कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पढ़े इल्मों अमल सारे चढ़े जा लामकाँ ऊपर ।
बजुज तुझ रहनुमाई रह न सूझे दाज बाकी है ॥
न रह रौशन ब सदहा मशअल व महताब अख़्तरके ।
कि अबतक नूर सूरै सारशबद व हाज बाकी है ॥
हुई काफूर दिल आजिजसे ख्वाहिशे दीन दुनियांकी ।
मगर सतगुरु सना ख्वानी हवस यह आज बाकी है ॥
कबीर साहिब कृत षड् देह वर्णन ।
कबीर साहिबने अपने शब्दोंमें छः प्रकारके देहोंका वर्णन किया है जिनमें आकर यह जीव पूर्ण पतित हो गया था, । साथके साथही उनका अर्थ भी कर दिया है जिससे पाठक गण आनन्दसे समझ लें । “सन्तों ! षट् प्रकारकी देही, स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण, कैवल्य हंसकी लेही।” कबीर साहिब कहते हैं कि, ए महात्माओ ! छः प्रकारकी देहें हैं । वे स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण, ज्ञान और विज्ञान ये हैं ।
स्थूल शरीर या कच्चे तत्त्वकी देह ।
सन्तों षट् प्रकारकी देही ।
स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण कैवल्य हंसकी लेही ॥
साढ़े तीन हाथ प्रमाना देह स्थूल बखानी ।
राता वरण जाग्रित वस्था वैखरी बाचा जानी ॥
रजो गुणी ॐ कार मात्राका त्रिकुटी है अस्थाना ।
मुक्ति सालोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना ॥
पृथिवी तत्व खेचरी मुद्रा मग पील घट कासा ।
क्षर निर्णय बड़वाग्नि दशेन्द्रो देव चतुर्दश बासा ॥
और अहै ऋग्वेद बताऊँ अर्द्ध शून्य सञ्चारा ।
सत्यलोक विषया अभिमानी विषयानन्द हंकारा ॥
आदि अन्त ओ मध्य शब्द है लखै कोई बुद्धि बीरा ।
कहैं कबीर सुनो हो सन्तों इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥
स्थूलदेह, साढ़े तीन हाथ, रक्तवर्ण, ब्राह्मी देवता, रजोगुण, ओंकार मात्रिका, जाग्रत अवस्था, वैखरी वाचा, त्रिकुटी स्थान, पृथिवीतत्त्व, खेचरी मुद्रा, कपिल मार्ग, मठाकाश, नेत्र स्थान, सत्यलोक, विश्वअभिमानी, गायत्री प्रथम पद, क्षर निर्णय, बड़वाग्नि, विषयानन्द आकार, आप तत्व, दश इन्द्रो, रहस मात्रिका, अर्द्ध शून्य, ऋग्वेद, चौदह देवता, पचीस प्रकृति ।
लिङ्गदेह या सूक्ष्म शरीर ।
सन्तो सूक्ष्म देह प्रमाना ।
सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥
श्वेत वर्ण ॐ कार मात्रका सतोगुण विष्णू देवा ।
उर्द्ध और अर्द्ध यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहैवा ॥
मुक्ति सामीप लोक वैकुण्ठ है पालन किरिया राखी ।
मारग बिहैंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥
आप तत्व कोहं हंकारा मदाग्नी कहिये ।
पञ्च प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम वाणी लहिये ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध मन बुद्धि चित्त हंकारा ।
कहैं कबीर सुनो हो सन्तो, यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥
लिङ्ग देह, अंगुष्ठके बराबर, ॐ कार मात्रिका, शुक्ल वर्ण, विष्णु देवता, श्रीहठ स्थान, मध्यमा, वाचा ऊर्ध्व, शून्य यजुर्वेद, वैकुण्ठ लोक, कण्ठस्थान, पालन क्रिया, आप तत्व, भूचरी मुद्रा, विहङ्ग साग, द्वितीय पद गायत्री, क्षर निर्णय, मन्दाग्नि, कोहं अहंकार, सामीप्य मुक्ति, पञ्च भूत, सूक्ष्म प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, चारों अन्तःकरण मन बुद्धि, चित्त, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध यह सूक्ष्म नौ तत्व हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पञ्च कर्मेन्द्रिय यह सब जड़ अर्थात् अनात्म हैं जिसकी सत्तासे ये चैतन्य होते हैं उसको जीव कहते हैं ।
कारण शरीर ।
सन्तो कारण देह सरेखा ॥
आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारावर्ण परेखा ॥
मध्य शून्य है मकार मात्रका हृदया सो अस्थाना ।
महंदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ति जाना ॥
उददा अग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कण्ठ स्थानी ।
कपि मारग तृतीया पद गायत्री अहै प्राज्ञ अभिमानी ॥
सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्ति स्वरूप बखानी ।
तेज तत्व अद्वैतानन्द अहंकार निखानी ॥
अहै विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई ।
कारण देह इति समपूरण कहैं कबीर बुझाई ॥ ३ ॥
चक्रोंसे स्वर व्यंजनोंका प्राकट्य
कारण देह, आधा पर्व, श्याम वर्ण, मकार मात्रिका, गोलाहठ स्थान, पश्यन्ति वाचा, सद्य शून्य, तमोगुण, सामवेद चाचरी मुद्रा, कपिमार्ग, महदाकाश, हृदयस्थान, प्राज्ञ अधिमानी, कण्ठस्थान, निर्णय अविद्याऽग्नि, तृतीय पद गायत्री, अद्वैतानन्द, इच्छा शक्ति सुधुप्ति अवस्था, सारूप मुक्ति ।
महाकारण ।
सन्तो महाकारण तन जाना ।
नीलवरण और ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥
नाभस्थान विकार मात्रिका चिदाकाश परमानी ।
मारग मीन अगोचरी मुद्रा वेद अथर्वण जानी ॥
ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति तन वार्ई ।
आश्रय लोक विदेहानन्द मुक्ति सायुज्य बताई ॥
निरणय प्रकाश तुरीअवस्था प्रत्यक्ष आत्म अभिमानी ।
॥शवहंकार महाकारण तन इति कबीर बखानी ॥ ४ ॥
महाकारण देह, मसूर प्रमाण, विकार मात्रिका, गोलाहठ स्थान, परा वाचा शून्य अद्वै मात्रिका, अथर्वण वेद, पवन तत्त्व, अगोचरी मुद्रा, ज्वाला काला, मीन मार्ग, चिदाकाश, आश्रय लोक नाभस्थान, प्रत्यज्ञ अभिमानी, चतुर्थ पद गायत्री, आदि शक्ति, विदेह आनन्द, सोहं ओहं अहंकार, तुरिया वस्था, प्रकाशक, सायुज्य मुक्ति ।
ज्ञान देह ।
सन्तो कौवल्य देह बखाना ।
कौवल्य सकल देहका साक्षी भँवर गुफा अस्थाना ॥
निराकाश औ लोक निराश्रय निरणय ज्ञान विशेषा ।
स्वसम्बेद है उन मुनि मुद्रा उनमुनि वाणी लेखा ॥
ब्रह्मानन्द कहिये हंकारा ब्रह्म ज्ञानको माना ।
पूर्णबोध अवस्था कहिये ज्योति स्वरूपी जाना ॥
पूर्णगिरी अनुचरी मात्रिका निरञ्जन अभिमानी ।
परमारथ पञ्चम पद गायत्री परामुक्ति पहचानी ॥
सदाशिव औ मार्ग सिखा है कहैं कबीर मतिधीरा ।
कलातीत कला सम्पूर्ण कौवल्य कहैं कबीरा ॥ ५ ॥
उपरोक्त चारों साक्षी ज्ञान देह, स्वसम्बेद, उनमुनि वाचा, भँवर गुफा स्थान, सदाशिव पूर्ण गिरी, अनुचर मात्रा, पूर्ण बोध अवस्था. कलातीत, सखमार्ग,
बर्णोंकी मा सबसे पहिलेका वर्णमाला, नलकीके तोंतेका दृष्टान्त
निराकाश, सिद्ध स्थान, निराश्रय लोक, निरञ्जन अभिमानी, पञ्चम परमार्थ पद गायत्री, ज्ञान निर्णय, ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मानन्द अहंकार, इसी ज्ञान देहको ज्योति स्वरूपी कहते हैं। मुक्तिमय ब्रह्ममय सर्व साक्षी।
षष्ठ विज्ञान देह — विज्ञान देह, आकाश स्वरूप है, न उसका रेख है वा रूप है, न उत्पन्न है न मरे, न आवे, न जावे न भीतर न बाहर, अहंकार रहित मान अपमान रहित रूप अरूप हैं तू, वाच्य अवाच्य, इच्छा अनिच्छा, सबसे रहित नहं नत्वं, न मैं कर्ता न मैं भोक्ता, जैसाका तैसा। न जीव न ब्रह्म न भाया। क्योंकि, विज्ञान देहमें ऐसाही विचार होता है।
इस पर कबीर साहिब — इसके आगे भेद हमारा। जानेगा कोई जानन हारा।
कहैं कबीर जानेगा सोई। जापर दया गुरूकी होई॥
सब ज्ञानी और ध्यानियोंकी दौड़ यहां तक होती है, किसीको इसके आगे की सुधि नहीं। विज्ञान देहके आगे केवल एक पद शेष रहता है, उसीके प्राप्त करनेसे यथार्थमें लीन हो जाता है। यह पारख गुरुकी सहायता बिना नहीं प्राप्त होता, यही सर्वोच्च मुक्तिपद है, शेष सब बन्धन हैं। जब जीव अपने सत्य स्वरूपसे पतित हुआ तो इसकी स्थिति इन छः शरीरोंमें हुई इसीमें भटकने लगा। जो कोई विचार पूर्वक स्वसम्बेदको पढ़ता है उसको सब बातोंका सार मालूम हो जाता है। किसी दूसरी किताब या वेदमें नहीं मिल सकता। जब स्थूल शरीरमें आया तो भ्रममें ऐसा अचेत हुआ कि, कुछ भी सुधि न रही कि, मैं कौन हूँ। कहाँसे आया हूँ? किस कारण उत्पन्न हुआ? फिर इसको गुरुआ लोगोंने भटकाया कर्म उपासना और ज्ञानके नाना उपदेश दिये जब अत्यन्त परिश्रमसे अपने ईश्वरको ढूँढ़ने लगा कुछ प्राप्त न हुआ तो कहने लगा कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार वेचून और वेचारा है। कभी तो वेद निर्गुण निराकारकी बन्दना करते हैं। कभी सगुण ईश्वरकी स्तुति करते हैं, न उनको कभी निर्गुणकी सुधि है न कभी सगुणका ठिकाना है। यदि निर्गुण कहा जाय तो उससे सृष्टिका उत्पन्न होना असम्भव है। सगुण कहा जाय तो नाशमान है जो कुछ देखने मुननेमें आता है वो सब विनाशी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादि सब धोखेमें पड़े हैं। इसीमें सब वेद और वाणी बनाई गई जो पर अपने स्वरूपकी सुधि नहीं पाई। पांच तत्व और तीन गुणका जाननेवाला अलग है। इसने पांचतत्व और तीन गुणोंकी कोठरीमें अपना घर बनाया। वेद पढ़ने लगा नानाप्रकारसे निर्गुण सगुणकी उपासना करने लगा। भिन्न २ मतावलम्बियोंने नानास्वरूपोंमें विविध प्रकारसे उपासना आरम्भ की। कोई तीर्थ व्रत, कोई यज्ञ योग, कोई जप तप आदिके भ्रममें पड़े। मुसलमान
समन्वय, विद्याभिमानी जनोंको पता नहीं साधुसे वाक्फल
आदि अन्य धर्मवाले भी उसी सगुण निर्गुणका गुण गाते हैं । जब इस अचेतताकी अवस्थामें यह जीव पड़ा तो महादेव (मुहम्मद) इसके गुरु बने सब जीवोंको उपदेश करने लगे । भ्रमकी वाणी और कलमेका प्रचार किया इसका यही भ्रम पथ दर्शक तथा उपदेशक हुआ ।
हिन्दुओंकी तरह मुसलमान भी भ्रममें — देखो मुसलमानी हदीसोंमें लिखा है आदि उत्पत्तिमें कलमेने लौहपर यह लिखा (इल्लाह लाइला) इसका अर्थ है नहीं खुदा मगर खुदा । पहले शब्द-ला-का अर्थ नहीं, दूसरे शब्द अल्लाह का अर्थ खुदा, तीसरे शब्द-इल्ला-का अर्थ मगर, चौथ शब्द-अल्ला-का अर्थ खुदा । आशय यह कि, नहीं खुदा, मगर खुदा नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा । यही भ्रमका कलमा सब मुसलमान पढ़ने लगे तब उस भ्रमका कलमा पढ़ानेवाला हुआ फिर कलमेने लौहपर उसका नाम लिखा अर्थात् जब महम्मद रसूलिल्लाह प्रगट हुआ तो पूरा महम्मदी कलमा
لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ مُحَمَّدٌ الرَّسُولُ
हुआ जैसे हिन्दू पड़े हुए हैं वैसेही मुसलमान भी भ्रममें पड़े ।
उन दोनोंमें ऐसा सोच और सम वाला कौन है ? जो इस बात पर विचार करे. दोनों भ्रमका कलमा पढ़ते हैं । इसके द्वारा तो कुछ प्राप्त होता है वह सब भ्रम है । नर्क, स्वर्ग और मुक्ति आदि सब भ्रमहीमें हैं सब पूजा सेवा भ्रमहीकी है भक्ति करके भ्रमही लाभ होता है । हानि लाभ सब भ्रम है । जिस कलमेसे लोगोंने अपनी २ मुक्तिका अनुमान किये हैं निर्गुण और सगुण कलमा भ्रम है तो मुक्ति किस प्रकार सत्य ठहर सकती है । इस प्रकार सब मनुष्य भ्रममें पड़े, भ्रमही के ग्रन्थ वाणी और कलमा पढ़ने लगे भ्रमका कलमा पढ़ पढ़ कर भ्रमके घरोंमें पड़ नित्य बन्धे हुये ।
सब भ्रम मात्र — तीनों लोकोंमें भ्रमसे छुड़ानेवाला पारख गुरुके बिना दूसरा कोई नहीं है । जीव तीर्थ, व्रत, वेद पाठ, योग, युक्ति, हृज्ज, रोजा निमाज सिजदा तथा कर्म उपासना, योग ज्ञान आदिक कर थक कर बैठ गया, कुछ हाथ न लगा तो उसने नौकोशोंमें अपना घर बनाया, जिनका वर्णन बिस्तार सहित लिख आया हैं । यहाँ केवल नाम मात्र लिखे देता हूँ, १ अन्नमय कोश, २ शब्दमय कोश, ३ प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, ५ मनोमय कोश, ६ प्रकाशमय कोश, ७ ज्ञानमय कोश, ८ आकाशमय कोश, ९ विज्ञानमय कोश । अब इस जीवने इन्हीं
प्राचीन कालके और आजके महाराजा-ओंके मन्त्री
छः देहों और नौकोशोंमें अपना घर बनाया। येही छः देह और नौ कोशोंतक, जीवकी सीमा ठहरी, किसीमें इसके पार जानेकी सामर्थ्य नहीं, न इसके आगेका समाचार जाननेकी शक्तिही है। इनके ज्ञानका अन्त यहाँही तक है। छः देहसे परे कोई नहीं जा सकता, बरन् इनका भेदभी जाननेवाला कोई कोईही होगा।
१—स्थूल देह पच्चीस तत्त्वकी होती है। वे तत्त्व ये हैं—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, दश इन्द्रिय, पाँच प्राण, चारों अन्तःकरण और जीव जाग्रित अवस्था है।
२—सूक्ष्म शरीर सत्तरह तत्त्वकी है। वे ये हैं—पञ्च प्राण, दश इन्द्रिय, मत बुद्धि और स्वप्न अवस्था है।
३—कारण देह तीन तत्त्वकी है—चित्त अहङ्कार और जीवात्मा, मुषुष्टि-अवस्था।
४—महाकारण देह दो तत्त्वकी है—अहङ्कार जीवात्मा, तुरियावस्था।
५—कैवल्य देह एक तत्त्वकी है—चित्त जीवात्मा तुरियातीत अवस्था जिस प्रकाशमें यह जीव समष्टि रूप था उसीको इसने अपना स्वरूप माना इसका ऐसा मानना भ्रम मात्र है।
हंस देह।
इस शब्दमें कबीर साहिबने बताया है कि, ए महात्माओ ! साहिबके हंसोंका ऐसा रूप हुआ करता है—
सन्तो सुनो हंस तन ब्याना।
अवरण बरण रूप नहीं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥
नहीं उपजे नहीं विनशे कबहूँ नहीं आवे नहीं जाहीं।
इच्छ अनिच्छ न दृष्टि अदृष्टी नहीं बाहर नहीं माहीं ॥
मैं तू रहिन न करता भोगता नहीं मान अपमानी।
नहीं ब्रह्म नहीं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जानी ॥
मन बुधि गुन इन्द्रिहु नहीं जाना अकह अलख निर्बाना ॥
अकह अनेह अनादि अभेदा निगम नेति फिरि जाना ॥
तत्वरहित रविचन्द्र न तारा नहीं देवी नहीं देवा।
स्वयं सिद्धि प्रकाशक कह्यो है नहीं स्वामी नहीं सेवा ॥
हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे।
नहीं आगे नहीं पीछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥
निज प्रकाशमें आप अपन पौ भूली भये विज्ञानी।
भूलके न लजाना ठन ठनाना ही हैं, हजरतईशाको साधुका आशीर्वाद, मुहम्मद साहिबको राहिबका आशीर्वाद
उन्मत्त बाल पिशाच मूक जड दशा पञ्च यह लानी ॥
खोय आप अपन पौ सर्वश निज रूप नहि जानी ।
फिर कैवल्य कारण महकारण सूक्ष्म स्थूल समानी ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महकारण कैवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट यहि हेरफेरमें कतहूँ नहि कल्याना ॥
कहें कबीर सुनोहो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा ।
जेहिते आप अपनपौ जानों मेटो खटका रैसा ॥
साहिबके हंस ऐसेही होते हैं उनकी देहके ये ही गुण क्यों ऐसेही अनेकों गुण होते हैं कोई छटे देहको ही हंसोंका देह मानते हैं यह उनकी भूल है तुमको हंस देह न प्राप्त होगी । जिसको तुमने हंस देह अनुमान कर रखा. वो तुम्हारी भूल और भ्रम है । सद्गुरुकी दया बिना हंसका स्वरूप नहीं प्राप्त हो सकता । हंस रूपके अकथ गुण हैं ।
पाँचों भूमिकाओंके नाम—गता भूमिका, अगता भूमिका, प्राप्ति भूमिका, समता भूमिका, शुद्धि भूमिका ।
पांचदेहके नाम—स्थूल, सूक्ष्म कारण, महाकारण और ब्रह्मरन्ध्र ।
पाँचों वाणियोंका नाम—परा, पश्यन्ति, मध्यमा, वैखरी, और अन्ूपम ।
सर्व मनुष्य अपने २ धर्म—मजहब—और गुरुकी प्रशंसा करते आते हैं, सब कहते हैं कि, हम बड़े, हम बड़े, हमारा गुरु बड़ा, हमारा मजहब बड़ा । यही चरचा चारों ओर फैल रही है अपने २ रङ्गमें सब मस्त हो रहे हैं ।
बीजकका शब्द ।
सबही मदमाते कोई न जाग । सङ्गहि चोर घर मूसनलाग ॥
योगी माते धरि धरि ध्यान । पण्डितमाते पढ़ी पुरान ॥
तपसी माते तपके भेव । सन्यासी माते करी हमेव ॥
मुल्ला माते पढ़ि मसहा । काजी माते करि इनसाफ़ ॥
संसार मति मायाके धार । राजामाते करि हंकार ॥
माते शुक्र देव ऊधो अकरूर । हनुमत माते ले लंगूर ॥
शिवमाते हरि चरणन सेव । कलमा माते निमाजके भेव ॥
सत्य सत्य कह स्मृतीवेद । जस रादण मारे घरके भेद ॥
चञ्चल मनके येहि काम । कहे कबीर भजु सत्य नाम ॥
मद कहिये जिसमें यह जीव मत्त होजावे आगे कुछ न सूझे सब मत्त होकर अचेत होगये मन चोरने सबको लूटा । धैर्य, दया, शील, विचार और सत्य
आदि धनको चुरा लिया। चोरको कोई नहीं पहचानता। सबके साथ रहके लूटता रहता है। पर उसको कोई नहीं पकड़ता। किस किस मदमें कौन कौन मस्त हुये यह सुन लो पहले योगके मदमें शिव गोरख आदि मस्त हुये, उसीमें अचेत होगये, योग क्रिया करते और उन मुनी ध्यान धरते धरते सब अचेत हो गये पारख पदको न पहुँचे। जब पिण्ड और ब्रह्माण्डका नाश हुआ तो योग क्रिया भी नाश होगई। देह छूटी योगी गर्भको प्राप्त हुये। दूसरे, विद्यामें व्यास आदि सर्व पण्डित मस्त हुये। तीसरे, तपके मदमें तपस्वी लोग मस्त हुये। मरकर बनके पशु बनें। चौथे, लोग ब्रह्माण्डका ध्यान करते हैं वे ब्रह्माण्डके संकल्पसे मरकर पक्षी होजाते हैं। पाँचवें, पुराणके अभिमानी लोग गीदड़ हुये। छठे, संन्यासी जो ब्रह्माका दृढ़ संकल्प करते हैं वे भ्रमरूप हो आवागमनमें रहेंगे। कोई भक्तिके मद कोई रूप, कोई बल, कोई धन आदि अनेक भेदोंमें मस्त हो रहे हैं। अपने मनमें अभिमान रखते हैं कि, मैं पूर्णताको पहुँच गया हूँ। इसी तरह सब मस्त हो रहे हैं एक दूसरेको कुछ नहीं समझते। सब कहते हैं कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। जिसने चार पुस्तकें पढ़ली वह जानता है कि, मेरे तुल्य दूसरा कोई नहीं, मैंही सबसे बड़ा बुद्धिमान हूँ, पुस्तकोंके न पढ़नेवाले मूर्ख हैं। जो जिसका उद्यम है जिसको जो हुनर आता है वह उसीमें मस्त हो रहा है, दूसरोंको तुच्छ समझता है। यही मत्तपना अज्ञानी होनेका कारण है। यदि जीव अपने रूप पर न इत-राता उसके आनन्दमें अचेत न होता तो विषय वासनाका बगला न बनता। जब तक इसमें भक्ति न आवे और भली प्रकार अहंकार न छूट जावे तब तक प्रकाशका मार्ग न मिलेगा। सच्चे सन्तोंकी सेवा और सङ्गति तो सन्तोंकी दयासे साहबकी कृपा हो, नहीं तो सतसङ्ग बिना दरदर भटकता फिरता है।
गजल — भटकते कोह दामों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता।
कभी जंगल व्याबों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जो ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादि उसके बहर कुदरतमें।
है खाते गोता समान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
चौरासी सिद्ध नौ नाथो अबस तदबीर जम द्वारे।
पड़े जँजीर दरमों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यती जङ्गम समाधी सिद्ध सन्यासी सती सूरै।
हैं फिरते सब परीशों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
वली अल्लाह गौसो कुतुब काज़ी पीर पैगम्बर।
है सबकी अलक हैरों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
योरोपमें साधुओंका दान, पादरियोंकी हंसी, जान मिल्टन साहिबका कथन
चले यह चर्ख चक्की और दले जाते बनी आदम ।
तले गदूर्नगर्दा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
कोइ रोजा निमाजो तीर्थो हज्जो हजाज़ी है ।
हिर्म दैरौ खरामौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े कुरआन पोथी है सोसारी बात थोथी है ।
हर्फ एक नाम सुबहौ कुछ नहीं बनता ॥
उठाते पाँव आगे को पड़े एकदाम पीछेको ।
हुआ आदमको खफ़कान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यहूदी और नसारा है कोई गुरु पीर प्यारा है ।
कोइ हिन्दू मुसलमानौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े हैं वेद बानी सारै खाते गोता पानीमें ।
अमीके बहर पैमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
हुआ इल्मों अमल सारा, मुआ तौ भी अजल मारा ।
हो अगर इल्म उर्फा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यह मलकुल मौत घेरा है करे जिस जाय फेरा है ।
हरदो कून हिरमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जफाये चर्ख बर मन दर कफाय शख्त दुश्मन है ।
वफाय यार फर्मा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
बचशमें जाहिरो बातिन लिया यह देख आजिजने ।
बुजुज मुशिर्द मिहरर्बा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
कबीर साहबकी साखी ।
बैठा रहे सो लानियाँ, खड़ा रहे सो ग्वाल ।
जागत रहे सो पाहूर, तेहि धरि खायो काल ॥
इसी प्रकारसे सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भर गई । मनुष्यके बन्धन का कारण यही है, इसीके कारण सब मनुष्य आवागमनमें रहते हैं । इसी मन शत्रुका सब छल है । इसीने सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भरी है । इसीके फन्देमें सब बँध रहे हैं ।
नज़म - वारब यह देह क्या बला है । है झूठ और बरमला है ॥
जो रिश्तः रहते शिकत है । सब रंजको गंज पंज तन है ॥
जो लेवे क्रार पंजके धार । दीदार तो यार हो पदीदार ॥
है कर्जको फर्ज मर्दों जनमें । आदम न अदा हुआ अदनमें ॥
आफ़त है प्रसाफ़त यह नौ कोश । दोजख़ है किसी किसीको फिर दौस ॥
कोई बन्दः हुआ कोई मौला । मफलूक है कोई शुजाअ दौला ॥
राहत नहीं जीवकी जराहत । मुफ़लिस हुआ छोड़ वादशाहत ॥
हिर्स हैवान रुख़ रवाँ हो । यह खुमस ख़वीस दिले दवाँ हो ॥
दिलदार हिला मिला न दिलदार । को गौहर जोहरी खरीदार ॥
क्या जाने कोई भेद अन्दर । बन्दर है बदस्त दिल कलन्दर ॥
जेरीं व ज़बर खबर से मसरूर । महबूव से डूब के हुआ दूर ॥
गुफ़लत में गरकी गीते जन है । खुश हो कि मेरा कमाल फ़न है ॥
यह उजुव अजब अमक़ि दरिया । सद औज के मौज मय लहरिया ॥
खुद करदः से खुद ऊपर सितम है । जाने के मेरा यह जाम जम है ॥
बातिल को रास्त कर कहे जब । यह इल्म के जेल्ह है मुरकब ॥
भर जाम पिलादे मेरे साक़ी । फिर कोई हवस रहे न बाकी ॥
जा बैठे जो तेरे अनजुन में । सदहा गुल वे लाला जिस चमनमें ॥
हर सिम्त बहार है गुलो मुल । दिल दौरे जहाँ न आव कुल कुल ॥
जह पहुँचे न शेख कुत्बो काज़ी । दिल हलक्का के बीच सब है राज़ी ॥
मक़बूल होय हवस है दिल में । फिर आन फँसे है आबो गिल में ॥
पर बाल न हाल मन गरीबी । क्यों कर करे मेरी तबीबी ॥
तू बन्दः निवाज़ बन्दः परवर । सब औलिया अम्बिआय सरनर ॥
जा पहुँचे जो अपनेही वतन में । फिर आवे कभी न सो वतनमें ॥
जब तक लगे न वह यारका रंग । कर जंग वजहाद नफ़सके संग ॥
जान करदे निसार माल क्या माल । हक्क तेरा यही कभी बहर हाल ॥
दिल देश भदेश भेष दे छोड़ । सब लागसे बाग अपनी को मोड़ ॥
तब देख तमाशा सब जो अपना । हर कूनो मकान मिसल सपना ॥
धर्मकी खोज ।
जब यह जीव अपने स्वरूपको भूलकर भ्रममें पड़ा योगी, जड़म सेवड़ा आदिकके निकट गया, उनको गुरु मानकर उनसे उपदेश लेने लगा, तो उन्होंने कपट करके नानाप्रकारके कम्मेंमें लगाया, उन नानाप्रकारके महात्म सुनाये; जिससे इसके मनमें लोभ उत्पन्न हुआ बुद्धिने उनके वचनपर विश्वास दिलाया । निश्चय हो जानेसे अहङ्कार दृढ़ हो गया । इसको यह पक्षपात उत्पन्न हुआ कहने लगा मेरे तुल्य कोई नहीं मेरा मत सबसे उत्तम है, मेरी मुक्ति सबसे पहले होगी । इसी प्रकार ज्ञानी और ध्यानी घोखेमें पड़े बार बार जनमते और मरते रहते हैं,
साधु फकीरीकी हंसी सच्चे साधुओंके लुप्त होनेका कारण, संग्रह विश्वमित्र
गुरुआ लोगोंने जो मिथ्या विचार बतलाया उसको इस प्रकार दृढ़ कर सत्य मान लिया, उसपर ऐसा दृढ़ विश्वास किया कि, पारख पदको समझाया जाय तो कोई नहीं मानता । जैसे किसीने एक काँचके टुकड़ेको हीरा समझा। बुद्धिने निश्चय करा दिया कि, यह अमूल्य रत्न है इसी मिथ्या विश्वासमें आनन्द मानता रहा । यदि कोई अपनी मूर्खतासे पत्थरको रोटी समझले तो भूखके समय वह काम न आवेगी । जिस समय गुरुआ लोगोंने निकट गया तो उन्होंने नाना प्रकारकी मुद्रा आदि बतलाई, इसने उन्हें बड़े अनुरागसे धारणकर अभ्यास करने लगा । त्राटक करके दृष्टिको एक स्थानमें जमाकर देखने लगा । ऐसा परिश्रम किया कि, पलक न झपके । कुछ देर इस प्रकार देखनेसे पित्त ऊपरको चढ़ा नाना प्रकारके रङ्ग व चकचकाहट दीखने लगे, दृष्टिमें नाना प्रकारके रूप आने लगे । अब और भी अनुराग बढ़ा कि, रात बहुत परिश्रमसे अभ्यास करने लगा । पित्त भी शनैः शनैः बढ़ते बढ़ते यहाँ तक बढ़ा उसकी ऐसी गर्मी फैली कि, उस पर कचेतता प्रगट हुई । अपना आप भूलकर अचेत होकर गिर पड़ा । फिर जब चित्त शान्त हुआ चेत आया तो कहने लगा मैंने समाधि लगाई, गुरुजीकी बड़ी कृपा हुई कि, निर्गुण अलख ब्रह्मको लखा दिया, सहज समाधि उनमनीमें लगा दिया, जिससे सहजानन्दको पहुँचा आत्मा पर प्रमात्माकी एकता हुई यह यथार्थमें भ्रम है, केवल अपनीही कल्पना द्वारा पित्तमें विकार आनेसे अचेतता होगई थी । इसी प्रकारके धोखेमें बड़े बड़े योगी विद्वान् साधु आदिक फँसे हैं, पारख पदकी ओर ध्यान न देनेसे सत्य पदसे वञ्चित रहते हैं ।
जो स्त्री इस जीवकी झाईसे प्रगट हुई थी उसीके साथ यह पागल बना, उसीके संयोगसे एकसे अनेक हुआ, यह न समझा कि मैं जिसको ब्रह्म ठहराता हूँ वह केवल मेरी छाया है, सत्य नहीं भ्रम मात्र है ।
जो लोग विराट पुरुषको साधते हैं वह दूसरा कुछ भी नहीं केवल उसीकी छाया है अपनी ही छाया अपना गुरु बनकर अपनेको सिखलाती है । अपनीही छायाका सिखलाया हुआ सिद्ध बनता है । इसी प्रकार सारा संसार अपनी छायाकी पूजा करता है । इसीकी छाया इसके ऊपर ईश्वरी करती है, उसीका दास बनकर उसीका भजन करता है, भ्रमकी ही सेवा भक्ति है, भ्रमकी ही मुक्ति प्राप्त होती है । जीव क्या है ? इसका भ्रम क्या है ? ब्रह्म जीव और ईश्वर क्या है ? यह अपने भ्रमसे सब कुछ हो गया है यही एक है यही अनेक है इसीके भ्रमने इसको बन्धनमें डाला है । सब सिद्ध साधु भ्रममें पड़े हैं भ्रमसे छूटने की औषधी नहीं मिलती । केवल एक कल्पित नाम ठहरा लिया है ।
सांबर
यदि ब्रह्मको निर्विकल्प कहा जाय तो अन्तःकरणका गम नहीं, यदि सविकल्प कहा जाय तो चित्तका विषय है। यदि ज्योंका त्यों माना जाय तो बुद्धिका विषय है। द्वैत मनका विषय है। देहाभिमान अहङ्कारका विषय है। यदि आनन्द आदि कहो तो वायुका विषय है, रूप प्रकाश ठहरावे तो अग्निका विषय है। रस, प्रेम आदि जलका विषय है। गन्ध सर्वदेशी माने तो पृथिवीका विषय है यदि इन सबको ब्रह्म बतलावे तो यह सब तुच्छ हैं, इस कारण जब देह छूटेगी तब अवश्य गर्भको प्राप्त होगा। जहां मन बुद्धि और किसी इन्द्रियकी पहुँच नहीं वहां ब्रह्मकी किस प्रकार खोज हो? न कहीं ब्रह्म है, न कहीं ईश्वर है, यह सब जीवके संकल्प हैं, जीव सत्य है सब झूठ है। जैसे २ यह आगेको संकल्प करता गया उसी प्रकार भ्रम भी बढ़ता गया, जिससे भिन्न भिन्न निश्चय होते गये, जहां पर यह थक कर बैठ गया, आगे खोज करना बाकी न रहा, वहां ब्रह्मका संकल्प करके बैठ गया। उसीको ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करके अपने विचार विवेक और खोजको समाप्त कर दिया उसीको अन्त पद समझ बैठ, ऐसेही यह चौरासीमें पड़ा है।
तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान है और त्वं पद दो प्रकारका ज्ञान है अस्ति पद दो प्रकारका विज्ञान है। तत्-त्वं-और-अस्ति, यह तीनों पद भ्रम रूप हैं। इन तीनोंसे भिन्न चौथा पद पारख है। जिसके द्वारा इस जीवको अपना शुद्ध स्वरूप दृष्ट आता है वह उनसे अलग है सो पारख गुरु इसको उन तीनों पदोंके भ्रमको नष्ट कर देता है। जब तक यह जीव पारख गुरुको नहीं प्राप्त होता तब तक सात ज्ञान और सात अज्ञान भूमिकामें भटकता फिरता है।
अज्ञानकी सात भूमिका।
१ अशुचि जाग्रत, २ जाग्रत, ३ महा जाग्रत, ४ स्वप्न, ५ स्वप्न जाग्रत, ६ स्वप्न, ७ सुषुप्ति। ये सात अज्ञानकी भूमिकाके नाम हैं।
१ अशुचि जाग्रत भूमिका—उसे कहते हैं जिसमें जीव पूरा अज्ञानतामें फँसा होता है, जगतको सत्य समझता है शरीरके पोषण पालनको अपना कर्तव्य जानता है।
२ जाग्रत भूमिका—वह है जिसमें जीवको देहाभिमान, वर्णाभिमान, जात्याभिमान, विद्याभिमान तथा रूप और बलका विशेष अहंकार होता है।
३ महाजाग्रत भूमिका—में प्राप्त जीवको यह अहंकार होता है कि, लोक परलोकमें कुछ कर सकता हूँ, मुझमें अमुक प्रकारकी कला कौशल है गुणविद्यामें पूर्ण हूँ अमुकके ऊपर अधिकार धराता हूँ आदि।
पठित मूर्ख, हजरत ईसाकी वाणी
४ जाग्रत स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें जीव ऐसा समझता है कि, जो कुछ मैं जानता बूझता हूँ वह सब सत्य है। जो कुछ दूसरे करते हैं वह सब असत्य हैं। मनुष्यको ऐसे समझना चाहिये, जैसे ज्वरकी अधिकतासे मदिराको जल समझता हो।
५ स्वप्न जाग्रतवाला जीव—जो स्वप्न देखता है उसे ज्योंका त्यों याद रखता है।
६ स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें प्राप्त हुआ जीव देखे हुये स्वप्नको भूल जाता है।
७ सुषुप्ति—गाढ़ निद्राके समान अचेताको कहते हैं।
अज्ञानकी इन सात भूमिकासे अपनेको बचाना, उनके फन्देसे बाहर होना इनके बदले सात ज्ञानकी सात भूमिकाओंकी इच्छा और उन्हींके लिये प्रयत्न करना उचित है।
ज्ञानकी सात भूमिकाएँ।
१—शुभइच्छा, २—स्वविचारना, ३—समानता, ४—शिशिरान्ति, ५—असंशक्ति, ६—पदार्था भाविनी, ७—तुरिया ये सात ज्ञानभूमिकाएँ हैं।
१ शुभ इच्छा भूमिका—उसको कहते हैं जिसमें प्रवेश करनेसे शुभ कामना उत्पन्न होती हो अज्ञानताको दूर करनेकी इच्छा होती है, ज्ञान और मुक्ति प्राप्त करनेकी सच्ची अभिलाषा होती है, अपनी बीती हुई आयु और किये हुये अशुभ कामोंके ऊपर पश्चात्ताप होता है। कुसङ्गतिसे दूर भागता है शास्त्र विहित शुभ कर्मोंमें लग जाता है।
२ स्वविचारना भूमिका—मैं मनुष्य जब पहुँचता है उस समय यह सत्सङ्गति और शुभकर्मोंको खोजकर उनमें प्रविष्ट हो जाता है।
३ समानता अर्थात् तनुमानसा भूमिका—मैं पहुँचनेपर संसारसे वैराग्य हो जाता है, विषय वासनाको मिथ्या दुःखदाई समझकर उससे विरक्त हो जाता है। वैराग्य करके सब प्रकारके सुखोंको तुच्छ जान ईश्वरमें निमग्न हो जाता है।
५ असंशक्ति भूमिका—मैं पहुँचकर ईश्वरमें भी अधिक निमग्नता होती है।
६ पदार्थाभाविनी भूमिका—मैं पहुँचकर ऐसी दशा हो जाती है कि, बड़े परिश्रमसे दूसरे के जगानेसे आगता है नहीं तो ध्यानमें मग्न रहता है।
७ तुरिया भूमिका—इस भूमिका—मैं पहुँचनेपर दूसरोंके जगानेसे भी नहीं जागता, गुप्त प्रगट ब्रह्ममें लय हो जाता है।
स्वामी रामानन्द वचन, नानकवचन
इन सात ज्ञान और अज्ञान भूमिकाओंका बहुत विस्तृत वर्णन है, यहाँ नाम मात्रही लिखा गया है।
माया दो प्रकारकी है, एकका नाम विद्या और दूसरीका नाम अविद्या है। इन्हीं दोनोंमें सारा ब्रह्माण्ड फँसा हुआ है। विद्याकी दशामें जीव परम ऐश्वर्यको प्राप्त हो, अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति पालन और नाश किया करता है। अविद्यामें सारे जीव बन्धे हुए हैं। यही जीव ईश्वर है और यही जीव है। ज्ञानकी न्यूनता और अधिकताके कारण भिन्न भिन्न नाम हैं। उपरोक्त ज्ञानकी सात भूमिओंमें प्रथमकी तीन भूमिकाएं साधकोंकी हैं शेष चार भूमिकाएं जीवनमुक्तकी हैं। प्रथम तीन भूमिकाओं को जीवकी भूमिका भी कहते हैं इन सबमें भिन्न भन्न अवस्था प्राप्त होती हैं।
इन्हीं सात ज्ञान और अज्ञान की भूमिकाओंमें सब स्वामी सेवक बँधे हुये हैं। इनसे कोई बाहर नहीं है। यहीं तक अपरा विद्याकी पहुँच है।
हंस देहका विशेष वर्णन।
अद्यापि जीवके उन शरीरोंका वर्णन किया जो कि, सत्य स्वरूपसे पतित होनेपर प्राप्त होते हैं। सत्य स्वरूपसे पतित होनेपर उन्हीं छः देह नौकोश और पांच अहंकारोंमें जीवकी स्थिति होती है। ये सब देह और कोश आदि नाशमात्र भ्रममान हैं अब अविनाशी, स्थिर, सत्य सुखमय हंस देहका वर्णन सुनो। हंस देहमें पक्के पांच तत्व और तीन गुण होते हैं, कच्चे और पक्केकी समानता करके देखो उनको ऊपर ध्यान दो।
हंसदेहके पक्के तत्व।
१—धैर्य्य, २—दया, ३—शील, ४—विचार, ५—सत्य ये पांच पक्के तत्वोंकी पक्की देह थी, इन्हींसे हंस देह बनती है। अब इनका त्रिगुण सुनो। सत्य और विचारका गुण विवेक, शील और दयाका गुण गुरु भक्ति साधु भाव और धैर्य्यका गुण वैराग्य।
इन्हीं पक्के पांचतत्व और तीन गुणोंमें जीवका वासा था, अब इनकी पचीस प्रकृति सुनो।
धैर्य्यकी पांच प्रकृतियां—१—झूठका त्यागना, २—सत्यका ग्रहण करना, ३—संशय रहित होना, ४—अचल होना, ५—अहंकार नाश करना ये पांच हैं।
दयाकी पांच प्रकृतियां—१—अद्वोह, २—समता, ३—मैत्री ४—निर्भयता, ५—समर्दशिता ये दयाकी पांच प्रकृतियां हैं।
शीलकी पांच प्रकृतियां—१—क्षुधा निवारण, (तितिक्षा)—२—प्रिय
प्रह्लाद वचन, फिक्रिया सिद्धान्त, शिष्टका वचन विद्याभिमानियोंका आधार
वचन, ३—शान्त बुद्धि, ४—प्रत्यक्ष पारख ५—प्रत्यक्ष सुख ये शीलकी पांच प्रकृतियां हैं ।
विचारकी पांच प्रकृतियां—१—अस्ति नास्तिपदका निर्णय करना, २—यथार्थ ग्रहण करना, ३—व्यवहार शुद्ध रखना, ४—शुद्धभावना रखना ५—सच्चि तता (ज्ञान और विज्ञानकी प्राप्ति) करना ये हैं ।
सत्यकी पांच प्रकृतियां—१—निर्णय, २—निर्बन्ध, ३—प्रकाश, ४—स्थिरता, ५—क्षमा । इन्हीं पांचतत्त्व और तीन गुणों और पचीस प्रकृतियोंकी देह थी । इस शरीरमें यह ेवे परवाह और बन्ध रहित था । ने कोई इच्छा थी न विषयवासनाका बन्धन एव न पशु वृत्तिही थी, बरन इसका बड़ा प्रभाव और प्रकाश था । जब इसने अपने प्रकाशको देखा तो सोचने लगा कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं, मेरा रूप और गुण अनुपम हैं । ऐसा संकल्प होतेही इसको परम आनन्द प्राप्त हुआ, उस आनन्दमें यह अचेत हो गया, अपने आपकी कुछ भी सुधि नहीं रही । इसी अचेता अवस्थाका नाम ब्रह्म सच्चिदानन्द रख लिया । यह महान् सुषुप्तिकी अवस्था थी । जब यह ऐसी सुषुप्तिकी अवस्थामें आ अचेत हुआ तो इसके पक्के तत्व गुण और प्रकृति आदिक सब पलट गये । पक्कीसे कच्ची देह होगई ।
स्थूल देह ।
पाँच कच्चे तत्व तीन गुण और पचीस प्रकृति—धैर्यसे आकाश उत्पन्न हुआ, दयासे वायु निकल पड़ी, शीलसे अग्नि प्रगट हुई, विचारसे जलका प्रादुर्भाव हुआ, सत्यसे पृथिवी बन गई, पक्के तत्वसे बने हुये येही कच्चे तत्व हैं । इनके तीन गुण ये हैं—पृथिवी और जलसे सतो गुण हुआ, अग्नि और वायुसे रजोगुण हुआ, आकाशसे तमोगुण स्थित हुआ । उन्हीं पाँच तत्व और तीनों गुणोंका मेल होकर पचीस प्रकृतियाँ प्रगट हुईं ।
कच्चे तत्वकी पचीस प्रकृतियाँ—१ आकाशकी पाँच प्रकृति १ काम, २ क्रोध, ३ लोभ ४ मोह, और ५ भय ।
२—वायुकी पाँच प्रकृति—१ चलना, २ बोलना, ३ बल करना, ४ सकोचना और पसरणा ।
३—अग्नि तत्वकी प्रकृति—१ आलस्य, निद्रा, ३ भूख ४ तृषा और ५ जम्हुआई ।
४—जलकी पाँच प्रकृति—१ रक्त, २ मूत्र, ३ प्रसेब, ४ लार और ५ बिन्द (बीर्य) ।
बुल्लेशाह और शरई
५—पृथिवीकी पाँच प्रकृति—१ अस्थि, (हाड) २ मांस, ३ नाड़ी, ४ चर्म, (त्वचा) ५ रोम ।
इन्हीं तत्व गुण और प्रकृतियोंकी कच्ची देह बनी है इस कारण इसका देह हुआ । हंस देहसे उलटी यह स्थूल देह उत्पन्न हुई, इसी को मनुष्य नामक स्थूल देह कहने लगे इसके प्राप्त होतेही अहंकार उत्पन्न हुआ, इसने अपनेको सबका स्वामी समझा । सुषुप्तिसे उत्थित होतेही दृष्टि उठाकर देखनेसे अपनी छाया दीख पड़ी, वह स्त्रीके स्वरूपमें स्थित हुई । उसीका नाम इच्छा हुआ । यह कामनाओंसे भरी हुई है । यह जीव एकसे दो हुआ इसी कारण नाम ब्रह्म और माया हुआ । दोनोंके संयोगसे स्त्रीको गर्भ रहा उससे तीन पुत्र उत्पन्न हुये, ब्रह्म अन्तर्धान हुआ ।
स्थूल सृष्टि ।
इस जीवसे मन उत्पन्न हुआ, ज्योति मनसे हुई, ज्योतिसे तीनों गुण प्रगट हुए. रजोगुण ब्रह्मा, सतोगुण, विष्णु, तमोगुण शिव हुआ. इस प्रकार यह जीव पक्केसे कच्चा हुआ । पीछे चौरासी लाख योनिकी कल्पना की । आपही आप सब योनियोंमें प्रवेश कर रहा है, आपही जगत है आपही ईश्वर है । अज्ञानताके कारण अपने आपको नहीं जान सकता । अविद्याके भवचक्रक्रममें पड़कर अन्धकारमें बन्ध हो गया । अज्ञान हुआ, अब व्याकुल होकर विचार करने लगा कि, मेरा कर्त्ता दूसरा कोई है । भिन्न कर्त्ताके निश्चय करतेही मिलनेकी इच्छा बढ़ी । अब तो जप, योग, तप आदिक नाना प्रकारकी युक्तियाँ करने लगा पर सफलता नहीं हुई । कुछ तेदेख नहीं पड़ा, तो कहने लगा मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है । वह बेचून बेचरा किसी प्रकार जाना नहीं जा सकता । उसी बेचून बेचराके वर्णनमें सर्व वेद, शास्त्र ग्रन्थ, किताब आदि बनाए । ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी उसकी पहचान नहीं हुई । कभी कहता है निर्गुण, कभी कहता है सगुण ऐसे भ्रम और धोखेमें पड़ा । यह तो हिन्दुओंका सिद्धान्त हुआ ।
मुसलमानोंका सिद्धान्त सुनो अर्थात् नहीं खुदा, है खुदा, सब धोखे और भ्रमका कलमा पढ़ने लगे ।
इस प्रकारसे जगतसे ईश्वर, ईश्वरसे जगत्, ऐसे नाना सिद्धान्त बनने लगे । सब मनुष्य भ्रममें पड़कर अविद्याके अन्धकारमें भटक रहे हैं । किसीको कुछ भी नहीं सूझता न पता लगता है । इस जीवको कहीं शान्ति नहीं मिलती सब प्रकार दुःखही दुःख उठा रहा है ।
यदि किसी पर विश्वास करे तो उसका खण्डन हो जाता है, न विश्वास
मूतकाचार्योंके शिष्य, उपदेशके अयोग्य
करे तो नष्ट भ्रष्ट होता है, किसी प्रकार सुख नहीं मिलता । यह इस प्रकार आवागमनके रहटमें पड़ा कि, कभी ऊपर जाता तो कभी नीचेको पतित होता है, कभी तो ब्रह्म सच्चिदानन्द बन जाता है, कभी महान् दरिद्र नीच अवस्थाको प्राप्त होता है । किसी प्रकार शान्ति नहीं मिलती, न श्रेय पदको प्राप्त होता है । सदा बन्धनमें ही पड़ा रहता है ।
इसने सहस्रों युक्तियों की तथा करता जाता है, इस कारण इसने नवधा भक्ति, योग युक्ति, षट् दर्शन, छयानबे पाखण्ड आदि नाना प्रकारके मार्ग प्रगट किये, सहस्रों प्रकारके धर्म और मजहब स्थित किये । अनन्त सिद्ध, साधु, पीर, पैगम्बर, औलिया, अम्बिया बीत गये । किसीको अपने यथार्थ स्वरूपमें मिलनेकी राह न मिली । एक दूसरेसे कपट छल करके धोखेमें डाले देते हैं, स्वयं अन्धे बने हैं दूसरोंको मार्ग बतलाते हैं । अन्धे अन्धेको राह बतावें तो दोनों मुंहके बल गिरे । एक राह भूला हुआ पुरुष दूसरेका पथदर्शक बने तो उसकी जैसी गति होगी, वैसेही नाना प्रकारके मतवादियोंकी है । यथार्थमें किसीको मालूम नहीं होता कि, सत्य और असत्य क्या है ?
प्रपंचसे छूटनेके साधन ।
जो कोई सन्त गुरुकी सेवा करे, जिसपर सत्यगुरुकी दया हो उसी पर सत्य परमात्माकी भी कृपा होती है, जिससे पारख गुरुकी प्राप्ति होती है, पारख गुरुके प्राप्त होतेही सब भ्रम और धोखे नष्ट होकर सत्य पदकी प्राप्ति हो जाती है, अपने सत्य स्वरूपको पा लेता है और जहांसे पतित हुआ था उसी स्थान पर फिर पहुँच जाता है ।
पक्के तत्त्वकी प्राप्ति—जब यह जीव पारख पदपर स्थित हो जाता है तो इसके एक अनेकका भ्रम नष्ट हो जाता है । सब दौड़ धूप छूट जाती है, पारखसे ही मन और बुद्धि स्थिर और शुद्ध होते हैं । इसका आवागमन दूर होता है । पक्के तत्त्वकी प्राप्ति होती है । कच्चे तत्त्वका सम्बन्ध छूटता है, पारख गुरुसे मिल कर गुरु रूप हो जानेमें कुछ भी सन्देह नहीं रहता ।
हंस कबीर और दूसरोंमें भेद—हंसदेह तथा पक्के और कच्चे तत्व पर ध्यान देकर विचार करनेसे प्रगट होगा कि, हंस कबीर और दूसरोंमें क्या भेद है ? हंस कबीर सब विषय वासनाओंसे मुक्त होते हैं । दूसरे विषयके बन्धनसे बाहर नहीं हो सकते, सहस्रों युक्तियों किया करते हैं पर बन्धनमेंही पड़े रहते हैं । चौरासीके जीवको सत्यमार्ग नहीं मिलता, अब अचेत हैं । लोगोंका सत्यमार्ग नहीं ऋषि मुनियोंको यह बात स्वप्नमें भी प्राप्त नहीं होती कि, यथार्थ क्या है ?
प्रामाणिकता—यह बचन सत्यगुरु सत्य कबीरका ज्यों का त्यों अनुवाद किया है। जिस किसीको परमात्माने दूरदर्शिता शुद्ध और सूक्ष्म विचार तथा तीव्र बुद्धि प्रदान की हो वही विचारे और समझेगा। जब खूब समझ जायगा तो उसे ज्ञान हो जायगा कि, स्वसम्बेदको और किताबों पर किस प्रकार श्रेष्ठता है? इसमें कौसी सूक्ष्म और अगम्य बातें लिखी हैं, जिससे सारा संसार अचेत है जिसके पथदर्शक था उपदेशक केवल हंस कबीरही हैं।
कथन—कबीर साहब कहते हैं कि, जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा उसकी दशा बाल, मूक, जड़ और पिशाचके समान हुई। यह पतित होकर इन अवस्थाओंमें पड़ा अपने सत्य स्वरूपको एकदम भूल गया। इस बातकी तनिक भी सुधि न रही कि, मैं पहले क्या था और अब क्या हो गया हूँ।
समस्त संसार और उसके कार्य—जब यह इस प्रकारसे उन्मत्त हुआ एकसे अनेक हो गया, नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प होने लगे, नानारूप दृश्य आने लगे, जिस प्रकार पागलोंको भ्रम करके नाना प्रकारके स्वरूप दिखाई देते हैं वह उनसे लड़ता झगड़ता और बकबाद किया करता है। एकको सत्य दूसरेको असत्य ठहराता है, एकको छोड़ता है दूसरेको ग्रहण करता है इस प्रकार अनेकोंको ग्रहण करता और छोड़ता है, स्थिर नहीं होता। अपने जाननेमें पागल होशमें अच्छाही करता है। पर सचेत और बुद्धिमान् पुरुषोंके जाननेमें वही पागल होता है। ज्ञान सुषुप्ति और अज्ञान सुषुप्ति दोनों उन्मत्त अवस्थाही हैं, इसी प्रकार तत्त्व-मसिके तीनों पद झूठे हैं, जो कुछ यह कहता और सुनता है सब उसी प्रकार निर्मूल होते हैं कोई ठीक नहीं। यावत् मतमतान्तर हैं सब ऐसेही भ्रमके ऊपर खड़े हैं। जिस अवस्थामें यह संसारही अचेततामें रचा गया है तो उसके कर्म और वाणी बचन सब वैसेही भ्रम और अज्ञान संयुक्त होंगे, उनका माननेवाला बुद्धिमान् विद्वान् अथवा सचेत नहीं समझा जा सकता। इस कारण यह संसार अचेत और अज्ञान है, इसके सारे कार्य अचेतताके ही हैं।
निर्गुण सगुण भ्रम—यह जितना योग, युक्तियाँ, यज्ञ, जप, तप, भजन, भक्ति आदिक करता है सबका यही परिणाम है कि, ब्रह्म सच्चिदानन्दके पदको पहुँच जावे पर हंस देह नहीं पा सकता, इसकी समझमें यह बात नहीं आती इस संसारमें जितने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर हुये हैं और होंगे किसीमें यह सामर्थ्य नहीं कि, वह यथार्थ पदको बतला सके; सबके सब सगुण निर्गुणमें पड़े हुये हैं, निर्गुण और सगुण सब भ्रम और धोखा है सब इसी निर्गुण और सगुणके बन्धनमें रहा करते हैं, इससे बाहर निकालनेवाला कोई सत्य पथ दर्शक नहीं दीखता।
परमात्माके तुल्य, साधुओंके दर्शनका फल
छाया वासना—यह अपने जानते तो वासनाको त्याग देता है, मनको मार लेता है पर यथार्थमें न तो इसका मन मरता है न वासनाही नष्ट होती है, वासना सर्वदा इसके सङ्ग बनी रहती है । सब ओरसे ज्ञानका सूर्य मध्याह्नको पहुँचता है तो इसकी वासना जो यथार्थमें इसकी छाया है, इसके शरीरमें गुप्त हो जाती है, बाहर नहीं दिखाई देती पर सर्वतः इससे अलग नहीं होती । ज्ञानरूपी सूर्य नीचेको ढलने लगता है तो वासनारूपी छाया फिर प्रगट होने लगती है यह उस छायरूपी स्त्रीसे प्रेम करने लगता है सदैव उसको अपने हृदयमें लगा रखता है, इस कारण वह इससे दूर नहीं होती ।
उसका साथ—यद्यपि यह अपनी तपस्या, भजन भक्ति, और ज्ञानसे पूर्णताको पहुँच जाता है, बहुत ऊँचे पदको प्राप्त करता है तो भी वासना इसको खींच लेती है पूर्वकी अवस्थामें डाल देती है, इसी कारण यह तत्त्वभसिके तीनों पदमें फँस गया है, बाहर निकलनेकी राह नहीं पाता । वासना ही माया है, यही उसकी छाया है यही इसकी प्यारी स्त्री है, यही इसको पकड़ कर नचाया करती है । उसका इससे छूटना कठिन है, इसको पक्के तत्वका घर नहीं मिलता, सदा कच्चे तत्वमें बंधा रहता है ।
कबीरसाहबका शब्द ।
कहु वैकुण्ठ कहाँ रे भाई ।
कितना ऊँचा कितना नीचा केती है चौड़ाई ।
अटकल पञ्चो भरमत डोलें कौन महलको जाही ॥
जिस साहबने किया पसारा ताको चेतत नाहीं ।
करत फिरे सगरी बद फेली चारों गई भुलाई ॥
कोइ कोइ पहुँचे ब्रह्मलोकको धरि माया ले आई ।
आन पड़े यम कालके फन्दे फिरि फिरिगोता खाई ॥
इस प्रकार यह जीव दुःखी और बिकल हुआ इसको कुछ सूझता नहीं कि क्या उपाय करें ?
कर्म उपासना भ्रम है—यह अपनीही भूलसे अपने स्वरूपसे भ्रष्ट हुआ स्वयं चौरासी लाख योनिकी कल्पना की आपही प्रत्येक योनियोंमें मारा मारा फिरता है । समस्त संसारमें आपही व्यापक हो रहा है अपने भूलसे आपको नहीं पहचानता । इसको कितनाही सिखलाया जावे नहीं सीखता, अपने हठको नहीं छोड़ता मन इसको जिधर भटकाता है उधरही ठोकर खाता फिरता है, आपही सब कौतुक कर रहा है, अपनेही कौतुकको आप नहीं जानता । कर्म उपासना,
साधुओंके भोजन देनेका फल
योग और ज्ञान असत्य हैं उसी प्रकार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष निर्मूल और जल तरङ्गवत् हैं।
गजल ।
भूल मत यार यह शराब सुरआब । पिये हुयेमस्त दिल किया है कबाब ॥
झूठ को सच जान गलतीसे । यह खयालात सारे नकश बर आब ॥
पञ्च हंकार है तमाशए दिल । होते और जाते रहते मिसल हबाब ॥
वार सब रह खबर न पार कहै । कौन जानै सो बरतरीन जनाब ॥
लौलियां ह्विस जो जिस्मानी । कर दिया सारे शहरको खराब ॥
और इन्सान किस हकीकत में । औलिया अम्बिया अल्लाह ए हबाब ॥
अस्ल इसरार जाने आजिज कौन । दिल जो चाहे सो राग रङ्गो रबाब ॥
बटमार—जितने जीवन्मुक्त कहलाये सात ज्ञानभूमिकाके अनुरागी हुये किसीका छुटकारा न हुआ । इस कारण यह है कि, उन लोगोंने मनुष्यके यथार्थ धर्म न जाने धर्मके स्वरूप न पहचाने सबके सब एक दूसरेकी चाल पर चले आते हैं, सत्य बातको कोई स्वीकार नहीं करता । यदि कोई सत्यकी ओर झुके तो दूसरे लोग उसको भटका कर फिर अंधेरेमें डाल देते हैं इसको सत्यकी चाल पर नहीं चलने देते । सचार्ई रूपी मार्गमें अनेक बटमार लुटेरे हैं इस कारण सबही डूब रहे हैं ।
चार प्रकारके आनन्द ।
१ अज्ञानानन्द—जो सांसारिक रागद्वेषमें प्रवृत्त हो परलोक तथा ईश्वरी भयसे अचेत रहे, मदिरापान करता हो, मांस खाता और व्यभिचार तथा विषय-भोगमें फस रहा हो देहको सच जानकर उसीके शृंगारमें लगा हुआ हो, सदा स्वाद और विषय लम्पटताका अभिलाषी रहे ।
२ ज्ञानानन्दका—स्वरूप है कि, स्थूल सूक्ष्म और कारण—जो तीनों देह हैं इनके स्वरूप और तीनों अवस्थाको जानें, पांच तत्वके पञ्जीकरण को जानें, चारों अन्तःकरणका स्वरूप जानें, मायाकी उपाधियोंको त्याग करें, समझें कि, सब मायासे हैं, चेतन ज्ञानके सत्यसारमें आनन्द रहे अपने स्वरूप आत्माको श्रेष्ठ मानता रहे उसीमें अहम्भाव (अर्थात् वह मैं ही हूँ) भावना रख वारम्बार अभ्यास करें ।
३ विज्ञानानन्द—अवस्थामें क्रिया कर्ता और कर्म कुछ शेष नहीं रहता आत्मा स्वयम् प्रकाश विज्ञानानन्दमें मग्न रहता है और यह विज्ञान हंस सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।