सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ४ )

बोधसागर

भटनागर कुल श्रेष्ठ कहाये । निगम नाम बारह बतलाये ॥
द्वादश चित्रगुप्तके जाये । कायथ लेखक गणक कहाये ॥
चित्रगुप्त धर्मरायके द्वारे । पुण्यपापको लेख उचारे ॥
तिमि ताके सुत पृथ्वी माही । राजद्वार पर लेखक राही ॥

इति

अथ चार आश्रमको वर्णन

दोहा-ब्रह्मचर्य गिरहस्थ पुनि, बानप्रस्थ संन्यास ।
भिन्न भिन्न इनके धर्म, मरम वेद परकाश ॥

इति

अथ चार वेदोंकी उत्पत्ति कथा वर्णन चौपाई

चौमुह वाक्य ब्रह्ममुख भैऊ । चारों वेद ताहिंते कियऊ ॥
असी सहस्र कमर्कांड प्रमाना । सोलह सहस्र उपाछा जाना ॥
चार हजार कहावै ज्ञाना । यह त्रिकोंडमत वेद बखाना ॥
चारों मम वाक्यको टीका । लक्ष श्लोक व्यास कृत टीका ॥
जेते शास्त्र पुराण कहाये । चारों वेद कि आस गहाये ॥
चारों वेद मूल सब केरा । महाबाक अब करो निबेरा ॥
प्रथमै जो ऋगवेद कहायो । पूरब मुख ब्रह्मा प्रकटायो ॥
ब्रह्मकी बानी भइ येही । प्रज्ञाना ब्रह्म कहि देही ॥
महाज्ञान कहिये प्रज्ञाना । ब्रह्म अर्थ परमेश्वर जाना ॥
यहि महा वाक्य रचे ऋगवेदा । क्रम उपाछा ज्ञान त्रिभेदा ॥
पूरब दिश ऋगकी अधिकाई । द्वितिये यजुर्वेद कहि भाई ॥
दक्षिण मुख ब्रह्मा निज खोले । अहं ब्रह्मा अस्मी सों बोले ॥
अहं अर्थ में ब्रह्म है ईश्वर । हौं अस्मी कह मैं हों ईश्वर ॥
यहि महाँ बाकते यजुर बनाये । दक्षिण देश अधिक फैलाये ॥
सामवेद तृतिये विख्याता । मुख पश्चिम ब्रह्माकी बाता ॥

आगनिगमबोध

( ५ )

महावाक्य ब्रह्माकी येही । तत्त्वमसी ताते कहि देही ॥
तत्त्व ईश्वर त्वं जीव कहाये । हौं पुनि स्मीको अर्थ बताये ॥
पश्चिम दिशतेहिअधिकपसारा । तीनों विधि ताको व्यवहारा ॥
चौथे वेद अथर्वण भाषी । उत्तर सुख ब्रह्माकी साषी ॥
तीनों वेदसे ताहि निकारा । तामें महावाक्य यह धारा ॥
अहं आत्मा ब्रह्म पुकारो । ताका ऐसो अर्थ विचारो ॥
अहं है मैं आत्मम है आपा । ब्रह्म नाम परमेश्वर थापा ॥
मेही हौं परमेश्वर आत्मम । उत्तरमें यहि वेद महात्मम ॥
चार युक्ति चहुँ वेदन माहीं । प्रथमें विधि जिहिकर्मकराही ॥
द्वितीये अर्थ बाद बतलाये । अस्तुति और कर्मफल गाये ॥
तृतिये मंत्र जो देव अराधू । चौथे नाम कथा शुचि साधू ॥
षट प्रकारकी विधि चहुँ वेदा । प्रथमें जग उत्पति निवेदा ॥
द्वितीये प्रलयको व्यौरा ठाना । तृतिये सुरसुनि चरितबखाना ॥
चौथे मन्वन्तर कथ दशचारो । पंचम सुरसुरपति व्यौहारो ॥
छठये धर्मशास्त्र विधिभाषा । तामें कथा भांति बहु राखा ॥
विद्या सकल जगत व्यौहारा । ज्ञान विधान अनेक प्रकारा ॥
ब्रह्मवाद भाषे विधि नाना । जाके पढे लाभ हो ज्ञाना ॥
चार वेद बुधि विद्या मूला । रचे शास्त्र षटतिहिअनुकूला ॥

इति

अथ षट् शास्त्रनको वर्णन चौपाई

अब षट्शास्त्रको वर्णन सुनिये । प्रथम न्याय ऋगवेदतेगुनिये ॥
गौतम न्याय कर्ताको करता । अस विचार ताके उर बरता ॥
सर्वे मई परमेश्वर जाना । एकते बहुरि अनेक बखाना ॥
उत्पति प्रलय कथा बखाने । नित्यानित्य बाद बहु ठाने ॥
द्वितियमीमांसाशास्त्रजोकहिया । यजुर्वेदते ताको गहिया ॥

( ६ )

बोधसागर

जैमिनि मीमांसक रचताही । शिष्य प्रसिद्ध भये बहु बाही ॥
परमेश्वरहि अकर्ता जाना । जक्त अनादि अनंत बखाना ॥
ज्ञान मुक्ति सब कर्मके द्वारा । कर्मके बशी भूत संसारा ॥
मुक्ति होय जिव ज्ञानके मर्मी । ब्रह्मा होय करन भल कर्मी ॥
तृतीय शास्त्र वेदांत बताये । सामवेदेते व्यास बनाये ॥
एक ब्रह्म द्वितीया कछु नाहीं । स्वप्न समान जक्त दरशाहीं ॥
ब्रह्ममें जबही माया डोले । ताको तब ईश्वर कहि बोले ॥
ईश्वर तीन भाग पुनि भयऊ । रज सम तमगुननामसोकहेऊ ॥
जेते जक्त माँह व्यौहारा । यही तीन सबके करतारा ॥
कर्म रहितसो ब्रह्म बखाना । कर्म स्वरूप तीन ये जाना ॥
मायायुक्त भये जब तीनों । तिहि कारण ईश्वर कहि दीनों ॥
ब्रह्म अविद्या युक्त जो होई । ताको जीव कहे सब कोई ॥
त्रिगुणब्रह्म अरु जग जिवसारे । सबही एक स्वरूप विचारे ॥
भिन्न अविद्या करिके माना । द्वै शक्ती तिहि माँह बखाना ॥
यक विशेष शक्ति कहलाये । द्वितीये अबरनशक्ति बताये ॥
शक्ति विशेषते जग उपजाये । अबरन शक्ती ज्ञान दुराये ॥
ज्ञानके उदय मुक्तिपद धरही । वेदांती यह निर्णय करही ॥
चौथे सांख्यशास्त्र मत गाढा । ताहि अथर्वण वेदते काढा ॥
रचे ताहिको कपिल मुनीशा । सोउ अकर्ता कथ जगदीशा ॥
सबही रचना प्रकृति कराये । जक्त अनादि सदा यहिभाये ॥
काहू बस्तूको नाश न होई । करता में करतूत समोई ॥
द्वैविधि भाषे पुरुष महातम । जीव आतमा अरु परमातम ॥
पुरुष प्रकृतको जब हो मेला । होय सकल रचनाको खेला ॥
पुरुष पंगुला परकृत अन्धी । दोहु बिनन्हि जगरचना बंधी ॥
प्रलय कालतिहु गुन समताई । रचनामें सतगुरु अधिकार्ई ॥

आगमनिगमबोध

( ७ )

पुरुषते महातत्त्व प्रकटार्ह । पुनि हंकार इन्द्रीतत्त्व गार्ह ॥
प्रलयको घौस बहुरि जब आवै । इन्द्री तत्त्व सब तहाँ समावै ॥
जिहि क्रमसे जो दियौ देखाई । तिहि क्रम २ सब जाहि लुपाई ॥
पंचम शास्त्र पतंजल कहेऊ । वेद अथर्वणसे सो गहेऊ ॥
ऋषि पातंजलि ताहि बनाई । वर्णन सारुयशास्त्र सम तार्ह ॥
योग युक्ति तिहि माँह बखाना । ज्ञान द्वारते युक्ति प्रमाना ॥
छठे शास्त्र वैशेषिक भाये । मुनि कणाद कर्ता कहलाये ॥
वेद अथर्वणते गहि लीना । यह षट्शास्त्रको वर्णन कीना ॥

इति श्री षट्शास्त्र

अथ चार उपवेद वर्णन

दोहा-आयुर्वेद धनुर्वेद पुनि, गन्धर्ववेद बखान ।

अथर्वेद ये चार हैं, तिनकी निर्णय ठान ॥

चौपाई

प्रथमे आयुर्वेद करतारा । ब्रह्मा प्रजापति अश्वनीकुमारा ॥
धन्वन्तरि आदिक रच ताही । कामशास्त्र वेदादिक जाही ॥
द्वितिये धनुर्वेदके करता । विश्वामित्र नाम सो धरता ॥
ब्रह्मा परजापति से जोई । विश्वामित्र सिखे गुन सोई ॥
सकल युक्ति शिष कीन प्रचारा । परजा पालन कै व्यौहारा ॥
शास्त्र प्रहारकि युक्ति है तामें । युद्धकरनकी बिधि वह वामें ॥
आयुध दोय प्रकारके मुक्ता । एक है मुक्त अरु द्वितिय अमुक्ता ॥
तृतिये मुक्तामुक्त कहाऊ । यंत्र मुक्त चौथेको नाऊ ॥
हाथसे जो चक्रादि चलाये । ताको नाम मुक्त बतलाये ॥
तरवार आदि अमुक्त बखाना । बरछी मुक्तामुक्त प्रमाना ॥
बहुरि तीर आदिक अरु गोली । यंत्र मुक्त तिनको कहि बोली ॥
मुक्त आयुधको अस्त्र कहीजै । अरु अमुक्तको शास्त्र भनीजै ॥

( ८ )

बोधसागर

सने चार प्रकार नाम धर । घोढचढरथचढगजचढपद्मचर॥
असगुन सगुन बहुत विधिभाषा । क्षत्री धर्म सकल तह राखा ॥
तृतिये गन्धर्व वेद बताये । ताहि भरथजीने प्रगटाये ॥
नाद नृत्य सुर ताल अनन्ता । विविधि भांतिसे ताहि बंदता ॥
युक्ति अनेकन देव अराधू । निरविकल्प पुनि कथे समाधू॥
चौथे अर्थवेद विधि कहिये । नाना युक्ते ताहिमें लहिये ॥
नीति शास्त्र अरु अश्चारुढा । शिल्प सूष आदिक मतिगुढा॥
धन उपाय बहु विधि तहलहिये । अर्थ वेद यहि कारण गहिये ॥
द्रव्य उपाजन रीति बनाई । अर्थ वेद पुनि अस अर्थाई ॥
कसेहु निपुण होय नर जोऊ । भाग बिना धन लहै न कोऊ ॥
ताते अन्त कथे बैरागा । सब चातुरी वृथा इमिलागा ॥
चहुँ उपवेदको यह सिद्धांता । सब तजि हो विरक्त बुधवन्ता ॥
वेद उपवेद कि विधिमें पागा । अन्त मुख्य वैराग अरुत्यागा॥

इति

अथ चार उपवेद षट् अंगवर्णन--चौपाई

शिक्षा कल्प व्याकरण वरनो । पुनि निरुक्तियोतिषचितधरनौ॥
पिंगल सहित कहैं षट् अङ्गा । विविधि भांति भाषे परसंगा॥
प्रथमें शिक्षा शास्त्रमें कहेऊ । नाना भांति कि युक्ती गहेऊ ॥
वेदके शब्द न माह बखाना । अक्षरनके अस्थानको ज्ञाना ॥
पाणिनीय है ताके करता । युक्ति चातुरी बहु तहँ धरता ॥
द्वितीये कल्पके सूत्रन माहीं । वेद कि विधिसो कहै तहाहीं ॥
कर्मके अनुष्ठान विधि गायन । पाणिनि पातंजलि कात्यायन ॥
तृतिये कथे व्याकरण जोई । वेदको शब्दबोध तिहि होई ॥
पाणिनीय आदिक बहु तेरे । कर्ता सोई व्याकरण केरे ॥
चौथे निरुक्त शास्त्रके माहीं । ऐसी निर्णय कीनो ताहीं ॥

आगमनिगमबोध

( ९ )

अपर सिद्धपद वेद जो होई। तासु अर्थ बोधक है सोई ॥
यास्क मुनीश्वर कथे बखानी। नाम निरूपन निर्णय ठानी ॥
आदित्य आदिक अरु बहुतेरे। रचित निरुक्त शास्त्र तिन केरे ॥
पंचम पिंगल कीन बखाना। पिंगलमुनिरचि छंद विधाना ॥
छटये ज्योतिष कालको ज्ञाना। आदित्यादिक गर्ग बखाना ॥

इति चार उपवेद

अथ अठारह पुराणोंके नाम-चौपाई

ब्रह्म बहुरि वयवर्त बखानो। बावन अरु ब्रह्मांड प्रमानो ॥
मार्कण्डेय भविष्य कहावै। नारद विष्णु पुराण बतावै ॥
गरुड बराह अरु पद्म गनीजै। भागवत मीन वो कूर्म कहीजै ॥
लिंगो वायु पुराण बताया। फिर अस्कंधो अग्नि कहाया ॥

इति

अथ शास्त्रके अठारह प्रस्थान वर्णन-चौपाई

शास्त्रके हैं प्रस्थान अठारा। या विधि तिनको नाम उचारा ॥
चार वेद उपवेद हैं चारी। वेदनके षट् अंग विचारी ॥
धर्मशास्त्र मीमांसा न्याई। चौथे पुनि पुराण बतलाई ॥
उप पुराण पौराण अनेका। अठारहेंकी नियम न एका ॥
स्मृती महाभारत रामायण। मंत्रशास्त्र नाना विधि गायन ॥
वाम तंत्र देवीके राखा। नारद पंचरात्र पुनि भाषा ॥
देव अराधन विधि बहु भनते। जक्त कार्य ताते भल गनते ॥

इति

अथ चारवेद को बाद वर्णन-चौपाई

प्रथम कहै ऋगवेद बखानी। निराकार परमेश्वर मानी ॥
निरलेपो सो अलख अगोचर। निरालंब सो जान ब्रह्मवर ॥
द्वितीय अथर्वण भाषत होई। निरालम्ब निलैप न कोई ॥

( १० )

बोधसागर

नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण कहेऊ । जो कोइ मरा मुक्त सो भैऊ ॥
जैसे पत्र वृक्ष ते टूटा । फेर न सो तरुवरमें जूटा ॥
ऐसो जीव मरा यकवारा । बहुरि नहीं ताते तन धारा ॥
तृतीय यजुर अस कहे बहोरी । इन दोनोंकी मतिभई भोरी ॥
सर्गुण ब्रह्म नरायण होई । क्षीर समुद्र शयन कर सोई ॥
दश अवतार सोई धरिलीनो । गोपीनके संग कीडा कीनो ॥
चौथेसाम कह पुनि मत अपना । यह सब जानो झूठ कल्पना ॥
नहीं सर्गुण नहीं निरगुण देवा । नहीं दृष्टि गोचरको भेवा ॥
सम्पूर्ण है ब्रह्म अखण्डा । तत्वमसी अद्वैतसे मण्डा ॥

इति

अथ षट्शास्त्रकी बादर्षणन—चौपाई

प्रथम मीमांसा शास्त्र आचारी । कर्म थापि निजु ज्ञान उचारी ॥
जो कछु लाभ जक्तसे कीना । सो सब जान कर्म आधीना ॥
कर्महि अधिष्ठान जिवकेरा । कर्मते करे जक्त में फेरा ॥
कर्म प्रवृत्त कर्म लय पावै । कर्महि दुखसुख जीव भुगावै ॥
भूत भग्य व्रत मानिक जोई । कर्म अधीन जान सब सोई ॥
अज हरि हर सनकादिक जेते । कर्म अधीन जान सब तेते ॥
कर्म अधीन ज्ञान अरु योगा । जो जस करे भोग तसभोगा ॥
कर्म स्वतंत्र सर्वे परगावै । जो जस करै सो तसफल पावै ॥
द्वितीय बाद वयशेष वदंता । कर्म नहीं जानिये सुतंता ॥
कर्मतो कालकि बसमें होई । काल पाय कर्मकरै न कोई ॥
जब कतहुँ परगात न होई । भोर कर्म तब करै न कोई ॥
जौ मध्यान न सन्द्या आवै । बिना काल को कर्म गहावै ॥
बाल कर्म ना हो तरुनाई । युवा कर्म नहीं शिशु करि पाई ॥
युवा कर्म करि सकै न बूढा । वृद्ध कर्म तरुनाई गूढा ॥

आगमनिगमबोध

( ११ )

ताते यह निश्चय करि मानो । कर्म कालकी वश में जानो ॥
कालहि ब्रह्म और नहिं कोई । काल पाय अज हरि हर होई ॥
काल पाय पुनि सो बिनसाही । उतपति प्रलयकाल वश आही ॥
कालहि ते सुख दुख लहंता । काल स्वतन्त्र कर्म परतन्ता ॥
जब चाहे क्रम कर नर लोई । काल किये ते कवहु न होई ॥
ताते काल सत्य करि मानी । कर्म असत्य वैशेषिक बानी ॥
तृतीय न्याय निज मत अर्थाई । काल है छीन छीन है जाई ॥
घटि बटि जाय कालकी बाते । काल कर्म नास्ती दोष ताते ॥
अस्ति एक परमात्म आही । तीन काल आवै अरु जाही ॥
निजु बश ईश्वर कालको धरई । जब जस चाहे तब तस करई ॥
ग्रीषम वर्षा काल बनावै । वर्षाको ग्रीषम दिखलावै ॥
चाहे रंक् रावकरि द्वारी । भूपतिको पुनि करे भिखारी ॥
सकल सूत्रधर ईश्वर ऐसे । नाचे जग कठपुतली जैसे ॥
ताते परमेश्वर है अस्ती । काल वो कर्म सुभाव है नास्ती ॥
चौथे पतञ्जलि कह यह लेखा । कहो कहां तुम ईश्वर देखा ॥
तुम नहिं जौ ईश्वर लखिपाई । तौ पुनि कैसे ताहि बताई ॥
कैसो ईश्वर होइ रे भाई । बिन देखे कह कहो बुझाई ॥
ईश्वर वहां सो कैसे जाना । बिनु अनुभव भाखे अनुमाना ॥
पीतर पाथर प्रथमा पूजो । अनुमानहिते मनमें सूजो ॥
यह सब झूठ भरमको फन्दा । आत्म शुद्ध सच्चिदानन्दा ॥
सो हम जोग मार्ग ते जाना । तुमको नहिं कहु अनुभवज्ञाना ॥
तुम प्रतिमा पूजो यहि लेखे । हम ब्रह्मांड पिंडमें देखे ॥
तुम हो झूठो हम हैं सांचे । ईश्वरकी अनभौ तुम काचे ॥
ताते योग सत्करि जानो । और सकल झूठा करि मानो ॥
पञ्चम सांख्यपती अस बोलो । तुम सब मिथ्या भ्रमयुत डोलो ॥

( १२ )

बोधसागर

यकदेशी अनुभव अरु ज्ञाना । सो कछु कामको नहीं बखाना ॥
ब्रह्म सर्व देशी कह सोई । साक्षी सर्व अकर्ता होई ॥
सब करतूत प्रकृती ठाना । योग समाध साधना नाना ॥
उत्तपति अस्थित परलय कर्मा । सो सबही प्रकृतके धर्मा ॥
पांचों तत्त्व पचीस प्रकृती । चारों देह आदि सब नास्ती ॥
ईश्वरको जो जाननहारा । सर्वसाक्षि सो आस्ति पुकारा ॥
ये सब अनितमें नितको आस्ती । योग आदि सब मिथ्या नास्ती ॥
झूठे वेदान्ती ऐसे कहई । मिथ्यावाद सकल यह अहई ॥
एक अखण्ड ब्रह्म है जोई । तामें अस्ति नास्ति नहिं कोई ॥
आप आप सम्पूर्ण व्यापा । अमकरी त्रिपुटी तामें थापा ॥
ध्याता ध्यान घेय नहिं कोई । ज्ञाता ज्ञान होय नहिं जोई ॥
ब्रह्म अखण्ड अद्वैत एकरस । ताते द्वैत भाष भाषे कस ॥
नित्य नित्य समाधि है जोई । तामें सो सम्भवै न कोई ॥
देखन अरु देखनमें आये । देखनहार ब्रह्म बतलाये ॥
ब्रह्मते इतर और न कोई । नास्ति और सब मिथ्या होई ॥

सोरठा-वाद करे इमि सोय, चार वेद षट् शास्त्र मिलि ।

भेद न पावे कोय, अगम अपार अकथ कथा ॥

सत्य कबीर वचन

सारखी-वेद हमारा भेद है, हम वेदनके माहिं ।

जौन भेदमें मैं बसो, वेदौ जानत नाहिं ॥

अथ विष्णुके चौवीस अवतारको-वर्णन

दोहा-मीन कूर्म बाराह कह, नरहरि बामन बंक ।

परशुराम रघुराम कह, कृष्ण बुद्ध निष्कलंक ॥

व्यासकपिल हयग्रीव पृथु, यज्ञत्रहपभ सनकादि ।

दत्त मन्वतर बद्धिपति, धानन्तर इंसादि ॥

आगमनिगमबोध

( १३ )

चौपाई

हरि औतार बहुत जग माँही । तिनकी कथा कही नहिं जाही ॥
हरि औतार जेते जग भैऊ । राम कृष्ण सर्वोपरि कहेऊ ॥
सुजस जासु जगमाहिं बखाना । गुण गण गावै वेद पुराना ॥
हरिमहैं चक वर्त तिहु पुरके । कोई शत्रु नहिं सम्मुख फरके ॥
ताते तिनकी कथा न लेखो । वेद पुराण न अधनी देखो ॥
जहाँ तहाँ हरिमंदिर सेवा । पूजै विष्णु विश्वंभर देवा ॥
तीन देवमें होइ है सोई । घट घट माह विराजै ओही ॥
चारों विधिकी मुक्ति लहीजै । विष्णु देवकी सेवा कीजै ॥

इति विष्णुके चौबीस अवतार

अथ ब्रह्माके षट् अवतारके नाम

दोहा-गौतम कलि कृपाद मुनि, व्यासो जैमिनि जान ।
मंडनमिश्र मीमांसकहि, ब्रह्म जग प्रकटान ॥

इति

अथ शिवजीके ग्यारह रुद्रके नाम

दोहा-सर्पकपाली त्र्यंबको, कपि कर्पादि मृग व्याधि ।
बहुरूपो वृष शम्भु हरि, रैवत वीरभद्रादि ॥

इति ग्यारहरुद्र

अथ ब्रह्माके दैहिक और मानसिक पुत्रनके नाम-चौपाई

ब्रह्मा द्वे सुत प्रथम उपाये । एक दक्ष एक अत्रि कहाये ॥
दक्षते सूर्यको औतारा । अत्रिते बहुरि चन्द तनु धारा ॥
सूर चन्द कुल क्षत्री भैऊ । पुनि सातो ऋषि देही गहेऊ ॥
भृगु अत्री अरु पुलह बतावो । फिर अंगिरा पुलस्त कहावो ॥
नारद और वशिष्ठ उचारा । पुनिकहसनकादिक औतारा ॥
ब्रह्मा मानसी पुत्र बतावो । अत्री और अंगिरा गावो ॥

नं. १० बोधसागर - ७

( १४ )

बोधसागर

पुलह पुलस्ती कृत गनीजै । भृगु प्रचेत वाशिष्ठ कहीजै ॥
पुनि ब्रह्म तनु सुतकह नामा । दक्ष प्रजापति धर्मो कामा ॥
कोथ लोभ मद मोह उपाये । हर्ष मृत्यु दशनाम बताये ॥

इति

अथ चौदह विष्णुके नाम

दोहा-यज्ञ विभू शतसेन हरि, पुनि वैकुंठो होय ।
पुनि अजितो बामन कहो, सर्वभूमि ऋषि भोय ॥
पुनि अमूर्ति भ्रममें तहै, बहुरि सुधामा जान ।
योगेश्वर बृहद्दान ये, चौदह विष्णु बखान ॥

अथ चौदह इंद्रके नाम

दोहा-यज्ञो रोचनसतजितो, बहुरित्रिशिखविभु जान ।
तथा मंत्र दुम जानिये, फेर पुरंदर मान ॥
बलि अद्भुत शंभू कहो, पुनि वैधृत उच्चार ।
रिनुधामा पुनि धौसपति, श्रुची इंद्रदशचार ॥

अथ चौदह मनुके नाम

दोहा-मनु स्वयंभू सारोचको, उत्तम तामस रैवत् ।
चाक्षु शतवृत्त सावनीं, दक्ष सवरनी सत् ॥
ब्रह्म सवनीं धर्म सवनीं, रुद्रसावनीं होय ।
देवसावनीं इन्द्रसावनीं, ये चौदह मनु रोय ॥

इति

अथ सप्तस्वर्गके नाम

दोहा-भुवरलोक अरु स्वर्ग कहैं, महरलोक जनलोक ।
तपलोक सतलोक है, सात नामको थोक ॥

इति सप्तस्वर्ग

आगमनिगमबोध

( १५ )

अथ सप्त पातालके नाम

दोहा—अतल वितल सुतलोक ही, फेरि तलातल होय ।
महातला पाताल पुनि, अंत रसातल जोय ॥

इति सप्त पाताल

अथ नौघरोके नाम चौपाई

प्रथम भूमि भूलोक बखानी । दूजे भुवरलोक है पानी ॥
स्वर्गलोक पुनि अग्निको घेरा । पितर लोक पुनि वायू टेरा ॥
पंचम शून्य लोक आकाशा । अन्तर लोक हँकार प्रकाशा ॥
सप्तम सत्यलोक मह तचू । अष्टम लोका लोक कहचू ॥
ॐ शब्द तहवां ते होई । मायाको घेरा है सोई ॥
ताके परे नामै अस्थाना । शुद्ध स्वरूप निरंजन जाना ॥
शब्द निरञ्जन ते उत पानी । ताते तब माया प्रकटानी ॥
मायाते महतत्त्व पसारा । महा तत्त्व से भा हँकारा ॥
अहँकार आकाश उपायो । पुनि आकाश वायू प्रकटायो ॥
वायुते अग्नि अग्निते पानी । ताते यह भूलोक बखानी ॥

इति

अथ सप्तद्वीप और ब्रह्मांडको वर्णन

दोहा—प्रथमै जम्बूद्वीप कह, शाकद्वीप कर फेर ।
कौंच कुशा शलमरूप पुनि, पुक्षो पुष्कर टेर ॥

चौपाई

ताते परे योजन दश कोरी । कंचनकी पृथ्वी लै जोरी ॥
परम प्रकाश मान महि सोई । तासु परे परवत यक होई ॥
लोकालोक नाम सो भाषा । महाशून्य बन तापर राखा ॥
उग्र उद्दि यक ताते आगे । बहुरि अग्नि ताते पर लागे ॥

( १६ )

बोधसागर

पौन दसगुना पुनि पर ताही । तासु परे दशगुन नभ आही ॥
तासु परे योजन यक लाखा । सघन कंथ ब्रह्मण्डको राखा ॥

इति समद्वीप

अथ अष्टवसुओंके नाम

दोहा-प्रथम द्रौन पुनि प्रानकह, ध्रू अर्क अग्नि प्रमान ।
दोषा वसू विभावसू, अष्ट वसू ये जान ॥

इति अष्ट वसु

अथ चार युगोंकी आयुस्थितिर्वर्णन चौपाई

चारों युगकर लेखा प्रमाना । कृत त्रेता द्वापर कलि जाना ॥
सतयुगकी आयू इमि कहसे । सत्रह लक्ष अठाइस सहसे ॥
त्रेताकी आयू पुनि भाषा । छानवे सहस्र अरु बारहलाखा ॥
आठ लक्ष चौसठ हजारा । द्वापर आयू करो विचारा ॥
बत्तिस सहस्र चार लक्ष कहिये । कलियुगको यह लेखा लहिये ॥
चारों युग यक ठौर गहीजै । एक महायुग तासु कहीजै ॥
एक सहस्र महा युग होई । कल्प एक मुनि कहिये सोई ॥
चौद मन्वंतर कल्पमें होई । कल्प एक ब्रह्मादिक सोई ॥
ऐसे दिनको लेखा लीये । एकसौ वर्ष लौ ब्रह्मा जीये ॥
एक सहस्र ब्रह्मा है बीते । तब एक घडी विष्णुकी रीते ॥
ताके दिनते करि पुनि लेखो । निजुसौ वर्षविष्णु थित देखो ॥
जबदशलक्ष विष्णु बित जाही । घडी एक तब रुद्र सिराही ॥
ताहि वर्ष पुनि लेखा कीये । निजु सौ वर्ष रुद्र पुनि जीये ॥
ग्यारह रुद्र जो उगि खपिजाना । रमा शिवा यक घडी प्रमाना ॥
निजु सौ वर्ष कि आयू पाई । सहस्रशिवा जबउगिखपजाई ॥
तब मायाको पलभर होई । न्यौरा वेद बखाने सोई ॥
यह लेखा यक भयो प्रमाना । प्रभु माया गति काडुन जाना ॥

आगमनिगमबोध

( १७ )

चहुँ युगमें आयू नर केरी । लखदश सहस्र सहस्र सत केरी॥
याहूको नहिं कीन प्रमाना । आयू थित हैं विविधि विधाना॥

इति

अथ चौदह रत्नके नाम

दोहा-श्रीमणि रंभा वारुणी, अमी शंख गजराज ।
कल्पद्रुम शशि घेनु धन, धन्वन्तर विष बाज॥

इति चौदह रत्न

अथ पंचप्रकारके यज्ञ वर्णन

दोहा-अभ्यागत आदर कहै, बहुरि वेदको पाठ ।
आहुत भूतन यज्ञ कह, पितर यज्ञकी ठाट ॥

इति पंचप्रकार यज्ञ

अथ कर्म उपासना और ज्ञानको वर्णन—चौपाई

मारग तीन वेद जो भाषा । प्रथमहि कर्म कांडको शाषा ॥
पुनि उपासना ज्ञान कहाही । तिहुके तीन देवतन माही ॥
क्रम इन्द्री क्रम कांड गहाये । अन्तःकरण उपासक गाये ॥
ज्ञान इन्द्री सो ज्ञान गहंता । यह तिहु देवको भेव भनंता ॥
सूरख कहाँ उपासक होई । कर्म ज्ञान यामें नहिं कोई ॥
कर्म उपासना ज्ञान जो तीनी । चौदह इन्द्रीते कहि दीनी ॥
जबलो नहिं तिहुकोसम ताई । कोई कर्म शुद्ध नहिं पाई ॥
एक हाथ जो चोरी करई । देह समस्त बन्दिमें परई ॥
कर्म उपासना ज्ञान गहाई । भली भांति तिहुमेल मिलाई ॥
हट हौ गहे मुक्ति जिव पावैं । अब कर्मनको भेद बतावैं ॥
जो कोई पित्रकिमुक्तिकि हेता । तन मन धन अपने सब देता ॥
पितृ लोकमें सो चलिजाई । पुनि जो जैसो कर्म कराई ॥
कोई गंधर्वके लोक समाही । देवकभी परजा पति पाही ॥

( १८ )

बोधसागर

हिरण्य गर्भं गुरु पंडित जासी । यज्ञ करंत चन्द्रपुर वासी ॥
जीव आतमाको गुण येही । जेहि औसर जैसी गह देही ॥
भ्रम भयते संयुक्त जो होई । भ्रमही रूप बनावै सोई ॥
ज्ञान बुद्धि जब होय संघट्टा । ज्ञान रूप हो भ्रम भय कट्टा ॥
पुण्य पाप कर्मनते जूटा । बँधा जीव ग्रह ताही खूटा ॥
तिहि अनुसार कर्म सब करई । जैसो कर्म धाम तस धरई ॥
जैसी देह कर्म कर तैसा । सदा आत्माको गुण ऐसा ॥
जीव वासनाते नित पूरन । जस वासना ताहिते जूरन ॥
मनमें यथा मनोरथ होई । अंतकाल फल पावै सोई ॥
रही लगी जह जीवकी आशा । सूक्ष्म तन धरि तहकरबासा ॥
पुत्र कामना जाको होई । पुत्र देह धरि प्रकटै सोई ॥
पुत्रको ऐसो उचित बतावै । पिताकि मन कामना पुरावै ॥
पिता मनोर्थ जो सुतन पुरावै । तौ पितु बहुरि देह धरि आवै ॥
पितु अपने मनोर्थ को हेरे । धरे देह निज इच्छा प्रेरे ॥
ज्ञान अरु परमारथ के कारण । जीव कीन मानुष वपु धारण ॥
अबलों कथा प्रसंग जो रहेऊ । बंधकामना व्यौरा कहेऊ ॥
वर्णन अब कीजे कछु तिनको । रहित कामना मन है जिनको ॥
सकल कामनाको जो त्यागे । कारण द्वै तिहि माह विभागे ॥
होय कामना जो कछु हीये । फेर न चाह भोगिभल लीये ॥
द्वितिये ज्ञानदृष्टि मनकामा । तुच्छ दृष्टि देवै सब तामा ॥
मिथ्या सकल जो कछु दरशाई । जानि अनित्य न नेह लगाई ॥
आतम ज्ञान सर्व पर जानी । ताते सर्व लाभको मानी ॥
आतमते सब कुछ प्रकटाना । ताहि लाभ सब लाभ लहाना ॥
सकल कामना जो कोइ त्यागे । आतम ज्ञान तासु उरजागे ॥
जो कछु चितमें चाह चपेरे । तौ बीन तन यह जिव हेरे ॥

आगमनिगमबोध

( १९ )

जाके हृदय कामना नाहीं । ब्रह्म स्वरूप कहीजै ताहीं ॥
रहित मनोरथ अमर है सोई । मयनहार कातिक जिव होई ॥

छन्द-सब चाह उत्तरते दाह भै तब सुक्ति याकी सन्ध है ।
जब लोन करिये बामना तिहि कामना जिव अन्ध है ॥
यहि लोककी वहि लोककी तिहि शोकमें यह बन्ध है ।
चाहे चमारी चूहरी तिहि फूहरी डुरगन्ध है ॥
जिमि सर्प त्यागे केखुली इमि चाह उत्तरे त्यागिये ।
तजिताहि फणि फिरि चाह नहि यौ पुनि ना तामें पागिये ॥
मद मार विषय बिकार डारके रूपते अनुरागिये ।
दलमलितखलदलललितज्ञानते ब्रह्महो जिय जागिये ॥

जो निष्काम कर्मको करही । तिनको कबहुँ न घाटा परही ॥
चाह न कर्म पलनते जाही । निश्चय अधिक फल कर्मते ताही ॥
नफाहेतु जो कर्मको गहते । घाटा हू पुनि सोई सहते ॥
जिनको फलनकी इच्छा नाहीं । जो प्रभुकृपासे तिहि मिल जाही ॥
सो फल नफामें लेख लगाये । ऐसी समुझ सुक्तिपद पाये ॥
जप तप तीर्थार्थदिक व्रत दाना । सहित मनोरथ जाने ठाना ॥
इनको फल जो कोई चाही । सो जिव असुर लोकमें जाही ॥
कर्मके बन्धनमें सो बांधा । बूथा सो निज इन्द्रीको साधा ॥
बादिसो आपनो ग्रह सुख खोई । अन्धकारमें अधिक बिगोई ॥
जो कोई है आतम ज्ञानी । सर्वमई सो आपुहि जानी ॥
पुण्य पाप सुख दुःख सब जोई । नर्क स्वर्ग आदिक जो होई ॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र अभिमानी । सो सब अपनी देह बखानी ॥
भ्रम रज बन्धा जीव अज्ञानी । सो टूटे आतम जब जानी ॥
जिनमें नहि साधूकी करनी । बचन बनाय ज्ञान बहुबरनी ॥

( २० )

बोधसागर

साधू नहीं भाँड है सोई । ताते अधिक न शठ है कोई ॥
तिनते भलो जानिये सोऊ । आगम फल आसा कर जोऊ॥
कर्म उपासना ज्ञान जो होई । भिन्न भिन्न तिहि फल कर जोई॥
ज्ञानते इतमें भेद बिचारा । तिनको फलहुबतावज्योन्यारा॥
सो अक्षर अभ्यासी अहई । ताहि न अर्थी पण्डित कहई॥
कर्म उपासना ज्ञान जो तीनी । एकै फल तीनते कहि दीनी ॥
सनबन्धी यक दूजा हेरो । ज्ञानको अर्थ जाननो टेरो ॥
कर्मको मर्म न हृदय गहाया । नहीं उपास्य गुणको लखिपाया॥
कर्म उपासना झूठे तिनके । कछु व्योरा हियमें नहि जिनके॥
कर्मको अर्थ याहि बिधि कहना । चाल चलन सुकर्म सब गहना ॥
जाके हृदय हो उत्तम ज्ञाना । करनी तासु विरुद्ध लखाना ॥
ताहि ज्ञानते गुन कछु नाही । कर्म उपासना वृथा कराही ॥
साची प्रीत उपासना सोई । होय एकता रहै न दोई ॥
जबलो नहीं यह गुन दृश्याई । कर्म उपासना ज्ञान वृथाई ॥
जो कोई विषयनको त्यागे । ताके हृदय ज्ञान यह जागे ॥
ज्ञान दृष्टि करि तब सो जाना । कर्मापासन योगो ज्ञाना ॥
चारों चार तत्त्वसे कहिये । रचना सकल सृष्टितिहि लहिये ॥
चारों मिश्रित सम सुख दाई । घटि बटि भये न सुख कोइ पाई ॥
बिना ज्ञान करा कर्म जो लोगू । कर्मापासन अथवा योगू ॥
सोनिशि दिन जौ निजुतन कसही । आशा तृष्णा युति बुधि नशही ॥
कर्मापासन योग समाधा । ज्ञान सहित जो कोई साधा ॥
सो सब विषम अविद्या जानी । जीयत जीवन मुक्त सो प्रानी ॥
मुये विदेह मुक्ति लह सोई । जिनके हृदय ज्ञान अस होई ॥
मरण काल जिहि औसर आवै । देहकि नेह जीवको छावै ॥
तनकी प्रीतिसे दुःख बड माने । काहूको नहीं तब पहिचाने ॥

आगमनिगमबोध

( २१ )

जीव आत्मा यह तिहि बेले । इन्द्रिको निजु संग सकेले ॥
सब इंद्री तजि निज खुटे । जाय जीव आतम ते जूटे ॥
उरमह दिसे बुद्धिके रूपा । मूर्ति एक तामें सब गुपा ॥
तनधारि तन आपुहि जाना । इन्द्रि सकल रहित भे ज्ञाना ॥
दृष्टि तब खनते हिलही । सूक्ष्म तन गति सूरजते मिलही ॥
सूर्यन पृथ्वी माह समाई । रसना स्वाद वरुणा में जाई ॥
वाक् अग्निमें पौन समीरा । दिशा सौन मन शशिके तीरा ॥
भूताकाश बुद्धिकर थाना । जिव सब संगले करे पयाना ॥
जो जिव भले कर्मको करता । दृगसार बाहर पग धरता ॥
सूर्य माह सब जाय समाई । इमि सब इंद्री राह गहाई ॥
भले कर्म जिनके अधिकार्ई । ब्रह्मरंध्र कटि बाहर आई ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसी राह गहै पुनि सोई ॥
जिवको बासा तनते छूटे । आवा गौन श्वासको टूटे ॥
जड समान देही रहि जाई । जीव नवीन कलेवर पाई ॥
अहं बोलिके जीव सिधारै । हौं मैं प्रथमहि शब्द उचारै ॥
सहित कर्म जिव करे पयाना । तजि तनथूलसौलिंग लहाना ॥
निज कर्मनके प्रेरित येही । सदा नवीन धरे जिव देही ॥
जिमियक भूषण भंजि सोनारा । निज इच्छाते और संबारा ॥
तैसे देह जीव यह गहई । पुनि पुनि गहै तजै श्रुतिगहई ॥
पूरन काल जीवको बाजा । उर्ध्व गमनको करै समाजा ॥
अधर लोक दोड लोकके बीचे । कर्म तहां जब जिवको खींचे ॥
ज्यों जाग्रत स्वप्नने भरमाई । अपने कर्मको फल इमि पाई ॥
सरगुन गहिकर सुरनमें बासा । असुरको गुनगहिदुःखबहुँपासा ॥
प्राण स्वप्नमें देखत सोई । जाग्रित माह बिचारे जोई ॥
ताहि समान गहैं सो देहा । दुख सुखको है कारण येहा ॥

( २२ )

बोधसागर

स्वप्न समान नर्क अरु स्वर्गा । इच्छारहित अहित अपवर्गा ॥
ऐसे निज अनुमान गहाये । नर्क स्वर्ग अरुमध्य गहाये ॥
मारग मुक्ति कहावे सोई । सूर्य मंडल बेधे जोई ॥
ब्रह्म लोक की मारग पाई । ताहि संग निज बास गहाई ॥
जिमि दीपक घटज्योति अपारा । जीव आतमा रूप सोधारा ॥
नसाजाल आतमकी ज्योती । सो बहुरंग ढंग की होती ॥
श्वेत हरित दुति प्रीती देखाये । भूरा रंग तासु प्रगटाये ॥
नसन प्रकाश तासु उर होई । मुक्त होत पहुँचे जो कोई ॥
सुषुम्णामें मिलि एकसौ नारी । उत्तम मध्यम लोक सिधारी ॥
केती नशा अधोमुख आहीं । अधोगती को सो ले जाहीं ॥
गहै गैल तिहि मारग जबहीं । अधोगती जिव पहुँचे तबहीं ॥
यहि विधि नर्क स्वर्ग जिव जाही । थित प्रमाण दुखसुखलह ताही ॥
पूरण जब करार हो आवै । तब मृत मंडल वासा पावै ॥
कर्मके बंधन जिव तन धरही । चार खानिमें दुख सुख भरही ॥
स्वेदज जरायुग अंडज पिंडज । नाना बरन रूप निजु २ सज ॥
अंतमें जीव सुरति रह जाही । प्रगट होय सो धरितन ताही ॥

इति

अथ जीवको योनिप्रवेशवर्णन-चौपाई

योनि प्रवेश जीव जब करता । कोई ध्रुत्र मारग पग धरता ॥
देह वानमें जाय समाई । वीर्य रूप है सो प्रगटाई ॥
मेघ बून्द मारग ते कोई । हो रसरूप औषधि सोई ॥
तेहि भोगीके वीर्य मैझारा । केते प्राण वायुके द्वारा ॥
पौन पंथ गहि केते समाई । केते धान खेत प्रवेशाई ॥
चावल आदिक अन्नमें रहई । नाना वर्ण रूप सो गहई ॥
केते गगनमें स्थित गहाई । चंद्र किण्मैं रहे समाई ॥

आगमनिगमबोध

( २३ )

किर्णमार्ग औषधहि समाही । किते पुष्प फलमें भरजाही ॥
तनधारी तिहि भोजन करही । जड आतमके वीर्यमें भरही ॥
सो सुखोसि में वेष्टित सारे । पिंजर गर्भमें सोई सिधारे ॥
दूध यथा है घृतमें पुरा । तिमि वीरजमें सब जिव जुरा ॥
वीरज दूरबीन ते देखो । चलतहिलतजिवअनितनिरिखो ॥

इति

अथ शरीरवृक्षवर्णन-चौपाई

एक प्रणवते सब संसारा । सबको आदि सर्व करतारा ॥
ब्रह्म सोई ओंकार कहीजै । मन ओंकार न भेद गहीजै ॥
ओंकार मन कर्म निरंजन । कर्म स्वरूप जबतको रंजन ॥
कर्मते फुटी तीन पुनि शाखा । रज सत तम जगकारन राखा ॥
कर्मते करत होय निहकर्मा । आगम ज्ञान गहि दूटे भर्मा ॥
तृष्णा ग्रन्थि कर्ममें परई । सोई जीवको बंधन करई ॥
आतम परमातम यह रूपा । विषयमें भूलि परा भ्रम कूपा ॥
विषय वा सना त्यागे जोई । ब्रह्म स्वरूप जानिये सोई ॥
आतम परमातमा विहंगा । दोनों एक स्वरूप यक ढंगा ॥
एक है पंछी एक है छाया । छाया नहीं आया लखिपाया ॥
मूल थूल जहैं तहैं प्रभु आपू । भ्रमकरि न्यारा न्यारा थापू ॥
पड़ा जीव यह त्रिगुनके फंदा । भूला रूप चिदानन्द कन्द ॥
काया वृक्ष ऊर्ध्व है मूला । हेठ शाख पत्री फल फूला ॥
मूल परम पुरुषको भेवा । पेड निरंजत शाख त्रिदेवा ॥
पाती जान सकल संसारा । सत्य कबीर वचन उचारा ॥

सत्य कबीर वचन-शब्द

सार शब्दसे बाचिहो मानो इतबारा हो ।
अक्षय पुरुष यक वृक्ष है नीरंजन डारा हो ॥

१. शरीर वृक्ष का चित्र देखो "कबीर मानु प्रकाश" में।