हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
१२० • • हित चौरासी मन हरण गौर इनका वर्ण हैं और तदनुरूप पाण्डु वर्ण के ये वस्त्र धारण करती हैं। (८) सुदेवीजी- बड़ी सलोनी हैं। प्रत्येक बात में पूर्ण हैं किसी बात में न्यून नहीं। युगल सरकार का नख शिख श्रृङ्गार करना ही इनकी सेवा है। ये कबरी बन्धन करना और अञ्जन रेख बनाना अच्छा जानती हैं, अतः श्रीप्रियाजी की परम कृपा पात्र हैं। ये अद्भुत रमणीय वर्ण की हैं और सूहे रङ्ग की सारी पहिनती हैं। उक्त आठ निज सखियों में से प्रधान हैं श्रीललिताजी। जो रति विहार के मर्म अवसरों पर भी युगल की सेवा की अधिकारिणि हैं किन्तु कभी कभी उन्हें भी एकान्त रस विहारावसर में लता भवन के रन्ध्रों से ही इस विहार का दर्शन सुख ले सकती हैं, समीप नहीं रह सकतीं। उस समय केवल एक सखी अव्यक्त रूप से युगल सरकार के समीप रहती है जिसका सङ्केत परिचय रुद्रयामल तन्त्र में इस प्रकार है- सुतल्पे शाययित्वाथ सम्वाह्य च पदाम्बुजम्। रहस्य समयं ज्ञात्वा वयस्या वाहिरागतः॥ एका सखी तु श्रीराधा कृपातिभर पूरिता। तदानीमपि सेवार्थं तल्पोपान्ते विराजते॥ अर्थात् “युगल सरकार को सुन्दर शय्या में शयन कराके एवं उनके चरण कमलों का सम्वाहन करके रहस्य समय जानकर सखियाँ बाहर हो गयीं किन्तु वहाँ श्रीराधा की अति कृपा प्रवाह पूरिता एक सखी उस समय भी सेवा के लिये श्रीराधा की शय्या के समीप रही।” रुद्र यामल में वर्णित यह 'एका सखी' कौन है ? इसका परिचय श्रीनाभाजी महाराज अपने भक्त माल में देते हैं- श्रीराधा चरन प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी। कुञ्ज केलि दम्पती तहाँ की करत खवासी॥ सर्वसु महाप्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी। विधि निषेध नहिं दासि अनन्य उत्कट व्रत धारी॥
हित चौरासी • • १२१ श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोई भलैं पहिचानि है। श्रीहरिवंश गुसाईं भजन की रीति सकृत कोऊ जानि है।। भाव यह कि दम्पति के कुञ्ज केलि की खवासी निरन्तर करने वाली वह 'एका सखी' श्रीहित हरिवंश चन्द्र ही हैं। इसी प्रकार चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी भी कह रहे हैं- बन्दौं प्रेम खिलाड़ी दंपति उर जो है। कौतुक रचै जु भारी दोऊनि मन मोहै।। कौतुक रचे जु भारी वारी अति रस रूप छकावै। सदा सदेह रहै वृंदावन पिय प्यारी दुलरावै।। याके खेल रसिक जन परखैं थिर चर सब मन भावै। वृन्दावन हित रूप सहेलिनु चित जु चोज उपजावै।। इस छन्द में 'दंपति उर जो है' सदा सदेह रहै वृंदावन और पिय प्यारी दुलरावै, विशेष ध्यान देने योग्य हैं। और इस प्रेम के मूल परिचय का प्रवचन श्री ध्रुवदास जी से सुनिये- प्रकट प्रेम कौ रूप धरि श्रीहरिवंश उदार। राधावल्लभ लाल कौ प्रकट कियौ रस सार।। बस इन्हीं हित हरिवंश चन्द्र-प्रकट हित (प्रेम) की प्रति मूर्त्ति हैं ये आठों सखियाँ। यथा- मानौं आठौं मूरति हित की, -श्रीहित ध्रुवदासजी (३) कृष्ण रसामृत सार- यों तो साहित्य के नव रसों में, वीभत्स, रौद्र और भयानक भी रस हैं इसी प्रकार भोजन के छः रसों में कटु अल्म और तिक्त भी, किन्तु साहित्य में श्रृङ्गार और भोजन में मधुर का जो स्थान है उसे सभी लोग बिना विवाद किये ही मान रहे हैं-उन्हें मधुर और श्रृङ्गार को अत्युच्च या सर्वश्रेष्ठ स्वीकार करने में कोई आपत्ति ही नहीं। अस्तु; इतिहास, पुराण एवं शास्त्रों के मत से सिद्ध तो है ही और संत महात्माओं ने अपने अनुभव की छाप लगाकर और भी सिद्ध कर दिया है कि
१२२ • • हित चौरासी
भगवान् श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान् शृङ्गार हैं। अनेक भाव प्रवण रसिक महानुभावों ने तो श्रीकृष्ण एवं उनके रस-शृङ्गार रस को साहित्यिक शृङ्गार रस से सर्वथा श्रेष्ठ उज्ज्वल रस कहा है, और है भी यही बात यथार्थ भी। क्योंकि जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण त्रिगुणातीत, पूर्ण आत्माराम, सच्चिदानन्द घन, स्वयं ज्ञान और अव्यक्त विभु हैं, उसी प्रकार वे श्रुति अतर्क्य, अवाच्य, अप्रकाश्य और केवल अनुभव गम्य है। इनके लिये भगवती जहाँ पर उक्त विशेषणों से पूर्ण शब्द देती हैं वहीं पर वह उन्हें "रसो वै सः," अर्थात् वह रस रूप भी है। ऐसा भी कहती है। अतएव अब यहाँ यह जानना आवश्यक हो जाता है कि वह उस "रस रूप ब्रह्म" का स्वरूप है क्या ? इस विषय का यहाँ पर संक्षेपतः निवेदन किया जाता है। ब्रह्मानुभूति की भाँति यह रसानुभूति केवल स्वानुभूति है-आत्मानुभूति है जो अवाङ्मनशगोचर और आलौकिक दिव्यानन्द है वही रस है। जहाँ प्राण, मन, आत्मा सभी किसी सात्विक एवं दिव्य प्रवाह में डूब कर परम स्निग्धता का अनुभव करने लगते हैं, वही रस की स्थिति है- वही प्रेम है। समस्त चराचर इसी रस के आस्वादन में आकुल है। फिर चाहे वह उसे अपने मन और इन्द्रियों का विषय बनाकर भोग रहा हो अथवा आत्मा का। अपने अपने स्तर में सभी उस रस रूप ब्रह्म का ही आस्वादन कर रहे हैं। किं बहुना ? चराचर जगत् ही रस रूप है, उस रस से अतिरिक्त कुछ अन्य है ही नहीं। भगवती श्रुति कहती है- "नेहनानाऽस्ति किञ्चन।" और इस चराचर व्यापी रस की प्रकट मूर्त्ति हैं श्रीराधा और श्रीकृष्ण। यही दोनों रस के दिव्य 'आलम्बन' हैं। इन्हीं से रस की स्थिति है और रस का विकास भी। श्रीवृन्दावन और सहचरि (युगल किशोर की नित्य सङ्गिनी सहेलियाँ ललिता विशाखा आदि) समाज इस उज्ज्वल रस के 'उद्दीपन' हैं। श्रीराधा और श्रीकृष्ण का पारस्परिक प्रेम ही रति है- 'स्थायी भाव' है। दोनों के बीच जिन जिन कारणों से स्थायी अनन्त रति का प्रकाश होता रहता है, वही 'विभाव' हैं। इसी प्रकार प्रेम पूर्ण कटाक्ष, भ्रू विक्षेप, हास, दर्शन, सङ्केत आदि इस रस के
हित चौरासी • • १२३ 'अनुभाव' हैं। रति की पुष्टि ही स्मृति, चिन्ता, उत्कण्ठा आदि भावों से पुष्ट होकर 'स्थायी भाव' का नाम ग्रहण करती है, यथा- विभावैरनुभावश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। आनीयमानः स्वाद्यत्वं स्थायीभावों रसः स्मृतः॥ स्थायी भाव की रति ही शृङ्गार रस है यह शृङ्गार रस दो प्रकार का है- (१) सम्भोग या संयोग शृङ्गार (२) विप्रलम्भ या वियोग शृङ्गार सम्भोग शृङ्गार की तीन स्थितिया हैं जो क्रमानुगत हैं- क: पूर्वानुराग- जहाँ नायिका के हृदय में पहले पहल किन्हीं कारणों से नायक के प्रति अनुराग की उत्पत्ति हो वह पूर्वानुराग है। यह पूर्वानुराग मुख्यतः चार कारणों को लेकर ही उदित होता है, वे ये हैं-गुण श्रवन चित्र दर्शन, स्वप्न दर्शन और प्रत्यक्ष दर्शन। यथा- पहिलें ही गुन में श्रवन मिले जाइ फिर रूप सुधा मधि कीनों नैनहू पयान हैं। हँसनि, नटनि, उजराई, सुघराई सुधा सुथराई मिश्री मिली कीन्हीं पय पान है॥ मोहि मोहि मोहनमयी री मेरौ मन भयौ, हरीचंद भेद न परत अब जान है। कान्ह भये प्रानमय, प्रान भये कान्हमय, हिय में न जानि परै कान्ह है कि प्रान है॥ खः मिलन- पूर्वानुराग के पश्चात मिलन होता है। यह मिलन ही रस का जीवन है। यह भी दो प्रकार का है, एक नित्य मिलन, दूसरा अनित्य मिलन। युगल किशोर निकुअ बिहारी का मिलन पूर्वानुराग और प्रवास से सुदूर एक रस, नित्य अनादि और अनन्त है अतः इसका रस विलास भी अनन्त है जिसका वर्णन इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में है भी और हम इसी प्रसङ्ग में आगे विशेष रूप से करेंगे। दूसरा अनित्य मिलन है जो श्रीहित ध्रुवदास जी के शब्दों में प्रेम ही नहीं है-रस ही नहीं। वे कहते हैं-
१२४ • • हित चौरासी जब बिछुरत तब होत दुख, मिलतहिं हियौ सिराइ। याही में रस द्वै भये 'प्रेम' कह्यौ क्यौं जाइ।। –प्रीति चौवनी ग. प्रवास– प्रियतम का प्रेमी से दूर हो जाना या अन्यत्र चले जाना ही प्रवास है। यह दो प्रकार का है, भूत प्रवास और भावी प्रवास। प्रवास से विरह की उत्पत्ति है। विरह के दश लक्षण हैं–अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुण गान, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मरण। कुछ विद्वान् गण ग्यारहवा लक्षण मूर्च्छा भी मानते हैं। इसी प्रसङ्ग में शृङ्गार रस के आलम्बन–नायक एवं नायिका की जाति गुण एवं अवस्थाओं का वर्णन अनावश्यक न होगा। जाति के अनुसार पद्मिनी एवं चित्रिणी श्रेष्ठ जाति की नायिकाएँ हैं और स्वभाव के अनुसार नायिका दश प्रकार की हैं; यथा–प्रोषित, पतिका, खण्डिता, कलहंतारिता, विप्रलब्धा, उत्कण्ठिता, वासकसज्जा, स्वाधीन पतिका अभिसारिका, प्रवत्स्य पतिका और आगत पतिका। श्रीजयदेव कविराज ने अपने 'गीत गोविन्द' काव्य में इन दशों लक्षणों को प्रायः श्रीप्रियाजी पर ही घटित किया है, क्योंकि वे भिन्न भिन्न स्थितियों में अलग अलग स्वभावों से अभिभूत होती हैं, तब वही उनका विशेषण होता है। अस्तु; इसके सिवाय उत्तमा, मध्यमा, अधमा, अन्य सुरत दुःखिता, मानवती, वक्रोक्ति गर्विता, प्रेम गर्विता, रूप गर्विता, गुण गर्विता आदि भेद नायिका के गुणों के अनुसार हैं। वय (उम्र) के अनुसार भी नायिका तीन प्रकार की हैं–मुग्धा, मध्या और प्रौढ़ा। भावों के अनुसार भी नायिका तीन प्रकार की है–स्वकीया, परकीया और गणिका। इनमें गणिका हेय–घृणास्पद है, अतः यहाँ उसका कोई प्रसङ्ग नहीं है। अस्तु; धर्मानुसार नायक भी अनेकों प्रकार के हैं, उनमें उत्तम नायक वही है जो धीर, ललित, प्रोषित पति, उप पति, अनुकूल, दक्षिण, वचन चतुर एवं क्रिया चतुर हो।
हित चौरासी • • १२५ श्रीवृन्दावन के दिव्य रस विहार में स्वामिनि श्रीराधिका सर्वतोगुणोधिका नायिका हैं। उनमें सर्वोत्तमा नायिका के सभी लक्षण हैं। इसी प्रकार ललित नायक श्रीकृष्ण भी सर्व गुण सम्पन्न नायक हैं। रस विलास के लिये श्रीराधिका स्वकीया भी हैं और परकीया भी तथा स्वकीया परकीया से विलक्षण अनिर्वचनीया रसवती प्रेम पुत्तली। इसी तरह श्रीलालजी भी पति उप पति सभी कुछ हैं। आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु द्वारा प्रकाशित मिलन-शृङ्गार में नित्य मिलन अखण्ड मिलन का ही अनवरत सुख है। वहाँ विरह मान आदि तो होंगे कहाँ से? उनका भ्रम भी नहीं है। फिर भी वहाँ विरह है पर रूप दर्शन की अतृप्ति रूप से, प्रेम की नवीन नवीन उत्कण्ठा के रूप में वह वहाँ बस रहा है। इसी प्रकार मान भी है पर प्रेम वैचित्य के रूप में। स्थूल मान की भाँति नहीं। यहाँ तक कि- देखत देखत कल नहिं माई। चाहत रूप में रूप समाई।। -हित ध्रुवदासजी श्रीवृन्दावन एक प्रेम मय देश है। वहाँ केवल प्रेम का ही राज्य है। युगल किशोर इस प्रेम राज्य के नरेश हैं। दुलहिनि राधा रानी हैं और दूलह हैं नवल किशोर श्याम। प्रजा हैं सखीगण, मृग, पक्षी और श्रीवृन्दावन का समस्त परिकर। युगल नरेश निरन्तर ललित यौवन के सिंहासन पर आसीन रहते हैं। उन पर रूप का छत्र भी तना ही रहता है। निकुञ्ज महल ही उनका राज्य प्रासाद है। और सखियाँ हैं सामन्त एवं सभासद गण। ये युगल नरेश सदा निर्भीक भाव से अपने अन्तरङ्ग महल में स्वच्छन्द विहार ही करते रहते हैं। इनके हृदय में मदन (प्रेम) की एक फुलवारी लगी है जो मानों इनके अङ्ग-अङ्ग में फूली हुई है। इस मदन बाग में मालिनिएँ हैं छहों ऋतुएँ जो सर्वदा सुख के फलों का उत्पादन करती रहती हैं। कभी कभी ये युगल नरेश मदन केलि की सतरञ्ज भी खेलते हैं। प्रतिक्षण रूव अवलोकन, हाव भाव एवं चितवन की ही चालें उस खेल में चली जाती हैं। दोनों के मन ही सतरञ्ज के वजीर (मन्त्री) हैं, जो रूख देख कर अपनी चाल चलते हैं। उरोज गयन्द और आँखें तुरंग हैं। पैदलों और (पयादों)
१२६ • • हित चौरासी का काम करती हैं दोनों की नरम नरम अँगुलियाँ। जब श्रीप्रियाजी के कपोल तिल अलक छवि एवं मुसकान के बीच में श्रीलाल नृपति का मन मन्त्री फँस जाता है औरश्रीप्रियाजी अपने नयन तुरंगों को अटपटी चाल पर ला देती हैं, तभी लाल नृपति को मानों शैः (किश्त) दी जाती है। यह ऐसी शैः है जो खाली जाती ही नहीं जिससे नृपति की गति रुक जाती है और वे मात खा जाते हैं किंतु श्रीप्रियाजी जब खेल की परिसमाप्ति नहीं करना चाहतीं तब पुनः मात खाये हुए नृपति अधरामृत रस रूप अवसर देकर अपनी चाल वापस कर लेती हैं और राजा की विसातों को सम्हाल देती हैं। पश्चात् आलिङ्गन चुम्बन पूर्वक पुनः खेल प्रारम्भ हो जाता है और निरन्तर चलता ही रहता है इसी हार जीत के साथ। इस प्रकार इस नित्य मिलन का रस विलास अक्षुण्ण है। इसमें मिलन के साथ विरह और अतृप्ति ओत प्रोत है किन्तु किस रूप में उसे भी देखें- फूल सौं फूलनि सेज बनाई। अति सुगन्ध सौंधे छिरकाई।। नैंकु चितै तिरछे मुसकानी। लालहिं सुधि बुधि सबै भुलानी।। बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसकानि। तबते कबहुँ छुटीनहिं, चुभी जु उर में आनि।। तिनकौं प्रेम और ही भाँति। अदभुत रीति कही नहिं जाति।। दिन संजोग में रहत हैं माई। सूक्ष्म प्रेम विरह दुखदाई।। देखत ही अनदेखी मानैं। तिनकी प्रीतहि कहा बखानैं।। प्रेम लालची लाल रँगीलौ। अवधि प्यार की रसिक रसीलौ।। कर अँगुरिनु भुज मूलनि परसै। अधर पान रस कौं जिय तरसै।।
हित चौरासी • • १२७ छुवै न सकत उरजनि कर काँपैं। चतुर कुँवरि अंचल सों ढाँपै।। सो वह छटा प्रेम की न्यारी। लालहिं विवस करति अति भारी।। तबहिं सँभारि लेति सुकुमारी। अधर कपोलनि चूँवत प्यारी।। जब देखी अँखियानि उघारी। प्याइ जिवाये अधर सुधा री।। जबहीं उर सों घुरि लपटाहीं। तब नैना विरही ह्वै जाहीं।। छुटैं जबहिं छबि देख्यौ करैं। विरह आनि अंगनि संचरैं।। भाँति अटपटी सों चित हरयौ। जात नहीं उर धीरज धरयौ।। छिन छिन दसा और की औरै। थाँभै रहतिं सखी सिरमौरै।। प्रेम अटपटी चटपटी, रही लाल उर पूरि। और जतन ताकौ न कछु प्रिया सजीवन मूरि।। विरह सँजोग दिनहिं दिन माँही। जद्यपि ग्रीवनि मेलैं बाँहीं।। इहि विधि खेलत कलप विहाने। परम रसिक कबहूँ न अघाने।। –श्रीहित ध्रुवदास जी यह हुआ इस नित्य मिलन का विलक्षण नित्य विरह। अब देखिये इस नित्य विहार मिलन में साहित्य के नवों रस किस प्रकार इस एक मिलन में समाकर एक हो गये हैं। रसिक श्रीहित ध्रुवदासजी महाराज कहते हैं– १ प्रथमहिं चतवनि लाज की, शृङ्गार रस २ दुतिय मधुर मृदु बैन। करुणा रस
१२८ • • हित चौरासी ३ तृतिय परस अंगनि सरस, उरजनि छबि सुख दैन ।। वीर रस ४ परिरंभन चुंबन चतुर, रौद्र रस ५ पंचम भाइ तरंग। हास्य रस ६ षट रस विंजन स्वाद जिमि, उठत अनंग तरंग ।। भयानक रस ७ विविध भाँति रति केलि कल, सप्त समुद्र अपार। वीभत्स रस ८ वचन रचन अष्टम, अद्भुत रस ९ नवम रस निधि रंग विहार ।। शान्त रस कुछ ऐसे ही श्रीभगवत रसिक जी ने भी नव रसों को एक ही शृङ्गार विहार में समावेशित कर दिखाया है। वे कहते हैं- पायँन परि विनती करें, सो रस मुख्य सिंगार१। मान छाँड़ि मृदु वचन कहि, करुणा२ रस निरधार।। सैना बैनी हास रस३, हथ्या बाँही वीर४। कंप भयानक५ जानिये, रौद्र६ छुड़ावै धीर।। रद छद में वीभत्स७ रस, अद्भुत८ प्रेम कौं देत। बूड़ि रहे सुख सिंधु में परम सांति रस९ हेत।। 'अनन्य निश्चयात्म' से इस प्रकार रस की मूर्त्ति श्रीलाड़िली लालजी रस में ओत प्रोत हुए अपनी समस्त क्रियाएँ रस वृद्धि पूर्वक रस सेवन के ही लिये करते रहते हैं। वे रस भरे नयनों से रस भरी चितवनों का विक्षेप करते और फिर रस के अनन्त आनन्दाम्बुधि में ही डूब जाते हैं तब उनके अन्तर्वहिः सिवाय रस-प्रेम के और कुछ रह ही नहीं जाता। श्रीहित ध्रुवदास जी कितनी सुन्दर शैली से इसका वर्णन करते हैं- प्यार ही की कुंज तामें प्यार की लै सेज रची, प्यार ही सौं प्यारो लाल प्यारी बातें करहीं।
हित चौरासी • • १२६ प्यार ही की चितवनि, मुसकनि प्यार ही की, प्यार ही सौं प्यारीजू कौं प्यारो अंक भरहीं।। प्यार सौं लटकि रहैं प्यार ही सौँ-मुख चहैं, प्यार ही सौं प्यारो प्रिया अंक भुज धरहीं। 'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखें खरी प्यारै प्यार रह्यौं छाइ प्यार रस ढरहीं।। 'आनन्द दसा विनोद' से और इस रस की पराकाष्ठा है तल्प विहार। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य्य चरण ने यत्र तत्र सर्वत्र 'हित-चौरासी' में किया है। रसज्ञ पाठकगण उन प्रसङ्गों को देखें। हम अपनी असमर्थता चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी के शब्दों में प्रकट करते हैं- कुंज महल कौतिक जु अलौकिक दृग अनुरागी जानें। रसना लोचन हीन वापुरी कैसे छवि जु बखानै।। भाव हीन भावुक के हिय कौ मरम कहा पहिचानै। वृन्दावन हित रूप देसरा मती रसिक उर आनै।।
- ३१ - अवतरण - कलिन्द नन्दिनी के सुरम्य तट वर्त्ती मञ्जुल निकुञ्ज भवन में श्रीयुगल किशोर ने आज की सम्पूर्ण रात दिव्य अनिर्वचनीय सुरत रस विहार में व्यतीत की है। अब प्रातः काल हो आया है। दोनों उठे से बैठे हैं परस्पर एक दूसरे के स्कन्धों पर अपनी सुकोमल भुज लताएँ अलस भाव से डाले हुए। श्रीअङ्गों के समस्त वस्त्राभूषण अस्त व्यस्त हैं सम्पूर्ण शृङ्गार विगलित है। दोनों तल्लीन हैं, एक दूसरे की मुख माधुरी का पान करने में। ऐसे कि जैसे दो चन्द्रमाओं पर चार चकोर। अतृप्ति का ओर छोर नहीं। इसी दशा में कभी-कभी युगल किशोर मधुर स्वरों में गान करने लगते हैं और कभी भवनान्तर से निकल कर बाहर श्रीवन की ओर डगमगाते हुए चल पड़ते हैं। इस प्रातः कालीन छवि छटा को देख कर सखियों को परम आनन्द प्राप्त है। तथा स्वयं श्रीहित युगल के सुख से कितना सुख मिलता है
१३० • • हित चौरासी इसका वर्णन वे स्वयं करती हैं। इस पद में प्रेम का अन्तिम सिद्धान्त 'तत्सुख सुखित्वम्' अर्थात् 'प्रियतम के ही सुख में सुखी होना' का सजीव और जागृत चित्रण है- देव गंधार मूल-आजु अति राजत दंपति भोर। सुरत रंग के रस में भीनें नागरि नवल किसोर॥ अंसनि पर भुज दियें विलोकत इंदु वदन विवि ओर। करत पान रस मत्त परसपर लोचन तृषित चकोर॥ छूटी लटनि लाल मन करष्यौ ये याके चित चोर। परिरंभन चुंबन मिलि गावत सुर मंदर कल घोर॥ पग डगमगत चलत बन विहरत रुचिर कुंज घन खोर। (जै श्री) हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर॥३१॥ भावार्थ- आज प्रातः काल युगल किशोर दम्पति अत्यधिक शोभा पा रहे हैं। नागरी श्रीप्रिया और नवल किशोर श्रीलाल जी दोनों ही सुरतानन्द के रस में सराबोर हैं। दोनों परस्पर (एक दूसरे के) स्कन्धों पर अपनी अपनी भुजा दिये (अर्पित किये) एक दूसरे की मुख माधुरी का ऐसे पान कर रहे हैं जैसे प्यासे लोचन चकोर। श्रीप्रियाजी की विखरी हुई केश लटों ने श्रीलालजी का मन अपनी ओर आकर्षित कर रखा है, तो वे भी उनके चित चोर बन गये हैं। आलिङ्गन एवं चुम्बन पूर्वक कभी तो मन्द मन्द स्वर में कभी उच्च स्वर में दोनों मिले मधुर गान करने लग जाते हैं। पश्चात् डगमगाते हुए चरणों से कभी श्रीवन की कुओं, उपवनों और सघन गलियों में विचरण करने लगते हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं कि इस प्रकार श्रीलाल ललना (युगल किशोर) मिलकर मेरे हृदय को शीतल कर रहे हैं-शान्ति और सुख प्रदान कर रहे हैं। टिप्पणी- 'हियौ सिरावत मोर' युगल किशोर के सुख विहार से श्रीहित सखी किंवा अन्यान्य सखियों को सुख मिलता है, यही इस विहार की अपनी विशेषता है कि यहाँ भोजन एक
हित चौरासी • • १३१ करता और दूसरे को तृप्ति मिलती-पुष्टि मिलती है। इसका कारण यह है कि समस्त परिकर ने अपना सुख उनके (युगल किशोर) के सुख में मिला दिया है। वे तत्सुख सुखित्वम् के सूत्र में ओत प्रोत हैं। यह तत्सुख के चिन्तन और धारण की भावना ही प्रेमी और प्रेम की सर्वोच्च स्थिति है। यहाँ तक कहा जा सकता है कि जब तक प्रेमी साधक में स्वसुख वासना की गन्ध भी है तब तक वह प्रेमी नहीं, वह प्रेम के धोखे मोह को बटोर रहा है। शृङ्गार रस के क्षेत्र में जहाँ नायक एवं नायिका अपना अपना सुख चाहते और एक दूसरे को सूख देने के नाम से सुख लूटते हैं वहीं पर युगल किशोर किंवा सहचरि गण अपनी समस्त भावना एवं क्रिया से एक दूसरे के सुखी करने में तल्लीन पाये जाते हैं। देखिये श्रीहिताचार्य्य पाद इसका सङ्केत किस प्रकार कर रहे हैं। श्रीलालजी सुरत विहार के मध्य काल में श्रम जल पूर्ण स्वामिनि को थकित श्रमित जान कर अपना सुख विस्मरण करके उनके सुख के लिये कह रहे हैं- 'विरमि विरमि' नाथ वदत वर विहार री। इससे बढ़कर तत्सुखित्व परायणता का कोई दूसरा उदाहरण कभी और कहीं भी न मिल सकेगा। इसी प्रकार सखियाँ भी कितनी तत्सुख परायणा हैं, कितनी निर्मत्सर हैं ? देखिये- जैश्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक, लता भवन रंधनि अवलोकत। अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।। युगल की केलि का दर्शन करके ईर्ष्या और स्वसुख विलास की वासना का लेश भी नहीं है वरं अनुपम सुख का प्रवाह बढ़ रहा है जिसमें बहते हुए प्राण और आनन्द वारि को विवश किया जा रहा है रोका जा रहा है। व्रज लीला एवं व्रज रस में चन्द्रावली, ललिता एवं विशाखा आदि सखियों के अनेकों प्रसङ्ग हैं जिनमें श्रीराधा के प्रति कटाक्ष, द्वेष और मत्सरता के भाव
१३२ • • हित चौरासी पाये जाते हैं। बहुनायक श्रीकृष्ण को बहुत कुछ कहा समझा जाता है चूँकि ये सभी भाव जगत् से परे और उस प्रेम राज्य के ही हैं, फिर भी अत्युज्ज्वल नित्य विहार और सर्वोपरि तत्सुखित्व से तो निम्न स्तर में ही हैं। तभी तो श्रीव्यास जी ने कह दिया- नवधा लौं सब भक्ति उबीटी, रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभी की।। इस नित्य विहार परायण अनन्य सभा की 'रहनि कहनि' की यही पृथकता है कि वह पूर्ण तत्सुख परायण है।
- ३२ - अवतरण- प्रेम धाम श्रीवृन्दावन की अभिराम कुञ्ज के अन्तर्भाग में एक सुन्दर पुष्प पर्य्यङ्क बिछी हुई है। उस पर रसिक युगल किशोर पौढ़े हुए हैं और हास परिहास, वक्र अवलोकन, कच कुच स्पर्श, एवं आलिङ्गन आदि क्रीड़ाओं का सुख आस्वादन कर रहे हैं। समस्त वृन्दावन पुष्पों से सज सा रहा है। आकाश में चन्द्र देव क्रमशः ऊपर की ओर उठते हुए अपनी अमृतमयी शारदीय किरण मालाओं के हार-मृदु मृदु हार श्रीवन को अर्पित करते जाते हैं। शीतल पवन अपनी मन्द गति से सुगन्ध का प्रसार सा कर रहा है। ऐसे सुखमय अवसर राका रजनी में युगल किशोर अपने विशद विहार अनिर्वचनीय रस क्रीड़ा में संलग्न हैं, जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी अपनी निकट वर्ती सहेली-ललितादिकों से कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।। सुभग बनी निसि सरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम।। खंडत अधर करत परिरंभन, ऐंचत जघन दुकूल।
हित चौरासी • • १३३ उर नख पात तिरीछी चितवन, दंपति रस सम तूल॥ वे भुज पीन पयोधर परसत, वाम दृशा पिय हार। वसननि पीक अलक आकर्षत, समर श्रमित सत मार॥ पलु पलु प्रवल चौंप रस लंपट, अति सुंदर सुकुमार। (जै श्री) हित हरिवंश आजु तृन टूटत हौं बलि विसद विहार॥३२॥ भावार्थ—आज वन (श्रीवृन्दावन) में श्यामा श्याम क्रीड़ा कर रहे हैं। शरद की बड़ी सुन्दर चाँदनी पूर्ण रात्रि है और वैसी ही रुचिर अभिराम कुञ्ज है। (उस कुञ्ज भवन के खिलाड़ी श्रीराधा मोहन) युगल (दम्पति) रस विलास में समतुल्य हैं (कोई किसी से किसी बात में कम नहीं है।) परस्पर एक दूसरे के अधरों का चुम्बन, खण्डन, करते श्रीवपु का परिरम्भण (आलिङ्गन) करते और जघन भाग से (प्रियतम प्रियतमा का) दुकूल खींचते हैं, पश्चात् फिर भी उर (उरोजों) पर नखाघात करते एवं कटाक्ष पूर्ण नयनों से विलास पूर्वक अवलोकन करते हैं। जब कभी प्रियतम (अपनी प्रिया के) बाहु मूल और पुष्ट पयोधरों का स्पर्श करने लगते हैं तब श्रीप्रिया जी अपनी निगाहों से तिरछा अवलोकन करती हुई उनके हार का—उर स्थित हारावली के बहाने हृदय देश का स्पर्श करने लगती हैं। फिर कभी वस्त्रों में (ताम्बूल) पीक लगा देते, कभी ललित अलकों का ही आकर्षण करने लगते हैं और फिर शत शत स्मर व्यथा से उत्तप्त होकर रति विहार युद्ध से थकित हो रहते हैं किन्तु फिर भी अत्यन्त सुन्दर सुकुमार युगल रस लम्पट किशोर के मनों में रस विलास की चौंप प्रति पल प्रवल ही होती रहती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि आज विहार अत्यन्त विशद है जिस पर तृण टूटते हैं अर्थात् जिस पर समस्त परिकर न्यौछावर है मैं भी उर वलिहार हूँ।
१३२ • • हित चौरासी पाये जाते हैं। बहुनायक श्रीकृष्ण को बहुत कुछ कहा समझा जाता है चूँकि ये सभी भाव जगत् से परे और उस प्रेम राज्य के ही हैं, फिर भी अत्युज्ज्वल नित्य विहार और सर्वोपरि तत्सुखित्व से तो निम्न स्तर में ही हैं। तभी तो श्रीव्यास जी ने कह दिया- नवधा लौं सब भक्ति उबीटी, रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभी की।। इस नित्य विहार परायण अनन्य सभा की 'रहनि कहनि' की यही पृथकता है कि वह पूर्ण तत्सुख परायण है।
- ३२ - अवतरण- प्रेम धाम श्रीवृन्दावन की अभिराम कुञ्ज के अन्तर्भाग में एक सुन्दर पुष्प पर्य्यङ्क बिछी हुई है। उस पर रसिक युगल किशोर पौढ़े हुए हैं और हास परिहास, वक्र अवलोकन, कच कुच स्पर्श, एवं आलिङ्गन आदि क्रीड़ाओं का सुख आस्वादन कर रहे हैं। समस्त वृन्दावन पुष्पों से सज सा रहा है। आकाश में चन्द्र देव क्रमशः ऊपर की ओर उठते हुए अपनी अमृतमयी शारदीय किरण मालाओं के हार-मृदु मृदु हार श्रीवन को अर्पित करते जाते हैं। शीतल पवन अपनी मन्द गति से सुगन्ध का प्रसार सा कर रहा है। ऐसे सुखमय अवसर राका रजनी में युगल किशोर अपने विशद विहार अनिर्वचनीय रस क्रीड़ा में संलग्न हैं, जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी अपनी निकट वर्त्ती सहेली-ललितादिकों से कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।। सुभग बनी निसि सरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम।। खंडत अधर करत परिरंभन, ऐंचत जघन दुकूल।
१३४ • • हित चौरासी टिप्पणी-इस पद की वर्णना अन्य पदों से कुछ विलक्षण है। इस वर्णन में आदि से अन्त तक नायक एवं नायिका सर्वथा अनुकूल हैं और उस अनुकूलता में भी विलास की रमणीयता, सरसता एवं प्रियता की पराकाष्ठा हैं। जो लोग "नेति नेति वचनामृत" और "गौर श्याम भुज कलह मनोहर" में ही रस विशेष की सिद्धि मानते हैं वे- वे भुज पीन पयोधर परसत वाम दृशा पिय हार।' की झाँकी का अनुभव करें अपने भाव पूर्ण हृदय में। कितनी रस मयी है इसकी कल्पना ?
- ३३ - अवतरण- आज प्रातः काल श्रीनन्द नन्दन एवं वृषभानु नन्दिनी उनींदे ही उठ पड़े हैं और निकुञ्ज के अन्तर्भाग में डगमगाते चरणों से प्रेम विक्षिप्त की सी दशा में किंवा सुरतालस पूर्ण खुमारी में डूबे वहीं भ्रमण कर रहे हैं। युगल की इस दशा का दर्शन-अवलोकन करके श्रीहित सजनी अपनी सखियों से उसका वर्णन कर रही हैं- देव गंधार मूल- आजु बन राजत जुगल किसोर। नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनींदे भोर॥ डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर। दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर॥ दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर। (जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर॥३३॥ भावार्थ- आज श्रीवृन्दावन में युगल किशोर यों शोभा पा रहे हैं कि नन्द नन्दन एवं श्रीवृषभानु नन्दिनी प्रातः काल ही उनींदे उठ पड़े हैं-रात्रि में पूरी तरह सो भी नहीं पाये (क्योंकि रति विहार के आनन्द ने मानों उन्हें सोने को कोई समय ही न दिया !) अतः चलते समय उनके चरण डगमगाते हैं और (गमन) गति भी शिथिल है। चलते हुए दोनों एक दूसरे को वसनाञ्चलों का-पट
हित चौरासी • • १३५ छोरों का अपने अपने नख चन्द्र से स्पर्श करते (-एवं आकर्षण करते हैं।) अधर क्षत विक्षत हैं, गण्ड मण्डल कज्जल से मण्डित है। ललाट पटल पर तिलक कुछ थोड़ा सा ही अवशेष रह गया है। अरुण नयन, जो चोर अलि-भ्रमर ही हैं केश राशि एवं उँगलियों के द्वारा छिपाये जाने पर भी नहीं छिपते -गोप्य रस पूर्ण रति विहार का प्रकाश किये ही दे रहे हैं। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि सुरत समुद्र की झकझोर के कारण (आज दोनों को अपने अपने) तन एवं मन की भी सँभाल नहीं रह गयी है, (ऐसे रस मग्न हो रहे हैं!)
- ३४ - अवतरण - श्रीवृन्दावन में विचरण करते हुए युगल किशोर कभी एक कुञ्ज से निकल कर दूसरी में प्रवेश करते हैं कभी एक गली से होकर दूसरी में जाते हैं। कभी-कभी अत्यन्त सङ्कीर्ण लता विटपाच्छादित कुञ्जों से होकर निकलते समय पट वस्त्रों के उलझने की पूर्ण आशङ्का होने पर भी वे नहीं उलझ पाते कुछ कुशल कला से निष्क्रमण कर जाते हैं। गलवहिया देकर चलते हैं तो सही पर दो हैं ऐसा भी प्रतीत नहीं हो पाता। वन विहार के उपरान्त रात्रि को सुख मय सुरत विहार की क्रीड़ा का आनन्द वितरण करते हैं और इससे समस्त सहचरि समाज को किसी अनिर्वचनीय सुख में मानो डुबा देते हैं किंवा केलि वारिधि की अमृत लहरियों से भिंगा देते हैं। इसी वन विहार एवं रसमय सुरत विहार सुख का साङ्केतिक वर्णन श्रीहिताचार्य चरण अपने स्वस्वरूप (सखी भाव) के अनुसन्धान पूर्वक इस प्रकार करते हैं- देव गंधार मूल- वन की कुंजनि कुंजनि डोलनि। निकसत निपट साँकरी बीथिनु, परसत नाँहि निचोलनि।।
१३६ • • हित चौरासी प्रात काल रजनी सब जागे, सूचत सुख दृग लोलनि। आलसवंत अरुन अति व्याकुल, कछु उपजत गति गोलनि॥ नर्त्तनि भृकुटि वदन अंबुज मृदु, सरस हास मधु बोलनि। अति आसक्त लाल अलि लंपट, बस कीने बिनु मोलनि॥ विलुलित सिथिल स्याम छूटी लट, राजत रुचिर कपोलनि। रति विपरित चुंबन आलिंगन, चिबुक चारु टक टोलनि॥ कबहुँ श्रमित किसलय सिज्या पर, मुख अंचल झकझोलनि। दिन हरिवंश दासि हिय सींचत, वारिधि केलि कलोलनि॥३४॥ भावार्थ – अहह ! कितना विलक्षण है युगल किशोर का वन की कुओं कुओं का विहरण ? यद्यपि अत्यन्त सङ्कीर्ण (लता सघन) गलियों से होकर निकलते हैं फिर दोनों के निचोल वस्त्रों का लताओं से स्पर्श तक नहीं हो पाता (ऐसे एकमेक हो जाते हैं परस्पर में सँट कर चलते हुए !) आज दोनों सारी रात जागते ही रहे हैं जिसकी सूचना अब प्रातः काल इनके लोल लोल लोचनों से प्राप्त हो रही है जो दृग आलस्य मय, अरुण और अति व्याकुल हैं और नेत्र गोलक भी किञ्चित किञ्चत् गति उत्पन्न करते हैं, नेत्रों की पलकें शिथिल हैं- भार से झँपी हुई हैं। भृकुटियों में नर्त्तन है और वदन कमल में सरस हास के साथ हैं मधुर मधुर वचन। अतः सिद्ध है कि अत्यन्त आसक्त एवं लम्पट भ्रमर श्रीलालजी को श्रीप्रियाजी ने विना मोल के ही वश में कर रखा है- अपना वशवर्त्ती कर रखा है। रुचिर कपोलों पर बिखरी हुई काली शिथिल केश माला शोभा पा रही है।
हित चौरासी • • १३७ कभी विपरीत रति का विलास है, तो कभी चुम्बन, तो कभी आलिङ्गन ही और कभी चारु चिबुक का प्रेम पूर्ण उचकाव ही कभी कभी युगल किशोर रति विहार से श्रमित होकर किशलय शय्या पर पौढ़ ही जाते हैं और परस्पर में एक दूसरे के वदन पर अपने अपने वसनाञ्चलों से झकझोलन करने लगते वयार डुलाने लगते हैं। इस प्रकार दिन प्रति-निरन्तर 'हरिवंश दासी' के हृदय को अपने केलि वारिधि की लहरियों से सींचते ही रहते हैं। – ३५ – अवतरण – नव नव प्रभा मण्डित श्रीवृन्दावन धाम है। प्रातः काल का पुनीत समय है। साँवन की सुहावनी ऋतु है। सर्वत्र श्रीवन में हिण्डोल पड़े हैं। रस सने युगल किशोर मन चाहे हिण्डोलों में चढ़कर झूलते हैं। कभी वन हिण्डोल से झूलते हैं, तो कभी रति हिण्डोल रंग। श्रम से जनित चिह्न श्रीमुख पर प्रकट हो आते हैं जो रात्रि के विहार हिण्डोल की मानो सूचना सी देते हैं। अस्तु; श्रीहित सखीजी अपनी अन्तरङ्ग सखियाँ ललिता विशाखा आदि के साथ इस हिण्डोल विहार का सुख दर्शन करतीं और आनन्द में भर कर रस विहार की प्रशंसा करती हुई कहती हैं– देव गंधार मूल–झूलत दोऊ नवल किसोर। रजनी जनित रंग सुख सुचत अंग अंग उठि भोर।। अति अनुराग भरे मिलि गावत सुर मंदर कल घोर। बीच बीच प्रीतम चित चोरति प्रिया नैन की कोर।। अबला अति सुकुमारि डरत मन वर हिंडोर झँकोर। पुलकि पुलकि प्रीतम उर लागति दै नव उरज अँकोर।। अरुझी विमल माल कंकन सौं कुंडल सौं कच डोर। वेपथ जुत क्यों बनै विवेचत आनँद बढ्यौ न थोर।। निरखि निरखि फूलतिं ललितादिक विवि मुख चंद चकोर। दै असीस हरिवंश प्रसंसत करि अंचल की छोर।।३५।।
१३८ • • हित चौरासी भावार्थ—(आज) दोनों नवल किशोर (हिण्डोल) झूल रहे हैं। उठने पर प्रातः काल अङ्ग-अङ्ग से रात्रि जनित आनन्द सुख की व्यञ्जना-सूचना सी हो रही है। दोनों अत्यन्त अनुराग से भरे हुए कभी मंद मधुर तो कभी तार(उच्च) मधुर स्वर में गान करते हैं। बीच बीच में श्रीप्रियाजी अपने नयन कोरों से प्रियतम के चित्त की चोरी भी करती जाती हैं। श्रेष्ठ हिण्डोल की लम्बी झंकोरों (झूलों) से अत्यन्त सुकुमारी अबला श्रीराधा का मन डर जाता है तब वे बार-बार रोमाञ्चित हो होकर और मानो अपने नव उरोजों की भेंट (अँकोर) सी देकर प्रियतम के हृदय से डर के मारे चिपट-लिपट जाती हैं। तरल हिण्डोल की झूलों में प्रियतम के उर की विमल माल प्रिया के कङ्कण से और प्रिया की कच डोर प्रियतम के कुण्डलों से उलझ गये। उलझ तो गये पर अब तरल हिण्डोल में यह उलझन सुलझायी कैसे जा सकती है ? इस उलझन में थोड़ा नहीं अपितु अत्यधिक आनन्द बढ़ा। हिण्डोल पर शोभित नवल युगल किशोर के पारस्परिक युगल चन्द्रमुख और युगल क्यों चतुः चारु चकोरों को देख-देखकर ललिता आदि सखियाँ प्रसन्न हो रही हैं और 'हरिवंश' भी (वलिहार भाव से) सम्मुख अञ्चल तटी करके युगल को आशीष देते और प्रशंसा कर रहे हैं। – ३६ – अवतरण – यमुना के परम पावन पुलिन पर आज रसिक शेखर श्रीलालजी ने रास रस की सरस आयोजना की है। उस रास में किशोरी श्रीराधा के सहित समस्त सहचरियाँ नृत्य गान एवं वाद्य में समान रूप से भाग ले रही हैं। यदि नृत्य परायण हैं, तो कोई उच्च स्वर से गान होकर रही हैं और कोई वाद्य वादन प्रवीण सखियाँ बाजे ही बजा रही हैं। समस्त युवति मण्डल के बीच विराजमान (मध्यवर्ती) श्रीलालजी अपने सुललित कण्ठ से सारङ्ग राग आलाप रहे हैं और श्रीवृषभानु किशोरी उसी राग के अनुसार सुधङ्ग नामक नृत्य गति का प्रदर्शन कर रही हैं। इस अलौकिक आनन्द को देख कर सुर नायक-इन्द्रराज फूल उठते हैं और पुष्प वृष्टि करने लगते है।