कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
११५
जीवधर्मबोध
( २०२३ )
काहूको नहीं सो भरमावै । राग द्वेष नहीं ताको भावै ॥
ब्रह्मन वैर जाहिसे गहेऊ । वेदविरोधी असुर सो कहेऊ ॥
पशुपंछी नरको दुःख देही । असुर कर्मकर असुर है येही ॥
कारे राते गोरें अंगा । असुर बखाने नाना ढंगा ॥
असुर कर्म जब जो नर त्यागा । सो अवश्य सुर होय सुभागा ॥
लघु दीरघ तन सबही नरके । होहि सुरासुर कर्महि करके ॥
अजौ विप्र जैनीके द्रोही । औसर पाय देत दुःख ओही ॥
तिर्थकरकी मूर्ति जो आही । बाहर जैन निकास जो ताही ॥
ब्राह्मण तब असक्रोध गहाई । पहुँचै ले निजु सरा सहाई ॥
प्रतिमाके ऊपर तेहि बारा । पाथर ईंट करै बौछारा ॥
मुसलमान अस बचन सुनाया । कतल हुकुम अछाहते आया ॥
जो अछाह कतलपै राजी । तो एकै मत जग किन साजी ॥
महम्मदमत जगमें फैलावत । और सकलमत दूर बहावत ॥
जो कलाम अछाह कहाई । यह कुरान असमानते आई ॥
सो अछाह निकटकै कहाई । रह्यौ चराचरमें सो पूरी ॥
सोई कुरान ऐसो प्रकाशी । शहर गते प्रभु निकट निवासी ॥
कंठ किनसते निकट जो रहई । पुनितेहिकिमिअकाशपरकहई ॥
शहरगते हरि निकट बताई । तासु कलाम दूर किमि जाई ॥
अस नरें अछाह बतावै । किमि कलाम असमानते आवै ॥
जहाँ अछाह तहाँ अछाह कलामा । अछाह निकट दूर कह कामा ॥
जो अछाहको नहीं लखि पाया । तेहि कलाम असमानते आया ॥
जो अछाहको नहीं पहिचाना । किमि ताकी कलामको जाना ॥
जबैह कतलते प्रभु नहीं राजी । भ्रमकरि भूले पंडित काजी ॥
कोई कह प्रभु मैं आखिन देखा । चर्मदष्टिको मिथ्या लेखा ॥
चर्मदष्टि सब माया भासा । जो भासा सो सकल विनासा ॥
( २०२४ )
बोधसागर
११६
कोइ कह मैं कोई ठौरमें गैऊ । प्रभुके संग बातकही भैऊ ॥
कोई कह मैं प्रभु सपने देखी । कोई कहै घटही मैं देखी ॥
कोइ कह मो प्रति भै नभवानी । झूठ साच मैं ताते जानी ॥
कोइ कह मैं लखि ज्ञानके द्वारा । सो कस जस बिजुली चमकारा ॥
झूठ सांच भल नहीं लखि पावै । और बात कह्यु और बतावै ॥
यह सब जिवकी भर्म कहानी । विरला कोइ ईश्वर पहिचानी ॥
बिना ज्ञानके सब यह बाते । ज्ञानभये भ्रम रहै न ताते ॥
जो कोइ साधु ज्ञानके खानी । प्रभु इच्छा सब आपै जानी ॥
तिन्है न स्वपना नहीं न भवानी । नहीं कहैं अनतबतकही ठानी ॥
ज्ञान द्वार हरदम हरिदरसै । दूर जाय कह तापद परसै ॥
चार वर्ण ब्रह्मा परकासी । तिमि शंकर तनते संन्यासी ॥
शीसते पुरी देह निजु गहेऊ । पुनि भारती माथसे कहेऊ ॥
जीभनोकते सरस्वती जाय । गिरपर्वत दोऊ भुजा उपाय ॥
पसुलीते सागर तन गन्नों । दोहु जँघते बन आरन्नों ॥
दो पदसे तीर्थआश्रम तनधारै । शंकरसे प्रकटे इमि सारे ॥
जस बिचार जिवमाह प्रकासा । सो प्रतक्ष है ताको भासा ॥
केते ऐसे भये परपंची । छल करि ग्रंथ नयौ निज रंची ॥
छल बल करि निज नाम छपावै । जगमें इमि निज धर्म चलावै ॥
पूर्वाचार्य श्रेष्ठ मत धारी । ग्रंथको करता ताहि पुकारी ॥
श्रेष्ठ पुरुषको रचित विचारी । होय ग्रंथको आदर भारी ॥
अकबरशाह वोजीर जो फैजी । नयौ धर्म परचारक पैजी ॥
ताने नयौ कुरान बनाई । एक वृक्षके बीच छपाई ॥
अकबर शाहसे जाय सुनाया । मोकहैं राति स्वप्न यकआया ॥
तुमरे नाम नबूबत आई । है कुरान तरुमाह छपाई ॥
अकबरशाह अचंमित भयऊ । शीघ्र ताहि तरुतर चलि गयऊ
११७
जीवधर्मबोध
( २०२५ )
बृक्षको चीर कुरान निकारा । फेजी छल खुल्लिगो तिहिबारा ॥
ऐसे केते कपटी जगमें । करे बिगार धर्मकी मगमें ॥
पंडित कह पै पंडित नाहीं । विद्या देखि जीव भरमाहीं ॥
कठिन प्रपंच करे सो लोगा । विद्या पढ़ न भक्ति संयोगा ॥
विद्वज्जन हैं द्वैविधि वक्ता । एक भक्त यक जत्तको ठगता ॥
षट् पशु ऐसे कीन प्रमाना । प्रथमैं वेद पशुको जाना ॥
वेदादिक पढ़ि ग्रंथ अनेका । वेद पशु न हृदय विवेका ॥
दुतिय देवपशु गह सुर पक्षा । कह सुर श्रेष्ठ करे जग रक्षा ॥
तृतिये नर पशु ताको कहते । श्रेष्ठ मनुषको पक्ष जो गहते ॥
चौथे शास्त्र पशु शास्त्र ले बोले । पुनि पंचम पुराण पशु टोले ॥
छठे नारि पशु लंपट भाषे । ये षट्पशु विचार नहीं राखे ॥
दोहा-गुरुपशु नरपशु वेदपशु, त्रियापशु संसार ।
मानुष सोई जानिये, जाके हृदय विचार ॥
इति विचारणीय वार्ता
अथ धर्मसार वर्णन
दोहा-सर्व धर्म परमान यह, ईश्वर समरथ सत्य ।
किहि विधि सो प्रभु रीझई, कोइ न जाने गत्य ॥
चौपाई
शुभ कर्मनते हरि हर खाहीं । यह प्रमान सब धर्मनमाहीं ॥
शुभ अरु अशुभ कर्म द्वै राखी । दोनों कर्म धर्मते भाखी ॥
समरथ करता दोहुते न्यारा । ताकी गति को जाननहारा ॥
न्याय मिमांसा जैनी भाषे । केते ऋषि सुनि सोइ मद राखे ॥
जीव स्वच्छंद कर्म अधिकारी । जस चाहे तस कार्य सँवारी ॥
केते साधु कथै विपरीती । जिव नहीं सके कर्मकुलजीती ॥
कर्ताकी गति काहु न जाना । कथे अनेकन वेद पुराना ॥
नं. ११ बोधसागर-
( २०२६ )
बोधसागर
११८
जापर कृपा करे सो साईं । ताकी बाँह गहे बरियाई ॥
ब्रह्मानंद बनावै ताही । सबते श्रेष्ठ होय जिव वाही ॥
बहुविधि जिवशुभकर्म जो करई । बिन प्रभु दया कार्य नहिं सरई ॥
बार बार सो प्रभुहिं नमामी । सर्व समर्थ सर्वके स्वामी ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
अवधू कुदरतकी गति न्यारी ।
रंक नेवाज करे वह राजा भूपति करे भिखारी ।
वाते लोग हरफ नहिं लागे चंदन फूल न फूला ॥
मच्छशिकारी रमै जंगल बिच सिंह ससुंदर झूला ।
रेडरूख भयौ मलयागिर चहुँदिश फूटी बासा ॥
तीन लोक ब्रह्मांड खण्डमें देखे अन्ध तमासा ।
पंगा मेरु सुमेरु उलेंचै त्रिभुवन सुक्ता डोले ।
गूंगा ज्ञान विज्ञान प्रकाशे अनहद बानी बोले ॥
आकाशहिं बांधि पताल पठावै शेष स्वर्गपर राजे ।
कहैं कबीर राम हैं राजा जो कछु करे सो साजे ॥
चौपाई
महागृह सुनिवर तप कीने । अंत नर्कमें बासा लीने ॥
पतित जौ नर्क भोगवे लायक । कृपा कीने कीन सुरनायक ॥
जौ मैं कर्मकरन समरथा । ज्ञानसुक्ति तौ सब ममहत्था ॥
मैं हौ कौन कर्म है काको । जीव नहीं जाने परिपाको ॥
जौ यह जाने मैं कछु नाहीं । तौ अभिमान दूर दुरि जाहीं ॥
सत्यकबीर-वचन
साखी-कबीर-पैठा है सब घटनमें, बैठा है संचेत ।
जब जैसी गति चाहत है तब तैसी मति देत ॥
कबीर-बहुबंधनते बांधिया, एक बेचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जौ न छोड़ावै पीव ॥
११९
जीवधर्मबोध
( २०२७ )
कबीर-मनको मनोरथछोडिदे, तेरा किया न होय ।
पानीमें धिंव निकले तो, रूखा खाय न कोय ॥
नानकशाह वचन
करै करावै आपै आप । मानुपकै कछु नाहीं हाथ ॥
जो कहै कि मैं कुछ कर्ता । फिर फिर गर्भ योनिमें फिरता ॥
चौपाई
मैं कछु नहिं कछु है मेरा । अहमित जे अज्ञानते घेरा ॥
जो कोई पायौ ज्ञान अमोला । अहंब्रह्म आपा लखि बोला ॥
ताहूकी यह दुर गति देखे । लखि नहिंपरतअलखयहिलेखे ॥
सत्यकबीर वचन-रेखाता
मालिन पुकारे हे पिया है हे साहेब तूने क्या किया ॥
यक बून्द लज्जत कारने मन्सूर सूली यौ दिया ॥
जल जलकि रोवै माछरी बनबनके रोवै मोरया ॥
महलोकि रोवै बीबिया अल्लाह इलाही क्या किया ॥
कायाके अंदर खोजिले छज्जेमें तेरा जीव है ॥
कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुजहिमें तेरा पीव है ॥
चौपाई
जस ईसाकी कथै कहानी । तस मन्सूरकेरि गति जानी ॥
दोनोके मरनेकी बारी । प्रकटे केते चीन्ह भयकारी ॥
ऋषि सुनि जैसे करनी करही । तैसी हानि लाभमें परही ॥
ज्ञानी ध्यानी प्रभु नहिं जाना । पाय कर्मफल सुख सब माना ॥
कबहु कबहु विपिरीति देखावै । उत्तम कर्म तुच्छ फल पावै ॥
जैसो नीक नाथको लागा । तैसोई तप फल जिव मागा ॥
कुंभकरन तप करि हरि टेरी । मांगसि नींद माष षट्केरी ॥
बारह लक्ष वर्ष तप भारी । कर इबलीस हदीस पुकारी ॥
( २०२८ )
बोधसागर
. १२०
कछु नहीं ताको बस तहँ चाला। अंतकाल तेहि नकीमें डाला ॥
जीवकि वसमें जो कछु रहता। तौन सुकर्म नीच गति गहता ॥
वेशुवा बहुदिनको लेआयो। ईश्वर कृपा ताहि परछायो ॥
जबकन आनदेशमें आया। तह बल्लाम साधु यक पाया ॥
तीनसौ वर्ष कीन तप जोई। जो कछु कहै सत्य सब होई ॥
बाद येशुपासे सो ठानी। तीनसौ वर्षकी तप विनसानी ॥
जब जहि जस चाहे तस करई। जीव जतन कछु काज न सरई ॥
किनको नाथ दीन बरदाना। निज भ्राता पर हो जय माना ॥
जीत्यौं प्रभु आज्ञा अनुसार। कोई न भा दोषी हत्यारा ॥
मूसा प्रभुकी आज्ञा पावो। चलि फिर उन भूप समुझावो ॥
देय यहूदिनको सो जाना। पुनि अस वचन कहौं भगवाना ॥
मैं फिर उनको करों कठोरा। मूसा वचनसे मुख सो मोरा ॥
फिर उनहिय प्रभुकरि कठिनाई। मूसाको तब कहा बसाई ॥
को अस बली जो ताहि उबारा। प्रभु जेहि आप डुबावन हारा ॥
जैसे प्रथम भन्यकी बानी। हसन हुसेन मृत्यु इमि जानी ॥
कीन हुसेन युक्ति बहु तेरी। पहुंचे मृत्यु महि मरनकी बेरी ॥
यकदिन अस कौतुक बतलाये। महम्मद द्वै किताब ले आये ॥
यक किताब दहने कर गहई। दूजी बाम हाथमें रहई ॥
दहने हाथ किताब जो दिखावा। नाम बिहिस्तिनकोतहँलिरकवा ॥
जो किताब बायें कर ग्राही। नारख नाम लिखा तामाही ॥
प्रथमहिंते भे स्वर्गी नकीं। कुदरतकी गति जाय न तकीं ॥
प्रभु केकइकी मनि हरि लीनो। रामचंद्रको सो बन दीनो ॥
केकइको कह दूषन दीजै। हरिइच्छा किन अटक कहीजै ॥
बाबुल बुर्ज बनावन लागे। सब नर तिय तेहि उद्यम पागे ॥
ताते नहीं ईश्वर सुखपाई। सबकी बोल दियौ पटलाई ॥
बरने बेद उपनिषद साखी। देव दनुज दोऊ दल रन भाखी ॥
१२१
जीवधर्मबोध
(२०२९)
हारे असुर सुरन जय पाया । विजइन मन अभिमान समाया ॥
जब देवन कीने अभिमाना । ब्रह्मरूप तब तहँ प्रकटाना ॥
ऐसो तेजमई सो रहेऊ । कोईसुर नहिं सन्मुख है सकेऊ ॥
सब सुर अग्नि पौनको टेरी । तेहि औसर तहँ दोउ कर फेरी ॥
सब सुर अग्नि पौनसे कहेऊ । ब्रह्मरूप जो प्रकटे भैऊ ॥
हम सन्मुख है सके न ताही । तुम करि कृपा तासु दिग जाही ॥
तादिग पौनदेव जब गैऊ । ब्रह्म ताहिते पूछत भैऊ ॥
तुम हो कौन कहा तौ कर्मा । पवन देवता भाज्यौ मर्मा ॥
नाम पौन सुर मेरो होई । जो कुछ होय उडावो सोई ॥
तहां रही यक तृणकी ढेरी । ब्रह्मसो पौनको पौकहि टेरी ॥
वह ढेरीको देह उड़ाई । पौनदेवकर बल अधिकाई ॥
यक तृण तासु न सका उड़ाई । बलकरि पवनदेव थकि जाई ॥
लज्जित पौन गौन धरकीने । अग्निदेव पुनि तहँ पग दीने ॥
पूछै ब्रह्म कौन तू भाई । अग्निदेव निजु नाम सुनाई ॥
पूछै ब्रह्म कर्म तो काहा । अग्नि कहे मैं सब कुछ दाहा ॥
कहे ब्रह्म तृणढेर जलावो । अग्निदेव वह जोर लगावो ॥
तृण यक भस्म न सो करसकेऊ । जोर लगाय अग्नि तहँ थकेऊ ॥
तब लजायके अग्नि सिंधारा । ब्रह्मा सो गुप्त भयौ तेहि बारा ॥
देवी प्रकट भई तेहि काला । देवनसे कहा बचन रसाला ॥
तुम अभिमान भंजवे कारण । ब्रह्मस्वरूप कियौ निजु धारण ॥
तुमरे मन हंकार जो आया । हम असुरनको मारि हटाया ॥
तुमरो कियौ होय कछु नाहीं । हानि लाभ विधिकी बस आही ॥
सर्वसमर्थ सर्वको दाता । ताकी गतिनहिं लर्यौ विधाता ॥
सो सबहीको खेल खेलावै । वाजीगर गतिको लखि पावै ॥
सबहीको जिन गर्व प्रहारा । लखि नहिं परत अलख करतारा ॥
(२०३० )
बोधसागर
१२२
बल वीरज विद्या चतुराई । बाजीगरको खेल् बनाई ॥
तीन देव जेते औतारा । कर्मके बन्धन नाचै सारा ॥
नाचै ब्रह्मा नाचै विष्णू । नाचै शंकर नाचै जिष्णू ॥
नाचै आप निरंजन ज्ञानी । तन धरि नाचै आदि भवानी ॥
नाचै ब्रह्म रुद्र हरि नारी । पीर पयम्बर नाचै झारी ॥
सिद्ध साधु सुर नर मुनि नाचै । सतगुरु कृपा सन्त कोई बाचै ॥
अहंकार करिके अज्ञानी । चाहत हरिमाया तरि जानी ॥
एक तपीकी कहो कहानी । जो अज्ञानते तप दृढ़ ठानी ॥
सोनिज मन असकीन विचारा । तपकरि चल हरि माया पारा ॥
ऐसी अपनी देह बढ़ावो । माया लंघि ब्रह्म मिल जावो ॥
ऋद्धि सिद्धि बल तामें जागा । तप करि देह बढ़ावन लागा ॥
महादीर्घ देही जब कीने । ब्रह्मचिंतवनमें चित्त दीने ॥
बढ़ तन ब्रह्म प्रभा परशनमें । अंग उत्तंग भंग मैं छनमें ॥
ब्रह्म प्रभाको कीन जो ध्याना । ताछन बढ़ा वपुष बिनसाना ॥
महादीर्घ तन है गिर परेऊ । पुनि सो मच्छरको तन धरेऊ ॥
घासनमें सो कियौ बसेरा । फिरत एक मृग वनमें हेरा ॥
तब ताको मृग लात जो लागा । ताते सो मच्छरतन त्यागा ॥
सुरति मसक मृग माह समाई । मच्छरतन तजि मृगतन पाई ॥
तेहि मृग मारन चले शिकारी । आय ताहिपर शस्त्र प्रहारी ॥
जब मृग निज तन त्यागकराई । बधिकमें ताकी सुरति समाई ॥
ताते बधिक भयौ मृग सोई । एक दिन वनमें विचरत होई ॥
विचरत बनहि मिले मुनि एका । ज्ञान दिये तेहि सहित विवेका ॥
मुनि उपदेश बधिक जो पाई । बहुरि सोभक्ति भाव मनलाई ॥
करि हंकार कर्म जो करहीं । तिनको कबहु न पूरा परहीं ॥
१२३
जीवधर्मबोध
( २०३१ )
दोहा-राम बढ़ावै सो बढ़े, और बढ़ै नहिं कोय ।
बलकरि बढ़ै जो रावन, पलमें डारचौ खोय ॥
चौपाई
वेद कहै जो ऐसो लेखो । ईश्वर सर्व मयी बुध देखो ॥
वेद कह कर्म कन्यौ नहिं अपन । ताको अर्थ विचारो निजमन ॥
महा करता महा भोगी जैसे । महा त्यागी पुनि जाने तैसे ॥
त्यागी महा जानिये सोई । जासु हृदय हंकार न होई ॥
जाके हृदये ऐसो बरता । मैं नाहीं कछु कर्मको करता ॥
मैं नाहीं हरि आपै आपू । सो नहिं कर्म आपनो थापू ॥
जाने ऐसो कीन विवेका । पुण्यमान पापी तेहि एका ॥
मित्र शत्रु ताके कोइ नाहीं । जहां तहां हरि आपै आहीं ॥
कोई नहीं सुख दुःखको दाता । मैं तू जग सब भ्रमकी बाता ॥
जिन विचारि लीना यह लेखा । सर्वमयी तिन ईश्वर देखा ॥
जेहि ईश्वर सब मयलखि आवै । पूरन पण फल सोई पावै ॥
रामचंद्र वचन
दोहा-जिनके हृदय विचार अस, मति न टरै हनुमंत ।
मैं सेवक चराचर, रूपराशि भगवंत ॥
चौपाई
भालू कीश कटक ले साथ । लंकापर चढ़िगे रखुनाथा ॥
सहित सेन रन रावन मारा । दोहु दिश जूझै बहुत जुझारा ॥
सुधा वृष्टि भै दोहु दल माहीं । जिये भालूकपि निश्चर नाहीं ॥
नाहीं राक्षस जिय कपि रिच्छा । ऐसी परमेश्वरकी इच्छा ॥
विष अमृत रिपु मित्र बनावै । भावे न्यारा खेल देखावै ॥
जापर कृपा करे करतारा । कन यक छनमें होय पहारा ॥
( २०३२ )
बोधसागर
१२४
सोरठा-पुण्य पाप मोहि नाहिं, निलैँपो निरद्वंद मैं ।
बंधा बंधन माहिं, विधि निषेधको ज्ञान गहिं ॥
चौपाई
मैं यक भर्म पूतसा ठाढ़ा । मेरे हृदय मान अति बाढ़ा ॥
मेरे विद्या गुण चतुराई । मैं सुन्दर छबि रूप निकार्ई ॥
मैं कुलीन उत्तम सब लायक । मेरो कर्म सकल मनभायक ॥
पुण्यते हर्ष पाप डर कापे । कर्म अकर्म आप शिर थापे ॥
जौजिव विधिनिषेध नहिं जानत । तौ कछु कर्म धर्म नहिं ठानत ॥
जानि बूझि करि है जो पापा । निश्चय ताहि नर्कदुःख व्यापा ॥
ऐसो मूढ कौन जगमाहीं । खरा खोट जो जानत नाहीं ॥
जो कोइ पुण्य पाप नहिं जाना । शिशुसमान निदौष बखाना ॥
जबते आदमको भो ज्ञाना । अहं भोगता करता जाना ॥ ॥
तबते परा कालको फांसा । पुण्यपापको व्यौरा भासा ॥
षटदरशन आतमको झगरे । न्यारे न्यारे मारग डगरे ॥
पीर पयंबरको मत न्यारा । एक विरुद्ध दुतिये व्यौहारा ॥
करतागति जो कोई लखिपावत । तौ काहेको झगर मचावत ॥
जिमि अंधरनमिसि चीन्हा हाथी । एक समान तासुके साथी ॥
मैं नहिं तू नहिं वह नहीं कोई । कहि नहिं जात ख्याल क्या होई ॥
जो मैं ही तो मोहि किन बंधा । पायौ ज्ञान गुरुकी संधा ॥
आप गुरु अरु आपै चेला । कहि न जात कुदरतको खेला ॥
दुतिया बिन कौ ज्ञान गहावै । ज्ञानते दुतिया नजर न आवै ॥
ज्ञान पाय दुतिया नहिं माना । दुतिया धौ मोहि माह डुराना ॥
अमीकुंडमें चिऊँटी डूबी । स्वाद पाय जान्यौ कछु खूबी ॥
कुंडको अंत न पावै कबहुँ । कोटिन गोता मारे जबहुँ ॥
अस विज्ञान गम्यको गहई । ताको पारावार न लहई ॥
१२५
जीवधर्मबोध
( २०३३ )
आपै भीतर बाहर बोले । बिरला साधु सो भेद टटोले ॥
देय दिलवै मागे जोई । सकल कर्मको करता सोई ॥
आपै देय आप नटि जाई । आपै चले आप हटि जाई ॥
सिद्ध साधु चकित है थकही । सतासत न कछु कही सकही ॥
स्वप्न अवस्था जब जिव परई । अपनी बस कछु कर्म न करई ॥
स्वप्नदशामें जाने सोई । यह सब कर्म आपनो होई ॥
जब जाग्यौ तब न्याय निबेरा । मेरो कर्म न सपने केरा ॥
चार अवस्थाके सब कर्मा । ऐसेहि जानि लेहु जिव भर्मा ॥
चहुँ अवस्था मिथ्या राचा । ताको कर्म होय कहँ साचा ॥
ऐसेहि ज्ञान अवस्था माही । सर्वकर्म मिथ्या दरसाही ॥
मैं नहिँ मैं मिथ्या अभिमानी । भर्मेते कर्म आपनो जानी ॥
संत सुजान यह मनहि विचारी । सब मद मान दूर करि डारी ॥
अहंकार है नर्क निसानी । भक्ति गरीबी जीव सुख दानी ॥
दोहा—जानि बूझि जो जड़ भया, आपको जानै नीच ।
सोई सबसे श्रेष्ठ है, ज्ञानगम्य तेहि बीच ॥
जाना नहिँ बूझा नहिँ, जो जड़ दशा गहाय ।
अज्ञानी मूरख सोई, सो न भक्तिपद पाय ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
दासको दीनता जब आवै ।
सो पद देव दास अपनेको शिव ब्रह्मा नहि पावे ॥
औरनको पूरा करि जाने आपको ओछ कहावे ।
अवधूतन ते सत कहत हो सो मेरे मन भावै ॥
एकै ब्रह्म सकल घट देखे दुबिधा दूर बहावे ।
इन पाँचोंसे तोरि सनेहा जब गोविंद गुण गावे ॥
( २०३४ )
बोधसागर
१२६
होय अधीन प्रेम लौलावै कुल अभिमान मिटावै ।
सहज शून्यमें रहे समार्ई पठिगुण सब बिसरावै ॥
गुरुकी दया साधुकी संगती भावभक्ति चितलावै ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन परमपद पावै ॥
कौन हमारे आये केशव क्यों न हमारे आये ।
पट रस व्यंजन छोटि रसोई साग विदुरघर खाये ॥
जहँ अभिमान तहाँ हम नहीं वह व्यंजन विष लागे ।
सोई मुनिजन पूरा कहिये अभिमानीको त्यागे ॥
जातिहीन जाके कुल नहीं है दासीको जायौ ।
ताकीट परिख्या तुम जायके बैठे कहा बड़ापन पायौ ॥
सत्यासत्यवचन कहो दुरयोधन सुनिले बात हमारी ।
विदुर हमारे प्रानसो प्यारे तुम विषिया बेकारी ॥
पुरातन कथा तुम्हारी हरिजी वनमें छाक मँगाई ।
ग्वालनके संग भोजन करते सो मति तुममें आई ॥
प्रेम प्रीतिके हम हैं भूखे अभिमानी नहीं भावै ।
कहैं कबीर साधुकी महिमा हरि अपने मुख गावै ॥
रामचंद्रवचन-चौपाई
सबहि मानप्रद आप अमानी । भरथ प्रानसम ते मम प्रानी ॥
वेद प्रमान आदि ओंकारा । सो करता सोई श्रुति सारा ॥
सो ओंकारको अर्थ बखानो । दीनता और गरीबी जानो ॥
जहँ दीनता गरीबी बसई । सबगुण ज्ञान ताहिमें लसई ॥
तौरे तो इञ्जील सोयी नय । आहि दीनता ज्ञान गुणनमय ॥
पुनि जन्बूर कहे सो हेता । दीनको प्रभु सोभा गति देता ॥
पुनि कुरानको सोई मत हेरी । ऊँच बोल है गर्दभ केरी ॥
गदहा पर ईसा चढ़ि चाले । सो दीनता धर्म प्रतिपाले ॥
१२७
जीवधर्मबोध
( २०३५ )
धन्य दीनता कह इञ्जीला । ताते हो जिव बंधन ढीला ॥
जूठी बेर सेवरी ल्याई । रामचन्द्र अति रुचिते खाई ॥
लक्ष्मन निर आदिरकर ताही । भिलनी जूठा हम नहिं खाही ॥
भई सजीवन बूटी सोई । लक्ष्मन प्रान बचायौ सोई ॥
पंडो यज्ञ जुरे ऋषि भूरी । स्वपचभक्त विन यज्ञ न पूरी ॥
जातिपातिकुलगुण अभिमानी । भ्रमत फिरे चौरासी खानी ॥
भगते भगवा भेष बनाये । शिव शंकर निज शीश चढ़ाये ॥
आदि भक्ति शिवजक्त प्रकाशी । भगवा भेष धरे संन्यासी ॥
भग पृथ्वीका रूप कहाये । तात भगवा वरन बनाये ॥
पृथ्वी तुल्य गरीबी आवै । संन्यासी जीवत मरिजावै ॥
बैरागी जो तिलक लगाई । ले मृतिका निजमाथ चढ़ाई ॥
आदम अघ तौ रेत प्रसंगा । कीनो प्रभुकी आज्ञाभंगा ॥
अदन बाहर आदन भैऊ । ताते प्रभु पुनि ऐसे कहेऊ ॥
खेहसे तेरी देह बनाई । जबलौ बहुरिन तेहि मिलिजाई ॥
तबलौं श्रम करिकरिके खैहो । अब नहिं अमृत फलको पैहो ॥
ताको ऐसो गहिये ज्ञान । जीवतही मिट्टी मिल जाना ॥
मुये तो सबही मिट्टी होता । पावै कर्म बीज यश बोता ॥
जीवतही लोधू मरजाना । यही सकल मतको परमाना ॥
चरनामृत अरु शीत प्रसादा । ताको आहि बड़ो मरजादा ॥
करिके कृपा साधु जो देही । दीनको शिष्य सेवक सो लेही ॥
ताको ऐसा अर्थ बिचारी । गहो गरीबी सब नरनारी ॥
बहुरि शिष्यसे भीख मंगवै । ताते तासु मान बिनसावै ॥
सुरगण जो अतिगुण गण धामा । आदमको कर दंड प्रणामा ॥
कारण यही तासुमें पायौ । प्रभु दीनताको श्रेष्ठ देखायौ ॥
कह आदम मिट्टीकी मूरत । कह इबलीस दीस शुचि मूरत ॥
( २०३६ )
बोधसागर
१२८
कह नारद ब्रह्मा सुत होई । कहब पुरा कैवर्तक जोई ॥
कहु सुख देवगर्भके योगी । कह नृप जनकविषयरस भोगी ॥
कह मूसा गुण ज्ञान निधाना । कह इबलीस दोजखी जाना ॥
बिनदी मतान जिव कोई तरिहै । करि सुकर्म भवसागर परिहै ॥
नानक शाह वचन
दोहा-नानक नन्हे हो रहो, जैसी नन्ही दूब ।
घास पात जरि जाहिगी, दूबखूबकी खूब ॥
सेख फरीद वचन
दोहा-फरीदा ऐसा हो रहो, जैसा करकख मंसीत ।
आठोपहरलताडिये, तेरीरब्बनालरह प्रीत ॥
सोरठा-धर्मसार यह जान, भक्ति दीन ता दिल गहे ।
तजि दीजै मदमान, होयपरम कल्यान तब ॥
तनमनधन गुरुअर्प, करनीकर गुरुद्वारनिज ।
बहुरि काल नहिं दर्प, प्रेमभाव पद पूजिये ॥
इति श्रीधर्मसार
अथ सर्वधर्मएकता वर्णन-चौपाई
एकै धर्म सकल संसारा । भिन्न भेदते दरसै न्यारा ॥
विषय अमृतमें दियौ मिलाई । ताते जिवकी सुधि विसराई ॥
सप्त पंथ तजि कुपुर कमावै । न्यारी राह जीवको भावै ॥
कहु तीरथ व्रत मूरति बताया । कहुमदमास हरामको खाया ॥
जारी जोर जुलुम कहु देखो । यक अछहको न्यारो लेखो ॥
उज्वल करनी सब देखलाई । तामें कहुक हराम मिलाई ॥
जबलों भोगकिआसा रहई । तबलों जिव हराम गतिगहई ॥
भोगकि इच्छा दिलसे त्यागे । तब जिव सत्य पंथमें लागे ॥
विषय विकारते मुक्ति न पावै । सतगुरु त्याग औरको ध्यावै ॥
१२९
जीवधर्मबोध
( २०३७ )
परम पुरुष पदको जब त्यागा । तब हराम कारीमें लागा ॥
जीव गँवायो ज्ञान कि थेली । तजि शुभकर्म करै बदफैली ॥
जौन विकार जाहि मत माहीं । तजि सब जिव निर्मल है जाहीं ॥
निज औगुणजब जिव पहिचाना । भर्म छाँडि शुभ धर्महि जाना ॥
हृदयमें जब उगे विवेका । तब सब जिवके मत हो एका ॥
सत्य पुरुषकी भक्ति जो गहेऊ । तजि विकार तब अमरसो भैऊ ॥
इति सर्वधर्मएकता
अथ ब्रह्माण्ड और पिंडकी एकता—चौपाई
यह ब्रह्मांड सकल है पानी । तामें अद्भुत ख्याल उपानी ॥
अण्ड पिंड दो उदधि अपारा । इन्द्रजाल तामें विस्तारा ॥
रच्यौ ख्याल यह बाजीगरको । अन्न लहेको भवसागरको ॥
अण्डाकार पिंड ब्रह्माण्ड । तामें सकल द्रौप नौखण्डा ॥
यह समुद्र है अगम अगाहा । भरमत जीव न पावे थाहा ॥
चौरासी लख गोता खाही । बूड़े उछले पार न जाही ॥
जिमि ब्रह्मांड समुद्र बखानी । तिमियह पिंडबून्दयकजानी ॥
सिन्धु बून्द दोनों यकरूपा । कहिनजाय अति अकथअनूपा ॥
सिन्धुमें बून्द बून्दमें सागर । जाने विनापन्यौ जगझागर ॥
जो कछु रचना सिन्धुमें परखो । ज्योंकीत्योंसोई बुंदमें निरखो ॥
वारिद बुंद विचार विलोका । दोनों द्वैधौ दोनों एका ॥
दोनों एक तुल्य है चोखे । विषय विकार दोहुनको पोखे ॥
इंद्रिन सहित दोहु एक सारा । दोहुमें एकै खेल पसारा ॥
ताते प्रथम पिंड गति जानो । पुनि ब्रह्माण्डको लेखा ठानो ॥
पिंड खेल जबलों नहीं लहई । अंडलेख तबलों कह कहई ॥
पहिले पिंड आपनो तरना । पुनि ब्रह्मांडके पार उतरना ॥
जाते पिंड तरो नहीं जाई । सो ब्रह्मा पार कह पाई ॥
( २०३८ )
बोधसागर
१३०
जबलों देह सत्यकरि जानी । तबलों पिण्ड तरे नहिं प्रानी ॥
आदिमें अण्ड रूप यक रहेऊ । हिरण्यगर्भ ताहीको कहेऊ ॥
हिरण्यगर्भ निज मनहि विचारा । द्रन्द्व खेल तेहि काल सँवारा ॥
हिरण्यगर्भ प्रजापति मेला । ताते खिला जत्तको खेला ॥
फूटा अंड भयो द्वै धारा । ताते द्रन्द्व जत्त हितकारा ॥
द्रन्द्वमता संसारहि मेले । नर नारी दोउ जगमें खेले ॥
दोनों मिले होय तब रचना । सकल स्वरूप ताहिसे खचना ॥
जिहि अवसर जिव भर्महि भंडा । जो कछु पिण्ड सोह ब्रह्मण्डा ॥
आपै लखे लखो सब जाई । आपहिमें सब सृष्टि समाई ॥
माया ब्रह्म मेल जब होई । यह संसार खेल तब होई ॥
माया दीख ब्रह्म नहिं दरसै । शून्य स्वरूप ताहिको षरसै ॥
बिंदु रुधिर दूनों हैं पानी । अंड पिंड रचनाको खानी ॥
बिंदु पिता लोहू है माता । श्वेत अरुण कहिये द्वै बाता ॥
यकभो द्रन्द्व द्रन्द्व जब टूटे । हैं अनन्त सब जगमें फूटे ॥
रुधिरसे तीन धातु प्रकटानी । चाम मासु अरु रुधिर बखानी ॥
तीन धातु नर विन्दुसे होई । हाड अरु गूद विन्द कह सोई ॥
माता तीन पिता मलतीनी । ताते जगकी रचना कीनी ॥
माताको सब कोई लखि पावै । पिता काहुकी नजर न आवै ॥
मातामें रह पिता छपाई । ताते कोई देखि नहिं पाई ॥
माता जबहि पिता बतलावै । तब कोई खबर तासुको पावै ॥
माताको अभाव जब होई । पिता दरस तब कर सब कोई ॥
यह दृष्टांत मैं प्रकट बखाना । मायामें हमि ब्रह्म लुकाना ॥
चाम मास लोहू है बाहर । हाड अरु गूद विन्द है भीतर ॥
माता जैसे पिता छपावै । माया ऐसे ब्रह्म दुरावै ॥
१३१
जीवधर्मबोध
( २०३९ )
माया ब्रह्म जीव कह आहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥
आपै खोजि आपको पैये । और कहा केहि खोजन जैये ॥
पिंड अंड दोनों यक लेखो । बाहर भीतर एकै देखो ॥
पग पाताल कहे सतइ महि । चरण पृष्ठ पाताल छठा कहि ॥
पद अंगुली सो कहे असुरगण । पदके नख असुरनके बाहण ॥
अष्टांलिग महातल पञ्चम । पेडीतलातल चौथ विरञ्चम ॥
ठेघुनी सुतल तीसरे कहिये । जंघको बितल दूसरो गहिये ॥
काल समय अथवा यज्ञ होई । पाव चलनको कहिये सोई ॥
भगसो अतलहै पहिली धरनी । लिंग ताहि प्रजापति बरनी ॥
वर्षा बीज नाम महि भनिये । महिते सो आकाशलो गनिये ॥
चूतर माथ सौ प्रभा प्रभाता । श्वेत रंग जो प्रथम लखाता ॥
मोट मास अथवा कह माया । सौ प्रदोष सन्ध्या बतलाया ॥
नाभी गंभीरता है जोई । क्षीर समुद्र बखानो सोई ॥
इत जठरा उत बडवा आगी । नसा जाल सरितागण जागी ॥
पेट सो भुवलोक पहिचानो । बालभोग लछु पल्लय जानो ॥
तृषा सो लछु पल्लय जग सोवन । हृदया स्वर्ग भूमि ऊपर भन् ॥
इत वैजन्ती माला जोई । उत लम्बादिक जाला सोई ॥
दक्षिण कुच यहि भांति बखाना । मांगनके प्रथम दे दाना ॥
बाम पयोधर ताहि कहीजै । दान याचना पीछे दीजै ॥
मन सोई गुण तीन मिलाना । रज सत तमगुण कीन प्रणामा ॥
मनसंकल्प सोई है ब्रह्मा । जग रचना जिन कीन अरंभा ॥
पोषण गुणसों वदे विष्णुवर । कोधहनन हंकार महेश्वर ॥
हास अनन्द सोई है माया । ज्ञान दुःख दंभ दूर कराया ॥
प्रानसो पौन पिष्ठ अपकर्मा । पीठ अस्थिहिमगिरि कह मर्मा ॥
पसुली इतर अस्थि गिर नामा । जो हिमगिरिके दक्षिण बामा ॥
दहनाहाथ सो दान अस वर्षा । बाम सूम तासुष्को तर्खा ॥
( २०४० )
बोधसागर
१३२
हाथ चीन्ह अप्सरा सुभाती । कर नख सो सुरगण बहु जाती॥
दक्षिण करबंध अरु निजतार्ई । लोकपाल देव अग्नि बनाई ॥
बाम जोड़कर जो अरु निजलो । अहं देव ईसान नामलो ॥
औरनिज सो कल्पद्वुम कहिये । आगे और भेद कछु कहिये ॥
दक्षिण कंध सो दांहना छोरा । वामकंध सो बायो ओरा ॥
गरदन मोठा वरुणदेववर । कंठसो महल्लोकके स्वर्ग ऊपर ॥
शब्दसो अनहद बुद्धि जो नीकी । महल्लोकके ऊपर ठीकी ॥
सो यम लोक बखानों ताहा । चितादुःखसे जगकी चाहा ॥
होटको ओष्ठ लोभको साजू । ऊपरको ओष्ठ हया अरु लाजू ॥
तालू पानी जिह्वा आगी । वचन सोई सरस्वती सुभागी ॥
दंतमोह जग पुनि कह भोजन । सब जग जीव करे जो भक्षण ॥
इतबानी उत चारों वेदा । हास्य सो माया रचना भेदा ॥
कानदो जक्त आठ विधि धारा । नाकपरा सो अश्विनी कुमारा ॥
देहगंध सो पृथ्वी योका । अधोतन दक्षिणपंचमयमलोका॥
अर्धदेह उत्तर जो हेरी । सो तपलोक षष्ठमो टेरी ॥
मस्तक बल सो नूर असलकह । आदि कि उत्पतिको सूरय वह॥
दृष्टि सदा जग उत्पति सारा । पलक मारन दिनरात उचारा ॥
दक्षिण दिशकी भृकुटी जोई । प्रीति देवता महतर सोई ॥
बाम और भृकुटी जो लस्ता । कहर कोध सुर कहे देवस्ता ॥
मस्तक सो तपलोक बखानो । सो जनलोकके ऊपर जानो ॥
शीस खोपड़ी लोकालोकू । सब लोकनते उपर विलोकू ॥
शिर कच महाप्रलय घनकारे । तनरोम नोक वनस्पति भारे ॥
रूप अनूप लक्ष्मी जाना । देहकार्ति रवि प्रभा प्रमाना ॥
महापुरुषको सोहैं गेहा । जगमें जेती मानुष देहा ॥
आतम चिदानंद करि मानी । खास महल पूर यतन ज्ञानी ॥
खास जबही नीचेको जाई । सारी सृष्टि तबै प्रकटार्ई ॥
१३३
जीवधर्मबोध
( २०४१ )
जिहि औसर बिच श्वासा रोका। हरा होय तब सब जग लोका ॥
जबहि श्वास ऊपरको खींचा। महाप्रलयहो सबकी मींचा ॥
दोहा-पिंड और ब्रह्मांडमें, रंच भेद नहीं वाद।
नानक सत्यकबीरको, अब सुनिये संवाद ॥
नानक वचन
तीन लोककी कहो गुसाईं। कैसे जानि परे तन माही ॥
कहीये दयासिंधु मोहि बानी। तुम निज पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जिंदा वचन
हेठ चरण दैं शीश अकाशा। तीनलोक देही प्रकाशा ॥
शब्द खंड ब्रह्मांडमें सोईं। माया ब्रह्म फैल घट दोईं ॥
हमरे पदको लहै न कोई। भले बूझ तुम पारख होईं ॥
नानक वचन
चार दिशा मोहि कहो गोसाईं। सातद्वीप निज कहो बुझाईं ॥
प्रभु नौरखंड अब कहो बखानी। चंद्रशूर तन कैसी मानी ॥
जिंदा वचन
आगा पीछा दक्षिण बाना। चार दिशा देही प्रमाना ॥
साठे तीन हाथकी देही। उनचास कोटि बिसियाहै पेही ॥
नवो खंड नौ संधी जानो। पिंड अंडको लेखा मानो ॥
परवत यामें हाड लगाया। धड पास ब्रह्मांड रचाया ॥
चंद्र शूर द्वै नेत्र जगावा। देखो पीठ सुमेर बनावा ॥
नसन दिया तन भीतर जानो। पेट गंडार पिंडमें मानो ॥
नानक वचन
तत्त्व प्रकार कही तुम वानी। वाकी शब्द संधि पहिचानी ॥
सातसमुद्र कहो बखानी। तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जिंदा वचन
जीभ नासिका नेत्र बखानो। श्रवण नाभ गुद इंद्री मानो ॥
( २०४२ )
बांधसागर
१३४
खार मीठ जल सब पहिचानो । नौसौ नदी पिंडमें मानो ॥
श्वासा नदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रस भाखा ॥
ये समुद्रमें जाय समानो । है गंडार नहीं त्रिसानो ॥
नानक वचन
सात समुद्रकी लहर बखानो । इनकी लहर कौन विधि मानो ॥
जिंदा वचन
काम अरु क्रोध लोभ हंकारा । मनमायाकी लहर अपारा ॥
अग्नि पौन पानी प्रचण्डा । पांच तत्त्व बतैं नौ खण्डा ॥
नानक वचन
बाही लहर हीरा अरु मोती । यामें कहा निकसि है सोती ॥
सभी भेद मोहिं कहु गुरुदेवा । नहिं छोड़ो अब तुमरी सेवा ॥
जिंदा वचन
जब गुरु मिलै भुङ्ग सम रंगा । ब्रह्मज्ञान उपजै सतसंगा ॥
सुमिरन भजन होय परकाशा । अनहद ध्यान पुरुषकी आशा ॥
अर्श गैवमें ध्यान लगावै । तवासिंधु थाह कोइ पावै ॥
जाय हंस तहैं डुबकी मारा । ले निकसे तब वस्तु अपारा ॥
हीरा लाल नाम परकाशा । शब्द सुरति हंसाको बासा ॥
कथा समाज निकसिहै ज्ञाना । सो हीरा मणि माणिक जाना ॥
नानक वचन
खार मीठ जल इहां अपारा । उहां कहाँ गुरुकर निर्धारा ॥
जिंदा वचन
नयन नाक इन्द्री जल खारी । गुदा श्रवण जानौ जलधारी ॥
खार मीठ जल सभी भरा है । जो ब्रह्मांड सो पिंड कहा है ॥
नानक वचन
इहां है काठ लोहकी नौका । कहो स्वामी व्यौहार वहांका ॥