कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इति कबीर मन्शूर विषयानुक्रमणिका समाप्त ।
कबीर मन्शूर
<!-- image: ★ -->प्रारंभिक उपोद्घात
इस ग्रन्थका नाम "कबीर मन्शूर" उर्दूमें लिखा है, इसी नामसे हिन्दीमें भी प्रसिद्ध हो गया है।
मन्शूर शब्द अर्बी भाषाका है। "नशर" का बहुवचन है ॥ "नशर" शब्दका अर्थ है ज्योति, रोशनी, प्रकाश इत्यादि तो मन्शूरका अर्थ हुआ।
"ज्योतियाँ, रोशनियाँ, प्रकाशों" इत्यादि इस हिसाबसे कबीरमन्शूरका अर्थ हुआ, कबीरकी ज्योतियाँ, कबीरके प्रकाश इत्यादि, यदि इसका हिन्दी अनुवाद किया जाय तो "कबीरज्योति" अथवा "कबीर प्रकाश" नाम रखना चाहिये, किन्तु विशेष नामका अर्थ नहीं किया जाता है, जिस नामसे जो प्रसिद्ध होता है, उसी नामसे पुकारा जाता है। इसीलिये इस हिन्दी अनुवादमें भी इसका नाम कबीरमन्शूरही रखा है। दूसरी बात है कि, पहिली आवृत्तिमें यह इसी नामसे छप चुका है और यह नाम लोगोंमें इतना प्रसिद्ध हो गया है कि, अब इसका दूसरा नाम रखा जाना ठीक नहीं है।
स्वामी श्रीपरमानन्दजी साहबको ऐसे नामसे बड़ा प्रेम था आपने सबसे पहले ग्रंथ बनाया है उसका नाम "कबीरभानुप्रकाश" रक्खा है। कबीर मन्शूर भी उसी भावको लिये हुए है। अन्तमें आपने कबीरकौमुदी लिखी है। कौमुदीका अर्थ भी चांदनीका ही है। भेद इतनाही है, उपर्युक्त दोनों ग्रंथ सूर्यके समान उग्रतेजको लिये हुए हैं और कौमुदी चन्द्रमाकी चन्द्रिकाके समान शीतलयुक्त प्रकाशका स्रोतक है।
ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति
स्वामी परमानंदजी साहबने कबीर मन्शूर ग्रन्थ लिखकर सबसे पहले सम्बत् १९३७ के आश्विन (कुवार) मास मुताबिक सन ईस्वी १८८० महीना सितम्बरमें पूर्ण किया था और मार्च १८८१ ई. में वह ग्रंथ छपकर तय्यार हो गया, उस आवृत्तिके सब ग्रंथ आपने अधिकारियोंको बिना मूल्य दे दिया था। आपने ग्रंथ बनाया छपवाया और बाँट भी दिया। किन्तु, आपके अंदर भरे हुए कबीरपंथके खजाने इतने अधिक हो गये कि, यदि उसमेंसे खर्च न किया-जाय तो, सोमके धनके समान होजावे और दूसरे पंजाबके सिकखोंने कुछ आक्षेप भी किये तब आपने दूसरा ग्रंथ सं. १९४२ बिक्रमीमें “तालीम कबीरकलियुग” लिखा, जो दूसरी बार कबीरमन्शूर की संशोधित और वर्द्धित आवृत्ति कही जा सकती है। इतने पर भी आपको संतोष नहीं हुआ, तब आपने फिरसे तीसरी बार उसे हाथमें लिया और उसे बढ़ाकर बड़े कबीरमन्शूरके रूपमें तय्यार किया जो सम्बत् १९४४ वैशाखमुदी (२५-४-२७) में छपकर तय्यार हो गया। जो कबीरमन्शूर पहली आवृत्तिमें ३५० पृष्ठोंमें छपकर पूरा हो गया था इस बार १५०० सौ से भी अधिक पृष्ठोंमें समाप्त हुआ। इतनेहीसे समाप्ति नहीं हुई, आपने रसाले तनासुख, कबीरगुणसागर आदि अनेक छोटे भोटे ग्रन्थ बनाये और कितने शब्द और पदोंको संग्रह कर उनपर व्याख्या लिखे। अन्तमें आपने “कबीरकौमुदी” नामका कबीरमन्शूरके समानही बृहत्ग्रन्थ लिखा है जो आपके लिये और ग्रंथोंके समानही अमुद्रित पडा है।
स्वामी परमानन्दजीकी रचना
स्वामी परमानंदजी साहबने कबीरभानुप्रकाश, कबीरमन्शूर, तालीम कबीरकलियुग, रसाले तनासुख, कबीरगुणसागर, कबीरकौमुदी आदि कई ग्रंथ और बहुतसे शब्द और पदोंपर व्याख्या लिखे हैं, जिनमें से बहुतोंका संग्रह मेरे कबीरदर्शन पुस्तकालयमें रक्खा हुआ है।
कबीर भानुप्रकाश की रचनाका समय
कबीर भानु प्रकाशके अन्तमें लिखा है :—
चौपाई
सतगुरुकी दायामय पूरी । लिख्यो ग्रन्थ जो भूतल भूरी ॥
रच्यो जो निजहिय हुआ हुलासा । ग्रन्थ कबीर भानु परगासा ॥
पण्डित जन सो विनय हमारी । भूल चूक जो कतहुँ निहारी ॥
टूटे अक्षर जहँ लिख पाई । सो सुधारिके पढ़ँ बनाई ॥
सम्बत उन्नीस सौ पैंतीसा । शुक्ला यकादशी तिथि दीसा ॥
मंगल अरु ज्येष्ठ महीना । तादिन ग्रन्थ समापति कीना ॥
मही पंजाब देशके माँही । शहर फिरोजपुर इक आही ॥
नगर मुक्तसर तहँ यक अहई । दोदा ग्राम निकट तेहि कहई ॥
ताहि ग्राममें जब आसीना । भजन ध्यान प्रभुके लौलीना ॥
ग्रन्थ रचन गुरु आज्ञा पाई । लिख रच धर्म कथा समुदाई ॥
जेते अक्षर लिखे बनाई । जो कोइ घटि बढि ताहिमिलाई ॥
सो गुरु सन्मुख लेखा भरि है । भिन्न भेद जो कोऊ करिहै ॥
इति
कबीर मन्शूर (छोटा)
इसी प्रकार सम्बत् १९३७ के आश्विन मु० सेप्टेम्बर १९८० ई. को पहला कबीरमन्शूर जिसको छोटा कबीरमन्शूरके नामसे कहा जाता है। स्वामी परमानन्दजीने समाप्त किया था। आप स्वतः लिखते हैं कि, इस किताबको आठ भाग बीस अध्यायोंमें विभाजित करके कबीरमन्शूर नाम रखा।
पहले भागके ४ अध्याय हैं। १ पहले अध्यायमें स्वसम्बेदके अनुसार जगतकी उत्पत्तिका वर्णन है। २ दूसरे अध्याय में—कालपुरुषके पंथोंका वर्णन है।
३ तीसरे अध्यायमें—कबीर साहबके पृथ्वीपर आकर अपना पंथ प्रचलित करनेका वर्णन है। ४ चौथे अध्यायमें—कबीरसाहबकी परीक्षा और अन्तर्धान होनेका वर्णन है।
दूसरे भागके सात अध्याय हैं। १ पहले अध्यायमें—कबीरसाहबके नामोंका वर्णन है। २ दूसरे अध्यायमें—कबीरसाहबके अद्वितीय होनेका वर्णन है। ३ तीसरे अध्यायमें—कबीरसाहबके पंथके शुद्ध निर्दोष होनेका वर्णन है। ४ चौथे अध्यायमें—कबीरसाहबके लोक और हंसोंका वर्णन है। ५ पांचवें अध्यायमें—कबीरसाहबकी सिद्धिशक्तिका वर्णन है। ६ छठे अध्यायमें—कबीरसाहबकी धार्मिक शिक्षाका वर्णन है। ७ सातवें अध्यायमें—कबीरसाहबके पंथके नियमोंका वर्णन है।
तीसरे भागमें केवल एकही अध्याय है। जिसमें विषयवासना और मनके कृत्योंका वर्णन है।
चौथे भागमें भी एकही अध्याय है—जिसमें जीवोंके चौरासी लाख योनियें भ्रमण करने अर्थात् आवागमनका वर्णन है।
पाँचवें भागमें एकही अध्याय है जिसमें प्रत्येक मजहबों (पंथों) पर व्याख्यान (लेकचर) है।
छठे भागमें चार अध्याय हैं। १ पहले अध्यायमें—जगतके मिथ्या होनेका वर्णन है। २ दूसरे अध्यायमें—संसारसे घृणा और वैराग्यका वर्णन है। ३ तीसरे अध्यायमें—बुद्धि विचार, विवेक, एकैईश्वरवाद तथा मालिक पर भरोसा (विश्वास) का वर्णन है। ४ चौथे अध्यायमें—मनन और निदिध्यासन का वर्णन है।
सातवें भागमें एकही अध्याय है जिसमें शिष्य और गुरुके प्रश्नोत्तर हैं। इसमें शिष्यमुखके १२५ प्रश्न और गुरुमुखसे उनका उत्तर वर्णित है।
आठवें भाग में भी एक ही अध्याय है जिसमें हानिकारक निषेध वस्तुओं का वर्णन, उनसे हानि उनके त्याग से लाभ आदि का वर्णन करके, मानवधर्मके नियम (पटल) को लिखा है अन्तमें कबीरमन्शूरका उपसंहार, ग्रन्थसमाप्ति की प्रार्थना और समाप्ति की तिथि सन सम्बत् आदि का वर्णन है—यह ग्रन्थ मार्च १८८१ ई. में छपा गया था—कोहिनूर प्रेस लाहौर में छपा था।
तालीम कबीर कलियुग
स्वामी परमानन्दजी साहब अपने तीसरे ग्रन्थ "तालीमकबीरकलियुग" की भूमिकामें इस प्रकार लिखते हैं—
इस किताब "तालीम कबीरकलियुग" लिखनेकी यह वजह है कि, इस किताबके पहले इस फकीरने दो किताबें लिखी, १ एक का नाम कबीरभानु-प्रकाश, २ दूसरेका नाम कबीरमन्शूर। इन दोनों किताबोंमें फकीरने नानक शाह साहबको कबीर साहबका चेला लिखा, इस बातपर वे लोग जो इन दिनोंमें आपको नानक साहबके पैरू (अनुयायी) समझते हैं, नाराज हुए, बावजूदकि (यद्यपि) फकीरने उनको समझाया कि, मैं अपनी तरफसे यह बात नहीं समझता बल्कि जो कुछ कबीरसाहब और नानक साहबके तहरीर (लिखे हुए) व
तकरीर (कहे हुए) हैं, उसके मुताबिक (अनुसार) मैं लिखा और कहता हूँ। बावजूद कहने और समझानेके उन लोगोंका नोकैजू (शत्रुता) दूर न हुआ और सन १८८५ में फिरोजपुरके चन्द सिकखोंने मेरे साथ कुछ फसाद करना चाहा तब मैंने उन लोगोंसे कहा कि, मैं तो नानक साहब और कबीर साहबको एक रूपही जानता हूँ, अगर आप नहीं राजी हों तो आइन्देको मैं न लिखूंगा। बावजूदे कि, उन लोगोंका मेरे साथ मुपाहसा और मजादला (झगडा और लड़ाई) इस बातपर न था कि, मैंने नानक साहबको कबीरसाहबका चेला क्यों लिखा, बल्कि और बातपर तकरार था, लेकिन अन्दरूनी (भीतरी) बोगभ (ईर्षा-की) इस बातका भी था। इस वास्ते फकीरने कबीर साहबके पांच हजार बरसकी तारीख लिखा और बनाम “तालीमकबीर कलियुग” मशहूर किया; ताकि हर खास व आमको इसकी असली हकीकत (यथार्थता) से आगाही हो। कबीर साहबके तीन युगोंका अहवाल मैंने साफ छोड़ दिया, फकत इब्तदाय (आरम्भ) कलियुगसे लिखा।
उपेयुक्त ग्रन्थकी समाप्तिपर आप लिखते हैं “खतम (समाप्त) हुई किताब “तालीमकबीरकलियुग” सतगुरुकी मेहरबानीसे। बमुकाम शहर फिरोजपुर ता० २२ अक्टोम्बर सन् १८८५ ई० बमुताबिक सम्बत १९४२ विक्रमी आश्विन सुदी १३ बरोज चहारशम्बा (बुध)। इसके पश्चात्-
बडे कबीरमन्शूर
की बारी आती है—आप उसकी दीबाइचा (प्रस्तावना) में इस प्रकार लिखते हैं—
दूसरी बार कबीरमन्शूरकी तरमीम (सुधार) व तरतीब (योजना) के सबब (कारण) का ब्यान।
यह किताब कबीरमन्शूर पहले एक बार मतबा (छापखाना) कोहनूर लाहौरमें छप चुकी है। और इस किताबके पढ़नेके शायक (अनुरागी) बहुत लोग थे, लेकिन मुसन्निक (ग्रंथकर्ता) किताबने, इस किताबका रिवाज आम (सर्वसाधारणमें) देना मुनासिब न समझा। और अपने खास (विशेष) लोग जहबहम्म (अपने पंथके) को मुफ्त दिया। बजह (कारण) इसकी यह थी कि, बाज बाज लोग स्वसम्बदस वाकफियत (जानकारी) रखते हैं, अक्सर (प्रायः) लोग बेखबर (अज्ञात) हैं और जो लोग वाकफ (जानकार) हैं,