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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९१६ )

बोधसागर

८

तमते त्रिगुन तत्त्वको होना । ताते जत्त बीजको बोना ॥
ब्रह्मा बुद्धि रूप तन धारा । बुद्धिते रचित सकल संसारा ॥
अग्निरूप है प्रकटा काला । ताते जत्तकेर जंजाला ॥

सत्यकबीर वचन

तेज रूप गुरु काल उपाया । ताते सकल सृष्टि दुःख पाया ॥

दोहा-मैं करता मैं भोगता, मेरो सकल जहान ।

मैंही जगमें पूज्य हो, सुर मुनि मनुष महान ॥

चौपाई

अहं ब्रह्मास्मी कह ब्रह्मा । ताते रचनाको आरंभा ॥

अहंते सकल सृष्टि यह ठाढ़ी । कथा कहानी जगमें बाढ़ी ॥

यही अहं अज्ञानको मूला । ताते जीव सहे सो शूला ॥

अहं बोलि यह जीव सिधारे । बहुरि नवीन कलेवर धारे ॥

आवा गौन अहंते होई । यक तन तजि दूसर गह सोई ॥

ज्यों ज्यों जीव तुच्छता गहई । त्यों त्यों अधिक अहंसो लहई ॥

ज्यों ज्यों श्रेष्ठ पदनको पावै । त्यों त्यों ताही दीनता आवै ॥

भृगमुनि विष्णुको मारचौ लाता । सोकरि क्षमा कहौ मृदुबाता ॥

देखो दारिद्री कंगाला । धनपाये तेहि गर्व विशाला ॥

गहे न अहंकार हरि प्यारे । जीवहि अहं तुच्छ करि डारे ॥

अहंकारके है षट अंगा । ताते जीव केरि मति भंगा ॥

जव मति भंग जीवकी होई । नाना विधिको तन गह सोई ॥

देह सदा वासना ते पूरी । सुखी होय करि ताको दूरी ॥

जबलों रहै वासना मनमें । तबलों बिचर विषयके बनमें ॥

जीव कहाव देह अभिमानी । ताको मुक्तिपात्र नहिं जानी ॥

निर्वासनिक होय निस्प्रेही । जत्त पूज्य है साधू येही ॥

जिनके हृदयमें अभिमाना । तिनको कबहु उगै न ज्ञाना ॥

९

जीवधर्मबोध

( १९१७ )

जो कोई कह मैं बड़ा कुलीना । सबसे ताको जाय मलीना ॥
जो कोइ कह मैं हौं बड़ सुन्दर । महाकुरुप सो होय छछूंदर ॥
जो कोइ कह मैं उत्तम जाती । सो बैठे कुकुरनकी पाती ॥
जो कोइ कह मैं पंडित ज्ञानी । होय निरक्षर पुरुष प्रानी ॥
जो कोइ कह मैं बड़ गुनवन्ता । होय सोय विद्याको जन्ता ॥
जो कोइ कह मैं बड़ बलवाना । होय अबल सो कीटसमाना ॥
जाति पांति कुलके अभिमानी । भ्रमत फिरै चौरासी खानी ॥
अभिमानिनकी कहो कहानी । धर्म महम्मद यथा बखानी ॥
त्रिविध तकबुर निर्णय ठानी । प्रथमजो भये ऐसे अभिमानी ॥
जस नमरूद आदि फिर उन्ता । नृप मद आपको ईश्वर गुन्ता ॥
प्रथम तकबुर प्रभुके ऊपर । नबीपै बहुरि तकबुर दूसर ॥
तृतीय तकबुर जग लोगनपै । मैं गड तुच्छ और सब जनहैं ॥
हौं बड़ श्रेष्ठ गुनन मलसही । औरनमें यह गुन कह बस ही ॥
प्रथम कहौं विद्या अभिमानी । दुतिये तपसीतपजिन ठानी ॥
विद्याके अभिमानी जोई । तिनके मत विचार अस होई ॥
हमही मनुष और सब पशु गन । जिनके हृदय न विद्याको धन ॥
विद्या धन सर्वापर गाई । ताते हम ईश्वर लखि पाई ॥
जगमें हम सबके शिर ताजा । हमरे हाथ है काज अकाजा ॥
दुतिये तपसिन केर समाजा । बिना मान नहीं कोई ऋषिराजा ॥
सो ऐसो निज मनहि विचारी । दरश हमार जक्त हितकारी ॥
आपको सुक्त युक्त लख औरा । और तुच्छ हम सब शिरमौरा ॥
ये दोनों पदको मद भारी । रूप गर्व धारत है नारी ॥
धनअभिमानी पुनि अस बोला । मैं चाहों औरहि लेव मोला ॥
बलमदकुलमदकुटुंबअरुचाकर । शिखशाखा बहु मानधरे नर ॥
अभिमानिनकी दशा बखाना । हशरगाह जो न्याय स्थाना ॥

( १९१८ )

बोधसागर

१०

चिउँटी रूप होय हंकारी । तिनहि लताडे सब नर नारी ॥
हशरगाह ते जब सो चाले । हबहब कूप नरकमें डाले ॥
हजरत सुलेमानकी बानी । बूथा सकल तप हो अभिमानी ॥
राई भरि जामें हंकारा । सो विहिंशतको नहिं पग धारा ॥
पुनि रसूल मकबूल बतावे । होय दीन बड़ि पदवी पावे ॥
ऐसो नर जगमें नहिं कोई । जाके शिर लगाम नहिं दोई ॥
गहे लगाम सो दोय फिरिशते । जगजिव तिनहि दीन हो दिस्ते ॥
तब दोउ प्रभुसे विनय उचरना । हे प्रभु याको ऊँचा करना ॥
धरि लगाम तेहि ऊँचा करही । जगमें श्रेष्ठ नाम तब परही ॥
जब जिव ऊँचा शीश उठावै । दोऊ फिरिशते विनय सुनावै ॥
हे प्रभु याको कीजै नीचा । धरि लगाम नीचेको खींचा ॥
अभिमानिनके शिरमें पौना । ताकौ चित्त फलावै तौना ॥
सोई पौन हंकार कहावै । बुरी चाल सब ताते आवै ॥
पढ़ि विद्या जगको भरमावै । आप न शुभकरनी मनलावै ॥
विद्याके अनुसार न करनी । अन्तमें तिनकी यह गति बरनी ॥
नरकमाह प्रभु तिनहै पठै हैं । औरनते दशगुन दुःख पैहैं ॥
गरदन पीठ तासु टुटि जाई । नरकमाह अतिशय दुख पाई ॥
जिमि खर चक्की को भरमावै । तैसे यम ताहि नाच नचावै ॥

दोहा—अग्नि कतरनी करगहे, कतरे तिनको ओठ ।

नरकमाह बड़ दुख भरे, विद्या पढ़िभे खोट ॥

चौपाई

अभिमानिनकी कथा बखानी । ईश्वरको बैरी तेहि जानी ॥
सकल बड़ाई प्रभुको सोहै । और बड़ा जगमें कहु कोहै ॥
जिनके हृदयमें हंकारा । तिनको कोई करे नहिं प्यारा ॥
नृप फिर ऊन महाअभिमानी । आपको जो ईश्वर करि जानी ॥

११

जीवधर्मबोध

( १२१२ )

अबिरहामके जो संताना । निजु गोला गोली करि जाना ॥
मूसायें प्रभु सो गुन खोला । ईश्वर बना तासुको गोला ॥
फिर ऊबर मूसा है जाई । मानमर्दके गर्द मिलाई ॥

सोरठा-एक गृही यक साधु, दोय पक्ष है जीवको ।
यक संग्रही उपाय, एक रसिक निजु पीवको ॥
निज निज धन सुखहेतु, दोनों उद्यमको करे ।
होय सजग चित्त चेतु, जेती बुद्धि विवेक जिहि ॥
कृपा जो करे करतार, पूर्ण होय मनकामना ।
यह धन वह भवपार, जैसो जाके आगमें ॥

दोहा-ग्रहीके धन अधिकात जब, तब तेहि कहे अमीर ।
अधिक अधिक धन बितलह्यौ, कह्यौ अमीर कबीर ॥
जबहि अमीर कबीरमें, तामें किन्न समाय ।
यथा दर्ब दिन दिन अधिक, तथा किन्न अधिकाय ॥
किन्न अधिक अधिकान जब, तब लाग्यौ बलकान ।
बलकत बलकत अंत भो, आप किब्रिया जान ॥
आप किब्रिया जान जब, गह्यौ ज्ञान शब्दाद ।
भूपर मोहिसम नहीं रहा, हरि ऊपर कर वाद ॥
प्रथम अमीर कबीर भो, पुनि अकबर अछाह ।
सो कबीर अकबर सोई, कहे किब्रिया ताह ॥
अछह जब बनि बैठिऊ, पहुँची तिनकी मौत ।
दोजखमें दाखिल भये, सेन सहित भै फौज ॥
जगमें भये कबीर बहु, जो लागे गहि तीर ।
आप तरे जग तार जो, सोई साच कबीर ॥
जिन जिन धारचो किन्न उर, टूटचौ सबको शीश ।
जासु किन्न टूटे नहीं, परम पुरुष जगदीश ॥

( १९२० )

बोधसागर

१२

जाको किन्न अघट्ट रह, तीन काल युग चार ।
ताहीको सब ठट्ट है, हट्ट लगी पन सार ॥
जिन जिन शीश उठायऊ, टूटचो सबको किन्न ।
सत्यकबीरको किन्न जो, सदा एक रस तिन्न ॥
श्रीमुख सत्यकबीर कह, किन्न जाहिमें दीप ।
मोड़ा तेहि छोड़ो नहीं, तोड़ो ताको शीश ॥
किन्न सहित जब जोय नर, होय नहीं तब खैर ।
परे किन्न या संगमें, याहि ढंगते बैर ॥
वैर किन्नियासे भयौ, गयौ नरक जिव सोय ।
कुशल कौनि विधि तासुकी, रिपु जाको हरि होय ॥
जासु किन्निया नाम है, किन्न ताहिको सोह ।
और किन्न जो कोइ गहे, ले कबीर सँगलोह ॥
धनवितकों यह अंत है, सत विचारो जाहि ।
सो धन पर हंकारकर, अहं दुःखद सब आहि ॥
जैसे गृहीकी कथा, कहति निककीरकी आहि ।
जब फकीर गुनज्ञान गह, तब हकीर कह ताहि ॥
घर घर मांगत भीख जो, दरदर होत हकीर ।
कोई गालीदे मार कोई, तनक न तन मन पीर ॥
अथ हकीरको तुच्छ है, कुछ रहौ नहीं मान ।
अधिकते अधिक हकीर भो, तब साहिब पहिचान ॥
तब साहिब पहिनेऊ, फना कियौ तब आप ।
गना आपके कुछ नहीं, तन मन धन लखि पाप ॥
अंत हकारत जब भयौ, तूही तू तब टेर ।
जहँ तहँ देखो तूहि तू, मैं नाहीं कहु हेर ॥
मैं नाहीं जब ही रहौ, कहौ तूहि तू सर्व ।

१३

जीवधर्मबोध

( १९.२१ )

जल थल वायू व्योममें, तुही व्याप सब दर्ब ॥
तूही भू जब देखेऊ, रहा कतहुँ नहिं आप ।
आप आप में रमि गयौ, पुनि दुतियाकिन थाप ॥
दुतिया गयौ गवाय जब, सिंधुमें बूंद समान ।
गहे गरीबी संत जब, अंत दुःख तब जान ॥
जब हंकार अतिशय बना, धन्य फकीर है सोय ।
किन्न तकबुरके गहे, गयौ धनिक सब खोय ॥
यथा फकीर हकीर भो, गूही अमीर कबीर ।
दोहु गुन दोष बिचारके, जीव तरे भवतीर ॥

इति अहंशब्द

अथ कामवर्णन—चौपाई

अहंते तम तमते आकाशा । तमते त्रिगुणतत्त्व परकाशा ॥
गुण प्रकृतमय तत्त्व जो पांचो । जगके अस्तंभन ये सांचो ॥
प्रथम अकाश है पंच प्रकृतमय । काम अरुकोध लोभमोहमय ॥
प्रथम कामको यह गुन जानू । दहन ज्ञान बन कठिन कृशानू ॥
स्वसंवेदमें प्रथमहि कहेऊ । ज्ञान गोप जब जिवको भैऊ ॥
तब निज सम्मुख दृष्टि उठाई । झाँई रूप नजरमें आई ॥
सो झाँई नारी तन गहेऊ । ताके संग भोग जिव कियऊ ॥
पुरुष छाहते प्रकटी नारी । सो भ्रम रूप जक्त विस्तारी ॥
जबलों नारि पुरुषकी चाह । तवलों नहीं कर्म कुल दाहा ॥
अपनी छाहते करे लड़ाई । भ्रम कटि जूनिनमें भरमाई ॥
सोई कहो जक्तकी जननी । परम रूपके ज्ञानकी हननी ॥
वृद्ध जक्तकी कामते आही । बुद्धि विवेक तहां कुछ नाही ॥
कामविश जिव हो जिहिबारा । ताके हृदय न रहौ बिचारा ॥

( १९२२ )

बोधसागर

१४

ताको गुन यह प्रकट देखावो । आवा गौनको लेख लगावो ॥
प्रथमहि दृष्टि दौरि जब जोई । नारि देखि केहि यह हरषाई ॥
जब नर ताहि निकट नियराया । कुचनके ऊपर हाथ चलाया ॥
कुचनको जब निजु करते परसा । अधिक मोद मनमें तब सरसा ॥
कुच नहिं भोजन पात्र पयोधर । अधिक प्रीति मानुष ताते कर ॥
प्रथमहि भोजन पात्र टटोले । आवागौन राह पुनि खोले ॥
तिहि मारगमें जब जिव धसेऊ । पुत्र होय पुनि बाहर खसेऊ ॥
भर्ता है तिहि मारग पैठा । पुत्र होय पुनि बाहर पैठा ॥
भोजन पात्र टटोल जो पहिले । बालक है भाजन सोह गहिले ॥
भोजन भाजन भायां माता । पुरुष पुत्र एकै द्वै बाता ॥
भीतर बाहर पैठे निकलेरे । आवा गौन आपनो सकरे ॥
मनते मनमथ भयौ प्रचंडा । महाकाल सत सो बरिबंडा ॥
पांचवान सो निज कर लीने । सकल जीव अपने बस कीने ॥

दोहा-मोहन मारन बसकरन, उच्चाटन उनमाद ।
पांच बान ये काम गह, तिहु पुर परा विषाद ॥
भवसागरमें आयके, कोइ न भयौ समरत्थ ।
यक कंचन यक कुचनपर, को न पसारचौ हत्थ ॥

कुंडलिया

भवसागरमें आनिके, भै कबीर समरत्थ ।
कंचन कुचन दोहूनपै, सो न पसारचौ हत्थ ॥
सो न पसारचौ हत्थ, आप कमला चलि आई ।
चित चंचलावनहित, कीन सो विविध उपाई ॥
कीनेसि विविध उपाय, कबीरको मन किमिहाली ।
है निरास श्री तास, बहुरि बैकुंठहि चाली ॥

१५

जीवधर्मबोध

( १९२३ )

चौपाई

कोई है पती पयोधर पकरे । कोई बनि पुत्र ताहिंते टकरे ॥
भरता पुत्र होय नहिं दोऊ । सत्य कबीरते और न कोऊ ॥
नारिके बसमें सब संसारी । रचना तिहु पुरमाह पसारी ॥
भवसागर भगसागर जानी । भवके करता भव रु भवानी ॥
तीनों पुरको ईश कहाया । जिन भगचौरके राह बनाया ॥
भगके रुधिरते भगवा भेषा । देव निरंजन अकथ अलेपा ॥
उज्ज्वल भेष पुरुषको बाना । भगवा भेष निरंजन राना ॥
अंग पिंड भग माह समाना । सत्य कबीर बचन परमाना ॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥
ताहि तियहि भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिवो अंता ॥
लिंग रूप यक शंकर कीना । धरती खिला रसातल दीना ॥
भा बालक भग द्वारे आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥
अबला सम कहुँ बली न कोई । तीन लोक ताकी बस होई ॥
अष्ट प्रकारके मैथुन अहई । ताते न्यारा कोह न रहई ॥

दोहा-श्रौतो सुमिरन कीर्तनो, चितवन बात यकंत ।

हठसंकल्पो रत्न पुनि, प्रापति अष्ट कहंत ॥

चौपाई

मिथुन विकार जीव सब पागा । जरे तीन पुर तिय अनुरागा ॥
जेती जगमें कथा किहानी । नारिप्रताप सकल से जानी ॥
जबलों रहैं देहको खेला । तबलों हो नारी सँग मेला ॥
नारि परे जो जाना चहई । ताकी देह तहां नहि रहई ॥
भग भोगै अरु भक्त कहावै । फिर फिर भगभोगनको आवै ॥
जड़ चेतन दोउ नारि स्वरूपा । कनक कामिनी जिव भ्रमरूपा ॥
विषकी बेल दोहूको जानी । लगे ताहिमें जिव अज्ञानी ॥

( १९२४ )

बोधसागर

१६

महामहाऋषि मुनि छलि मारा । यह मनोज पापी हत्यारा ॥
तप जप सकल अष्ट करि दीने । ज्ञानी ध्यानी निज बस कीने ॥

छंद माधवी

सूखे पत्र अहार अरु पौन भपे । धृत धर्म परासरके सरके ।
दृग जोहनि मोहनि रूपमहा, मनमोहित नाहरके हरके ॥
विधि नारद चंद स्वच्छंद भये, हृदया बजरोधरके धरके ।
अस कौतुक भो जो मन दौन कियौ, सब जी भवसागरके गरके ॥

चौपाई

साध सिद्ध चल वनमें भागी । जाय नारि तिनके सँग लागी ॥
मौनी होय बसै गिरकंदर । बसै नारि तिनके डर अंदर ॥
मैथुन अष्ट तबो नहिं जाई । ताते विकल सकल ऋषिराई ॥
बाहरको विकार जो त्यागे । पुनि अंतरको दुःख दौ दागे ॥
इन्द्री मर्दके गर्द मिलाई । तऊ साधुको काम सताई ॥
जतन अनेक करे ऋषिराई । विजय मार पर ताऊ न पाई ॥
जस नट मरकट खेल खिलावै । तथा मनोजभव जीव नचावै ॥
नारिके बसन आभूषन ओरा । साधु कबहु न निजु दृग जोरा ॥
नारि चित्र कागज मूरत गन । ताहि न सन्त लखै निजु नैनन ॥
निरखै ध्यान आव सो मूरत । चढ़ै काम पुनि ताहि विमूरत ॥
नारि पुरुष जिमि घरमें रसहीं । ताके निकट साधु नहिं बसहीं ॥
कामकलोल करे पशुखग जहैं । साधु न कबहुँ दृष्टि डारे तहैं ॥
मदन विकार अनेक विधाना । सो सब त्यागे ज्ञान निधाना ॥
जब लों यह विकार दिल दागे । तब लों ज्ञान किरिन नहिं जागे ॥
कामकरे जिहि औंसर अंधा । करे जीव कछु उलटा अंधा ॥
छन्द-रतिनाथ भाथ जो हाथ गहि, निजु सुमनसरसंधानेऊ ॥
तजि नीति गह बिपरीत रह, नर धर्मबंधन भानेऊ ॥

१७

जीवधर्मबोध

( १९२५ )

चैतन्यमे जड़ रूप जड़, चित चेत निजु उर आनेऊ ।
शृंगार साजन लाल कहुँ, कुसु कानिकौ मन मानेऊ ।

इति काम

अथ क्रोधवर्णन-चौपाई

द्वितीये क्रोध महा बलवंता । सोसमस्त शुभ गुनको हन्ता ॥
जाको देखि बुद्धिवर कम्पत । रहै न निकट भाजिहो चंपत ॥
महा काल यह क्रोध उचारा । यह खल प्रकट होय जेहिबारा ॥
धर्मको लेश रंच नहीं रहई । यह अपराधी जप तप दहई ॥
प्रलय करे सतगुनहि विडारा । आप दाहि और न दुहि डारा ॥
वर्षहजार जो सुनि तप कीने । पलमें क्रोध अष्ट करि दीने ॥
नरकवास सुनि बरहि पठाई । कतहुँ न रही ज्ञान गहिराई ॥
तप जप कहाँ क्रोध जब होई । जिवको निश्चय नरक विगोई ॥
सकल धर्मकी धूल उडावै । क्रोधको अंधकार जब आवै ॥
अहंकार क्रोधादि विकारा । तुच्छ जीवमें अधिक निहारा ॥
कीडा एक रहे घासनमें । ऐसो क्रोध ताहिके मनमें ॥
जो कोई ताको परसे जाई । महा-क्रोध ताके उर छाई ॥
क्रोधितहै अस मनहि विचारी । छूवन हार को डारो मारी ॥
कूदे उछलै जो रन चलई । आपको अबल जानिके टलई ॥

इति क्रोध

अथ लोभवर्णन-चौपाई

तृतीये लोभकी कथा बखानी । शुभ गति लहै न लोभी प्रानी ॥
लोभी निशदिन माला फेरा । ताको पार होय नहीं बेरा ॥
सूम है नरक केर अधिकारी । जपतप कियहु न जन्म सुधारी ॥
लोभी जीव जेते जग माहीं । नरक हेत सबही सो आहीं ॥
लोभ ते शुभ करनी नहीं भावै । सोई सब अघकर्म करावै ॥

( १९२६ )

बोधसागर

१८

सो नरपर कलियुग को बासा । तेहि प्रिय कीने बुद्धि विनासा ॥
सोई दुष्ट सब करे अकाजा । प्रीछित धर्म-धुरंधर राजा ॥
ताहूको सो बुद्धि बिगारा । कञ्चनपरकलि आसन धारा ॥
धर्म महम्मद करे बखाना । सोरनको भागी शैताना ॥
गहि कर कञ्चनदृग न लगाये । चूमि ताहि पुनि कह गोहराये ॥
कञ्चनसे जो प्रीति लगाई । सो नहिं भगवत भक्ती पाई ॥
सो लोभी इबलीसको बन्द। निश्चय परे ताहिके फन्द। ॥
पुनि ऐसो इबलीस पुकारा । साधु सूम है मित्र हमारा ॥
सूम साधु जो जप तप करई । लोभ समस्त कृपा संहरई ॥
तैसे पापी दाता जोई । परमशत्रु मेरो है सोई ॥
जो कछु पाप करे सो दाता । दान किये सो सकल निपाता ॥
सो शैतानके वश नहिं परई । दाता कोटि पाप जो करई ॥
दोय वृक्ष द्वै ठौरमें देखा । यक औदारता लोभ है एका ॥
दानवृक्ष वैकुण्ठमें बरनी । गड़ी तासु जड़ ताही धरनी ॥
साष तासु दुनियामें आई । नरहित हेत सो दियो झुकाई ॥
जो कोई पकरे साष सखावत । सो निश्चयविहिशतको जावत ॥
साष सखावत पकरि जो रहई । अघ औगुन सब ताको दहई ॥
नवीन प्रसंशिके बचन सुनावै । सखी अवश्य मेरे ढिग आवै ॥
ऐसहि लोभवृक्षकी लड़ है । घोर नरकमें ताकी जड़ है ॥
साष तासु जगमाह झुकाई । जो कोई गहै नरकमें जाई ॥
शुभ करनी सब तासु नशावै । सूमको दौजरमें पहुँचावै ॥
सब धर्मनको मत है एहा । लोभी करे नरकमें गेहा ॥

अथ मोहवर्णन-चौपाई

चौथे मोह महा दुःखदानी । भव भोगनकी यही निशानी ॥
ता पिता सुहृद परिवारा । सगे सहोदर सह सुत दारा ॥

१९

जीवधर्मबोध

( १९२७ )

प्रथमहि मातु पिताकी मोहा । अंधभो जिमि काई लग लोहा ॥
जिहि औसर घरनी घर आई । मातु पिताकी प्रीति भुलाई ॥
परम प्रीतमा नारी अहई । बाधिन यथा गरासन चहई ॥
मधुर मधुर बोलै सुसकाई । महा ठगिन जिव ज्ञान ठगाई ॥
हने जबहि सो काम कटारी । सरवस छीन लेय सो नारी ॥
ताते प्रकट भये जो पूता । पूत नहीं आयो यमदूता ॥
मधुर बोल बोलै मन हरही । दिन दिन अधिक प्रीतिपितुकरही ॥
पुत्र कि मोहमें जन्म गँवाये । ताते कबहुं न छूटन पाये ॥
ताकी मोह भयो जिव अंधा । चला अंतको यमपुर बंधा ॥
पुत्रसे कहो कौन सुख पाया । झूल गड़े जड़ मूल नशाया ॥
जन्मतही युवती हरि लीनो । युवा भये तब धन वित छीनो ॥
मूयहुपर कपालको फोरा । मा यह सुत धौ वैरी मोरा ॥
शत्रुको सदा मित्र जग जाना । मूढ़ नहीं चेते विन ज्ञाना ॥
मेरो मेरो कर अज्ञानी । ममतामें भूले सब प्रानी ॥
मोर तोर कहि जन्म गँवावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥
बन्धु मित्र अरु संगे सखागन । सो समस्त है भक्तिके दुश्मन ॥
इन्है पेलिके हरि यश भनिये । प्रीति कबहुँ मति ठगनते ठनिये ॥

छन्द पद्मिनी

दशदिश देख बहु दृष्टि पसार । कोई नहिं तेरो यहि संसार ॥
मातु पिता स्वारथ हितकार । सुतदारादि सकल परिवार ॥
कोई न तेरो उबारनहार । सब मिलि तोहि नरकमें डार ॥
ताते तजो सकलकी प्रीत । यह दुनिया मतलबको मीत ॥
जिहि औसर स्वारथ ना होय । तेरो संग करे नहिं कोय ॥
बुद्धि विचारि विलोक विलोक । यह जग जान महाठग होय ॥
ठगसे प्रीति किये धन खोय । लहे अमरफलको विष जोय ॥

( १९२८ )

बोधसागर

२०

क्यों नहीं चिन्तामनि चित्चीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥
जठर अग्निते तेहि जो बचाय । काहे ताको दियो भुलाय ॥
महा दुःख जब घरे आय । संकटमें सो करे सहाय ॥
भजु तेहि जन्म सुफल है जाय । परमहंसकी पदवी पाय ॥
ताकी कृपा चलो यमजीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥

इति मोह

अथ भयवर्णन चौपाई

पंचम भय बटमार बड़ेरा । जो गहि जीव नरकमें गेरा ॥
भयवश तपी न जपतपकरहीं । भयते कायर घरमें मरही ॥
भय करि शूरा करे न करनी । भय करि सती न अग्निमें जरनी ॥
भय कीने शुभ कर्म न होई । भय करि शुभगति लहै न कोई ॥
भयकरि विद्याबुद्धि की हानी । भय भ्रम करि भमें चहुँखानी ॥
पांच वर्षका वय ध्रुव पाया । तप कारन सो वनाहँ सिधाया ॥
मिले ताहि नारद ऋषिराया । विविधि भांतिसे भय दिखलाया ॥
कानन महाभयावन कहेऊ । ध्रुवके हृदय न भय कछु गहेऊ ॥
बनमें जाय गूढ़ तप ठानी । रंच न सो मनमें भय मानी ॥
तपकरि हरिहि लियो प्रकटाई । धन्य धन्य ध्रुव धन्य कहाई ॥
जिनको हृदया भयते पूरा । तिनमें कबहुँ न साहस जूरा ॥
दोहा—पंचप्रकृति आकाशकी, कीने कछुक बखान ।
एकते एक महाप्रबल, सकल नरककी खान ॥

इति भय

चौपाई

पंच प्रकृत आकाश बखानो । पंच बहुरि बागूको जानो ॥
पंच अग्नि जलकी है पांचो । धरती पंच प्रकृति उर जांचो ॥
यही जीवको बंधन करही । इनहींते देही थित धरही ॥

२१

जीवधर्मबोध

( ११२९ )

तेहि सर्वथा अभाव जो कीजै । तब कैसे निज देह धरिजै ॥
पै अभाव कीजै गुरु द्वारे । तब जिव अपनो काज सँवारे ॥
पुत्र अकाशको बायू होऊ । पिता समान शून्य है सोऊ ॥
बायू बेटा अग्नि बखानी । सो तद्रूप तातके जानी ॥
तासुत जल जलते यह धरनी । ये सब सन्न एक सम उरनी ॥
शून्य अकाश शून्य तिहु गुन है । तम अरु अहंकार सब सुन है ॥
पुत्र पिता परपिता सहीते । सर्व सुन कहु सार न चीते ॥
शून्यको रचित देह यह अहई । शून्य सर्वथा ताको कहई ॥
शून्यकि कृपा सूत्र सब जानो । शून्य सर्वसंसारहि मानो ॥
तन मन धन सब शून्य बताओ । नाम रूप गुन शून्य कहाओ ॥
सो तन मन धन गुरुको दीना । नाम तासु बदले गहि लीना ॥
शून्य जो दीना शून्यहि लीना । कहो कहा कारज निज कीना ॥
शून्यहि दीन जो सूत्रहि पाया । तेहि व्योहार हाथ क्या आया ॥
है परंतु कारण तह एका । तामैं लहो भिन्न कछु लेखा ॥
निश्चय नामहु शून्य विचारी । तामैं है कारज यक भारी ॥
नाम डोरि हटु गहि जो कोई । शून्य पार पथ पावै सोई ॥
शून्यकि पारपंथ जब पावत । बहुरि शून्यमें सो नहि आवत ॥
शून्य रूप भवसागर धारा । अंड पिंड सब शून्य सँवारा ॥
अमकरि शून्यमें खल प्रकाशो । जस मृगजल मरुथलमें भासे ॥
फेन बुदबुदा वारि तरंगा । वायु प्रसंग बनावहु ढंगा ॥
जेहि औसर वायू नहि चलही । गलके सकल मिले तोह जलही ॥
जल विकार सब जलहै जैसे । माया ब्रह्म जीव यक तैसे ॥
अम करि नाम धरे बहु डोरा । एकब्रह्म तजि कतहु न औरा ॥
जेहि औसर जिव सोलखि पावै । एकै माह अनेक समावै ॥
दृश्य अनेक जो एक समई । पिंड अंडकी थाह सो पाई ॥
थाह पाय जब जीव थिरोना । तब जान्यौ हो चारु चिरोना ॥

नं. ११ बोधसागर - ६

( १९३० )

बोधसागर

२२

मैं हो आदि मध्य अरु अन्ता । मोहि फुराफुर वेद बदन्ता ॥
पक्की तत्त्व देह जब पावै । तबनिजुघरजिव बहुरिके आवै ॥
पक्की तत्त्व प्रकृत पच्चीसा । स्वसंवेदकी विधि जो दीसा ॥
ताको गह कच्चीको त्यागे । ऐसे योग युक्तिमें लागे ॥
तनकी कृपा योग अष्टंगा । ताको तज भज मनको अंगा ॥
मन अष्टांग योग उरधारो । स्वसंवेद जाको निरधारो ॥
तनकी कृपाकाज नहीं सरही । मन करनी जिवपार उतरही ॥
मनको रचित सकल संसारा । हो निवृत्त जिव मनके द्वारा ॥
तन मन यद्यपि मिथ्या दोई । मन करनी अति उत्तम होई ॥
तन है जाय आपनी बसमें । जेहि औसरआवै मन कसमें ॥
तन मन दोनों बश है जाई । तब निज रूप नजरमें आई ॥
ऐसे साधु जो जगमें आही । हरि ब्रह्म शिव ध्यावै ताही ॥
ताकी गतिको सके बखानी । लखे न शारद वेद अरु बानी ॥

मौनीजि वचन विचार माला

दोहा—स्वसंवेद नहीं कहि सके, लक्षण सन्त महन्त ।
परसंवेद कहे कष्ट, संग प्रताप कहंत ॥

चौपाई

जिनकी गति अगम अगाधू । बानी वेद पारसो साधू ॥
स्वसंवेद गुण तासु न कहई । तिनको भेद जीव किमि लहई ॥
समदृष्टि सो साधू ऐसे । सोई ब्रह्म रूप मैं पैसे ॥
काहू नहीं सो दुःख दुःखावै । जिनकी दृष्टिमें साहेब आवै ॥
को हिन्दू को मुसलमाना । को ब्रह्म केहि श्रद्ध बखाना ॥
कौन यहूदी कौन नसारा । एकै ब्रह्मको सकल पसारा ॥
रह्यौ चराचरमें सो पूरी । जाहि लखे हो सब दुःख दूरी ॥
आप आप लख ब्रह्म सनेही । जहाँ तहाँ देखो नेरी देही ॥

२३

जीवधर्मबोध

(१९३१)

मोहितजिऔर कतहु कोइनाही । अमकरि भिन्न भाव दरसाही ॥
मेरो मन अरु तन सब मेरो । तनमें मन मनमें प्रभु डेरो ॥
लखे अलखगति झगरा टूटा । जीव काल बंधनते छूटा ॥
अपनी देह सकल जग जानी । ताते सबहीको सनमानी ॥
काहूको नहीं करे निरादर । सब कोइ ओढ़े मेरी चादर ॥
स्वर्ग नरक मृत आपै आपा । जैसो कर्म तहां ले थापा ॥
सबदिल महल वहां प्रभुको है । आपै आप सर्वमें सोहै ॥
काहूको अनभल नहीं ताका । निजु अनभल ताते परिपाका ॥
औरको अनभल ताके जोई । अनभल अवश्य ताहिको होई ॥
एक मोगल क्रमकरे जो बनियां । तेहिदिग रह यक वैललदनियां ॥
मोगल परोसी धोबी रहई । लादनको एक गदहा गहई ॥
जिमि औसर खर करे पुकारा । मोगल दुखित होय तेहिबारा ॥
प्रभुसे नीति अस विनय उचरई । यहि धोबीको गदहा मरई ॥
यकदिन ऐसे कारन भयऊ । वैल मोगलको तब मरि गैऊ ॥
तिहि औसर मोगल गहि रोषा । परमेश्वरहि लगावै दोषा ॥
केते काल खुदाई कीना । गदहा बैल अजौ नहीं चीन्हा ॥
ऐसेहि सकल जीव अज्ञानी । प्रभु कह दोष लगावहि प्रानी ॥
सो नहीं दोष लगावन योगा । सबजिवनिजु२क्रमफल भोगा ॥
परभल किये भला हो अपना । निश्चय यह प्रमाण करिथपना ॥
जो काहूको कछु दुःख देई । सो दुःख अवश्य आप शिरलेई ॥
जो सबला अबला दुःखदानी । सो दुख अपने सिरपर आनी ॥
मांसरुधिर जिन जाको चाखा । परगल काटि आपसुख राखा ॥
औरकोशिरनहिनिजु शिरकाटा । अपनो तनकर बारह बाटा ॥
कोटिन यतन करे किन कोई । बदला अमिट छुटै नहीं सोई ॥

( १९३२ )

बोधसागर

२४

सत्यकबीर वचन-शब्द

अपनो कर्म न मेटो जाई ।
कर्मको लिखा मिटै घौँ कैसे जो युगकोटि सिराई ॥
गुरु वशिष्ठ सुनि लगन सोधाई सूर्य मंत्र यकदीना ।
जो सीता रघुनाथ विवाही पलयक संचन कीना ॥
तीन लोकका करता कहिये बालि बध्यौ बरि पाई ।
एक समय ऐसी बनि आई उनहू औसर याई ॥
नारदसुनिको बदन बिगान्यौ कीन्है कपिको रूप ।
शिशुपालकी भुजा उखारी आप भये हरि टूँटा ॥
पारवतीको बांझ न कहिये ईश न कही भिखारी ।
कहै कबीर करताकी बातें कर्मकि बात है न्यारी ॥

चौपाई

मेरो कर्म मोहि दुःख देता । जाने बिना भये वश प्रेता ॥
बदला भोगे आदि भवानी । बदला हरि हर अयशि आनी ॥
बदलाके कारन जिव झारी । भोगे दुःख भये संसारी ॥
दिल दुःखाव मति काहू कैंरो । सब तन अपने तन सम हेरो ॥
सबको दुःख सुख एक समाना । एकै रूप रूप सब जाना ॥
एकै रूप अनेक बरन है । एकै इन्द्री एकै तन है ॥
मनु सतरूपा वेदमें कहेऊ । सोई सकल रूप निजु गहेऊ ॥
चौरासी लख योनि उपानी । एकै अंग न और बखानी ॥
सबमें रमा सो अकथ अनूपा । सबको जानो मनु सतरूपा ॥
मनु सतरूपा आपै साहेब । देखि परे जगमें नाना ढब ॥
आदि पिता सबजग जिन हेरा । सो समदृष्टी सन्त बडेरा ॥
निर्वासनिक आदि ओंकारा । हिरनगर्भ वासना जो धारा ॥
भई वासना जगको कारन । दोय स्वरूप कीन तब धारन ॥

सुमिरनबोध एवं ग्रन्थ समाप्ति

२५

जीवधर्मबोध

( १९३३ )

हिरण्यगर्भ चित्ताह जो चाली । एक चना कीना द्वे दाली ॥
नारि पुरुष मिलि द्वन्द्व मचाया । ताते रचना राम रचाया ॥
स्वामी एक एक भे दासा । करे एक दूजाकी आसा ॥
वासना जब निवृत्त है जाई । स्वामी सेवक तब मिलिजाई ॥
जैसे प्रथम भयो द्वे ढंगा । तैसे दोनों होय करंगा ॥
सकल वासना लियौ बटोरी । द्वन्द्व खेल तब कतहु न हेरी ॥
मन इन्द्री कछु रहा न बाकी । निश दिन होय ब्रह्मकी झांकी ॥
जस प्रथमै रह अंडकि गोली । तस है बहुरि वचनको बोली ॥
तन मन इन्द्रीकी गम नाहीं । परम रूप रमि अलख कहाहीं ॥
लखै न कोई अलख गुरु देवा । जाने बिना करे सब सेवा ॥
जब जान्यौ तब सेवा नाहीं । मैं तू तह तब कछु न रहाहीं ॥
मोहिमें तूमें तोहि समाना । एक भयौ नहि दुतिया जाना ॥
सकल वासना मनते हरई । पारब्रह्म जब दाया करई ॥
ब्रह्मके खोजी साधो भाई । कैसे ब्रह्म की खोज बताई ॥
भजनानन्दी संत सुजाना । ब्रह्म सर्वमय पूरण जाना ॥
जाना तौ पै मिले न ताही । बिना मिले कछु सुख है नाहीं ॥
जैसे नारि पुरुष बर होई । एक दूसरो जाने सोई ॥
जानेते कछु सुख नहि सरसे । नारि पुरुष जबलों नहि परसे ॥
अरश परशते सुख सरसाना । तब मनहीमनमें सुखसमाना ॥
कहे कहा सो कहो न जाई । निज सखियनते सैन बुझाई ॥
सखीकि सैन सखी कोई बूझे । पियामिलनको सुखजेहि सूझे ॥
और कोई जो पूछे जाई । चुप है रहै तबै मुसकाई ॥
ब्रह्मको सुख जो कोई लहई । गूँगा होय न सो कछु कहई ॥
लून पूतली निज मनठाना । सागर थाह लेनको जाना ॥
जलमें पैठत जल है जाई । ताकी खबर कहै को आई ॥

( १९३४ )

बोधसागर

२६

कीट पतंगसे पूछे बाता । दीपक गिरे कौन सुख आता ॥
तेहि पतंग अस वचन सुनावो । तुमहि दीप ढिग चलि सुख पावो ॥
कीट तबहि दीपक नियराया । पुनि पतंग ढिग सो चलि आया ॥
आय पतंगसे वचन सुनाई । मैं कछु ज्योति स्वाद नहीं पाई ॥
तेहि पतंग बोला चिछाई । तैं किमि ज्योतिके सुखको पाई ॥
अरे मूढ संसारी कीडा । तोहि न व्यापी तन मन पीडा ॥
सुख पतंग आसिक सो जाना । दीपकमें जो धाय समाना ॥
तू तो फिरा देखिके आगी । जाने कहा मूढ दुरभागी ॥
शीश काटि निज करमें लीजै । ब्रह्मके सुखमें तब चित्त भीजै ॥
चले जक्त सब देखी देखा । सार असार करे को लेखा ॥
भेड़ा चाल सकल संसारा । नर पामरको यह व्यवहारा ॥
सबकोई कह यह मेरो धर्मा । मेरो गुरु कहा यह कर्मा ॥
सबते हमरो धर्म बडारा । सो बुधवंत जो करे विचारा ॥
चले अंधके पीछे अंधा । बिना विचार करे सोई धंधा ॥
यक शृगाल तेहि औसर बोला । ततछन तासुजाति सुह खोला ॥
वायस एक जो बोल उचारी । सबहि जातिगण तबहि पुकारी ॥
कीटके पीछे कीट जो चाला । तैसे जक्त धर्म प्रतिपाला ॥
यक धोबी यक गदहा राखा । सोढर नाम तासुको भाखा ॥
घाटके ऊपर धोबी गयऊ । ताहि ठौर सोढर मरिगयऊ ॥
ताते धोबीको दुःख होई । सोढर सोढर कहिके रोई ॥
घाटके ऊपर धोबिन आई । रुदन करत धोबीको पाई ॥
पुनि धोबिन निजघर फिर आई । सोढर कहिके रुदन कराई ॥
राजाकी रानी तेहि बेरी । धोबी गृह पठयो निज चेरी ॥
रुदन करत धोबिनिहि निहारा । सोढर सोढर करे पुकारा ॥
चेरी पुनि तहैंते फिरि आई । सोऊ रुदन करे बिलखाई ॥

२७

जीवधर्मबोध

(१९३५)

बांदी विलपत देखा रानी । रुदन बिलाप सोऊ तब ठानी ॥
राजा जब निज महलमें आया । रुदन करत रानीको पाया ॥
रानी रोवै सोढर कहि ताहा । सुनि सो रुदन रोवै नरनाहा ॥
राजा रुदनकरन जब लागा । नग्र नारि नर धीरज त्यागा ॥
सकल नग्रमें परा खँभारा । नृप मंत्री तब तहँ पग धारा ॥
मंत्री नृपते बचन उचारी । कारन कहा रुदन भो भारी ॥
तब नरनाथ बचन अस कहेऊ । दुखी सकल सोढर मरि गएऊ ॥
सोढर कौन सो मन्त्री बूझा । तब नृप कहौ मोहि नहिं सूझा ॥
रानी को मैं रोवत देखा । कीन्हौ मैं पुनि सोई लेखा ॥
रानीते जब पूछा जाई । सोढर कौन सो देहु बताई ॥
रानी कहे न जाने सोढर । मैं रोई बांदीके औढर ॥
जब पूछै बांदीसे जाई । सोढर कौन कहा बतलाई ॥
बूषली बोले मैं नहिं जानी । धोबिन देखि रुदन मैं ठानी ॥
धोबिन कह मोर धोबी रोई । सो लखि सोग मोहिको होई ॥
धोबीसे जब पूछा जाई । सोढर गढ़ा नाम बताई ॥
ऐसेही अंधा संसारा । देखा देखी कर्म पसारा ॥
जिनके हृदये माह बिचारा । सो नहिं लीकलीक पग धारा ॥
दोहा-लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत ॥
तीन लीकमें नहिं चले, सूरा सन्त सपूत ॥

चौपाई

जगमें कतहुँ न तुर्क न हिंदू । सकल देखिये नाद अरु बिंदू ॥
जेते नाद बिंदु मय बंदा । सबही कर्मके फंदमें फंदा ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसोई फल पावै सोई ॥
कर्म कुरूप स्वरूप सँवारा । कर्महि ऊँच नीच गति डारा ॥
कर्महि दुःखसुख जीव भोगावै । कर्महि सकल योनि भरमावै ॥