कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
११
जीवधर्मबोध
( १२१२ )
अबिरहामके जो संताना । निजु गोला गोली करि जाना ॥
मूसायें प्रभु सो गुन खोला । ईश्वर बना तासुको गोला ॥
फिर ऊबर मूसा है जाई । मानमर्दके गर्द मिलाई ॥
सोरठा-एक गृही यक साधु, दोय पक्ष है जीवको ।
यक संग्रही उपाय, एक रसिक निजु पीवको ॥
निज निज धन सुखहेतु, दोनों उद्यमको करे ।
होय सजग चित्त चेतु, जेती बुद्धि विवेक जिहि ॥
कृपा जो करे करतार, पूर्ण होय मनकामना ।
यह धन वह भवपार, जैसो जाके आगमें ॥
दोहा-ग्रहीके धन अधिकात जब, तब तेहि कहे अमीर ।
अधिक अधिक धन बितलह्यौ, कह्यौ अमीर कबीर ॥
जबहि अमीर कबीरमें, तामें किन्न समाय ।
यथा दर्ब दिन दिन अधिक, तथा किन्न अधिकाय ॥
किन्न अधिक अधिकान जब, तब लाग्यौ बलकान ।
बलकत बलकत अंत भो, आप किब्रिया जान ॥
आप किब्रिया जान जब, गह्यौ ज्ञान शब्दाद ।
भूपर मोहिसम नहीं रहा, हरि ऊपर कर वाद ॥
प्रथम अमीर कबीर भो, पुनि अकबर अछाह ।
सो कबीर अकबर सोई, कहे किब्रिया ताह ॥
अछह जब बनि बैठिऊ, पहुँची तिनकी मौत ।
दोजखमें दाखिल भये, सेन सहित भै फौज ॥
जगमें भये कबीर बहु, जो लागे गहि तीर ।
आप तरे जग तार जो, सोई साच कबीर ॥
जिन जिन धारचो किन्न उर, टूटचौ सबको शीश ।
जासु किन्न टूटे नहीं, परम पुरुष जगदीश ॥
( १९२० )
बोधसागर
१२
जाको किन्न अघट्ट रह, तीन काल युग चार ।
ताहीको सब ठट्ट है, हट्ट लगी पन सार ॥
जिन जिन शीश उठायऊ, टूटचो सबको किन्न ।
सत्यकबीरको किन्न जो, सदा एक रस तिन्न ॥
श्रीमुख सत्यकबीर कह, किन्न जाहिमें दीप ।
मोड़ा तेहि छोड़ो नहीं, तोड़ो ताको शीश ॥
किन्न सहित जब जोय नर, होय नहीं तब खैर ।
परे किन्न या संगमें, याहि ढंगते बैर ॥
वैर किन्नियासे भयौ, गयौ नरक जिव सोय ।
कुशल कौनि विधि तासुकी, रिपु जाको हरि होय ॥
जासु किन्निया नाम है, किन्न ताहिको सोह ।
और किन्न जो कोइ गहे, ले कबीर सँगलोह ॥
धनवितकों यह अंत है, सत विचारो जाहि ।
सो धन पर हंकारकर, अहं दुःखद सब आहि ॥
जैसे गृहीकी कथा, कहति निककीरकी आहि ।
जब फकीर गुनज्ञान गह, तब हकीर कह ताहि ॥
घर घर मांगत भीख जो, दरदर होत हकीर ।
कोई गालीदे मार कोई, तनक न तन मन पीर ॥
अथ हकीरको तुच्छ है, कुछ रहौ नहीं मान ।
अधिकते अधिक हकीर भो, तब साहिब पहिचान ॥
तब साहिब पहिनेऊ, फना कियौ तब आप ।
गना आपके कुछ नहीं, तन मन धन लखि पाप ॥
अंत हकारत जब भयौ, तूही तू तब टेर ।
जहँ तहँ देखो तूहि तू, मैं नाहीं कहु हेर ॥
मैं नाहीं जब ही रहौ, कहौ तूहि तू सर्व ।
१३
जीवधर्मबोध
( १९.२१ )
जल थल वायू व्योममें, तुही व्याप सब दर्ब ॥
तूही भू जब देखेऊ, रहा कतहुँ नहिं आप ।
आप आप में रमि गयौ, पुनि दुतियाकिन थाप ॥
दुतिया गयौ गवाय जब, सिंधुमें बूंद समान ।
गहे गरीबी संत जब, अंत दुःख तब जान ॥
जब हंकार अतिशय बना, धन्य फकीर है सोय ।
किन्न तकबुरके गहे, गयौ धनिक सब खोय ॥
यथा फकीर हकीर भो, गूही अमीर कबीर ।
दोहु गुन दोष बिचारके, जीव तरे भवतीर ॥
इति अहंशब्द
अथ कामवर्णन—चौपाई
अहंते तम तमते आकाशा । तमते त्रिगुणतत्त्व परकाशा ॥
गुण प्रकृतमय तत्त्व जो पांचो । जगके अस्तंभन ये सांचो ॥
प्रथम अकाश है पंच प्रकृतमय । काम अरुकोध लोभमोहमय ॥
प्रथम कामको यह गुन जानू । दहन ज्ञान बन कठिन कृशानू ॥
स्वसंवेदमें प्रथमहि कहेऊ । ज्ञान गोप जब जिवको भैऊ ॥
तब निज सम्मुख दृष्टि उठाई । झाँई रूप नजरमें आई ॥
सो झाँई नारी तन गहेऊ । ताके संग भोग जिव कियऊ ॥
पुरुष छाहते प्रकटी नारी । सो भ्रम रूप जक्त विस्तारी ॥
जबलों नारि पुरुषकी चाह । तवलों नहीं कर्म कुल दाहा ॥
अपनी छाहते करे लड़ाई । भ्रम कटि जूनिनमें भरमाई ॥
सोई कहो जक्तकी जननी । परम रूपके ज्ञानकी हननी ॥
वृद्ध जक्तकी कामते आही । बुद्धि विवेक तहां कुछ नाही ॥
कामविश जिव हो जिहिबारा । ताके हृदय न रहौ बिचारा ॥
( १९२२ )
बोधसागर
१४
ताको गुन यह प्रकट देखावो । आवा गौनको लेख लगावो ॥
प्रथमहि दृष्टि दौरि जब जोई । नारि देखि केहि यह हरषाई ॥
जब नर ताहि निकट नियराया । कुचनके ऊपर हाथ चलाया ॥
कुचनको जब निजु करते परसा । अधिक मोद मनमें तब सरसा ॥
कुच नहिं भोजन पात्र पयोधर । अधिक प्रीति मानुष ताते कर ॥
प्रथमहि भोजन पात्र टटोले । आवागौन राह पुनि खोले ॥
तिहि मारगमें जब जिव धसेऊ । पुत्र होय पुनि बाहर खसेऊ ॥
भर्ता है तिहि मारग पैठा । पुत्र होय पुनि बाहर पैठा ॥
भोजन पात्र टटोल जो पहिले । बालक है भाजन सोह गहिले ॥
भोजन भाजन भायां माता । पुरुष पुत्र एकै द्वै बाता ॥
भीतर बाहर पैठे निकलेरे । आवा गौन आपनो सकरे ॥
मनते मनमथ भयौ प्रचंडा । महाकाल सत सो बरिबंडा ॥
पांचवान सो निज कर लीने । सकल जीव अपने बस कीने ॥
दोहा-मोहन मारन बसकरन, उच्चाटन उनमाद ।
पांच बान ये काम गह, तिहु पुर परा विषाद ॥
भवसागरमें आयके, कोइ न भयौ समरत्थ ।
यक कंचन यक कुचनपर, को न पसारचौ हत्थ ॥
कुंडलिया
भवसागरमें आनिके, भै कबीर समरत्थ ।
कंचन कुचन दोहूनपै, सो न पसारचौ हत्थ ॥
सो न पसारचौ हत्थ, आप कमला चलि आई ।
चित चंचलावनहित, कीन सो विविध उपाई ॥
कीनेसि विविध उपाय, कबीरको मन किमिहाली ।
है निरास श्री तास, बहुरि बैकुंठहि चाली ॥
१५
जीवधर्मबोध
( १९२३ )
चौपाई
कोई है पती पयोधर पकरे । कोई बनि पुत्र ताहिंते टकरे ॥
भरता पुत्र होय नहिं दोऊ । सत्य कबीरते और न कोऊ ॥
नारिके बसमें सब संसारी । रचना तिहु पुरमाह पसारी ॥
भवसागर भगसागर जानी । भवके करता भव रु भवानी ॥
तीनों पुरको ईश कहाया । जिन भगचौरके राह बनाया ॥
भगके रुधिरते भगवा भेषा । देव निरंजन अकथ अलेपा ॥
उज्ज्वल भेष पुरुषको बाना । भगवा भेष निरंजन राना ॥
अंग पिंड भग माह समाना । सत्य कबीर बचन परमाना ॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥
ताहि तियहि भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिवो अंता ॥
लिंग रूप यक शंकर कीना । धरती खिला रसातल दीना ॥
भा बालक भग द्वारे आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥
अबला सम कहुँ बली न कोई । तीन लोक ताकी बस होई ॥
अष्ट प्रकारके मैथुन अहई । ताते न्यारा कोह न रहई ॥
दोहा-श्रौतो सुमिरन कीर्तनो, चितवन बात यकंत ।
हठसंकल्पो रत्न पुनि, प्रापति अष्ट कहंत ॥
चौपाई
मिथुन विकार जीव सब पागा । जरे तीन पुर तिय अनुरागा ॥
जेती जगमें कथा किहानी । नारिप्रताप सकल से जानी ॥
जबलों रहैं देहको खेला । तबलों हो नारी सँग मेला ॥
नारि परे जो जाना चहई । ताकी देह तहां नहि रहई ॥
भग भोगै अरु भक्त कहावै । फिर फिर भगभोगनको आवै ॥
जड़ चेतन दोउ नारि स्वरूपा । कनक कामिनी जिव भ्रमरूपा ॥
विषकी बेल दोहूको जानी । लगे ताहिमें जिव अज्ञानी ॥
( १९२४ )
बोधसागर
१६
महामहाऋषि मुनि छलि मारा । यह मनोज पापी हत्यारा ॥
तप जप सकल अष्ट करि दीने । ज्ञानी ध्यानी निज बस कीने ॥
छंद माधवी
सूखे पत्र अहार अरु पौन भपे । धृत धर्म परासरके सरके ।
दृग जोहनि मोहनि रूपमहा, मनमोहित नाहरके हरके ॥
विधि नारद चंद स्वच्छंद भये, हृदया बजरोधरके धरके ।
अस कौतुक भो जो मन दौन कियौ, सब जी भवसागरके गरके ॥
चौपाई
साध सिद्ध चल वनमें भागी । जाय नारि तिनके सँग लागी ॥
मौनी होय बसै गिरकंदर । बसै नारि तिनके डर अंदर ॥
मैथुन अष्ट तबो नहिं जाई । ताते विकल सकल ऋषिराई ॥
बाहरको विकार जो त्यागे । पुनि अंतरको दुःख दौ दागे ॥
इन्द्री मर्दके गर्द मिलाई । तऊ साधुको काम सताई ॥
जतन अनेक करे ऋषिराई । विजय मार पर ताऊ न पाई ॥
जस नट मरकट खेल खिलावै । तथा मनोजभव जीव नचावै ॥
नारिके बसन आभूषन ओरा । साधु कबहु न निजु दृग जोरा ॥
नारि चित्र कागज मूरत गन । ताहि न सन्त लखै निजु नैनन ॥
निरखै ध्यान आव सो मूरत । चढ़ै काम पुनि ताहि विमूरत ॥
नारि पुरुष जिमि घरमें रसहीं । ताके निकट साधु नहिं बसहीं ॥
कामकलोल करे पशुखग जहैं । साधु न कबहुँ दृष्टि डारे तहैं ॥
मदन विकार अनेक विधाना । सो सब त्यागे ज्ञान निधाना ॥
जब लों यह विकार दिल दागे । तब लों ज्ञान किरिन नहिं जागे ॥
कामकरे जिहि औंसर अंधा । करे जीव कछु उलटा अंधा ॥
छन्द-रतिनाथ भाथ जो हाथ गहि, निजु सुमनसरसंधानेऊ ॥
तजि नीति गह बिपरीत रह, नर धर्मबंधन भानेऊ ॥
१७
जीवधर्मबोध
( १९२५ )
चैतन्यमे जड़ रूप जड़, चित चेत निजु उर आनेऊ ।
शृंगार साजन लाल कहुँ, कुसु कानिकौ मन मानेऊ ।
इति काम
अथ क्रोधवर्णन-चौपाई
द्वितीये क्रोध महा बलवंता । सोसमस्त शुभ गुनको हन्ता ॥
जाको देखि बुद्धिवर कम्पत । रहै न निकट भाजिहो चंपत ॥
महा काल यह क्रोध उचारा । यह खल प्रकट होय जेहिबारा ॥
धर्मको लेश रंच नहीं रहई । यह अपराधी जप तप दहई ॥
प्रलय करे सतगुनहि विडारा । आप दाहि और न दुहि डारा ॥
वर्षहजार जो सुनि तप कीने । पलमें क्रोध अष्ट करि दीने ॥
नरकवास सुनि बरहि पठाई । कतहुँ न रही ज्ञान गहिराई ॥
तप जप कहाँ क्रोध जब होई । जिवको निश्चय नरक विगोई ॥
सकल धर्मकी धूल उडावै । क्रोधको अंधकार जब आवै ॥
अहंकार क्रोधादि विकारा । तुच्छ जीवमें अधिक निहारा ॥
कीडा एक रहे घासनमें । ऐसो क्रोध ताहिके मनमें ॥
जो कोई ताको परसे जाई । महा-क्रोध ताके उर छाई ॥
क्रोधितहै अस मनहि विचारी । छूवन हार को डारो मारी ॥
कूदे उछलै जो रन चलई । आपको अबल जानिके टलई ॥
इति क्रोध
अथ लोभवर्णन-चौपाई
तृतीये लोभकी कथा बखानी । शुभ गति लहै न लोभी प्रानी ॥
लोभी निशदिन माला फेरा । ताको पार होय नहीं बेरा ॥
सूम है नरक केर अधिकारी । जपतप कियहु न जन्म सुधारी ॥
लोभी जीव जेते जग माहीं । नरक हेत सबही सो आहीं ॥
लोभ ते शुभ करनी नहीं भावै । सोई सब अघकर्म करावै ॥
( १९२६ )
बोधसागर
१८
सो नरपर कलियुग को बासा । तेहि प्रिय कीने बुद्धि विनासा ॥
सोई दुष्ट सब करे अकाजा । प्रीछित धर्म-धुरंधर राजा ॥
ताहूको सो बुद्धि बिगारा । कञ्चनपरकलि आसन धारा ॥
धर्म महम्मद करे बखाना । सोरनको भागी शैताना ॥
गहि कर कञ्चनदृग न लगाये । चूमि ताहि पुनि कह गोहराये ॥
कञ्चनसे जो प्रीति लगाई । सो नहिं भगवत भक्ती पाई ॥
सो लोभी इबलीसको बन्द। निश्चय परे ताहिके फन्द। ॥
पुनि ऐसो इबलीस पुकारा । साधु सूम है मित्र हमारा ॥
सूम साधु जो जप तप करई । लोभ समस्त कृपा संहरई ॥
तैसे पापी दाता जोई । परमशत्रु मेरो है सोई ॥
जो कछु पाप करे सो दाता । दान किये सो सकल निपाता ॥
सो शैतानके वश नहिं परई । दाता कोटि पाप जो करई ॥
दोय वृक्ष द्वै ठौरमें देखा । यक औदारता लोभ है एका ॥
दानवृक्ष वैकुण्ठमें बरनी । गड़ी तासु जड़ ताही धरनी ॥
साष तासु दुनियामें आई । नरहित हेत सो दियो झुकाई ॥
जो कोई पकरे साष सखावत । सो निश्चयविहिशतको जावत ॥
साष सखावत पकरि जो रहई । अघ औगुन सब ताको दहई ॥
नवीन प्रसंशिके बचन सुनावै । सखी अवश्य मेरे ढिग आवै ॥
ऐसहि लोभवृक्षकी लड़ है । घोर नरकमें ताकी जड़ है ॥
साष तासु जगमाह झुकाई । जो कोई गहै नरकमें जाई ॥
शुभ करनी सब तासु नशावै । सूमको दौजरमें पहुँचावै ॥
सब धर्मनको मत है एहा । लोभी करे नरकमें गेहा ॥
अथ मोहवर्णन-चौपाई
चौथे मोह महा दुःखदानी । भव भोगनकी यही निशानी ॥
ता पिता सुहृद परिवारा । सगे सहोदर सह सुत दारा ॥
१९
जीवधर्मबोध
( १९२७ )
प्रथमहि मातु पिताकी मोहा । अंधभो जिमि काई लग लोहा ॥
जिहि औसर घरनी घर आई । मातु पिताकी प्रीति भुलाई ॥
परम प्रीतमा नारी अहई । बाधिन यथा गरासन चहई ॥
मधुर मधुर बोलै सुसकाई । महा ठगिन जिव ज्ञान ठगाई ॥
हने जबहि सो काम कटारी । सरवस छीन लेय सो नारी ॥
ताते प्रकट भये जो पूता । पूत नहीं आयो यमदूता ॥
मधुर बोल बोलै मन हरही । दिन दिन अधिक प्रीतिपितुकरही ॥
पुत्र कि मोहमें जन्म गँवाये । ताते कबहुं न छूटन पाये ॥
ताकी मोह भयो जिव अंधा । चला अंतको यमपुर बंधा ॥
पुत्रसे कहो कौन सुख पाया । झूल गड़े जड़ मूल नशाया ॥
जन्मतही युवती हरि लीनो । युवा भये तब धन वित छीनो ॥
मूयहुपर कपालको फोरा । मा यह सुत धौ वैरी मोरा ॥
शत्रुको सदा मित्र जग जाना । मूढ़ नहीं चेते विन ज्ञाना ॥
मेरो मेरो कर अज्ञानी । ममतामें भूले सब प्रानी ॥
मोर तोर कहि जन्म गँवावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥
बन्धु मित्र अरु संगे सखागन । सो समस्त है भक्तिके दुश्मन ॥
इन्है पेलिके हरि यश भनिये । प्रीति कबहुँ मति ठगनते ठनिये ॥
छन्द पद्मिनी
दशदिश देख बहु दृष्टि पसार । कोई नहिं तेरो यहि संसार ॥
मातु पिता स्वारथ हितकार । सुतदारादि सकल परिवार ॥
कोई न तेरो उबारनहार । सब मिलि तोहि नरकमें डार ॥
ताते तजो सकलकी प्रीत । यह दुनिया मतलबको मीत ॥
जिहि औसर स्वारथ ना होय । तेरो संग करे नहिं कोय ॥
बुद्धि विचारि विलोक विलोक । यह जग जान महाठग होय ॥
ठगसे प्रीति किये धन खोय । लहे अमरफलको विष जोय ॥
( १९२८ )
बोधसागर
२०
क्यों नहीं चिन्तामनि चित्चीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥
जठर अग्निते तेहि जो बचाय । काहे ताको दियो भुलाय ॥
महा दुःख जब घरे आय । संकटमें सो करे सहाय ॥
भजु तेहि जन्म सुफल है जाय । परमहंसकी पदवी पाय ॥
ताकी कृपा चलो यमजीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥
इति मोह
अथ भयवर्णन चौपाई
पंचम भय बटमार बड़ेरा । जो गहि जीव नरकमें गेरा ॥
भयवश तपी न जपतपकरहीं । भयते कायर घरमें मरही ॥
भय करि शूरा करे न करनी । भय करि सती न अग्निमें जरनी ॥
भय कीने शुभ कर्म न होई । भय करि शुभगति लहै न कोई ॥
भयकरि विद्याबुद्धि की हानी । भय भ्रम करि भमें चहुँखानी ॥
पांच वर्षका वय ध्रुव पाया । तप कारन सो वनाहँ सिधाया ॥
मिले ताहि नारद ऋषिराया । विविधि भांतिसे भय दिखलाया ॥
कानन महाभयावन कहेऊ । ध्रुवके हृदय न भय कछु गहेऊ ॥
बनमें जाय गूढ़ तप ठानी । रंच न सो मनमें भय मानी ॥
तपकरि हरिहि लियो प्रकटाई । धन्य धन्य ध्रुव धन्य कहाई ॥
जिनको हृदया भयते पूरा । तिनमें कबहुँ न साहस जूरा ॥
दोहा—पंचप्रकृति आकाशकी, कीने कछुक बखान ।
एकते एक महाप्रबल, सकल नरककी खान ॥
इति भय
चौपाई
पंच प्रकृत आकाश बखानो । पंच बहुरि बागूको जानो ॥
पंच अग्नि जलकी है पांचो । धरती पंच प्रकृति उर जांचो ॥
यही जीवको बंधन करही । इनहींते देही थित धरही ॥
२१
जीवधर्मबोध
( ११२९ )
तेहि सर्वथा अभाव जो कीजै । तब कैसे निज देह धरिजै ॥
पै अभाव कीजै गुरु द्वारे । तब जिव अपनो काज सँवारे ॥
पुत्र अकाशको बायू होऊ । पिता समान शून्य है सोऊ ॥
बायू बेटा अग्नि बखानी । सो तद्रूप तातके जानी ॥
तासुत जल जलते यह धरनी । ये सब सन्न एक सम उरनी ॥
शून्य अकाश शून्य तिहु गुन है । तम अरु अहंकार सब सुन है ॥
पुत्र पिता परपिता सहीते । सर्व सुन कहु सार न चीते ॥
शून्यको रचित देह यह अहई । शून्य सर्वथा ताको कहई ॥
शून्यकि कृपा सूत्र सब जानो । शून्य सर्वसंसारहि मानो ॥
तन मन धन सब शून्य बताओ । नाम रूप गुन शून्य कहाओ ॥
सो तन मन धन गुरुको दीना । नाम तासु बदले गहि लीना ॥
शून्य जो दीना शून्यहि लीना । कहो कहा कारज निज कीना ॥
शून्यहि दीन जो सूत्रहि पाया । तेहि व्योहार हाथ क्या आया ॥
है परंतु कारण तह एका । तामैं लहो भिन्न कछु लेखा ॥
निश्चय नामहु शून्य विचारी । तामैं है कारज यक भारी ॥
नाम डोरि हटु गहि जो कोई । शून्य पार पथ पावै सोई ॥
शून्यकि पारपंथ जब पावत । बहुरि शून्यमें सो नहि आवत ॥
शून्य रूप भवसागर धारा । अंड पिंड सब शून्य सँवारा ॥
अमकरि शून्यमें खल प्रकाशो । जस मृगजल मरुथलमें भासे ॥
फेन बुदबुदा वारि तरंगा । वायु प्रसंग बनावहु ढंगा ॥
जेहि औसर वायू नहि चलही । गलके सकल मिले तोह जलही ॥
जल विकार सब जलहै जैसे । माया ब्रह्म जीव यक तैसे ॥
अम करि नाम धरे बहु डोरा । एकब्रह्म तजि कतहु न औरा ॥
जेहि औसर जिव सोलखि पावै । एकै माह अनेक समावै ॥
दृश्य अनेक जो एक समई । पिंड अंडकी थाह सो पाई ॥
थाह पाय जब जीव थिरोना । तब जान्यौ हो चारु चिरोना ॥
नं. ११ बोधसागर - ६
( १९३० )
बोधसागर
२२
मैं हो आदि मध्य अरु अन्ता । मोहि फुराफुर वेद बदन्ता ॥
पक्की तत्त्व देह जब पावै । तबनिजुघरजिव बहुरिके आवै ॥
पक्की तत्त्व प्रकृत पच्चीसा । स्वसंवेदकी विधि जो दीसा ॥
ताको गह कच्चीको त्यागे । ऐसे योग युक्तिमें लागे ॥
तनकी कृपा योग अष्टंगा । ताको तज भज मनको अंगा ॥
मन अष्टांग योग उरधारो । स्वसंवेद जाको निरधारो ॥
तनकी कृपाकाज नहीं सरही । मन करनी जिवपार उतरही ॥
मनको रचित सकल संसारा । हो निवृत्त जिव मनके द्वारा ॥
तन मन यद्यपि मिथ्या दोई । मन करनी अति उत्तम होई ॥
तन है जाय आपनी बसमें । जेहि औसरआवै मन कसमें ॥
तन मन दोनों बश है जाई । तब निज रूप नजरमें आई ॥
ऐसे साधु जो जगमें आही । हरि ब्रह्म शिव ध्यावै ताही ॥
ताकी गतिको सके बखानी । लखे न शारद वेद अरु बानी ॥
मौनीजि वचन विचार माला
दोहा—स्वसंवेद नहीं कहि सके, लक्षण सन्त महन्त ।
परसंवेद कहे कष्ट, संग प्रताप कहंत ॥
चौपाई
जिनकी गति अगम अगाधू । बानी वेद पारसो साधू ॥
स्वसंवेद गुण तासु न कहई । तिनको भेद जीव किमि लहई ॥
समदृष्टि सो साधू ऐसे । सोई ब्रह्म रूप मैं पैसे ॥
काहू नहीं सो दुःख दुःखावै । जिनकी दृष्टिमें साहेब आवै ॥
को हिन्दू को मुसलमाना । को ब्रह्म केहि श्रद्ध बखाना ॥
कौन यहूदी कौन नसारा । एकै ब्रह्मको सकल पसारा ॥
रह्यौ चराचरमें सो पूरी । जाहि लखे हो सब दुःख दूरी ॥
आप आप लख ब्रह्म सनेही । जहाँ तहाँ देखो नेरी देही ॥
२३
जीवधर्मबोध
(१९३१)
मोहितजिऔर कतहु कोइनाही । अमकरि भिन्न भाव दरसाही ॥
मेरो मन अरु तन सब मेरो । तनमें मन मनमें प्रभु डेरो ॥
लखे अलखगति झगरा टूटा । जीव काल बंधनते छूटा ॥
अपनी देह सकल जग जानी । ताते सबहीको सनमानी ॥
काहूको नहीं करे निरादर । सब कोइ ओढ़े मेरी चादर ॥
स्वर्ग नरक मृत आपै आपा । जैसो कर्म तहां ले थापा ॥
सबदिल महल वहां प्रभुको है । आपै आप सर्वमें सोहै ॥
काहूको अनभल नहीं ताका । निजु अनभल ताते परिपाका ॥
औरको अनभल ताके जोई । अनभल अवश्य ताहिको होई ॥
एक मोगल क्रमकरे जो बनियां । तेहिदिग रह यक वैललदनियां ॥
मोगल परोसी धोबी रहई । लादनको एक गदहा गहई ॥
जिमि औसर खर करे पुकारा । मोगल दुखित होय तेहिबारा ॥
प्रभुसे नीति अस विनय उचरई । यहि धोबीको गदहा मरई ॥
यकदिन ऐसे कारन भयऊ । वैल मोगलको तब मरि गैऊ ॥
तिहि औसर मोगल गहि रोषा । परमेश्वरहि लगावै दोषा ॥
केते काल खुदाई कीना । गदहा बैल अजौ नहीं चीन्हा ॥
ऐसेहि सकल जीव अज्ञानी । प्रभु कह दोष लगावहि प्रानी ॥
सो नहीं दोष लगावन योगा । सबजिवनिजु२क्रमफल भोगा ॥
परभल किये भला हो अपना । निश्चय यह प्रमाण करिथपना ॥
जो काहूको कछु दुःख देई । सो दुःख अवश्य आप शिरलेई ॥
जो सबला अबला दुःखदानी । सो दुख अपने सिरपर आनी ॥
मांसरुधिर जिन जाको चाखा । परगल काटि आपसुख राखा ॥
औरकोशिरनहिनिजु शिरकाटा । अपनो तनकर बारह बाटा ॥
कोटिन यतन करे किन कोई । बदला अमिट छुटै नहीं सोई ॥
( १९३२ )
बोधसागर
२४
सत्यकबीर वचन-शब्द
अपनो कर्म न मेटो जाई ।
कर्मको लिखा मिटै घौँ कैसे जो युगकोटि सिराई ॥
गुरु वशिष्ठ सुनि लगन सोधाई सूर्य मंत्र यकदीना ।
जो सीता रघुनाथ विवाही पलयक संचन कीना ॥
तीन लोकका करता कहिये बालि बध्यौ बरि पाई ।
एक समय ऐसी बनि आई उनहू औसर याई ॥
नारदसुनिको बदन बिगान्यौ कीन्है कपिको रूप ।
शिशुपालकी भुजा उखारी आप भये हरि टूँटा ॥
पारवतीको बांझ न कहिये ईश न कही भिखारी ।
कहै कबीर करताकी बातें कर्मकि बात है न्यारी ॥
चौपाई
मेरो कर्म मोहि दुःख देता । जाने बिना भये वश प्रेता ॥
बदला भोगे आदि भवानी । बदला हरि हर अयशि आनी ॥
बदलाके कारन जिव झारी । भोगे दुःख भये संसारी ॥
दिल दुःखाव मति काहू कैंरो । सब तन अपने तन सम हेरो ॥
सबको दुःख सुख एक समाना । एकै रूप रूप सब जाना ॥
एकै रूप अनेक बरन है । एकै इन्द्री एकै तन है ॥
मनु सतरूपा वेदमें कहेऊ । सोई सकल रूप निजु गहेऊ ॥
चौरासी लख योनि उपानी । एकै अंग न और बखानी ॥
सबमें रमा सो अकथ अनूपा । सबको जानो मनु सतरूपा ॥
मनु सतरूपा आपै साहेब । देखि परे जगमें नाना ढब ॥
आदि पिता सबजग जिन हेरा । सो समदृष्टी सन्त बडेरा ॥
निर्वासनिक आदि ओंकारा । हिरनगर्भ वासना जो धारा ॥
भई वासना जगको कारन । दोय स्वरूप कीन तब धारन ॥
सुमिरनबोध एवं ग्रन्थ समाप्ति
२५
जीवधर्मबोध
( १९३३ )
हिरण्यगर्भ चित्ताह जो चाली । एक चना कीना द्वे दाली ॥
नारि पुरुष मिलि द्वन्द्व मचाया । ताते रचना राम रचाया ॥
स्वामी एक एक भे दासा । करे एक दूजाकी आसा ॥
वासना जब निवृत्त है जाई । स्वामी सेवक तब मिलिजाई ॥
जैसे प्रथम भयो द्वे ढंगा । तैसे दोनों होय करंगा ॥
सकल वासना लियौ बटोरी । द्वन्द्व खेल तब कतहु न हेरी ॥
मन इन्द्री कछु रहा न बाकी । निश दिन होय ब्रह्मकी झांकी ॥
जस प्रथमै रह अंडकि गोली । तस है बहुरि वचनको बोली ॥
तन मन इन्द्रीकी गम नाहीं । परम रूप रमि अलख कहाहीं ॥
लखै न कोई अलख गुरु देवा । जाने बिना करे सब सेवा ॥
जब जान्यौ तब सेवा नाहीं । मैं तू तह तब कछु न रहाहीं ॥
मोहिमें तूमें तोहि समाना । एक भयौ नहि दुतिया जाना ॥
सकल वासना मनते हरई । पारब्रह्म जब दाया करई ॥
ब्रह्मके खोजी साधो भाई । कैसे ब्रह्म की खोज बताई ॥
भजनानन्दी संत सुजाना । ब्रह्म सर्वमय पूरण जाना ॥
जाना तौ पै मिले न ताही । बिना मिले कछु सुख है नाहीं ॥
जैसे नारि पुरुष बर होई । एक दूसरो जाने सोई ॥
जानेते कछु सुख नहि सरसे । नारि पुरुष जबलों नहि परसे ॥
अरश परशते सुख सरसाना । तब मनहीमनमें सुखसमाना ॥
कहे कहा सो कहो न जाई । निज सखियनते सैन बुझाई ॥
सखीकि सैन सखी कोई बूझे । पियामिलनको सुखजेहि सूझे ॥
और कोई जो पूछे जाई । चुप है रहै तबै मुसकाई ॥
ब्रह्मको सुख जो कोई लहई । गूँगा होय न सो कछु कहई ॥
लून पूतली निज मनठाना । सागर थाह लेनको जाना ॥
जलमें पैठत जल है जाई । ताकी खबर कहै को आई ॥
( १९३४ )
बोधसागर
२६
कीट पतंगसे पूछे बाता । दीपक गिरे कौन सुख आता ॥
तेहि पतंग अस वचन सुनावो । तुमहि दीप ढिग चलि सुख पावो ॥
कीट तबहि दीपक नियराया । पुनि पतंग ढिग सो चलि आया ॥
आय पतंगसे वचन सुनाई । मैं कछु ज्योति स्वाद नहीं पाई ॥
तेहि पतंग बोला चिछाई । तैं किमि ज्योतिके सुखको पाई ॥
अरे मूढ संसारी कीडा । तोहि न व्यापी तन मन पीडा ॥
सुख पतंग आसिक सो जाना । दीपकमें जो धाय समाना ॥
तू तो फिरा देखिके आगी । जाने कहा मूढ दुरभागी ॥
शीश काटि निज करमें लीजै । ब्रह्मके सुखमें तब चित्त भीजै ॥
चले जक्त सब देखी देखा । सार असार करे को लेखा ॥
भेड़ा चाल सकल संसारा । नर पामरको यह व्यवहारा ॥
सबकोई कह यह मेरो धर्मा । मेरो गुरु कहा यह कर्मा ॥
सबते हमरो धर्म बडारा । सो बुधवंत जो करे विचारा ॥
चले अंधके पीछे अंधा । बिना विचार करे सोई धंधा ॥
यक शृगाल तेहि औसर बोला । ततछन तासुजाति सुह खोला ॥
वायस एक जो बोल उचारी । सबहि जातिगण तबहि पुकारी ॥
कीटके पीछे कीट जो चाला । तैसे जक्त धर्म प्रतिपाला ॥
यक धोबी यक गदहा राखा । सोढर नाम तासुको भाखा ॥
घाटके ऊपर धोबी गयऊ । ताहि ठौर सोढर मरिगयऊ ॥
ताते धोबीको दुःख होई । सोढर सोढर कहिके रोई ॥
घाटके ऊपर धोबिन आई । रुदन करत धोबीको पाई ॥
पुनि धोबिन निजघर फिर आई । सोढर कहिके रुदन कराई ॥
राजाकी रानी तेहि बेरी । धोबी गृह पठयो निज चेरी ॥
रुदन करत धोबिनिहि निहारा । सोढर सोढर करे पुकारा ॥
चेरी पुनि तहैंते फिरि आई । सोऊ रुदन करे बिलखाई ॥
२७
जीवधर्मबोध
(१९३५)
बांदी विलपत देखा रानी । रुदन बिलाप सोऊ तब ठानी ॥
राजा जब निज महलमें आया । रुदन करत रानीको पाया ॥
रानी रोवै सोढर कहि ताहा । सुनि सो रुदन रोवै नरनाहा ॥
राजा रुदनकरन जब लागा । नग्र नारि नर धीरज त्यागा ॥
सकल नग्रमें परा खँभारा । नृप मंत्री तब तहँ पग धारा ॥
मंत्री नृपते बचन उचारी । कारन कहा रुदन भो भारी ॥
तब नरनाथ बचन अस कहेऊ । दुखी सकल सोढर मरि गएऊ ॥
सोढर कौन सो मन्त्री बूझा । तब नृप कहौ मोहि नहिं सूझा ॥
रानी को मैं रोवत देखा । कीन्हौ मैं पुनि सोई लेखा ॥
रानीते जब पूछा जाई । सोढर कौन सो देहु बताई ॥
रानी कहे न जाने सोढर । मैं रोई बांदीके औढर ॥
जब पूछै बांदीसे जाई । सोढर कौन कहा बतलाई ॥
बूषली बोले मैं नहिं जानी । धोबिन देखि रुदन मैं ठानी ॥
धोबिन कह मोर धोबी रोई । सो लखि सोग मोहिको होई ॥
धोबीसे जब पूछा जाई । सोढर गढ़ा नाम बताई ॥
ऐसेही अंधा संसारा । देखा देखी कर्म पसारा ॥
जिनके हृदये माह बिचारा । सो नहिं लीकलीक पग धारा ॥
दोहा-लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत ॥
तीन लीकमें नहिं चले, सूरा सन्त सपूत ॥
चौपाई
जगमें कतहुँ न तुर्क न हिंदू । सकल देखिये नाद अरु बिंदू ॥
जेते नाद बिंदु मय बंदा । सबही कर्मके फंदमें फंदा ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसोई फल पावै सोई ॥
कर्म कुरूप स्वरूप सँवारा । कर्महि ऊँच नीच गति डारा ॥
कर्महि दुःखसुख जीव भोगावै । कर्महि सकल योनि भरमावै ॥
( १९३६ )
बोधसागर
२८
अष्ट कर्म विधि जैन बखाना । बहुरि मिमांसा कर्मप्रधाना ॥
सत्यकवीर कहै पुनि ऐसे । सब जिव कर्म फन्दमें पैसे ॥
सत्यकवीर वचन-कर्मखंडकी रमैनी
कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चंद सूर परकाशा ॥
कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महि ते भये गौरि गणेशा ॥
सात वार पंद्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥
कर्महि राम कृष्ण औतारा । कर्महि कंस रावन संसारा ॥
सार्वी-कवीर कर्म रख सागरबंध्यौ, सौ योजन मरजाद ॥
बिन अक्षर कोइ ना छुटै, सो अक्षर अगम अगाध ॥
रमैनी
सो सागर भवसागर धारा । नहिं कछु सूझै वार न पारा ॥
तहँवा बावन अक्षर लेखा । कर्मरेख सबहिन पर देखा ॥
कर्मरेख बांधा सब कोई । खानी बानी देख बिलोई ॥
वेद कतेव कर्मही गाया । कर्महिको निह कर्म बताया ॥
सतगुरु मिले तो भेद बतावे । कर्म अकर्ममध्य देखलावे ॥
कर्मरेख तहँवा लगि राखा । जहँलगि वेद व्यास कछु भाषा ॥
सार्वी-कवीर कर्मफांस छूटे नहीं, केतो करे उपाय ॥
सतगुरु मिले तो ऊबरे, नातो परलय जाय ॥
कवीर बहु बंधनते बांधिया, एक विचारा जीव ॥
जीव विचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी
सूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥
दुखिया होय रैन दिन रोवे । भोगी भोग करे सुख सोवे ॥
दुःख सुख भोग सोग समजाने । भली बुरी कछु मन नहिं आने ॥
भली बुरीको करे सो त्याग । निश्चै पावै पद वैराग ॥
२९
जीवधर्मबोध
(१९३७)
साखी-आसन साधे आपमें, आपा डारे खोय ।
कहैं कबीर सो योगी, सहजे निर्मल होय ॥
कुण्डलिया
मानुष है नहिं कोई सुवा, सुवा सो डंगर ढोर ।
चौरासी भर्मत फिरे, टूटै न कर्मकी डोर ॥
टूटै न कर्मकी डोर, भोर बुधि जहाँ तहैं भटके ।
लहे न ज्ञान अन्नप, रूप भवमें पुनि पटके ॥
पुनि पुनि पटके काल, कर्म बेरी पग भारी ।
वचन कह यक मृग चोट, जहां लख कोट शिकारी ॥
चौपाई
कृपा करे गुरु धनी दयाला । जीवहि खच लोक ले चाला ॥
ताकी कृपा योग जब होना । लगे मही तब कालको टोना ॥
कृपा योग जबलों नहिं लोई । कृपा कौनविधि तापर होई ॥
सत्यकबीर वचन
धर्मदास तोहि लाख दोहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ॥
सारशब्द बाहर जो परि है । बिचलै पीढी हंस नहिं तरि है ॥
युगन युगन तुम सेवा कीनी । ता पीछे हम इहां पगदीनी ॥
कोटिन जन्म भक्ति जब कीन्हा । सारशब्द तबही पै चीन्हा ॥
अंकुरी जिव होय जो कोई । सारशब्द अधिकारी सोई ॥
सत्यकबीर प्रमाण बखाना । ऐसो कठिन है पद निर्वाना ॥
पै दुतिये विधि कह्यो बहोरी । जापर सदगुरु कृपा न थोरी ॥
धर्मदास प्रति ऐसे कहेऊ । मांगु जो कछु तेरो चित चहेऊ ॥
धर्मदास तब वचन उचारा । तारो मोहि सहित परिवारा ॥
पिता पितामह सरखा समेता । सबहि पारकर कृपानिकेता ॥
( १९३८ )
बोधसागर
३०
तेहि अवसर सतगुरु विहसाना । का मांगे कछु मांग न जाना ॥
तारो सकल सृष्टिको भाई । तुम तो आप रहे अरुगाई ॥
यामें नहिं कछु दोष तुम्हारा । कालपुरुष तुमरी मति मारा ॥
ऐसो समरथ सत्य कबीरा । पलमें सब क्रम कागज चीरा ॥
कोटिन जन्म जो परा भुलेषा । करे जो कृपा चुकावै लेखा ॥
जहँ तहँ देख आप सदगुरु है । नहिं कहँ असुर नहीं कहँ सुर है ॥
असुर भाव जब सुरको आया । ता छन ताको असुर बनाया ॥
सुरते असुर असुर सुर होई । नारिते पुरुष पुरुष तिय सोई ॥
नीचते ऊंच ऊंचते नीचा । उत्तम मध्यम योनिमें खींचा ॥
ताते देखो दृष्टि पसारी । सकलधर्म प्रभु आप बिहारी ॥
मेरे मतसों सब धर्मनमें । खेले खेल सकल कर्मनमें ॥
जो कोइ चीन्है लाल बिहारी । दुबिधा सकल दूरकरि डारी ॥
सत्यकबीर वचन
राम रहीम करीमा केशव हरि हजरतहैं सोई ।
गहना एकै दृढ है गहना दुतिया और न कोई ॥
चौपाई
सब धर्मनमें आपै खेले । एक दूसरेसे नहिं मेले ॥
भर्मत सारी सृष्टि भुलानी । होय चहुँदिश ऐंचातानी ॥
झूठ सांच जब लेख सविवेका । झूठको तज गहु सत्तको टेका ॥
यह संसार सकल भ्रम छाही । भ्रमकरि सर्व सत्य दरशाही ॥
एक अनेक अनेक भो एका । ज्ञानते होय सो एक अनेका ॥
यथा कांचके मंदिर माहीं । कोटिन मणि मानिक रहजाहीं ॥
झाड़ फतूस अनेकन टांगा । तामें यक भ्रम दीपक जागा ॥
भ्रम दीपक जब तहां प्रकासा । कोटिन दीप मंदिरहि भाषा ॥
यक प्रतिबिम्ब अनेकन देखो । वार न पार लेख कह लेखो ॥