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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

९१

जीवधमबाध

( १९९९ )

जब हरिपद तजि और न भावै । तब छटवों भूमिकामें जावै ॥
भयौ लीन जब छटवों भूमी । तब तेहि माह रह्यो सो रूमी ॥
जबलों लागि प्रीति अति गाढ़े । सतई भूमिमें भे तब ठाढ़े ॥
सतई भूमिमें जब जिव होई । तब नहिं तनहिंमें नहिं कोई ॥
छूटि गयौ तब देहको नाता । तब नहिं जक्त न जगतकी बाता ॥
विद्या और अविद्या दोई । भर्मरूप जानो सब सोई ॥
दोनों ब्रह्मा केर कल्पना । सो ब्रह्मा आवै भ्रम स्वप्ना ॥
ब्रह्मा आप जो भो भ्रमरूपा । ताकी कृत सकल भ्रमकृपा ॥

इति

अथ जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति मिथ्यावर्णन--चौपाई
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर टेरे । जीवनमुक्त न माह बडेरे ॥
सो तिहु भवसागरके कारन । बारबार तिनको बसुधारन ॥
व्यास वशिष्ठ पराशर बादा । दशरथ जनको ध्रुव प्रहलादा ॥
सो सब जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनितनधरि जगमें आवै ॥
सत्यकवीर वचन परमाना । ध्रुव प्रहलाद श्रेष्ठ करि जाना ॥
साठि हजार वर्ष ध्रुव भोगकर । प्रहलाद भोग चौकरी बह्तर ॥
इतने बड़ा भक्त नहिं कोऊ । आवागौन युक्त रह सोऊ ॥
जेते जीवनमुक्त कहावै । पुनि पुनि तनधरि जगमें आवै ॥
प्रलय विदेहमुक्त सब होई । उत्पतिमें तनधर सब सोई ॥
आवै जाय सो मुक्त न मानो । दोनों मुक्ति भर्म करि जानो ॥

सत्यकवीर वचन-शब्द

भर्मसेवा भर्मपूजा, भर्म जपतप ध्यान ।
भर्मकरिकरि भर्मबंधा, नहीं सब पहिचान ॥
भर्म इंद्री करी निग्रह, भर्म गुफा में वास ।

( २००० )

बोधसागर

९२

भर्म तो तहाँ लोकहो जहाँ, जीवनमुक्तको वास ॥
कहो जी तुम आये कहते, जाहुगे किस ठाँव ।
औरको उपदेश देतहो, आप समुझत नाह ॥
जानबेको कहा कहिये, कहेको पतियाय ।
कहै कबीर अनंतरधुनि उपजै, सहज शून्य समाय ॥

चौपाई

लोमस ऋषि आदिक मुनि नाना । जिनको हंस कबीर बखाना ॥
कोटिन उत्पति प्रलय जो होई । कबहुँ गर्भ नहिं आवै सोई ॥
मुक्तस्वरूप संत कह तिनको । आवागौनसूत्र नहिं जिनको ॥
सारशब्द सतगुरुको लहेऊ । जन्ममरणको संशय दहेऊ ॥
जक्तमाह जेते हैं कर्मा । सो सब मिथ्या जिवको भर्मा ॥
झूठ सत्य दोउ एकसम आहीं । यहि संसार सार कछु नाहीं ॥
उत्तम करनी जिवको करना । यद्यपि नहीं सार कछु बरना ॥
गर्भते शिशु बाहर हो जबसे । कर्मकरन लागे सो तबसे ॥
कर्मक्रिया सब तबते जागे । हाथपांव शिशु फेकन लागे ॥
हाथपांव मारन ते जाहीं । नफा होय कछु शिशुको नाहीं ॥
शिशुहि भलो कर पगमारनहै । बिन कर पग फेके दुखतन है ॥
हो बाल जब अधिक सयाना । माटी धूल खेल अरु काना ॥
ताहु कर्म नफा नहिं पावै । तऊ खेलमें घौस बितावै ॥
कर्म करत पहुंचै तरुणार्ई । लाभ कर्मते तब कछु पाई ॥
सोऊ लाभ नफा कछु नाहीं । सर्व कर्म मिथ्या है ताहीं ॥
आदि अवस्था यथा निहारी । कर्म करत बीते बयसारी ॥
कर्म करनकी बानि न होई । तौ निश्चय जिव जाय बिगोई ॥
भलो कर्म करिये तेहि काजा । जाते शुभगतिको सज साजा ॥

९३

जीवधर्मबोध

(२००१)

वेद कि बिधिते जो कोइ ध्यावै । जीवन्मुक्तकी पदवी पावै ॥
स्वसंवेद विधि कर्म जो करिये । पाय अमरपद बहुरी न मरिये ॥

सत्यकबीर वचन-शब्दहेली

हेली तीरथ जाय बलाय । हरदम परवी नहाय ॥
तीरथ कोट अनंत है रे गंग यमुन जहैं दोय ।
मध्य सरस्वती वहत है नहाये निरमल होय ॥
ब्रह्म नयके घाटमें हो आगे शिवको लिंग ।
ताहुँपै दक्षिना दीजिये रे बहे सहसमुख गंग ॥
आगे कलाली कि हाट है रे चोखा फूल चुबंत ॥
बिन सतगुरु पावै नहीं कोई साधूजन पीवंत ॥
शीश उतारि धरनि धरैरे ऊपर धरि ले पाय ।
ब्रह्म नयके घाट मेरे याविधि परवी नहाय ॥
ऋग यजुर साम अथर्वना रे चार वेदको ज्ञान ।
उनकी कहो उहो कौनगति बांधे गांठि पखान ॥
चारवेदको पिता है रे स्वसंवेद संगीत ।
साहिब कबीर जूके मोकदिमे रे अविगति ब्रह्म अतीत ॥

इति जीवनमुक्तमिथ्या

अथ वर्णाश्रममिथ्यावर्णन-चौपाई

वर्णाश्रम सब मिथ्या जाना । नरकृत सो अज्ञानते माना ॥
पूर्व कर्म बिन यहि तनमाहीं । केते विप्र शुद्ध हैं जाहीं ॥
केते शुद्ध विप्र सो भैऊ । मातु पिता नहीं ब्राह्मण रहेऊ ॥
जो कोई वर्णाश्रमते अटका । निश्चय सो सत्पन्थसे भटका ॥
मल अरु मूत्र कि देही जोई । ताको ब्राह्मण कहे न कोई ॥
ज्ञान द्वार जो ब्राह्मण भैऊ । वर्णाश्रम ताके नहीं रहेऊ ॥

( २००२ )

बोधसागर

९४

राजा पंडित मिसके दोई । वर्णाश्रम थापे सब सोई ॥
जिते जीव वर्णाश्रम बंधा । उत्तम विद्यासे सो अंधा ॥
उत्तम धर्म गहे नहीं पावै । वर्णाश्रम तिनको अटकावै ॥
लहै कबहुँ नहीं ज्ञान कि घाटी । जिनको वर्णाश्रमकी टाटी ॥
प्रथम जैन मते मैं भाषा । तीन वर्ण कुल करते राखा ॥
भरथने ब्राह्मण वर्ण थपाई । चार वर्णकुल यहि भांति कहाई ॥
चक्रवर्तिपद भरथ जो पायौ । दान देनको प्रजा बुलायौ ॥
प्रजा परीक्षाको मनलाया । बीच राहमें जल ढरकाया ॥
जलमय धरती हो जेहि ठाई । जीव असंख्य तहां प्रकटाई ॥
दान लेनको प्रजा जो चाले । दयावंत पथ गह्यो निराले ॥
जहां कीच तहँ पग नहीं दैऊ । भरथ भूप तेहि न्यारा कियऊ ॥
ब्रह्मचीन्हि जिन दाया पालो । कीच बीचमें सो नहीं चालो ॥
ब्राह्मण तिनको नाम उचारा । सबपर श्रेष्ठ धर्मसो धारा ॥
अजयपाल कनउजको राजा । रचे ताहिमें यज्ञ समाजा ॥
सातसौ वर्षके ऊपर भैऊ । लखब्राह्मण सो नेवति बोलैऊ ॥
येतो ब्राह्मण सो नहीं पाये । तब नरेश अस हुकम लगाये ॥
जो कोइ विप्र चिह्ने आवै । द्विजसम आदर दछिना पावै ॥
वर्ण विवेक न कीने राजा । जो आये तेहि यज्ञ समाजा ॥
भूप सबहि को द्विजकरि माना । विप्रतुल्य दे आदर दाना ॥
केते विप्र बने तेहि बेला । निज गल माह जनेऊ मेला ॥
नृप बुलाय सेनपति बंगाला । ताहूकी कहिये अस चाला ॥
कनउजसे द्विज पंच बोलाई । बंगालेमें सो चलिजाई ॥
ब्राह्मण पांच अरु कायथ पांचा । पहुँच जहां महीपति जांचा ॥
तिन्है प्रतिष्ठा दीन सो राजा । बस बंगाले सहित समाजा ॥
तिनको वंश पसारा कीना । भित्र भित्र पदवी सो लीना ॥

९५

जीवधर्मबोध

( २००३ )

उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥
ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥
कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥
यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥
असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥
जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥
जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥
तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥
पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥
कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥
जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥
पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥
सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥
हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥
जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥
विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥
गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥
पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥
कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥
दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥
रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥
कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥
ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥
वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥
नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥

( २००४ )

बोधसागर

९६

उत्तम मध्यम कर्महि आही । कर्मते उग्र क्षुद्र है जाही ॥
सत्यकबीर वचन

साखी—जबलगि नाता जातिको, तबलगि भक्ति न होय ।
नाता तोर हरि भजै, भक्त कहावै सोय ।
बड़े गये बड़ आपने रोम रोम हंकार ।
सतगुरुकी परचै बिना, चारो बरन चमार ॥

रमैनी

पहिलो तारो कोरि चमारा । फिर तारो राजन दरबारा ॥

शब्द

नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठाने नर प्रानी ॥
पठेरे भरथरी चारो वेदा । बिन सतगुरु नहिं पायौ भेदा ॥
गोरख खोजत जन्म सिराने । कायाकी गति उनहु न जाने ॥
पंडोने बहु विप्र हंकारा । तबहुँ न घंटबजा ओहि बारा ॥
जवहिजुरेहेकोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घंट अधरबिच बाजा ॥
जवहि श्वपच मंदिर पग धारा । बाजै घण्ट होय झनकारा ॥
कहे कबीर चारो बरन है नीचा । सबसे श्वपच भक्त है ऊँचा ॥

चौपाई

वैशांपायन ऋषिके पास । नृपतियुधिष्ठिर वचन प्रकाशा ॥
कृपाकरो कहिये ऋषि राया । कहगुनगही ब्राह्मण कहलाया ॥
तब ऋषिराय कहे समुझाई । ब्राह्मणको यह गुण बतलाई ॥
गहे धर्म अरु धर्मके गुनको । कबहुँ अधर्म अकर्म न उनको ॥
दुतिये कबहुँ मांस न खावै । कबहुँ न कोई जीव सतावै ॥
प्रथमें वस्तु पड़ी कोई पावै । बिन स्वामी आज्ञा न उठावै ॥
काम क्रोध लोभ मोह मत्सर । कबहुँ न जगविषयनमेंचितधर ॥
पंचम गहे पंच न गुन जबही । तप दम दया सत्य प्रियसबही ॥

९७

जीवधर्मबोध

( २००५ )

सोई ब्राह्मण जब ये गुन गहिये । बिन गुन सदा शूद्र तेहि कहिये ॥
जो चंडालमें ये गुन होही । निश्चय ब्राह्मण जानो सोही ॥
षटउर्मी विकार सब माहीं । गुण करि विप्र शूद्र विलगाहीं ॥
जो गह परमारथ शुभ करनी । मुक्तसे और चाह नहिं धरनी ॥
शमदम दान आदि शुभ गुन गह । ऋद्धि सिद्धि आदिक गुन गन लह ॥
एकै विधि चहुँ बरन बनाया । रुधिर विन्दुते सबकी काया ॥
सतसंगमें सब एकै जाती । लिखा भागवतमें यहि भांती ॥
नृप शौनक चहुँ बरन बनाये । गुण करि भिन्न भिन्न विलगाये ॥
केते शूद्र विप्र है जाही । केते विप्र शूद्र गुन ग्राही ॥

इति वर्णार्थम मिथ्या

अथ कर्तापुरुष विवै शवजीवनका विचार—चौपाई

अलख अगोचर जो प्रभु अहई । तासु कथा कैसे कोइ कहई ॥
हरि हर ब्रह्मा पार न पावै । और जीवकी कौन चलावै ॥
कर्ता पुरुष जत्तको जोई । ताको नाम न जाने कोई ॥
जेते नाम जत्तते माहीं । राय निरञ्जनको सब आहीं ॥
वेद कहे जस अण्ड उगाये । ताते अण्डज ब्रह्मा जाये ॥
नारा जलको नाम बतायन । जलमें गृह कीनो नारायण ॥
के पुनि जलको नाम कहे जो । जलपर शयन करे सो केशो ॥
निर्णय स्वसंवेद पुनि भाषा । अण्डज देव निरञ्जन राखा ॥
बहुरि कहे तो रेतको लेखा । ईश्वर जलपर तरते देखा ॥
पुनि जन्मुर जाहि निरताये । जलपर शब्द यहूह उठाये ॥
गर्ज यहूह ससुद्र न ऊपर । वासा ईश्वर करे जलनपर ॥
यह सबही उर ला व्यौहारा । करता भेद है अगम अपारा ॥
अस प्रभु किमि बिचारते जानी । ताते सुन सतपुरुषन बानी ॥

( २००६ )

बोधसागर

९८

सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥
करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥

इति

अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई

सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥
स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥
वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥
ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥
स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥
यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥
ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥

दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।

ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥

चौपाई

षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥
सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥
स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥
स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥
पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥
अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥
पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥
यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥
पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥
इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥
शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥

११

जीवधर्मबोध

( २००७ )

भिन्न भिन्न पूजा परकाशा । सकल जीव गल डारे फांसा ॥
रजगुण ब्रह्मा है संसारी । कर्मजाल जिन जक्त पसारी ॥
तमगुण रूप महादेव केरा । भवसागरमें ताको डेरा ॥
सतगुन मारग जो कोड धरई । भवसागरके पार उतरई ॥
द्रन्द खेल सतगुणमें बतें । ताहु भिन्नभाव बहु करते ॥
प्रथमहि विष्णु संप्रदा चारी । दुतिये सत्यपंथ आचारी ॥
वेद कि विधि पूरणता पावै । स्वसंवेद कह तब समुहावै ॥
जीवहि अवश्य कर्म सो करनो । सतगुणकी मारग पग धरनो ॥
सात प्रकार कहों पुनि धर्मा । भिन्न-भिन्न तिनको सुन भर्मा ॥
शक्ति निरंजन त्रिगुन है पांचो । वेद विदित शुभ धर्म है सांचो ॥
छठा धर्म कहिये शैतानी । जिनको गुरु इबलीस बखानी ॥
सप्तम धर्म कबीर कृपाला । जरतजक्त जिव जिन प्रतिपाला ॥
प्रथमें ब्रह्मा रजगुण कहिये । कर्मकांड सब ताते गहिये ॥
दुतिमें विष्णु उपासना हेता । तृतिये शंभु योग चित चेता ॥
चौथे ज्ञान निरञ्जन राया । पंचम शक्ति पसान्यौ माया ॥
तीन तीन विधि तिनमें आही । उत्तम मध्यम कनिष्ठ कहाही ॥
छठे धर्म इबलीसको जाई । तीन विभाग ताहुमें होई ॥ ॥
उत्तम कर्म करंता जोई । बुधि विद्या सागर है सोई ॥
कोड गुणगण कोड धनमद पूरे । कोड बाह विजयी है शूरे ॥
जो मद मान सहित हंकारा । मैं बड़ डोरहि तुच्छ विचारा ॥
मोरे योग गुरु कहूँ नाहीं । सो शैतानको पन्थ गहाहीं ॥
उत्तम कर्म जो करे करावै । मलिन कर्म लख दूर परावै ॥
ऐसे सुकर्म करे जो लोगा । ताते नर्क भोग नहि भोगा ॥
तिनको आवागौन न छूटे । योनी संकट पुनि पुनि जूटे ॥
दुतिये आपन उत्तम करनी । और सिखाये सुख कह बरनी ॥

( २००८ )

बोधसागर

१००

तृतिये करे करावै पापू । घोर नर्क अह तिनका थापू ॥

दोहा-विविधि कह इबलीस जन, उत्तम मध्यम नीच ।

जस मति तस गति प्रेरिके, ल्यावै तिनको खींच ॥

चौपाई

कोई रजोगुण कर्म कहीजै । कोई मलीन रजोगुण भीजै ॥

कोई सतोगुण धर्म प्रचारा । कोई मलीन सतोगुण धारा ॥

कोई तमोगुण ऐसे जानो । विविधि भेद तिनमाह प्रमानो ॥

पञ्चधर्म षट्धर्म बखाना । इहाँलो विषय वासना नाना ॥

यह षट्धर्म जत्तमें जागे । सकल नारि नर तिनमें लागे ॥

छवो त्याग सप्तम जब चीन्हा । सत्य पन्थपर तब पग दीन्हा ॥

देव कबीर धर्म नयसागर । तापद गहि बीते सब झागर ॥

विषय विकारकी भै तब हानी । सरिता सकल सिंधु ससुहानी ॥

निश्चल होहि पाय प्रिय अपना । जहँ नहिं अमभय केर कल्पना ॥

मन बानीते पार जो होई । ताकी कथा कहे किमि कोई ॥

मीन विहंग कि मारग दूँढ़ा । बुद्धिविहीन विचारन सूढ़ा ॥

पठि गुण तोता कहे कहानी । बिना विचार मूलकी हानी ॥

झूठना

मूल जाने बिना धूल रसरीवरे मीन पग पंथ कहु कौन पावै ॥

दूर नेरे नहीं क्रूर हेरे तही बिना गुरु गम्य तेहि को लखावै ॥

जासुको नाम नहीं रूप नहिं रेख है भेष आलेख कह देख कोई ॥

बकत बहु वाय है सार नहिं पाय है घोषको धर्म गहि भर्म भोई ॥

स्वप्नकी वस्तु जौँ दूँढ़ जागृतमें हाथ आवै नहीं यत्न कीने ।

चारहु दशाते पार सरकार जो तासु दरबार पथ कौन लीने ॥

खेचरी भूचरी चाचरी अगोचरी योग अरु युक्ति सब रहै पोले ॥

दुन्मुनी खातजहँ उन्मुनीफिरत है अलककीझलकको पलकखोले ॥

१०१

जीवधर्मपौध

( २००९ )

भक्ति नौधा कही प्रेम पौधा यही बृद्धि विन सृद्धि नहिं यार आवै ।
यार चीन्हा नहीं प्यार कीना वृथा नाद अरु नृत्य कह गीत गावै ॥

इति श्रीधर्मव्यौरा

अथ वेदधर्म व्यौरा

दोहा—सतगुण सबमें श्रेष्ठ है, सतगुण विष्णु देव ।
सतगुणकी साखा गहे, लहे अगमको भेव ॥

चौपाई

सतगुनको सेवै बैरागी । तन मनते प्रभु सेवा लागी ॥
चार संप्रदा सगुण उपासी । नौधा भक्ति गहे सुखरासी ॥
भाव भक्ति प्रभु प्रतिमा पूजा । राम कृष्ण सम और न दूजा ॥
कोई बाल रघुपति कर ध्याना । कोई कृष्ण शिशु सेव प्रमाना ॥
नाना भांति सेव जिवधारी । लक्षण जानकी औध विहारी ॥
गान करहि बहु साधु समाजा । नादनृत बाजहि बहु बाजा ॥
धर्म वैष्णव परम सोहाई । दान पुण्य अति उज्ज्वल ताई ॥
गृह आश्रमी भाव भल धरही । सन्त गुरुकी सेवा करही ॥
वेद धर्मकी बात घनेरी । जहैंतहैं कविकृत मिश्रित हेरी ॥
ताते शुद्ध न व्यौरा लहिये । जो जिहिभाव सोई गति गहिये ॥
पौरानिक बहु कथा कहानी । शुद्धाशुद्ध जत्त विहरानी ॥
व्यास आदि ऋषिसुनि बहुतरे । जो जेहि भासा सत्यसो टेरे ॥
केते पंडितन ग्रंथ सँवारी । व्यासनाम धरि जत्त प्रचारी ॥
पुरुष प्रमानि बचन प्रमाना । सो विधि गहे भर्मभय भाना ॥
झूठ साँच जो कछु जगमाँही । निश्चय किये सत्य दरसाही ॥
झूठकी जबही झुठाई जाना । तब तेहि त्यागहि पुरुष सयाना ॥

इति वेदधर्म

( २०१० )

बोधसागर

१०२

अथ जैनधर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

जैनधर्मं जिव दाया भारी । हिंसा पंथ नसो पग धारी ॥
शौच क्रिया जैनीमें थोरी । सतगुण मलिन मतामय सोरी ॥
रात समै ढिग जल नहिं घरही । अशुचि शरीर रहै का करही ॥
अशुचि देह नहिं मन सकुचाही । इन्द्रो शुद्ध बिना जल नाहीं ॥
देवी देवकी सेवा साधन । यन्त्र मन्त्र बहु देव अराधन ॥
दिन गति जबहि रैन नियरावै । जल अरु अन्तनसो कछु खावै ॥
प्राण जाय तो जान दे भाई । सुखमें कबहुँ न जल परिजाई ॥
महा कठिन व्रत जैनी ठाना । भूखसे त्यागे अपनो प्राना ॥
जेते इतर धर्म बहु भांती । जैनी सबहि कहै मिथ्याती ॥
जैनेश्वरकी केवल बानी । इतर ग्रंथ नहिं जैनी मानी ॥
दान पुण्य अरु शौच अचारा । जैन धर्म अति अल्प निहारा ॥
दान पुण्य बिन कर्म जो करही । उर कठोरता जैनी धरही ॥
दान पुण्य नहिं जहां निहारा । हृदयमें न होय उजियारा ॥
दाया कहां जहां नहिं दाना । बिना दान किमि हो कल्याना ॥
तप जप करि साधू कछु सुखिया । जैनी गूही दान बिन दुखिया ॥
जैन यती वह सीष सिपाई । जो ताहुके धन अधिकाई ॥
फूटे कूपमें धनबरु डारो । बिना पात्र मतिदान बिचारो ॥
पात्र बिना नहिं देत जो दाना । तिनके पात्र मिलै नहिं आना ॥
तिनके पात्र हैं साधू जैनी । भोजनदान तिन्है कछु दैनी ॥
घरघरते भिक्षा ले येई । एक ठौर भोजन नहिं लेई ॥
ताते जैनमें दानकि हानी । जीव दया सुख पावै प्रानी ॥
बिना दिये पावे किमि कोई । देन लेन चारो युग होई ॥
दान न करहिं बर्त बहु करही । करि करि बर्त भूखते मरही ॥
जो नहिं देहे सो नहिं पैहै । निश्चय भूखते प्रान गवैहै ॥

१०३

जीवधर्मबोध

(२०११)

चौथा काल जैनी जो कहेऊ । वज्रशरीर मनुष को रहेऊ ॥
जैनी करहि तबहि तप भारी । करि करनी सुख धाम सिधारी ॥
अब यह काल होयसो नाही । ज्ञान सुक्ति नहिं तिनके पाहीं ॥
परमारथ न होय बिनदाना । गहे साधु परमारथ बाना ॥
जहँ परमारथ दान कि हानी । तहां सुगति पावै कह प्रानी ॥
जैनमते अब सुक्ति न पाई । अन्य धर्म जिवको सुखदाई ॥
पंचम काल जैनको येहा । ज्ञानी सन्त धरे बहु देहा ॥
और धर्ममें जैनमें नाही । जो परमारथ दान कराही ॥
धर्मके चार चरण बतलाया । सत अरु सौच दान अरु दाया ॥
कलिमें कहा सप्त पदवर्ता । नाम दान कलिमल संहर्ता ॥
जैनमें सप्त शौच अरु दाना । तीनों चरण विभंग बखाना ॥
महाकठिनतप करि जब ध्यावत । चौथकाल कोई गति पावत ॥
अब यहि कालसो व्रतको पाले । एक टांगते धर्म न चाले ॥
संबंधी तन मन धन तीनों । यह प्रमान सब धर्महि कीनों ॥
तन मन धन बिन कार्य न कोई । स्वारथ अरु परमारथ दोई ॥
तन मन दे जब कर सेवकाई । तब धन लाभ होय दुनियाई ॥
धनको त्यागि औरको दीजै । तन मन ताते लाभ लहीजै ॥
तन मन धन दे जिहि जिन साधा । कोई दुनिया कोई हरि अवराधा ॥
तिहुदे सोइ अवश्य लहीजै । जब काहू दिश निज दिल दीजै ॥
तिहु बिन कर्म जो साधा चहई । सो शठ हठ अज्ञानी अहई ॥
तजि धन साधु जो वनमें बसही । घोर घोर तप करि तन कसही ॥
धनको दान दंड तिहि नाही । रहे नहीं धन जिनके पाहीं ॥
दारिद्री अरु भिक्षुक जोई । ताते दान लेत नहिं कोई ॥
जिहि औसर नर वज्र शरीरा । सहे परीसा लहै न पीरा ॥
दुःख अनंत देहीपर परही । जप तप साधु गृही दोउ करही ॥

( २०१२ )

बीधसागर

१०४

महा कठिन तप करि अघ दहई । दोनों यक समान गुण गहई ॥
पंचये छठये कालमें सोई । जनीसे नहिं सो तप होई ॥
दान देनकी बानि न तिनको । कहु कल्याण होय किमि इनको ॥
धन सो धरहि दान नहिं करही । कौन भांति उनको अघ हरही ॥
ताते पंचये छठये काला । जैनी कोइ न मुक्तिको चाला ॥
तनहित धन दे तन सुख पाई । धन जो गहतौ तन दुख आई ॥
जैनी कहै सुनो रे भाई । मिथ्याती मिथ्या फैलाई ॥
एवनको राक्षस कहि गाया । मिथ्याती सो झूठ बताया ॥
एवन जैनी छत्री सोई । राक्षसनाम वंशको होई ॥
राक्षस वंशी क्षत्री एवन । जैनधर्म ताके मनभावन ॥
ब्राह्मणहिंसा कर अधिकाई । ताते जैन महादुख पाई ॥
यज्ञमें जीव भरूम जब करही । मनमें रोष सदा जब धरही ॥
क्षत्रीवंशके सबही राजा । जैनधर्मधर सहित समाजा ॥
जिवकी हिंसा जबसों देखे । क्रोधवंत धावै यहि लेखे ॥
यज्ञविघ्नेस करे सो आई । ताते ब्राह्मण देहि दोहाई ॥
यहि विधि एवन विप्रविरोधी । हिंसा देखी होय अति क्रोधी ॥
ब्राह्मण ताते वैर गहाई । एवनको राक्षस बतलाई ॥
अमिश अहारी मद्यप भाषे । वैरभावको कारण राखे ॥
वीश बाहु दश शीश बखाना । ताको भेदनसो कहु जाना ॥
एवन सिद्ध मंत्र एक करेऊ । ऐसो भेष ताहिंते धरेऊ ॥
ताके पास रहै एक माला । ताते ऐसो दरसै ख्याला ॥
सो माला जब गलमें डारे । वीश बाहु दश शीस निहारे ॥
मालाको प्रताप बतलाई । भेष भयंकर लेत बनाई ॥
और मनुष सब देखो जैसे । रातन यकशिर द्वैभुज तैसे ॥
इन्द्रनाम यक राजा केरो । मंत्री जुत्थप तासु चनेरो ॥

१०५

जीवधर्मबोध

( २०१३ )

अग्नि पौन आदिक जो कहाऊ । इन्द्रके दरवारिनको नाऊ ॥
इन्द्रहि रणमें रावन जीता । बंधन डारिके देतेहि कीता ॥
नृपको जब बंधनमें डारा । मन्त्रिनको कर चेरवा डारा ॥
नीचटहल दरबारिन गहेऊ । अग्नि पौन रावन बस भैऊ ॥
अग्नि पौन आदिक जो कहेऊ । सो सब नाम मनुषको रहेऊ ॥
सुरपति नहीं बंधनमें आवै । मिथ्याती सब कूट बतावै ॥
छनमें इन्द्र प्रलय जग करई । ताहि कौन बंधनमें धरई ॥
प्रलय करे फिर जग प्रकटावै । सो किमि रावनकी बस आवै ॥
ऐसो अग्नि पौन बलकारा । छनमें प्रलय करे संसारा ॥
मिथ्याती सब कूठ वर्णके । अग्नि पौन रह बस रावनके ॥
ब्रह्मन क्षत्री होय लराई । क्षत्री द्विजनको मारि हटाई ॥
परशुराम तब द्विजकुल होई । परमशत्रु क्षत्रीको सोई ॥
ताते अनगिन क्षत्री मारा । तब सुभूमि लीवो औतारा ॥
क्षत्री चक्रवर्त पदधारा । पशुरामको ताने मारा ॥
हनिवर द्वीपकौ राजा जोई । हनोमानको नाना सोई ॥
हनोमान ननिओ रे गैऊ । आदर मान तहां बड़ भैऊ ॥
हनिवर द्वीपमें आदर पाई । ताते हनोमान कहलाई ॥
बानरवंशी क्षत्री सोई । हनोमान विद्याधर होई ॥
रूप अनूप महा छबि जाको । कामदेव औतार है ताको ॥
बज्र अंग बल बरनि न जाई । गुणगणशील जासो अधिकार्ई ॥
राजा पौन जय कहलाये । हनुमान है ताके जाये ॥
पौनते मनुष न जन्मै कोई । यह कपोलकलपित सब होई ॥
हनोमानको बानर भाषा । पीठके ऊपर पूछ सो राखा ॥
कूठ कथा मिथ्याती कहई । नर बानर किमि संगत गहई ॥
बालि सुकंठ आदि नृप जेते । बानरवंशके क्षत्री तेते ॥

( २०१४ )

बोधसागर

१०६

यह सब विद्याधर कहलाई । नभकी मारग चलै उड़ाई ॥
चंद्रनखा भगिनी रावनकी । सूपनखा तेहि विप्र कथनकी ॥
ब्रह्मन वेद पुरान बनाई । झूठी कथा अनेक मिलाई ॥
चौथा काल बहुरि जब ऐहै । भिन्नतिथ करतब प्रकटैहै ॥
कृष्णलक्ष्मण आदिक जानू । जरासंध रावण हनुमानू ॥
देव तिथंकर जब प्रकटाई । जैनधर्म सब जीव गहाई ॥
जैनधर्म विधि करनी करही । नर विद्याधर सो मत धरही ॥
अब मिथ्यात फैलि बहु गैऊ । नर विद्याधर अंतर भैऊ ॥
यहि बिधि जैनकथा सब न्यारी । वेदधर्मते भिन्न उचारी ॥
ऐसहि बुद्ध धर्मकी चाली । वेद जैनते कथा निराली ॥

इति श्री जैनमतव्यौरा

अथ स्वसंवेदव्यौरा

दोहा-चारवेदको पिता है, सर्वे धर्म गुरु जोय ।
परम पुरुषको भेद है, स्वसंवेद कह सोय ॥

चौपाई

सत्य कबीरको निज मुख बानी । स्वसमवेदसो नाम बखानी ॥
सतगुणपर जब सतगुण सरसे । तब शिव परम पुरुषपद परसे ॥
ताको नहीं जाने संसारा । अलख अगोचर अगम अपारा ॥
नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण सोई । निर्गुण सर्गुण निरंजन होई ॥
निर्गुण सर्गुण फंदपसारा । सत्यमता है इनते न्यारा ॥
कहुँ न ताको मंदिर सेवा । सबमई परमात्म देवा ॥
जब जिव धर्म कबीर गहंता । बाद बिवाद होय सब अंता ॥
स्वसमवेदकी विधि जो गहई । तामें बहुरि न औगुण रहई ॥
सब औगुणको दूर बहावै । स्वसमवेद विधि तब जिव पावै ॥
इहां न कोई विषयबिकारा । निर्मल जीव सन्त मतधारा ॥

१०७

जीवधर्मबोध

( २०१५ )

मान सरोवर हंस निवासा । बकुला तहां करहि नहिं वासा ॥
भोजन भैक मीन जिन केरा । तिनको डाबर माह बसेरा ॥
जो हरिनाम खुगे शुचि मोती । बसे मानसर तिनके गोती ॥
सब जीवनके जो हितकारी । परमारथमें तन धन वारी ॥
स्वसंवेदकी आस गहाई । अन्य नती बहु रीति चलाई ॥
निर्मल जल अकाशते आवै । भूमि परत डाबर है जावै ॥
तिमि सब स्वसंवेदते वानी । भिन्न भाव धरिजग प्रकटानी ॥
सत्यपंथके गृही विरागी । परम पुरुषकी सेवा लागी ॥
जुरे समाज जहांयक तीरा । ढोल मृदंग मधुर मखीरा ॥
बजै झांझ खँजरी करताला । बाजन विविधि प्रकार सुताला ॥
सत्य कबीरको नाद उठावै । रहसि-रहसि प्रभुको गुण गावै ॥
सन्त गुरुकी सेवा माहीं । इन्है समान और कोउ नाहीं ॥
परमधर्म गुरुसन्तकी सेवा । ताते मिले पुरातन देवा ॥
धरे जेते धन द्रव्य शुभागे । सब गुरु सन्त सेवमें लागे ॥
गृही होय गुरु साधू सेवै । वैरागी तपमें चित देवै ॥
परम उदार चित जिन केरा । सत्यलोकमें तासु बसेरा ॥

इति स्वसंवेद

अथ स्मार्तमत व्यौरा वर्णन

दोहा—सतगुण रजगुण धर्ममय, स्मृती मत संन्यास ।

उत्तम मध्य कनिष्ठ विधि, कौजै कथा प्रकाश ॥

चौपाई

उत्तम मध्यम जो संन्यासा । सतगुण मयी ताही परकाशा ॥
दीगम्बर दंडी संन्यासी । दोनों धर्म सतो गुण राशी ॥
अब कनिष्ठ संन्यास कहीजै । जब सत रज मिश्रित चित दीजै ॥
कोइ कोइ दुराचार इन माही । मद्य मांसको भोग कराही ॥

( २०१६ )

बोधसागर

१०८

योगी अरु संन्यासी दोई । एक स्वरूप जानिये सोई ॥
इति स्मार्तभत

अथ मीमांसाधर्म वर्णन—चौपाई

रजगुण ब्रह्मा रूप कहावै । धर्म मिमांसा जक्त चलावै ॥
कर्मते श्रेष्ठ और नहिं कोई । कर्महिंते सब रचना होई ॥

इति मीमांसा

अथ मूसा और ईसाधर्म व्यौरा—चौपाई

रजगुण तमगुण जहां मिलाई । मूसाधर्म और ईसाई ॥
होम यज्ञ तौरेत बखाना । यथा वेदविधि कीन प्रमाना ॥
सागपात जैसे तरकारी । तैसे नर मद मांसु अहारी ॥
मानुष घातसे पातक माना । इतर जीव सब साग समाना ॥
मूसा धर्म यहूदी धारा । यहि मतको नहिं अधिक पसारा ॥
मूसाके कोइ शिष्य न रहेऊ । ताते धर्म कि बृद्धि न भयऊ ॥
अबीरामको जो सन्ताना । मूसाधर्म करे परमाना ॥
सतगुणरूप आहि ईसाई । क्षमा शीलतामें अधिकाई ॥
छल बल रहित दीनता धरही । उज्ज्वल किया शौच आचरही ॥
मद्य मांसको करे अहारा । ताते तमगुणमय व्यौहारा ॥
भजन अरु दान पुण्यकर थोरा । अधिक रजोगुणते चित जोरा ॥
क्षमा शांति सब औगुण ढकई । भर्मभूत तजि प्रभु दिशि तकई ॥
ईसा शिष्य साखा बहु भयऊ । पृथ्वीपर जहैं तहैं रमि गयऊ ॥
देश देशमें धर्म प्रचारा । ईसा गुण सब ठौर उचारा ॥
जेहि औसर यह धर्म चलाई । नर भोले थोरी चतुराई ॥
थोरी विद्या बहुत निरअक्षर । धर्मकी गति जाने तब कहैं नर ॥
थोरे ही उपदेशके करते । सब ईसाई धर्मको धरते ॥
यूरूप सबही भयो इसाई । देश एशिया गुण अधिकाई ॥

१०९

जीवधर्मबोध

( २०१७ )

थोरे मनुष्य गह्यौ मत ईसा । हिंदू स्थान धर्म धुरदीसा ॥
चरित इहां पादरी आये । विरले जीवहि धर्म गहाये ॥
राज भयौ अंगरेजको जबते । भये अधिक ईसाई तबते ॥
मूसा ईसामतके माहीं । स्वर्ग नर्क निर्णय कछु नाहीं ॥
आतम गुण अरु ज्ञाना ज्ञाना । कछु नहिं इनमें कीन बखाना ॥
मोटा ज्ञान धर्म बतलाई । पुण्य पापकी थाप थपाई ॥

इति मूसाईसा

अथ महम्मद धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण जहाँ रजोगुण पेला । धर्म महम्मदको यह खेला ॥
बिन अपराध जो मानुष मारे । मारि काटि निज धर्म प्रचारे ॥
यह गुण मुसलमानमें कहई । यक अच्छाहकि भक्ति सो गहई ॥
दुतिये गुण इनमें बड़ भारी । अभ्यागत आदर अधिकारी ॥
दान पुण्य अरु उज्वल कर्मा । चित्त उदार महम्मद धर्मा ॥
भये महम्मद ऐसे दाता । आपअलूने साग जो खाता ॥
माल कोरोनको लुटवाई । सह्यौधुरक्सेकाडुःख अधिकाई ॥
वेद धर्मको जैसे देखा । मता महम्मदको तस लेखा ॥
कथा कहानि अधिक मिलाई । सुनी गुणी बहु बात बनाई ॥
स्वर्ग नर्क महि मध्य कहानी । धर्म महम्मद निर्णय ठानी ॥
आत्मवाद कछु ज्ञानको भेदा । जपतपशमदम आदिनिवेदा ॥
मोटा ज्ञान तीन हूको पद । मूसा ईसा धर्म महम्मद ॥

इति महम्मदधर्म :

अथ शक्ति धर्म व्यौरावर्णन—चौपाई

धर्म तमोगुण जो लखि पाया । शक्ती धर्म आदि है माया ॥
भवसागर जिन कीन पसारा । नारीते यह सब संसारा ॥
शिव अरु शक्ती रूप द्वै कीन्हा । दोहू रूप मायाको चीन्हा ॥

(२०१८)

बोधसागर

११०

जब संचट होय दोहु रूपा । ताते जीव परे भ्रम कृपा ॥
द्वंदरूप मायाको खेला । ताते जीवको ज्ञान सकेला ॥
ज्ञानते माया पंथ बिरोधी । भवसागर पद जीव प्रबोधी ॥
हिंसा कर्म बुद्धि जिव घाटी । ज्ञानद्वारे पर दीनो टाटी ॥
भोगे भोग भोगमें रहई । भोगवासना चितमें गहई ॥
भोगमें भर्मि रहा सब लोगा । आवे जाय सहे सो सोगा ॥

इति

अथ अघोर धर्मव्यौरावर्णन—चौपाई

तमगुण पर तमगुण सरसाई । धर्म अघोर परम कठिनाई ॥
नर पशु जीव सकल धरखाही । धर्म विचित्र कहो कह जाही ॥
डुराचारको अन्त अघोरी । जिमि अचार वैष्णव घोरी ॥

इति अघोरधर्म

अथ विचारणीय वार्ता

दोहा—येते धर्म बखानेछ, इनते कहूँ जो और ।
सकल त्रिगुणमय भक्त हैं, जक्तमाह सब ठौर ॥
त्रिगुणातीत जो कोय कहे, त्रिगुणातीत न होय ।
कहनको त्रिगुणातीत हो, त्रिगुणमें बांधा सोय ॥
जीवनसुक्त विदेह जो, सब तिरगुणके फन्द ।
सार शब्द लहि पार हो, तब जिव होय अनन्द ॥

चौपाई

जेते धर्म प्रचारक होही । कहो न जाय कहै का ओही ॥
जिमि नृप थापे देशन देशा । धर्म प्रचारक जगमें ऐसा ॥
एक प्रानि दुतिये मत खंडा । अपनो धर्म धारा प्रचंडा ॥
यक जकती यक भकती पाला । दोनों ते प्रभु बसे निराला ॥