कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गजूवा
करते हैं । एतवारके दिनको भली प्रकार पहचानकर व्रत रखा करते हैं । पंजाब तथा हिन्दुस्थानके लोग यों कहा करते हैं ।—
एतवारकी रात कराड़ी । गीदड़ दौत न लावे बाड़ी ॥
कुत्ता
कुत्ता बड़ा कृतज्ञ, नमक हलाल, चौकस तथा स्वामीपर प्राण देनेवाला पशु है इसी कारण लोग उसको पालते हैं, पुस्तकों तथा मनुष्योंमें कुत्तोंके बडे २ गुण प्रगट हैं । कुत्ता मनुष्योंके घरोंकी बहुत चौकसी करता है । कृतज्ञताके साथ अपने स्वामीकी अधीनतामें रहता है । संसारमें कुत्तों के अनेक गुण और बुद्धिकी बातें प्रसिद्ध हैं ।
राम कालका श्वान—पुराणोंमें लिखा है कि, महाराज रामचन्द्रजीके समयमें एक संन्यासी अपना पेट भरकर बची रोटी सिरहाने रखकर सो गया, उसने सोच लिया था कि, बची रोटियोंको सौझको खावेंगे । जब वह अचेत होके सो गया तो उसी वृक्षके नीचे एक कुत्ता बैठ था, उसने संन्यासीके सिरहानेसे वो रोटी खींच एक स्थानपर भूमिमें दबा दिया, आप चुपचाप उसी जगह बैठ रहा । वह संन्यासी सोकर उठा, अपनी रोटी न पाकर इधर उधर देखने लगा कि, मेरी रोटी कौन ले गया ? जान लिया कि, और तो कोई नहीं, मेरे समीप केवल यह कुत्ता है, इसीने मेरी रोटी खा ली । क्रुद्ध होकर कुत्तेको एक डण्डा मारा, जिससे कुत्तेकी एक टाँग टूट गयी । कुत्ता श्रीरामचन्द्रजीके निकट जाकर चिल्लाने लगा । महाराजाने उस संन्यासीको बुलाया पूछा कि, तुमने उस कुत्ते को क्यों मारा ? संन्यासीने उत्तर दिया कि, यह कुत्ता मार खानेके ही योग्य था, पहले तो इस कुत्तेमें यह दोष है कि जब किसी साधुको देखता है तो भूंकता है—जब वे रोटी मांगने जाते हैं तो यह उनको काटने दौड़ता है, दूसरा इसमें यह दोष है कि, रातको चिल्लाता है सोने नहीं देता । तीसरा प्रातःकाल भजनके समय सो जाता है । चौथे यह मार्गके बीचों बीच बैठता है । पाँचवें जब कोई कहीं चलता है तो यह कान फटफटाता है, उसके कान फटफटानेसे काम नहीं होता छठे मने सौझके लिये रोटी रखी थी यह निकाल कर खा गया । इसी प्रकार इसमें अनेक अवगुण हैं, इस कारण मारनेके ही योग्य है । महाराजाने कुत्तेसे पूछा कि, तू अब इसका उत्तर दे । कुत्तेने कहा कि, मैं साधुओं को देखकर इस कारण भूंकता हूँ कि, तुम तो संसारसे विरक्त होकर साधु हो गये, अब द्वार द्वार पर भिक्षा क्यों मांगते हो । परमेश्वर पर क्यों नहीं निर्भर रहते, क्या वह तुम्हें तुम्हारा भोजन नहीं पहुँचावेगा ? जो अभी तक सांसारिक मनुष्यों के अधीन बने फिरते हो, यही साधूपना है अथवा धूर्तता है ? रातभर मैं इस कारण
मनुष्यके शिरका सर्प संग पुस्त जलमनुष्य मनकता शेष यहूदी अजीबुल खिलकत विचित्र पशु
चिल्लाता रहता हूँ कि, जिसका टुकड़ा मैं खाऊँ, हलाल करके खाऊँ चोरीसे बचाऊँ किसी भी बैरीको निकट न आने दूँ। प्रातःकाल सोता नहीं वरन् जागता रहता हूँ पर लोगोंके देखनेमें सोता दिखाई देता हूँ, पथमें मैं इस कारण बैठता हूँ कि, मैं अपने पापोंके कारण कुत्ता हो गया हूँ। यदि अब किसी साधु सन्त के चरणकी रज मुझपर पड़ जावे तो मैं मेरी कुत्तेकी देह छोड़ मनुष्यकी देह पाऊँ मैं भविष्यका वृत्तान्त जानता हूँ। जिसकेद्वारा मैं जान जाता हूँ कि, यह कार्य होगा अथवा नहीं, जो कार्य नहीं होनेवाला होता है उसी समय मैं कान फट-फटा देता हूँ कि, तू मत जा, तेरा कार्य सिद्ध न होगा। तेरा परिश्रम व्यर्थ जायगा। मैंने इस संन्यासीकी रोटी नहीं खाई, केवल उसके सिरहानेसे रोटी खींचकर एक स्थान पर गाड़ दी। क्योंकि, उस दिन मुझे एतवारका व्रत था, रोटी खाना स्वीकार नहीं था, केवल इसकी भलाईके लियेही मैंने रोटी लेली, क्योंकि, यह बासी रोटी खाता तो बीमार हो जाता। रोटी तो यह माँगकर खाता है औषध कहाँसे पाता?, जिस परमेश्वरने इसको इस समय रोटी दी है क्या सांझको न देगा? सांझके समय यह ताजी रोटी माँगकर खाले। जब श्रीरामचन्द्रने इस प्रकार समस्त बातें सुनीं तो राज्य कर्मचारियोंको आज्ञा दी कि, जाके देखो इस कुत्तेने कहाँ रोटी दबाई है? वह कुत्ता उनके साथ गया, जहाँ रोटी दबाई थी वो जगह बतला दी। उन लोगोंने रोटी खोदकर निकाल महाराजसे जाकर सारी बातें कह सुनाई। महाराजने कहा कि, अब तो यह कुत्ता निर्दोष सिद्ध हो गया संन्यासीका ही दोष है। महाराजा ने कुत्तेसे पूछा कि, तू क्या चाहता है, मैं इस संन्यासीको क्या दण्ड दूँ। उसने कहा कि, इसको शिवजीके मन्दिरका महन्त बना दीजिये। महाराजाने कहा कि, यह शिवजीके मन्दिरका महन्त हो जावेगा तो बड़े सुख चैनसे अपने जीवनके दिन बितावेगा। यह तो इसको कोई दण्ड न हुआ। कुत्तेने उत्तर दिया कि, हे महाराज! मुझको अपने पूर्व जन्मकी सुधि है, मैं शिव पूजा किया करता था, एक दिन मैंने मन्दिरमें घृतका दीप जलाया था जिससे शिवजीके चढानेका घृत मेरे नखोंमें समा गया। मैं रातको भोजन करने लगा तो गरम दालमें मेरे नाखूनका घी छुट पड़ा, मैं अचेतावस्थामें उसको खा गया। केवल उतने ही घी खानेके दोषपर मैं मनुष्यसे कुत्ता हो गया हूँ। मैं केवल उतना घी खानेके पापसे कुत्ता हो गया ऐसी अवस्थामें जब यह महन्त होकर शिवजीका प्रसाद खाया करेगा तो न जाने कितने जन्मतक कुत्ता होगा, किस कष्टमें फसेगा। इस कारण इससे बढ़कर इसको और क्या दण्ड है। कुत्ते के कथनके अनुसार वह संन्यासी शिवमन्दिरका महन्त बना दिया गया।
मनुष्यकीसी बातें—लेटेम्बर नामके एक मनुष्यने प्रांसककी विद्याशालामें इस प्रकार कहा है कि, एक कुत्तेको मनुष्यकीसी बोली सिखाई गई थी । वह स्पष्टरूपसे बोल सकता था आवश्यकताके अनुसार चाहता था कहवा मंगा लेता था ।
एक कुत्ता स्पष्टरूपसे एलिजिबेथका नाम लेता था । वह दूसरी बोली भी बोलता था पर साफ नहीं बोल सकता था ।
NATURAL-HISTORY.
डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहिबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखा हुआ है कि, एक बालकने एक कुत्तेको बिना सिखाये हुए मनुष्यकी बोली बोलते हुए देखा था ।
नानीकुतिया—पंजाब देशस्थ फीरोजपुर जिलेके भाई कोटकसबेमें एक कुतियाने चार बच्चे दिये । उसको एक जमींदारने ऐसा सोटा मारा कि वह मर गई । उसके बच्चे अनाथ होगये, भूखसे मरने लगे, मृत कुतियाकी माता अपने नातियोंसे स्नेह करने लगी । उनकी नानीको भी दो बच्चे हुए थे उसके दोनों बच्चे जीवित थे । अब उसने अपने दोनों बच्चोंको लाकर अपने नातियोंके साथ रखा उन छः बच्चोंका लालन पालन एक साथ उस नानी कुतियाने किया ।
डब्बू—फीरोजपुर जिलेके डरौली गाँवके पास कोपरीवाला नामक एक गाँव है । उसमें एक बहुत कृतज्ञ आज़ाकारी कुत्ता था । उसका स्वामी जो कुछ कहता वह वैसाही काम किया करता । जहाँ बिठा देता वहीं बैठ रहा । जब कहता कि, उठ अमुक स्थानको जा तो वह तुरन्तही चला जाता वह काय्य कर आता । भोजन बनता, घरके मनुष्य कहीं चले जाते तो वह चौकस बैठकर भोजनकी रखवाली किया करता । किसी मनुष्य तथा पशुकी सामर्थ्य नहीं थी कि, भोजनके निकट आ सके । उसका स्वामी आबे अथवा स्वामीकी स्त्री आबे तो आ सकती थी घरके लोग भोजन करती वार उसको भी दे दिया करते थे । स्वामीकी बिना आज़ा भोजनमें मुंह न लगाता था, उसके कितनेही गुण थे । एक दिन ऐसी घटना हुई कि, वह कार्तिक मासमें जब कि, कुत्तोंको काम सताता है कुत्ते कुतियोंके पीछे दौड़ते फिरते हैं, उस समय यह भी एक कुतियाके पीछे लगा । लोगोंने देखकर उस जमींदारसे कहा कि, तुम्हारा डब्बू कुत्ता कुतियोंके पीछे फिरता है । जब वह कुत्ता घर आया तो उसका स्वामी उस पर झिड़का । कहा कि, ऐं डब्बू ! तू भ्रष्ट हो गया, बूढ़ा होने पर भी तू कुतियोंके पीछे फिरा करता है ? क्या तुझे लज्जा नहीं आती । अब तू मेरे सामनेसे चला
उनका दोशिरके मनुष्य छातीमें शिर घुटनेके नीचे कान, श्वान मुख अश्वमुख मनुष्य, पचास गजका मनुष्य एक टांगके मनुष्य, तात्पर्य निर्गमसे निर्धारण
जा, फिर मत आइयो। इतनी बात सुनतेही वह कुत्ता पलटकर गौवके बाहर आया, एक तालाबके समीप जलके किनारे वृक्षकी जड़पर अपना शिर रखकर लम्बा पड़ गया। जब भोजनका समय आया तो जमींदारकी स्त्रीने कहा कि, आज डब्बू नहीं आया, न जाने कहाँ है लोगोंने समाचार दिया कि, डब्बू तो गौव के बाहर जलके किनारे पड़ा हुआ है। जमींदारने जान लिया कि, डब्बू मेरी झिड़कियोंसे असन्तुष्ट हो गया, रोटी तथा लस्सी लेजाकर उसके मुंहके निकट रख दी। उसने मुंहसे भी न लगाया। यद्यपि जमींदार तथा अन्यान्य मनुष्योंने उसको बहुत कुछ बढ़ावे दिये पर उसने रोटी नहीं खाई। जमींदारने कहा डब्बू ! तू घर चल, पर वह न आया। जमींदार फिर झिड़का। कहा कि, तू घर चल, तब घर आया। उस जमींदारकी स्त्री ने कहा कि, ऐ डब्बू ! क्या तुझे लज्जा नहीं आई कि, तू घर आया। इतनी बात सुनतेही फिर वह भाग कर उसी स्थान पर जा पड़ा। जमींदार लाख लाख बार उठाता, पर वह कुत्ता अपनी जगहसे हिलता नहीं था। उसी जगह पड़ा रहा, उसकी आंखोंसे आँसू निकलते थे। वह बिना खाये पीये उसी जगह पड़ा रोता रहा। अन्त चौथे दिवस उसी जलके किनारे मर गया। जमींदारने नवीन वस्त्रका कफन देकर पृथिवीमें उसे अपने हाथसे गाड़ दिया। ऋषि मुनि और सिद्ध साधु जो अपने कर्मोंके फलसे किसी पशुकी योनिमें जन्म लेते हैं तो भी उनके पूर्व जन्मके कार्य वैसेही उस जन्ममें भी रहते हैं।
दूसरा डब्बू—फीरोजपुर नगरके सोतियोंके महलामें एक डब्बू माकन कुत्ता था। वह एतवारका व्रत रखवा करता था, जो कोई उसके स्वामीसे लड़ता झगड़ता तो वह अवश्य ही काटता। बनाया हुआ भोजन रखकर घरके मनुष्य चले जाते वह उसकी रखवाली किया करता। किसी पशु अथवा मनुष्यको पास न आने देता, बहुत चौकसी रखता था। जो कार्य उससे कहा जाता वे वो सब ठीक ठीक किया करता था। जो मिहमान आते तथा बिदा होने लगते वो उनके वस्त्रका खूंट पकड़ लेता था। उस कुत्तेका यह तात्पर्य होता कि, वह रोटी खाकर जावे जब घरके मनुष्य कहते कि, डब्बू ! यह मिहमान भोजन कर चुका है इसको जाने दे तो वह उसको छोड़ देता घोड़ेकी बाग पकड़कर ले जाता उसको पानी पिलाया करता। वह कुत्ता मिट्टीके बरतनका हो अथवा गँदला जल हो कभी नहीं पीता था। मल त्यागके लिये बाहर दूर चला जाता था। स्वच्छ तथा पवित्र रहता था। चारपाई पर सोया करता था। चौकी पर बैठता था। मुसलमानका रोटी पानी व्यवहारमें कदापि नहीं लाता था। जब तक उसका स्वामी आज्ञा न देता तब तक कुछ नहीं खाता था।
अन्तर्यामिनी कुतिया—जौनपुर जिलेके बदलापुर मौजेमें एक कुतिया थी वह बच्चोंको जनते ही खा जाती एक भी जीवित न छोडती थी एक बार एक ब्राह्मणने उससे एक बच्चा छीन लिया उसको खाने न दिया । उसको पालता रहा । जब वह बच्चा बड़ा हुआ तो ऐसा विपैला हुआ कि, जिसको काटता वह भूंक भूंककर मर जाता । उसका काटा हुआ कहता कि, मेरी माता कुतिया अन्तर्यामिनी थी इस कारण वह अपने सारे बच्चोंको खा जाया करती थी । इसका कारण यह था कि जितने बच्चे उसके पेटसे उत्पन्न होते थे सबके सब विपैले होते थे । यह दशा देखकर ब्राह्मणने उस कुत्तेके पालनेका बहुत खेद प्रगट किया । लोगोंने उस कुत्तेको मारकर फिकवा दिया ।
मोतीराम—अवध पश्चिमोत्तर प्रान्तके कोटवानामके कसबेमें जगजीवनदास नामके एक श्रेष्ठ पुरुष, सत्य नामियोंके पंथके आचार्य हुये हैं । वे कबीर साहबके शिष्य थे । उनके पास एक मोतीराम कुत्ता था । वह उनका बड़ा आज्ञाकारी था । जगजीवनदासने उसके कृतज्ञतादि गुणको भली भाँति देखकर उस पर बड़ी दया की, महन्तों की तरह सेली टोपी पहना दी । वह कुत्ता भी सारे साधुओंके साथ भजन कीर्तन सुना करता था जैसे साधु सुनते हैं ।
एक दिन ऐसी घटना हुई कि, मोतीराम अन्यान्य कुत्तोंके साथ मिलकर चमारोंकी बस्तीमें गया । वहाँ पशुवोंकी हड्डियोंका ढेर लगा हुआ था । सारे कुत्तोंने एक एक हड्डी लेली । मोतीरामने भी सजातियोंके साथ हड्डी उठा ली । लोगोंने जगजीवनदासजीको समाचार दिया । देखो मोतीरामने मुंहसे हड्डी पकड़ी है । उन्होंने जाकर देखा तो पुकार कर कहा कि, ऐ बेईमान मोतिया ! अब तू मुझको अपना मुंह मत दिखा । यह बात सुनते ही मोतीराम नितान्त ही लज्जित होकर बैठ गया । उसने उसी समय प्राण त्याग दिये ।
जगजीवनदासजीने उसकी समाधि बनवा दी । सुना है कि, उसकी समाधि वहाँ अभीतक बनी हुई है । जिस किसीको पागल कुत्ता काटता है वह मोतीरामके नामसे यह कहता कि, मैं तुम्हारी समाधिपर कुछ चढ़ाऊँगा, मुझे कुत्तेका विष न चढ़े । जब वह चढ़ा हो जाता है तो वह मोतीरामकी समाधिपर जाकर अपनी मनौती पूरी करता है ।
पठानका कुत्ता—अवध पश्चिमोत्तर प्रान्तकी एक बात है कि, एक पठानने आवश्यकतावश एक महाजनसे दो सौ रुपया लिया, अपना कुत्ता उन रुपयोंके बदले उसको दे दिया प्रण किया कि, अमुक समयके पीछे मैं तुम्हारा रुपया चूकाकर अपना कुत्ता ले जाऊँगा । एक रातकी बात है कि, महाजनके
अकानसे चोर बहुतसा धन दौलत लूट ले गये। सबेरा होते ही चोरको ढूंढ़ा पर पता न लगा। लोग एकत्रित हुये हुल्लड मचा। उस समय वह कुत्ता महाजनका वस्त्र पकड़ कर खींचता था पर लोग कुछ ध्यान न देते थे, अन्तमें लोगोंने मालूम करना चाहा कि, कुत्तेके कपड़ा खींचनेका क्या कारण है कि, यह कुत्ता बारम्बार कपड़ा पकड़के खींचता है आगेको दौड़ता जाता है। कुछ लोग कुत्तेके साथ चले वह उनके आगे आगे चला। नगरके बाहरके एक तालाब पर जा पहुँचा, वहाँ वह तालाबके भीतर घुस गया, गोता मारकर फिर बाहर निकल आया। लोगोंको इशारा किया कि, इसमें सब माल असबाब है। क्योंकि, जब चोरोंने वहाँ माल रक्खा था तब यह कुत्ता देख रहा था। लोगोंने कुत्तेका अभिप्राय जान लिया। तालाबके भीतर घुसकर माल ढूंढ़ने लगे। चोरीका सारा माल तालाबसे निकल पड़ा, महाजन अपना माल पाकर अत्यन्त हर्षित हुआ। एक पत्र उस कुत्तेके गलेमें बाँध कर उससे कहा कि, अब तुम जाओ अपने स्वामीको मेरा यह पत्र दिखाओ। तब वह कुत्ता चला। उसी समय वह पठान महाजनका रुपया लेकर आता था। राहमें वह कुत्ता मिला उसको देखकर पठान अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। कहा कि, ऐ कुत्ते ! तूने मुझको महाजनसे झूठा बनाया, मेरी आज्ञाके बिना चला आया। तलवार खींचकर मारी कुत्तेका शिर कट गया। वह पत्र गिर पड़ा जब उसको लेकर पढ़ा तो उसमें लिखा पाया कि, मैंने आपसे दो सौ रुपये भर पाये चोरीका सारा हाल तथा कुत्तेकी निम्नक हलालीकी सब बातें लिखी हुई थी उसको पढ़कर पठान नितान्त ही दुःखी हुआ उस उजाड़में कुत्तेकी पक्की छतरी बनवादी। सुतरां अभीतक वह क्रूर वहां बनी हुई है।
कुत्ताकी योनिमें कर्जी—मैंने सुना था कि, महाजन अपने मृत पिताके लिये तीर्थमें पिण्ड देने गया, सांझके समय एक अपने मित्र महाजनके घर उत्तरा। घरवालेने उस महाजनसे कह दिया कि, रातको सचेत रहना, हमारे घर एक ऐसा बलिष्ठ कुत्ता है जो कि, रातके समय किसी पराये मनुष्यको घरके समीप देखता है तो फाड़ खाता है। उसके कहनेसे मेहमान चौकस रहा। रातके समय उसको पायखाने जाना हुआ। उसने इधर उधर कुत्तेको देखा पर वह कहीं दिखाई नहीं दिया। वह लोटेमें जल भर कर पायखानेके लिये चला। यह देख चारपाईके नीचे बैठे हुआ कुत्ता बाहर निकलकर महाजनके पीछे लग गया। महाजनने पीछे फिरके देखा तो कुत्ता दिखाई दिया। यह देखकर वह बहुत डरा और ठहर गया। उसको भयभीत होते देखा तो कुत्ता बोला कि, भयभीत न हो, पायखाने जा यह बात सुनकर वह और भी चकित हुआ
पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे पशु भेदका कारण महावीर, वैज्ञानिक, हाथी गोपाल दास
कि, यह कुत्ता तो बातें करता है उसने पूछा कि, तुम कौन हो ? अपना हाल कहो, कुत्ता बोला कि पायखाने हो आ, तब मैं तुमसे कहूँगा । वह महाजन पायखानेसे शीघ्रही पलटकर हाथ पैर धोकर आ बैठा । उस कुत्तेसे पूछा कि, तुम कौन हो ? कुत्तेने कहा तुम कहाँ जाते हो ? महाजनने उत्तर दिया कि, अपने पिताकी गति कराने जाता हूँ । यह बात सुनकर कुत्ता बोला कि, तुम्हारी गया सुफल न होगी । क्योंकि, तुम्हारा पिता तो मैं हूँ । मैंने इस महाजनसे पचास रुपये उधार लिये थे पर ये भूलसे बहीपर न चढ़ा सके, न मैं उनको इसे लौटा सका । उन्हींके बदले मैं इस महाजनके घर कुत्ता हुआ हूँ । यदि तू उसको वे पचास रुपये दे देवे तो मैं इस कुत्तेकी योनिसे छूटूँ, तेरा गया करना सुफल हो । यह बात सुनकर वह मेहमान चुप हो रहा । सबेरा होतेही उसने घरवाले महाजनसे कहा कि, ऐ भाई ! हमारा तुम्हारा लेन देन सदैवसे चला आता है, हमारे पिताने तुमसे पचास रुपये लिये थे, वो अबतक नहीं दिये जासके, उन्हें ले लो । क्योंकि, हिन्दुओंका यह नियम है कि, जो गया करने जाता है वह प्रथम अपना सारा ऋण शोध लेता है तब ही गया सफल होती है, नहीं तो उसका गया करना सुफल नहीं होता । यह बात सुनकर घरवाले महाजनने अपनी बही निकाली । देखी तो कहीं लिखा न पाया । उसने कहा कि, मैं रुपया न लूँगा । उसने बहुत समझाया । कहा कि, यद्यपि तुम्हारी बही पर नहीं चढ़ा पर मुझे भली प्रकार विदित है कि, मेरा पिता तुम्हारे पचास रुपयोंका ऋणी था । पीछे बहुत कहनेसे उसने रुपया ले लिया । उसने अपने मित्रसे विदा होकर गयाकी राह ली । अभी वह दो तीन कोस भी न गया होगा कि, कुत्ता मर गया जिससे वह महाजन बड़ा दुःखी हुआ कि, हमने न जाने कैसा रुपया लिये, जिससे हमारा प्यारा कुत्ता अचानक मर गया ।
कुत्ता और संन्यासी—पञ्जाब देशकी कपूरथला नगरकी एक कहानी है । वहाँ एक राजा था । वहाँ एक तपस्वी संन्यासी भी रहता था । राजा उसकी सेवा किया करता था । उस संन्यासीके पास एक कुत्ता रहता था । एक दिन वह संन्यासी जीवित समाधि लेने लँगा । समाधि लेनेका समस्त प्रबन्ध कर चुकनेके बाद राजाने निवेदन किया कि, ऐ महाराज ? आप तो अब समाधि ले चले, मैंने अनेक कालतक आपकी सेवा की है, आपसे बहुत कुछ आशा रखता था । क्योंकि, मैं निश्चूत हूँ यदि आपकी दया हो तो मेरे कोई सन्तान हो जाय, मैं राज्य धन लेकर क्या करूँ, किसको दूँ ? संन्यासीने उत्तर दिया कि, ऐ राजन् ! तेरे सन्तान नहीं तो मैं स्वयम् तेरा पुत्र होकर उत्पन्न होऊँगा । तेरा पुत्र कहला-
ग्यारहवां द्वार मोक्षका अधिकारी, लिखनेका कारण
ऊँगा। मैं उत्पन्न होऊँ तब तू मेरी शरीरके अमुक अमुक चिन्ह देखकर जान लेना कि, यह वही संन्यासी है। यह कहकर संन्यासी गड़हेके भीतर समाधि लेनेको बैठ गया, लोगोंने गड़हा बन्द करना चाहा तो संन्यासीका कुत्ता भी गड़हेमें कूद पड़ा, जिसमें वह भी संन्यासीके साथ समाधि ले। संन्यासीने कुत्तेको बहुत रोका पर उसने न माना। उस संन्यासीने कुत्तेसे कहा कि, ये कुत्ता! यदि तू ऐसा करता है तो तू निश्चय मेरा छोटा भाई होगा। मेरे तेरे राज्य विषयके, झगड़े होंगे। मैं तुझको मारूँगा। संन्यासीने आज्ञा दी कि, अब मिट्टी डालो लोगोंने मिट्टी डालकर उस गड़हेको बन्द कर दिया। समय पाकर उस राजाके घर पुत्र उत्पन्न हुआ जो चिन्ह संन्यासीने कहे थे राजाने देख लिये जिससे जान लिया कि, ठीक यह वही संन्यासी है। आगे कुछ दिनोंके पीछे दूसरा पुत्र हुआ, वे दोनों तरुणावस्थाको प्राप्त हुये। छोटे पुत्रने बड़े पुत्र से विद्रोह किया। उस छोटेकी धृष्टतासे रुष्ट होकर बड़ा छोटेको मार आप राज्य करने लगा।
विदुषी कुत्ती—पञ्जाबदेशके फरोजपुर जिलामें बङ्गला नगर है। वहाँ एक मनुष्यके घरमें एक कुतियाने कई बच्चे दिये थे। उसने चूहडीको आज्ञा दी की, उनको कहीं दूर रख आ। भङ्गिनने ऐसा ही किया, वह कुतिया कहीं गई हुई थी वह बच्चोंको उठाकर कहीं रख आई। जब कुत्ती आई तो अपने बच्चोंको न पाकर जान गई कि, भङ्गिनने मेरे साथ यह दुर्व्यवहार किया है। अब तो जब कभी कहीं वह कुतिया भङ्गिनको देखती तो उसके कपड़ोंको फाड़ती और भूंकती काटती। यद्यपि उसने उस भङ्गिनको बच्चे उठाते न देखा था तो भी भविष्यकी बातें बतानेवाली विद्याके कारण उसने जान लिया कि, यही मेरा बैरी है वह मनुष्य जिसने यह कार्य कराया था उसका पुत्र मर गया। रोजगार छूट गया। उसपर बड़ी बड़ी तंगियां आईं।
बुलहाउण्ड—एक जातिका कुत्ता होता है। इसको लोग बड़े चावसे अपने घरमें रखते हैं। इसकी घ्राण शक्ति ऐसी है कि, गंधही से चोर पकड़ लेता है। इसका यह नियम है कि, जब उसके स्वामीके घर चोरी होती है, चोर माल लेकर चले जाते हैं तब प्रातःकाल इसको छोड़ा जाता है, यह वायुको संधता चला जाता है। जिस ओर वह चोर गया हो उसी ओर बराबर चला जाता है, जहाँ कहीं चोर पाता है वहाँही भूंकने लगता है उसको काटता है उसके कपड़े फाड़ता है। उसकी चिल्लाहट सुनकर लोग दौड़ कर चोरको पकड़ थानेमें लेजाते हैं। क्योंकि, लोगोंको भलीप्रकार विदित है कि, यह बुलहाउण्ड चोरके अतिरिक्त और किसी पर ऐसा आक्रमण नहीं करता। चोर पकड़कर स्वामीका माल थानेसे वरामद कर लिया जाता है।
१९ अध्याय । जानवर
किसरोट जानका कथन है—कि, मछली पकड़नेवाला पनिहा कुत्ता बहुत प्रेम करनेवाला पशु होता है। जब उनकी माता मर जाती है तो बच्चे, बहुत सुस्त होकर माताको ढूंढते फिरते हैं। यदि बच्चाको कोई कष्ट पड़ता है तो माता उनके चारों ओर फिरा करती है। जबतक कि, वह स्वयम् मारी न जावे या मर न जावे। यदि उनमेंसे एक मर जावे अथवा मारा जावे तो दूसरा उसका साथी छुड़ानेके लिये बहुत उद्योग करता है। स्काटलैण्डके लोग समझते हैं कि, पानीके कुत्तोंका एक बादशाह होता है, वह दूसरोंसे बड़ा होता है, उसके ऊपर काले श्वेत दाग होते हैं। जब वह उनमेंसे मारा जाता है, तो उसी समय कोई न कोई मनुष्य भी मर जाता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि, उनमें जहर मुहरा होता है, वह सिपाहियोंको मरी तथा रोगोंसे बचाता है, मल्लाहोंके आपत्तिसे बचाता है।
स्ववेमेक्सका कुत्ता—दक्षिणीय अमेरिकाकी रहनेवाली एक जाती स्ववेमेक्सका कुत्ता एडनवर्गनामक नगरमें बँधा रहता था, वह छूट कर अपने स्वामीके घर गया। पलंगके निकट खड़ा होकर अत्यन्त प्रेम प्रगट करने लगा। एक समय उसका स्वामी गिर पड़ा तब वह कुत्ता उसकी कुर्सी पकड़कर उठाने लगा। यह कुत्ता बड़ा धोखेबाज था जब वह भोजन करता था तब अपने भोजनको इधर उधर फँला देता था जिसमें चिड़ियों और चूहोंको धोखा दे आप नेत्र मंद दम साधकर सो जाता था। जिस समय कोई पक्षी अथवा चूहा भोजन लेने आता था उसी समय झपटा मारकर उसको पकड़ लेता था। ये कुत्ते गाड़ियोंमें जोते जाते हैं। पक्का पचास सेरका बोझा छः मिनिटके समयमें एक मील तक ले जाना साधारण बात है।
अनुचितकी लज्जा—उक्त पुस्तकका लेखक लिखता है कि, उसके घरमें एक कुत्ता था—वह घरकी रखवाली किया करता। दैवात् उससे एक दिन टट्टीका शीशा टूट गया। स्वामीने उसको शिक्षादी बहुत लज्जित हुआ। फिर जब कोई नौकर उस टट्टीकी ओर इशारा करके उससे कह देता कि, तूने शीशा तोड़ डाला तो वह अत्यन्त लज्जित हो पूँछ लटकाकर शिरको झुका देता था।
बेडका लानेवाला—एक महाशय अपने मित्र सहित कनवाल नदीके किनारे पर चले जाते थे। वहाँ उन्होंने एक वस्तु पाई जिसको कि, अङ्ग्रेजीमें बेड कहते हैं यानी वो समुद्री पत्थरका टुकड़ा होता है। इसमें अनेकों जीव रहते हैं। जब उस साहबने उसको पाया तो अपने मित्रको दिखाकर कहने लगा कि, यदि इसका समूचा वृक्ष मिलता तो बड़ा बहुमूल्य होता। मुझे बड़ी उत्कण्ठा है कि, यदि ऐसा एक मुझको मिले तो अत्यन्त लाभ हो।
बन्दर, चोर पकड़नेवाला बन्दर जमीदारका बन्दर, बच्चेको निकाला
उक्त साहबके साथका कुत्ता सारी बातें सुन रहा था। साहब आगे चल जाता था उसी समय पीछेसे उसके जलमें कूदनेकी आवाज सुन पड़ी। फिर-कर देखा तो जल बडे वेगसे हिल रहा था। तब वे दोनों महाशय देखने लगे कि, यह कुत्ता क्या कर रहा है। पुनः उन्होंने एक क्षणके पीछे देखा तो उस कुत्तेकी पूछ दिखाई दी, कुत्तेने दमलनेके लिये अपना शिर प्रगट किया जल हिला। अन्तमें वह कुत्ता परिश्रमसे थका हुआ हाँफता २ किनारे आया। वैसेही बूझ खाँचकर लाया जैसा कि, उसका स्वामी चाहता था उसको घसीटकर अपने स्वामीके पांव पर धर दिया। एक समय जब वह बाहर आखेटमें था अपने घरसे बहुत दूर था उससे कहा गया कि, अब तुम जाओ तुम्हारे स्वामीकी स्त्री रोगसे अत्यन्त पीड़ित है उसकी हिफाजत करो। वह उसी समय आ पहुँचा स्वामिनीके पलंगके नीचे लेट रहा।
डूबनेसे बचानेवाला—एक बड़ी मनोहर कहानी है कि, एक मनुष्य हाइलैण्ड भ्रमण कर रहा था। उसके पास निउफाउण्डलेण्डका कुत्ता था। वह नहरके ऊँचे किनारे परसे चला जाता था। वह पैर फिसलनेसे नहरमें गिर पड़ा। उसमें पैरनेका बल नहीं रहा। इस कारण शीघ्रही अचेत हो गया। जब उसे कुछ चैतन्य हुआ तो देखा कि, उसको बहुतेरे गँवार घरे हुए हैं वह नदीके दूसरे किनारे पर एक झोपड़ीमें पड़ा हुआ है, गांववाले घेर कर उसकी औषध कर रहे हैं कि, जिसमें उसके प्राण फिर पलट आवें। बात यों है कि, उन देहातियोंमेंसे एक मनुष्य काम करके अपने घरको जा रहा था उसने दूरसे देखा कि, एक बड़ा कुत्ता जलपर तैरता हुआ किसी वस्तुको खाँच रहा है। वह कभी २ डूब भी जाता है जान पड़ता है कि, वह कुत्ता बडी कठिनाईमें है। क्योंकि, वह कार्य बलके बाहर था उससे खाँचा नहीं जाता था। अन्तमें वह बहुत कठिनाईसे खाँचकर एक खाड़ीमें लाया, जहां तक बन पड़ा जलमेंसे खाँच लाया मनुष्योंने देखा कि, वह आदमीकी लाश है कुत्ता अपनी देह झड़ झडाकर अपने स्वामीका मुंह और हाथ चाटने लगा। यह बात देखकर देहातियोंने सहायता दी, वे उस शवको उठा लाये। अनेक युक्तियाँ करने लगे कि, फिर उसमें प्राण आवे, अन्तमें उस मनुष्यमें प्राण आगये। उसके मोढ़े तथा दूसरा गर्दन पर कुत्तेके दांतके दो चिह्न दिखाई देते थे। इससे यह विचार होता था कि, कुत्तेने पहिले मोढ़े को पकड़ा था फिर उसकी बुद्धिने बतला दिया कि, उसकी ग्रीवाका पिछला भाग पकड़ा जिसमें शिर जलके ऊपर रहे पाव मीलतक वह कुत्ता यह कार्य करता
गाड़ी हांकनेवाला, बुद्धिमती वानरी
रहा । इस प्रेम तथा युक्तिसे उसने अपने स्वामीके प्राणोंकी रक्षा करली ।
मइजअं प्रेम तथा युक्तिसे उसने अपने स्वामीके प्राणोंकी रक्षा करली ।
रोटी खरीदनेवाला—अन्यान्य कुत्तोंके सदृश निउफाउण्डलैण्डके कुत्ते भी अपने समयको पहचानते हैं । इस विषय पर औबिल साहबका एक उदाहरण है कि, निउफाउण्डलैण्डका एक अच्छा कुत्ता डोर्स नगरकी सरायमें रहा करता था । उसका यह नियम था कि, प्रातःकाल आठ बजते ही कुछ पैसें सहित एक टोकरी ले रोटी बेचनेवालेके पास जाता । रोटी बेचनेवाला पैसा ले लेता था । उसके बदले टोकरीमें रोटी रख देता था । वह रोटी लाकर पाकशालामें रक्षा-पूर्वक रख देता था । बडे आश्चर्यकी बात तो यह है कि, वह रविवारके दिन उस टोकरीके पास न जाता न उसको छूता वह अइतवारको व्रत रखा करता था । एक दिनकी घटना है कि, जब वह कुत्ता रोटीकी टोकरी लिये चला जाता था तो एक दूसरे कुत्तने रोटीकी टोकरी छीन लेनेके लिये उसपर आक्रमण किया, पर उस बुद्धिमान् कुत्तने टोकरी पृथिवी पर धर दी आक्रमण करके उस कुत्तेको भगा दिया । पीछे रोटियोंकी टोकरी लेकर अपने स्वामीके घर सानन्द चला आया ।
बुद्धिमान् डण्डी—एडिनवर्ग नगरमें निउफाण्डलैण्डका कुत्ता रहता था । उसमें ऐसी बुद्धि थी कि, सहस्रों टोपियोंमेंसे स्वामीकी टोपी पहचानकर निकाल लाता था । सहस्रों ताशोंमेंसे स्वामीकी तास भी पहचानकर निकाल लाता सहस्रों छूरियोंके ढेरोंमेंसे स्वामीकी छुरी पहचानकर निकाल लाता । जिस किसी विशेष वस्तु तथा कार्यके लिये कहा जाता वही करता, चाहे वह चीज सहस्रोंके ढेरमें क्यों न हो उसीको पहचानकर निकाल लाता । इससे यह प्रमाणित होता है कि, वह गन्धसे नहीं बरन् बुद्धिकी तीक्ष्णतासे जान लेता था । एक दिन सांझ को अनेक मनुष्य एकत्रित थे । उसके साहबने एक अठन्नी खो दी, जेबमेंसे निकालते समय वह कहीं गिर पड़ी । लोग दूढ़ते रहे नहीं मिली । साहबने कुत्तेका नाम लेकर कहा कि, ऐ डण्डी ! मैं तुझ को बिस्कुट दूंगा, तू मेरी अठन्नी दूढ़ला । कुत्तने कूदकर अठन्नी मेजपर धरदी, शायद वह अठन्नी गिरनेके समय किसीने नहीं देखी उस कुत्तने उठा लिया होगा । एक रातको सब लोग तो सोने चले गये उसके स्वामीने अपना बूट दूढ़ा पर न पाया । उसने कहा कि, ए डण्डी । मेरा बूट नहीं मिलता तू दूढ़ला । तब वह द्वारपर पञ्जामारने लगा साहबने द्वार खोल दिया उस घरमें प्रवेश कर डण्डी अपने मुंहमें बूट पकड़ कर उठा लाया । साहबको याद आया कि, वह अपना बूट तख्तके नीचे भूलकर चला
सेवक बन्दर, चंपेन, हम्बाका बन्दर
आया था। कितने साहब लोग डण्डीको रोज एकपैसा दिया करते थे उस पैसोंको एकत्रित करके डण्डी रोटीवालेकी दूकानपर जाकर रोटी भोल लाया करता था। उन साहबोंमेंसे, एक दिन एकके पास पैसा नहीं था डण्डीने अपना पैसा माँगा। उसने कहा कि, मेरे पास तो पैसा नहीं है मेरे घरमें बहुत पैसा है। जब वह साहब घर गया तो द्वारपर कोलाहल सुना। किवाड खुलतेही डण्डी कूदकर अपने पैसेके लिये घरके भीतर पहुँच गया। उस साहबने कौतुकके लिये डण्डीको खोटा पैसा दे दिया वही लेकर नानाबाईकी दूकान गया। नानाबाईने उसका खोटा पैसा देखकर रोटी नहीं दी। वह पैसा लेकर डण्डी उस साहबके पास आया द्वार खटखटाया नौकरोंने द्वार खोल दिया। डण्डी खोटा पैसा साहबके पांव पर धरकर उसको घृणाकी दृष्टिसे देखता हुआ वहाँसे चला गया। डण्डी जितने पैसे पाता था सब खर्च नहीं करता था। एक रबीवारके दिन जब उसको कहींसे पैसा नहीं मिला था तो भी उसको नानाबाईकी दूकानसे रोटी लाते देखकर उसके स्वामीने नौकरसे कहा कि, मकान दूँढो यह कहींसे पैसा लेकर रोटी लाता है। दूँढने लगे तो वह कुत्ता गुरनिं तथा तड़पने लगा। तलाश हुई तो सात पैसा एक कपडेके नीचे दबे पाये, तबसे डण्डी अपने पैसे बाहर किसी जगह धूलमें दबा रखता था। फिर कभी कोनेमें न रखता था। अपने स्वामीकी आज्ञानुसार वह कुत्ता दूरतक अपने स्वामीके मित्रोंके साथ जाया करता पहुँचाकर अपने मकानको लौट आता।
गडेरियेका कुत्ता—बड़ी सावधानीसे भेड़ें चराया करता था। बहुत बुद्धिमान तथा तीक्ष्ण विचारका था। सारी भेड़ोंको भली भाँति जानता था। जिसको उसका स्वामी कहे उसी भेड़को झुण्डसे जाकर उसके पास ला दिया करता था भेड़ोंकी रक्षा किया करता था। यदि कभी उनमेंसे कोई भटक कर इधर उधर हो जावे तो तुरन्तही उसको खींच खाँचकर झुण्डके भीतर कर देता था। सांझ के समय उन भेड़ोंके झुण्डको लाकर बाड़ेके भीतर बन्द कर देता था। यदि कोई वैरी भेड़ोंको नष्ट करने आवे तो उसके ऊपरसे होकर जावे इस विचारसे उसके द्वारपर आप लेंट जाता था। यदि कोई भेड़ी पीछे रह जाती कोई दूसरा कुत्ता आकर उसको काटता तो वह उसका कान पकड़कर ऐसा झड़ झड़ाता कि वह चिल्लाता हुआ भाग जाता। इसके पीछे वह पुनः आकर अपनी भेड़ोंके साथ हो जाया करता।
एक दिन गडेरियेने अपने कुत्तेकी बुद्धिमानी जाननेके लिये यह युक्ति की कि, जब वह कुत्ता आगके पास बैठे और लोग बात चीत कर रहे थे उसने
रैंग कायप, शव लेनेवाला
कहा कि, मैं समझता हूँ कि, गाय आलूके खेतमें है । केवल यह बात छेडीही गई थी उसपर विशेष चर्चा नहीं हुई थी, उस समय वह कुत्ता अचेत सोता हुआ जान पड़ता था पर उसने यह बात सुनली खिड़की द्वारा बाहर कूदा छत पर चढ़कर आँगनको देखा तो वहाँ गौ नहीं थी देखा कि, सब कुछ ठीक है, फिर अपने घरको पलट आया । कुछ कालके पीछे चरवाहेने फिर वही बात कही फिर वह कुत्ता उसी प्रकार गया उस मैदानको देखकर फिर आ बैठा, तीसरी बार फिर उसने उसी प्रकार कहा तब कुत्ता उठकर पूछ हिलाने लगा । अपने स्वामीकी ओर इस दृष्टिसे देखने लगा कि, तू मुझसे ठट्ठा करता है इस बात पर समस्त मनुष्य जोर जोरसे हँसने लगे । वह कुत्ता फिर अपनी जगह पर आ बैठा उस समय उन लोगोंके हँसी ठट्ठा करनेपर अत्यन्त क्रोधित जान पड़ता था ।
इसी पर हाग साहबका—कथन है कि, एक गड़रियेका कुत्ता बहुत बुद्धिमान था—वह ऐसा अद्वितीय कुत्ता था कि, किसीकी शुश्रूषा तथा प्यारको न मानता था अपने कार्यसे बहुत चौकस रहता था । ऐसा कृतज्ञ था कि, कुत्तोंकी जातिमें वैसा कोई न होगा । वह न किसीपर भूंकता, न कभी कोई भूलही करता जब वह एक वर्ष का था तभीसे भेड़ोंकी रक्षा करना सीख लिया था । जो कुछ उससे एक बार कहा जाता उसको वह कभी नहीं भूलता था । उसमें अत्यन्त बुद्धिमानी तथा विवेक प्रगट होता था । एक दिनका हाल है कि, उसके अधीन सात सौ बकरीके बच्चे तीन भागोंमें विभक्त होकर आधी रातको अपने बेड़ेसे भागकर पहाड़ पर चले गये । स्वामी तथा सहायकके वशसे बाहर हो गये । उस समय वह सरानामका कुत्ता भी दिखाई नहीं दिया । अंधेरी रात थी । उस कुत्तने अपने स्वामीको खेद करते सुना, चुपकसे उन बच्चोंकी खोजके लिये निकला । उसका स्वामी सारीरात उन बच्चोंकी तलाश करता रहा पर कहीं भी बच्चों और कुत्तेका कुछ पता न लगा । प्रातः काल उन्होंने देखा कि, समस्त बच्चे पहाड़की एक नीची जगहमें फिर रहे हैं । वह विश्वस्त कुत्ता उनकी रक्षा कर रहा है बड़े आश्चर्यका विषय तो यह है कि, उस कुत्तने समस्त बकरीके बच्चोंको ऐसी युक्तिके साथ रखा था कि गिनतीमें सब ठीक ठहरे एक भी कम नहीं हुआ, न जाने ऐसी अंधेरी रातमें किस प्रकार उसने उन समस्त बच्चोंको एक स्थानपर एकत्रित कर रखा था यह बात बुद्धिमें नहीं समाती । क्योंकि, उस अंधेरी रातमें समस्तर चरवाहे बच्चोंका सब प्रकारसे रक्षा करते तो भी वे छिटक जाते ।
मारटन साहबने—कुत्तोंके संबंधकी पुस्तकमें लिखा है कि, एक स्त्री
रोटी बनानी, मनुष्यकी सन्तान
अपने बूटको लैस करके उस बूटके ऊपर रेशमी फीता बांध रही थी उसमेंसे एक लैस टूट गई उस समय उसके पास खड़ी हुई कुतियाका नाम लेकर उसने जो मजाकियाने तौरपर कहा कि, मैं चाहता हूँ कि, तू मेरे लिये कोई और दूसरा लैस ले आती, इसके पीछे उस स्त्रीने लैस ठीक किया इस विषयका कुछ ध्यान नहीं किया। दूसरे दिन वह स्त्री पुनः अपने बूटको लैस करनेमें लगी तो कुतियाने दौड़कर नवीन रेशमी लैस उसके सामने धर दिया। इस बात पर लोगोंने अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया कि, कुतियाने उसको कहाँ पाया कदाचित कहींसे चुरा कर लाई होगी।
**स्पायल डाग—**एक मनुष्यके पास था, वो ऐसा जान पड़ता था, वह समस्त बातोंको समझता हो। यदि उसका स्वामी उसके कानमें कहता कि, मेरे लिये अमुक वस्तु ले आ तो वह जाता। यदि वह वस्तु खुली होती तो लाकर अपने स्वामीके चरणोंके पास रख देता, गृहकी स्त्रियां समस्त वस्तुओंको सन्दूकमें बन्द करके ताला लगा देती थीं। क्योंकि वह सारी वस्तुओंको खींच ले जाता था। यही एक दस्ताना खो जावे दूसरा उस कुत्तेको दिखाया जावे तो जबतक वह उसको दूढ़ कर उपस्थित करदे तबतक स्थिर नहीं होता था। एक दिन देखा तो बाजेकी किताबोंके ढेरको हटा उसमेंसे खोये हुए दस्तानेको निकाल लिया। जिसका कि निकालना कठिन था। यदि कोई अपरिचित उसके स्वामीके सकानमें आता तो वह उसपर गुराता। यदि वह मनुष्य न माने और भीतर चला आवे तो कुत्ता एक घण्टा बजा देता जिससे नौकर दौड़कर भीतर आ जाते कुत्तेके घण्टा बजानेके कारणको जान लेते।
**रुपयोंकी सँभाल—**बिल साहबका कथन है कि, एक बार वह सफर कर रहे थे, उनका विश्वासी कुत्ता उनके साथ था। एक दिन प्रातःकाल अपने घरसे कहीं बाहर जाते थे। उस समय उन्होंने रुपयोंकी थैली अपने साथ इस ध्यानसे ली कि सांझ तक घर लौटकर न आसकूंगा। उस समय थैलीमेंसे कुछ रुपये गिर पड़े, जब साहब कहवा खानामें गये वहाँ थैली खोलकर देखी तो कुछ रुपये कम पाये। सांझके समय घर लौटकर आये। नौकरोंने कहा कि, कुतिया कुछ खाती पीती नहीं बीमार है। साहब उस कोठरीमें गये कुतिया दौड़कर उन गिरे रुपयोंको साहबके चरणोंपर धर अत्यन्त हर्षपूर्वक खाने पीने लगी। यहाँ यह स्पष्ट है कि, जिस समय वह साहब कमरेसे बाहर जाने लगे उस समय ही उनसे रुपये गिर पड़े। उनको उठाकर कुतियाने अपने मुहमें रख लिया। यदि खाती तो वे रुपये उसके मुहसे बाहर गिर जाते।
एटलेश, शराब लेनेवाला, चेम्पेनका
स्पर्शानियल रोवर कुत्ता—सेण्टजान साहबके पास था । वह सारी बातें समझता था आज्ञानुसार सारे काम किया करता था, अपने स्वामीका बड़ाही आज़ाकारी था । उस कुत्तेका नाम रोवर था । उसका स्वामी कहे कि, रोवर ! आज तुम घरमें रहो, मैं तुमको अपने साथ बाहर नहीं लेजा सकता, तो रोवर बाहर जानेकी कभी भी इच्छा न करता, यदि वह कहदे कि, मैं आज रोवरको साथ ले जाऊंगा तो रोवर पहिलेसेही तयार होकर चलनेकी प्रतीक्षा करता रहता । एक रातको सलाह होरही थी कि, कल सबेरे आखेटको जावेंगे । कुत्ता भी समस्त बातें सुनता था । समय पर आपसे आप वह वहाँ जा पहुँचा जहाँ कि, सारे मनुष्य इकट्ठे थे, वह भयभीत हो मुंह बनाता हुआ उस स्थानपर पहुँचा कि, ऐसा न हो कि, मेरे ऊपर रुष्ट हो क्योंकि, मैं बिना आज़ा चला आया हूँ । किसी प्रकारका क्रोध न दिखाने पर वह कूद २ कर प्रसन्न होने लगा ।
सामनामका कुत्ता ।
साम—एक साहबके पास था उसका स्वामी कहता था कि, ऐ साम तु अन्यान्य कुत्तोंके साथ खेल कौतुक दिखा तो वह तुरन्त कौतुक दिखानेमें संलग्न होता, भाँति भाँतिके कौतुक दिखाता । एक दिन वह अपने स्वामीके साथ एक स्त्रीके घर गया । उसने जान लिया कि, यही प्रसिद्ध साम है । उसने कहा कि, आजकें दिन सामको मेरे यहाँ रहने दीजिये सामने अपने स्वामीसे क्षमा मांगी, उसके स्वामीने आज़ा दी कि, वह उस स्त्रीके साथ रहे उसका पहरा दे । कुछ काल तक उसके घरमें रहने पर उसका स्वामी उसको लेने आया । स्त्रीने कहा कि, कलके दिन सांझको मेरे घरमें रहने दीजिये । उसके स्वामीने उस कुत्तेको बहुत प्यार किया कहा कि, कल भोजनके समय तक इनके घर रहो, भोजन करके चले आना । उस कुत्तेने बात मानली । दूसरे दिन भोजनके समय तक उपस्थित रहा, भोजन करके स्त्रीकी ओर देखा पूछ हिलाई और उसके घरसे निकल कर अपने घर भाग आया । वह कुत्ता अपने स्वामीको वस्त्र लाता था । उसके पहननेके सारे वस्त्रोंका नाम जानता था । भोजन करनेके समय कुरसी पर बैठता था, किसी प्रकारका शब्द न करता था रोटी माँस अथवा दूध इत्यादि खाता कोई कहे साम ! एक टुकड़ा मुझे भी दे तो वह तुरन्त मान लेता था । जब सब चले जाते, तब वह सारी वस्तुओंको साफ किया करता । अस्तबल जाकर अपने स्वामीके लिये घोड़ा तैयार करा लाया करता । साईसको आज़ा देता घोड़ेकी जीनके पीछे सवार हुआ करता । तात्पर्य यह कि उससे कहीं हुई सारी बातें समझ लेता वो बड़ाही कृतज्ञ तथा नेक कुत्ता था ।
औरंग औरटंग, गीरेला, एनजिना
पूडलडाग—एक प्रकारके कुत्तोंको फीड और व्योंको कहते हैं। उसकी बुद्धि बड़ेही आश्चर्यमें डालनेवाली होती है इस जातिके कूत्तेको जल स्थल एकसे हैं। इस प्रकारके दो कुत्तोंने एक नगरमें शिक्षा पाई थी, पेरिस नगरीमें उनकी परीक्षा ली गई थी। एक कुत्तेका नाम फीड तथा दूसरेका नाम व्योंको था फीड गम्भीर था, व्योंको छिछोरा था। वह सदैव चुलबुलाता रहता था इधर उधर दौड़ता हुआ चलता था। यूनानी लेटिन इटालिक फरांसीसी तथा अंग्रेजी आदिसे कोई शब्द उनको दे दो तो उसे ढूँढ लाता था। यहाँ तक कि, जहाँ पचास २ अक्षर प्रत्येक भाषाके लिखे हुये पड़े हों उन सबमेंसे भी। उनके शब्दको ढूँढ लाया अपने स्वामीके पावोंपर रख दिया। जैसे अङ्ग्रेजी भाषामें एक शब्द हेवन है। हेवनका अर्थ बैकुण्ठ है। सुतरां समस्त अक्षर पृथक् पृथक् करे हुए रखे होते हैं। उस कुत्तेसे कहा गया कि शब्द हेवन ( HEAVEN ) बनाओ। तब वह कुत्ता गया और कटे अक्षर ढूँढ ढूँढकर लाता गया बराबर ला लाकर क्रमानुसार रखता गया और ( HEAVEN ) शब्द बनाकर दिखा दिया इन छः अक्षरोंमें दूसरा और पाँचवां ये दो अक्षर एकही प्रकारके हैं। यह अक्षर ( E ) ई है। यदि दो हो तो हेवन् शब्द ठीक हो जब उस कुत्तेने कटे अक्षरोंमें ढूँढा दूसरा अक्षर न पाया—केवल एकही देखा तब उनसे ऐसी बुद्धिमानकी कि, दूसरे अक्षर ( E ) को उठाकर पाँचवें स्थानमें धर दिया ( HEAVEN ) शब्दको पूरा करके दिखा दिया। इसी प्रकार गणित विद्यामें दोनोंकी परीक्षा ली गई वे दोनों गणितमें भी सुविज्ञ थे। समस्त अददोंको पृथक् पृथक् दिखा देते थे, तनिक विभिन्नता न पड़ती थी। यदि एक कुत्तेसे भूल होती थी तो दूसरा बुलाया जाता था। वह आकर उस त्रुटिको ठीक किया करता था वे दोनों कुत्ते फेड तथा व्योंको ताश खेलनेको बैठ जाते, अपने ताशको कभी नहीं भूलते थे उनमें एक हारता या जीतता था। उनका कौतुक देखनेके लिये अनेक मनुष्य एकत्रित होते वे दोनों कुत्ते खेलके सारे शब्दोंको जानते थे। वे भूलते नहीं थे, एककी त्रुटिको दूसरा शुद्ध करता था यह समस्त घटना उनके और उनके स्वामीके बीच होती थी। कुत्तोंमें ये दोनों बड़े पण्डित थे।
विविन्न पनिहा कुत्ता कुतिया—हेस्टिङ्ग नगर में एक मल्लाहके पास ऐसा पनिहा कुत्ता था कि, वह रोटी बेचनेवालेकी दूकानसे रोटी खरीद लाता। अपने स्वामीकी आज्ञा भली प्रकार पालन किया करता था। इस प्रकारकी एक कुत्ती भी थी, अपने स्वामीकी आज्ञानुसार पुस्तक उठा लाती। जो कार्य उसके योग्य होता उसको किया करती। किसी मनुष्यको बताकर उसको जो
कोरोनकियाँ और पोस्ती गान्धी
चीज दी जावे तो उसे वह उसके पास ले जाया करती थी । वह वस्तु उसको देकर चली आती थी । यहांतक कि, भारी बोझ उठाते उठाते उसके दांत टूट गये थे । आज्ञा मिलती कि, अमुक मनुष्यके पास तुम जाओ तो वह तुरन्त चली जाती थी । यदि वह न मिलता तो सामने आकर चुपचाप खड़ी हो जाती ।
प्राणदेनेवाला—एक विधवा स्त्रीके पास डंडी नामक एक कुत्ता रहता था । एक समय विधवाका दूसरा विवाह होनेवाला था । विवाह होनेके पहले डण्डीने सारा हाल जान लिया । इस बातसे कुत्ता बहुत रुष्ट हुआ ! उस स्त्रीसे प्रेम करना छोड़ दिया । वह विवश होकर कुत्तेको घर छोड़ गई क्योंकि, उसका विवाह लण्डन नगरमें होनेवाला था । जब तक विवाहका आयोजन होता रहा उतने समयतक वह उस स्त्रीके टेबुलके नीचे बड़े ही दुःखसे पड़ा रहा । उसको किसी तरह सन्तोष न होता था । प्रथम जिसको वह प्यार किया करता था उसके साथ भी न जाता, जिस प्रातःकालको उसकी मालिका उसको जहां छोड़ गई थी वह उसी स्थान पर पड़ा रहा तथा अपना शिर भी नहीं उठाता था । एक पञ्जा उठाकर आत्मिक दुःखको व्यक्त कर रहा था । उसकी मालिका चली गई । डण्डी गायब हो गया दूँढनेसे भी न मिला । अन्तमें एक दिन उसकी लाश मिली । लोगोंने पशुओंके हकीमसे पूछा कि, डण्डी किस बिमारीसे मरा । अभी तो उसकी उम्र थोड़ीसीही थी । हकीमने कहा कि, यह कुत्ता बिरहके दुःखसे मर गया है ।
भविष्य दृष्टि—टेरियर एक जातिके कुत्तेका नाम है । एक स्त्रीके पास स्काच टेरियर रहता था । वो स्त्री बलगेरिया नगरमें रहती थी । स्त्रीके मरनेके जब दो दिन रह गये तो उस कुत्तेने पहलेसे ही जान लिया कि, ऐसी घटना होनेवाली है । यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि, वह अपने घरके पीछे गया दो बड़े बड़े गढ़हे खोदे, जब उसकी मालिका मर गई तो उसने भी एक गढ़हेमें घुसकर प्राण त्याग दिये । यह बात एकही कुत्तेके साथ नहीं अनेकों कुत्तोंके साथ हुई ।
वर्तमानका ज्ञाता—हेण्टिंग नगरमें एक बीबीके पास एक कुत्ता रहता था । उसकी स्वामिनी तो ब्रिटेनको गई थी । वह नौकरोंके, साथ घरमें था । एक दिन सांझको वह कुत्ता अपनी मालकिनकी कोठरी में गया उसके कपड़े पर लोटने लगा । लोगोंने समझा कि, कदाचित् वह कुत्ता पागल हो गया है । दूसरे दिन चिट्ठी मिली कि, उसकी स्वामिनी उसी समय मर गई । जब कि, वह कुत्ता गये काल उसके कपड़ों पर लोट रहा था ।
मास्तिक जातिका कुत्ता—एक अङ्गरेजको लिये हये बागमें गया । वह
बराबरी, एम, दपये लेनेवाला, प्रत्युपकारी
कुत्ता बगीचेके भीतर जाने न पाया। चौकीदारोंने रोका साहब उस कुत्तेको जमादारके हवाले करके बाड़ेके भीतर चला गया। कुछ कालके पीछे साहब बाहर आया जमादारसे कहा कि, मेरी छड़ी खो गई, यदि आप मेरे कुत्तेको भीतर जाने दो तो वह तुरन्तही चोर पकड़ लेगा। साहबकी प्रार्थना स्वीकार की गई। साहबने कुत्तेको ईशारा किया कि, मेरी छड़ी जाती रही है। दूंड ला। कुत्ता बाटिकाके भीतर गया और चारों ओर फिरा, अन्तमें उसने एक आदमीको पकड़ लिया। साहबने कहा कि, इस मनुष्यने मेरी छड़ी चुरा ली है। इस पर उस मनुष्यकी तलाशी ली गई, उसकी जेबसे वह छड़ी निकली। उसके अतिरिक्त उसकी जेबसे और भी छः छड़ियां निकलीं। बड़े आश्चर्यकी बात है, कि कुत्ता केवल अपने स्वामीकी छड़ीको पहचानकर मुंहमें ले चला आया। दूसरी छड़ियोंको नहीं छूआ।
मास्टिककी वफादारी—एक धनाढ्यके घरमें जिसे अङ्ग्रेजीमें बैरोनेट कहते हैं। एक मास्टिक कुत्ता था। उसकी वफादारीकी अनेक बातें अङ्ग्रेजी पुस्तकोंमें लिखी हुई हैं। बैरोनेट अमीरने उस कुत्तेकी ओर पहले ध्यान नहीं दिया न उसपर कुछ दया की। एक दिन वह अमीर अपने मकानमें सोनेके लिये चला, उसके साथ इटली देशका रहनेवाला उसका नौकर था पीछे पीछे चला वह कुत्ता भी चुप चाप उनके साथ हो लिया अटारीपर चला गया चाह्ता कि, अमीरके शयनागारमें प्रवेश कर—पहले तो उसको जाने न दिया पर जब वह द्वार पर बहुत चिल्लाने लगा तब बैरोनेटने द्वार खोल दिया उसको भीतर आने दिया। अब वह कुत्ता उसकी कोठरीके भीतर जाकर एक कोनेमें बैठ गया। जब आधी रातका समय हुआ तो उस अमीरकी कोठरीका द्वार खुला, कुत्ता जोरसे गुरनितथा भूंकने लगा। अमीरने उठकर बत्ती जलाकर देखा कि, वही उसका इटलीवासी नौकर था। उससे बैरोनेट पूछा कि, तूने किस अभिप्रायसे आधी रातको मेरी कोठरीका द्वार खोला। अन्तमें उसने स्वीकार कर लिया कि, आपको मारकर सब धन लूट लेजानेकी मेरी इच्छा थी। वास्तवमें यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि, इस बातकी सूचना इस कुत्तेको पहलेसेही क्यों होगई। उसने पहलेसेही जान लिया कि, मेरे स्वामीके साथ वह मनुष्य उस प्रकारका व्यवहार करनेवाला है। निश्चय वह कुत्ता पहलेकी बातोंको जानता था, इस कारण सचेत होकर स्वामीके कमरेमें चौकस होकर पहलेसेही बैठ गया था।
माउण्ट सेंट बर्नर्ड डाग—एक जातिका कुत्ता होता है। यह कुत्ता मास्टिक और निउफाइण्डलेण्डके वर्णसंकर कुत्तोंकी जाति है। ऐल्पके पर्वतों पर जहाँ
शराबी बन्दर
कि, अत्यन्त बरफ पड़ती है वहाँ रहता है । वहाँ धर्मशाला बनी हैं, वहाँ पर बरमंक नामके एक प्रकारके फकीर रहते हैं, जो धर्मशालोंका प्रबन्ध रखवा करते हैं । वे लोग इस प्रकारके कुत्तोंको पालते हैं । इन कुत्तोंको सिखलाते हैं । पथिक जब उन बरफोंमें जा पड़कर मरने लगते हैं तो वे फकीर पथिकोंके बचानेके लिये कुत्तेको छोड़ते हैं । उन कुत्तोंकी सभी जातियोंकी अपेक्षा इन कुत्तोंमें अधिक बुद्धि होती है । ये कुत्ते बहुत शिक्षित होते हैं अत्यन्त बुद्धिमानोंके साथ काम किया करते हैं । धर्मशालाओंके लोग इस कुत्तेके गलेमें, गरम शराबकी बोटल बांध दिया करते हैं । स्वीट जर लेण्डके बरफीले पर्वतोंमें यह कुत्ता गिरे पड़े मुसाफिरोंको बरफोंमें ढूँढ़ा करता है । परमेश्वरने इन कुत्तोंको ऐसी बुद्धि प्रदान की, यदि मसाफिर पन्द्रह या बीस फीट बरफके नीचे दबाहो तो उसी समय बरफको खरोंच खरोंचकर टालना आरम्भ करता है । बहुत ऊँची आवाजसे भूंकता है । जिससे एक मीलसे भी अधिक उसकी आवाज चली जाती है । कुत्तेकी आवाज सुनकर धर्मशालाओंके महन्त आपहुँचते हैं । उसकी सहायता करते हैं । उपरोक्त कुत्तेकी कहानी एक अङ्ग्रेजी पुस्तक लाइबरेरी, आफ, इण्टर-टेनिङ्ग, एलफारफीसमें लिखी है कि, इस कुत्तेने बाईस मनुष्योंकी जान बचाई थी । इस कारण कुत्तेके गलेमें उसकी सुकीर्तिका तगमा पहनाया था ।
एक बार यह कुत्ता एक पथिककी जान बचाने और उसकी धर्मशालामें लानेका उद्योग कर रहा था । वह सन् १८१६ ई० में मर गया और उसके स्मारक चिह्नके लिये उसकी एक सुविशाल सभाधि बनाई गई । वे पहाड़ी लोग अबतक भी उस कुत्तेकी भलाईको नहीं भुला सके हैं ।
इस कुत्तेको धर्मशालाओंके बरमंक लोग पर्वतोंमें भेजते हैं वह वफोंमें जाकर मुसाफिरोंको ढूँढ़ता फिरता है । जहां कहीं बरफका मारा अचेत पथिक दिखाई देता है तो उसके ऊपर बैठ जाता है अपने बालोंसे उसको भली प्रकार गरमाता है । उस कुत्तेके शरीर पर बहुत बाल होते हैं । उन बालोंकी गरमीसे पथिक कुछ चैतन्यता लाभ करता है वह उसको गलेकी बोटल विखाता है । वह मुसाफिर बोटलको उसके गलेसे खोलकर पीता है जिससे सचेत हो जाता है । कुत्ता पथिकको अपनी पीठपर लादकर धर्मशालेमें ले आता है । धर्मशालाओंके साधुगण उसकी भली प्रकार सेवा करते हैं वह आरोग्यता लाभ कर अपने घरको चला जाता है ।
निउफौण्ड लेण्ड डाग—नामके कुत्तेको एक साहब अपने मित्र सहित अपने साथ लिये चले जाते थे । कुत्तेके स्वामीने कुत्तेकी बहुत प्रशंसा करके कहा
पूर्व जन्म बेत्ता मृगेंद्र
कि, कितनीही दूरसे इस कुत्तेको कोई वस्तु लेनेको भेजा जाय तो वहाँसे वह वस्तु लाकर उपस्थित कर देता है। इस बातकी सत्यता प्रगट करनेको उस साहबने एक चौकोर पत्थरके बीचमें अठन्नी धरकर उस कुत्तेको दिखाकर अपनी राहली। वह पत्थर सड़कके किनारे पर पड़ा था। वह साहब घोड़ेपर सवार होकर तीन मीलके अन्तर पर गया। उसने उस कुत्तेको इशारा किया कि, अठन्नी ले आ। कुत्ता उसी समय अठन्नी लेने चट्टानके पास गया। साहब अपने घरको चला गया। साहबने घर पहुँचतेही कुत्तेकी प्रतीक्षामें सारा दिन बिता दिया पर कुत्ता न आया।
पीछे यह बात जान पड़ी कि, कुत्ता स्वामीकी आज्ञा पाते ही उसी समय उस स्थान पर आ पहुँचा। जहाँ कि, वह अठन्नी दबाई गई थी। उस चट्टानका हटाना अपने सामर्थ्यके बाहरका कार्य समझकर वहाँ खड़ा होकर भूंकने लगा। इसी अवसरमें उस पथसे दो सवार निकले उस कुत्तेको कष्टमें जानकर उनमें से एकने अपने घोड़ेसे उतरकर उस चट्टानको हटा दिया। वह अठन्नी देख उसको हटाकर अपनी जेबमें रख लिया कुत्तेके तात्पर्यको न समझ अपने घरकी राह ली। कुत्ता उनके घोड़ेके साथ बराबर बीस मील तक चला गया। सांझको दोनों सरायमें ठहरे रातके समय दोनों आनन्दपूर्वक एक कोठरीमें सो रहे वहाँकी भटियारी उनकी सेवा करती रही। वह कुत्ता भी उनकी चारपाईके नीचे छिपकर बैठा रहा। जिसने वह अठन्नी ली थी उसने उसको लेकर अपनी पतलूनकी जेबमें रख दिया था रातके समय पायजामा उतारकर खूंटोके ऊपर रख दिया। जब वे दोनों सो गये तो उस कुत्तेने पतलूनको अपने मुँहसे पकड़ लिया खिड़की द्वारा बाहर कूदकर निकल भागा। उसी खिड़कीसे वह निकल गया जो गर्मीके मौसममें वायुके आवागमनके निमित्त खुली रहा करती थी। इस कारण ही उस कुत्तेका दाव घात लगा रातके चार बजे अपने घर पहुँचा। साहबने पतलूनकी जेब खोल कर देखा तो चिह्नवाली अपनी अठन्नीको उसी प्रकार पाया उस जेबमें से घड़ी तथा एक रुपया भी निकला। साहबने ढँढोरा पिटवाया कि, एक पतलूनमें एक घड़ी तथा रुपये इस प्रकार आये हैं। इससे उस घड़ी तथा पतलूनवाले मनुष्यको पता चल गया कुत्तेकी समस्त कीर्ति खुल गई। इस जातिका कुत्ता बड़ा हिम्मतो तथा दयालु होता है। अपनेसे निर्बल कुत्तोंपर कभी भी बल प्रयोग नहीं करता।
हिरण।
हिरण बहुत ही सचेत तथा चैतन्य पशु है। उसको हितक पशु तथा मनुष्य