कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इस प्रकारसे गंगाजी नदीरूपसे देवी करके जगत् प्रसिद्ध हैं। गंगाजीके दर्शनोंकी कथा भी प्रायः प्रख्यात है।
इसी प्रकारसे देवी भागवतके उसी अध्यायमें गंडकी, सरस्वती, लक्ष्मी यमुना आदि नदियोंकी भी कथाएँ विस्तारपूर्वक लिखी हैं। जिसको देखना हो देखले।
तात्पर्य—ऐसे २ सहस्रों उदाहरण हैं जो कि, जड़ चैतन्यके आत्माकी एकता सिद्ध करते हैं। चैतन्य जड़स्वरूपमें जाता है और जड़ चैतन्य हो जाता है।
इसलामी पुस्तकें और हदीसें।
मुसलमानी पुस्तकोंमेंभी इस प्रकारका बहुत वर्णन आता है। जिनसे यह बात सुतरां सिद्ध हो जाती है।
जमीनोंकी आपसकी बातें—सफर सआदत नामक किताबमें लिखा है कि, रसूल खुदाने फरमाया कि, जमीने आपसमें बात करती हैं कि, आज मुझपर कोई मुसल्ला बिछा किसीने निमाज पढ़ा कि, नहीं।
प्यालेका आशीर्वाद—हदीस तरमजी और अविनमाजःमें लिखा है कि, मुहम्मद साहब कहते हैं कि, कोई प्यालेमें खावें उसको चाट कर साफ करे तो प्याला उसके हकमें इस्तगफार करता है। मसकात शरीफमें लिखा है कि, प्याला उसके लिये कहता है कि, अल्लाह तुझे दोजखकी आँचसे मुक्त करे जैसे कि, तूने मुझको आजाद किया है।
इन्द्रियोंकी गवाँइयाँ—लिखा है कि, कयामतके दिन सब आदमियोंको उनके फेल नामे दिये जावेंगे। पढ़े अन पढ़े सब अपने २ आमाल नामे पढ़ लेवेंगे जब गुनहगार अपना अमाल नामा पढ़ेगा तो पुकारेगा कि, यह झूठ लिखा है, मैंने इनमेंसे एक भी गुनाह नहीं किया है। खुदा उनको समझावे कि, तुमने अवश्य किया है। रोज मुनिकिर नकीर तुम्हारे गुनाहोंके लिखते थे। इस पर भी जब न मानेगा उनके शरीरके सब अंग गवाही देंगे, सब इन्द्रियाँ बोलेंगी अपने कर्मोंको प्रगट करेंगी। गुणहगार लाचारीसे मान लेवेगा, उनके गुनाहोंके अनुसार उनके माथेपर चिन्ह किया जावेगा।
सजीवमूर्तियाँ।
लात १ मनात २ गुरों नामक तीन देवियाँ बड़ी प्रतिष्ठित थीं, जिन्होंको रैश जातिवाले—अरबदेशमें (पूजते थे। मुहम्मद साहबने उनके मन्दिर और मूर्तियोंको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे कालीर मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर जीवित
मयूर, पेरू, गिनीफाउल बतख
होकर रोती हुई बाहर निकलीं जिनको २ मुहम्मद साहबने कत्ल कर डाला, मौलवी अमाउद्दीन कृत किताब तालीम मुहम्मदी देखो ।
जमीनकी जिबराईलसे बातें—अजाय बुलकिस में लिखा है कि, जब खुदाने जिबराईलको हुकुम दिया कि, जमीन परसे मिट्टी ले आओ, जिससे आदमका पुतला बनाया जावे । खुदाकी आज्ञानुसार जब जिबराईल पृथ्वीपर आकर मिट्टी लेने लगे उस समय पृथ्वी रोई कहा कि, मुझसे मिट्टी मत लो ।
बड़ी मूर्तिकी बातें—तारीख मुहम्मदी और दूसरे हदीसोंमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबका जन्म हुआ तो पृथ्वीकी सभी मूर्तियाँ गिर पड़ीं । कुरैश जातिकी सबसे बड़ी मूर्ति तीन बार मुँहके बल गिरी लोगोंने प्रत्येक बार खड़ा किया वह बोली कि, मुहम्मदसे मैं खड़ी नहीं रह सकती ।
जिस समय मुहम्मदसाहबका जन्म हुआ उस समय कंसरा बादशाहका महल कौषा उसके चौदह कँगूरे गिर गये ।
वृक्षोंकी सलाम—मुसलमानी किताबोंमें लिखा है कि, वृक्ष दीवार स्थावर आदि सब मुहम्मद साहब को सलाम करते थे पर उसको मुहम्मद साहबके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जानता था ।
पशुबल—नशकातमें कब्रकी कठिनताके बारेमें लिखा कि, जब कब्र गुनहगारोंको दबाती है तो पशु उनकी चिल्लाहटको सुनते हैं । खुदाने पशुओंमें मनुष्यसे भी बढ़कर ताकत दी है वेही सुन सकते हैं दूसरे नहीं सुन सकते ।
गदहावों फिरस्ते—तौरैतमें लिखा है कि, जब बलःआम गदहेपर सवार हो बनी इसराईलको शाप देने चला तो पहले गदहेनेही तलवार लिये फिरिस्तोंको देखा पीछे वे बल आमकी दृष्टिमें आये ।
पत्थर और दाऊदकी बातें—तारीख मुहम्मदी और हदीसोंमें लिखा है कि, साहिल नाम बादशाहने शर्त की थी कि, जो कोई जालूतको मारेगा उसको अपनी बेटी और आधा राज्य दूंगा ।
बनी इसराईलको खुदाने आज्ञा दी कि, दाऊदके हाथसे जालूत मारा जावेगा । दाऊद जालूतको मारने जा रहा था, रास्तेमें तीन पत्थर मिले, तीनोंने मनुष्यकी भाषामें दाऊदसे कहा कि, हे दाऊद ! हमसे जालूतको मार, तब जालूत मरेगा, दाऊदने वैसाही किया बादशाहकी बेटी तथा आधा राज्य पागया ।
कूआंका रोना—बहुरलअभवाजने लिखा है कि, यूसुफके भाइयोंने उन्हें कूयेमें डाल दिया, अरबके सौदागरने उन्हें निकाला तो कूआं यूसुफकी जुदाईमें बहुत रोया ।
नमरूह बादशाहकी बतख कौज, दोनोंकी प्रेमाधिक्यसे मृत्यु कौवा तथा कुलाग, कागोंका न्याय
रागसे कार्यं विशेष—रागके गानेसे बुझा हुआ दीपक आपसे आप प्रज्वलित हो जाता है। वर्षा होने लगती है, पत्थर मोम हो जाता है। चुंबक लोहा खींच लेता है।
सबकी बातें—एहवालूल आखरतमें लिखा है कि, क्यामतके निकट आनेपर वृक्ष दीवार आदि भी जड़ पदार्थ आपसमें बातें करके भविष्य कहेंगे।
इसी प्रकारकी हजारों बातें हैं कि, जड़ स्थावरके बात करनेके विषयमें लिखी हैं। जिससे सिद्ध होता है कि, जड़ चैतन्य है चैतन्य जड़ हैं; स्थावर जंगम हो जाता है जंगम स्थावर हो जाता है।
बिच्छूके बदले चांदी —मैंने लड़कपनमें अपने पितासे सुना था कि, एक दिन एक मनुष्य उजाड़ मैदानमें शौच फिर रहा था उस समय क्या देखता है कि, सफेद बिच्छूओंकी सेना तार लगाये चली आ रही है। सफेद बिच्छू उसने पहले कभी नहीं देखा था, इस कारण लकड़ीसे थोड़ेसे बिच्छूओंको पकड़के, गामके लोगोंको दिखानेके हेतु ले गया। घर पहुँचकर बिच्छूकी फौजका हाल सबसे कहकर, लाये हुये बिच्छूओंको लोटेसे दिखलाने लगा कि, जिससे लोगोंको विश्वास हो जावे। लोटेको उलटतेही बिच्छूके बदले सफेद २ चांदीके रुपये निकल पड़े। लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। लोभके मारे कितने लोग उस बिच्छूकी फौजको देखने गये पर पीछे पता न मिला कि, कहाँ चली गई।
ऐसा कहते हैं कि, जब धन लबारिस हो जाता है सौ वर्षतक उसका कोई स्वामी नहीं होता, तो वह पृथ्वीमें गड़े २ एकही जगह रहनेसे घबराता है वहांसे दूसरी जगह चला जाता है। या तो बिच्छूके रूपमें बाहरसे नाना प्रकारके स्वरूपसे पृथ्वीके भीतरसे एक जगहसे दूसरी जगह चला जाता है। जिस समय अपने स्थानको छोड़ता है उस समय बड़ा भारी शब्द होता है पृथ्वी कांपती है। जिस मनुष्यने जो दश बीस पा लिया था, उसमें उसका उतनाही भाग था, शेषके जिसका भाग होगा वह पावेगा।
जगदीशका समभाव ।
सब जीवधारियोंपर परमात्माकी समान दयादृष्टि है वह सबको एक दृष्टीसे देखता है जो जीव जिस अवस्थामें होता है वह उसी अवस्थामें उसकी रक्षा करता है वह न्यायी दयालु और भक्त वत्सल है उसकी ऊंचे नीचे सभी लोकोंपर एकही दृष्टि है। जिस लोकमें जैसा देह चाहिये वो उन्हें वैसाही देह देता है। यदि स्वर्गस्थ जीवोंको पृथिवी पर लाया जाय तो उनके देह यहाँके
खरगोशको शिकार कुत्तेसे मित्रता, मानुषी वाक् चोर बगुला मुर्ग
प्राकृतिक उपचारोंको न सह सकेंगे । अपने अपने चोलामें सुखी—सब जीवधारियोंको अपना २ चोला प्यारा लगता है । कोई नहीं चाहता कि, मेरा शरीर नष्ट हो जाय यहाँतक कि, विष्ठाके कीड़ेको भी अपना शरीर प्यारा लगता है वह भी मरना नहीं चाहता । उदाहरण—एकवार नारद महाराजने विष्णु भगवान्से पूछा कि, आपने जीवोंमें उत्तम मध्यम और अधम भेद क्यों किया है ? आप तो दयालु हैं, आपको सबको सम भावसे सुख देना चाहिये । यह सुन भगवान्ने उत्तर दिया कि, मैं स्वतः किसीको सुख दुःख नहीं देता किन्तु जीवोंकी इच्छाके अनुसार वैसीही व्यवस्था कर देता हूँ यदि कोई भी दुःखमें हो तो पूछ लो नारदजी उसी जीवोंको देखते हुए भूमिपर आये कीचके गढ़ढेमें सूकरको पड़ा देखकर उससे कहने लगे कि, तू क्यों कष्ट पा रहा है ? स्वर्ग चल, नारदजीने उसके सामने स्वर्गके सुखोंका वर्णन किया । उसने पूछा कि, वहाँ कीचड़ है वा नहीं ? क्योंकि मुझे यह कीचड़ अत्यन्त प्यारी है यह पूछकर फिर भी सूकरने कहा कि, स्वर्गमें विष्ठा है कि नहीं ? (क्योंकि, शूकर विष्ठा खाता है) नारदजीने कहा ये सब पदार्थ वहाँ कहाँ ? यह बात सुनकर शूकरने कहा कि, मैं तुम्हारे स्वर्गमें नहीं जाना चाहता, मैं यहाँही रहूँगा तुम्हारा स्वर्ग तुम्हारे लिये सदा रहो । इस विषयपर महात्माओंका एक दोहा भी है कि—
कलयुगी संत चले वैकुण्ठको, चढ़े पालकी माहिं ।
वीच राहसे फिर आयै, वहाँ भंग तमाखूँ नाहिं ॥
जो जीवधारी जिस दशामें हैं, उसी हालतमें उसकी रक्षा करनेवाला भगवान् उसके साथ मैं है, वहाँ उसकी कठिनाताको दूर करता है तथा उसी अवस्थामें उसको सुख पहुँचाता है ।
बालककी रक्षा—हिन्दुस्थानका सिपाही रास्तेमें चला जाता था, उसकी स्त्री गर्भवती थी, उसने मार्गमेंही पुत्र प्रसव किया, आप मर गई । जीवित पुत्रको देखकर सिपाही चिन्ता करने लगा कि, इस पुत्रको मैं किस प्रकार पालूंगा ? जब उसे कोई उपाय न सूझा तो गड़हा खोदकर अपनी मृतक स्त्रीको लेटा दिया उसकी छातीपर बच्चेको रख इधर उधरसे बूझोंकी डालियाँ और काँटे वगैरः लेकर उस गड़हे पर इस प्रकारसे रख दिया कि, जिसमें लड़केको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचे । पीछे अपनी नौकरीको चला गया । कुछ दिनोंके बाद छुट्टी लेकर वह अपने घर जाने लगा, उसी रास्तेसे आया, वहाँ जाकर देखा तो बच्चा बाहर खेल रहा है । गड़हेके अन्दर देखा तो उसकी स्त्रीका सर्व अङ्ग तो गल गया था पर स्तन उसी प्रकार रहे वह बच्चा उन्हें ही चूसता करता था, बच्चेने मनुष्य-
मुरगावी, उल्लू, कारभो रेण्ट
को आते देखा, तो डरकर गड़हेमें भाग गया। इस मनुष्यने उस बच्चेको गोदमें उठा लिया। बच्चा रोने व चिल्लाने लगा। सिपाहीने मिठाई वगैरः खिलाकर उसको बहुत धीरज दिया उसे लेकर अपने घर आया। धन्य है सर्वशक्तिमान् सर्व रक्षक दयालु परमात्माको जो इस प्रकार रक्षा करता है।
बनी इसराईलकी रक्षा—इस बातमें कोई आश्चर्य न करे। बाइबुलमें लिखा है कि, बनी इसराईल चालीस वर्षतक जड़लोंमें फिरते रहे, उनके पाँवके न जूते टूटे और न कपड़े फटे उनके बच्चे उत्पन्न होते थे पेटसे ही जामा पहरे निकलते थे ज्यों वे बड़े होते थे, त्यों त्यों उनका जामा भी बढ़ता जाता था। आकाशसे उनके लिये भोजन उत्तरता था, खुदा उनके साथ रहता था उनकी रक्षा किया करता एवं वही उनकी आवश्यकताको पूरा किया करता था।
कीड़ेकी रक्षा—तीन चार वर्ष हुए। एक सिकख पहाड़पर चला गया, वहां उसके पास रसोई बनानेको कोई बरतन न था। वह एक झरना पर गया, एक पत्थर पर आटा गूंधा, एक पत्थरका तावा बनाया, दो पत्थर जोड़कर चूल्हा बनाया रोटी पकाने लगा। पत्थर आगसे गरम हो गया पर दो अंगुल गरम नहीं हुआ, इसी प्रकार नित्य होने लगा। पत्थरका जो भाग गरम नहीं होता, उतने भागमें रोटी भी कच्ची रह जाती। सिकख आश्चर्यमें था कि, क्या कारण है कि, समस्त पत्थर गरम होता है पर इतना भाग गरम नहीं होता। संयोगसे एक दिन वह तावावाला पत्थर टूट गया उसमें जितनी जगह ठंडी रह जाती थी उसमें से एक कीड़ा निकल पड़ा। देखो परमात्माकी कृपालुता, किस प्रकारसे उस कीड़ेकी पालना करते हुए उसकी जान बचा दी।
मंजारीके बच्चे—हिरण्यकश्यप दैत्य अपने पुत्र प्रह्लादको मारनेके विचारमें था। प्रह्लादने कौतुक देखा था कि, एक कुम्हार अपने आवामेंसे बरतनोंको निकाल रहा है बरतन निकालते निकालते एक जगह देखा कि, बरतन ज्योंके त्यों कच्चे रह गये, उनमें तनिक भी आँच नहीं लगी उन बरतनोंको हटाने पर नीचे बिल्लीके कई बच्चे निकले। यह बात इस प्रकार हुई थी कि, जब कुम्हार बरतनोंका आवा लगा रहा था उसी समय बिल्ली आई बच्चा देकर कहीं बाहर चली गई, इतनेहीमें कुम्हारने अज्ञानतासे आवामें आग लगा दी।
यह घटना देखकर प्रह्लादको पूरा निश्चय हो गया कि, जिस प्रकार सर्वरक्षक प्रभुने बिल्लीके बच्चोंकी जान बचाई है वही मेरी भी रक्षा करेगा। परमात्माने मनुष्यको हाथ पाँव दिये हैं जिससे वह अपना काम करे, परिश्रमसे पेट भरे, वस्त्र पहने आवश्यकताओंको पूरा करे, किसी दूसरेका आसरा न करे।
चमगीदड, रक्त पीनेवाली
जबतक यह माताके गर्भमें रहता है इसके हाथ पाँव बंधे रहते हैं अपनेसे खाना पीना नहीं जानता, ऐसी विवशताकी दशामें विश्वम्भर उसकी नाभीमें एक नल लगाकर, उसीके द्वारा इसको भोजन देकर उसकी रक्षा करता है । गर्भसे बाहर होनेके पहले माताके स्तनोंमें दूध भर देता है, उसके लिये अत्यन्त प्रेमी और सच्चे सेवक उपस्थित कर देता है जो उसकी पूर्ण अवस्थामें पहुँचने तक इसके लिये अपना प्राण भी निछावर करनेको तैयार रहते हैं ।
मनुष्यको तो प्रभुने हाथ पैर दिये, पशुओंको स्वयं वस्त्र पहनाया तथा उनके भोजनका प्रबन्ध किया । मनुष्यका शरीर वस्त्रोंसे ढकता है तो अन्य जीवधारियोंके शरीर उनके बाल, पर और दुमोंमें ढक देता है कोई जड़ली जीवधारी भोजन और वस्त्रके मोहताज नहीं होते, जो जीवधारी जिस अवस्थामें है, प्रभु उनका पालन उसी अवस्थामें करता है ।
तुलना—शारीरिक सुख और विषयवासना इन्द्रसे लेकर मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े मकोड़े सबमें समान है । सब अपने भोजन छाजन और विषय भोगके ग्रहण करनेमें एकही प्रकारके हैं । सुख दुःखमें एकही समान हैं बल्कि अमीरसे गरीब अधिक सुखमें हैं, क्योंकि, संसारी वैभव जितनाही होता है उसको उतनाही चिन्ता, रोग, शोक बढ़ता है, गरीबोंको उतनाही कम होता है । निश्चिन्तता अथवा थोड़ी चिन्तामें विशेष सुख है । बहुत धनवान्, बहुत चिन्ता, शोच और भयमें पड़ा रहता है, गरीब दो रोटी खाकर बेफिक्र सो जाता है । इन्द्र जैसे इन्द्राणीसे प्रसन्न होता है, उसी प्रकार शूकर अपनी शूकरीके साथ सुखको प्राप्त होता है, इन्द्रको जैसे शूकरीसे घृणा है, वैसेही शूकरको इन्द्राणीसे भी भय है । पशुओंके राजा, मनुष्योंके राजासे किसी बातमें घटे नहीं होते ।
मनुष्यसे बन्दर—सब जीवधारी अपनी २ योनिमें उसी प्रकार सुखी हैं जैसे कि, मनुष्य अपने शरीरमें सुखी होता है । बन्दरोंके वर्णनमें लिखा जा चुका है कि, एक बाबर्ची बन्दरोंके साथ रहनेसे बन्दर बन गया । उसीके बशमें अफ्रीकाके सब बन्दर हैं । उसकी स्त्रीने बहुत कहा पर वह उसके साथ न रहा, बन्दरोंके साथही रहना अच्छा लगा ।
वस्त्रादि भोग—चिलमैन सोंप, रेशमी कीड़ा और गिरगिट आदि विविधि प्रकारके रङ्ग बदला करते हैं । उनके सामने मनुष्यकी क्या बात है चटकीले वस्त्र और उत्तम भोजन विशेष प्राप्तिसे भजनमें बाधा पड़ती है । भजनके लिये साधारण अन्न वस्त्रही उत्तम है । पक्षियोंके शरीर पर परमात्माने ऐसा वस्त्र पहनाया है कि, उसके आगे मनुष्यके उत्तम २ बहुमूल्य रेशमी वस्त्र भी तुच्छ
गायनाकी चमगीदड़ी
हैं। पक्षियोंके चमड़े नर्म हैं उनके लिये कर्ताने ऐसे वस्त्र बनाये हैं कि, जिससे उनको सर्दी और गर्मी कुछ न लगे। दो प्रकारके पक्ष बनाये हैं, एक नर्म जो नीचेके चमड़ेको बचाते हैं ऊपरके सर्दी गर्मी आदिकको रोकते हैं। पशुओंके चमड़े कठोर बनाये गये हैं उसके ऊपर कोश भी बनाये हैं। सब जीवधारियोंको उसकी अवस्थाके योग्य सब कुछ प्रदान किया है। पानीके जीवधारियोंको वस्त्रकी विशेष आवश्यकता नहीं। क्योंकि, वे अपने शरीरको जलमें छिपा लेते हैं। उनमें ऐसी शक्ति दी है कि, वे जब चाहें पानीके तहमें चले जायें अथवा ऊपर आ जायें। जलके जीवधारियोंको नाज और फल आदिककी कुछ आवश्यकता नहीं, कोई २ मछली इतने बच्चे देती हैं कि, जिससे हजारों मछलियोंका पोषण होता है। काडनाम एक मछली है जो एकही बार इतने अण्डा देती है कि, जितने पृथ्वीपर मनुष्य हैं। जब वह अण्डा देती है तो सबको पानीपर फेंक देती है, वे पानी पर तैरते फिरते हैं। सूर्यकी गरमीसे पककर बच्चे निकलते हैं पानी पीकर बड़े होते हैं, फिर एक दूसरेका भक्षण बन जाते हैं, इसी प्रकार इन मछलियोंकी उत्पत्ति बहुतायसे होती है। जैसे बिहिश्चितयोंके पास बहुत हरे हैं। उसी प्रकार मुर्गोंके पास बहुतसी मुर्गियाँ हैं, सेर आध सेर अनाजमें आदमीका पेट भरता है। सत्तर अथवा उससे भी अधिक दस्तरखॉन हो, वे सब बेफायदा हैं, जितनी विषयकी अधिकता है उतनीही अधिक खराबी है, बिहिश्चितके सब सुख मूर्खोंके लिये हैं, बुद्धिमान् बिहिस्त (स्वर्ग) को कभी अच्छा न समझेगा।
परमात्माकी दृष्टि—जीवधारियोंपर समान है, जिसको वह रक्षा करना चाहता है उसको कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। अतएव सन् १८७८ ई० में तहसील मुक्तेश्वर जिला फिरोजपुरके कानूनी नामक गाँवमें ईंटों का बड़ा भारी आवा लगा था, जब ईंट पककर ठण्डी होगई तो उठाई जाने लगीं। उस समय उनमेंसे एक चूहा निकल कर भागा, जितनी दूरतक वह चूहा रहा था उसके चारों तरफ पाँच सात ईंट कच्ची रह गई थी। इसी गाँवमें एक मरतबे लोग चूना पका रहे थे, चूना पककर ठण्डा हो गया बाहर निकालने लगे एक दोहाथकी लकड़ी ज्योंकी त्यों साबित निकली, उसमें आँचका एक भी चिन्ह न था, लोगोंने आश्चर्यके साथ सावधानी पूर्वक लकड़ीको चीरा। उनमेंसे डेढ़ हाथ लंबी एक गोर निकलकर भाग गई।
उसकी शक्ति।
वो सर्व शक्तिमान् है जो चाहे सो करे वो जंगमको स्थावर और स्थावरको
फाखता या पण्डुक कबूतर प्लेनीका मत
जंगम कर सकता है वो स्थावरोंको जंगमोंकेसे गुण देता है सब उसके हाथ है वो मनुष्यको पशु तथा पशुको मनुष्य बना सकता है ।
पहाड़से ऊँटिनी—कुरानमें लिखा है कि, किसी जातिके लोगोंने साले-दनबीकी सिद्धि देखनी चाही नबीने उनसे कहा कि, खुदा चाहे तो पहाड़से ऊँटिनी पैदा कर दे, उसी समय पहाड़से ऊँटिनी उत्पन्न हुई उसी समय उसने बच्चे दिये । होते ही वे बराबरके हो गये ये सब बाबुलके पास बहुत दिनों तक चरते फिरे थे ।
यह अपनी शक्तिमात्रसे सबकी रक्षा कर सकता है, उसकी शक्तिका कोई ठिकाना नहीं है उसी शक्तिसे सबकी समभावसे रक्षा करता है ।
उपसंहार—अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उसमें अनन्त प्रकार की उत्पत्ति है, उत्पत्तिके अनन्त प्रकारके रूप और स्वभाव हैं उसका हाल किसीको मालूम नहीं। केवल ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । केवल ब्रह्मज्ञानी वहाँ पहुँच सकते हैं ब्रह्मज्ञानीही एक पलमें करोड़ों योजन उड़ जाते हैं, अपनी सामर्थ्यसे दूसरे को भी अपने साथ ले जा सकते हैं । ब्रह्मज्ञानी जिसकी सहायता करते हैं उसका काम पूरा कर देते हैं । ब्रह्मज्ञानी सब कौतुक देख दिखला सकते हैं जैसा कि, नानकसाहब भिन्न २ लोकों द्वीपों ब्रह्माण्डों और पृथिवीको सँर करते फिरते थे, उस समय एक ऐसे स्थानपर पहुँचे जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई पुरुष, न था। उनकी उत्पत्ति आश्चर्य रीतिसे है । यह बात नानकसाहबके सफरनामे में कहीं लिखी हुई हैं । ज्ञानीलोग बड़े उड़नेवाले हैं, जहाँ चाहें वहाँ उड़कर चले जावें पर कोई २ ऐसे सुकर्मों भी संसारमें हैं जिनमें उड़नेकी सामर्थ्य नहीं ईश्वरकी कृपा उनको आसमान पर ले जाती है, जैसे कबीर साहब मुहम्मद साहबको ले गये। वाइबुलमें लिखा है कि, एक अरेशा नामक पुरुष शरीर सहित आसमान पर उठाया गया हजरत ईसा भी देहसहित आसमान पर गये, ऐसे सहस्रों पुरुष, परमात्माकी कृपासे देहसमेत ही जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हैं ।
राजा युधिष्ठिर भी देह सहित धर्मलोक गये । यह कथा महाभारत आदिमें प्रसिद्ध है, कबीरपन्थके उपग्रीता नामक ग्रन्थमेंभी लिखी है ।
यह तो पुरानी बातें हुई, अब आजकलकी बात सुनो, १८९७ ई० में फरीदकोटमें गेंदाराम नाम का एक अन्धा ब्राह्मण रहता था । तब मैं भी भ्रमण करता हुआ फरीदकोट आकर ठहरा, वह सत्संग का बड़ा अभिलाषी था, मेरे पास नित्य आया करता था ठाकुरजीकी पूजा बड़े प्रेमसे किया करता था । वो अन्धा होनेपर भी अच्छा पंडित था, उसके पास अनेकों विद्यार्थी पढ़ते थे । वो
हुद हुदपर कुरान, कप्तान वाउन जर्मनी और फ्रांसके कबूतर मैना
जाति स्मर था. अपने अन्धे होनेके बारेमें कहा करता कि, मैं दक्षिण भारतमें एक अच्छी रियासतका दीवान था राजाको राजनीतिकी शिक्षा देता था, बिना राजा-जाके कोई काम न करता था। एक दिन एक बलात्कारका अपराधी आया-राजाके पूछने पर मैंने कहा कि, उसे आँखोंसे अन्धा कर दो. वो पापी अन्धाकर दिया गया. उसी दिनसे मैं अन्धा हो गया हूँ क्योंकि, ऐसा दण्ड अनुचित था।
एक बार वो तीन दिनतक गायब रहा चौथे दिन प्रकट होनेपर उसने कहा कि, मुझे विष्णुके पारषद विष्णुलोक को लिये जाते थे मैंने पूछा कि, कहाँ लिये जाते, हो तो उत्तर मिला कि, वैकुण्ठ लिये जाते हैं, मैंने अपने घरवालोंसे मिलनेकी इच्छा प्रगट की दूतोंने मुझे सवासन जानकर लौटा दिया।
इस घटनाके बाद वो ब्राह्मण तीन माह और जीवित रहा पीछे वैकुण्ठ चला गया।
इस प्रकरणके लिखनेका मेरा यही अभिप्राय है कि, जो लोग पशु पक्षी आदिको अर्किचित्कर मानते हुये अपने मनुष्य होनेपर इतराते हैं। वे जान लें कि. जो बातें उनमें हैं वो जानवरोंमें भी पाई जाती है। सबमें इश्वरीय बातें समान हैं जो काम मनुष्य देहसे करते हैं वेही काम पशु पशुतनसे कर लेते हैं आकृतियाँ जुदी २ हैं बस्तु एकही है सबमें आत्मा है तथा परमात्माकी दृष्टिमें सब समान हैं।
दूसरा मेरा यह भी प्रयोजन है कि, जो लोग आवागमनको न मानकर अनेकों पापोंमें लगे हुये हैं, वे जानलें कि, वे कर्मवश हैं जैसे कम्मेंने मानवीशरीर प्रस्तुत कर दिया है उसी तरह कीड़ा मकोड़ा भी बना देगा इसमें कयामत आदिकी आवश्यकता नहीं है केवल कर्मही कारण है. यदि लोगोंने मेरे लेखसे लाभ उठाया तो मैं मेरे भ्रमको सफल होऊँगा जो अपनेको आवागमनके फन्देसे बचावेगा वही श्रेष्ठ है नहीं तो आवागमनके फन्देमें फसे रहनेवाले सभी समान हैं।
अध्याय २०.
अथ आदि मंगल।
दोहा— प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥
दूजा केहि विधि ऊपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥
आदि मंगलका अर्थ।
धर्मदासजी कबीर साहिबसे पूछते हैं कि, प्रथमै-चैतन्याकाशमें पड़े हुये साहिबके लोकके प्रकाश स्वरूप जो समष्टि जीव हैं। उनके संसारी बननेके
चोर मैना, रोम सेन साहिब तोता
पहिले, आप-सभोंके गुरु, समरथ-सर्वेश्वर सत्य पुरुष ही रहे-थे । सत्य पुरुष अथवा उसके पूर्वोक्त प्रकाशके सिवा, दूजा-दूसरा, कोई-कोई, न-नहीं, रहा-था । दूजा पूर्वोक्त समष्टि जीव, केहि-किस, विधि-तरहसे, ऊपजा-संसारी हुआ । गुरु-हे गुरुजी महाराज ! सोइ-वही, मैं पूछत हूँ-पूछता हूँ ।
यानी सत्यपुरुष भगवान् रामका लोक और वहांके पार्श्व आदि निवासी भगवान् रामही हैं उनसे भिन्न नहीं हैं, उनके लोकका जो प्रकाश चैतन्याकाशमें है वही समष्टि जीव है । यह किसी तरह भिन्न तथा व किसी तरह एक है । धर्मदासजीका कबीर साहिबसे यही प्रश्न है कि, भगवान्का ऐसा प्रकाश यह जीव संसारी कैसे होगया यह मुझे बताइये । वेदान्तकी दृष्टिसे तात्पर्य-सृष्टि रचनाके पहिले एक अद्वितीय सत्यपुरुषही था ये सब जीव उपकरण रहित पड़े थे, नामरूपात्मक जगत् नहीं था यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ मैं आपसे यही पूछता हूँ ॥ १ ॥
तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ॥
आदि अन्तकी परिचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥
तब-शिष्यका प्रश्न सुनकर, सतगुरु-सच्चे गुरु कबीर साहिब मुख-मुंहसे, बोलिया-बोले कि, सुजान-ऐ परम बुद्धिमान्, सुकृत-संस्कारी-जीव धर्मदास, सुनो-सुन लो । मैं तोसों-तुमसे, आदि-संसारी नाना जीव होनेसे पहिलेकी और अन्तकी, सबसे पीछेकी, पारचै-परखी हुई बात, कहौं-कहता हूँ ।
कबीर साहिबने धर्मदासजीका प्रश्न सुनकर बताना आरम्भ किया कि, आदिमें क्या था और कैसे संसारी हुआ किस तरह इसका उद्धार हो सकता है यह सब मैं तुम्हें सुनाये देता हूँ तुम सावधानीके साथ सुन लो ॥ १ ॥
प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ॥
ताते जामन दीनिया, सात करी विस्तार ॥ ३ ॥
समरथ—भगवान् रामचन्द्रजीने, प्रथम-पहिले, समष्टि जीवको अचेत पड़ा देखकर उनके कल्याणके लिये, घटमें-जीवके भीतर, सुरति-चैतन्यताका, सहज-अपने आपही, उच्चार-संचार, कियो-कर दिया, ताते इस सुरतिके कारणही, जामन-जीवपना जमानेवाली वस्तु, दीनिया-दे दी, इसके बाद जीवने, सात-इच्छा आदिक सातका, विस्तार-फैलाव, करी-दिया ।
अपने अंशरूप जीवोंकी दशा देखकर उनके उद्धारके लिये भगवान्ने उन्हें चैतन्यता दे दी साधन तो उद्धारका था पर इसने अपनेको संसारका पथिक
निशानेबाज और लिपिके जानकारी राजा रसालुके तोता मैना
बना डाला, यही इसमें जामन लग गया तब इस समष्टि जीवने सातोंका विस्तार किया। वे सात वस्तु कौनसी हैं इन्हें अगिले वचनमें बताते हैं ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चित्त मन सातों कीन्ह ॥
सात रूपनि रमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
घट-जीव समष्टिमें, दूजे-सुरति होनेके बाद, इच्छा-में एक हूँ, अनेक हो जाऊं यह इच्छा, भई-होगई। इसके बाद, चित्त-चित्त, मन-मन तथा बुद्धि-अहंकार, मैंही ब्रह्म हूँ यह अनुभव और जीव ये, सातों-सात, कीन्ह-किये। सात रूपनि-इन्हीं सातों रूपोंमें, रमाइया-सब रम गये, काहु-किसीने भी, अविगत-नहीं जाननेवाला समर्थ, न-नहीं, चीन्ह-जाना।
जीव समष्टिको सुरति मिलनेके बाद अनेक होनेकी इच्छा हुई। इसके बाद उसे क्रमशः चित्त, मन बुद्धि, अहंकार और मैं ब्रह्म हूँ यह अनुभव हुआ। तथा उसीसे जीव भी हो गया ॥ ४ ॥
तब समरथके श्रवणते, मूलसुरति भइ सार ॥
शब्द कला ताते भई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
तब—उसके बाद, समरथके—भगवान् राम के, श्रवणते—रामनाम सुननेके कारण, यही, मूल सुरति—राम नामकी सुरति, सार (मुख्य रूप), भइ-हुई। ताते—इसी राम शब्दसे पाँच-पाँच, ब्रह्म-ब्रह्मोंके, अनुसार-अनुकूल, शब्दकला-शब्दके टुकड़ोंसे नाम, भई-हुए।
चैतन्यता देनेके बाद समष्टि जीवसे कहा कि, राम नामको जपिके मुझे पहिचान ले, मेरे हंसोंमें हो जानेके बाद मैं तुझे अपने लोकमें बुला लूंगा पर समष्टि जीवने इसका विपरीत अर्थ समझा उसके असली अर्थ छोड़कर र् का परा १ आद्या शक्ति, अ का ओम् २ अक्षर, आ का ३ नारायण, ४ म् का संकर्षण, आदि पुरुष, विराट्, हिरण्यगर्भ और अ का-५ महाविष्णु मतलब निकाल लिया एवम् इसका वास्तविक र्-जानकी, र-राम, आ-भरत, म्-लक्ष्मण और अ-शत्रुघ्न तथा रं का-हंस अर्थ होता है यह न समझ सका। तथा उसकी बुद्धिमें यही आया कि, मेरे किये अर्थ असली अर्थके अंश मात्र हैं अंशी नहीं हैं ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचें अंड धारे, एक एकमा कीन्ह ॥
दुइ इच्छा तहें गुप्त हैं, सो सुकृत चित चीन्ह ॥ ६ ॥
पाँच-पाँच, अण्ड-स्वरूप, धरि-बनाकर, एक एकमा—एक एकमें, एक एक करके, पाँच-पाँचौ ब्रह्म, कीन्ह-कर दिये। तहें-तहां, दुइ-दो, इच्छा-
रसालुका अन्तर्दृष्टि तोता
एक तो कारणरूपा इच्छा जो समष्टि जीवमें सुरत देनेसे पहिले थी जिसने कि, इसे जगत् मुख किया । दूसरी वह इच्छा जिससे कि, सुरति पाकर अनुभव ब्रह्म खड़ा किया यही माया परा शक्ति है इस प्रकार ये दो इच्छाएं हैं ये, गुप्त-छिपी हुई, हैं-हैं । कृत-हे धर्मदास । सो उन्हें, चित-दिलमें, चीन्ह-जान लो ।
पांचों ब्रह्मोंके लिये पांच स्वरूप तयार करके एक २ को एक २ में स्थापित कर दिया उसमें दो इच्छाएं गुप्त हैं हे धर्मदास ! तुम उन्हें जानलो । संकर्षण, परा योगमाया, शब्द ब्रह्म, नारायण और महा विष्णु ये पांच ब्रह्म हैं इनमें उक्त दोनों इच्छाएं छिपी हुई हैं ॥ ६ ॥
योगमाया यकु 'कारण, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥
या अविगति समरथ करी, ताहि गुप्त करि दीन्ह ॥ ८७ ॥
योग माया-एक तो योग माया, और यकु-एक, कारणे-एक कारण जगत्मुख करनेवाली इच्छा ये दो इच्छाएं हैं । ऊजे-उन्होंनेही, अक्षर-ब्रह्म, कीन्ह-किया, अविगति-समझने न पानेवाले, समरथ-समर्थ श्री रामचन्द्रजीने, या-यह, करी-किया, ताहि-उस इच्छाको, गुप्त-तिरोहित, करि-कर, दीन्ह-दिया ।
एक तो परा आद्यायोगमाया तथा दूसरी कारणरूपा इच्छा है जिसके कारण समष्टिजीव संसारी बनता है इन्होंनेसे उक्त पांचों ब्रह्म बने हैं । भगवान् रामने इन इच्छाओंको गुप्त कर दिया है । इस कारण ये भी नहीं समझ पाये ॥७॥
शवासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ सन्त सुजान ॥ ८ ॥
सोहम्-अनुभव गम्य ब्रह्म मैं हूं यह, शवासा-समष्टिजीव आदि पुरुषके श्वाससेही, ऊपजे-उत्पन्न होता है इसीने, अमी-अमृत जैसे प्यारा लगनेवाली वस्तुका, बन्धन-बन्धान, कीन- किया । उसके आठ अंश-आठ भाग निरमाइया-बनाये, सुजान-हैं परमबुद्धिमान्, सन्त-महापुरुषो, चीन्हो-पहिचानो ।
समष्टिजीव आदि पुरुष हिरण्य गर्भके श्वाससे सोहंकी उत्पत्ति होती है इसीने मीठी वस्तुका बन्धन कर दिया कि, इनके बन्धनमें लोग बन्धे रहें उसके अणिमा आदिक आठ भेद किये । ए सत्य सुजानो ! यह जान लो इनके बखेंडेमें मत पड़ो । ये आठों सिद्धियां योगशास्त्रमें प्रसिद्ध हैं । ये बड़ी सिद्धियां थोड़ेही समयमें नष्ट हो जाती हैं ॥ ८ ॥
लंगड़े तोतेकी बातें
तेज अण्ड आचिन्त्यका, दीन्हो सकल पसार ॥
अण्ड शिखा पर बैठिके अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
आचिन्त्यका—चिन्तनमें न आनेवाले रामका, तेज, अण्ड—अण्डेकी सूरतमें कल्पित किया गया जो तेज रेफ उसका माया मुख अर्थ जो पराशक्ति है उसने, सकल-सारा, पसार—फँलाव, दीन्हों—कर दिया, वही अण्ड-ब्रह्माण्डकी, शिखापर—चोटीपर, बैठिके—बैठकर, अधर—नीचेकी ओर, दीप—प्रकाशका, निरधार—निर्माण किया ।
रके जगत मुख अर्थ पराआद्या शक्तिने सारे संसारको बनाकर खड़ा कर दिया वही इस ब्रह्माण्डकी चोटीपर बैठकर नीचेके लोकोंको प्रकाशित कर रही है ॥ ९ ॥
ते अचिन्तके प्रेमते, उपजे अक्षर सार ॥
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
ते-उस, अचिन्तके—भगवान् रामके नाम, प्रेमते—प्रेमके कारण, सार—सबमें प्रधान, अक्षर-ओम्, उपज्यो-उत्पन्न हुआ, उसके, चारि-चार, अंश—भाग, निरमाइया—निरमाण—किये, उसीसे चारि-चार, वेद-वेदोंका, विस्तार—निर्माण हुआ ।
रामनामके जानने की चिन्तासे इसीसे ओम् शब्द प्रकट हुआ, यही सार अक्षर है इसके अ, उ, म् और बिन्दुसे चार वेद उत्पन्न हुए ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ॥
वे समरथ अविगति करी, मर्म कोई नहिं जान ॥ ११ ॥
तब—इसके बाद, योगमायाने, अक्षरका ओम् शब्दवाच्य ईश्वरको नींद—निद्रा, मोह-असावधानी, और अलसान—आलस्य, दीनिया—देदिये वे वेदोंने, अविगति—नहीं समझमें आनेवाले, समरथ—समर्थ भगवान् रामकी स्तुति, करी—की है, पर कइ—कोई, मर्म—इस तात्पर्यको, न-नहीं, जान-जानता ।
योगमायाने ईश्वरको नींद मोह और आलस्य देदिया, वेदोंने भगवान् रामकी बड़ी प्रशंसा की है पर इसे कोई समझ नहीं सकता सब माया मुख अर्थ करके भूल रहे हैं ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींद गै, देवी सुरति निरवान ॥
श्यामवरण यक अंड है, सो जलमें उत्तरान ॥ १२ ॥
एक चालाक तोता हृष्य देशका तोता, झिङ्कीकी नकल तोतेकी ईर्ष्या
जब—जिस समय, अक्षरके—अक्षरपदवाच्य नारायणकी, नींद—निद्रा गे—चली गई, तब, निरबान्-निराकार, सुरति—चैतन्य, दबी—सबमें प्रविष्ट हुआ, श्याम वरण-श्याम रंगका चतुर्भुजी, यक—एक, अण्ड रूप, है— होकर—सो, वह, जलमें—पानीमें, उतरान—रहने लगा ।
अक्षरपदवाच्य नारायण भगवान्को योगमायाने जगा दिया वह श्यामल कोमलांग चतुर्भुजी होकर पानीमें निवास करने लगा ॥ १२ ॥
अक्षर घटमें ऊपजे, व्याकुल संशय शूल ॥
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
अक्षर—नारायणके, घटमें—नाभिमें, ऊपजे—कमल उत्पन्न होता है, उससे अण्डा—यह ब्रह्माण्ड, किन—किसने, निरमाइया—बनाया, अण्डका—इस, अण्डेका, मूल—जल, कहाँ कौनसी जगह है. इस, संशय—सन्देह रूपी, शूल कांटेसे व्याकुल—घबरा गया ।
नारायणकी नाभिके कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ उसे सन्देह हुआ कि, इस ब्रह्माण्डको किसने बनाया, एवं इसकी जड़ कहाँ है ॥ १३ ॥
तेही अंडके मुखपर, लगी शब्दकी छाप ॥
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दश द्वारे कढ़ि बाप ॥ १४ ॥
तेही—उसी, अण्डके—ब्रह्मारूपी पिण्डके, मुखपर—मुंहपर, शब्दकी—वेदोंके सारका, छाप—चिह्न, लगी—लगा, अक्षर—समष्टि जीवकी, दृष्टिसे—जगत् मुख, दृष्टिसे, बाप—मायाशबलित ब्रह्म, दश—दश, द्वारे—इन्द्रियोंसे, कढ़ि—निकलकर, फूटिया—फँल गया ।
नारायणने ब्रह्माको ओम्का उपदेश दिया ब्रह्माने उसका जप किया उसीसे चारों वेदोंका प्राकट्य हुआ । वेदोंका भी जगत् मुख अर्थ देखा गया उस समय माया शबलित ब्रह्म दशों इन्द्रियोंका विषय और इन्द्रिय बनकर बाहिर निकल संसार बन गया ॥ ४ ॥
तेहिंते ज्योति निरज्जनौ प्रकटे रूपनिधान ॥
काल अपरबल वीर भा, तीन लोक परधान ॥ १५ ॥
तेहिंते—उसी, रामनामसे, रूपनिधान—रूपके खजाने, निरंजनौ—माया रहित ज्योति महाविष्णु, प्रकटे—उत्पन्न हुए येही, तीन—तीनों, लोक—लोकोंमें, परधान—मुख्य, अपरबल—अमित बलवाले, वीर—बलवान्, काल—काल, भा—हुए ।
इसी नामसे विरजा पार निवासी श्री महाविष्णु भये ये मायासे परे हैं
ईर्ष्यसि हत्या, स्वाद तोतेकी चोरी पर आश्चर्य सरायका तोता
माया तो विरजाके इसी पार रह जाती है तीनों लोकोंमें येही मुख्य हैं इनके बलकी कोई तुलना नहीं है ये यमोंके भी यम हैं काल भी इनके भयसे काम करता रहता है ॥ १५ ॥
ताते तीनों देवभय', ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
चारि खानि तिन सिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
ताते-उससे, ब्रह्मा-ब्रह्माजी, विष्णु-विष्णुजी, महेश-महादेवजी, ये तीनों-तीन, देव-देवता, भे-हुए, तिन-इन्होंने, मायाके-मायाके, उपदेश-बलसे, चारि-चारों, खानि-स्वेदज आदि, सिरजिया-रचा दिये ।
काल पायकर ब्रह्मा विष्णु और महेश उत्पन्न हुए इन्होंने मायाके बलसे चारि खानि चौरासी लाख जीव बना दिये ॥ १६ ॥
चारि वेद षट् शास्त्रउ, औ दश अष्ट पुरान ॥
आशा दै जग बांधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
चारि-चारों वेद-वेद, औ-और, दश-दश, अष्ट-आठ, पुरान-पुराण, और षट्शास्त्र-छओ शास्त्रोंने, ऊ-भी, आशा-आश, दै-देकर, जग-संसारको, बांधिया-बांध दिया, उसमें, तीनों-तीनों, लोक-लोक, भुलान-भूल गये ।
चारि वेद, अठारह पुरान और छओ शास्त्रोंकी मायाने जीवोंको आशा देकर बांध दिया इसीमें तीनों लोकोंके प्राणी भूल रहे हैं ॥ १७ ॥
लख चौरासी धारमाँ, तहाँ जीव दिय बास ॥
चौदह यम रखवारिया, चारि वेद विश्वास ॥ १८ ॥
लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धारमाँ-धारामें, तहाँ-उस जगह, जीव-जीवोंको, बास-निवास, दिया-दिया, जहाँ कि, चौदह-चौदह, यम-यमराज, रखवारिया-निगरानी करते हैं, और चारि वेद-चारों वेदोंका, विश्वास-विश्वास है ।
इस चौरासी लाख योनिकी धारावाले संसारमें इस जीवको उस जगह निवास दिया गया है कि, जहाँ चौदह यम इसकी निगरानी करते हैं एवम् यह चारों वेदोंका यथार्थ अर्थ न समझकर इतस्ततः विश्वास करते हैं ॥ १८ ॥
आपु आपु सुख सब रमें, एक अंडके माहिं ॥
उत्पत्ति परलय दुःख सुख, फिरि आवहिं फिरि जाहिं ॥ १९ ॥
एक एकही, अण्डके-ब्रह्माण्डके, माहिं-भीतर, आपु आपु-अपने अपने, सुख-आनन्दमें, सब-सारे जीव, रमें-रम रहे हैं, इस कारण इसीमें, उत्पत्ति-
अभ्यागतोंसे बात ट्रापर बातें, विलीयमका तोता तोता नामा बुलबुल
सृष्टिकी रचना होती है, इसीसे, परलय-प्रलय होता है, सुख-आनन्द और दुःख-कष्ट, इसीमें हैं, फिर वारंवार, आवै-जन्म लेते हैं, फिर-वारंवार, जाहि-मरते हैं ।
एकही ब्रह्माण्डके भीतर अनेक तरहके प्राणी अपने २ सुखके लिये आप प्रयत्न कर रहे हैं । उत्पत्ति, प्रलय, सुख, दुःख, जन्म और मरण सब इसीमें हैं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसो कहिदेत ॥ २० ॥
तेहि-उसके, पीछे-पीछे, हम-मैं, सत्य-साचे, शब्दके-रामनामके, हेत-कारन, आइया-आये । आदि अन्तकी सर्व प्रथम रामनामके जगत् मुख अर्थसे संसारकी तथा रामनामके यथार्थ अर्थ जानकर साहिबके लोकमें गमन की । उत्पत्ति-प्राप्ति, जैसे हुए, सो-वही, तुमसों-तुमसे, कहि-कहे, देत-देत है ।
उद्धारके लिये दिये गये रामनामका उलटा अर्थ देखकर हमें भगवान्ने भेजा जिस तरह जगत् हुआ एवं जैसे हमारे बताये हुए अर्थका अनुसंधान करनेसे साहिबके लोकको चला जाना होता है यह सब बात हम तुमसे कहे देते हैं ॥ २० ॥
सात सुरति सब मूल है, प्रलयहु इनहीं माहि ।
इनहीं मासे उपजे, इनहीं माहि समाहि ॥ २१ ॥
सब-सबका, मूल-मुख्य कारन, सात सुरति-पहिले बताई हुई सात सुरति हैं, प्रलयहु-प्रलय भी, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर है, इनहीं-इन्हींके, मासे-भीतरसे, उपजे-उत्पन्न होता है, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर, समाहि-लय हो जाते हैं ।
दोनों इच्छाएं तथा पांचही सबके मूल कारण हैं इन्हींसे उत्पत्ति होती है एवम् प्रलय भी इन्हींमें हो जाता है ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथ कर, रहे सो अछप छपाई ॥
सोई संधि लै आइया, सोवत जगहि जगाई ॥ २२ ॥
सोई-वही यह समष्टि जीवने, समरथ-अपनेको समर्थका, ख्याल-ध्यान, कर-कर लिया । सो-वे, अछप-न छिपनेवाले, इसकी दृष्टिसे, छपाइ-छिप, रहे-गये । सोई-उसी, सन्धि-बीचके, समाधानको, लै-लेकर, आइया-आया, सोवत-सोते हुए, जगहि-संसारको, जगाइ-जगानेके लिये ।
समष्टि जीवने अपनेको सब कुछ मान लिया इस कारण व्यापक राम इसकी दृष्टिसे ओझल हो गये । जिस सन्देहमें जीव पड़ गया है मैं उसीका
बुलबुलोंकी मानुषी वाचा चण्डूल और सांप
समाधानको लेकर मैं आया हूँ कि, संसारी प्राणियोंको असली अर्थ बता दूँ जिससे सबका उद्धार हो जाय ॥ २२ ॥
सात सुरतिके बाहिर, सोरह संखिके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥ २३ ॥
सात-सातों, सुरतिके-सुरतियोंके, बाहिर-बाहिर, और सोरह-सोलह, संखिके-संख्यक कलाओंके, पार-किनारेपर, तहैं-वहाँ, समरथको-समर्थ श्रीराम भगवान्का, बैठका-बैठनेकी जगह है, वही हंसनकेर-हंसोंका, अधार-आधार है ।
जहां सातों सुरति नहीं पहुँच सकती, जहां सोलहों कलाओंकी कोई कहानी नहीं है वहां भगवान् राम विराजते हैं वही भगवान्के हंसोंका आधार है ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनै हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
हम-हमने, सबसों-सभीसे, घर घर-घर घर जाकर, कही-कह दी, पर, हमार-हमारा, शब्द-रामनामका अर्थ कोई, न-नहीं, सुने-सुनता, ते-वे, लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धार-धारावाले, भवसागर-संसार सागरमें, डूबहीं-डूबेंगे ।
हमने घरघर जाकर रामनामका असली अर्थ बताया है पर हमारे कहेंको कोई नहीं सुनता इस कारण न सुननेवाले अज्ञानी चौरासी लाख योनियोंकी धारवाले संसार सागरमें अवश्य डूबेंगे ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥
इति आदि मंगल ।
उत्पत्ति आदिका-उत्पत्तिकी आदिके, मङ्गल-मङ्गलको, ऐ सुजान-ज्ञानवान, सन्त-महात्माओ, सुनियो-सुन लीजिये । कबीर-कबीर साहिब, कह-कहते हैं कि, गुरु-सबके गुरु, जाग्रत-निभ्रान्त, समरथ-समर्थ श्री राम-चंद्रजीका, फुरमान-कहन है ।
कबीरसाहिब कहते हैं कि, हे ज्ञानवान महात्माओ ! मैं उत्पत्तिकी आदिके मंगलको कहता हूँ यह कोई मेरी ओरसे बना हुआ नहीं है किन्तु मायारहित सबके गुरु श्रीरामचन्द्रजी महाराजका ही यह कथन है वही मैंने आपको सुना दिया है ॥ २५ ॥
सार-भगवान् रामने जीवोंके उद्धारके लिये समष्टि जीवको चैतन्यता दी पीछे उसे उपदेश दिया कि, तुम रामनामका अर्थ समझ लो इसीसे मेरे हंसोंमें हो जाओगे मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा । राम शब्दके 'र' का जानकी 'र'
विचित्र कर्तव्य
का श्रीराम, 'आ' का भरत, 'म्' का लक्ष्मण, 'अ' का शत्रुघ्न, हंस यह असली अर्थ है पर समष्टि जीवमें जो कारणरूपा इच्छा थी, उससे इसने इन नामका कुछका कुछ अर्थ समझा । 'र' का परा आद्या योगमाया, 'अ' का अक्षर, 'आ' का नारायण 'म्' का संकर्षण और 'अ' का महाविष्णु अर्थ समझा । यही समस्तकर यह संसारी हो गया । वास्तवमें असली अर्थोंके भ्रामिक अर्थ अंश हैं जो अंशीके रूपमें समझे जा रहे हैं । कारणरूपा अविद्याने इतनाही कार्य नहीं किया किन्तु चित्त मन बुद्धि तथा मैं ब्रह्म हूँ इस अहङ्कार को भी पैदा किया, इसी अहङ्कारने एकसे अनेक होनेकी इच्छा प्रकट की । इस तमास बखेड़में दो इच्छाएं काम कर रही हैं, पहिली तो कारणरूपा इच्छा जिसे कह चुके हैं, दूसरी योगमाया है इसीने संसारको रच दिया यही प्रकाशित कर रही है । मैं ब्रह्म हूँ उस अनुभवसे होने वाला ब्रह्म समष्टि जीवके श्वासके पैदा हुआ । उसीने अष्ट सिद्धियाँ तथा काली आदि आठ ईश्वरोंको उत्पन्न किया । सत्यपुरुषने उद्धारके पथका जगत् मुख अर्थ देखकर मुझे भेजा कि, रामनामका सन्ध्या अर्थ बताकर संसारका कल्याण करूँ मैं रामनामका सन्ध्या अर्थ समझाकर लोगोंका कल्याण करने आया हूँ जो मेरा कहना मान लेगा उसका उद्धार हो जायगा जो न मनेगा वो संसारमें भटकता फिरेगा ॥ ॥ इति आदि मङ्गल ॥
जीव हत्या और मांस मदिराका निषेध ।
निकृष्ट घृणित पदार्थोंसे मन लगानेवालेको कभी भी प्रकाशका मार्ग न मिलेगा । जिस प्रकार कालिससे जल काला हो जाता है उसी प्रकार घृणित पदार्थोंके ग्रहणसे अन्तःकरण अशुद्ध एवं शुद्ध पदार्थोंके खानेसे स्वच्छ और ज्ञानमय हो जाता है । जो लोग अपने अन्दर घृणित वस्तुओंको डालते हैं, उनके अन्तःकरणकी शुद्धि होनी असम्भव है, वे कभी भी सत्यगुरुके मार्गको नहीं पा
१ इस आदि मंगलमें कबीर साहिबके अवतार धारण करनेका प्रयोजन एवं कबीर दर्शन अत्यन्त सावधानीके साथ कहा गया है तथा इतना गूढ़ कि, कबीर साहिबके आज्ञाकारी हंस श्री विश्वनाथजी देव महाराज रीवाँकी टीकाके बारम्बार पथ्यालोचन करनेसे भी जलदी ध्यानमें नहीं आता इस कारण अनुवादकने इसका अर्थ साथही साथ कर दिया है ।
यद्यपि अनुवादक कबीर साहिब तथा साहिबके हंसोंकी वाणीको समझनेकी कोई शक्ति नहीं रखता पर यह इस तुच्छ हृदयमें उन्हींकी प्रेरणा हुई है जिससे उक्त अर्थ किया गया है । यदि कोई चूक हो तो भी भक्तजन केवल श्रद्धापर ध्यान देकर क्षमा कर देंगे । केवल इतनाही लक्ष्य है कि, कबीर साहिब के अक्षरों की और कबीर पन्थी तथा दूसरों भावुकों का पूरा ध्यान हो ।
समझदार चिड़िया थसकी बोली, मुर्ख सीना, बड़ी आवाबील सांप निकालनेवाली, रेल
सकते, न उनका मनही कभी निश्चल हो सकता है। मनुष्यके खाने पीनेके लिये जो शुद्ध पदार्थ नियत किये गये हैं, उनको खाने पीनेसे अन्तःकरण शुद्ध होता है। यद्यपि जड़ और चैतन्यमें एकही आत्मा है तो भी अङ्गुरजका भक्षण शुद्ध है। पाशुविक भोजनसे मन शुद्ध नहीं हो सकता पशु और मनुष्य दोनों भाई हैं, इस कारण, अपने भाईका मांस मत खाओ, भाईको मत मारो, उसका रक्त पात न करो, उसको दुःख देनेसे नरककी राह खुलेगी, सुख शांतिका मार्ग एकदम बन्द हो जावेगा; सत्यगुरु कभी कृपा भी न करेंगे।
मांस खाना और शराब पीना, अपने भाइयोंके रक्तपात करनेके बराबर है इसका बदला अवश्य देना पड़ेगा। जिस प्रकार मां, बहन, बेटो और स्त्री चारोंका रूप एकही है पर उनमें अपनी विवाहिता स्त्रीहीसे सम्भोग करनेकी आज्ञा है। दूसरीकी ओर दृष्टि उठाना भी महापाप है तब जो कोई अपनी विवाहिता स्त्रीके अतिरिक्त दूसरोंपर दृष्टि करेगा, वह अवश्य घोर नरकका वासी होगा। इसी तरह मनुष्यके खाने योग्य अंकुरज पदार्थ, भक्षण किये जाय तो अन्तःकरण अशुद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि, वे मनुष्यके मुख्य भोजन हैं, भोजन किये बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। इस कारण भोजनको कुछ चाहिये। अशुभ कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ेगा, फल भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता। कबीर साहिबने कहा है कि
साखी—कबीर कमाई आपनी, कभी न निषफल जाय।
सात समुन्दर आडा पड़े, मिले अगाऊं धाय ॥
संस्कृतके अनेक योग्य पुरुषोंके वचन है कि—“अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्” किये कर्म अवश्य भोगने पड़ेंगे चाहे सात समुद्र बीचमें आजाय पर भोग नहीं टाल सकता।
बदलेपर दृष्टान्त—एक अङ्ग्रेजी समाचार पत्रके १८७९ के दिसम्बरके परचेमें लिखा था कि, अमेरिका देशका एक कसाई बहुत बीमार पड़ा, समस्त शरीरमें सूइयां चुभानेके समान कष्ट, होने लगा वह बहुत कुराने लगा। कष्टके मारे बहुत दुःखी हुआ, पर प्राण न निकले, उसी दशामें उसने जिनका बध किया, था, उन जीवधारियोंकी बहुत भयानक स्वरूपसे अपना बदला लेने उपस्थित देखा। उनके भयानक दृश्यको देखकर बहुत भयभीत हुआ. अनुमानकर लिया कि जिन जीवधारियोंका मैंने बध किया है वह मुझसे बदला लेने आये हैं।
वह उनसे बचनेका उपाय शोचने लगा. पर कोई न सूझा, अन्तमें अपने कमाईके दो लाख रुपयोंके नोटोंको इस विचारसे जला दिया कि, यह मेरे
पफन, कासबीक, भुजंगा
पापकी कमाई है। यदि इनको छोड़ जाऊगा वा किसीको दे जाऊगा तो भोगने-वाला भी मेरेही समान कष्टमें पड़ेगा, उस समय उसका प्राण निकल गया ।
अभक्ष्यपर कबीर साहिब ।
अभक्ष्य निषिद्ध एवं घृणित पदार्थोंके विषयमें कबीर साहबकी अनगिनित साखिया तथा अनन्त शब्द प्रचलित हैं उनमेंसे थोड़ासा यहां भी लिख देता हूँ जिससे लोग जान जायें कि, कबीर जैसे निष्पक्षपातीभी इसको कितनी बुरी दृष्टिसे देखते थे ।
कबीर— मांस अहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जानि ।
ताकी सङ्गति मति करो, होय भगतिमें हानि ॥ १ ॥
कबीर— मांस खायते ढेर सब, मद पिये ते नीच ।
कुलकी दुरमति परिहरै, राम भजेतेँ ऊँच ॥ २ ॥
कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर नरकहिं जायंगे, माता पिता समेत ॥ ३ ॥
कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर जड़से जायँगे, ज्यों मूलीका खेत ॥ ४ ॥
कबीर— मांस खाय अरु मद पिये, धन विपसा जो खाय ।
जुआ खेल चोरी करे, अन्त समूला जाय ॥ ५ ॥
कबीर— मांस मांस सब एकही, मछली हिरनी गाय ।
आँख देखि जो खात हैं, सो नर नरके जाय ॥ ६ ॥
कबीर— ब्राह्मण राजा चार वरणके, और कौम छत्तीस ।
रोटी ऊपर माछली, सभी वरण गये खीस ॥ ७ ॥
कबीर— कलियुग केरे ब्रह्मणा, मांस मछरिया खाँय ।
पाय लगे सुख मानही, राम कहे मर जाँय ॥ ८ ॥
कबीर— पाँव पुजावैं वैठिके, भखें मांस मद दौय ।
तिनकी दीक्षा मुक्ति नहीं, कोट नरक फल होय ॥ ९ ॥
कबीर— सकल वर्ण एकत्र है, शक्ति पूजि मिलि खाहिं ।
हरिदासनकी भ्रान्ति कर, केवल यमपुर जाहिं ॥ १० ॥
कबीर— विष्ठाकी चोका दिये, हांडी सीझे हाड़ ।
छूत बरावे चामकी, इनहुँका गुरु रौड़ ॥ ११ ॥
कबीर— जिव हिंसा किये, प्रगट पाप शिर होय ।
निगम पुण्य स्थाप ते, देखि न आया कोय ॥ १२ ॥