कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मुन्नत
१४—शरीरके ऊपर द्वादश तिलक लगावे । कपालमें खड़ी लकीरके समान सीधा तिलक करे, वैसेही मस्तक दोनों ओँख, नाभि, हृदय, दोनों भुजा और दोनों छातियोंसे लेकर मोढेकी ओर फिरता हुआ, पीठ और कानपर तिलक करे ।
१५—उज्वल वस्त्र श्वेत रखे ।
१६—ग्रीवामें तुलसीकी माला एवं तुलसीकी कंठी धारण करे ।
१७—सत्यनामका जप, कीर्तन और भजन करता रहे ।
१८—सत्यपुरुषकी भक्ति तथा सत्यपंथका उपदेश करे । एक मनुष्यको सत्यपुरुषकी भक्ति और सत्यपंथमें प्रवेश करानेके फल करोड़ों गऊओंको कसाईके हाथसे बचानेके पुण्यसेभी बढ़कर है ।
१९—यंत्र, मंत्र, तंत्रादिकी ओर कभी ध्यान भी न दे क्योंकि, ये मुक्ति और भक्तिके शत्रु हैं । इनका साधन करनेवाला छल कपटके व्यसनमें फँसकर महादुराचारी हो नर्कका अधिकारी हो जाता है । जितने तंत्रादिक साधन हैं सब नर्ककेही मार्ग हैं ।
२०—स्वसंबेदके बिना दूसरी पुस्तकोंसे मुक्ति पथ मिलनेकी आशा न रखना चाहिये परन्तु अन्य पुस्तकोंका बोध और ज्ञान बृद्धिके हेतु पढ़े ।
२१—सत्य कबीर और उनके सच्चे हंस और कंडिहारके बिना दूसरेको मुक्तिपथका दर्शन नहीं समझे ।
२२—पारख गुरुकी शिक्षा बिना कदापि मुक्ति नहीं होती ।
२३—सत्य पुरुषकी भक्तिके बिना अन्य सब भक्तियाँ भवसागरमें डुबानेवाली हैं ।
२४—सकाम तीर्थ व्रत आदि सब यमके बन्धन हैं ।
२५—सकाम नौधाभक्ति और चार प्रकारकी मुक्तिकी चाह सब बन्धनही हैं ।
२६—कामी निर्गुण और सगुणके ध्यान करनेवाले भी हों बंधनमेंही रहते हैं ।
२७—हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सब जाति और धर्मके लोग कबीर पंथमें मिल सकते हैं, सबके हेतु समानही भक्ति और मुक्ति है ।
१ यंत्र मंत्र तंत्रका आशय, देखो पण्डित श्रद्धाराम फिल्लोरी विरचित सत्यामृत प्रवाह पृष्ठ १८० में ।
२ वेदादि विद्या सब, बोध हेतु हिय धार ॥ सब मत महरम करे, तब देखे निज सैन ॥
३ कबीर— हम वासी वहि देशके, जहाँ जाति वरण कुल नाहि ।
शब्द मिलावा होय रहा, देह मिलावा नाहि ॥
जाकी मर्यादा जौन विधि, बरते सोई प्रमान ।
जमा माँहि कछु भेद नहि, उज्वल धर्मओ ज्ञान ॥ ६
कुरबानी
२८—नर्क स्वर्ग तथा अन्य सर्व लोक अज्ञानियोंके हेतु ठहराये गये हैं जिसको सत्य आत्मज्ञान प्राप्त हुआ उसके हेतु सब असत्य और भ्रम मात्र हैं ।
२९—सारशब्दके बिना मुक्तिका द्वार कोई भी नहीं है ।
३०—निन्दा, ईर्षा, वैमनस्य, छल, कपट, अभिसान आदि मुक्तिके बँरी हैं ।
३१—अधीनताके द्वारा सब शुभ गुण और पुण्य प्राप्त हो जाते हैं ।
३२—मुक्तिमार्ग बहुत सांकरा और नर्कका मार्ग बहुत चौड़ा है ।
३३—कबीर साहब विदेह हैं उनका देह कभी नहीं कल्पे है ।
३४—कौसीही विपत्ति क्यों न आपडे अपने सत्यगुरुको छोड किसी दुसरेकी सहायताका ध्यान न करे । सत्यगुरुके अतिरिक्त किसीसे भी किसी प्रकारकी आशा न रखे ।
३५—जो कोई सतगुरुकी शरणमें आवे उसे शरणके नियमोंको भली प्रकार पूर्ण करना उचित है । पूर्ण विश्वास रखे कि, सत्यगुरु अवश्य कालके जालसे निकालेंगे और दुखसागरसे पार करेंगे ।
३६—सत्यगुरुकी कृपाका धन्यवाद कभी न भूले क्षण क्षणमें धन्यवादही देता रहे । ऐसा नहीं कि, प्रथम तो प्रार्थना करे पीछे भूल जावे कृतघ्नी कभी मुक्त नहीं होता ।
३७—ईश्वरीय भय मुक्तिका चिह्न है । मृत्युको सदा स्मरणमें रखे ।
३८—सच्चे प्रेमके बिना भक्ति निष्फल है ।
३९—धन्य हैं वे जो शरीरका मोह छोडकर भक्तिमें लगते हैं ।
४०—उदारताके बिना कोई भी भक्तिका पद प्राप्त नहीं कर सकेगा । उदार दोनों लोकोंमें सुखी होता है । उसका थोडा पुण्यभी बहुत फलदायक होता है । कृपणके भजन और तपस्या निष्फल होते हैं चाहे वह जितना भक्ति और भजनका ढोंग करे । कृपण दोनों लोकोंमें दुःखकाही भागी होता है ।
४१—मौन परम उत्तम गुण है । आवश्यकताके अनुसार यथाअवसर बोलें, निरर्थक बकबक न करे । मिथ्या प्रलाप करनेसे आत्मा शरीर सबकी हानि है ।
४२—सत्य गुरु (कबीर साहब) की वाणीका पाठ करे, बारम्बार मनन करे, उनके आशयके ऊपर विचार करे, उनके भेदको भली प्रकार सोचे, समझे सदा काल उन्हींका चिंतन रखे । उनके आशय समझनेमें कोई भी युक्ति उठा नहीं रखे । सत्य गुरुके शब्दोंको यथा अवसर गावे और कीर्तन करे । सत्यगुरुकी प्रशंसा और प्रार्थना सदा करता रहे ।
४३—जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं ऐसा कबीर पन्थियोंको ध्यान करना चाहिये, परन्तु उनके मुक्ति दाता तो स्वयम् (कबीर साहब) और चार गुरु तथा उनके वंशोकोही ठहराया गया है, दूसरेको नहीं कहा ।
४४—किसीको कभी शाप न देना, किसीसे कुवचन न बोलना, एवं किसीका अहित चिंतन न करना चाहिये ।
४५—परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेको तुल्य जाने ।
४६—अभिमानी कभी परमात्माको ध्यापक नहीं देख सकता ।
४७—गुरुकी आज्ञाकारिताही परम तपस्या है ।
४८—जबतक शरीरसे लाड प्यार है उसके पोषणमें वृत्ति लगी हुई हैं इसमें आज्ञाकारिता असम्भव है ।
४९—मूर्ख, शठ तथा विद्याहीनको मुक्ति पद कभी नहीं मिलता ।
५०—जबतक शरीरका भय और चिंतन यानी देहाभिमान है तबतक विदेह पद कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो विदेहको प्राप्त हो ।
कबीर साहबके लोक तथा हंसोंकी कथा ।
कबीर साहबका वह लोक है जिसके कि, गुण कहने सुननेसे बाहर है । केवल स्वसंवेदही थोडासा विवरण करता है । जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समयके उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता । भला उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका कि एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान् है, जिसके कि सामने करोड़ों सूर्य छिप जावें, उन हंसोंके मनमें तनिक भी वासना नहीं रहती । निरञ्जन, आद्या, ब्रह्मा, यम, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाकेही आधीन हो बारम्बार अवतृत होते हैं—राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्मवासनासे अवतार लेते हैं ।
जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर चलकर प्रथम विष्णुको निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है । जब हंसकबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्द्वारा अपने पूर्ण बलसे ऊपरकी ओर चढे चले जाते हैं, ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं, तब धर्मराजकी तीन-सौ साठ कन्या मिलती हैं, जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण करूँ ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है
जो कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे । वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालें, जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्षद्वारा उनको सौहित करना चाहती हैं । परन्तु वे उनकी ओर तनिकभी ध्यान न देते हुए कहते हैं कि, दूर हो चली जा ? तुम्हारी तनिक भी इच्छा हमको नहीं है । तब वे निराश होकर लौटती हैं । भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं । जब हंस उनको अनादर करके चलते हैं, तब आगे धर्मराय मिलते हैं दंडवत् प्रणाम करते हैं, पीछे हंस ऊपरकी ओर चले जाते हैं । जब सत्यलोकको पहुँचते हैं, तब सत्यलोकके हंस उनकी अगवानीके निमित्त बाहर निकलते हैं, प्रत्येक हंस अपने हृदयसे लगाता, मिलता और प्रसन्न होता है, कहता है कि, बहुत दिवसोंके पृथक् हुये हंस आज हमसे आकर मिले । सभी हंस मिलकर उनको सत्यपुरुषके पास ले जाते हैं वे हंस सत्यपुरुषका दर्शनपा दंडवत् प्रणाम करके कृतार्थ हो लोकमें वास करते हैं ।
शोर' ।
भुर्गू रूह आखिरीं नफसको । जब छोडे इस उनसरी कसफको ॥
सतलोग सिधार साथ सतसाज । उस वक्त करे बुलन्द परवाज ॥
दर सिम्त शुमाल सर बसर जाय । बासुरअत सो उबूर कर जाय ॥
वह नूरो जलाल बेबयों है । गुप्ततारे कबीरमें आयों है ॥
जब सुकृत लोक रखरवों हो । रागोरंग देखते दवों हो ॥
देखे कहीं सज्जः लाल जारों । बाहुस्नो जमाल गुलअजारों ॥
सदहा गुलशन चमनबहारी । शीरीं नहरेँ पुर आब जारी ॥
गहे बर्क बदन है नाजनीनाँ । है खूब लगी बजारे मीनाँ ॥
है फिरते कहीं ये हूरो गिलमाँ । बैठे कहीं जाहिदो मुसलमाँ ॥
सैकड़ों प्रकारकी बस्तियाँ और सृष्टिकी रचना देखते हुए ऊपरको चलते हैं । स्वर्ग तथा वैकुण्ठकी सैर करते हुए समस्त बस्तियों और शून्यको पार करके पीछे सत्यलोकको पहुँच जाते हैं ।
कबीर साहबकी मङ्गलवाणी ।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोडो यह संसारा हो ॥
यहि संसार काल है राजा, कर्म को जाल पसारा हो ॥
चौदह खंड बसे वाके मुखमें, सबहीं को करत अहारा हो ।
जारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥
ब्रह्मा विष्णू शिवतन धरिया, और को कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छलछल मारे, ले चौरासीमें डारा हो ॥
मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।
ताका रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भान उजियारा हो ॥
श्वेतस्वरूप शब्द जहां फूले, हंसा करत बिहारा हो ॥
कोटिन चांद सुरज छिपि जहँ, एक रोम उजियारा हो ।
वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृतधारा हो ॥
कहे कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥
इस सत्यलोककी मनोहरता और हंसोंका रहन सहन और रीति व्यवहार सूक्ष्मवैदके पढनेसे जाना जा सकता है ।
मुस'दस ।
यह हरदो जहां काल पुरुष के हैं इजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वैद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहां तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पाबन्द हुवा तिफली जवानी व वृद्धापा ॥
सब पर है लगा मलिक मौत मोन्ह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥
जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥२॥
अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत ।
एक इश्क जदः भई है एक हुश्न है औरत ॥
हर कौन कियों भौन है यह मोहिनी मूरत ।
१—यह मुसदस कबीर साहब की मंगलवाणीके भावका विशद अनुवाद है "चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो—“चल हंस अचल मोलिदो आताद हमारे” यह अनुवाद है। “यहि संसार काल है राजा, कर्मको जाल पसारा हो—इसका “यह हरदो जहाँ” यहाँसे “तलवार दो धारे” यहाँतक अनुवाद है, पर कुछ भाव बढाकर किया है। इसी तरह प्रत्येक पावके भावका कल्पना के साथ अनुवाद किया है विस्तारके भयसे पूरा नहीं मिलाते।
दिल पारः हुवा पारः बमह पारए सूस्त ॥
बाजार खड़े मार व वीमार नजारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ३ ॥
कैलास चलेगा व जिन् लोक् चलेगा ।
अमरावती अलकावती गोलोक चलेगा ॥
सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा ।
जो हृद जनो मर्द में सो लेछा चलेगा ॥
वोभी चल जावे जहां नौलाख सितारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ४ ॥
कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा ।
आवे जो वहांसे सो खबर उसकी कहेगा ॥
सब कौल कर शमः अजिले सोल बहेगा ।
जिसको वह नजर आवे सो फिर कुछ न चहेगा ॥
निश्चल सो रहे कायम जहां अमृत धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ५ ॥
हंसोंकी हुस्न खूबी कही जाए सो कैसे ।
यह नातिकः गुम सुम्म बर्या कीजिए ऐसे ॥
एक मूय मुनौविर कह इस नूर का जैसे ।
छिप जायें करोड़ों महेश्वर तलअत तैसे ॥
सब हंस पुरुषरूप पुरुष उनको दुलारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ६ ॥
जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा ।
सोहङ्ग ढुरै चँवर करे पुरुष अनन्दा ॥
यक मुरत सारे न खुदावन्द न बन्दा ।
इस मंजिल नजदीका नहीं कालका फंदा ॥
जिस लोक हमेशः को परमहंस पधारै ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ७ ॥
सतगुरुकी शरण लेके चलो बहूके उस पार ।
वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ।
कर पलमें सुबुकदोश उठा उसका गर्रा बार ।
पहुँचावे बतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥
आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ ८ ॥
अध्याय ६.
कबीर साहबकी कुछ लीलाएँ ।
कबीर साहबकी लीलाएँ असीम तथा अनन्त हैं, जिनका कि विवरण किसी प्रकार किया नहीं जा सकता । क्योंकि, जब जब सृष्टि होती है तब तब कबीर साहब पृथ्वीपर प्रगट होते हैं, लोगोंको शिक्षा देनेके लिये कौतुक दिखलाते हैं, सत्ययुग त्रेता द्वापर और कलियुग इन चारों कालोंमें आपकी लीलाएँ एक तरहकी प्रगट होती हैं, उनकी गणना कौन कर सकता है, आप उत्पत्तिके आरंभसे महा प्रलयपर्यन्त मनुष्योंको सिखलाते और शिक्षा देते रहते हैं, अगणित लीलाएँ आपसे प्रगट होती हैं, प्रत्येक स्थानपर जा जाकर आप पुकारते हुए मनुष्योंको शिक्षा देते फिरते हैं, कोई कोई भाग्यवान् मान लेता है, नहीं तो प्रायः लोग आपकी बातों को सुनकर घृणा करते हुए भागते हैं । क्योंकि, समस्त मनुष्योंकी बुद्धिपर कालपुरुषने ताला चढ़ा रखवा है, इस कारण सत्यगुरुकी बातोंको कोई २ पसंद करता है । कालपुरुषका विष सबमें प्रवेशित हो रहा है । जैसे नीमके कीड़ेको नीमही पसंद है । मिश्री तथा चीनी उसके दक्किर नहीं होती । न नीमके अतिरिक्त और किसी वस्तुसे उसकी तृप्ति होती है । सहस्रों लीलाएँ देखते हैं, तो भी उनको विश्वास नहीं होता । समस्त कालोंमें जो लीलाएँ आपसे होती हैं, उनको लिखनेवाला कोई नहीं है । यदि समस्त समुद्रोंकी मसि बनावे, समस्त पृथ्वीका कागज करे, समस्त वृक्षोंकी कलमें हों, समस्त देवतागण लिखें तो कदाचित् कुछ लिख सकें तो लिख सकें । मुझसे तुच्छ मनुष्यमें क्या सामर्थ्य है कि, लिख सकें । क्योंकि, वह समस्त जगतका रचयिता और समस्त लोकोंका मालिक है । समस्त परमेश्वरोंका परमेश्वर है । उसके सामनेकी लीलाओंकी क्या गणना है ? जो समस्त महामान्योंका महामान्य है उसकी लीलाका विवरण व्यर्थ है । फिर भी अपने पाठकगणोंके मनोविनोदके लिये कुछ कौतुक नीचे लिखता हूँ ।
गरीबदासजीकी बाणी इत्यादिमें लिखा है कि, सम्मन नामका एक भक्त था । कबीर साहब शेख फरीद और कमाल सहित उसके घर गये उस समय सम्मनके घरमें भोजनके लिये कुछ नहीं था । सम्मनकी स्त्रीका नाम नेकी और पुत्रका नाम सीब था । सम्मनने अपने पुत्र और पत्नीसे परामर्श किया कि,
कबीर साहिबकी मुन्नत वू. क. कसोटी बालक कबीरका नीरुके घरसे अन्तर्धान
हमारे गृहमें साधु मेहमान आये हुए हैं। हमारे पास भोजनके निमित्त कुछ नहीं है अब क्या किया जाय। तब सम्मनने सीवसे कहा कि, अब तो कोई उपाय नहीं, चलो चोरी करें। तब पिता-पुत्र दोनोंने रात्रिके समय एक महाजनके घर सँध लगाया— सीव द्वार तोड़कर भीतर गया, तीन सेर आटा सीधा तीनों मेहमानोंके पेट भरनेके हिसाबसे चुराकर अपने पिताके हाथ धरा, जब आप छेदसे बाहर निकलने लगा यानी जब छेदसे शिर बाहर निकाला, तब पाँव भीतर ही रह गया—महाजनने भीतरसे पाँव पकड़ लिया। सीवने अपने पितासे कहा कि, मैं तो पकड़ा गया। मेरी हुरमत जाती रहेगी। इस कारण तू मेरा शिर काटले, जिसमें मैं न पहचाना जा सकूँ। सम्मनने अपने पुत्रका शिर काट लिया। आटा सीधा और अपने पुत्रका शिर लेकर अपने घर आगया। सीवका शव वहाँ ही पड़ा रहा। सम्मनने अपने बेटेके शीशको एक ताकपर रख दिया। आटा सीधा अपनी स्त्रीको देकर कहा कि, भोजन प्रस्तुत करो परन्तु सावधान, रोना नहीं। यदि रोओ व दुःख प्रगट करोगी तो साधु भोजन नहीं करेंगे। नेकीने तुरन्त भोजन प्रस्तुत किया, सम्मन उन तीनों साधुओंके लिये भोजन लेगया। तीन पत्तल कबीर साहबके सामने रखकर कहा कि, महाराज ! आप तीनों साधुजन भोजन करें। कबीर साहबने तीन पत्तलके छः टुकड़े किये, और छः भाग करके कहा कि सम्मन ! अब तुम अपने पुत्रको बुलाओ हम छः मनुष्य एक साथ भोजन करेंगे, सम्मनने कहा कि, महाराज ! हम तीनों पीछे आवेंगे—आप तीनों संत पहले भोजनकर लें कबीर साहबने कहा कि, ऐसा कभी न होगा, हम सबके सब एक साथ भोजन करेंगे—कबीर साहबने कहा कि, सीव तू कहाँ है, शीघ्र उपस्थित हो, सीवके शीशसे शब्द निकला कि, महाराज ! मैं किस प्रकार आऊ मेरा तो शीश कटा हुवा ताकपर धरा है। और धड़ कहीं पड़ा है। तब कबीर साहबने कहा कि, शिर तो चोरोंके कटते हैं भक्तोंके शीश नहीं कटते। तू चला आ। कबीर साहबके इतना कहतेही सीवका शव आकर मस्तकसे मिल गया। और वह उसी समय जैसा था वँसा जीवित होकर प्रसन्नतापूर्वक कबीर साहबके पास आ बैठ। छः मनुष्योंने भोजन किया, दूसरे दिन बिदा होने लगे उस समय कबीर साहबने कमाल और शेष फरीदसे कहा कि, यहाँसे शीघ्र चलो। कल तो इसने यह कार्य किया आज न जाने और क्या करडाले।
एक बेर कुछ वैरागी जो रामानन्दके चले थे, कबीर साहब सहित अपने गुरुद्वारे दक्षिण देश तोताद्रिको चले। वे जब काशीजीसे चले थे तब एक भँसा भी अपने साथ लेलिया था उसके ऊपर सबने अपनी गुदडी तथा कठारी इत्यादि
बालक कबीरका काफिरकी व्याख्या करना बालक कबीर वैष्णवके बाने-
लादली । जब चलते २ अपने गुरुद्वारे पहुँच कर डेरा डाला तब भोजन प्रस्तुत हुवा, रामानुज स्वामीके जो आचार्य हैं वे स्नानादिका बहुत ध्यान रखते हैं । पडदा करके अपने हाथसे भोजन बनाकर भोजन करते हैं । यदि किसी शूद्रकी छाया भोजनपर पड जावे तो वे उसको नहीं खाते, उन लोगोमें जातीय ध्यान भी विशेष है । प्रायः वे जातिके ब्राह्मण होते हैं, तथा अन्य जातिके मनुष्योंकी भी उनमें संख्या है । उन लोगोका मुख्य अभिप्राय यही था कि, कबीर साहब वेदपाठी नहीं है—इस बहानेसे हम अपनी पंक्तिमें कबीर साहबको न बैठावेंगे उन्हींने पूछा कि, कबीर साहबको अपने बराबरमें बैठकर भोजन करावें परन्तु अपने झुंडसे पृथक् बैठवें किन्तु पृथक् बैठ लेना भी उचित न समझा । अतएव उन्हींने एक बहाना निकालकर कहा कि, जो कोई वेदकी ऋचा पढ़े वह हमारे साथ बैठकर भोजन करे, जिसको वेद पाठ न आवे वह हमारी पंक्तिमें न बैठे । सबोंने वेदका कोई २ विशेष भाग पढ़ पढकर सुना दिया—जब कबीर साहबकी बारी आई तब कबीर साहबने भैसेके शीशपर हाथ धरकर कहा कि, ए भैसे ! तू वेद पढ़ । तब वह भैंसा अत्यंत स्वच्छता और स्वरके साथ वेद पढ़ने लगा । जब उस भैसेको वेद पढ़ते देखा तब समस्त आचारियोंने कबीर साहबके चरणोंपर गिर कर अपना अपराध क्षमा कराया । यह बात दक्षिणके आचारियों तथा वैरागियोंमें विख्यात है । अनेक साधुगण इस लीलाको जानते हैं कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते हैं ।
कबीर साहब तथा रविदासजीसे वाद विवाद हुवा । तब रविदासजी का पक्षपात करनेके निमित्त देवी तथा ब्रह्मा विष्णु शिव सब आए । कबीर साहबने सबको परास्त कर दिया । चारोंका क्रोध तथा झल्लाहट किसी काम न आया । देवी और शिवने अत्यंत क्रोध किया । देखो कबीर साहब और रविदास गोष्ठी ।
जहाँगशतशाह एक सिद्ध साधु था । वह समस्त पृथ्वीकी सैर किया करता था । उससे साधुओंने पूछा कि, तुमने कभी कबीर साहबका दर्शन किया, क्या वह बड़े प्रतिष्ठित हैं । तब जहाँगशतशाह काशीको चले । कबीर साहबने जान लिया कि, मेरे साक्षात्के निमित्त जहाँगशतशाह आते हैं । कबीर साहबने एक सूबर मँगवाकर अपने द्वारपर बँधवा दिया । जहाँगशतने दूरसे देखा कि, द्वारपर सूबर बँधा हुआ था, बड़े क्रुद्ध हुए और झल्लाकर पलट पड़े । तब कबीर साहबने पुकारा कि, ए जहाँगशत ! क्यों पलटे जाते हो ? मेरे समीप आओ । इतनी बात सुनकर जहाँगशतने मालूम कर लिया कि, कबीर साहबने जान लिया ।
बालक कबीरकी ज्ञान कथनी और गुरुकी पूछ गुरु करनेका वृत्तान्त (वू. क. कसोटी)
मुझको पहिचान लिया। उनके मनमें निश्चय हो गया कि, कबीर साहब कोई सिद्ध तथा श्रेष्ठ पुरुष हैं। वहाँसे पलटे और कबीर साहबके पास आकर कहने लगे कि, मैंने सुना था कि, कबीर साहब बड़े सिद्ध हैं, इस कारण मैं आपका साक्षात् करने आया था। अपने द्वारपर हराम बाँध रक्खा है—यह कैसी घृणित बात है? यह बात सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया कि, ऐ जहाँगशत-शाह! मैंने हरामको अपने गृहके बाहर बाँध दिया है मेरे भीतर तनिक भी नहीं रहा—आपने हरामको अपने भीतर बाँध रक्खा है। फिर बाहर निकाल देना अच्छा कि, भीतर बाँध रखना? क्योंकि, क्रोध अहंकार भद आदि सब हराम हैं, वे तुम्हारे भीतर हैं। जिसको तुमने हराम समझा हैं—वह हराम नहीं, बरन् क्रोध हराम हैं। इस शिक्षासे जहाँगशतशाह प्रसन्न हो गए—संध्याका समय निकट आया जहाँगशतशाहने इच्छा प्रगट की कि, मैं भवकाममें निभाज पढ़ना चाहता हूँ। कबीर साहबने एक पलभरमें भवका पहुँचा दिया। जिन सिद्धोंके बीच जहाँगशतसे जाया न जाय वहाँभी कबीर साहबने उनको पहुँचाया—तब जहाँगशत अधीन हुए।
रामदास नामक एक धनाढ्य जागीरदार ब्राह्मण था वह दक्षिण देशमें नर्मदा नदीके किनारे रहता था। स्नान करनेके लिये गया तो वहाँ उसे कबीर साहब बैठे मिले। उसने उनसे निवेदन किया कि, महाराज! आप समर्थ हो, मुझको विष्णुका दर्शन कराओ, तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, कल दोपहरको विष्णु तुम्हारे घरपर जावेंगे। यह बात सुनकर रामदासको निश्चय हो गया कि, कबीर साहबका बचन हो गया है अब कल मेरे घर अवश्यही विष्णु आवेंगे। तब उसने अपने घर जाकर बड़ी तैयारी की। दूसरे दिवस गृहको भली-भाँति स्वच्छ और पवित्र करा बिछौने इत्यादि बिछवाए। नाना प्रकारके स्वादिष्ट भोजन बनवाये। सिंहासन इत्यादि प्रस्तुत कराए। प्रतीक्षा करते हुए बैठे कि, अब विष्णुमहाराज आया चाहते हैं तो कुछ कालके उपरान्त देखा कि, एक भँसा कीचड़से लतपत होकर आया और उस फर्शके ऊपर बैठ गया। रामदासको अत्यंत क्रोध आया कि, इस भँसेने फर्शको बिगाड़ दिया। सोटा लेकर इस भँसेको मार भगाया। उस भँसेको भगाकर फिर विष्णुके आनेकी प्रतीक्षा करने लगे। समस्त दिवस व्यतीत हो गया पर कोई नहीं आया। वह ब्राह्मण निराश हुवा। प्रातःकाल नदी स्नानके निमित्त गया। फिर उसी स्थानपर कबीरको बैठो देखकर कहा कि, महाराज! मुझको विष्णु महाराजका दर्शन तो न हुवा!
आपकी बातें मिथ्या कैसे हों ? कबीर साहबने कहा कि, ए रामदास ! मेरे कथनानुसार विष्णु तुम्हारे घर गए । परन्तु तुमने अच्छी विष्णुपूजा की । सोटे मारकर भगा दिया । यह बात सुनकर वह ब्राह्मण लज्जित तथा दुःखी हुआ । क्योंकि विष्णुभक्त था । जान लिया कि, विष्णु भैंसाके स्वरूपमें थे । वह भक्त तो था, परन्तु भक्तोंकैसे गुण उसमें नहीं थे कि, अपने प्रेमीको प्रत्येक वस्तुमें देखे इस कारण विष्णुदर्शनसे वञ्चित रहा ।
कमालको कबीर साहबने मुरदासे जीवित किया उसीका (बोधसागर-मेंका यह दोहा है —
दोहा—मुरदासों जिन्दा किया, दिलसों दीन मलाल ।
शाह परतीत दिखाइयाँ, उत्पन दास कमाल ॥
तब शेखतकीने कहा कि, मैं इस लीलाको नहीं मानता । कारण यह कि, यह लडका अचेत था । इस कारण जीवित हो गया । मेरी बेटी आठ दिवसोंसे कन्नमें मरी पड़ी है । जब आप उसको जीवित करें तब मुझे विश्वास हो । कबीर साहब सिकन्दर शाह और शेखतकीके साथ उस लडकीकी कन्नपर गए । कबीर साहबने पुकारा । उठ शेखतकीकी बेटी ! वह नहीं उठी । फिर कहा कि, उठ शेखतकीकी बेटी ! फिरभी वह न उठी तब तीसरी बार कबीर साहबने कहा उठ कबीरकी बेटी ! उस समय वह लडकी जीवित होकर कन्नसे निकल पड़ी । शेखतकी उसके जीवित होनेपर उसका हाथ पकडकर अपने घर ले चले । उस लडकीने कहा कि, मैं तुम्हारे नामसे जीवत नहीं हुई हूँ । बरन् कबीर साहबके नामसे उठी हूँ । मैं कबीर साहबकी बेटी हूँ । मैं इनके साथ रहा करूँगी । तुम्हारे गृहपर न जाऊँगी । वह लडकी कबीर साहबकी बेटी विख्यात हुई ; और उसका हृदय सत्यगुरुकी कृपासे प्रकाशित हो गया ।
कबीर कसोटीमें लिखा है कि बादशाहने तेरह गाडी कोरी पुस्तकोंकी
१ कबीर कसोटीमें लिखा हुआ है कि, किसीके यहाँ एक लडकी मर गई थी, लडकीके वापसे कबीरजीने उस मृत बालिकाको माँगा । पर उसने न दी । जब उसकी पत्नीको यह समाचार मिला तो उसने उसको कबीरजीके पास भेज दिया । कबीरजीने उसे जिन्दा करके कमाली नाम रखा कमालबोधमें लिखा हुआ है कि, "शेखतकी हरसे मनमाई, लाय कमाली भेट चढाई" यह लिखा मिलता है । इससे यह प्रतीत होता है कि, कबीर साहबके पास पुत्रीके रूपमें रहनेवाली एक कमाली ही है । कबीरकसोटी पृ. ३० में शेखतकीने बादशाहसे कहा है कि, यहाँसे जगन्नाथकी आग बुझाना क्या है, उसने अभी लडका और एक लडकीको जिन्दा किया है । इन बातोंके देखनेसे यह अवश्य ज्ञान होता है कि विज्ञ पाठक इस प्रकरणको सर्वत्र विचार करके पढ़ें, कमाली पुत्री थी वा नहीं यह प्रश्न इतिहासके गर्भमें अन्तर्हित है । कमालीकी दिव्य वाणीही इस बातको बता रही है, कि, उसके हृदयमें पूर्ण प्रकाश हो चुका था ।
कबीररोपदेश कबीर साहिब और रामानन्द स्वामीका वृत्तान्त
कबीर साहबके पास भेजकर कहा कि, मैं तब विश्वास करूँगा जब आप उन समस्त पुस्तकोंको ढाई दिवसमें लिख देंगे। वे पुस्तकें कबीर साहबके पास पहुँचें। उन्होंने अपनी लाठी उनपर घुमाई। वे उसी समय लिखी गई। बाद-शाहको यह लीला देख विश्वास होगया। कबीरसाहबने उस ग्रंथोंको दिल्लीमें गडवा दिया। सुनते हैं कि, जब मुक्तामणि महाशयका समय आवेगा, उनका झंडा दिल्ली नगरीमें गडेगा। तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वीसे बहिर्गत होंगी। मुक्तामणि साहबका अवतार वंशकी तेरहवीं पीढ़ीमें होगा। तब वंशगुरुगद्दी दिल्लीाम स्थिर होगी।
त्रेतायुगमें कबीर साहबने हनुमान्जीको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश दिया। मुक्तिमार्ग दिखाकर कहा कि, ऐ हनुमान्जी ! तू मुझको पञ्चतत्त्व तथा तीन गुणोंमें पृथक् मान मैं स्वयम् जगत् रचयिता हूँ। हनुमानने कहा कि, मुझको किस प्रकार विश्वास हो ? जबलों मैं अपनी आखोंसे न देखलूँ। कबीर साहबने हनुमानको देखनेका बल दिया। अपना वह तेज दिखलाया। जो पाँच तत्त्वों तथा तीनों गुणोंसे पार था। हनुमान्ने कहा कि, मैं आपका वह स्वरूप देखूँ तब विश्वास करूँ। उस समय कबीर साहब अपना महाप्रताप दिखा अन्तर्धान हो गए। हनुमान्जी अनेक प्रार्थनाएँ करने लगे कि, मुझको पुनः दर्शन हो। बहुत स्तुति करनेपर पुनः प्रगट हुए। हनुमान्बोध ग्रंथमें लिखा है यह कबीर सागरके पाँचवें भागमें पूर्ण प्रकाशित है। हनुमान उस स्वरूपको देखकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरा। उनका विश्वास उसके मनमें जम गया। सत्यगुरुने हनुमान्को अपना पान दिया।
सर्वानन्द एक धुरीण विद्वान् ब्राह्मण था। वह भारतवर्षके समस्त प्रांतोंमें जाकर पण्डितोंके साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुआ। जब कोई भी पण्डित उसके सामने न ठहरा तब वह अपने घर आ मातासे कहने लगा कि, मातः ! अब तुम मेरा नाम सर्वजित् रखो क्योंकि, अब मेरा सामना करनेको क्लोई पण्डित नहीं रहा। तब माताने कहा कि, ए पुत्र तूने काशीमें जाकर कबीर साहबके साथ भी वाद विवाद किया था ? उसने कहा कि, नहीं। तब मताने कहा कि, जबतक तू कबीर साहबपर विजयी न होगा तब तक तेरा नाम सर्वजित् नहीं रखूँगी। तब सर्वानन्दने कहा कि, कबीर कैसा बड़ा पण्डित है ? मैं अब चलकर उसके साथ वाद विवाद करता हूँ। बहुतसे ग्रंथ और वेद इत्यादि लादकर काशीमें कबीर साहबके पास पहुँचे। कबीर साहबने कितनी लीलाएँ दिखलाई उन सब बातोंका विवरण करनेसे पुस्तकके सुविस्तीर्ण होजानेका भय है। इस कारण, उनको छोड जाता हूँ किन्तु उसे विश्वास न हुआ।
स्वामी रामानन्दका कबीर साहिबको शिष्य स्वीकार करना
अन्तमें सर्वानन्द कबीर साहबके साथ सामना करनेको उद्यत हुए। बड़ा वाद विवाद हुवा। सर्वानन्दने श्लोकोंकी झड़ी लगादी। यद्यपि कबीर साहब समझाते पर वह न मानते। बात बतापर श्लोकोंका प्रमाण तथा पुस्तकोंकी साक्षी देते। कबीर साहबने देखा कि, इसके पीछे तो घमंडका भयानक रोग लगा है। यह कदापि न हटेगा। न कहना मानेगा। तब कबीर साहबने कहा कि, ए सर्वानन्द ! अब तुम्हारी क्या कामना है किस बातके इच्छुक हो ? सर्वानन्दने कहा कि, मेरी विजय लिखदे। कबीर साहबने कहा कि, मैं तो लिखना नहीं जानता तुम स्वयम् लिख लो। सर्वानन्दने लिख लिया कि, कबीर साहब हार गए। सर्वानन्द जीत गए। भली भाँति लिखकर यथा वह विजयपत्र कबीर साहब तथा अन्यान्य लोगोंको दिखलाकर अपने घरको चले। आनेपर अपनी मातासे कहा कि, माता मैं कबीर साहबसे वाद विवाद करके उनपर विजय पागया हूँ। तब माताने कहा कि, ए पुत्र ! मुझको तो विश्वास नहीं होता कि तू कबीर साहबपर विजयी हुवा है। सर्वानन्दने कहा कि, मैं विजयपत्र लिखवा लाया हूँ तू देखले। माताने कहा कि कागज निकालो। जब कागज निकाला और पढ़ा तो उसमें लिखा था कि, सर्वानन्द परास्त हो गए कबीर साहब विजयी हुए। यह लिखा देखकर आश्चर्यान्वित हुए कि, यह तो मेराही लिखा था यह कैसा उलटा हुआ। कदाचित् मैं लिखने में भूल गया। मातासे कहा कि, मातः ! मैं लिखनेके समय भूल गया। अब पुनः जाता हूँ अत्यंत सावधानी पूर्वक ले आऊँगा। सर्वानन्द कबीर साहबके पास आए और कहा कि, मैं लिखनेमें भूल गया अबकी बार सँभालकर लिखूँगा। कबीर साहबने कहा कि, भली प्रकार सँभालकर लिखो। सर्वानन्दने उसी विषयको भली प्रकार सँभालकर लिखा। अपनी माताके समीप आकर प्रगट किया कि, अब मैं सँभाल कर लिख लाया हूँ। कागज खोला तो वही पूर्वकी बात लिखी पाई कि, कबीर साहब विजयी हुए तथा सर्वानन्द हार गये। इस प्रकार तीन बार हुए। तब सर्वानन्दको निश्चय होगया, कि, निस्संदेह कबीर साहब ईश्वर हैं। चरणों पर आन पड़े और शिष्य हो गए। कबीर साहब तथा सर्वानन्दका विवरण भिन्न भिन्न स्थानोंमें लिखा है।
एक स्थानपर नवनाथचौरासी सिद्ध कबीर साहब तथा नानक साहब सब इकट्ठे थे। उस समय एक महाजन जो नानक साहब का परिचयी या सेवक था, जा पहुँचा। उसने विचारा कि, सन्त गुरुके समीप बिना कुछ लिए जाना उचित नहीं। कुछ भेंटके निमित्त ले चलना ठीक है। उसने अपनी जेबमें हाथ मारा पर कुछ न निकला। बहुत खोजने पर उसके वस्त्रोंमें एक तिल मिला !
कबीर साहिब और स्वामी रामानन्द- जीकी गोष्ठी
उसने उसी तिलको नानक शाहके समक्ष रक्खा । नानक शाहने कबीरसाहबसे कहा कि, मैं इस तिलको इतने साधुओंमें किस प्रकार बाँटूँ ? कबीर साहबने कहा कि, इस तिलको जलमें घोटकर सकल साधुओं में बाँटों, नानक शाहने कहा कि, यहाँ जलभी नहीं है । किसे घोटें ? यह बल तो आपहीमें है, इसको बाँटिये । उस स्थानपर एक शुष्क नदी थी, उसको कबीर साहबने जारी किया । उसमेंसे जल भरकर उस तिलको घोटा, सब साधुओंको पिलाया । जिससे उन्हें अत्यंत आनंद आया । कबीरजीसे कहा कि, कबीरजी ! माँगो जो माँगोगे वही हमलोग आपको देंगे । कबीर साहबने कहा कि, तुम लोग तो दरिद्री जान पड़ते हो । मैं तुमसे क्या माँगूँ तुम मुझको क्या दोगे ? उन लोगोंने कहा कि, जो कुछ तुम माँगोगे वह सब हम तुमको देंगे । कबीर साहबने कहा कि, पाँच पैसेभर दरिद्रता मुझको दो । नवनाथ चौरासी सिद्धोंने परामर्श किया कि, यह गुण तो हम लोगोंमें नहीं । कारण यह कि, हम लोगोंको तो अपनी सिद्धि जप तपका मान है । चलो ब्रह्मासे पाँच पैसेभर दरिद्रता माँगें । ब्रह्मलोकमें जा पाँच पैसेभर दरिद्रता ब्रह्माजीसे माँगो, ब्रह्माजीने विचार कर उत्तर दिया कि, मेरे पास दरिद्रता कहाँ ? मैं तो इस बातपर अहंकार करता हूँ कि, मैं सृष्टिका उत्पन्न करता हूँ । तब नवनाथ और सब सिद्ध कंलासमें शिवजीके पास जा वही प्रश्न किया । शिवजीने भी वही उत्तर दिया कि, मुझमें दरिद्रता नहीं क्योंकि, मुझमें तो यह अहंकार है कि, मैं मिटाता हूँ । सब ओर दूँदते २ थक गये परन्तु दरिद्रता कहीं न मिली । अन्तमें विष्णुके पास गए दरिद्रताके लिये प्रार्थना की । विष्णुने कहा कि, ए सिद्ध साधुओ ! पाँच पैसेभर दरिद्रता या जो कुछ दरिद्रता है वह सब उसीके पास है जिसने तुमको भेजा है । मेरे पास तो केवल तीन पैसे भरही दरिद्रता है, जिसके कि कारण, मैं सारे संसारका रचयिता कहलाता हूँ । दरिद्रताके समूह तो स्वयम् कबीर साहबही हैं दूसरा कोई नहीं । तब सब सिद्ध साधु कबीर साहबके पास लौट आए । आपको दण्डवत् प्रणाम करके प्रदक्षिणा की, सारी बातें प्रगट कीं । कबीर साहबने कहा कि, क्या मैंने तुमसे पहिलेही न कहा था कि, तुम लोग तो दरिद्री हो, मैं तुमसे क्या माँगूँ ।
इससे यह परिणाम निकला कि, अहंकारसे सब फँसे हुए हैं । दरिद्रता तथा नम्रता यह गुण सबसे विशेष हैं । क्योंकि अहंकारके वश यह जीवन अपने स्वरूपसे गिरा इसीसे यह इतना बड़ा सिद्ध शौतान और नारकी हुवा । अहंकारहीके कारण हारूत मारूत जैसे भले देवता बाबिलके कुएँमें बंद किए गए । अहंकारने मनुष्य जातिको सदाके लिये बंधनमें डाल दिया है ।
कबीर साहब नानक साहबके पास पञ्जाब देश आए, नानक शाहने अत्यंत आवभगत तथा सम्मानके साथ उनसे मिलकर कहा कि, जिस सेवाके निमित्त आप आज्ञा दें उसको मैं करूँ । कबीर साहबने आज्ञा दी कि, पाँच दिवसकी उत्पन्न हुई बछियाके स्तनमें दूध दुहकर मेरा कमण्डलु भर दो । नानक शाहने कहा कि, पाँच दिनकी पैदा हुई बछिया कैसे दूध दे सकती है ? कबीर साहबने कहा कि, यही मेरी सेवा है इसे ही तुम करो । नानक शाहने ढूँढ ढाँढ कर पाँच दिनकी उत्पन्न हुई बछियाको ला उपस्थित किया । उसके समीप दूध लेने गये । वह बछिया लात चलाकर भाग गई । नानक शाहसे कबीर साहबने कहा कि, अब तुम जाओ, मेरे नामसे उस बछियासे दूध माँगकर कमण्डलु उसके स्तनके नीचे रख दो, नानक शाहने बछियाके नीचे कमण्डलु रखकर कबीर साहबके नामसे दूध माँगा । बछियाके स्तनसे आपसे आप इतना दूध निकला कि, वह भर गया । कबीर साहबने नानक साहबसे कहा कि, ऐ नानकजी ! आपने बंदना तो बहुत की परन्तु अभीतक आपकी कमाईमें कमी है । आपका पंथ चलेगा बहुत लोग आपकी आज्ञामें चलेंगे । भविष्यत्में ये रङ्ग ढङ्ग होंगे । ऐसा बहुत कुछ नानक शाह से कबीर साहबने कहा । इसी ग्रंथमें नानक शाहके विषयमें भविष्य वाणी है । नानक धर्मका विवरण किया गया है जो कि, भविष्यत्में होनेवाला है । इसी स्थानपर यह साखी है । “तिल घोंटतारे लगे” इत्यादि है और इसी स्थानपर यह है :—
ऐसो दाता सत्य कबीर, सूखी नदी बहावे नीर ।
शूखेको खिलावैं खीर, नङ्गेको पहनावे चीर ॥ इत्यादि ॥
महाराजा श्रीरामचन्द्रजीको कबीर साहब (मुनीन्द्रजी) ने योगयुक्ति सब कुछ सिखलायी । सीताके चुराये जानेके समय अत्यंत कठिनाता उपस्थित हुई समुद्रोल्लंघन करना अत्यंत कठिन था । रामचन्द्रजीपर कबीर साहब की दया हुई । पत्थरोंपर सत्य नाम लिखा । उसके कारण बहुतेरे पर्वत तथा पत्थर तैरने लगे, पुल बन गया । इसी साहबकी दयादृष्टिसे लंकापर विजय पाकर मङ्गल-पूर्वक अपने घर पहुँचे । देखो ग्रंथ ज्ञानसंबोध तथा अन्यान्य ग्रंथोंमें ।
कृष्णचन्द्र बाँसुरी बजाकर गोपियोंका मन चुरा लिया करते थे, कबीर साहबने बाँसुरी बजायी, तीनों लोक मोह गये, जड़ चैतन्य सभी मोहित हुए । यमुना नदीका जल स्थिर होगया । स्थावर जङ्गल सभीको आनन्द आगया वह बाँसुरी ऐसी बजी कि, फिर कभी न बजी होगी । लोगोंने जाना कि, कृष्णचन्द्रने बजायी थी । गोप तथा गोपियोंकी बड़ी कामना थी कि, वैसी बंसी फिर बजे क्योंकि, उस बाँसुरीके बजानेवाले तो सत्य पुरुष थे । अभेद भावनामें होते हैं ।
कबीर साहब, इस बाँसुरीकी प्रशंसा हंस कबीर किया करते हैं जिनको इसका ज्ञान है ।
जब प्रथम कबीर साहबका गोरखनाथसे सामना हुवा, गोरखनाथ कबीर साहबकी श्रेष्ठता तथा कीर्तिते अनभिन्न थे, तब गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, आओ हम तुम वाद-विवाद करें। उस समय गोरखनाथने अपना त्रिशूल गाड़कर कहा कि, आओ कबीर साहब ! उस त्रिशूलकी एक शाखापर बैठ जाओ मैं बैठता हूँ पीछे वाद-विवाद करेंगे, कबीर साहबने सूकते एक तारको आकाशकी ओर चलाया । और शून्यमें उस सूकते ऊपर बैठकर कहा कि, नाथजी ! आओ, हम और तुम इस सूतपर बैठकर वाद-विवाद करें क्योंकि, तुम्हारा त्रिशूल तो पृथ्वीसे लगा हुवा है । कबीर साहबकी यह लीला देखकर गोरखनाथजी दङ्ग हो गए ।
गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, मैं छिपता हूँ आप मुझे ढूँढ निकालें । गोरखनाथ मेंढक बनकर जलमें छिप गये कबीर साहब उस मेंढकको पकड़ लिये कहने लगे कि, अब किधर जाओगे, तब गोरखनाथ पुनः अपने असली रूपमें आ गए । पीछे कबीर साहबने कहा कि, अब मैं छिपता हूँ तुम ढूँढलो । कबीर साहबने जलमें डुबकी मारी । जल होकर जलके साथ मिल गए । गोरखनाथ ढूँढते २ थके तीनों लोकमें ढूँढते फिरे परन्तु कहीं पता नहीं लगा । पीछे विवश होकर बैठे कबीर साहबने देखा कि, अब तो गोरखनाथ हारके बैठ गए हैं उसी समय कमण्डुल के जलमेंसे कबीर साहब प्रगट होगए ।
गोरखनाथने कबीर साहबके पास दो सर्प भेजे । वे दोनों सोंप कबीर साहबके पास आए । आपने उनको अपने शरीरमें लगा लिया । बहुत विलंब हुवा पर पलटकर नहीं गए तब स्वयम् गोरखनाथजी कबीर साहबके गृह पधार कर पुकारा कि, कबीर साहब ! बाहर आइए । कबीर साहबने भीतरसे उत्तर दिया कि, नाथजी ! मेरे गृह दो अतिथि आए हैं मैं उनके सेवा सत्कारमें लगा हुवा हूँ । गोरखनाथने जाना कि, कबीर साहब कैसे प्रतिष्ठित पुरुष हैं । आपमें कौसी क्षमा तथा संतोष है । प्रथम तो गोरखनाथने कबीर साहबसे बहुत वाद विवाद किया बहुत कौतुक देखे पीछे भलीप्रकार जान लिया कि, आप अद्वितीय हैं मनुष्य मात्रमें दूसरा ऐसा कोई नहीं । कबीर साहबने गोरखनाथको भलीप्रकार संतुष्ट कर दिया बहुत कुछ कहा । सब कौतुक दिखलाए । गोरखनाथको भलीप्रकार निश्चय करा दिया कि, कबीर साहब स्वयम् अलख अविनाशी हैं । तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिर शिष्य होकर परमगति पागये । योगयुक्ति आदि सबको व्यर्थ जाना ।
४ अ. कबीरजीका आत्मविकास । सिकन्दर लोधीका काशीमें आना, कबीर साहिबका वहां बुलावा जाना, उनके दर्शन बादशाहकी जलन दूर होना, सुलतानका उनपर विश्वास लाना
कबीर साहबके कमालीके मस्तकपर हाथ रखतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया । उसे आरंभसे अन्ततकका सार समयोंका वृत्तान्त प्रगट हो गया । उसकी जिह्वासे ज्ञानके फौव्वारे छूटने लगे । वो सब वृत्तान्तोंका विवरण करने लगी कन्नसे बाहर आतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया उस समय वह ये शब्द बोली कि —
हंसा निकल गया मैं न लडीसी ।
पाँच सहेली संग है मैली, पाँचोंसे मैं अकेली खडीसी
नौ दरवाजे बंदकरलीने, दशबीं मोरी खुली जो पडीसी ।
न मैं बोली न मैं चाली, औठ दोपट्टः किनारे खडीसी ॥
कहत कमाली कबीरकी बालकी, सादीसे मैं कुमारी भलीसी ॥
जी दुनियाँके फन्देसे निकल गया मैं लडी हुई नहीं हूँ, मनकी पाँच वृत्ति ही मैली सहेलियाँ हैं, इस कारण मैं उनके उद्देगको छोड कर उनसे अकेली खडीसी दीख रही हूँ मेरे शरीरके नौऊ दरवाजे समाधि लगानेके लिये बन्द करलेने पर भी दशम द्वार मेरे लिये खुलासा पडा है जब चाहूँ जब उससे शून्य शिखरमें आसन लगालूँ । उस अवस्थामें मेरे संसारके व्यवहार बन्द हो जाते हैं मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर दुनियाँके किनारे खडीसी लगती हूँ ।
इसी प्रकार धर्मदास साहबकी स्त्रीका नाम माई अमीन था । उसके शिर पर कबीर साहबने हाथ रक्खा जिससे उसकी जिह्वासे ज्ञानलोत बहने लगा । एवं वह भी सब वृत्तान्त कहने लगी कि —
साधो नाम सभन से न्यारा लखि पुरन गुप्त विसतारा ।
जानेगा कोई जाननहारा ॥
जब नहिं अंशवंश निर्मायो, नहिं कुछ किया पसारा ।
चर और अचर चार चर नाहीं, नहिं मनको विसतारा ॥
जब नहिं पुरुष नहीं तब ज्ञान, यह मन सबसे न्यारा ।
जब नहिं पाँच अमी निर्माया, नहिं सोहँग विस्तारा ॥
धर ओ अधरधार धर नाहीं, नहीं पुरुषकी काया ।
तब नहिं कूरम नहिं जलरंगी, नहिं तब जलकी छाया ॥
फुप दीपलीला दहजा हैं, नहिं अदली औतारा ।
करमन कहै सुनो धर्मदासा, यह मत सब से न्यारा ॥
जब अंश और वंश नहीं बनाया न कुछ संसारकी रचना ही की थी । स्थावर
जंगम जड़ चेतन कुछ नहीं था, न मानसिक ही कल्पनाएँ थीं। न अक्षर निरंजन या न ज्ञानी ही थे। हमारा यह विचार सबसे निराला है क्योंकि दूसरे उस समय भी कुछ मानते हैं। न देशसे हंगकाही विस्तार था एवं न पांच अमरही बनाये थे। जमीन आसमान और पुरुषका प्रतिबिम्ब जीव भी नहीं था। न कूर्मजी जल-रंगजी और जलकी छायाही थी। फुप दीपलीलाके दहजेमें न कोई अदल करने वाला औतार था। करमन कहती है कि, ए धर्मदास ! यह मत सबसे भिन्न है। इसी प्रकार राजा चन्द्रविजयकी इन्द्रमती, राजा रावणकी मन्दोदरी, राजा वीरसिंहकी माणिकवती, राजा योगधरकी लीलावती पुरंती आदि पचासों स्त्रियाँ राजा अमरसिंहकी रानी, राजा उदयपुरकी रानी। मीराबाई, क्षेमश्रीगवालिन तथा और भी अनगिनत स्त्रियाँ जिनके कि, शिरपर कबीर साहबने हाथ रक्खा व सब हंसस्वरूप होकर परमधामको चली गई। तथा सिधार जायँगी। उन बातोंके लिखनेकी सामर्थ्य मेरी लेखनीमें नहीं है। न किसी मनुष्य तथा देवताओंमें ही लिखने और कहने सुननेकी सामर्थ्य है। कबीर साहबकी लीलाएँ कबीर साहबही जानें या उसके परम भवतगणही जान सकते हैं।
गजल ।
यह लिखना माजिजातका यह भी अबस हुवा ।
और कहना इस सिफ़ातका यह भी अबस हुवा ॥
नाकारः नतिकिः न कहा जाय उससे कुछ ।
फिर कहना पाकज तका यह भी अबस हुवा ॥
दिनमें सके न देख जिसे दूरबीनसे ।
फिर दीद उसका रातको यह भी अबस हुवा ।
जिस बन्दगान कुदरतसे है बन्दः बेखबर ।
क्या लिखना उह बरातका यह भी अवस हुवा ॥
वह खालिके जहाँ है जो चाहे करे सोई ।
फिर जिक्र वारदात का यह भी अवस हुवा ॥
नाम और निशों मकौ है न जिसका कोई कहीं ।
बतलाना उस समातका यह भी अबस हुवा ॥
मौजिब कोई न जान कभी जिसका आजतक ।
जोयन्दः मोजिबातका यह भी अवस हुवा ॥
आजिज न पाया भेद है जो यारिफां जमौ ।
फिर करना उसकी बातका यह भी अवस हुवा ।
शेखतकीका क्रोध
कबीर साहबकी शिक्षा ।
तीन कालके जितने धर्मके अगुवा हैं, हुए तथा होंगे, उन सबसे कबीर साहबकी शिक्षा जुदी है । इस शिक्षाका मुख्य अभिप्राय यही है कि, गर्भका आवागमन बंद हो इसका बड़ा भारी दुःख है । जिस शिक्षा तथा धर्मसे बारम्बार जन्म और मृत्युका दुःख दूर हो उसीको ग्रहण करना वही मनुष्यका धर्म है । उसी गुरु तथा शास्त्रको धारण करना मानुषिक बुद्धिका कर्तव्य है । जो कोई मनुष्य देह पाकर मुक्तिमार्ग न ढूँढ़े वो बड़ा अभाग है । क्योंकि, वह फिर ऐसा समय न पावेगा । सदा ही भवसागरमें डुबकियाँ खावेगा । योगयुक्ति तथा सारे तंत्र मंत्र बंधनके प्रधान कारण हैं । यदि योग समाधिसे योगी अमर हो जाता तो फिर कदापि कोई योगी न मरता । इस समयभी सब नजर आते । असंन्यासी तो ब्रह्मके ध्यानमें रहते हैं उनका भ्रम ब्रह्म है । वे भ्रमरूप होकर आवागमनमें पड़े रहते हैं उनका ब्रह्म भ्रम हो उसीमें फँसे रहते हैं ब्रह्म यम शिव सनकादिक इत्यादि सभी भ्रमकी नदीमें पड़े हुए डुबकियाँ खारहे हैं । इस भ्रमकी कोई सीमा नहीं है ।
सूक्ष्म वेदके बिना पढ़े किसीकी मुक्ति नहीं होती । जो कोई ध्यानपूर्वक पढ़े, एवं उसके सारे विषयोंपर विचार करे, उसकी आज्ञाओंपर भली-भाँति दृढ़ हो, समस्त मिथ्यओंसे पृथक् हो, वही मनुष्य है । वही कालपुरुषके पञ्जेसे छुटकारा पावेगा । कञ्जूस, कामी, व्यभिचारी पुरुषको सूक्ष्मवेदके पढ़नेसे किसी प्रकारका भी लाभ नहीं होता है ।
अपने गुरुको स्वयम् सत्यपुरुष करके जाने । गुरुके मुँहसे सत्यपुरुष स्वयम् खाता पीता है । गुरुके शरीरसे वस्त्रादि पहनता है जिसको गुरुकी बातपर विश्वास न होवे । जिसके मनमें घमंड हो, तथा जिसके मनमें नम्रता न हो वह नरकमें जावेगा । सेवा सब पुण्योंसे बड़ा चढ़ा पुण्य है । गुरुकी सेवाका कर्तव्य सबके ऊपर है । जो गुरुकी पूरी सेवा करेगा, उसका हृदय प्रकाशित होगा । गुरुकीही मूर्तिसे पारख गुरु निकलकर उसकी सारी कामनाओंको पूरी करेगा । कोई अपने गुरुके कर्तव्य पालन न करे, उससे पालन करावे, गुरुकी दी हुई वस्तुओंको भोंगे तो वह चोर और ठग है । एक अवस्थामें गुरुकी सेवा न भोंगी जावेगी जबकि, मनुष्य भली-भाँति डूबा रहे, दिन-रात वंदनामें संलग्न हो जावे, किसी दूसरी ओर ध्यान न हो, अपने शरीरकी चिन्ता भी न हो उस समय गुरु सेवाकी क्षमा होगी । गुरु उसकी वंदनका भागी होगा । जबतक ऐसी अवस्था न हो तब तक गुरुसेवासे अपनेको वो बचायेगी तो उसके मनमें तेज न चमकेगा । इस कारण सारे जीवन गुरुकी सेवा एवं आज्ञामें रहना उचित है । क्योंकि, गुरुके प्रति अपना कर्तव्य
लोगोंका शेखतकीके पास आना शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न
कभी किसीसे पूर्णरौतिसे निवह नहीं सकता है। केवल एक नामके बदले तीनों लोकमें कोई वस्तु नहीं है जो दी जावे। गुरुही धर्मकी जड़ है जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं। निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।
कंजूसकी कभी मुक्ति नहीं होती। यह बहुत बड़ा शैतान है, जिसके मनमें घुसता है वह जीवित ही मरा जैसा है, यह एक घृणा उत्पादक लत है। इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है, समस्त पीर पैगम्बर सिद्ध साधु इसको बुरा जानत हैं। किसी प्रकारकी वन्दना सेवा मनुष्य करे पर कृपणता एक ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती हैं। कंजूस सिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।
साखी—कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त।
लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥
साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है, भक्ति मुक्तिकी देनेवाली है। जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता तथा आवश्यकताकी वस्तुओंको इकट्ठा कर देता है उसकी सारी कठिनाइयाँ और पाप दूर हो जाते हैं। साधुओंकी कृपासे सारे पदार्थ प्राप्त होते हैं, साधु सारी युक्तियाँ बतलाते तथा सभी शुभ कार्योंको सिखलाते हैं, नरकसे बचाते, खींचकर वैकुण्ठको ले जाते हैं। ज्ञान एवं मुक्तिकी सारी युक्तियाँ समझाते हैं, समस्त भ्रम और धोखेको दूर कर देते हैं, साधु सत्यपदमें लगाते हैं, साधु संसारके सारे पदार्थोंपर आज्ञा करते हैं, साधु समस्त दुःख संतापको हर लेते हैं। साधुके समस्त पातक पृथक् हो जाते हैं। साधु साहब जुदे नहीं। साधु तो अनेक हैं। परन्तु वह साधु, जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे, सत्यपदमें लगावे उससे विशेष प्रेम करे। उसीकी वन्दना सेवासे हार्दिक कामना पूर्ण होगी। रोटी कपडा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंको दे। मान संमान तो समस्त साधुओंका करना चाहिये। वह साधु जो अपने स्वरूपके मिलनेका मार्ग बतलावे, साधु शिरोमणि वही है। साधुओंकी सेवा तथा आज्ञाका पालन सौभाग्यके चिह्न हैं। बड़े बड़भागी हैं जो साधुओंकी संगति करते हैं। साधुओंको भोजन देनेमें बड़ा पुण्य है। जगत्में उसके समान कोई नहीं है। साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख मिट जाते हैं। जबतक साधुके शरीरपर वस्त्र रहता है, तबतक देनेवालेकी सारी आपत्तियाँ दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बन्धनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई, मनुष्यताकी गतिको प्राप्त न हो। साधुओंकी दयासे मनुष्यधर्म तथा संसारकी सारी विद्याएं और बुद्धि प्राप्त करता है। बहुतेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्यपुरुषकी भक्तिसे भटकाकर कालपुरुषकी भक्तिमें लगा