कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भेद जानता है, कभी धोखेमें नहीं आता। यहाँ पर मैं कई एक दृष्टान्त लिखता हूँ, जिससे लोगोंको संसारकी असत्यता प्रमाणित हो।
प्रथम दृष्टान्त।
सन् १८५७ में जब कि, हिंदुस्तानमें राज विद्रोह हुआ था, दिहली शाह अपराधी ठहराये जाकर शहरसे निकाल दिये गये थे। शहर लूट लिया गया था। उसी समय, महाराजा कपूरथलाके दीवान, रामजसमल नामक खत्रीको एक पुस्तक, लूटमें मिली थी जो स्वयम् शाहजहाँ बादशाहके हाथकी लिखी हुई थी, उसमें एक बात इस प्रकार लिखी थी।
बादशाह लिखता है कि एक दिन एक बाजीगर नाना प्रकारके कौतुक दिखाने वह एक तलवार लेकर आकाशकी ओर उड़ गया। ऊपर जानेके समय वह कहता गया कि "मैं खुदाके साथ लड़ाई करने जाता हूँ"। थोड़ी देरमें देखतेही देखते, वह आखोंसे छिप गया। अधिक समय न लगा होगा कि, ऊपरसे उसका धड़ (जैसे, हाथ, पोंच, आदिसे लेकर समस्त शरीरके) एक एक टुकड़े होकर नीचे गिर गया। अब उसकी स्त्रीने कहा कि, मेरा पति मर गया है, मैं सती होऊँगी। बादशाह तथा अनेक लोगोंने बहुत समझाया पर स्त्रीने एककी भी न मानी, लकड़ियोंका ढेर लगाकर अपने पतिके अंगोंको लेकर सती होगई। उसके जल जानेके पीछे थोड़ी देर बाद बाजीगर आनन्दमें भग्न नीचे उतरा। अपनी स्त्रीको न देखकर बादशाहसे अर्जकी कि, मेरी स्त्रीको बुलवा दिया जाय। बादशाहने कहा कि, तेरी स्त्री तो तेरी लाशके साथ जलकर राख होगई, पर उस बाजीगरने एकका भी कहना न माना। अन्तमें अपनी स्त्रीको ऊंचे शब्दसे पुकारने लगा, तो वह स्त्री बादशाही अटारीपरसे बोली कि, मैं महलमें हूँ। उसने पुकारा कि, चली आ। वह आनन्द पूर्वक हँसती हुई आगई।
बाजीगरका यह कौतुक देख बादशाह प्रसन्न हुआ। उसे बहुत कुछ पारितोषिक देकर बिदा किया।
द्वितीय दृष्टान्त।
सन् १८३० ई० में मैं अपनी जन्मभूमि आजमगढ़में थे। वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। आजमगढ़में मच्छर नहीं थे। लोगोंसे पूछनेपर लोग कहते कि, यहाँके मच्छरोंको एक बाजीगरने बांध दिया है। मैंने पूछा कि, किस प्रकार? लोग कहते कि, एक समय यहाँके राजाके पास एक बाजीगर आया। उस समय राजा अपने राजमहलमें था। राजाको खबर पहुँची तो राजाने कहा कि, इस समय बाहर निकलनेसे मच्छर बहुत दुख देंगे। क्योंकि, मेरे शहरमें मच्छर
बहुत हैं । बाजीगरने कहला भेजा कि, मैं शहर भरके मच्छरोंको बाँधे देता हूँ, राजा साहब आकर मेरा खेल देखें । बाजीगरने अपने मंत्रके बलसे शहर भरके मच्छरोंको क़ैद कर दिया । राजा बाहर आया । बाजीगरने बहुत प्रकारके कौतुक दिखाये पीछे वही कौतुक दिखलाया वैसाही कर्तव्य किया जैसा कि, शाहजहाँ बादशाहके वृत्तान्तमें लिखा गया है । अन्तमें राजाने उपरोक्त बाजीगरको कतल करनेकी आज्ञा दी । अंतमें गिड गिडानेपर भी, अपने प्राणको बचाता हुआ न देखा तो बाजीगरने शाप दिया कि, “ऐ राजा ! तू कोढ़ी होकर बहुत दुःख पावेगा, तेरा राज्य नष्ट हो जावेगा, महान् कष्ट भोगकर प्राण त्यागेगा ।” पीछे बाजीगर तो मारा गया पर राजाको भी ठीक वैसेही विपत्ति, दुःख और कष्टोंका सामना कर प्राण त्यागना पड़ा ; जैसा कि, बाजीगरने शाप दिया था ।
बाजीगरकी समाधि—उपरोक्त बाजीगरकी समाधिपर एक खजूरका वृक्ष उगा जो कि, सीधा शहतीरके समान खड़ा था । राजाके वंशवाले उसपर खारूयेकी गिलाफ लगाते और उसकी पूजा किया करते थे । यदि वे उसकी पूजा नहीं करते तो उनको नाना प्रकार के विघ्नोंद्वारा बहुत दुःख हुआ करता था । नियत समयपर समाधिपर मेला लगा करता था, जिसमें हजारों आदमी इकट्ठे होते थे । राजाका किला टूट फूट कर दरियामें गिरता जाता था । राजाकी संतान, किला खजूर का वृक्ष, मेला और समाधिकी पूजा, मैंने अपनी आँखोंसे देखी थी ।
अनुमान होता है कि, उपरोक्त बाजीगर वही था, जिसने शाहजहाँ बादशाहको कौतुक दिखलाया था क्योंकि, बादशाह और राजा एकही समयमें हुए थे ।
राजाके परिवारका बालक—मूख राजाने विचारा था कि, यदि इस बाजीगरको मार डालूंगा तो यहाँके मच्छर ऐसे ही बँधे रहेंगे । अज्ञानतासे यह न सोच सका कि, जिस शरीरके सुखके लिये मैं ऐसा अनर्थ करता हूँ वह कबतक रहनेवाला है । इसका सुखही क्या है । उस पापका जो फल उसको प्राप्त हुआ वो तो ऊपर लिखा गया पर उसकी संतान भी महान् दुःखमय जीवन व्यतीत कर रही थी । उसी राजाके वंशका एक विद्यार्थी मेरे साथ पाठशालामें पढ़ने आया करता था जो महान् दुःखी था । उस समयके आजमगढ़ जिलाके मजिस्ट्रेट और कलेक्टरको धन्य है जिन्होंने, उसकी सब दशा देख उसके खानदानका हाल जान दया कर उसके पोषण पालनके लिये एक तहसीलदारीकी जगह दिलवा
गुरु दर्शन विधि
दी, जिससे उसे जीवन यात्राका सहारा लगा। यह हाल मैंने अपने कानों सुना कितनीही बार अपनी आँखोंसे देखा।
समन्वय — इस हालके लिखनेसे मेरा यह प्रयोजन है कि, उपरोक्त बाजीगरके खेलसे इस संसारकी दशा प्रगट करूँ कि, यह संसार निरञ्जन नटका खेल है, बड़े बड़े महात्मा सिद्ध, साधु गते इसमें पड़े खा रहे हैं।
पथिकका दृष्टान्त।
एक पथिक कहीं चला जाता था। एक दिन सन्ध्या होनेतक ठहरनेका कोई स्थान न मिला, पथिक घबड़ाकर शीघ्र किसी गाँवमें पहुँचनेकी कोशिश करने लगा। बहुत प्रयत्न करके जल्दी जल्दी मार्ग समाप्त करनेपर भी रात हो जानेतक कोई ग्राम न मिलनेसे और भी अधिक घबराया। अन्तमें बहुत व्याकुल होनेपर दूरसे एक दीपकका प्रकाश दिखाई दिया। उसे देखकर कुछ धैर्य हुआ, मनमें अनुमान किया कि, अवश्य कोई ग्राम है। अब बहुत शीघ्रतापूर्वक चलकर ग्राममें पहुँचा। वहाँ जाकर देखनेपर जान पड़ा यह तो ग्राम नहीं शहर है। ऊँचे ऊँचे मकान खड़े हैं, दीपकोंका प्रकाश फैल रहा है, दोतरफी दूकान लगी हैं, लोग अपने अपने कारबारमें लगे हुए हैं। बाजारमें सब प्रकारके पदार्थ मौजूद हैं। अतः पथिकने अपनी आवश्यकतानुसार पदार्थ लेकर, आनन्दपूर्वक भोजन किया, पानी पीकर सो गया। दिन भरका थका था ही ऐसी गाढ़ निद्रामें सोया कि, दूसरे दिन सात बजे आँख खुली। तो देखा कि, न तो शहर है, न मकान। न दूकान है, न कोई आदमी ही है वरन् शून्य सान जंगल पड़ा है।
पथिक यह कौतुक देख अत्यन्त आश्चर्यमें आकर, सोचने लगा कि, या परमात्मा यह क्या बात है? जिस शहरमें ८-१० घण्टा पहले मैंने पदार्थ खरीदे, इस समय उसका कुछ भी पता नहीं। इसी आश्चर्य सागरमें डूबा हुआ चलते चलते जब कुछ आगे गया तब क्रमशः दूसरे मुसाफिर मिलने लगे। पथिकने लोगोंसे पूछना आरम्भ किया कि, यहाँ पर एक शहर था, जिसके बाजारमेंसे खानेके पदार्थ लेकर रात मैंने भोजन किया उसी शहरमें सो गया पर इस समय उसका कुछ भी पताही नहीं। लोग उत्तर देते कि, क्या कहते हो? यहाँ तो कभी भी न शहर बसा, न बाजार लगा, न यहाँ आदमीही रहते हैं! हम लोग सर्वदासे इस जगहको ऐसाही देखते हैं। यह बात सुन सुनकर पथिक अचम्भमें आता था।
पथिकने जो नगर देखा था उसे गंधर्व नगर कहते हैं। गन्धर्वोंमें यह सामर्थ्य है कि, वे जो चाहें करलें। वे शहर बना लेते हैं पुनः जब चाहते हैं अन्तर्धान कर देते हैं। किन्हीं किन्हीं साधुओंमें भी ऐसी ही सामर्थ्य होती है कि, अपने
संकल्प द्वारा जो, पदार्थ चाहते हैं उपस्थित कर देते हैं फिर संकल्पसेही गायब भी कर देते हैं । यदि चाहें तो नियत समयतक स्थित भी रख सकें ।
कोलम्बसका अमेरिका प्रगट करनेका दृष्टान्त ।
नई दुनियाँ (अमेरिका) का प्रकाश कोलम्बस नामक जहाजीने किया था, जिसको ४०० वर्षके लगभग होता है । उसने चाहा कि, अपना जहाज उत्तर महासागरसे होकर भारतवर्षको ले जाऊँ । क्योंकि, दक्षिणसे तो अंग्रेजोंको मार्ग मालूमही है, उत्तरसे चलकर नया रास्ता निकालना अच्छा होगा । उसने सोचा कि, जब पृथ्वी गोल है तब चाहे दहिनेसे चलो, चाहे बायेंसे, अन्तमें एकही स्थानपर पहुँचना होगा । यह सोच विचार कर कोलम्बसने अपना जहाज उत्तरसे चलाया । जहाज महासागरमें पड़कर ऐसे स्थानपर जाने लगा, जहाँ पृथ्वीका भाग देख पड़ना भी कठिन हुआ । जहाज परके खानेकी सामग्री घटने लगी, यहाँतक कि, लोगोंने घोड़ोंको भी मारकर खा लिया, अन्तमें मनुष्योंको खानेकी बारी आई वरन् दो चार मारे भी गये । दो चार आदमियोंको मारकर खा लेनेके पीछे सबने आपसमें विचार करके यह निश्चय किया कि, कोलम्बसको भी मारकर खालो, उसीके कारण हमलोग इस विपत्तिमें फँसे हैं । जब कोलम्बसके मारनेकी युक्ति करने लगे तो कोलम्बसने सभोंसे कहा कि, एक दो दिन मुझे और जीवित रहने दो, यदि भूमि मिल गई तो अच्छा नहीं, तो मारकर खालेना । कोलम्बस मनमें बहुत घबड़ाया उदास हो जहाजको आगे चलाया । ईश्वरकी कृपा और लीला विचार करने योग्य है कि, जहाज बहुत दूर भी न गया होगा कि, समुद्रमें घास फूस बहे जाते देख पड़े । कोलम्बसके मनमें कुछ घैर्य हुआ, मनमें विश्वास हुआ कि, अब यहाँसे पृथिवी निकट है जिधरसे घास बही आती है पृथिवी उसी ओर है, यह अनुमान करके जहाजको भी उसी ओर चलाया । थोड़ेही दूर चलने पर अमेरिका' देश मिला जिसे कि अब नई दुनियाँ कहते हैं मिला ।
वहाँ पहुँचकर कोलम्बसने देखा कि, वहाँके लोग बड़े सरल सीधे और छल कपट रहित हैं, उनके पास धन बहुत है । कोलम्बसने दो चार तोप लगादी कई आवाजकी, जिसको सुनकर अमेरिकन लोग डर गये । उन लोगोंने आपसमें अनुमान किया कि, यह (कोलम्बस) सूर्यका पुत्र है उसकी पूजा करने लगे, उसकी आज्ञा दासके समान पूरी करने लगे । कोलम्बसने अमेरिकाका समाचार
१ इसी देशको नवीन शीक्षित लोग पाताल अथवा नागलोक कहते हैं बच्चोंको सिद्ध करनेके लिये बहुतसी युक्तियाँ भी दिखलाते हैं ।
सार, फकीर और शेख फरीदुद्दीन
युरोपमें भेजा, जिसको पाकर युरोपके कई एक सन्नाटोंने अपनी सेना भेजकर अमेरिका का बहुतसा भाग अपने आधीन कर लिया।
इस अमेरिकाको नई दुनियाँ बोलते हैं। वहाँके लोग बहुत सरल हृदय और छल कपटसे रहित थे। इससे प्रमाणित होता है कि, यह देश कोलम्बसके सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ था। उसका ऐसा सङ्कल्प हुआ कि, यह देश ऐसाका ऐसाही बना रहा, वही अबतक चला जाता है। इसको पहले कोई भी नहीं जानता था, इसकी रचना भी गन्धर्वनगरके समान है।
नारदजीकी कथा।
एक समय नारदजीने कठिन तपस्या की, जिसको देखकर इन्द्र भयभीत हुआ कि, नारद मेरा राज्य ले लेगा। इसी भयके कारण नारदजीकी तपस्याको नष्ट करनेके लिये कामदेवको भेजा। कामदेवने नारदजीके निकट जाकर शक्तिके अनुसार बहुतसी युक्तियाँ कीं पर मुनि कामातुर न हुये। पश्चात् इन्द्रके निकट गया कहा कि, नारदमुनि पर मेरा कुछ भी बल नहीं चलता, नारदजीने मुझे जयकर लिया। नारदजीको (कामके निष्फल होनेके कारण) अहङ्कार हुआ कि, मैं कामजीत हुआ, मेरे बराबर दूसरा कोई नहीं है। इसीमें नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प करते हुये इन्द्रके पास पहुँचे। वहाँ इन्द्रसे अपनी अपनी बड़ाई आपही करने लगे कि, मैंने कामको जीता। इन्द्रने कहा—क्यों न हो? आप जैसे तपस्वी, महात्मा ज्ञानीका काम क्या कर सकता है। इन्द्रसे यह अपनी प्रशंसा सुन नारदमुनि वहाँसे सीधे चलकर ब्रह्मलोकको पहुँचे। ब्रह्माजीने कुशल मङ्गल पूछनेके बाद पूछा कि, ऐ बेटा ! कहाँसे आ रहा है ? नारदजीने कहा मैं अमुक बनमें तपस्या कर रहा था, वहाँ काम मुझे छलने गया, पर मैंने उसको जीत लिया, इतना कहकर अपने तप तथा कामदेवका सब हाल कह सुनाया। यह बात सुनकर नारदजीको अभिमान देख ब्रह्माने कहा कि ऐ बेटा ! ऐसा अभिमान मत कर काम बड़ा बली है, उसके कारण बहुत लोग नष्ट भ्रष्ट हुये हैं। अबसे यह अभिमान मनसे निकाल दे, मेरे सामने कहा सो कहा, विष्णु भगवानके सामने भूलसे भी न कहना।
ब्रह्माजीकी यह बात सुनी अनसुनी कर नारद शिवजीके पास गये। शिवजी बड़े प्रेमसे मिले। नारदजीने वहाँ भी अपनी वही बात चलाई, जिसको सुनकर शिवजीने कहा कि, यहाँ जो कहा सो कहा विष्णुके पास यह कभी न कहना। पर नारदजी शिवजीके वचनको भी न मानकर सीधे विष्णुलोकको गये, भगवान्ने बड़े प्रेमके साथ नारदका सत्कार कर कुशल मङ्गल पूछा।
मुहम्मद साहिबके कार्य बिनापढे ज्ञानी
नारदका तो मन तरङ्गोंमें था वहाँ भी अपनेको कामजीत प्रगट किया । विष्णु भगवान्ने नारदकी बात सुनकर मुसकुरा कर प्रगट किया कि, आप सब तप-स्वियोंके शिरोमणि हैं आपके सन्मुख कामका जीतना कौन बड़ा भारी काम है ? भगवान्ने मनमें विचार किया, इस समय नारदको अड़कार हुआ है । यदि इसको न सम्हाल लिया जावेगा तो बहुत दुःख होगा । इतना विचार कर अपनी शक्तिको आज्ञा दी । मायाने वहाँसे चलकर एक स्थान पर जो नारदजीके जानेका मार्गमें ही एक नगर बनाया, जिसमें राजा प्रजा सहित सब सांसारिक सामग्री । उपस्थित कर दीं ।
उधर तो यह कौतुक हुआ, इधर नारदजी भगवान्के पाससे चलकर उस नगरमें पहुँचे, नगर देखनेकी लालसासे शहरमें प्रवेश किया । नारदजीके आनेका समाचार राजाके पास पहुँचा, वह दौड़ा हुआ आया नारदजीकी अगवानी करके अपने राजमहलमें ले गया, अर्घ्य पाछ दे पूजन कर उच्च आसनपर बैठाया ।, पीछे अपनी एक पुत्रीको जिसका कि वह शीघ्रही स्वयम्बर करनेवाला था बुलाकर नारदजीके सन्मुख खड़ा किया । कहा कि, महाराज ! दया करके इसके भाग्य अभाग्यका विचार बतलाइये इसको कैसा पति मिलेगा ? यह भी कहिये नारदजीने देखकर कहा कि, यह बालिका बहुत भाग्यशालिनी है, इसका पति सब विद्या सम्पन्न कला कौशल संयुक्त महाऐश्वर्यवान् चक्रवर्ती राजा होगा । नारदजीने प्रगटमें तो यह कहा पर अन्तःकरणमें उसके प्रेमका तीर खाया । यह चिन्ता हुई कि, किसी प्रकार इस राजकुमारीको व्याहना चाहिये । इसी चिन्तामें विचार करते २ यह निश्चय किया कि, यदि मैं अत्यन्त सुन्दर बन जाऊँ तो यह मुझे अवश्यही स्वीकार कर लेगी । अन्तमें विचार करते २ यह निश्चय किया कि, विष्णुसे बढ़कर कोई सुन्दर नहीं है, अब चलकर विष्णुसे सुन्दरता माँगनी चाहिये । यह निश्चय करतेही उलटे फिरकर विष्णुलोक पहुँचे । विष्णु भगवान्ने देखकर कहा, बहुत शीघ्र लौटे । कहो क्या चाहिये नारदजीने कहा कि, आप अपनी सुन्दरता दीजिये, श्रीनगरके राजा की पुत्रीका स्वयम्बर है । विष्णु भगवान्ने कहा कि, बहुत अच्छी बात है जिसमें आपकी भलाई होगी वही करूँगा । इतना सुननेके बाद नारदजीने देखा कि, मेरा शरीर परम सुन्दर हो गया, पर यह सुधि नहीं हुई कि, मेरा मुंह कैसा है ? भगवान्ने समस्त शरीर तो नारदका अपने समान बना दिया पर मुख बन्दरोंकासा बनाया । नारदजी बकुण्डसे चलकर फिरसे उसी नगरमें पहुँचे, वहाँ देखा कि, राजकुमारीके स्वयम्बरकी बड़ी तैयारी हो रही है, रङ्गभूमिमें देश देशके अनेक राजे
और राजकुमार बैठे हैं, राजकुमारी माला लिये फिर रही है। नारदजी भी रङ्गभूमिमें पहुँचे, जाकर एक आसन पर विराजमान हुये मनमें लगी थी कि, राजकुमारी मेरेही गलेमें जैमाल डाले, पर राजकुमारी फिरते २ जैसे नारदजीके सम्मुख आई वैसेही पिछले पाँव फिर कर दूसरी ओर चली गई। नारदजी अपने आसनसे उठकर राजकुमारीके सम्मुख जा बैठे। राजकुमारी उनको देखतेही उधरसे भी लौटी। अब तो नारदजीने ऐसा किया कि, राजकुमारी जिधर २ जाती उधरही उधर उसके सम्मुख जा बैठते राजकुमारी भी विचित्र बन्दर मुखवाले पुरुषको देखकर घृणासे दूसरी ओर फिर जाती। इतनेहीमें विष्णु भगवान भी राजाके स्वरूपमें आकर रङ्गभूमिमें उपस्थित हुये। राजकुमारीने जैसेही भगवानको देखा वैसेही माला पहनादी। नाना प्रकारके बाजन बजने लगे, बड़े उत्साह और आनन्द पूर्वक भगवानके साथ राजकुमारीका विवाह हो गया, भगवान् उसे साथ लेकर वैकुण्ठको गये। भगवानके चले जाने पर नारदने निराश होकर मनमें बहुत क्रोधित हो चलनेका विचार किया। नारदजीकी व्याकुलता और क्रोधसे क्षण क्षणमें मुखका रङ्ग बदलते देखकर शिवके गणोंने, कहा कि, महाराज आपका मुंह तो देखिये! आरसी न मिले तो जलमें देखो। नारदजीने जाकर जलमें मुखको देखा। कुरूप बन्दरकासा रूप देखकर अत्यन्त क्रोधित हुये। क्रोधसे उन दोनों शिवके गणोंकी ओर देखा। कहा कि, हे मूर्खों! तुम लोगोंने जान बूझकर न कहा मेरा ठट्ठा किया जिससे मेरी अप्रतिष्ठा हुई तुम लोगोंने जानकर मेरी प्रतिष्ठा नष्ट की है, इस कारण तुम दोनों राक्षस होगे बन्दरोंसे तुम्हारी दुर्दशा होगी। फिर नारदजी क्रोधसे झुंझलाते हुये विष्णु-भगवानके पास चले। जाते जाते राहमेंही राजकुमारी सहित विष्णु भगवान् मिल गये देखतेही क्रोधके आवेश में आकर शाप दिया कि, हे विष्णु! जैसे तूने मेरे साथ छल किया है, मुझे स्त्रीका वियोग कराया उसी प्रकार तू भी मनुष्य का शरीर धारण करेगा, तेरी स्त्रीका हरण होगा, जिसके लिये बनबन रोता फिरेगा, विरहसे व्याकुल होगा, मेरा मुख बन्दरोंकासा बनाया है इस कारण बन्दरोंकाही आसरा लेना पड़ेगा, उनके बिना तेरा काव्य सिद्ध न होगा। नारदजीके इसी शापके अनुसार रामावतार हुआ, रावणने सीताका हरण किया, फिर बन्दरोंकी सहायतासे रावणको जय किया।
मायानगर—जिस नगर में यह हाल हुआ था वह श्रीनगरके नामसे प्रसिद्ध है। कोई २ कहते हैं कि, काश्मीरकी राजधानी श्रीनगर वही मायावी शहर है। कोई कहते हैं कि, ब्रह्मनारायणके मार्गमें जो श्रीनगर नामक नगर है
२१ अ० जीवका वर्णन
बही वह नगर है । अतः कुछ भी क्यों न हो, दोनोंमेंसे एक न एकही होगा । यदि इस नगरकी शोभा और बनावट अब वैसी नहीं रही है पर अब तक नगर वर्तमान है उसको मायाने एक पलमें बनाया था यह कथा भी पूर्वोक्त कथाओंके समान है ।
सिकन्दर बादशाह और फकीर ।
किसी समय एक फकीरने बड़े सिकन्दरकी दावत की । फकीरने अपने चेलेसे कहा कि, तू अमुक मंदानमें खड़ा होकर अपनी झोली हिलाया कर । गुरुकी आज्ञानुसार शिष्यने झोली हिलाना आरम्भ किया थोड़ेही समयमें उस मंदानमें एक नगर बस गया । राजाओंके योग्य सब सामग्री इकट्ठी होगई, सहस्रों दास दासियाँ उपस्थित हो गये, पाकशाला खड़ी होगई, नानाप्रकारके भोजन तैयार होने लगे । एक ओर नाच रङ्गका सामान इकट्ठा हुआ, आनन्द कुतूहल होने लगा इस प्रकार फकीरने बादशाहकी बड़ी आवभक्ति की । बादशाह जब भोजन करके शयनागारमें गया तो वहाँ एक परम सुन्दरी स्त्री भी उसके साथ सोई पर जब वे दोनों सो रहे थे सम्भोग करते २ अन्तका समय निकट आया तो उस फकीरने अपने चेलेसे कहा कि, अब तू झोलीका हिलाना बन्द कर दे, शिष्यने जैसेही झोलीका हिलाना बन्द कर दिया वैसेही सब रचना अन्तर्धान होगई, सूनसान उजाड़ दीखने लगा न कोई जीवधारी रहा न कोई मकान, न कोई पदार्थ ही वहाँ देखनेमें आया । बादशाहने देखा कि, मैं औंधे मुंह पृथिवी पर पड़ा हूँ, न वह स्त्री है, न वह पलंग । अपनेको नङ्गा पृथिवी पर पड़ा देखकर अनुमान किया कि, इस फकीरने मेरे साथ ठट्ठा किया है, क्रोधमें आकर फकीरको बहुत ढुँढवाया पर कहीं उसका पता न लगा न उसका चेलाही मिला । इस प्रकार उस फकीरने बादशाहको यह उपदेश किया कि, न तू कुछ है न तेरी बादशाहतही है ।
इन्द्रकी कथा ।
योगवाशिष्ठमें लिखा है कि, किसी समय देवताँ और दैत्योंमें युद्ध होने पर इन्द्र दैत्योंसे परास्त होकर भयसे भागा । अपने योगबलसे बहुत सूक्ष्मरूप बनाकर एक परमाणुमें घुस गया । अब उसमें से दैत्योंके भयके कारण वहाँसे निकलना नहीं चाहता था । पर उसे तो तीन लोकका राज्य भोगना था इस कारण उसी परमाणुमें ही तीन लोक दीख पड़े । सब सामग्री राजा, इन्द्रको उसी परमाणुमें मिली उसी परमाणुमें दश पीढ़ी तक इन्द्रका राज्य रहा ।
जीवके पक्के तत्व, कच्चे होना मायासे संयोग
तपस्वीकी कथा ।
इसी पुस्तकमें लिखा है कि, एक पुरुष उलटा लटक रहा था, उससे उसका आशय यह था कि, तीन लोकका राज्य मिले, पर उसकी स्त्री इस हेतु तपस्या कर रही थी कि, मेरा पति मेरे घरसे बाहर न जावे। दोनोंकी कामना पूर्ण हुई, उस पुरुषने तो सातों द्वीपका राज्य पाया उसकी स्त्रीके जानते उसका पति उसके घरसे बाहर न गया। घरके भीतरही उसे सात द्वीपका राज्य मिला।
तपस्वी गाधको माया दर्शन ।
एक समय कर्मकाण्डी विद्वान् सरयू नदीमें खड़ा होकर तपस्या कर रहा था, अत्यन्त कष्टसे तपस्याके सिद्ध होनेपर विष्णु भगवान् प्रसन्न हुये दर्शन देकर बोले कि, बर माँगो। तपस्वीने कहा कि, आपकी मायाका कौतुक देखना चाहता हूँ। भगवानने कहा कि, ऐसाही होगा। इतना कहकर भगवान तो अन्तर्धान हो गये। तपस्वीने पानीमें स्नान करनेके लिये डुबकी लगाई तो क्या देखता है कि, वह सपरिवार है अपने घरपर बीमार होकर भर गया है, उसके घरके लोग रोते हुए शोक करते हैं। रीतिके अनुसार उसकी अन्तिम क्रिया हुई, श्राद्ध आदिक भली प्रकारसे किये गये। अब क्या देखता है कि, एक भङ्गीके घरमें जन्म लिया जहाँ इसका गज नाम रखा गया। सोलह वर्षकी अवस्था होने पर एक सुन्दरीके साथ विवाह हुआ, आनन्दपूर्वक उसके साथ जीवन व्यतीत करने लगा। इसके कुछ दिन बीत जानेपर तपस्या करनेकी इच्छा हुई, जङ्गलमें रहकर तपस्या करने लगा। कुछ दिनके बाद स्त्री आदिक सब मर गये, उसके शोकमें देश त्यागकर दूसरे देशको चला गया, जिस देशमें वह पहुँचा वहाँ का राजा सन्तानहीन मर गया था। वहाँके लोगोंने रीत्यानुसार एक हाथीके सृङ्गमें मोतियोंका माला दे दी ऐसा निश्चय कर लिया कि, यह हाथी जिसको माला पहनावेगा उसीको राजा बनाऊँगा। उसी समय जब कि, गज उस देशमें पहुँचा कारंवाई हो रही थी, उस हाथीने इस भङ्गी (गज) के गलेमें माला डाल दी। अब गजकी दयासे उस देशका राजा बन गया। अब वहाँ उसका नाम “कौल” रखा गया। बहुत दिनोंतक आनन्द पूर्वक राज्य करनेके बाद एक दिन राजा कौल नग्न शरीर फिर रहा था कि, उसीके वंशका कोई पुरुष भङ्गी वहाँ आ निकला। उसने राजा कौलको पहचान कर कहा, भाई गज ! इतने दिनों तक कहाँ रहे, किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत किया, आजका दिन कँसा अच्छा है कि, बहुत दिनोंके विरेछ हुये मित्रसे भेंट होगई। वे दोनों खड़े वार्तालाप कर रहे थे, बहुतसे लोगोंने उनको
पतन, उन्नति और अवनतिके कारण तत्वमसिका अर्थ खण्डन
देखा यह बात प्रसिद्ध होगई कि, राजा जातका भङ्गी है । इस बातके प्रसिद्ध होनेपर राज्यके जितने अहलकार थे सब बहुत लज्जित हुये । विचारने लगे कि हाय ! हमने बड़ा अनर्थ किया कि, भङ्गीके साथ भोजन आदिक संसर्ग किया । प्रायश्चित्तके लिये ब्राह्मणोंके पास गये, ब्राह्मणोंने कहा कि, अपना सब धन सम्पत्ति ब्राह्मणोंको दान कर दो अपने कुटुम्ब सहित अग्निमें जल जाओ इस पापसे छूटोगे, दूसरा कोई भी मार्ग नहीं है । अतः वे सब अपना धन सम्पत्ति ब्राह्मणोंको देकर अग्निमें जल मरे ।
कौल राजाने जब सुना कि, मेरेही कारण सहस्त्रों मनुष्य सपरिवार अग्निमें जलकर मर गये, अब मेरा जीवन व्यर्थ है, मैं भी जलकर मर जाऊँगा यह विचार कर लकड़ियों जमा करके चिता बनाई उसपर बैठके अग्नि लगा दी । थोड़ी देरमें अग्निकी ताप उसे लगी चेत आया अपनेको देखा कि, मैं वही गाध नाम ब्राह्मण हूँ, जो सरयू नदीमें स्नान कर रहा था । उसके कपड़े जैसेके तैसे रखे हुये हैं, स्नान करनेके लिये चार घड़ीसे अधिक समय नहीं बीता पर उसको भङ्गीके घरमें रहते और उसको राज्य करते हुये सौ वर्ष (१००) हो गये थे । नदीमें डुबकी मारतेही उसकी यह दशा हो गई थी ।
यह कौतुक देखने पर भी सन्तोष नहीं हुआ, फिर तपस्या करना आरम्भ किया । दूसरी बार तपस्या आरम्भ करने पर एक ब्राह्मण उसके घर आया । वह नवागत बहुत कृश और निर्बल हो रहा था । गाधने उसकी यह दशा देखकर पूछा, तुम ऐसे क्यों हो रहे हो ? अभ्यागतने कहा कि, मैं कोशर देशका रहनेवाला हूँ, कालके प्रभावसे वहाँ एक चाण्डाल राजा हो गया था, जिसके साथ वहाँके सब लोगोंने भोजनादिक किया, जिसके कारण वे सब अग्निमें जलकर मर गये । अग्निमें जल जानेके भयसे मैं वहाँसे भाग आया । क्योंकि, मेरा भी उन लोगोंके साथ भोजन आदिकका संसर्ग हुआ था । इस भयसे कि, कोई मुझे भी जल जानेको न कहे मैंने देश छोड़ दिया । अब अज्ञात देशोंमें फिरता हूँ जिससे मुझे कोई न पहचान ले । तभीसे बराबर चान्द्रायण व्रत करता हूँ, जिसके कारण शरीर कृश और निर्बल हो गया है ।
यह कहानीको सुनकर गाध ब्राह्मणने अपने मनमें विचारा कि, यह तो मैंने स्वप्नके समान देखा था, यह प्रत्यक्ष कैसे वर्णन करता है ? इस ब्राह्मणकी जबानी तो मेरा स्वप्नके समयका देखा हुआ सब सत्य जान पड़ता है । कुछ विचार कर उस अभ्यागत ब्राह्मणसे पूरा पता ठिकाना पूछ लिया । वह ब्राह्मण तो बिदा हो गया और गाध उस विषयकी सत्यता जाननेके लिये चला ।
जीवनमुक्त तथा विदेह मुक्त
प्रथम लौतदेशको गया वहाँ अपने भङ्गी परिवारोंको देखा, उनको भली प्रकार पहचाना, मकानोंको ठीक २ वैसेही देखा। वहाँसे केशर देशको चला, केशर देशमें पहुँचकर राज्यका हाल जाना, जैसे पहले देखा था वैसेही पाया। लोगोंसे कहा यहाँके लोग तो बड़े भक्त और अभ्यागतसेवी जान पड़ते हैं। लोग कहने लगे कि, यहाँ तो बड़ी भक्ति और सेवा हुआ करती थी पर कुछ दिन हुए यहाँ एक भङ्गी राजा हो गया था, जिसके साथ लोगोंने भोजनादिक संसर्ग किया बहुतसे लोग उसी पापमें जल मरे। इसी कारण लोगोंके मनमें बड़ा सन्देह हुआ इसीसे अभ्यागतोंकी सेवा बन्द हो गई।
यह सब हाल देख सुनकर गाधको विश्वास हुआ कि, माया कुछ न होनेपर भी सब कुछ है। फिर तपस्यामें संलग्न हुआ। विष्णु भगवान् फिर प्रगट हुये कहा कि, सब कुछ पञ्चतत्त्वसे बना है पञ्चतत्त्व माया है, जो मायाको चाहेगा उसको मायाही मिलेगी। जो ज्ञान चाहता है अथवा जिसको ज्ञान हो जाता है, वह मायाको तुच्छ जानता है, उसकी अभिलाषा नहीं करता। मायाको चाहनेवालोंको मायाही मिलती है जैसे खेतमें धान बोनेवालोंको खलिहानमें गेहूँ नहीं मिलता। बबूरकी डालीसे कोई सेब नाशपाती अथवा अंगूरदि नहीं तोड़ सकता। तू मायाका अभिलाषी था, इसलिये मायाही मिली। भङ्गीके घरमें तुझको सुन्दर स्त्री मिली, राजा होकर सहस्रोंकी हत्याका अपराधी हुआ, यदि मोक्ष चाहता है तो मायाकी उपासना छोड़ दे।
फकीर और अघोरी।
पञ्जाब देशान्तगत पटियाला राज्यके बिटण्डा नामक नगरमें मेरे मित्रोंमें से हुजूरशाह नामक एक विरक्त मित्र (१८७५ ई. में) रहते थे। हुजूरशाह बड़े महात्मा थे, वे कभी २ मुझसे भी मिलनेके लिये दूधनामक गाँवमें आया करते थे, जहाँ कि, मैं रहता था। एक दिन संयोगन मुझसे कहने लगे कि, उनके पास (शहर विटण्डामें) धूलीशाह नामक एक फकीर आये। उन्होंने उनके खूब आवभक्ति की, रातके समय धूलीशाह उनके पास रहे। सबेरे वहाँसे जाने लगे तो हुजूरशाहजीने कहा कि, अब फिर कब दर्शन होगा? धूलीशाहने कहा कि, मेरा डेरा सङ्कुरा राज्यके अमुक ग्राममें है इतना कहकर वहाँसे चले गये। कई एक दिनोंके बाद धूलीशाहके बताये हुये पते ठिकानेपर हुजूरशाह उसी ग्राममें पहुँचे। वहाँ लोगोंसे उन्होंने पूछा कि, धूलीशाह कहाँ रहते हैं, उनकी कुटिया कहाँ है? वहाँके लोगोंने कहा कि, अब धूलीशाह यहाँ कहाँ, उनको मरे हुये पचास वर्षसे भी अधिक हो गया, अब तो यहाँ उनकी समाधि बनी
अम्र ब्रह्म, दृष्टान्त
हुई है । हुजूरशाहजीने धूलीशाहके कब्रको जाकर देखा सलाम करके चले आये । इसी प्रकार सहलों साधू फकीर प्रगटमें तो मर गये हैं पर दूसरी जगह फिर प्रगट होकर फिरा करते हैं । यह सारा संसार बाजीगरका कौतुक है । उदाहरण लिखता हूँ ।
एक दिन ये ही हुजूरशाह साहब कहने लगे कि, गरमीका समय था । कड़ाकेकी धूप पड़ रही थी, दोपहर होने आया था, उस समय एक अघोरी मेरे पास आया । अभ्यागतोंको सम्मान देना सबको उचित है पर उस समय पास खानेका पदार्थ कुछ नहीं था । मेरे हृदयकी बातको अघोरी समझ गया और कहींसे कुछ गुड़ लाया, वह गीला होनेके कारण उसमें बहुतसी मक्खियाँ चिपटकर मर गईं थीं, जिसको देखकर मुझे बहुत घृणा हुई पर मक्खियोंके साथही उसने गुड़ भी घोल कर पी लिया । मक्खियें साथ पी लेनेके बाद वह हुक्का पीने लगा । तम्बाकू पीते पीते धूँवाँ निकालता तो दो चार मक्खियाँ मुखसे निकल कर हवामें उड़ने लग जातीं, इसी प्रकार सब मक्खियोंको उसने धूँवाँकी राहसे बाहर निकाल दिया ।
इसी प्रकार काल निरञ्जन समस्त संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश किया करता है । अघोरी लोग निरञ्जनके मुख्य सेवकोंमें हैं, जब इनका साधन पूर्णताको पहुँचता है तब ये काल निरञ्जनसे मिलकर उसीके रूप हो जाते हैं ।
राजा लवण ।
उत्तरीय भारतके प्रसिद्ध महाराजा हरिश्चन्द्रके वंशमें लवण नामक एक राजा हुआ था । वह सर्वाङ्ग सुन्दर, विद्या, कला कोशलमें पूर्ण, राजकीय कार्योंमें निपुण, सदाचारी, न्यायी, शत्रुओंपर दया भी करने वाला, सेवकोंपर पुत्रके समान दृष्टि रखनेवाला, समानके राजाओंसे द्वेष रहित प्रीति करनेवाला और छोटे तथा पड़ोसके राजाओंकी रक्षा करनेवाला था, सब देशके वणिज लोग स्वतन्त्रता पूर्वक उसके राज्यमें वाणिज्य किया करते थे ।
एक दिन राजा सिंहासनपर बैठा दरबार कर रहा था कि, एक बाजीगर आया, यथायोग्य नमस्कार करके कहने लगा कि, मैं कामरूपदेशसे आया हूँ, बंगालेकी जादूगरी सीखा हूँ, विचित्र खेल दिखला सकता हूँ, यदि आज्ञा है तो कुछ कौतुक दिखलाऊँ । राजाकी आज्ञा पाकर तमाशा दिखलाने लगा । हाथमें एक मुछल लिया, उसको इधर उधर हिलाकर आकाशकी ओर फेंक दिया । वो आकाशमेंही लोप हो गया । बहुत देर न हुई थी कि, सिन्धदेशका एक दूत एक घोड़ा लिये हुये आया कहने लगा कि, यह घोड़ा समुद्रसे निकला
है, मेरे राजाने यह आपके लिये भेंट भेजी है। राजाने दूतको यथायोग्य प्रतिष्ठा दी। राजाने उसे आनन्द पूर्वक स्वीकार कर ली। बाजीगरने कहा कि, महाराज ! इस घोड़ेपर सवार हूँजिये, इसका तमाशा देखिये। राजाने उस घोड़ेकी ओर दृष्टि की। दृष्टि करतेही राजाकी टकटकी बँध गई ऐसा चुप बैठ गया मानों सक्तासी आ गई है। राजाकी यह दशा देखकर सब दरबारी लोग आश्चर्यमें थे, राजाके शरीरको निर्जीव अनुमान करने लगे थे। इस अवस्थामें दो घड़ी रहनेके बाद चैतन्य हुआ, सब लोगोंकी जानमें जान आई। राजाने कहा कि, जिस समय बाजीगरने अपना मूर्छल हिलाया था घोड़ा आजानेपर जैसेही बाजीगरने उसपर चढ़नेको कहा वैसेही मैंने अपनेको उस घोड़ेपर सवार हुए घोर वनमें शिकार खेलते हुये पाया था। वहांसे चलते चलते एक ऐसे वनमें पहुँचा जहां किसी भी जीवधारीका पता नहीं था। आगे चलकर एक ऐसे भँदानमें पहुँचा जहां कि, वृक्ष तो क्या ? घास भी नहीं देख पड़ती थी, दिनभर उसीमें फिरता रहा, रात हुई तो उससे बाहर हुआ। बाहर होना क्या था ? एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा। उस जङ्गलमें नानाप्रकारके जीवधारी इधरसे उधर फिर रहे थे, जगह जगह मीठे पानीके तालाब भरे हुये थे, नानाप्रकारके सुन्दर और फलदार वृक्ष स्थान स्थान पर खड़े थे। मैंने वृक्षकी डाली पकड़ ली वृक्षपर चढ़ गया। घोड़ा भी उसी जङ्गलमें चरता रहा। वह रात मुझे कल्प समान बीती। क्योंकि, दिनभरका थका हुआ भूखा, प्यासा, ऐसे अपरिचित वनमें पड़ा हुआ था। सबेरा होनेपर मार्गको ढूँढ़नेके लिये इधर उधर भटकते भटकते एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा, उसमें बड़े वृक्ष तथा जलका अभाव था, पर कुछ दूर आगे चलनेपर एक लड़की, हशियाँ काली, जैसी भँसकीसी मोटी और शूकरकीसी मैली, अपने हाथमें भोजन लिये हुये जल्दी जल्दी कहींको जाती देख पड़ी। मैं कई दिनका भूखा था, धैर्य न रख सका, उसीसे कहा कि, पर उपकार करना सर्वोत्तम गुण है, किसी भूखेको तृप्त करादेनाही पुण्य है, मैं कई दिनोंका भूखा हूँ, तू अपने भोजनमेंसे थोड़ा मुँ भी देदे। बहुत प्रकारसे बिनती करनेपर कठोर हृदयाने मेरी कुछ भी न सुनी, वरन् भयानक होकर कहने लगी कि, मैं भड़्गिनकी लड़की हूँ, इस वनमें मेरा पिता खेतका काम कर रहा है, उसीके लिये भोजन लिये जाती हूँ, इसमेंसे मैं तुझको नहीं दे सकती। हाँ ! उस दशामें कि, तू मुझसे विवाह करना स्वीकार कर ले तो आधा तुझको दे दूँ, क्योंकि, पति पितासे भी अधिक प्यारा होता है। राजाने कहा कि, आवश्यकतामें प्रतिष्ठा और पवित्रताका ध्यान नहीं रहता, आवश्यकता मनुष्यको किस घाटका पानी नहीं पिलाती
ज्ञानके साधन
है ? मैंने भी आवश्यकताके बश होकर उस भङ्गन की लड़कीसे विवाह करना स्वीकार कर, उससे भोजन लेकर खाया । उसके पास स्वयं मृत पशुका मांस और जो की रोटी थी । वह मुखमें स्वर्गीय भोजनके समान स्वादिष्ट जान पड़ा । पीछे लड़की मुझे पिताके पास ले गई उससे कहा कि, मैंने इस पुरुषको पति स्वीकार किया है तुम भी इसे अपना दामाद बनाओ । उसके बुड़दे बापने कहा कि, जिसको तूने स्वीकार किया वह मुझेभी स्वीकार है । सन्ध्या होनेपर मैं उसके साथ उसके घर गया । वहां देखा तो चारों ओर शूकर फिर रहे हैं, घरमें स्थान २ पर मांस, हड्डियां लटकती औ पड़ी हैं । उस बुड़देने अपनी स्त्रीसे कहा कि, मेरी बेटीने इस पुरुषको पति बनाया है, मेरी सासने भी स्वीकार किया । उन लोगोंके स्वीकार करतेही गांवभरके मेहतर लोग जमा हुये उत्सव करनेका विचार किया । सात दिनतक बराबर मछ, मांसका खाना पीना तथा नाच रङ्ग होता रहा ; मेरा विवाह हो गया । एक सप्ताह भी पूरा न बीता होगा कि, भङ्गन गर्भवती हुई । दो महीनेमें गर्भ रह गया, अब क्या कहना था ? साल २ बच्चे पैदा होने लगे, कई वर्षोंमें बच्चोंसे घर भर गया । एक साल अकाल पड़ा, गांवके सब लोग तितिर बितिर हो गये, मैं भी अपनी स्त्री और बच्चोंको साथ लिये हुये बाहर निकला । चलते २ थकावट भूखसे एक वृक्षके नीचे बैठ गया । खानेको कुछ भी पासमें न था, भूखके मारे सबके प्राण घबड़ा गये । यह विचार हुआ कि सब आत्महत्या करदे, मैंने जब अपनेको आगमें दिया आगकी गर्मीने मुझने तपाया तो मेरी आँख खुल गई, होशमें आया अपनेको यहाँका यहाँही बैठ पाता हूँ । यह सब विपत्ति इस बाजीगरके कारणही भोगी है । इतनी बात सुनतेही बाजीगर अन्तर्धान हो गया । लोगोंने राजासे कहा यह कोई बाजीगर नहीं था, वरन् देवता था, जो आपको उपदेश करनेके लिये आया था कि, संसार ऐसेही भ्रम हैं । यदि कोई बाजीगर होता तो इनाम लिये बिना न जाता । कुछ दिनोंके बाद राजा आखेटके लिये बनकी दक्षिण दिशामें गया चलते २ एक पहाड़की तराईमें पहुँचने पर देखा कि, वहां भङ्गियोंकी बड़ी भीड़ है, उसमें अपने ससुरको भी देखा । उससे अपनी स्त्रीका हाल पूछा राजाका भङ्गी साला मिला । वह, पहचानकर अपने घर ले गया । वहाँ पहुँचनेपर राजाने देखा कि, बहुतसी स्त्रियां बैठी रो रही हैं राजाने पूछा तुम क्यों रोती हो ? उसकी सासने कहा, मेरा दामाद मेरी पुत्रीको लेकर अकालके दिनोंमें न मालूम कहाँ चला गया, इसीसे मैं रोती हूँ । यह बात सुनतेही राजाको भी रोना आया, फिर अपने मंत्रीकी ओर देखकर अपनी सासको कुछ इनाम दिलवाया, वहांसे दूसरी ओर चल दिया ।
माया क्या नहीं करती है, सत्यको असत्य और असत्यको सत्य बनाना असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव बना देना ही इसका काम है। मायाके कार्यमें बुद्धि कुछ भी निश्चय नहीं कर सकती मायाकी गतिको जान लेना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है।
साखी - जाकी गति ब्रह्मै नहिं पायो, शिव सनकादिक हारे।
ताकी गति नर कैसेके पड़हो, कहैं कवीर विचारे ॥
मुहम्मद साहबके मआराज।
मुहम्मद साहब मआराजको गये एक क्षणमेही सारे आकाशका भ्रमण करके पीछे आगये। पीछे आने पर लोगोंसे अपना सबहाल कहा, किसी २ ने तो मान लिया पर बहुतोंने न माना। सुलतान रुमने तो इस बातके ऊपर तनिक भी विश्वासही नहीं किया। मुहम्मदसाहबकी बातको बिलकुल झूठ समझा बहुत दिनोंतक ऐसाही अविश्वासी बना रहा। एक दिन एक फकीर बादशाहके सामने आकर कहने लगा कि, ईश्वरमें सब शक्ति है वह जो चाहे दिखलावे, जो चाहे सो करदे। आप मुहम्मद साहबके मआराज पर क्यों नहीं विश्वास लाते? मुहम्मद साहबका मआराज बहुतही ठीक है। उस फकीरने बहुत प्रकार बादशाहको समझाया पर बादशाहने एक भी न मानी, उस फकीरने बादशाहसे कहा कि, पानीका एक बड़ा बरतन मँगवाओ। बरतन मँगवाया गया फकीरके कहनेसे उसमें पानी भरकर मैदानमें रखवा दिया गया। उसने बादशाहसे कहा कि इसमें अपना माथा डुबाकर निकाल लो। दरबारी लोग चारों तरफसे घेरकर खड़े थे, बादशाहने जलमें शिर डालके तुरतही निकाल लिया। शिर निकालतेही उस फकीरके ऊपर क्रोध करके बहुत झुंझलाया कहा कि, इस फकीरने मेरे ऊपर बहुत कष्ट डाला था। फकीरने कहा आपके सब आदमी यहाँ खड़े हैं, मैंने आपको कुछ भी नहीं किया, मैं अलग खड़ा था इन लोगोंसे पूछ देखिये। लोगोंने भी कहा, हां हुजूर! यह फकीर तो अलगही खड़ा है, इसने कुछ भी नहीं किया। अपने आदमियोंकी यह बात सुनकर बादशाहको बड़ा आश्चर्य हुआ कहने लगा कि, मैंने जबपानीमें शिर डुबोया उस समय देखा कि मैं स्त्री होगया हूँ एक मैदानमें इधर उधर फिर रहा हूँ, कोई आगे है न कोई पीछे। वहाँसे थोड़ेही दूर पर खेतिहर लोग खेतीका काम कर रहे थे, उसी (स्त्रीके) रूपमें मैं उन लोगोंके पास गया। उन लोगोंने मुझे अकेला लावारिस जानकर अपने गाँवमें चलनेको कहा, वहाँ पहुँच कर एक युवकके साथ मेरा विवाह कर दिया, मैं उसके साथ रहने लगा। उसी अवस्थामें बहुतसे लड़के और लड़कियाँ
कबीर साहिब कृत षड्देह वर्णन
उत्पन्न हुई, यहांतक कि, मैं बहुत बूढ़ हो गया उसी बुड़्डी स्त्रीके स्वरूपमें एक दिन तालावमें स्नान करने गया । जलमें शिर डुबाके बाहर निकलतेही अपनेको यहां खड़ा पाया जाना कि मैं शाहनशाह रूम हूँ आप लोगोंको भी जैसेका तैसा खड़ा पाया । आश्चर्य है कि, इतनीही देरमें क्या क्या हो गया—स्त्री होकर बहुतसे बच्चे जने बूढ़ हो नदीमें स्नान करने गया डुबकी मारतेही पूर्वावस्थामें आगया । यह क्या कौतुक है ? जो एक क्षणमात्रमें ऐसा देखा । उस फकीरने कहा कि खुदाकी कुदरत है, वह जो चाहे सो कर सकता है । उस बादशाहको मुहम्मदके आराज पर विश्वास हुआ उसने समझ लिया कि, संसार ऐसाही है ।
गजल — यह हरदो जहाँदर जहाँ शुवदः बाजी ।
नादानसे दर परदः तिहाँ शुब्दः बाजी ॥
है ख़ाब वह दर नज़र अह्व बरासत ।
यह सारी जमीं और जमाँ शुब्दः बाजी ।
है किस्सा जो सब दो जखो फिरदवस ।
यक सच नहीं यहाँ और वहाँ शुब्दः बाजी ॥
इस किस्साके दफ़्तरमें न गुनजायश आजिज ।
कबतक लिखेगा यह ब्यान शुब्दः बाजी ॥
संसारसे भय और घृणा ।
जो लोग ज्ञानी हैं वे संसारको बहुत तुच्छ समझते हैं क्योंकि, यह यथार्थमें कुछ भी नहीं है जलके बुदबुदके समान है । इसलिये जो मोक्षमार्गके खोजी हैं वे लोग इससे घृणा रखते हैं, समस्त विषय और वासनाको त्यागकर अलग हो जाते हैं, उसकी तरफ दृष्टि भी नहीं करते । यह संसार मृतक है मृतकसे जो लिपटता है वह कुत्ता है, इस कारण संसारसे प्रेम करनेवाले मनुष्यत्वसे हीन कुत्तेके समान हैं । मनुष्य कभी मृतकसे प्रीति नहीं करता, सारी विषयवासना आशक्तिको अन्तःकरणसे उठा दिया उसीका नाम वैरागी, सन्यासी और उदासी है । वही तपस्वी साधु है । इसकी आशक्तिको अन्तःकरणसे निकाले बिना कोई भी साधु वैरागी आदि नामोंका अधिकारी नहीं हो सकता । तन, मन, धन, जिसमें सारे संसारकी आशक्ति है वे ही बन्धनके कारण हैं । पहले शरीरकोही विचारना चाहिये, जिसके कारण धनसे प्रीति करते हैं । यह देह झूठी है असत्यसे प्रेम करनेवाला सत्यको छोड़ता है । जिसने सत्यको छोड़ा वह भटककर अन्धकारमें पड़ेगा । जब असत्य (देह) से आशक्ति हुई तो उसके पोषण पालनके लिये नाना प्रकारकी युक्तियाँ करने लगा, झूठ बोलकर बेइमानी करके दूसरोंको
स्थूल शरीर या कञ्चे तत्त्वकी देह लिंग देह या सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर
दुख देकर, चोरी और धूर्तता आदि नाना प्रकारके निषिद्ध पाप कर्मोंसे धनको कमावेगा, या परतन्त्र होकर नाना प्रकारकी झिड़कियोंको सहता हुआ दासपनसे कुछ प्राप्त करेगा । जो शरीरके ही पोषण पालनमें लगा रहेगा वह सत्यको नहीं प्राप्त कर सकता क्योंकि, सारे विकारोंका मूल आशक्ति है । शरीरकी आशक्ति छोड़े बिना अपने स्वरूपकी सुधि नहीं होती । शरीरकी आशक्तिमें पड़ा हुआ सारा संसार कोल्हूके बेलके समान दिनरात चढकर खा रहा है, इसको कभी भी सुख नहीं होता । इस पर कबीर साहिबने एक शब्द कहा है—
शब्द — खसम विन तेलीके बेल भये ।
बैठत नाहीं साधुकी संगति नांधे जनम गये ॥
बहि बाँह मरे पचे निज स्वार्थ यमको दण्ड सहे ।
सुत दारा धन राज काज हित माथे भार गहे ॥
खसमहिं छोड़ि विषय रंग राचे पापके बीज बोये ।
झूठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रीतिको झूठ खोये ॥
लख चौरासी जिया जन्तुमें सायर जात बहे ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो उन स्वानकी पूछ गहे ॥
जीव विषयवासनामें पड़ा हुआ चौरासी लाख योनियोंमें मारा मारा फिरता है, उसको ज्ञान विवेकका अवकाशही नहीं मिलता, सदा भय और आशामें फँसा हुआ सन्देह सागरमें गोते खाया करता है ।
साखी—कबहुँ चित्त संसारमें, कबहुँ लोकको भीति ।
क्षणहूँ सुख पावे नहीं, कहा हार कहैं जीति ॥
यह अपने मनमें तनिक भी नहीं सोचता समझता कि, मातृगर्भमें पोषण करनेवाला कौन था ? किसने वहाँ भोजन पहुँचाया ? किसने रक्षा की ? किसने सुखपूर्वक बाहर निकाला ? जन्म लेनेके प्रथमही माताके स्तनोंमें दूध भर दिया । जब तक मातृगर्भमें उलटा लटकता था तबतक किसने किस युक्तसे पेटमें खानेको पहुँचाया ? गर्भसे बाहर निकालने पर किसने दो सेवक प्राणापन्न सेवा करनेवाले उपस्थित कर दिये । वे प्राण जाय तो जाय पर बालककी रक्षामें किसी प्रकारसे उत्साह नहीं हारते थे जब तक युवावस्थाको न पहुँचे तब तक अपना जान माल सब उसके ऊपर निछावर करते रहे जिस विश्वम्भर सर्व रक्षक माताके गर्भमें पोषण और रक्षा की, सुखपूर्वक जन्म दिया वो सर्वदा रक्षा किया करता है । ऐसे दयालु सर्व रक्षक सर्व शक्तिवान पिताको भूल कर असत्य संसारसे प्रेम करना मनुष्यत्व नहीं है इस संसारमें कोई किसीका नहीं होता, सब अपने २ स्वार्थके चाहनेवाले हैं ।
महाकारण, ज्ञान देह
माता पिता पुत्रकी रक्षा सेवा स्वार्थ जानकर करते हैं, पुरुष स्त्रीको अपने सुखके लिये चाहता है, स्त्री पुरुषको स्वार्थवश हो प्यार करती है, सांसारिक प्रेम कोई न कोई स्वार्थसेही हुआ करता है । निःस्वार्थ हर समय रक्षा करता है वही सत्य परमात्मा अपना है, नहीं तो कोई किसीका नहीं है । माता पिताके अन्तःकरणमें बालककी सेवा करनेका अङ्कुर डालनेवाला भी वही है । यदि उसकी कृपा न हो तो माता पिता अथवा कोई भी प्रेम न करे । सारे जीवधारी अपने बच्चोंको प्रेम और प्रीतिके साथ पालते हैं । किसी प्रकारकी आशा नहीं रखते । ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि, जबतक बच्चा स्वयं अपना व्यवहार चलाने योग्य नहीं होता तबतक (मनुष्यके अतिरिक्त सब जीवधारी उसका पोषण और पालन करते हैं, पीछे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, पर मनुष्य अपने बच्चोंकी सेवा और पोषण पालन करके उससे बदलेकी इच्छा रखते हैं । जिसने उनके (माता पिता) अन्तःकरणमें बालकका प्रेम और प्रीति वही बदला भी दिला सकता है, परमात्माको धन्य है जो सर्व कुछ करनेपर भी किसीसे कुछ नहीं चाहता । पशु अपने बच्चोंसे इतनी प्रीति करते हैं कि, मनुष्य उनकी समता नहीं कर सकते, जैसा कि, इसी पुस्तकके देखनेसे प्रगट होगा कि, पशु अपने बच्चोंसे कितनी मुहब्बत करते हैं पर वे कुछ भी बदला नहीं चाहते । उससे उल्टा मनुष्य नाना प्रकारकी आशाओंसे घिरा हुआ अपनी सन्तानसे बहुत कुछ चाहता है । प्रत्येक जीवधारी कामके वशमें होकर स्त्रीसे सम्भोग करता है, जिससे सन्तानकी उत्पत्ति होती है । जिस प्रकार अपना सुख विचार कर सम्भोग करता है उसी प्रकार प्रेमके वश होकर उसकी रक्षा और पोषण पालन करता है, यह ईश्वरी नियम है । माता इस कारण भोजन नहीं करती कि, वह बच्चेको पहुँचे, वरन् वह भूखको मिटानेके लिये भोजन करती है पर विश्वम्भर स्वयं बच्चेको गर्भमें भी भोजन पहुँचाता है, जिसको विश्वम्भर पर विश्वास है वह संसारकी आशाओंसे मुक्त होता है । जो सर्व रक्षक परमात्माको सत्य जानता है, वह सांसारिक प्रेम और प्रीतिसे निर्मूल होजाता है । सांसारिक स्नेहको मूर्खता । अज्ञानता समझकर त्याग देता है ।
गजल
मुहब्बत देह और दिलबर नहीं होता नहीं होता ।
कि, दो मिहमानका एक घर नहीं होता नहीं होता ॥
चढ़े मन्सूर और ईसा हजारों दारके ऊपर ।
कि रौशन रोजमें शब्रे पर नहीं होता नहीं होता ॥
षष्ठ विज्ञान देह
नहीं मैं तुही तू है जब हूँ मैं तब तू नहीं हरगिज ।
भजन विन वह सुजन दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
सनमके खालो ख़तको देख जिसने हज उठाया है ।
कि, इस दिल पर हजे दीगर नहीं होता नहीं होता ॥
नहीं रूईदगी बाकी रहे कोई तुख्म बिरियामें ।
कभी बरपा कोई अशजर नहीं होता नहीं होता ॥
जमुरंद नीलमो मिर्जा और लाले बढुखाशॉनी ।
गोहर गंजों मेहर दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
जो होवे खाने खंजीर और फिर तैर तारीकी ।
कि, वह मंजिल परी पैकर नहीं होता नहीं होता ॥
यह जान बाजी न हो हरगिज वज्रज कोई मर्द गाजीके ।
कि, बुजहिल फौजका सरवर नहीं होता नहीं होता ॥
न करत खीर तन मन धन तसद्दुक करनेमें आजिज ।
कि, आशिक धडके ऊपर सर नहीं होता नहीं होता ॥
मनकी इच्छाओंको पूरा करनेसे यह मोटा और प्रबल हो जाता है ।
जब यह प्रबल हो गया तो फिर वशमें लाना बहुत कठिन हो जाता है । इसी
कारण साधु लोग मनकी इच्छाओंको पूरी नहीं होने देते, वरन् इसके उलट
करके मृतक तुल्य बान लेते हैं । जब यह इच्छा पूर्वक पदार्थोंको नहीं पाता तो
शनैः शनैः आपही मुर्वके समान हो जाता है । जो बुद्धिमान् हैं वह शरीरसे
आसक्ति करके इसीमें नहीं लगे रहते वरन् जैसे होता है संसारकी मुख्य वास-
नाओंको ठिकाने लगाते हैं अर्थात् संसार मुख्यवृत्तिका निरोध करके सत्पुरुषमें
जोड़ते हैं । इसी विषय वासनाकी इच्छाने सारे संसारको खा लिया है ।
शब्द — नर तेरी कबकी बैरिन जवानी ।
विषया लीन भयो मतवारो निर्गुन भक्ति न जानी ।
बीस बरसकी घरमें सुन्दरी रहे अलमस्त दिबानी ॥
निसिवासर वाहीसे लुबधे ज्यों माँखी मिष्ठानी ॥
उड़ते बार उड़ा नहिं जाई नारी नरककी खानी ॥
कहें कबीर सुनो भाई साधो यही विधि बहुत दिवानी ॥
शब्द — सन्तो बाधिनका खायो लोई ।
तीन लोकमें पड़ गई बाधिन खात न जाने कोई ॥
काजल नैन दशन चमकावे कसकस बाँधे गाढ़ी ।
हिन्दुओंकी तरह मुसलमान भी अम्रमें
लुकि २ अन्तरगत पैठी खाय करेजा काढी ॥
कान गहू काजी नाक गहू मुल्ला औलिया भेष है प्यारी ।
राज कुमार रङ्गपति सुन्दर मोहि लिये नरनारी ॥
जेहि स्वाद षट्दर्शन मोहे पण्डित कियो खिहोड़ी ।
सुखदेव स्वामी कन फट्टा गुरु उनहूँकी नाड़ि मरोडी ॥
शिव सनकादिक औ ब्रह्मादिक बाधिन मुख सब आये ।
गिरि गोवर्द्धन नखपर लीन्ह्यो तेहि बाधिन धर खायै ॥
उत्तपति परलय दोउबिच बाधिन सतगुरु भली विचारे ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हरिजन बाधिन मारे ॥
बाधिनने सबको खा लिया, जिसको सतगुरुका पता मिला कायाके मार्ग-
मेंही उनको प्रकाश मिला है ।
नजम — जो तन मनो धनके हंकारसे । न टूटा न जूटा निरंकारसे ॥
सो तनोमन धनसे गिरफ्तार है । न कोई राह्रास्त रफ्तार है ॥
सो यह तन सरासर त अफुन भर । फिक गौरसे उसको देखो जरा ॥
कोधानो सोई सातसो पूर हैं । यह नापाक है गन्दगी धूर है ॥
मिलेगी सो जा खाक्रमें अन्तको । तजो नेह देही भजो कंतको ॥
गलत इसको जाने है जाहिद वही । सो पावे खुदापाक वाहिद वही ॥
बलैयात आफादका घर यही । महल आमदो रफदका दर यही ॥
निगह कीजसे कृष्ण और रामको । करो गौर आगाज न अनजाम को ॥
यह दुनियाँका दुख भोगकर चले । कैरो जादव और पांडो अमर कले ॥
धरे तन कहाँ कोन जगमें सुखी । गूही और तपी सिद्ध योगी दुखी ॥
जमीन आसमानके जो बाशिदगान । गिरफ्तार गम है सब बे गुमान ॥
धरे तन लगी सङ्ग तेरी बला । कनक कामिनी रङ्गमें जारुला ॥
परख दोनों तलवारकी धार है । मिले इनसे उनका गला पार है ॥
यह जड़ देह तो आत्माराम है । तू चैतन गुनों सारेका धाम है ॥
किया जड़की संगततू चैतन्य हो । निराकार निराधार तू धन्य है ॥
त्रिगुण पाँच पञ्चीसके कोटमें । पुराने डुराने इसी ओटमें ॥
सो तदबीर कर कर्म फन्दा कटे । कि जड़ संग देहीका गन्दा कटे ॥
तू मनके मते जो करे कामको । पड़े नर्कमें ना लखे रामको ॥
यही मन निरञ्जन निराकार है । यही खींच नफ़सानीमें डार है ॥
यही लोक तीनोंका भूपाल है । यही जगत कारन महाकाल है ॥