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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

कुछ अनुभव

  1. १-भोजन पाने के पश्चात् लघुशंका को जाना चाहिए।
  2. २-लघुशंका के पश्चात् तत्काल ही जल पीने से, दूध के पश्चात् जल पीने से तथा रात्रि को जल्दी-जल्दी जल पीने से नजला जुकाम तथा सिर दर्द हो जाता है।
  3. ३-दूध खड़े होकर और जल बैठकर पीना चाहिए।
  4. ४-पैर गरम, पेट नरम, सिर ठण्डा तिस पर वैद्य आये तो दे डण्डा।
  5. ५-रात्रि को सोते समय पैरों के तलबों को सरसों या तिल का तेल मलने से नजला, जुकाम, सिर का चकराना और खुश्की दूर होती है।
  6. ६-भोजन पाने के पश्चात् स्नान करने से मन्दगति उत्पन्न होती है।
  7. ७-गरम तथा ठण्डा जल मिलाकर प्रयोग न करें।
  8. ८-एक बार अग्नि पर पकी हुई वस्तु को दोबारा अग्नि पर गर्म नहीं करना चाहिए। दोबारा गर्म करने से विष सद्दृश हो जाता है।
  9. ९-रात्रि में सोकर उठने पर यदि जल पीने की इच्छा हो तो दीत मीचकर हल्के-हल्के जल पीना चाहिए।
  10. १०-हर वर्ष होली के दिनों में आम का मौल पीस कर सारे शरीर को मल कर ३, ४ मिनट बाद स्नान करें, तो भयंकर लू भी नहीं सताती और लगभग ५ - ६ मास तक किसी विषैले जन्तु के काटे का असर भी नहीं होता।
  11. ११-प्रत्येक विवाहित को उचित है कि प्रत्येक वर्ष शरद ऋतु में कम से कम ४० दिन तक किसी न किसी बाजीकरण (पौष्टिक) पदार्थ का अवश्य सेवन किया करें। ऐसा करने से वृद्धवस्था में शारीरिक कष्ट अधिक नहीं सताते और शरीर

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वीरेन्द्र गुप्त

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भी स्वस्थ रहता है।

१२-वृद्धावस्था में भोजन की मात्रा भूलकर भी कम नहीं करनी चाहिए और ना ही भूखे रहना उचित है। क्योंकि वृद्धावस्था में आई हुई निर्बलता पुनः वापिस नहीं आती। युवाकाल में तो शरीर के सभी यन्त्र दृढ़ होते हैं और भोजन की कमी को कभी भी पूरा कर लेते हैं। परन्तु वृद्धावस्था में तो शरीर यन्त्र भी निर्बल हो जाते हैं इस कारण वह आई हुई निर्बलता को पूर्ण नहीं कर पाते।

१३-१ तोला अर्क गुलाब १ तोला अर्क वेद-मृशक। दोनों को एक चौंटी के पात्र में रखकर उसमें ४० नग हरी किशमिश रात्रि को डालकर खुली हवा में कपड़े से ढक कर रख दें। प्रातः मुख प्रक्षालन करके सुई की नोक से एक-एक किशमिश उठा-उठाकर खा लें और ऊपर से सारा अर्क पी लें ऐसा करने से हृदय के अनेक रोग दूर होकर दृढ़ता मिलती है।

१४-पीपल के पत्तों का अर्क भपारे से निकाला हुआ १ तोला प्रातः १ तोला सायं लेने से हृदय की दुर्बलता को नष्ट करता है।

१५-अर्जुन की छाल का चूर्ण ३ माशा दूध से लेने पर हृदय को बल मिलता है।

१६-बादाम की मींग छिली हुई ५ नग पीस कर १ तोला मक्खन में मिलाकर खाने से मस्तिष्क को बल मिलता है।

१७-ब्रह्मी, स्वरस १ तोला में मधु-मिलाकर पीने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

१८-ब्रह्मी, मुण्डी और शंख पुष्पी का समान भाग चूर्ण ४ माशा दूध से लेने पर मेधा शक्ति बढ़ती है।

१९-एक पाव ब्रह्मी तेल या धुली तिली का तेल एक छंटाक कास्ट्रायल मिलाकर स्नान करने से एक घण्टा पूर्व या रात्रि

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को सोते समय सिर पर मलने से सिर के बाल गिरने से रुक जाते हैं और मजबूत हो जाते हैं।

२०-सौफ एक तोला, गुलाब पुष्प ॥ तोला, मिश्री २ तोला का चूर्ण ३ माशा नित्य सेवन करने से नेत्र ज्योति बढ़ाता है।

२१-त्रिफले के जल से नेत्र धोने पर ज्योति बढ़ती है।

२२-शुद्ध बादाम का तेल सप्ताह में दो बार कान में डालना चाहिए।

२३-तोमड़ के बीज ४ तोला, हल्दी पिसी १ तोला, काली मिर्च २ तोला, फिटकरी की खील १ तोला, नमक १ तोला सबको कूटकर मंजन बना लें दांतों के लिए उत्तम है।

२४-काली मिर्च १ तोला, मिश्री २ तोला कूटकर चूर्ण कर लें इसे मुख में डालने से बैठा कंठ ठीक हो जाता है।

२५-बारी रत्न चूर्ण- सौंठ १ तोला, शतावर १ तोला, असगंध नगीरी १ तोला, अजवायन देसी १ तोला, मिश्री ४ तोला, सबको बारीक कूटकर रख लें मात्रा, ४ माशा नो दूध से दोनों समय। लाभ स्त्रियों के रजः और गर्भाशय सम्बन्धी समस्त रोगों को दूर करता है। प्रभव के पश्चात् २ मास तक सेवन करने से शरीर पुष्ट और निरोगी होता है और दूध अधिक उत्तरता है।

२६-शीशम के हरे पत्ते २ तोले, मिट्टी के पात्र में एक छटांक मल करके उसमें रात्रि को भिगो दें। प्रातः पत्तों को मसल कर उसका जल छान कर एक तोला निकाल लें उसमें थोड़ा मीठा मिलाकर देने से स्त्रियों का प्रदर रोग ठीक होता है।

२७-सुपारी पाक- दक्षिणी सुपारी चिकनी १० तोला को बारीक कूटकर २ सेर गाय के दूध में डालकर मन्द-मन्द आग पर ही पकायें जब सारा दूध सूख जाय तो उसमें छोटी माई, बड़ी माई, कमरकस ५-५ तोला, मिश्री १० तोला इनको बारीक कूटकर उपरोक्त पाक में मिला दें। मात्रा ६ माशा प्रातः, ६ माशा

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सायं ऊष्ण दूध से स्त्री को देने से प्रदर कमर दर्द, गर्भ स्थित न होना आदि रोगों को दूर कर स्त्री स्वस्थ और सुन्दर बनती है। २८-२ तोला सफेद सुर्मे की डली लेकर अनि में गर्भ करके आधा पाव अर्क गुलाब में बुझाओ तथा बार बार सुर्मे को गर्भ करके बुझाते रहो यही तक बुझाओ कि सारा अर्क समाप्त हो जाय फिर उस सुर्मे को खरल में घोटकर रख लो। एक माशा प्रातः, एक माशा सायं मक्खन या मलाई में देने से प्रदर रोग ठीक होता है।

२९-श्याम तुलसी का १ पत्ता साबुत निगल लें और नित्य एक पत्ता बढ़ाते जायें। ४०वें दिन ४० पत्ते निगल कर अगले दिन से एक पत्ता घटाते जायें। यह श्याम तुलसी का ८० दिन का कल्प है। इससे शरीर रोग रहित होकर पुष्ट होता है, बल, वीर्य बढ़ता है। ध्यान रहे तुलसी पत्र को दौतों से नहीं चबाना चाहिए, क्योंकि इसमें पारद होता है और पारद दौतों को हिला देता है। इसलिये सम्भव है तुलसी पत्र दौत से चबाने पर दौत हिल जायें।

३०-जलजमनी के सूखे पत्ते १ पाव, हर छोटी घी की भुनी १छटीक, मिश्री ५ छटीक सबका चूर्ण कर लें। ८ माशा प्रातः, ८ माशा सायं दूध से लेने पर स्वप्न दोष, निर्बलता, शीघ्र पतन आदि को दूर करता है।

३१-बानरी गुटक- १ पाव काँच के बीजों को काटकर छिलका अलग करके कूटें। १ सेर गाय के दूध में डालकर पकायें जब पकते-पकते हलुआ जैसा हो जाय तो उतार कर बड़े बेर की बराबर गोली बना लें इन गोलियों को गाय के घी में तल कर आधा सेर चीनी की चासनी में डालते जायें। जब चीनी चढ़ जाये तो गोलियाँ निकाल कर किसी चीनी या शीशे के पात्र में रख लें और उसमें ऊपर तक असली मधु भर दें। प्रातः सायं बल के अनुसार सेवन करें। इसके सेवन से वीर्य के समस्त दोष दूर होकर प्राकृतिक सन्तन्मन होता है।

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३२-अश्वघ (पीपल) के पके फलों को छाया में सुखाकर चूर्ण कर लें। समान भाग मिश्री मिलकर ३ माशा प्रातः, सायं, दूध से लें तो वीर्य पुष्ट हो तथा हृदय की निर्बलता को भी दूर करता है।

३३-सालब मिश्री पंजे वाली १ तोला, सफेद मूसली १ तोला, दोनों को बारीक कूट लें। इसमें १ तोला तुखेरिहॉ सफ करके साबुत ही मिला दें। इसमें से ६ माशा लेकर एक पाव दूध में घोल कर अग्नि पर पकायें। दो उबाल आने पर नीचे उतार लें और मीठा डालकर सेवन करें। इससे वीर्य गाढ़ा होकर सन्तान को जन्म देने की शक्ति वाला हो जाता है। शरद ऋतु में ७ नग बादाम की गिरी और पीसकर मिला लें। ३४-१ पाव चुने को ४ सेर जल में मिलाकर मिट्टी के पात्र में रखें। २४ घण्टे में ४, ५ बार लकड़ी से चला दें। बाद में नितार कर साफ जल निकाल लें।

उपरोक्त चूने का साफ जल २सेर, बायबिडुंग १ छटीक, भारगी १ छटीक, सौफ २ तोला, कासनी २ तोला, दूधिया बघ २ तोला, जायफल २ तोला, अतीस २ तोला। सबको २४ घण्टे भिगोकर पकाएँ चौथाई जल रहने पर छान लें और ३ छटीक चीनी डालकर शर्बत बनालें। यह बच्चों को जल में या दूध में घोलकर देने से बच्चों के हरे पीले दस्त, दूध डालना आदि सभी रोगों को नष्ट करके बच्चों को हृष्ट-पुष्ट करता है।

३५-सुहागा चौकिया की खील १ तोला, नौसादर देसी ॥ तोला, काली मिर्च ॥ तोला, सब का चूर्ण बना लें। यह चूर्ण बच्चों के जिगर, तिल्ली, अपच, अफारा आदि रोगों में लाभदायक है। बड़े व्यक्तियों को भी लाभप्रद है।

३६-चूने का जल ४ माशा बच्चों को देने से, बच्चों की हड्डी आदि दृढ़ होती है। एक छटीक चूने को १॥ सेर जल में

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भिगो दें। ३, ४ बार चला दें जल टिक जाने पर नितार लें। फिर ४-५ बार कपड़े में छान कर साफ कर लें। यही चुने का जल है।

३७-सोये का अर्क भपारे से निकाला हुआ ॥ तोला दोनों समय बच्चों को देने से बच्चों के सामान्य समस्त रोगों को नष्ट करके स्वस्थ करता है।

३८-पुष्प नक्षत्र में शंख पुष्पी को उखाड़ कर छाया में सुखा लें। यह शंख पुष्पी १ तोला, सत गिलोय ३ माशा, दोनों को मिलाकर कूट छान कर चूर्ण कर लें। यह चूर्ण २ से ४ रंती तक बच्चों को ४ वर्ष की आयु से देना चाहिए।

लाभः- इसके सेवन से बच्चों की बुद्धि स्थिर होकर पढ़ने में रुचि होती है और कण्ठस्थ करने की शक्ति बढ़ती है।

३९-१ रंती स्वर्ण भस्म, ३माशा बंसलोचन अलसी में मिलाकर खरल कर लें। इसकी २० पुड़िया बना लें, एक पुड़िया नित्य मधु, मक्खन या मलाई से २० दिन बराबर दें। बचपन में प्रति वर्ष शरद ऋतु में बच्चों को सेवन करा दिया जावे तो उसकी रोग निरोधक शक्ति बढ़ती है और कोई मर्याकर रोग सहसा आक्रमण नहीं करता। बल बुद्धि को बढ़ाता है।

४०-१ तोला काली मिर्च, २ तोला जीरा भुना हुआ, ३ तोला नौसादर देशी, ३ तोला सेंधा नमक, १॥ माशा हाँग भुनी हुई, ३ माशा टाटरी। सबको कूट कर चूर्ण कर लें। यह स्वादिष्ट और हाजिम है।

४१-हर छोटी, बड़ी इलायची के दाने, तुम्बोरिहों, सौफ, धनियाँ, समान भाग लेकर हल्का-हल्का अग्नि पर भून लें। दरदरा कूट कर सबको बराबर बूरा मिला लें। दिन में चार बार ८-८ माशा जल से दें। इससे आँख, खून के दस्त ठीक होकर पेट ठीक हो जाता है।

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४२-जामुन की गुठली १ तोला, सौठ १ तोला, गुडमार बूँटी २ तोला, सबका बारीक घूर्ण करके कुहमार पाठा के गूदे में घोटकर बेर की बराबर गोली बनाकर छाया में सुखा लो। १ गोली प्रातः १ सायं गौ दूध में शहद मिला कर लेने से मधुमेह (शकर) रोग के लिये उत्तम है।

४३-प्रायः बच्चों को सुखा रोग हो जाता है। यह रोग एक बच्चे से दूसरे बच्चे को भी लग जाता है। इसके लिये निम्नलिखित तेल का मरदन करना उत्तम है।

शुद्ध सरसों का तेल आधा सेर, आँगा जिसे कुत्ता या अपामार्ग कहते हैं लम्बी शाख वाली जिस पर चावल से लगे होते हैं। उसकी जड़ २ तोला, सिन्दूर असली ४ रत्ती। इन सबको लोहे की कढ़ाई में डालकर रविवार या मंगलवार के दिन तेज धूप में मन्द-मन्द अग्नि पर पकायें। ध्यान रहे पकते समय किसी की छाया न पड़े। जब सब जलकर काला हो जाये तो ठण्डा कर छान लें। और शीशी में भर कर रख लें। तेल तैयार हो गया।

प्रयोग विधिः- यह तेल पहले बच्चे के कान के पीछे मलें, बाद में हाथ की हथेली पर, पैर के तलबे पर, सिर के काग पर, रीढ़ की हड्डी पर मलने के पश्चात् सारे शरीर पर हल्के-हल्के मलें। शरद् ऋतु में धूप में बैठ कर मलें और ग्रीष्म में छाया में मलें। इस क्रम से नित्य तेल मरदन से एक मास में ही बच्चा स्वस्थ होने लगेगा।

४४-गाय का ताजा गोबर लगभग २ तोले बच्चे की कमर पर मलने से कुछ देर पश्चात् बच्चे की कमर पर बारीक-बारीक काले रंग के कीटाणु निकल आर्येंगे इन्हें स्पीट के फोहे से शीघ्रता से साफ कर देना चाहिए। यही सुखा रोग के कीटाणु होते हैं। ध्यान रहे यह कीट किसी अन्य बच्चे को न लग जायें अन्यथा उसे भी सुखा रोग लग जायगा। पीठ पर नित्य

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गोबर मलते रहें। जब तक कौट निकलने बन्द न हो जायें।

४५-स्वादिष्टि, पाचक, रेचक और दीपक चूर्ण- ३ ग्राम हींग भुनी, ४० ग्राम जौरा भुना, ४० ग्राम अनारदाना, १० ग्राम काली मिर्च, १० ग्राम सनाय, २० ग्राम नौसादर हाँडी का, १० ग्राम काला नमक, १० ग्राम छोटी हर, १० ग्राम साँठ, १० ग्राम पीपल छोटी, १० ग्राम चव, १० ग्राम चौते की छाल, १० ग्राम साँफ, १० ग्राम सैन कचरी, १० ग्राम तेजपात। कूट कर चूर्ण बना लें। सेवन करें।

४६-वात नाशक- साँठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, चव, चौते की छाल, सैनकचरी सब को समान भाग लेकर कूट लें। दाल, शाक, सब्जी आदि में डालकर सेवन करें वात नाशक है।

४७-ठण्ड के लिये- ५ ग्राम जायफल, १० ग्राम जावित्री, २५ ग्राम दारचीनी, २० ग्राम लौंग, २५ ग्राम हरी इलायची, सबको कूट लें २ से ४ रस्ती तक दाल, शाक, सब्जी में डालकर सेवन करें ठण्ड के विकार को दूर करेगा। उत्तम है।

४८-अग्नि मुख रस- शुद्ध वत्सनाभ (सिंगया) १ ग्राम, शुद्ध सिंगरफ २ ग्राम, केशर ४ ग्राम, लौंग ८ ग्राम। सबको बारीक करके देसी पान के रस की सात भावना देकर मूंग के दाने की बराबर गोलियाँ बना लें। एक या दो गोली दूध से, वात कफ नाशक और वीर्य वर्धक है।

४९-आधा शीश दर्द पर- एक रीठे को मुख पर से काट कर गोली निकाल दें। रात्रि को खाली रीठे में पानी भरकर रख दें, प्रातः काल रीठे को पानी की दो, चार बूँदें नाक के उस नथने में डालें जिधर सर में दर्द है। यदि दर्द शेष रहे तो अगले दिन फिर नया रीठा लेकर प्रयोग करें तीन चार दिन में पूर्ण आराम हो जायगा।

५०-बबासीर के मस्तों पर- शौच के लिए ले जाने वाले पानी में डिटोल की दो बूँदें डालकर मल विसर्जन के पश्चात् गुदा

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को इसी पानी से साफ करें, इस प्रकार ३ या ४ मास में अर्श के मत्से अपने आप सूख कर नष्ट हो जाते हैं। गुदा पर खुरकी मालूम हो तो जूरा-सा देसी घी लगा दें।

५१-नेत्र रोगों पर- २५० ग्राम शुद्ध गुलाब जल, १० ग्राम गुलाबी फिटकरी, २ ग्राम हरी इलायची के दाने कूटकर, २०० मिलीग्राम तूतिया, सबको मिलाकर पक्की शीशे में बन्द करके २० दिन रखा रहने दें। दिन में दोबार हिला दिया करें २० दिन पश्चात् छान कर रख लें नित्य नेत्रों में एक-एक बूँद डालें। नेत्रों के सभी रोगों को दूर करके रोशनी बढ़ाता है, मोतियाबिन्द पर भी लाभ करता है।

५२-नेत्र मणि- मकोय सूखी २५० ग्राम, दारु हल्दी २५० ग्राम, गुलाब के फूल की सूखी पत्तियाँ ५० ग्राम, भीम सैनी कपूर ५ ग्राम, मिश्री ५० ग्राम, शहद २५ ग्राम, पानी ४ लीटर।

विधि- दारुहल्दी की लकड़ी को बारीक कूट लें, मकोय, गुलाब के फूल की पत्तियाँ इनको पानी से धोकर साफ करलें बाद में पीतल के पात्र में ४ लीटर पानी डाल कर उसमें भिगो दें १२ घन्टे के पश्चात् मंद-मंद आग पर पकायें, जब पानी एक लीटर शेष रह जाय तो उतारकर ठण्डा करके छान लें। तौबे के पात्र में उक्त पके पानी को डालकर उसमें मिश्री डाल दें और फिर आग पर पकने रख दें जब शहद की तरह गाढ़ा हो जाय तो उतार कर रखें, शहद में भीम सैनी कपूर डालकर खरल में खूब घोटें जब कपूर का दाना न रहे तो पके हुए पदार्थ को डालकर फिर घोटें तैयार होने पर शीशे में भरकर रख लें।

प्रयोग- इसे नित्य रात्रि में संलाई के साथ आँखों में लगाने से आँखों के सभी रोग दूर होते हैं, रोशनी बढ़ती है।

५३-दीर्ता के लिये- ३० ग्राम पोस्त डोडा, १० ग्राम छाल कीकड़, ५ ग्राम नमक, ५ ग्राम फिटकरी, १ सेर पानी में

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डालकर पकायें जब १ भाग जलकर तीन भाग शेष रह जाय तो उतार कर रख लें, इससे कुल्ले करें दंतों के दर्द आदि पर लाभ करेगा।

५४-पनीर (तुखें हयात) १० ग्राम को १०० ग्राम पानी में रात को कौंच के पात्र में भिगो दें, प्रातः काल मलछान कर हल्का गर्म करके १० ग्राम शुद्ध देशी घी मिलाकर पी लें इसके सेवन से तीन मास तक दंतों में कोई विकार न होगा। और न फोड़ा फुन्सी निकलेगा, पायरिया में भी लाभ देता है। इसे तीन मास का दंतों के लिए बीमा समझिये।

५५-वीर्य शोधक एवं शक्ति वर्धक- बबूल की कच्ची बिना बीज वाली फली, बबूल की कोपलें, बबूल का गोद तीनों को समान मात्रा में लेकर कूट लें सबके समान मिश्री मिला लें ५ ग्राम प्रातः सारय दूध से लें।

५६-नजला जुकाम- मुण्डी, तोमर के बीज, सौंफ २१।, २१। ग्राम एक पाव जल में डालकर पकायें छान कर पीने से नजला नष्ट होता है।

५७-टिकिया चूर, नरकचूर, काली मिर्च, काला नमक संगम मांझा में सबको कूट कर चूर्ण बना लें भोजन के बाद २१। ग्राम ताजे जल से लें नजला समाप्त हो जायगा।

५८-स्मृति के लिये- बालछड़, ब्राह्मी, शंख पुष्पी, दूधियावच समान मात्रा में चूर्ण बना लें २१। ग्राम दूध से दें।

५९-पेट अफारा पर- कलमी शोरा, नौसादर हाँडी का, काली मिर्च सौदा नमक समान भाग लेकर चूर्ण बनालें। भोजन के बाद १ ग्राम लें।

६०-हर प्रकार की खाँसी के लिये अति उत्तम- छोटी इलायची के दाने ५ ग्राम, तेजपात ५ ग्राम या दालचीनी, ५ ग्राम छोटी पीपल, २० ग्राम मुलेठी, ४० ग्राम मिश्री, ४० ग्राम छुआरा गुठली निकाल कर, ४० ग्राम मुनक्का बीज निकालकर,

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सबको बारीक कूटकर शहद मिलाकर २, २ रस्ती की गोलियाँ बना लें। १, २ गोली मुख में डालकर चूँसे दिन में ४ बार। खाँसी, कण्ठ बैठ जाना आदि पर उत्तम है। इसे एहलादि वटी कहते हैं।

६१-जिगर के प्रत्येक उपद्रव पर अति उत्तम प्रयोग- देसी पीली हर गुठली रहित, काली हर गुठली रहित, काली हर, नरकचूर, बायबिङग, सौठ, काली मिर्च, चौकिया सुहागे की खील, नौसादर देसी हाँडों का, काला नमक, सागर (साम्पर) नमक, सँदा (लाहौरी) नमक। सब को समान भाग लेकर बारीक कूटकर रख लें, आयु के अनुसार, कम अधिक मात्रा बनाकर भोजन के पश्चात् दोनों समय सेवन करें।

६२-खुनाक टौंसिल पर- गाजवीं २।। ग्राम को १०० ग्राम पानी में शीशे के पात्र में रात को भिगो दें प्रातः एक उबाल देकर छानकर पान करें। इससे जुकाम भी ठीक हो जाता है।

६३-जल जाने पर उपचार- तत्काल धीगवार का गुदा मलने से छाले नहीं पड़ते। गाय का ताजा गोबर भी मलने से लाभ होता है। कबीला, कपूर- देसी, जस्त फूला, मुर्दासींग सबको बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसकर कपड़छन करलें, चमेली या तिल के तेल में मिलाकर लगाने से तत्काल ठण्डक पड़ती है और विषांश निकलने लगता है यदि खुरन्ट को न छुटाया गया तो जले के चिन्ह भी नहीं रहते और खुरन्ट अपने आप उतर जायगा।

६४-सफेद दाग- १ किलो बापची, २०० ग्राम मेथी, १०० ग्राम हल्दी। सबको बारीक कूट कर चूर्ण बना लें। बापची में तेल होता है इस कारण आग पर गर्म करके भी कूट सकते हैं। जब चूर्ण तैयार हो जाये तो इसमें से ५ ग्राम लेकर, २०० ग्राम पानी में रात को भिगो दें प्रातः काल छान कर पी लें, इसी प्रकार प्रातः काल को भिगो कर रात्रि को पी लें। एक

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वर्ष तक प्रयोग करें। सफेद दाग दूर हो जाते हैं।

६५-गठिया के दर्द पर तेल- ३०० ग्राम सरसों के तेल में एक नग नागफली के पत्ते को काट कर छोटे छोटे टुकड़े करके तेल में डालकर आग पर पकायें, जब पत्ता जल जाये तो नीचे उतार कर ठण्डा करके छान लें फिर उसमें १ ग्राम अफीम डालकर घोट लें तेल तैयार है। इस तेल को धूप में बैठकर दर्द वाली जगहों पर मलें। सावधानी मलने वाला अपने हाथ पानी से एक घण्टे बाद धोकर कपड़े से साफ कर लें। रोगी को तेल मलने के ३ घण्टे बाद ही पानी लगाने दें।

६६-खौसी- बहेड़ा २० ग्राम, कल्या १० ग्राम, लौंग ५ ग्राम, सबको बारीक कूटकर शहद या पानी डालकर चूने बराबर गोलियाँ बनालें। मूँह में डालकर चूसने से खौसी ठीक होती है।

६७-मासिक धर्म की अधिकता पर- खून खराबा ५ ग्राम, नागकेशर १० ग्राम दोनों को बारीक कूटकर १० पुच्छियाँ बना लें तीन दिन तक ताजे जल से प्रातः सायं, व बाद में एक मात्रा प्रातः काल दें।

६८-मधुमेह- तुलसी, जामुन, बेल, नीम, आम की सूखी पत्तियाँ समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें नित्य दिन में २ बार ३-३ ग्राम जल से लें।

६९-कल्याण अवलेह- हल्दी, बचदूधिया, कूट मीठा, पीपल छोटी, साँठ, काला जीरा, अजवायन, मुलेठी, सेंधा नमक। सबको समान मात्रा में लेकर बारीक कूट लें, गाय का घी मिलाकर १-१ माहो की गोलियाँ बना लें। १ से २ गोली तक दूध से सेवन करें। स्मृति और कण्ठ की मधुरता के लिये यह उपयोगी है।

७०-वासना को कम करने के लिये- शीम सेनी काफूर, सुहागे की खोल समान मात्रा में लेकर पान के साथ सेवन करने से वासना में कमी आती है।

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७१-पथरी पर- कलमी शोरा, जवाखार, सुहागा खील, तीनों को समान भाग लेकर चूर्ण तैयार कर लें। इसमें से ५ ग्राम प्रातः निहार मुड़ और रात्रि को सोते समय, कुलथी के कवाथ से लें।

कवाथ- कुलथी २० ग्राम, रात्रि को १०० ग्राम पानी में भिगों दें प्रातः काल आग पर रख कर पकायें, जब आधा रह जाये तो हल्के गर्म से उपरोक्त चूर्ण लें, इसी प्रकार प्रातः काल कुलथी को भिगो कर रात्रि को काम में लें। एक सप्ताह में ही पथरी साफ हो जायेगी।

७२-पाचक और वात नाशक- राई, अजवायन दोनों को समान भाग लेकर चूर्ण बना लें। १ ग्राम खाना खाने के बाद जल से लें या दाल सब्जी में मिला कर लें।

७३-जोड़ों में चिकनाई कम हो जाने से जो दर्द हो जाता है उसके लिये- १ ग्राम हीरा हींग को जरा से देसी घी में धून लें। २ ग्राम सूरंजन शीरी, इन दोनों को वारीक पीस लें शुद्ध देसी मोम ५ ग्राम को किसी पात्र में डालकर गर्म करें जब मोम पिघल जाय तो उक्त चूर्ण को डालकर मिला दें, ठण्डा होने पर चॉटली को बराबर गोली बना लें। एक गोली प्रातः एक रात्रि को दूध से लें।

७४-पुष्टी कारक- १० ग्राम साबुत उर्द को ७५० ग्राम गाय के कच्चे दूध में डाल कर मन्द- मन्द आग पर पकायें, जब उर्द गल जायें तो नीचे उतार कर ठण्डा करके रुचि अनुसार मीठा मिलाकर हल्के हल्के सेवन करें। बचे उर्द को भी चबा कर खा लें। सात दिन सेवन करें।

७५-स्वर्ण केशरी अवलेह- २ नाग सोने के वर्क, केशर १ ग्राम, वसन्त कुसुमाकर १ ग्राम, सफेद मुसली १० ग्राम, शिलाजीत १० ग्राम, काँच वीज छिलका उतार कर २० ग्राम, सौठ १० ग्राम, शतावर १० ग्राम, असगन्ध १० ग्राम, अजवायन १०

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वीरेन्द्र गुप्तः

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ग्राम, काली मिर्च १० ग्राम, छोटी पीपल १० ग्राम, लींग १० ग्राम, छोटी हर. १० ग्राम, हरी इलायची २० ग्राम, बड़ी इलायची ३० ग्राम। सोने का वर्क, कैसर, वसन्त कुसुमाकर, शिलाजीत इन को खरल में बारीक करें और सबको बारीक कूटकर सबको मिलाकर ५०० ग्राम शहद में मिलाकर रख लें। ५ ग्राम नित्य सेवन करें। वात, कफ और निर्बलता के लिये दें।

७६-दाड़, दौत का दर्द- हाइड्रो (खाँड साफ करने वाला मसाला) १ ग्राम, गुलाबी फिटकरी २।। ग्राम, खाने का सोडा १० ग्राम। सबको मिलाकर रख लें, जिस दाड़, दौत में दर्द हो उस पर मल में दर्द शीघ्र ही दूर हो जायगा।

७७-मासिक धर्म की कमी पर- धाय के फूल १० ग्राम, १०० ग्राम पानी में ४ घन्टे भिगो दें, बाद में पकाकर आधा रह जाने पर उसमें ५ ग्राम पुराना गुड़ मिलाकर रख लें। इसमें से आधा प्रातः काल निहार मुख और आधा रात को सोते समय दें। रुका हुआ मासिक धर्म खुल जाता है और गर्भ स्थित हो जायगा। इसे तीन दिन सेवन करायें जब मासिक धर्म का समय आये तब देना चाहिये।

७८-पाचक जल- हीरा हींग २ ग्राम, नौसादरे देसी हाँड़ी का ५ ग्राम, काला नमक १० ग्राम, पानी ७५० ग्राम सबको एक बोटल में भर कर ८ दिन धूप में रखें। इसके सेवन से पेट के विकार दूर होते हैं।

७९-पीलिया- कमलवाव, कड़वी बिण्डाल के ५ फलों को लोकर कैंची से बारीक काटलें। फिर उसे बारीक कपड़े में बाँध कर पोटली बना लें। पोटली को हाथ से मसल मसल कर बार बार सूर्य में। इसे दिन में ८, १० बार सूर्य नाक से पीला पानी निकलेगा उलटी भी हो सकती है। कच्ची मूली का सेवन करायें। तेल हल्दी ५ दं।

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८०-हलका विरेचन- सनाय ३ ग्राम, मुनक्का ३ ग्राम, मिश्री ३ ग्राम, सनाय की पत्ती से डण्डल तोड़ दें। मुनक्का के बीज निकाल दें। सब को कूट कर तैयार करें। रात को गुन गुने दूध से लें। प्रातः २ या ३ बार शौव जाना पड़ेगा, पेट साफ हो जायगा।

८१-जिगर के लिये- घीग्वार पाठा का गुदा १०० ग्राम, नौसादर देसी हाँडी का १० ग्राम, काला नमक १० ग्राम। सबको एक बोलत में भरकर ४-५ दिन धूप में रखें सब पानी बन जायगा। छान कर रख लें। एक छोटा चम्मच प्रातः एक शाम को खाना खाने के बाद दें। जिगर ठीक हो जायगा।

८२-दमा खाँसी- पीपल के पत्ते सुखाकर बारीक कूटलें ४ रत्ती प्रातः काल शहद से लें दो तीन सप्ताह में रोग ठीक हो जायगा।

८३-प्रदर- माजुफल, मजीठ, कलमी तज, मखे चने। सबको बारीक कूट कर बराबर की बूरा मिलाकर ५ ग्राम प्रातः ५ ग्राम रात्रि को दूध से लें। सावधानी- खटाई, लाल मिर्च और आचार- विचार शुद्ध रखें।

८४-प्रदर- सैमरगदूदे सुखाकर बारीक चूर्ण बना लें बराबर की बूरा मिलाकर १० ग्राम, दूध से लें दिन में दो बार।

८५-स्तम्भक- सफेद प्याज एक को कुचल कर उसका रस निकाल लें उसमें १० ग्राम ग्वारपाठा का गुदा मिला लें २। ग्राम शुद्ध भौंग का चूर्ण मिलाकर दूध के साथ सेवन करें।

८६-चूर्ण- साँठ २५ ग्राम, काली मिर्च २५ ग्राम, पीपल छोटी २५ ग्राम, जीरा भुना २५ ग्राम, अजवायन २५ ग्राम, सनाय २५ ग्राम, पोदीना २५ ग्राम, नौसादर देसी हाँडी का ४० ग्राम, काला नमक ४० ग्राम, सेंदा नमक ४० ग्राम, चव २५ ग्राम, चीता २५ ग्राम, सैन कचरी २५ ग्राम, कलमी शोरा २५ ग्राम, राई २५ ग्राम, हाँग हीरा भुनी हुई ५ ग्राम। सबको बारीक कूट लें।

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८७-मासिक धर्म की अधिकता- अड़हरे के पत्ते ५० ग्राम, अशोक की छाल ५० ग्राम, नाग केसर ५० ग्राम, खुन खराबा ५० ग्राम, सबको कूटकर ८० मात्रा बना लें। प्रातः और रात्रि दोनों समय जल से लें।

८८-चोट दर्द पर- मेथी, अजवायन, कलौंजी, हालों समान मात्रा में लेकर बारीक कूट लें। ५ ग्राम गर्म पानी से दिन में २ बार लें।

८९-५ ग्राम असगन्ध नागौरी के चूर्ण को ३०० ग्राम कच्चे दूध में घोल कर हलकी हलकी आग पर पकायें, जब पकते-पकते कुछ गाढ़ा होने लगे तो नीचे उतार कर उसमें १० ग्राम देसी घी और रुचि अनुसार मीठा मिलाकर हलका गर्म एक-एक चूँट से पिये। इसके सेवन से चोट के दर्द शीघ्र ठीक हो जाते हैं। एक सप्ताह सेवन करे यह 'लो' ब्लड प्रेशर में भी उपयोगी है।

९०-जुकाम खाँसी के लिये- आवरेशम ३ग्राम, उन्नाव ५ दाने, खतमी ४ ग्राम, गजवर्षी ४ ग्राम, गुलबनफशा ४ ग्राम, गुल गजवर्षी ३ ग्राम, सपिस्तौं ९ दाने, मुलैठी ३ ग्राम, बादाम गिरी ५ दाने, सब को जो-कूट कर २०० ग्राम पानी में रात को भिगो दें। प्रातः काल पका छान कर उसमें १० ग्राम लहक सपिस्तौं मिला कर पी लें।

९१-भयंकर गहरी गुम चोटों पर- ७ भिलावे के टुकड़े कर के २५० ग्राम देसी घी में डाल कर तल लें। भिलावे निकाल कर फँक दें। उक्त घी में गुड़ और गेहूँ का भुना आटा डाल कर हलुआ बना लें और खायें, ५ या ७ दिन सेवन करें। जब भिलावा शरीर में फूट निकले तो भीस की छाछ सारे शरीर पर चुपड़ के तीन घन्टे धूप में बैठे। चार दिन में भिलावे का सारा उद्भव शान्त हो जायगा। गोला और तिल का सेवन करें। खटाई और मिर्च लाल न खायें।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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१२-छुआरे को चाकू से चीर के उसकी गुठली निकाल दें, उसके स्थान पर सुनहरी गूगल भर कर डोरे से बाँध कर लोई का आटा उस पर चढ़ा भुवल में दबा दें जब आटे के जलने की गन्ध आने लगे तो निकाल कर आटा अलग कर के छुआरा गूगल सहित कूट लें। जब एक हो जाय तो चने बराबर गोली बना लें। १-२ गोली रात को दूध से लें। कमर दर्द के लिये उपयोगी है।

१३-लहशुनादि वटिका- लहसुन, जीरा भुना, हींग भुनी, सौंठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, शुद्ध गन्धक, सैंधा नमक। सब बराबर का लेकर कूट लें फिर नीबू के रस में ३ दिन खरल करें। एक-एक रस्ती की गोलियाँ बना लें २ गोली दिन में ३ बार लें। चूसें। पेट, अफारा, हैजा, अपच, अजीर्ण, कुमि, उदर शूल, आदि पर उपयोगी है। अधिक अजीर्ण अपच होने पर मास में एक दिन में ८ बार लें जल पीते रहें अन्न न लें। अगले दिन दोष दूर हो जायगा।

१४-आपरेशन के द्वारा प्रसव से बचने का उपाय- गर्भ स्थिति के सातवें मास के चौथे सप्ताह से प्रसव समय तक नित्य प्रति गर्भणी को ३ग्राम बादाम का तेल रात्रि को दूध में मिलाकर देने से प्रसव स्वाभाविक रूप से हो जायगा। आपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह प्रयोग उल्टे बच्चे के जन्म को अर्थात् पैरों के बल प्रसव होने को भी ठीक करेगा।

१५-गोक्षारादि चूर्ण- २०ग्राम गोखरुछोटा, २०ग्राम बीजबन्द, २०ग्राम ताल परवाना, २०ग्राम नगरमोथा, २०ग्राम कौंच बीज छिलका उतार कर। २०ग्राम शतावर, २०ग्राम मुलैहटी, २०ग्राम उटंगन के बीज, १०ग्राम सालब मिश्री पंजा, १०ग्राम मुसली सफेद, १०ग्राम मुसली काली, १०ग्राम सौंठ, १०ग्राम काली मिर्च, १०ग्राम मेथी, १०ग्राम जीरा, १०ग्राम असगंध, १०ग्राम

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वीरेन्द्र गुप्तः

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पीपल बड़ी, १०ग्राम लाजवन्ती, १०ग्राम तुखेंगिरी, १०ग्राम विदारी कन्द, १०ग्राम अजवान इन सबका बारीक चूर्ण करके सबके बराबर मिश्री पीस कर मिलालें। नित्य प्रातः और रात्रि को सोते समय ५-५ ग्राम दूध से सेवन करने से वीर्य में पुष्टता आती है, शुक्रकीट बढ़ते हैं, पस-सैल्स नष्ट होते हैं। शीघ्रपतन का नाश होकर गर्भ-स्थापक वीर्य बन जाता है।

१६-आयुर्वेदिक चाय- ५०ग्राम अर्जुन की छाल, २५ग्राम सौफ, १५ग्राम मुलैठी, ५ग्राम गुलवफशा, १०ग्राम तेजपाता, ५ग्राम लौंग, ५ग्राम दारचीनी, ५ग्राम लालचन्दन, ५ग्राम सौंद, ५ग्राम गाजर्वा। इन सबको दरदरा कूटकर तैयार करलें, एक चम्मच पानी में पकाकर दूध मिलाकर सेवन करें उत्तम हो।

१७-शरीर के तिल मस्से ठीक करना- किशोर गुल ११गोली प्रातः ११गोली सायं भोजन के बाद अभ्यारिष्ट के साथ लेने से ठीक हो जाते हैं।

१८-ग्वारपाठा - इसे घीग्वार भी कहते हैं। अंग्रेजी में एलोबेरा कहते हैं। इसके गुदे को सिर पर मलने से रूसी नष्ट हो जाती है, बाल कोमल हो जाते हैं। इसके गुदे को चेहरे पर लगाने से मुहासे, चेहरे की झुर्रियाँ आदि नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ मुलतानी मिट्टी पीसकर, मिलाकर लगाने से अच्छा परिणाम आता है। इसे जले पर तुरन्त लगाने से छाला नहीं पड़ता। इसके लड्डू बनाकर सेवन करने से जाड़ों में अच्छा रहता है।

१९-ठण्डक का योग- १०ग्राम वंशलोचन, १०ग्राम हरी इलायची, १०ग्राम सफेद चन्दन चूर्ण, १०ग्राम धनियाँ, १०ग्राम कहवा, १०ग्राम जहरमोरा, ५ग्राम पत्थरबेर, ५ग्राम अकौक, २।ग्राम मूंगा, ५०नग चान्दी के वर्क। इन सबको बारीक कूटकर अथवा खरल करके रख लें। यह औषधि पित्त को रोगों में रसायन है। हृदय की निर्वलता, पिपासा, घबराहट आदि में

इच्छानुसार सन्तान २२७ वीरेन्द्र गुप्तः

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उपयोगी है। शहद में बलानुसार प्रयोग करें। या रात के भीगे बादाम की मींग ५ ग्राम को बारी पीसकर उसमें ५ ग्राम मक्खन और १० ग्राम शहद मिलाकर औषधि का सेवन करने से अधिक लाभ होता है।

१००-ज्योतिषपति तेल- इसे मालकांगनी का तेल भी कहते हैं। इसका तेल नित्य १-२ बूँद खाण्ड के बताशे में अथवा खाली कपूल में डालकर सेवन करें, २ बताशे और खा लें। इनके सेवन से स्मृति बढ़ती है, बुद्धि स्थिर होती है। एक बूँद तेल दोनों हाथ की हथेलियों पर लगाकर अंगूठे से २ मिनट तक मलते रहने से आँखों की ज्योति बढ़ती है। इसका सेवन गर्म प्रकृति के और बच्चों को नहीं कराना चाहिये। यह हलका रेचक होता है। जिन बच्चों की नेत्र ज्योति कम है उनकी हथेलियों पर मल सकते हैं, नेत्र ठीक बने रहते हैं।

१०१-कैन्सर के लिये उत्तम प्रयोग- हीरा भस्म इसे वज्रभस्म भी कहते हैं। ११ रत्नी, सुवर्ण भस्म, मुक्तापिष्टी और अघ्रक भस्म सी पुटी २-२ माशा सबको मिलाकर ४८ पुड़ियाँ बनालें। प्रतिदिन प्रातः १ पुड़िया मलाई मिश्री के साथ देने से कर्कस्फोट अर्थात् कैन्सर आदि की प्रस्थियाँ गलकर नष्ट हो जाती हैं। देह के भीतर होने वाले पुष्पशत, अबुर्द, कर्कस्फोट कैन्सर पिलपिला, ग्रन्थीदार, चारों ओर फैलने वाला, रक्त कैन्सर, गुल्म आदि सब पर सफलता सहित कार्य करता है। हीरा भस्म के अभाव में वैक्रान्त भस्म ली जा सकती है।

१०२-कांचनार गुग्गुल- के प्रयोग से कण्ठमाला, अपची, अबुर्द, कर्कस्फोट (कैन्सर) ग्रन्थी व्रण, गुल्म, कुष्ठ, भगन्दर आदि उग्र रोगों में अतिलाभदायक है। इसका सेवन ३-४ मास तक निरन्तर करना चाहिये। २ गोली खदिररिष्ट या त्रिफला क्वाथ से लें।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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१०३-माजूम उशबा- इसके सेवन से जीर्णलीन, विषको जलाने और स्वेद अर्थात् पसीने द्वारा विष को बाहर निकालने के लिये प्रयोजित होता है। जीर्ण फिर्ग, जीर्ण सुजाक, नाड़ी ब्रण, विस्फोटक आदि लीन विष से उत्पन्न रक्त विकार चर्मरोग कण्डु, अर्श, संधि स्थानों की वेदना आदि को दूर करता है। अबुर्द, कैन्सर और ट्यूमर अन्तर्विद्रधि अर्थात् आंत का बढ़ना आदि लीनविष को गलाने में उपयोगी है। सेवन दिन में एक बार प्रातः या रात्रि को सेवन करें। अनुकूल रहे तो गोदुध का सेवन करें।

१०४-सूर्य गुणी औषधि- इन्दिरा गुप्ता, वेद कृति १३, राम बिहार कालोनी, जिला सहकारी बैंक के पीछे मुरादाबाद से प्राप्त हो सकती है। इसका सेवन गर्भावस्था के ८१ से ८५ दिन के मध्य में सेवन कराने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

१०५-संख्या चूर्ण नं०१- शुद्ध सफेद संख्या १ग्राम, वंशलोचन असली १०ग्राम, दानेदार चीनी १०ग्राम इन तीनों में से पहले खरल में डाल कर संख्या को घोटें, पश्चात् वंशलोचन डालकर घोटें, उसके पश्चात् चीनी डालकर खूब घोटें कम से कम ६ घन्टे की घुटाई होनी चाहिये। संख्या चूर्ण नम्बर १ तैयार है। मात्रा १२ती मक्खान या मलाई में मिलाकर चाटें। भोजन के एक घन्टे पश्चात्।

इसके सेवन से प्रत्येक रोग की उग्रता के कारण बनी निर्बलता को शीघ्र दूर करता है। इसके साथ घी देसी और दूध का अधिक सेवन करें। यह श्वास तथा कास खाँसी आदि में अतिहितकर है। हस्त मैथुन के रोगियों को तत्काल लाभ करती है। रक्तवर्धक है। ठण्ड को दूर करती है।

१०६-संख्या चूर्ण नं२- संख्याचूर्ण नं१ १०ग्राम, वंशलोचन २० ग्राम, चीनी (खाण्ड) २०ग्राम। इन तीनों को खूब बारीक खरल कर के रख लें।

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