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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(५१७)

सुनाये॥ जमकी कहें आन मुख चारी। नरक सरगकी बातें न्यारी॥ चित्रगोपित्र कहें समुझाय। जो कुछ सूरज चंद लखाय॥ न्याव कहत सब रिषि मुनि देवा। पावे सोई कियो जस सेवा॥ सुन यह बात सृष्टि डर खाय। निराकार परम ठहराय॥ आपाकी कछु खबर न पाई। लिखेकी बात सृष्टि भरमाई॥

समै--तीन लोक देख हम आये, पाया न जमपुर गांव। पंडित भरम उपराजिया, राखा जमपुर नाम॥ जिनते जम यह ऊपजा, तिनको लीन्हेंसि खाय। कहैं कवीर सोई जन बांचे, बापे चीन्हें धाय॥

रमैनी १७०--कहो पंडित तुम वेद विचारी। पहिले पुरुष कि पहिले नारी॥ पहले तीर्थ कि पहिले देवा। पहिले वेद कि पहले भेवा॥ पहले कर्ता कि पहले कर्मा। पहले पाप कि पहले धर्मा॥ पहले बीज कि तरवर होई। पहले ज्ञान अज्ञान कि सोई॥ पहले दिवस कि पहले राती। पहले मुख की पहिले जाती॥

समै--बीज बृच्छ एक साथ है, नजहँ देखे कोय।

तैसहँ जीव रु साज सब, आग पाछ ना होय॥

रमैनी १७१--वेद बड़ा कि जिन सिरजाया। ब्रह्म बड़ा कि जहांते आया॥ तीरथ बड़े कि हरिके दासा। देह बडी कि बड़े अकासा॥ कृष्ण बड़े कि बड़े हनुमाना। राम बड़ा कि रामहँ जाना॥ देव बड़े कि बड़ करतारा। धरती बडी कि बड़े पहारा॥ देव बड़े कि पूजनहारा। विद्या बडी कि पढ़ने हारा॥

समै--तीरथ गये एक फल, साध मिले फल चार।

सद्वरु मिले अनेक फल, कहें कवीर पुकार॥

रमैनी १७२--सुन पंडित इक बात हमारी। हरि ब्रह्मा एक रची फुलवारी॥ मूल चार छे ताकी शाखा। अठारह पत्र चार फल चाखा॥ बारह कनई फूटी चहुँ ओरी। कुंचन बिरोह चहुँ दिसि

(५९८)

कवीरपंथी—

बहु तेरी ॥ सो देखनको चला संसारा । वहाँ बैठे पंडित रखवारा ॥ देख देख सब कोइ भुलाना । षट् दरशन सबके मन माना ॥ रैन औ दिन करें सब सेवा । वहि बनवारीका लखा न भेवा ॥

समै--जेहि बन सिंह न संचरे, पंछी बैठ न डार । सो बन कविरन दूढिया, सिंह समाध बिचार ॥ ओंकार नाद यक माया, तहँ लागे गुन तीन । तामे अटका जगत सब, भया वहीँ लौलीन ॥

रमैनी १७३--देखो देखो जीवके काजा । जात चले तज अविचल राजा ॥ ये देखो लोगनकी भूल । सींचत साख तजत हैं मूल ॥ मीठा फल तजि कडुवे खाता । जो नहिं तेहि जपे दिन राता ॥ बस्ती छोड़ उजार जग जाई । खांड तजिके खरी जो खाई ॥ करिके बिचार तजे जो कोई । जुग जुग यह सुख बिलसे सोई ॥ वहाँकी खबर सब ले आया । वहाँ नाहिं कछु मन भरमाया ॥

समै--साखा पात सींचे सब, हरियर होय सुखाय । कविरा सींचे मूलके, डार पात हरियाय ॥ आस लाय सिंचत विरवा, जाके फल नहिं पात । मोहि निसदिन संसा, दिन दिन सो हरियात ॥

रमैनी १७४--चारो जुग हम फिरे पुकारी । कोइ न माने बात हमारी ॥ कहत कहत मोर रसना हारी । मानत नाहिं मोर सुत नारी ॥ हम संजोग कीन्ह व्योहारा । बंस बेलको रचा संसारा ॥ जो हम हैं सो पूत हमाग । पिता पुत्र ते नाहिं निनारा ॥ हम नित बोलें हम नित चालें । हम करता त्रिभुवनको पालें ॥ हम जललें हम करें अहारा । यह सब आतम आप हमारा ॥ जो बूझे सो प्राण हमारे । जो नाहीं तिनते हम न्यारे ॥

समै--जिसका करता और है, निराकार नहिं होय । जो उपदेश दियो सद्गुरुने, जगत कहे सब रोय ॥ अमर तखत अडि आसले, पिंड झरोखे नूर । जाके दिलमें मैं बसूं, सैना लिये हजूर ॥

शब्दावली

(५९९)

रमैनी १७५--सुन पंडित मैं पूछो तोही । निसदिन संशय व्यापे मोही ॥ चार भुजा जाके पिंड न प्राना । सो प्रभु कैसे भयो पखाना ॥ जाका यह सब कीन कराया । सो प्रभु कैसे गरभमें आया ॥ तीन सृष्टिका करता जोई । सो प्रभु कैसे बालक होई ॥ अकास सीस पाताल जेहि पाया । सो संपुट प्रभु कैसे समाया ॥ चौदह भुवन लो जो प्रभु छाया । सो अंगुल दस कैसे कहाया ॥ नित उठ जो प्रभु सबको देई । सो प्रभु कैसे तुमसो लेई ॥

समै--आगु आगु पंडित चले, पाछे लागु संसार ।

कविरा सेवक सो भया, पाया जिन निरंकार ॥

रमैनी १७६--यह तन पांच तत्त्वका भेला । इनमें कौन गुरु कौन है चेला ॥ एह तन है एक नगर अपारा । ताकी वस्तु कहो बिस्तारा ॥ कैसी बस्ती कैसी चाला । कैसे लोगवा कैसे रूयाला ॥ कैसे रैयत कैसे राजा । कैसे हरि यह जग उपराजा ॥ यहि बस्तीकी चाल जो पाई । सो अमरापुर नगर बसाई ॥

समै--काजी पंडित पच मरे, पाये गांव न ठांव । कवीरा मोहि अचंभा, नाहिं धरायो नाम ॥ नाम न पाये गांवका, रहे नाहिं ठहराय । कविरा लखे बिन हरिके, आपा दिया गंवाय ॥

रमैनी १७७--बिना विवेक जगत भरमाना । भेष किया पै राम न जाना ॥ बिना विवेक जगत भयो रोगी । भेष धरा जग भया वियोगी ॥ जेहिके घर यह बूझ न होई । तिसके बंस न तिछे कोई ॥ बिना विवेक गये त्रिदेवा । भेष धरा पै लखा न भेवा ॥ जहां विवेक तहां करतारा । भेषहिं करता रहा निनारा ॥ भेष मध्य निराकार समाना । जहाँ विवेक तहाँ आतम ज्ञाना ॥

समै--कर बंदगी विवेककी, भेष धरे सब कोय ।

वह बंदगी बहि जान दे, जहाँ शब्द विवेक न होय ॥

(६००)

कबीरपंथी-

रमैनी १७८-देखा देखी जग भर्माना । ज्ञान कथा पै राम न जाना ॥ काहू तीरथ बरत लौ लाया । कोई सुन्न मंदिलको धाया ॥ कोई पीर औलिया सेवे । कोई नित उठ पूजे देवे ॥ कोई जोग जुगति अरुझाना । कोई मंत्र जंत्र मन माना ॥ कोई सुनि जन काया मारे । कोई जटाधर ब्रह्म विचारे ॥ कोई जन्म कर्म ठहराई । कोई बौध जती कहवाई ॥ कोई सकति ते भया संचाती । कोई भगति करे दिन राती ॥ कोई ज्ञान करता ठहरावे । कोई भूत प्रेत तन धावे ॥ एक मते चले ना कोई । अपनी मत पुरुष अपनी मत जोई ॥

समै--पिता न पाया पुत्रने, परा भरम जी माहिं । बहुते चित्त लगाइबो, ताते पहुंचत नाहिं ॥ हती एककी भई अनेककी, बेस्या बहुत भतारि । कहैं कवीर काके संग जरि है, बहुत पुरुषकी नारि ॥

रमैनी १७९--नरकी टेक गही नहिं जाई । कोट कवीर रहे समझाई ॥ कैसे उन तत गुरु पढाया । गुरु मंत्र ले जी भर्माया ॥ रहन गहन जो गुरु पढाई । सो सो जीव टेक जग भाई ॥ खांड तजे खारीको खाई । आप नासि दूजा ठहराई ॥ आपनी तजि औरकी आसा । जलमैं ठाढा मरे पियासा ॥

समै--टेक न कीजे बावरे, टेक माहिं है हानि । टेक तजे सुख पाइये, कहे कवीर निदान ॥ टेक करी रावन गये, कंस भया निरबंस । कविरा छाँडो टेक तुम, बूझ बचावो हंस ॥

रमैनी १८०--सब जगका ऐसा प्रस्थावा । सब कोइ कहे राम हम पावा ॥ कोइ कहे हम जप तप कीन्हों । तहां राम मोहि दरशन दीन्हों ॥ कोइ कहे तजा अन्न अहारा । तहं पाये हम राम दिदारा ॥ कोइ कहे हम भये संन्यासी । सार्क्य जोग करि मिले अविनासी ॥ कोइ कहें कण्ठी छाप बनाई । तहैं हरि दरशन दीन्हों भाई ॥ कोइ कहें हम दीन्हों दाना । कोइ कहें हम रामहिं जाना ॥

शब्दावली

(६०१)

समै--जहँ देखा तहँ रामको, बिन यक राम न कोय । बातन हमे जगत प्रवोये, बातन राम न होय ॥

रमैनी १८१--देखो देखो यह नर ज्ञाना । आप तजत पूजत पाषाना ॥ कोई सिद्ध करे धुन पाना । कोई रह गोड उलाटे ताना ॥ कोई बैठा तज अन्न अहारा । कोइ बैठा आसन मारा ॥ कोइ करे नित तरपन जापा । कोई धर्म करे तजि पापा ॥ कोई घर तजि भये ब्रह्मचारी । कोई अन्न तजि दूधाधारी ॥ कोइ बैठा तन खास लगाई । कोइ बैठ तन तिलक दिखाई ॥ मठ मंडपा कोइ पढ़ुंचा जाई । कोई सुन्नमें रहा समाई ॥ कोई चढावे उलटा पवना । कोइ सकल तजि भया सु मौना ॥ कोइ श्रुति स्मृति पढे पुराना । कोई तीरथ बरत जो दाना ॥ कोई देश दिसंतर जाई । हरि गुन गाई अन्न न खाई ॥ कोइ करे काया प्रछाला । कोई डाले फिरे कंठी माला ॥ कोइ करता नित राग औ रंगा । कोइ करते देव सुनीका संगा ॥

समै--देखा देखी सब जग भरमा, मिला न सद्धरु कोय । कहें कवीर कर कर नित संशय, जियरा डारा खोय ॥

रमैनी १८२--घट फूटे जल सब बह जाई । काठ जरे पावक सब जाई ॥ फूल सुखाने बास न होई । घटमें चंद न पावे कोई ॥ दूध बिनासे निकसे न घीव । बिन तन कैसेहु रहे न जीव ॥ कांसी फूटे धुन नहि आई । बिजना टूटे पवन नसाई ॥

समै--बिन तन कोई लखे न जियरा, बिन तन झूठा रूप ।

कहें कवीर झूठा किन्ह पंडित, ऐसा ल्याल अनूप ॥

रमैनी १८३--सीते सात भई सितलाई । सीते सीत रोग होय जाई ॥ सीतल मिला सो साधु कहाई । सीत बिहूना साध न पाई ॥ सीतल होय तब सीतल पावे । सीतल होय तब सीत न जावे ॥ सीते सीत अमर नर होई । सीतल राखे ज्ञानी सोई ॥

(६०२)

कबीरपंथी—

समै—सीतै मिल सीतल भया, सीतै सित अधिकाय । सीतल जीव विनासिया, सीतलकी दो बात ॥

रमैनी १८४—यहि बिधि बूझो पंडित ज्ञानी । हिय कपारकी दोउ हेरानी ॥ बूच्छ एक फल भये अनंता । माटी एक घर भये अतिअंता ॥ दो संजोग सृष्टि बहुतार्ई । कंचन एक भूषण बहु भाई ॥ सूत एक वस्तर बहु नामा । अन्न एक धरे बहु नामा ॥ अनेक जान जिय एके जाने । अलख पुरुषको जो पहिचाने ॥

समै—गहना एक कनकते गहना, नाम अनेक धराया । कहैं कबीर कंचनका भूषण, एक भया जब ताया ॥

रमैनी १८५—पंछी एक जाकी सब सेना । बिन तन जीव बोले मुख बैना ॥ बिना पंख उड़ सब जग जाई । बिना चोंच जग लीन्हा खाई ॥ वहि पंछीका खोज न पाया । जिन पंछी सब भरमाया ॥ अकास पताल कीन्ह वहि बासा । घट घट वाका भया निवासा ॥

समै—ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, असुर मुनी सुर देव । दृढत दृढत पच मुए, लखा न वाका भेव ॥ तिल जैसी है चिरैया, पंखा नौ नौ हाथ । बकोटन मास परोसन वाकी, पूछ अठारह हाथ ॥

रमैनी १८६—सांचा बनिज करो सब कोई । सांच बनिज लाभ बहु होई ॥ सब गुन भरे जीव सो देवा । निरफल वृक्षकी करो न सेवा ॥ बनखंड मांझ परोजन भाई । शब्द विचार रहो ठहराई ॥ करता पुरुष ते करो सनेहा । देह धरे जनि होहु बिदेहा ॥ जहां बूझ तहैं करता माना । साधते करता नाहिं भिनाना ॥ करता करे सब जीव जनंता । नित समझावे संत अनंता ॥

समै—जो दिल दगा समुद्र है, तेहि बन जाव जिन कोय । सो

शब्दावली

(६०३)

दिल सदा बनीजिये, जेहि दिल दगा न होय ॥ जैसा दिल मेरा अहै, ऐसा तेरा होय। कच्चा लोहा ताय करि, संधि लखे नहिं कोय ॥

रमैनी १८७--भौजल नदी महा विकरारा। मन मलाह तहैं खेवनहारा ॥ काम क्रोध दोऊ घटवानी। ते सबकी कर ऐंचातानी ॥ मोह नाव आसा कँडिहारा। लोभ और तूज्जा लहर अपारा ॥ ऐसी नदी नाव यह आई। तेहि चढ उतरे यह जग भाई ॥ उतर उतरके गये तेहि ठाऊं। मिला संदेस न लीना नाऊं ॥

समै--गुन टूटे बेरा बहे, औघट लागे जाय।

कहैं कवार मोर यह विरवा, जड़ पातो गयो सुखाय ॥

रमैनी १८८--वचन हमार तुम सुनो कवीरा। करता सब गुन धरे शरीरा ॥ आदि माया संग केल कराई। केल करत इच्छा जिय आई ॥ दो संयोग भये तिरदेवा। तिनहिन लाई उनकी सेवा ॥ सेवा करत गये जुग चारी। किनहुं न मानी बात हमारी ॥ करताकी कछु खबर न पाई। अंग बिहूना रहा लौलाई ॥

समै--बंस बेलके कारने, करता पास उपाव।

करता छोड अकरताकी नारी, पुत्रते कीन्ह अन्याव ॥

रमैनी १८९--बचन हमारा सुनो अनूठा। वेद किताब कहेको झूठा ॥ वेदको भेद न काहू पाया। झूठा वेद पंडित ले आया ॥ वेद बिहूना न पंडित होई। वेदे जाने पंडित सोई ॥ संध्या तरपन न पंडित जानो। करता लखा सो पंडित मानो ॥ भेद न पाया जग भर्माया। झूठा झगरा पंडित लाया ॥ तेहि झगरा सब जग अरुझाना। देव आदिका मरम न जाना ॥

समै--चारो जुग झगरा गये, झगरा तऊ न छूट।

यह पंडित सब जग भर्मावे, कहे कवीर सब झूठ ॥

रमैनी १९०--बाद विवाद तजो तुम ज्ञानी। बूझो बूझो हमारी

( ६०४ )

कबीरपंथी—

बानी ॥ बिन बूझे नाहीं गुन पैहो । बिन बूझे तुम हरिहिं समेहो ॥ सत् होय तेहि तजो न भाई । औ सत् तजो जन रहो समाई ॥ तजो नहिं बाप तजो नहिं माया । तजो नहिं कर्म तजो नहिं काया ॥ छाडो न आपन लोग व्योहारा । छाडों न यह सुखको दरबारा ॥ बापहिं चीन्हों चीन्हों फिर माई । तातै चीन्हों तत्त्व समाई ॥

समे—जात पात जिन छोडो, छोडो गांव न ठांव । शब्द हमारा न छोडो, जनि फेर धरावो नाम ॥ षट् दरशन भूले जात पांत तज, मिला न सद्गुरु कोय । कहैं कबीर भर्म ऊपजा, थित काहे ते होय ॥

रमैनी १९१—यहि विध बूझो पंडित ज्ञानी । जहां अगिन तहां धूम निसानी ॥ जहां जीव तहं होइहै देही । जहां पुरुष तहं होइहै जोई ॥ घटके आधार नीर घट होय । जहैं देही तहैं जीव संजोय ॥ जहां संशय तहं होइहै रोगा । जहां प्रीत तहैं होय वियोगा ॥

समे—एक एक ते होय नहीं, जो पै दूसर नाहिं ।

दूसर मिला एकै भया, इसमें संशय नाहिं ॥

रमैनी १९२—समझो शब्द होय जिय चैना । जिन परछि पाय न देखो नेना ॥ षट् शास्त्र यह करत लड़ाई । मिमांसा रहा कर्म ठहराई ॥ वेदान्त कहे ब्रह्म जग करता । जैन मते बोध चित धरता ॥ करताको ठहराया अन्याई । मंत्र शास्त्र शिव सकती ठहराई ॥ पातंजली अनेक ठहरावे । झगरा मेटे जो न्याय चुकावे ॥

समे—न्याय करे यह सोय जिन, पाया पुरुष अलेख ।

कहैं कबीर सोई जिव मुकुत, जिन यह किया विवेक ॥

रमैनी १९३—षट् दरशन यह करें बिचारा । निराकार सो सिरजनहारा ॥ निराकार दस दिशा बनाई । दसो दिशामें रहा समाई ॥ पूरव भगति पच्छिम करे ज्ञाना । उत्तर जोग दच्छिन कर्म ठहराना ॥ अग्ने काल वायव्य भई संसा । नित नेम ईसान

शब्दावली

(६०५)

नीवंसा ॥ पाताल भर्मे अकाश निराकारा । मृत्युलोकका झूठ षसारा ॥ घरकी नारि तज भया वियोगी । दसों दिशामें भया विरोगी॥ समाधलायजोतको ध्याया। अलख न चीन्हा जीव गँवाया॥

समै--दसों दिसा खाली परी, सुन्न ब्रह्म ठहरान ।

कहे कवीर यह बूझ जगतकी, यहि ठहरा गुरुज्ञान ॥

रमैनी १९४--देव निरंजन पुरुष न दूजा । वेद पुकारे पंडित कर पूजा ॥ मसजिद मुलना करे पुकारा । स्वास वेद करे निरं- कारा ॥ जवाब सवाल न पावे कोई । पुकार पुकार जन्म सब खोई॥

समै--आखंडिया झाई भई, पंथ निहार निहार ।

जीभड़िया छाले परे, अलख पुकार पुकार ॥

रमैनी १९५--षट दरशन मिल समझो बानी । केहि ठहराया आदि भवानी ॥ अलख बड़ा कि, जिन अलख लखाया । करम बड़ा कि जिन ककर कराया ॥ दसो दिशामें दस व्योहारा । दिशा बडीकी बूझनहारा ॥ जो सब बूझे करे करावे । तौन बड़ाकी जो नहि पावे ॥

समै- बीजक बतावे बित्तको, जो विज्ञ गुप्ता होय ।

शब्द बतावे जीवको, बिरला बूझे कोय ॥

रमैनी १९६--नरका ढाढस अगम अपारा । गहे न जाय जाय संसारा ॥ जनक आद जिव देह जराई । सनकादिक बसे बन जाई ॥ रावन आदि जिन सीस कटाया । हरनाकुस आदि जिन उदर फराया ॥ बलि आदिक जिन पीठ नपाई । कस आदि जिन कीन उपाई ॥ गौतम आदि जिन तप कियो भाई । विश्वा- मित्र आदि सृष्टि करि आई ॥ जमदग्नि आदि जिन तप कीना भाई । जड़भरत आदि जिन सरब गंवाई ॥

समै--षट दरशन ढाढस मरे, गन गंधर्व मुनि देव । कहे कवीर

(६०६)

कवीरपंथी-

ढाढस तजे, लखे सो अविगत भेव ॥ जेहि करता तिन दीन ढाढस, ढाढस वहाँ न होय । अंग विहूना जो रहे, अहंकार करे सोय ॥

रमैनी १९७--नर सा चतुर न दूजा होई । चतुरे चतुर मिला सब कोई ॥ पाप न चतुर चतुर व्योहारा । चतुर चतुर ठगे संसारा ॥ चतुरे सुत चतुरे मिल जोई । चतुर विहूना मिला न कोई ॥ एक न तजे करे चतुराई । माता एक जोनि ठहराई ॥ चतुरे मिल चतुरा समझावे । चतुरको भेद चतुर होय पावे ॥ एक न चतुर चतुर संसारा । सब चतुरनते करता न्यारा ॥

समै--चतुराईको छोडदे, सद्वरुको मिल बूझ । कहैं कवीर दीपक बिना, अंधेरे परे न सूझ ॥

रमैनी १९८--यह नर उतर पारको जाई । कहो पंडित मोहिं तैं समुझाई ॥ नाव न करिया न खेवनहारा । नदी विकट जेहि बार न पारा ॥ जल अगाध तहैं लहर गंभीरा । औघट घाट सब उतर कवीरा ॥ रैन अंधेरी संग न कोई । आप आप चले सब सोई ॥ दिवस न रजनी पुरुष न नारी । हरि ब्रह्मा तहैं नहि त्रिपु- रारी ॥ सुख ना भोग गुरु ना चेला । पार उतर जग चला अकेला ॥ निरगुन ब्रह्म कछु ना भाई । सुन्न सेयके सुन्न समाई ॥

समै--गुन टूटे बेरा बहा, उठ गया खेवनहार । औघट घाटी नर गया, कासों कहों पुकार ॥ फुलवा भार न ले सके, कहैं सखिन सो रोय । ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय ॥

रमैनी १९९--बाट विकट नहिं कोइ बटवानी । तौने बाट चले ब्रह्मज्ञानी ॥ नगर दूर तहैं संग न कोई । गैल सलसली उदो ना होई ॥ भेद अभेद न त्रिगुन माया । पांच तत्त्वकी हती न काया ॥ बोल चाल न पीव न खाई । अंकार नहिं नगरमें रहाई ॥ सुख अनंद ना निद्रा भाई । समझ भूल नहि आवे जाई ॥

शब्दावली

(६०७)

समै-चिउँटी जहाँ न चढि सके, राई ना ठहराय । आवागमनकी गम नहीं, तहाँ सकल जग जाय ॥

रमैनी २००-वहाँकी कोई कहे न बाता । सुन्न नगर की जो कुसलाता ॥ पुरुष साथ जरे जो जोई । वहाँकी बात कहे न कोई ॥ निरगुनमें जो जीव समाया । तेहि की खबर न कोई लाया ॥

समै-स्वाद ना पाये कंदका, सब कोइ करे बखान । मीठा मीठा जग कहे, मीठेमें भइ हानि ॥ बात पराई को कहे, परदा लखे न कोय । सहना छिपा पयारमें, को कह बैरी होय ॥

रमैनी २०१-प्रेम प्रीति सुनत जग आया । सरगुन छोड़ निरगुन गुन लाया ॥ निरगुन पदमें बैठा जाई । निरगुन रहा सुन्न ठहराई ॥ निरगुनका गुन लखे न कोई । प्रेम लगाय पुरुष औ जोई ॥ प्रेम प्रेम सकल जग बंधा । प्रेमका गुन कछु लखे न अंधा ॥ प्रेम प्रेम मुवा सब कोई । प्रेम बूझ प्रीतम है सोई ॥

समै-साध बसें हरि भीतरे, हरि बस साधन मांझ । कहे कवीर देश वह ऐसा, जहां भोर नहि सांझ ॥

रमैनी २०२-सब पंडित मिल कहे विचारी । केकर बाप काकी महतारी ॥ हमना कोइके कोइ न हमारा । उड़ जैहै जब बोलन- हारा ॥ सुन्न नगरका पवन यह भाई । सुन्न नगरमें जाय समाई ॥ संग साथ नहि कोई आया । बीचहिं माया बीच मिलाया ॥ यह कह गुरुवा जग भरमावे । सहर छुटाय सुन्न ले जावे ॥

समै-वहाँ की आसा लाय ना, झूठी यहां की आस । यह तज घर बन मांडिया, जुग जुग फिरे निरास ॥

रमैनी २०३-एक दिवस वो एके राती । सात रैन दिन कहो केहि भांती ॥ एक पुरुष वो एके जोई । दो संजोग जगत सब होई ॥ एके प्रान वो एके काया । बहुत जीव घर कहां ते आया ॥ एक ऊखकी एक मिठाई । अनेक नाम कैसे घर भाई ॥

(६०८)

कवीरपंथी—

समै--नीवके बिचले सब घर बिचला, अब कछु नहीं बसाय । कहै कवीर जो कोइ समझे, तेहिको काल न खाय ॥

रमैनी २०४--कहो पंडित तुम निगम बिचारी । काहे ते पुरुष काहे ते नारी ॥ कहाँ ते पुरुष कहाँ ते राती । काहे ते जात काहे ते पाती ॥ कहाँ ते गुरु कहाँ ते चेला । काहे ते बृच्छ काहे ते भेला ॥ काहे ते हिंदू तुर्क कहाये । काहे ते नरक सरग बतलाये ॥ कहो पंडित अनेक व्योहारा । सत् मितमें है संसारा ॥

समै--एके यह तन जीउरा, एक बृच्छ एक बेल । कहै कवीर एक जो समझे, एक अनंत अकेल ॥

रमैनी २०५--अचरज एक सुनो तुम भाई । बिंद चोराइ स्व- पचका लाई ॥ उठी बेल फल तामे लागा । माय बहिन सब गावें रागा ॥ छठी भरी तहें बाजन बाजे । बंदनवार मंडलमें छाजे ॥ पर लडका मरम काहु न पाया । तैंतिस कोट देवतन खाया ॥ जेहिका सुत तेहि राख दुराई । पर पुत्र पर तात खिलाई ॥

समै- पेडे मूल बिगाडिया, सुत आगे भरमाय । कहै कवीर जेहिका सब कीना, तेहिका कछु न बसाय ॥ आद भई अब नाही, पराबीजपर खेत । कहै कवीर समझे नहिं कोई, विरथा जीव मृग देत ॥

रमैनी २०६--भरत भूत एक खेले भाई । ऐसा भूत लखा न जाई ॥ दिवस एक भूत लपटाना । दूसर होयके पिंड समाना ॥ नावत भौहा करे दवाई । भर्म भया पै भरम न जाई ॥ नित उठ पीर वो देव मनावें । आप भरम आप थित लावें ॥ जहांते भरम उठा यह भाई । तहां भरम वह जाय समाई ॥

समै--मथुरा नगर भरम एक प्रानी, कविराके उपदेश । कहै कवीर वहां कोइ नहीं, झूठा बहुत संदेश ॥

शब्दावली

(६०९)

रमैनी २०७--पांच तत्त्व गुन एके भाई । रक्त मांस कछु भेद न पाई ॥ नासिका सरवन मुख एके बैना । रोम त्वचा पग कर नैना ॥ रक्त मांस हाड एक गूदा । ब्राह्मण क्षत्री वैश्य वो सूदा ॥ कहो पंडित तुम मोहि समझाई । बरन भेद तेहि देहु बताई ॥

समै--एक वृच्छ बहु फल लगे, कौन बड़ा को हीन । जो जाहीमें संचरे, सो ताही आधीन ॥

रमैनी २०८--पंडित खोल देख तुव ग्रंथा । जग संजोग कामिन वो कंथा ॥ नांदे बिंद समते है भाई । बालक होय विरंच बनाई ॥ नांद बिंद मिल जग भौ पाडा । ते कैसे कहे माटीको भांडा ॥ नांद बिंदकी खबर न जानी । फिर फिर धोखा कहें कहानी ॥

समै--बिन संजोग भया कछु नाहीं, ऐसा दिया संदेश । बिन संजोग जगत सब उपजा, यह आया उपदेश ॥

रमैनी २०९--बिन काजे काया जिव जारी । रट रट राम जनम सब हारी ॥ रटे रैन दिन गुरु समझाई । रटे राम पै राम न पाई ॥ रामहि जाने रहित तब होई । रामहि कहे भये जम लोई ॥

समै--बिन डाई जग हांडिया, सोरठ परिया डांड । बाटनहारा लोभिया, गुरु सो मीठी खांड ॥

रमैनी २१०--ले चोरीटा बाभन लावे । दो कर जोरके देव मनावे ॥ नारसिंह भैरोंके लाई । हनुमान देवी कहवाई ॥ पीर पैगम्बर कहें यह देवा । घर घर होय सबनकी सेवा ॥ दूध पूत मांगे जग जाई । कोई कहें कंथ सुत आई ॥ कोई कछु कोई कछु कहई । जो जो मांगे सो सो लहई ॥ सृष्टि बावरी तेहि दिल लावे । देवी देवका मरम न पावे ॥

समै--राम रहे वन भीतर, गुरुकी पूजी न आस । कहें कवीर पाखंड सब, झूठे सदा निरास ॥

कवीरपंथी-शब्दावली २०

(६१०)

कवीरपंथी—

रमैनी २११--बिस्व रूप नया न होई । बीज वृच्छ गुन नया न कोई ॥ सत मिथ्या कछु नया न जानो । मती अवस्था नया न मानो ॥ इनही निरगुन सरगुन ठहराया । इन्हि कहा इनहीं लौ लाया ॥

समै-निरगुन पुरुष सरगुनका थापा, निरगुन बसा निनार । निरगुनमें यह सब अटके, कहत कवीर पुकार ॥

रमैनी २१२--वोई नैन वो वोई बैना । वोई कंथ कामिन सुख चैना ॥ वोई गुन तत्त्व वोई सब भाई । वोई प्रकृति वोई रस आई ॥ वोई करें औरहि ठहराई । पुरुष विदेही फिर जग समझाई ॥ ऐसी तजे पुरान न पंथा । तत्त्वमा सगरे डारे कंथा ॥ प्रगट जगतमें देत दिखाई । फिर फिर गुरुवा ग्रंथ सुनाई ॥

समै--अपनी सुरत बिसारिके, पढ पढ भया निरवान । जो जौन जाके बस परा, सो ताके आधीन ॥

रमैनी २१३--पांच तत्त्व गुण जीव औ देही । पचीस प्रकृति विकार सनेही ॥ तिनमें चार बरनको भाई । तेहि पंडित मोहि कहो समुझाई ॥ नांद बिंद जब जाय समाया । जीव सनेही भई यह काया ॥ माटीकी काया क्यों ठहरावे । अवरन बरन गुन बरन लगावे ॥ बरन लगाय गहे नोलावे । कहि कहि पंडित जग भरमावे ॥

समै-जीव ब्रह्म पर ब्रह्म ना, अरजन बरन शरीर । हिन्दू तुर्क दोळ मिल भूले, कहत पुकार कवीर ॥

रमैनी २१४--सब कोइ बात नहीं समझावे । कोइ ना मोहि वह देश दिखावे ॥ उदे अस्त लो वाहीकी बातें । हिन्दू तुर्क कहें कुसलाने ॥ सब जग वाहीते लौलाया । कर्ता न लखा जीव भर्माया ॥ षट दरसन छियानवे पारखंडा । लेके प्राण चढे ब्रह्मंडा ॥ वह देसवाकी खबर न पाई । बेद किताब सबन सुनाई ॥

समै-देव रिषी सुर औ गन गंधर्व, जच्छक किन्नर आद । कहें कवीर सब वहीं समाने, कर गुरुवा सो बाद ॥

शब्दावली

(६११)

रमैनी २१५--गुन टूटे बेडा वह जाई। टूटे डोर पतंग न आई॥ घट फूटे जल औघट जैहै। काया गये जिव सुन्न समैहै॥ कला बूके नट जीव गंवाई। आप चीन्हे विन करता न पाई॥ दूध विनासे घिव ना होई। पुरुष विना सुत जने न जोई॥

समै-विन बूझे धोखे गये, तिरदेवा तिरलोक। थित ना पकड़ी सृष्टि यह, यही भया जी सोक॥ बहते बहते औघट गये, पाया घाट ना तीर। बही सृष्टि सब जात है, कासों कहैं कवीर॥

रमैनी २१६--उतपत प्रलय वहांकी न होई। रूप न रेख पुरुष न जोई॥ सूक्ष्म स्थूल न वंहे ठाऊं। अर्थ उर्ध निर्जन नाऊं॥ निराकार निरगुन वह देवा। यह उपनिषद देत है भेवा॥ चारो जुग सेवा चित लाया। निरगुन पुरुष न काहू पाया॥ एक होय तो कह समझाई। सकल सृष्टि ते कहा न जाई॥

समै-नारि वह अंग बिहूना, सुत कन्या भइ चार। माता विगडी सुतन ते, पंडित लेहु विचार॥

रमैनी २१७--जेठ मास जल जाय सुखाई। कुम्भका नीर कहांते आई॥ कहो विष सर्प कहाँते लाया। कहो मक्खी मधु कहांते पाया॥ गये चारा भीतर घांस कराई। च्छीर कहाँते गऊ वह दुहाई॥ अगिन काठमें कहाँते आई। पुष्पमें बास कहाँते भाई॥ सरमें ज्ञान कहाँते होई। करामात कहाँते सोई॥ बनखंड माहिं परा संसारा। हैं सब नेरे कहत निनारा॥

समै-नियरे रहा दूर अब भइ, भई वहांकी आस। कहैं कवीर गया तब तहवाँ, फिरके चला निरास॥

रमैनी २१८--पांच चार बैठे एक तीरा। तहां बसे परमहंस कवीरा॥ पांच चार मिल खेले पाला। तिनका भया हंस यह बाला॥ पांच चारके है यहते जो जो। किया करे इनका वह

(६१२)

कबीरपंथी—

सो सो ॥ पांच चारके जो बस आया। ते करताको चीन्ह न पाया ॥ पांच चार बस लावें जोई। सुबस बसें सो करता होई ॥

समै—पांच चार जग लूटे, कोई लिया न भेद। जग पंडित भर्मावई, पठ पठ चारों वेद ॥ बारह मास जुग चारो, नौ नायकके साथ। कहें कबीर किनहीं नहीं चीन्हा, झगरा चला जग हाथ ॥

रमैनी २१९—बाजीगिर एक बड़ा अन्याई। आप न नाचे जगहिं नचाई ॥ सब जग करे वाहीकी सेवा। घर घर गुरु पुजावें देवा ॥ बाजीगरकी कोइ खबर न पावे। नाचे जग जो नाच नचावे ॥ बाजीगरको लखे जो कोई। सो बाजीगरका गुरु होई ॥ बाजी खेलाय रहा संसारा। बिरला बाजी बूझन हारा ॥

समै—बिना रूप बिन रेख बिन, जगत नचावे सोय। मारे जांचे जो नहीं, ताहि डरे सब कोय ॥ डर उपजा जिय माहिं डरा, डरते परा न चैन। लेखा रामै देन है, यही कहें दिन रैन ॥

रमैनी २२०—तन धरके नर सुख ना पाया। हीरा जन्म बिन काज गँवाया ॥ योगी जंगम भया सन्यासी। जती सती बैराग उदासी ॥ वनखंडी ब्रह्मचारी ग्रेही। जहां लो जीव धरे जग देही ॥ पात पात सब दुखिया भाई। सुखमें दुख जग लीन उठाई ॥

समै—सुखका सागर मैं रचा, दुख दुख मेलो पांव। थित न पकड़ी आपनी, चले रंक औ राव ॥ दुख न हता संसारमें, हता ना सोग वियोग। सुखहीमें दुख लादिया, बोली बोले लोग ॥ सुख विलसो सुख विलसो, काटो भरमकी डोर। कहें कबीर पुकारिके, जगते होर बहोर ॥

रमैनी २२१—सांच कहों तो जग दुख पाई। झूठ कहों तो कहा न जाई ॥ सत् बात झूठ जग जाने। झूठ बात सत्के माने ॥ कहा हमार न माने कोई। पूत धरै है बापकी जोई ॥ सरगुन ब्रह्म

शम्बाबली

(६२३)

निरगुन ठहराई । पिता ते पुत्र होय जग भाई ॥ ससुर बहूका भर्ता होई । बहूकी सौत ससुरकी जोई ॥ बहिन होय भैयाकी नारी । जो इला लौट होय महतारी ॥

समै--ऐसी जगकी चाल, मूल वस्तु माने नहीं । भरम परा संसार, माने जो जाही कहीं ॥

रौनी २२२--कहो पंडित तुम मोहि समझाई । छीर गऊ यह कहाँति लाई ॥ जंत्र होय सब निकसे भाई । मधको कौन दोष लगाई ॥ जहँ लग वस्तु पृथ्वी पर होई । पांच तत्त्व विन उपज न कोई ॥ सो नित खाय सकल संसारा । मद माँस दे दोष निनारा ॥ जोहिके मन जो चाल जो भाई । सोइ कछु करे वहे कराई ॥ पांच तत्त्वका यह विस्तारा । पांचो ते कछु नाहि निनारा ॥ स्वासा बिंद कहो जो नाहीं । वह संयोग वाहिके माहीं ॥

समै--आद अटकमें सब परे, अटक तजे नहीं कोय । कहँ कवीर नर बंधन भया, आवागमन न होय ॥

रौनी २२३--गुरु गुरु करे न गुरुवा पावे । सद्वरु माहीं जगत समावे ॥ सातो गुरुवा मर गये भाई । निहअच्छरमें गये समाई ॥ जब जग मर गये लोक सिधाया । निहअच्छरकी खबर न पाया ॥ यह अजपासे अजपा नियारा । तहाँ उठे अनहद झनकारा ॥ अधर दीप है वाको नामा । जगत मुवा गया उस ग्रामा ॥ बिन कर बिन पग सब कहँ जावे । नैन बिन देखे बिन मुख गावे ॥ बिन हिय बिन सरवन सुनता । रुन झुन सोहँ सोहँ झुंता ॥ बिन नासिका बिन इंद्री भोगा । बिन गुन बिन जिव जोगी जोगा ॥

समै--जोगी ऐसो जुगति बिहूना, तासों जनि करु नेह । कहँ कवीर तुम करता, खोजो काल पुरुष विदेह ॥

रौनी २२४--ऐसी सुनी अकथ कहानी । सुर नर मुनि सब

(६१४)

कवीरपंथी—

गावैं प्रानी ॥ क्षर अक्षर निअक्षर गावे । तत्त्व माहिं निज धर्म बतावे ॥ अमी शरीर नांद औ बिंदा । निहअच्छर पुरुष तहैं करे अनंदा ॥ सुन्न परे निज धाम बताया । निरगुन पुरुष तहां ठह- राया ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर थाके । सुर नर सुनि तहां कोइ न राखे ॥ सब बातनते रहैं निनारा । निहअच्छर पुरुष जान अपारा ॥ हिंदू तुर्क दोऊ यक बानी । निहअच्छर पुरुष न कोऊ जानी ॥ निरगुन सोइ निअक्षर जोई । लखे न वाको चले सब कोई ॥ छर कहे माया अच्छर प्राना । निहअच्छर निरगुन निरवाना ॥ बस्ती उजार उजार बसावे । छर अच्छरकी खबर न पावे ॥

समै--छर अच्छर दोनों नहीं, निहअच्छर निज नाम । सुन्नके परे मुकाम है, सो जानो निज धाम ॥ सुन्न परे एक शिखर है, तापर है एक ठांव । तहांते हंसा आइके, जीव धरायो नाव ॥ शिखर परे निज धाम है, शब्द उठे गंभीर । तहांते हंसा आइके, भये वीर कवीर ॥ घरको छोड़ बाहर चले, निहअच्छर जहं नाम । कहैं कवीर पुकारके, द्वादस गये निज धाम ॥ निहअच्छर निजधाम है, तो सुन्न परे है नाहिं । सुन्न परे निज सुन्न है, निरगुन पुरुष वहां नाहिं ॥

रमैनी २२५--षट् दर्शन मिल कर बिचारा । आपन आपन मत कीने न्यारा ॥ औ पंथ अनेक हैं भाई । अपन अपन मत सबे बताई ॥ अपनी अपनी कथा बतावैं । करताका अस्थान न पावैं ॥ जोगी कहैं जोग करो भाई । अलख पुरुष तब देइ दिखाई ॥ जैन कहैं करो पारस पूजा । पारसनाथ पर देव न दूजा ॥ सन्यासी कहैं तत्त्व जो जारी । सच्चिदानन्द मिले त्रपुरारी ॥ जंगम कहैं करो शंकर सेवा । संकरनाथ पर और न देवा ॥ दरबेस कहैं चार पर आवैं । अल्लह तब लाहूत दिखावैं ॥ ब्राह्मण कहैं वेद जो जाने । वेदकी रीत ते ब्रह्म पहिचाने ॥ यहि विधि कहैं जहां लो पंथा ।

शब्दावली

(६१५)

निरगुन कथ गल डारें कंथा ॥ नौधा भगतिका भेद बतावें । चौका आरति और करावें ॥ जमते तिनका बहुर तोड़ावें । शरीर अर्थ नारियर अरपावें ॥ निहअक्षर निरगुन निरवाना । लैके जाय जवे निनाना ॥ पान परवान सनंद जब पावे । अधर दीप तब जाय समावे ॥ निरगुन निराकार निज जोई । अलख निरंजन जाने सोई ॥ जो परवाना पावे भाई । अमरलोक सोह जाय समाई ॥ सोरहें भान तेज सो होई । वाकी सुरत करे सब कोई ॥ ऐसे कह कह जग भरमाया । सबै जीव यहि भांति ठगाया ॥ वे व्योहार सुने मन माना । यही कहें मोहिं वा घर जाना ॥ घर घर झालर झाझ बजावें । निहअक्षरकी लीला गावें ॥ वहांसे उतर यहां जिव आया । यहां वहां कछु भेद न पाया ॥ कहे मैं कहो सो न समझे कोई । शब्द हमार न चीन्हे लोई ॥ जो कोइ सुरतवंत होय सांचा । काल मिटावे मनसा बाचा ॥ सुवना सेम्हर बहुत दिढाया । ऐसे कह कह मान उतराया ॥ सुवना सेम्हर त्यागो भाई । यही छुगली पर बैठो आई ॥ सुगना सुरत कीन जिव सांचा । सेम्हर त्यागो मनसा बाचा ॥ उड़ सुगना छुगली पर आई । छुगली प्रीत कीन्ह चितलाई ॥ वही सेय पाई तहँ हरुना । जबहिं निरासा उड़ सुवना ॥ ऐसे जीव भूल भटकाया । आरति चौका बहुत कराया ॥ देहै त्याग जैहै यहि लोका । सत्तनाम सुमिरो नहिं सोका ॥ बारह बाट कीन जिव भाई । समता नाहीं लोग लुगाई ॥ झूठी बनिज करो मत कोई । सांचा शब्द परखो निज सोई ॥ जीवन भई भर्मकी फांसी ॥ सुये मुक्ति कौन उदासा । अच्छर अमर वो छर है माया । यहीते सब जगत डराया ॥ ज्योंका त्यों छर अक्षर भाई । बिना बूझ सब जगत डराई ॥ ये तो सबे चढे ब्रह्मण्डा । भये झूठ सबही पाखण्डा ॥

(६१६)

कवीरपंथी—

समै--साहेब अंते है नहीं, जेहि सेवे संसार। तुझही ते साहेब तुझहीते बंदा, कहैं कवीर पुकार॥ ऊपरकी दोऊ गई, हृदयकी गई हेराय। जाके चारो लोचन गये, तासो कहा बसाय॥ सेम्हर करे सुगना, छुगले बैठा जाय। सीस पटके सिर धुने, ये उसहीका भाय॥

रमैनी २२६--अगम अगोचर कहैं सब ज्ञानी। विरला बूझे हमरी बानी॥ कवीर कवीर कहैं सब कोई। जहँ लग सृष्टि कवीरा सोई॥ तामे अनेक विवेक समाना। सो कवीर जिन रामहिं जाना॥ अल्लह राम न दो हैं भाई। अल्लह रामने सृष्टि उपाई॥ एक कवीर समुद्रके तीरा। जलहल बूड़ा एक कवीरा॥ दोनों एक कवीर कहाया। वैष्णव एक कवीरा गाया॥ एक कवीर कासीमें रहिया। अनंत कवीरको तेरा सहिया॥ अनंत बीज करता कहवावे। देश देश अपनी मत गावे॥

समै--तुर्की अरबी फारसी, संस्कृत उनमान।

अपनी अपनी भाषा, सब कोई करे बखान॥

रमैनी २२७--तीन काल बिच खेलो भाई। इक्कीस छै सोलह ठहराई॥ ताते अठोत्र जाप कहाया। नारी पुरुष यहि देख भुलाया॥ छैसौ छत्र जाप जो होई। एक एक ते अंस मिले सोई॥ यह अजपाका जाप विचारा। एक जपत हैं तत्त्व निरंकारा॥ अघर दीप तेहि साहेब खेला। वहाँ करें नर नारी मेला॥ तेहि मिल सुन्न यह सब जग धाया। तार एक बिच अगम बताया॥ अजपा अनहद रहे भुलाई। येहीकी गर्ज यहीकी झाई॥

समै--बिनरी बरसे सावन, त्रिबेनीके घाट। झाई झलके सुख करे, पाडीजीकी बाट॥ तन छूटे जो तन लहे, आवागवन न होय। कहैं कवीर यह भरम है, यह वह मेटो दोय॥

रमैनी २२८--अघर दीप तेहि नाम धराया। जीव ब्रह्म पर