तरह मुल्तान (सिंध) पंजाब, राजपूताना और रुहेलखंड भी उनके आधीन हो गये, और "हरिभक्त" शांतिपूर्वक रहने लगे। वे अब भलीभांति यह दावा कर सकते थे कि अब मरहठों ने मुग़लराज्य के वक्षःस्थल में अपनी संगीन घुसेड़ दी है। महाराष्ट्र-मंडल के नेता बालाजी ने इन महत्वपूर्ण घट- नाओं के समाचार पाकर अपनी सेना को लिख भेजा, "आप लोगों का साहस अनुपम और वीरता प्रशंसनीय है। दक्षिणा की सेनाओं ने नर्मदा, यमुना और गंगा को पार कर के रुहेलों और पठानों जैसे विकट शत्रुओं को पराजित करके उनका नाश कर दिया। सेनापति और वीरो ! आप लोगों ने वास्तव में असाधारण सफलता प्राप्त की है और आप ही इस हिन्दू राज्य के स्तंभ हैं। आपलोगों का नाम, ईरान और तूरान को पार कर बादशाह बनाने वालों की श्रेणी में हो गया है।" [ १७५१ ई० ] महाराष्ट्र मंडल के प्रमुख लोगों ने एक बार फिर काशी और प्रयाग को अवध के नवाब और दिल्ली के वज़ीर से वापस लेने का उद्योग किया। हिन्दू-स्वातंत्र्य-आन्दोलन के प्रतिनिधि होने के कारण वे काशी और प्रयाग जैसे सर्वोत्तम पुण्य तीर्थों को अब भी मुसलमानों के अधीन देखना अपमानजनक समझते थे। उस समय के पत्रों को पढ़ने से हमें पता चलता है कि मरहठे काशी और प्रयाग के लिये सर्वदा चिन्तित रहे हैं। किसी प्रकार किसी राजनैतिक चाल से काम चलता न देख मल्हरराव अधीर हो उठा और उसने यहां तक निश्चय कर लिया कि सीधे काशी पर हमला करके ज्ञानवापी के मन्दिर पर खड़ी मसजिद को गिरा कर हिन्दू-जाति के कलङ्क को सदैव के लिये मिटा दें, क्योंकि यह मसजिद हमेशा उन अशुभ दिनों की याद दिलाती थी जिन दिनों मुसलमानी हलाली झंडा हिन्दुओं के पवित्र मन्दिरों के खण्डहरों पर स्थापित हुआ था। लेकिन मुसलमानों के बदला लेने के डर ने ब्राह्मणों को भयभीत कर दिया था और उन्होंने मल्हरराव

से प्रार्थना की कि जब तक कोई सुन्दर अवसर न आ जाय, तब तक हमले का विचार स्थगित रखिये। उन्होंने ऐसा इसलिए लिखा था क्योंकि काशी के आस पास अब भी मुसलमानों का अधिक आतंक छाया हुआ था। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कदाचित् काशी के इन ब्राह्मणों ने उसी पत्र में अपनी इस पवित्र चिन्ता को भी प्रकट किया हो कि हम लोग ही, जो अपने जीवन की रक्षा के लिये आप को काशी पर आक्रमण करके जातीयता का बदला लेने से रोक रहे हैं, उस पाप के भागी होंगे, क्योंकि आप को इस शुभ कार्य से रोक रहे हैं। सन् १७४६ ई० में शाहू जी का परलोक वास हो गया। तब से बालाजी ही, जिसे स्वयं शाहू जी "अधिष्ठाता" के अधिकार दे गये थे, महाराष्ट्रमंडल का अधिष्ठाता और जातीय मनोरथ और आदर्श का प्राण बन गया। यद्यपि घरेलू झगड़े और छोटे २ षड्यन्त्र जो राजमहल में हुआ करते थे, कभी कभी बड़ा भीषण रूप धारण कर लेते थे, तथापि इस योग्य शूरवीर ने इससे बेपरवाह हो, मुगलराज्य के स्थान पर मरहठों के आधिपत्य में एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य स्थापित करने का ध्यान ही प्रमुख रक्खा और इसके लिये अपने पूर्वजों से भी विशेष परिश्रम किया, यहां तक कि इस कार्य की पूर्ति के लिये उसे देशी, विदेशी, मुसलमान, ईसाई, एशियाई और यूरोपियन सभी से भारी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। विदेशियों में विशेषतः फ्रांसीसी दक्षिण में अधिक शक्तिशाली हो रहे थे और बालाजी भी इससे अनभिज्ञ न । पर उसे एक साथ ही हिन्दुस्तान के दूरस्थ भागों में भी बहुत से शत्रुओं के साथ युद्ध करना तथा उन असंख्य शत्रुओं का मुकाबिला करना पड़ रहा था, जो कि मरहठा-शक्ति का नाश करने का प्रयत्न कर रहे थे। इसलिये बालाजी ने उस समय फ्रेन्चों के साथ मत्था न लगाना ही श्रेयस्कर समझा। लेकिन राजनीति के दांव-पेंच की उलझन ने उसे उनके साथ

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रणक्षेत्र में उतरने के लिये बाधित कर ही दिया और बालाजी ने उन्हें उनके सहायक निज़ाम के साथ ऐसी बुरी तरह पराजित किया कि उन्हें १७५२ ई० में 'भालकी' में संधि करनी पड़ी जिसके अनुसार गोदावरी और ताप्ती का राज्य मरहठों को मिल गया। इस प्रकार दक्खिन के सारे राजाओं और प्रजाओं के दिलों से फ्रेंच-शक्ति का प्रभाव नष्ट हो गया। पेशवा ने, करनाटक और निचले दक्खिन के सारे नवाबों को दण्ड देने का काम पहले से ही आरम्भ कर दिया था। सवनूर के नवाब को कई लड़ाइयों मे हरा कर उस अपने राज्य का एक बड़ा भाग और शेष पर ११ लाख मालगुजारी देने को विवश किया। बालाजी भाऊराव की संरक्षता में ६० हजार मरहठा-सेना श्रीरंगपट्टम् पहुंचा, शिवर को पुनः अपने आधीन कर लिया और बलपूर्वक ३५ लाख रुपया चौथ वसूल किया तथा छोटे छोटे मुसलमान-सरदारों को दण्ड भी दिया। इसके बाद यशवन्तराव मेहेंडलने कड़ापाके नवाब पर चढ़ाई कर दी। निचले दक्षिण के सारे मुसलमान-सरदार, जो मरहठों के नाम से कांपते रहते थे, नवाब के साथ एकत्रित हो गये। अङ्गरेज़ों ने भी उनकी सहायता की। वर्षार्त्तु होने पर भी यशवन्त- रावने उन पर आक्रमण किया और एक घोर तथा दोटूक युद्धके पश्चात् हजारों पठानों और उनके साथ नवाब को भी मार डाला। उसका आधा राज्य ले लेने के पश्चात् अराकाट के नवाब पर चढ़ाई कर दी। अङ्गरेज यहां भी मरहठों के खिलाफ नवाब के मददगार थे, पर नवाब या उसका कोई संरक्षक भी उनकी (मरहठों की) मांगों की उपेक्षा न कर सका और उन्हें शान्त करने के लिये ४ लाख रुपया देना पड़ा। सन् १७५६ ई० में मरहठों ने बंगलोर को जा घेरा, चीनापट्टम को अपने अधिकार में कर लिया और हैदरअली को, जिसके मन में सारे मैसूर का स्वामी बनने की धुन समाई थी, ३४ लाख रुपया देने पर विवश किया। बालाजी की अभिलाषा उसे उसी समय नष्ट कर डालने की थी; पर क्योंकि उत्तर में

[ ८६ ] मरहठे महान् युद्ध लड़ रहे थे इसलिए उसे निचले दक्षिण का काम अधूरा ही छोड़ आना पड़ा और परिणामतः वह अपनी सेनाओं को भी वापिस ले आया। इसी बीच सन् १७५३ ई० में राघोबा ने अहमदाबाद ले लिया और दिल्ली में मरहठा-प्रभाव का विरोध करने के कारण जाटों से ३० लाख रुपया वसूल किया। इसी समय जोधपुर की गद्दी के लिये राजपूतों में घरेलू झगड़ा खड़ा हो गया। विजयसिंह के मुक़ाबले में रामसिंह ने मरहठों से सहायता की प्रार्थना की जो स्वीकार कर ली गई और दत्ताजी तथा जयप्पा ने स्वयं सेना लेकर सहायता के लिये प्रस्थान किया। इस युद्ध में बड़ा रक्तपात हुआ। ५० हजार की मरहठा सेना ने विजयसिंह को हरा दिया और वह भागकर नागौर चला गया। जयप्पा ने घेरा डाल दिया। लेकिन राजपूतों और मरहठों-यानी हिन्दू-हिन्दू की लड़ाई बालाजी को अच्छी नहीं लगती थी, इसलिये उसने बार बार शिन्डे पर ज़ोर दिया कि राजपूताने में सुलह करा दो और मरहठों के सब से प्रिय कार्य, तीर्थ स्थानों अर्थात् काशी और प्रयाग को मुक्त कराने का काम हाथ में लो। पर उसी समय विजयसिंह ने ऐसा नीचतापूर्ण कार्य किया जिससे महाराष्ट्र भर में सनसनी फैल गई और सुलह होना असम्भव हो गया। आप लोगों को याद होगा कि विजयसिंह के चचा ने पिलाजी गायकवाड़ को अपने खेमे में आमन्त्रित कर मार के डाला था। विजयसिंह ने भी उन्हीं का अनुकरण किया, यद्यपि वह जानता था कि पिलाजी की हत्या का बदला किस बुरी तरह लिया गया था। तीन राजपूत हत्यारे विजय- सिंह के खेमे से भिखारियों का रूप धारण करके निकल कर जयप्पा के खेमे के सामने मरहठा घुड़शाला के पास गिरे हुये चनों को चुनने लगे और ज्यों ही अपने शरीर पर देह पोंछने का एक अंगोछा डाले जयप्पा स्नानकेलिये बाहर निकले, हत्यारे झपटे और उनके शरीर में उन्होंने तलवारें घुसेड़ दीं। जयप्पा को प्राणघातक चोट लगी। दो हत्यारे पकड़े गये और एक भाग गया। राजपूत सेना ने तुरन्त ही निकलकर घबराई

[ ८७ ] हुई और सेनापति हीन मरहठा सेना पर आक्रमण कर दिया, ताकि उसको नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाये परन्तु शूरवीर सेनापति के असीम आत्मबल के कारण उनका यह आशा फलवती न हुई। उसने अपनी मृत्यु-शय्या के पास रोते हुए साथियों को एकत्रित करके शत्रुओं का सामना करने के लिये उत्साहित किया। और उन्हें कहा कि स्त्रियों की तरह रोने से पहिले शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो। अपने मरते हुये सरदार के इन उत्साहवर्धक वाक्यों ने मरहठा-फ़ौज को क्रोध और जोश से भर दिया। मरहठों ने उन्हें फिर हरा दिया। दूसरे मरहठा सरदार भी शिन्दे की सहायता को दौड़ पड़े। अन्ताजी मानकेश्वर १० हजार सेना लेकर राजपूताने में जा पहुंचा और विजयसिंह के पक्ष- पाती तमाम राजपूतों को उचित दण्ड देने लगा। विवश होकर विजय- सिंह ने रामसिंह का अधिकार मान लिया और सुलह की प्रार्थना की तथा मरहठों को अजमेर एवं अन्याय स्थानों की लड़ाई का खर्च दिया। इसी समय बूंदी के अबोध राजकुमार की विधवा माता ने अपने शत्रुओं के ख़िलाफ़ शिन्दे की सहायता मांगी। दत्ताजी ने उसकी इच्छानु- सार ही वह कार्य सम्पादन किया, जिस पर प्रसन्न होकर राजमाता ने ७५ लाख रुपये शिन्दे को इनाम दिया। १२ सिन्ध की ओर प्रस्थान ☸ फेहून नदम माहोरस गेले लाहोरास जिंकित शेंडे। अरे त्यांनीं अटकेत पात्र धडकत लाविले झेंडे ॥ सरदार पदरचे कसे कुंजर सिंह जसे कुंणि शार्दूल गेंडे ॥—'प्रभाकर' इन्ही दिनों राघोबा दिल्ली में बड़े बड़े काम कर रहा था। उसने गाजीउद्दीन को शाही वजीर बनने में सहायता दी और 'कुरुक्षेत्र' तथा ✵ मरहठों ने माहुर को अपने अधीन करके लाहौर को भी अपने आधिपत्य में ले लिया। तत्पश्चात् अल्प समय में ही अटक तक पहुँच कर अपनी विजय पताका वहां भी फहरा दी। उनके जो सरदार थे, वे सिंहों, व्याघ्रों और गैंडों के समान साहसी और निर्भय थे।

'गया' मरहटों को देने के लिये बादशाह को मजबूर किया। वह स्वयं आगे बढ़ा और उसने मथुरा, वृन्दावन, गढ़मुक्तेश्वर, पुष्पवती, पुष्कर और कई हिन्दू तीर्थ-स्थानों पर अधिकार जमा लिया। फिर मरहटों की एक टुकड़ी लेकर बनारस पर चढ़ दौड़ा और उसे भी जीत कर क़ब्ज़े में कर लिया। इस प्रकार हिन्दुओं की एक चिर-अभिलाषा पूर्ण हुई। राघोबा ने बड़े गर्व के साथ पेशवा को लिख भेजा कि उत्तर भारत के लगभग सभी पवित्र नगरों को मुसलिम-पंजे से छीन कर अपने अधिकार में कर लिया गया है। उन स्थानों पर भी—जिन्हें हिन्दू बहुत ही श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे मरहटों द्वारा हिन्दुओं की विजय ध्वजा फहराने लगी है। इससे हिन्दुओं की स्वतन्त्रता और हिन्दू-पद-पादशाही के आन्दोलनों की रहनुमाई तथा प्रतिनिधित्व करने का मरहटों का दावा और भी न्याय-पूर्ण हो जाता है। मुग़ल बादशाह ने सोचा कि मरहटे काफ़ी बढ़ चुके हैं इस- लिये अब उनसे युद्ध छेड़ देना चाहिये। नया वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन मरहटों का मित्र था। ज्यों ही उसे पता लगा कि मुग़ल-सम्राट् छिप-छिप कर उसके और मरहटों के विरुद्ध साज़िश कर रहा है, उसने होल्कर को बुलाया। होल्कर ने भी ५० हज़ार सेना के साथ ऐसी आसानी से शाही फ़ौज को भगाया कि बेगमों की रक्षा करने वाला भी वहां कोई न रहा और वे मरहटों के हाथ पड़ गईं। ग़ाज़ीउद्दीन को साथ लिये मरहठा-फ़ौज दिल्ली में जाकर प्रविष्ट हो गई और महलों में जा करके बूढ़े बादशाह को गद्दी से उतार कर आलमगीर द्वितीय—अर्थात् संसार विजयी—नाम से एक नये मनुष्य को गद्दी पर बैठाया। इस नाम के दो बादशाह हुये। पहला आलमगीर औरङ्गज़ेब था। उसने सोचा था कि वह अपने शाही क्रोध की सांस से हिन्दू-जीवन के टिमटिमाते चिराग़ को बुझा दूँगा। अल्लाह की क़सम खाकर उसने उस पर फूँक मारी, पर उसने उसकी दाढ़ी झुलस दी और शीघ्र ही उसने अग्नि ऐसा भयंकर रूप धारण कर

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लिया कि सह्याद्रि पर्वत को जा पकड़ा और उसमें से ऐसे शोले निकले जिसने लाखों मनुष्यों, मन्दिरों की चोटियों, कलशों, पहाड़ों और तराइयों तथा जल और स्थल सब को जा घेरा। इस प्रकार वह होमाहुति की एक प्रचण्ड अग्नि बन गई। पहले आलमगीर ने मरहठों को पहाड़ी चूहों के रूप में देखा था, पर इन चूहों ने इतनी उन्नति की कि उनके पैने पंजों ने कितने ही मुसल- मान-शेरों का पेट फाड़ दिया और उनका रक्त दूसरे आलमगीर की राजधानी में मरहठों के पैरों में बहने लगा। पहला आलमगीर शिवाजी को एक साधारण राजा भी स्वीकार न करता था; पर उसका दूसरा उत्तरा- धिकारी, आलमगीर द्वितीय, जो उसी का वंशज था, अपने आपको तभी बादशाह कहला सका जब कि शिवाजी की सन्तान ने कुछ कृपा करके उसे बादशाह बना रहने दिया। हिन्दुस्तान की मुसलिम-दुनिया भयभीत हो गई। वह हिन्दू-राज्य की शक्ति तथा प्रताप देखकर अपार क्रोध में जलती-भुनती खाक होने लगी। रुहेले और पठान फ़र्रुखाबाद और दूसरी जगहों में पराजित हुये, वज़ीर तथा नवाब अपनी जगहों से हटाये गये, मौलवी और मौलाना काफ़िरों की उन्नति-शील दशा देख कर "हलाली ध्वजा" के घटते प्रताप का स्मरण कर अधीर होने लगे; यहाँ तक कि स्वयं बादशाह भी अपने राज्य को भालों की नोकों पर स्थापित देखकर घबड़ा गया। अतः राज्यहीन तथा विवश होने पर भी मुसलमानों ने मरहठों के नाश करने और बदला लेने की कसम खायी और गुप्त रूप से षड्यन्त्र रचने लगे। यह कहते आश्चर्य होता है—यद्यपि यह आश्चर्य की विशेष बात नहीं भी है—कि मरहठों के उत्तर भारत के इस उत्कर्ष से कुछ हिन्दू-राजे भी असन्तुष्ट हो गये और जयपुर के माधवसिंह, जोधपुर के विजयसिंह, जाटों तथा अन्यान्य छोटे-छोटे सरदारों ने अपने स्वाभाविक बैरियों के साथ मिलने में विलम्ब नहीं किया। उन्होंने मुसलमानों को इस हिन्दू-शक्ति को नष्ट करने के लिये एक षड्यन्त्र रचने के लिये उभारा, जो अकेले ही हिन्दू-

[ ६० ] स्वतन्त्रता तथा हिन्दुओं के धार्मिक कृत्यों को नाश करने वालों का सामना पूर्ण रूप से कर सकती थी, तथा उसके लिये तैयार थी । मुसलिम-जगत् के नेताओं ने अपनी परम्परागत नीति के अनुसार मूर्तिपूजकों तथा काफ़िरों के विरोध के लिये भारत के बाहर से अपने सहधर्मियों के बुलाने का निश्चय किया । इसका मुख्य कारण यह था कि भारतवर्ष के मुसलमान मरहठों का किसी भी प्रकार से सामना नहीं कर सकते थे— न ही युद्ध में, न ही धोखा देने में, न ही चालाकी में, न ही औरंगजेबी मक्कारी में । नजीबखां रुहेला, जिसे मरहठों के नाश से हर प्रकार मे लाभ था, तथा मल्का जमानी, जो किसी समय शाही महल में अग्रगण्य षड्यन्त्र- कारिणी स्त्री थी, और जिसे हिन्दुओं से भिक्षा मांग कर जीवन निर्वाह करना असह्य था, इस भीषण षड्यन्त्र के नेता बने । उन लोगों ने अपने पूर्वजों का, जिन्होंने ऐसे ही डर और आशा में नादिरशाह को बुलाया था, अनुसरण करने का निश्चय किया और गुप्त पत्र-व्यवहार द्वारा अहमदशाह अब्दाली के पास, विधर्मियों पर चढ़ाई करके मुसलिम- राज्य को बचाने की विनीत प्रार्थना लिख भेजी । अहमदशाह ने उनके निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया क्योंकि उसमें उसका भी स्वार्थ छिपा हुआ था । हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त करने की उसकी चिर-अभिलाषा थी । पर असली और सब से बड़ा कारण, जिससे वह युद्ध छेड़ना चाहता था, यह था कि मरहठों का प्रताप और तेज तथा राज्य मुल्तान के पास उसकी सीमा तक पहुँच गया था; और इसके बढ़ने का डर इसे प्रतिदिन लगा रहता था । अहमदशाह ने पहले ही मुल्तान और पंजाब को अपने राज्य में मिला लिया था । लेकिन १७५० में थटा, मुल्तान और पंजाब को भीतरी तथा बाहरी आक्रमणों से बचाने तथा वहां शांति-स्थापना का काम मरहठों ने अपने हाथ में लिया था और वहाँ चौथ लगाने का अधिकार भी प्राप्त

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कर लिया था। इसके अनुसार ही उन्होंने अपने अभिलाषित वजीर ग़ाज़ीउद्दीन को, १७५४ में, अब्दाली से पंजाब और मुल्तान वापस लेने में सहायता दी थी। यह उसे एक खुली ललकार थी। ठीक उसी समय नजीबखां के षड्यन्त्र ने मुहम्मद अब्दाली को पूर्ण विश्वास दिला दिया कि भारत के मुसलमान और नवाब उनकी मदद करेंगे। तभी से वह हिन्दुस्तान का शाही ताज पाने का स्वप्न देखने लगा और जो सफलता नादिरशाह भी न प्राप्त कर सका था उसे प्राप्त करने को उद्यत हो गया।

मुख्य-मुख्य मरठे सरदारों को दक्खिन में संलग्न समझ कर उसने ८० हज़ार मनुष्यों की फ़ौज लेकर सन् १७५६ में सिन्धु नदी को पार कर पंजाब और दिल्ली को क़रीब २ बिना युद्ध के ले लिया और बादशाह की पदवी धारण कर ली। विजयी पठानों की परम्परानुसार वह क्रोधित भी हुआ और दिल्ली-निवासियों की कुछ घंटों तक क़तल-आम की आज्ञा देकर अपनी शाही ताजपोशी की शान को पूर्ण किया। उन थोड़े ही घंटों के भीतर १८ ००० निरपराध मनुष्यों का निरंकुशता से वध किया गया। तत्पश्चात् वह मुसलमान-धर्म के रक्षक का पद पाने तथा अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये हिन्दुओं के पवित्र तीर्थ-स्थानों और नगरों को, जिनको मरहटों ने अभी अभी वापिस लिया था, नष्ट करने के लिये रवाना हुआ। सब से पहले मथुरा उनका शिकार बना। लेकिन यह शहीदों की तरह समाप्त हुआ। ५,००० जाटों ने, जब तक उनके शरीर में प्राण रहे, मुसलमानों के इस टिड्डू-दल का बड़ी वीरता- पूर्वक सामना किया। मथुरा पर क्रोध उतारने के बाद, मरहठों को अपमानित करने के लिये वृन्दावन पर चढ़ दौड़ा, पर गोकुलनाथ की रक्षा में एकत्रित सशस्त्र ४,००० नागों ने जिस वीरता से युद्ध करके उसकी अमर विजय की आशा को निराशा में परिणत कर दिया, वह चिरस्मरणीय है। २,००० वैरागी मारे गये, परन्तु उन्होंने अपने गोकुल-