करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
जब निरंजन की बात न चली, वो कटने लगा तो उसने क्रोधित होकर कहा कि तुमने पहले भी मुझे मानसरोवर से निकाला था और अब मेरी दुनिया में तुम आए हो, इसलिए मैं बदला भी लूँगा । यह कह निरंजन ने विकराल हाथी का रूप धारण किया और साहिब पर झपटा।
ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँड़ दाँत गहि मोरा ।।
मारेऊ शब्द पाँय पर पेली । तोर सूँड़ समुद्र गहि मेली ।।
पुरुष रूप तबहीं पुनि धारा । जौन सरूप सकल औतारा ।।
साहिब कह रहे हैं कि तब मैंने वहाँ परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया और उसकी सूँड़ पकड़कर समुद्र में फेंक दिया। तब निरंजन अधीन हुआ, कहा कि क्षमा करो, मैंने आपको पहचाना नहीं था, आप तो स्वयं साहिब हैं, मेरा बड़ा भाग्य है कि जो आपने मुझे दर्शन दिये। अब आप दुनिया में जाएँ, पर मेरी भी एक विनती सुनें। कहा कि यदि आप सभी जीवों को अपने लोक ले जायेंगे तो मेरे शाप का क्या होगा । (क्योंकि निरंजन को रोज एक लाख जीव निगलने का शाप मिला था ) । निरंजने ने कहा कि जो जीव पाप कर्म करेंगे, क्या वो भी पार हो जायेंगे । तब साहिब ने कहा कि जो जीव मेरे शब्द पर चलेंगे, मेरा कहा मानेंगे, उन्हें तुम हाथ भी नहीं लगाओगे। पर दूसरी ओर जो मेरे शब्द के विपरीत चलेंगे, उन्हें तुम ले जाना ।
सुनो निरंजन वचन हमारा। नहीं सत्त वो जीव तुम्हारा ।।
इस तरह साहिब का निरंजन से करार है । यही कारण है कि मैं आपसे कह रहा हूँ कि भजन हो सके तो करना नहीं तो कोई बात नहीं है, पर नाम लेकर ग़लत नहीं चलना। जो वस्तु दी, उसे संभालना। किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करना । सत्य नाम निज औषधी, खरी नियत से खाय
औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ।।
6. जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है
जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्माण्ड
में कहीं नहीं है
है
जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है । यह बात अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । इसमें कहीं भी अहंकार की बात नहीं है । यह अलग बात है कि लोग अपनी समझ से इसका कैसा भी अर्थ लगाएँ। पर यह बात बड़े गहरे विश्वास के साथ बोल रहा हूँ। यह अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । अहंकार से बड़ा परहेज करता हूँ। मेरा मानना है कि जैसे शरीर को कैंसर खा जाता है, इसी तरह अहंकार ज्ञान को खा जाता है । कितना भी ज्ञानी हो, अहंकार उसे ख़त्म कर देगा। इसलिए मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ । यह बात सत्य बोल रहा हूँ। मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूँ। सत्य मानना, मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। मैं यह बात विचार करके बोल रहा हूँ, मैं यह बात विवेक से बोल रहा हूँ, मैं यह बात ज्ञान से बोल रहा हूँ। मैं इन शब्दों को प्रमाणित कर सकता हूँ। हम अपने आस-पास में नाना मत-मतान्तर देख रहे हैं। अगर ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि 70 प्रतिशत माँस, शराब का इस्तेमाल करते हैं । हालांकि वो भक्ति की बात भी कर रहे हैं, हालांकि वो संत- मत की बात भी बोल रहे हैं, पर उनका खान-पान ठीक नहीं है, उनकी आचार संहिता भी ठीक नहीं है, कर्म से भी वो उत्तम नहीं हैं। बहुत डाउन हैं वे । आप खान-पान में भी बेहतरीन हैं और कर्म से भी बड़ा अन्तर है । वो छल, कपट, धोखा आदि कर रहे हैं, लेकिन आपकी जिंदगी एक स्थिर जिंदगी है । आप चाहकर भी ग़लत नहीं कर पाते हैं। जैसे ही करने जाते हैं, एक शक्ति आपको सतर्क करती है, आपको सावधान करती है । यह प्रासंगिक बदलाव हरेक नामी की जिंदगी में दिखाई देता है। और फिर सुरक्षा के मामले में भी आप लाजवाब हैं। ज्ञान के
मामले में भी आप परम- ज्ञानी हैं। क्या करने योग्य है, क्या नहीं करने योग्य है, यह भी आपको समझाने की ज़रूरत नहीं है । जैसे ही आप कोई ग़लती करने जाते हैं, अन्दर से एक प्रेरणा मिलती है, आपको वो ताक़त चेतन करती है, बताती है कि यह न किया जाए । यह ज्ञान आपके पास है । आप महसूस करते हैं। भक्ति-क्षेत्र में आप अनूठे हैं। जब आप अन्य मत-मतान्तरों की तरफ देखते हैं तो एक बात का पता चलता है कि कभी वे भैरो को मानते हैं, कभी काली जी को मानते हैं, कभी कुछ करते हैं। इसका बोध मिलता है, इसकी जानकारी मिलती है । वे भ्रम में हैं; वे अनिश्चित हैं । आपको इसका ज्ञान है कि दुष्टात्माएँ कैसे व्यवधान डालती हैं । आपको इसका बोध हो जाता होगा । आप भक्ति में मजबूत हैं । आप दुनिया से निराले हैं। दुनिया का हरेक आदमी मन के नशे में है, मन की पकड़ में है । हरेक को मन, जैसे चाहे, नचाता है, पर आप मुक्त हैं । आपके ऊपर मन का ज़ोर नहीं चल पाता है। साहिब कह तो रहे हैं-
नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह जग बाँध नचावे ॥
नि:संदेह इस मन का कोई ज़ोर आपपर नहीं चल रहा है । मन बेबस है | पूरी दुनिया को यह नचा रहा है। एक नशा - सा मन का सबके ऊपर है। माया का एक नशा-सा सबके ऊपर छाया है । पर आप मन की पकड़ से आज़ाद हैं। मन का नशा छाता है तो काम, क्रोध आदि जाग्रत होते हैं । ये चीजें आपमें भी हैं, पर आपके पूरे कण्ट्रोल में हैं। आपका ये चीजें कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं। आपमें आध्यात्मिक शक्ति भरपूर है । आपके पंथ में लाजवाब शक्तियाँ हैं । आप मन, कर्म, वचन से किसी को पीड़ा नहीं देने वाले, अन्दर से शांत और सुखी हैं। एक ताक़त आपको प्रेरित कर रही है । आप पूरे सुरक्षित हैं। भूत-प्रेत आपके पास नहीं आ पा रहे हैं। आपके पास आना तो दूर, यदि आप किसी ऐसे ग़ैरनामी के पास बैठकर नाम करेंगे जिसके पास में भूत होगा तो वहाँ से भी भाग जायेगा । आपपर कोई जादू, टोना, सिद्धि ताक़त प्रभाव नहीं डाल पा रही है। मेरा मानना है कि साहिब एक बात की अनुभूति दिलाता है। जीवन में एक बार, दो बार या कई बार, पर दिलाता है। यह काम साहिब खुद करता है । एक बार धर्मदास जी उदास हो गये । साहिब अपनी जगह धर्मदास को देकर
जा रहे थे। धर्मदास ने कहा कि काल - पुरुष में जान है; सबको भ्रमित कर दिया; मुझसे कैसे होगा ? लोगों को भक्ति में कैसे जोडूंगा? साहिब ने कहा कि चिंता मत कर ।
पुरुष शक्ति जब आन समाई । तब नहीं रोके काल कसाई ॥
कहा कि जब परम-पुरुष की ताक़त आकर समायेगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा। जिस दिन नाम मिलता है उस दिन परम - पुरुष की ताक़त आकर समाती है। तब काल का ज़ोर नहीं चलता है । आप इन बातों पर मनन करें। इनमें से कितनी बातें आपके साथ में हो रही हैं। यह आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता है । आपके साथ में एक ताक़त है, यह मेरी वाणी से अधिक आप स्वयं जान सकते हैं। मुझे आपको कुछ समझाने की ज़रूरत ही नहीं है । मेरी वाइब्रेशन ही आपको समझा देगी। सत्संग में बैठकर उलटी गिनती गिनूँगा तो भी समझ आ जायेगी और आप कभी बोर भी नहीं होंगे। वाणी से समझाना तो एक बहाना है । रावण का दिल बदला ही नहीं। राम जी थे । दुर्योधन का दिल बदला ही नहीं। कृष्ण जी थे । पर साहिब कह रहे हैं- सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरी
रंग डारी ॥
यह काम बड़ा मुश्किल है । इस पंथ में आने में रुकावटे हैं कुछ । निरंजन रुकावटें डालता है । मेरे लिए लोग जो-जो भी कह रहे हैं, अच्छा ही कह रहे हैं, ठीक ही कह रहे हैं। केवल अपनी शैली बदल रहे हैं। मैं सब चीज़ सकारात्मक लेता हूँ। मैं नकारात्मक में जाता ही नहीं हूँ । कुछ लोग कह रहे हैं कि इसके पास हिप्नोटिज्म है। इससे उच्चाटन किया जाता है। सही तो कह रहे हैं। जो वस्तु मेरे पास है, वो किसी के पास नहीं है। पर वो हिप्नोटिज्म कह रहे हैं । संतों के शरीर से अध्यात्म किरणें निकलती हैं; वो जगाती हैं । तो उन्हें यह हिप्नोटिज्म लग रहा है । फिर दूसरा कह रहे हैं कि धर्म बदल देता है । यह भी सही है। दुनिया निरंजन के धर्म का पालन कर रही है, मैं परम-पुरुष के धर्म की ओर ले चल रहा हूँ। मैं कुछ भी नकारात्मक नहीं ले रहा हूँ। मैं उनकी बातों को ठीक-ठीक मान रहा हूँ। तो आपका बदलाव मामूली नहीं है। आप दुनिया से निराले हैं । आपके खोटे कर्मों को निकाला गया है। अगर गुरु चेले की ग़लती बोलने में
झिझक रहा है तो समझना कि वो गुरु मर चुका है। मैं उदण्ड नहीं हूँ, पर आप यह नहीं सोचना कि आप ग़लती करें और मैं कुछ न कहूँ। यह नहीं सोचना । गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट । अन्तर हाथ सम्हार दे, बाहर मारै
चोट ॥
आपमें जो बदलाव है, वो मामूली नहीं है । आप दुनिया से निराले हैं। जो काम आपसे नहीं संभलने वाला होता है, उसमें एक ताक़त आकर आपको मदद दे जाती है। वो एहसास करवाती है कि साथ में हूँ । मैंने जो कहा कि ‘जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है, ' प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है । 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है। वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा । अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा । कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था । पर नहीं हो सका मन काबू में । इसलिए—
नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥
जब पूर्ण गुरु एक ताक़त रोपित कर देता है तो अन्दर का पूरा खेल दिखने लगता है, अपने अन्दर के शत्रुओं को साधक समझने लगता है, मन समझ में आ जाता है । मैंने बार-बार कहा है कि 'जो वस्तु मेरे पास है वो कहीं नहीं है'। यह सुन एक ने मुझसे कहा कि जो आप कहते हैं कि जो पॉवर मेरे पास है, किसी के पास नहीं, इसे प्रमाणित करो। मैंने उससे कहा कि मैं पॉवर नहीं बोल रहा हूँ, वस्तु बोल रहा हूँ । शब्दों की तरफ ध्यान दो । जैसे कोई दुकानदार कहता है कि जो मिर्ची मेरे पास है, कहीं नहीं मिल सकती। वो कहता है कि यह फलानी - फलानी जगह से आई है । ... तो मैं जिस 'वस्तु ं की बात कर रहा हूँ, वो भी इस संसार की नहीं है, तीन लोक में कहीं नहीं है। वो चौथे लोक की वस्तु है। जब वो वस्तु मिलती है तो तीन चीज़ें आ जाती हैं। मैंने अपनी इस चीज़ का अनुभव एक-दो पर नहीं, बल्कि लाखों
लोगों पर किया है । इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है । तीन चीजें शर्तिया होती हैं। जिसे भी मैं नाम देता हूँ, तीन चीज़ें पक्का हो जाती हैं— 1. आत्मा और मन अलग हो जाते हैं। 2. संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है । 3. एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है। असर सामने है। मेरा हर नामी नाम पाकर बदल जाता है। हर इंसान मन तरंग में नाच रहा है । मन प्रबल है । पर मेरे नामी के साथ अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। नाम पाने के बाद मेरा हर नामी चेतन हो जाता है । अन्य पंथों के लोगों के साथ मेरे नामी की तुलना की जाए तो उनका अपने ऊपर कोई होल्ड नहीं मिलता है, कोई आध्यात्मिकता नहीं मिलती है। मेरे नामी अपने को सबसे अलग पाते हैं, उन्हें अपने अन्य साथी बेवकूफ़ लगते हैं, उनकी हरकतें पागलों वाली लगती हैं, क्योंकि उनके मूड का कोई पता नहीं होता कि कब अच्छे बन जाएँ और कब गंदे | कब मूड खराब हो जाए, कोई पता नहीं । यानी मन पर कोई होल्ड नहीं होता, इसलिए पागल लगते हैं । मेरे नामी का मन पर होल्ड होता है, क्योंकि नाम के साथ मैं मन से उसकी आत्मा का बिलगीकरण कर देता हूँ, दोनों को अलग कर देता हूँ, जिससे मन समझ में आने लगता है। यह काम दुनिया में सबसे कठिन है, जो कोई नहीं कर सकता है। जब मन समझ आने लग जाता है तो दुनिया फीकी लगने लग जाती है, उसका आकर्षण समाप्त होने लग जाता है । फिर तीसरा हर नामी को लगता है कि उसके साथ में एक सबल संरक्षक है, हरेक को वो संरक्षक अनुभव होता है । सच है, यह जो वस्तु मेरे पास है, किसी के पास नहीं है। इस वस्तु से मन की दुनिया समाप्त होती जाती है और आत्मा का रूप समझ आने लग जाता है I ध्यान क्यों किया जा रहा है ? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है । किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है । मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है,
सभी उलझन वाले हैं । जब भी कोई चाहे कि इससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन-दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। एक अदद गुरु आपको बाहर निकाल देगा। मन की पहली ताकत है- अज्ञान । मन आत्मा में ऐसे घुल-मिल गया है कि बड़ा झमेला हो गया है। आत्मा यह झमेला लिए-लिए घूम रही है, इसे समझ नहीं पा रही है। चाहे कोई करोड़ों उपाय भी कर ले, इस झमेले को समझ नहीं सकता है, मन की सीमा से बाहर नहीं जा सकता है। गुरु यथार्थ में आत्म रूप दिखाता है। हंस की चोंच में गुण है। वो दूध पीता है । अगर उसमें पानी मिला हो तो वो उसे छोड़ देता है, केवल दूध-दूध पी जाता है। यदि पाव दूध में पाव पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वो पूरा दूध पी लेगा और पूरा पानी छोड़ देगा। यह काम और कोई नहीं कर सकता है। केवल हंस। ऐसे ही पूर्ण सद्गुरु की सुरति में यह ताकत है कि आत्मा और मन को अलग कर सकता है । यह काम गुरु पल में कर देता है । फिर आत्मा दुबारा मन में नहीं समा सकती । चाहकर भी नहीं । जैसे- दूध को मथ घृत न्यारा किया,
पलट कर फिर ताहिं में नाहिं समाई ॥
दूध से घी बना लिया तो फिर दूध नहीं हो सकता। यदि दही को मथ मक्खन निकाल लिया तो फिर चाह कर भी उसमें नहीं समा सकता। जब पूर्ण गुरु आत्मा को मन से अलग कर देता है तो फिर आत्मा मन में नहीं समा सकती है। कितनी भी ताक़त लगा ले कोई, यह काम नहीं कर सकता है । पर-
कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥
तब एक संतुष्टि मिलती है । जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है । फिर आप चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे । जगत के पदार्थ आपको रोमांचित नहीं कर पायेंगे। ऐसे पर ही कहा- सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण । नाम अकेला रह
गया, पाया पद निर्माण ॥
यह काम पल में किया। फिर तीसरा, एक सुरक्षक भी साथ हो गया। हर पल के लिए एक ताकत साथ में दे देता है । तभी तो कहा— जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहीं ।
प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो न समाहिं ॥
जो आप अपने को महसूस कर रहे हैं, यही धोखा है। यह आपा ही आसक्त है। यह पूरा खत्म हो जाता है । क्यों ? गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह । बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो
देह ॥
गुरु आपको अपने समान कर देगा । आप अपनी दुनिया ही भूल जाओगे । साहिब की वाणी में वजन है—
नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा ॥
सच मानना, अभी बार- बार चेताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा तो दुनिया पछताएगी, क्योंकि सत्य है - जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।
पलटू कहै साँच कै मानो । और बात झूठ कै जानो ॥
जहवाँ धरती नाहिं अकासा । चाँद सूरज नाहिं परगासा ॥
जहवाँ ब्रह्मा विष्णु न जाहीं । दस अवतार न तहाँ समाहीं ॥
आदि जोति ना बसै निरंजन । जहवाँ शून्य शब्द नहिं गंजन ॥
निरंकार ना उहाँ अकारा । अक्षर शब्द नहिं विस्तारा ॥
जहवाँ जोगी जाए न पावै । महादेव ना तारी लावै ॥
जहवाँ हद अनहद नहिं जावै । बेहद वहाँ रहनी ना पावै ॥
जहवाँ नाहिं अगिनि परगासा । पाँच तत्व ना चलता स्वाँसा ॥
सुन्न गगन में उठत है, सो सब बोल में आवै ।
निःसदी वह बोलै नाहीं, सो सत सबद कहावै ॥
- पलटू साहिब
7. नाम दान का दिन
नाम दान का दिन
जब आप नाम-दान लेने आ रहे हो तो एक बात जान लेना कि आज आपका नया जन्म होने जा रहा है । आज तक जीवन में जो कुछ भी छल- कपट किया, पाप-कर्म किये, भूल जाओ, क्योंकि तब अज्ञान में थे, पाप-पुण्य का इतना बोध नहीं था। वैसे पाप होना नहीं चाहिए, पर पूर्व संस्कारों से बुद्धि न हुई और इस कारण पाप हुए। खैर, अब आप अज्ञानी नहीं रहेंगे। पाप- पुण्य का बोध आपको हो जाएगा, इसलिए अब कुछ ग़लत नहीं करना । सात नियम आपको बताए जायेंगे, जिनपर आपको दृढ़ता से चलना होगा। चिंता मत करें, आपको नाम की ताक़त का सहयोग मिलेगा। कहीं गफलत में होंगे तो वो ताक़त आपको रोकेगी, समझायेगी, पर उसके अनदेखा नहीं करना । यदि उसे अनसुना करके जानबूझकर ग़लत किया तो माफी नहीं मिलेगी। सज़ा साथ- साथ मिलेगी। सत्य बोलना, माँस न खाना, नशा न करना, चरित्रवान रहना, हक की कमाई खाना, जुआ नहीं खेलना और चोरी नहीं करना । तो आपको पहले ये नियम बताए जायेंगे । आप एक विश्वास के साथ नाम लेने आ रहे हैं तो और जगहों पर आपका विश्वास नहीं होना चाहिए, क्योंकि जिसकी सभी में आस्था है, समझो कि उसकी किसी में आस्था नहीं है, इसलिए वो नास्तिक है। आप आस्तिक होकर आएँ। पूरे विश्वास के साथ आएँ। इसलिए यदि आपने कोई डोरे, ताबीज, ग्रहों वाली अँगूठियाँ आदि पहन रखी हैं तो वो सब उतार आएँ, एक पूरे विश्वास के साथ समर्पित भाव से आएँ। ‘एक नाम को जानकर दूजा देई बहाय ।।' समझ लें कि आप सही जगह जा रहे हैं। मैंने बार-बार कहा है कि जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। इस बात को दिमाग़ जल्दी नहीं मानता है । आप विश्वास रखें। ऐसे ही सब कुछ नहीं कहा। पर मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं ही साहिब हूँ, मैं ही सब
कुछ कर रहा हूँ। मैंने तो साहिब के लिए कहा। अपना नाम लेना ही नहीं है । पता है, दुनिया डर रही है। खैर, अभी तो साहिब पर्दा करके चल रहा है । जिस दिन पर्दा हट जायेगा, सब साहिब में लय हो जायेंगे । लय हो जायेंगे सब। आपको ऐसे ही सब कुछ छोड़कर आने को नहीं कहा है। इसके पीछे कोई रहस्य है। तो फिर नाम-दान के समय आपसे एक चीज़ माँगूगा — विश्वास । विश्वास है क्या? आप कहेंगे- हाँ, है । इसी विश्वास के बदले आपको नाम दूँगा। याद रहे, इसी विश्वास के बल पर आपको पार करना है । इसलिए सही में करना विश्वास । विश्वास क्या-
गुरु को अखंड ब्रह्म कर माने । गुरु को नहीं मानुष कर जाने ।।
फिर मैंने आपसे आपका तन, मन, धन - तीनों लेने हैं; कहूँगा कि सच्चे दिल से आँख बंद करके दो । पता है, ये क्यों लूँगा ! क्योंकि ये तीनों ही आत्मा पर बीमारी है। आत्मा भूल से इन्हें मेरा-मेरा कह रही है । इसलिए—
तन मन दिया तो भल किया, सिर का जासी भार ।
जो कछु कहे सो मैं दिया, बहुत सहे शिर मार ।।
बस, आप आँख बंद करके सच्चे दिल से दे देंगे। यदि सच्चे दिल से नहीं देंगे तो समझ लेना कि मैं भी सच में नहीं लूँगा। तो जब आप अपना तन, मन, धन–तीनों मुझे सौंप देंगे तो फिर बाद में मैं आपका तन आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा—जाओ ! घर में माता-पिता होंगे, बाल-बच्चे होंगे, उनकी सेवा करना, पर आज से इसे मेरा मानकर कोई भी ग़लत काम नहीं करना । आप तो मुझे सौंप चुके होंगे, पर मैं आपको वापिस कर दूँगा। फिर इस तरह धन भी आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा कि इससे कोई ग़लत काम नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा भी नहीं करना। फिर आपका मन मैं आपको वापिस नहीं करूँगा, कहूँगा कि इसे मेरे पास ही रखना । इसके बाद फिर आपको शीश पर अपना हाथ रखकर एक-एक करके कान में मंत्र दूँगा और आपकी आत्मा को उस एक पल में मन से अलग करके आज्ञा चक्र पर एकाग्र कर दूँगा । आपकी आत्मा को अपने में समाहित करके फिर छोड़ दूँगा। इससे जो गुरु - अंश आपके साथ टच हो जायेगा, वो कभी समाप्त नहीं होने वाला । नाम रूप में साहिब खुद साथ खड़ा हो जायेगा ।
नाम पाय सत्य जो बीरा । संग रहूँ मैं दास कबीरा।।
बस, यहाँ पर अपना नया जन्म समझना। फिर आपको खोलकर नाम और मंत्र - दोनों समझा दिये जायेंगे । ध्यान में बिठाकर अभ्यास भी करवा दिया जायेगा। नाम लेने के बाद आप सुबह - शाम नाम - भजन में बैठना। वैसे तो खाते-पीते, सोते-जागते हर समय लगे रहना । पर बैठते समय पहले 4-5 मिनट गुरु-मंत्र करना यानी आपने गुरु को याद करने बुला लिया। अब जो नाम बताया गया, उसका स्वाँसों में सुमिरन करते हुए शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान को एकाग्र करके जैसे बताया, वैसा करना । इस भ्रम में नहीं पड़ना कि यह नाम तो जपने में आ रहा है। जैसे तार पर बिजली चलती है, ऐसे ही इसके द्वारा आध्यात्मिक किरणें आपके अंदर आयेंगी। जो नाम आपको दिया, वो कहने- सुनने में आने वाला नहीं है। वो आपके साथ है । 'सार नाम सत्पुरुष कहाया।।' वो खुद परम- पुरुष है, जिसे प्रकट कर दिया। तो इस भ्रम में न पड़कर नाम का सुमिरन करना, क्योंकि इसी से ध्यान एकाग्र होगा। वैसे कभी भी बैठ सकते हो और सच पूछो तो आधी रात का समय बड़ा सुंदर है, क्योंकि उस समय मैं मिल भी जाऊँगा । 'देखा देखी सब कहें, भोर भये गुरु नाम । अर्धरात को जागसी, खानाजाद गुलाम ।।' छ: महीने तक गुरु पूरा-पूरा आपके साथ होगा। इस बीच यदि उसे पा लिया तो पा लिया अन्यथा बाद में थोड़ी मुश्किल होगी। इसलिए जमकर ध्यान करना - पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ। यदि नाम या मंत्र भूल जाओ तो किसी भी नामी से पूछ सकते हो। पर याद रहे, अपनी पत्नी से नहीं । यदि उससे पूछा तो फिर भाई-बहन का रिश्ता हो जायेगा। किसी दूसरे गैरनामी के सामने नाम (शब्द) को प्रकट नहीं करना अन्यथा बुरी हालत हो जायेगी । नामी से आप कुछ भी समझ सकते हैं। यदि आन्तरिक दुनिया में कोई रुकावट आए तो उसके लिए मैं हर समय उपलब्ध हूँ, पूछ सकते हो।
8. हमारा पंथ क्या है
हमारा पंथ क्या है
‘साहिब' परम-पुरुष को कहते हैं और 'बंदगी' प्रणाम का पर्यायवाची सूचक है। इस तरह उस परम - पुरुष को प्रणाम का दूसरा नाम ' साहिब - बंदगी' है । साहिब बंदगी पंथ कोई कबीर पंथ नहीं है । यह संत - मत भी नहीं है। संत-मत इसलिए नहीं है कि कबीर साहिब से नाम लेने से पहले सभी काल-पुरुष की भक्ति ही तो कर रहे थे । इसलिए उनकी वाणी में काल - पुरुष की भक्ति से संबंधित शब्द भी हैं, जिन्हें पढ़कर भक्त लोग भ्रमित हो जाते हैं। और संकलनकर्ता कोई संत तो है नहीं कि सत्य - भक्ति से संबंधित शब्द छाँटकर अलग कर सके। तो दूसरा हम कबीर पंथी भी नहीं हैं। वर्तमान में जितने भी कबीर पंथी हैं, वो साहिब की मूल शिक्षा पर चल ही नहीं रहे हैं, भूल चुके हैं। काल-पुरुष सबको उलझा देता है। कईयों में ऐसा है कि दीक्षा हमसे लो पर गुरु कबीर साहिब को मानो । कबीर साहिब यह कहकर नहीं गये कि मेरी भक्ति करना। वो तो सद्गुरु की भक्ति के लिए बोल गये । वास्तव में मुझे कबीर साहिब की वाणी को लेने की ज़रूरत भी नहीं है। यह तो मैं मजबूरी में उदाहरण के लिए, अपनी बात का प्रमाण देने के लिए ले रहा हूँ, क्योंकि मैं जो बोल रहा हूँ, वो अनुभूति की बात कर रहा हूँ, आँखों देखी बात कर रहा हूँ जबकि बहुत से महात्मा द्वारा कबीर साहिब की वाणी को तो कई जगहों से तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है । इसलिए यदि आप कबीर साहिब की वाणी को ही पढ़ेंगे तो भी भ्रमित हो जायेंगे। क्योंकि शुद्धता नहीं रह गयी है। मैं आपके सामने शुद्ध अध्यात्म पहुँचा रहा हूँ। इसलिए आपको कबीर साहिब या संतों की वाणी के गिर्द न घुमाकर अपने गिर्द ही घुमा रहा हूँ। एक ने कहा कि आप निरंकारी भी नहीं हैं, राधा स्वामी भी नहीं हैं, जैनी भी नहीं हैं, मुसलमान भी नहीं हैं, फिर मामला क्या है ? फिर क्या हैं? मैंने कहा कि यह फ़िलासफ़ी समझने में बड़ा समय लग जायेगा । किसी को इस्लाम समझाना हो तो कुरान आगे रख दो, समझ जायेगा। हिंदू धर्म समझाना हो तो बता दिया जाता है कि त्रिदेव हैं । ईसाई धर्म समझाना हो तो क्राइस्ट का
संदेश दे दो। पर किसी को साहिब बंदगी समझाना हो तो पसीना छूट जाता है। इसलिए आप परेशान हो जाते हैं। मैंने समझा दिया है आपको। आपके बस की बात नहीं है । पहले जितने भी आए, काल की भक्ति कही । हम ऋषि-मुनियों के उदाहरण नहीं दे रहे हैं। क्योंकि उन्होंने तो काल की बात की है। हमारी फ़िलासफ़ी तो ऐसी है कि एक छोटा-सा लड़का गाता फिरता है— 'मुझे अपने ही रंग में रँगदा फिरे, साहिब अपने ही रंग में रँगदा फिरे ॥' जो कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, ठीक कह रहे हैं । हम मीराबाई की फ़िलासफ़ी पर नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने तो पहले सगुण भक्ति की है, सगुण पद भी गाए हैं। बाद में जब रविदास जी से दीक्षा तो सत्य - भक्ति में आई। तो पहले वाला कोई पढ़ेगा तो कहेगा कि एक ही बात है। हम अंतर ठीक से समझायेंगे । पलटू साहिब भी पहले निरंजन के दायरे में घूम रहे थे। गुरु नानक देव स्वयं ओंकार की उपासना कर रहे थे। बाद में साहिब से नाम लिया । और दसवें द्वार से भी आगे बोल दिया। हम एक को बॉयकाट नहीं कर रहे हैं । उसकी वाणी पर चलो, यह नहीं कह रहे । जो लोग कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, वो ठीक ही कह रहे हैं। कबीर साहिब की फ़िलासफ़ी पर चलना, यह भी नहीं कह रहा हूँ। समय के साथ लोगों ने उनकी वाणी को इतना तोड़-मरोड़ दिया है कि कुछ कहते नहीं बनता । भ्रमित हो जाता है इंसान। सबने अपनी बात बीच में मिला दी है। अपनी सुविधाओं के अनुसार लिख दिया है। इसलिए मैं जो आपके पास पहुँचा रहा हूँ, वो शुद्ध है। एक माई ने कहा कि 'साहिब' (परम-पुरुष) को मेरे लिए कहना कि मेरा कष्ट दूर करे। मैं पूछना चाहता हूँ कि वो फाल्ट में थी कि नहीं ! एक ने कहा कि जब ध्यान में बैठती हूँ तो कभी आपके गुरु जी आ जाते हैं, कभी कबीर साहिब आ जाते हैं। मैंने कहा—माई, तू तीन किश्तियों पर क्यों खड़ी है ! आपने मेरे गुरु से क्या लेना है ! आपको कबीर साहिब से क्या लेना है! आपको तो मुझसे काम होना चाहिए, केवल मुझसे । 'मुझे है काम सतगुरु से....' वो कबीर साहिब अपनी शरण नहीं बता गया; सारा भार गुरु को सौंप गया। कहा-
गुरु मानुष कर मानते, चरणामृत को पान ।
ते नर नरकै जायेंगे, जन्म जन्म होय स्वान॥
मेरे गुरुदेव मेरे गुरुभाइयों को बोल गये कि इन्हें ही गुरु मानना मेरे जाने के बाद, क्योंकि मैं अब अपने बिंदू पर जा रहा हूँ। तो हम सद्गुरु फ़िलासफ़ी पर चल रहे हैं ।
गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं ।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहीं ॥
हम कह क्या रहे हैं, यह समझो । गुरु ताक़त देता है; उसी से पार हो सकते हैं। मेरी वाणी में कमाई की बात नहीं मिलेगी । सेवा करो, यह भी नहीं कह रहा हूँ। जैसे किसान ने बीज बोया तो बहुत बड़ा काम हो गया। जमीन को गोड़ित किया, सींचा। फिर समय समय पर खाद भी डालनी है, सींचते भी रहना है। इस तरह आगे भी देखना है । मैंने जो आपको देना है, दे चुका हूँ । अब तो गहन सत्संग द्वारा उलझनों से परे कर रहा हूँ। बस, एक व्यक्तित्व कबीर साहिब को ओवरटेक नहीं कर रहा हूँ। बाकी किसी की फ़िलासफ़ी पर नहीं चल रहे हैं। मगहर में किताबें मिल रही थीं तो मैंने कहा कि नहीं ख़रीदना। पर कुछ ने मेरे मना करने पर भी चुपके से ख़रीद लीं। उसमें तो ग़लत बताया गया है । बाद में लोगों ने अपने विचार उसमें मिला दिये हैं । उसमें बताया गया है कि कबीर ने आत्मा को ही सब कुछ कहा है; किसी सत्लोक की बात नहीं है । तो मैं आपको शुद्ध चीज़ दे रहा हूँ । माँ ने बेटे को जन्म दिया तो बाद में खिलाया, पढ़ाया, लाड़-प्यार देकर बड़ा किया। नाम-दान के समय मेरा काम ख़त्म नहीं हो गया। माँ को परवरिश करनी होती है। तो मैं इसलिए दौड़ता घूम रहा हूँ। रोज़ के 5-5 सत्संग दे रहा हूँ। इसलिए हमारी फ़िलासफ़ी है – सद्गुरु भक्ति । जो सत्लोक की बात कह रहे हैं, उनमें भी भ्रांतियाँ हैं । वो तो पढ़कर बोल रहे हैं। कोई कहे कि जम्मू शहर समुद्र के बीच टापू पर है तो जो जम्मू में रहने वाले हैं, उनको कैसा लगेगा ! ऐसे ही मैं जान जाता हूँ कि ये खुद नहीं गये हैं। मैं तो स्वर्ग जाना हो तो चला जाता हूँ, ब्रह्माण्ड में घूमता रहता हूँ । पर सच यह है कि मैं अपने से बाहर नहीं निकलना चाहता हूँ ।
तो दूसरा हमारा जो मत है, वो है भृंग - मता । यह क्या है ? भाई, बाकी जो जीव हैं, वो पेट में रखकर जन्म देते हैं बच्चे को । पर भृंगा यह नहीं कर रहा है । वो पल-भर में अपने समान कर रहा है । इस तरह हम भी आपको अपनी तरह करके चल रहे हैं। इसलिए जितने भी उदाहरण दिये, साहिब की वाणी से । बाकी की फ़िलासफ़ी में दोष है, धोखा है, छल है। धर्मदास जी भी पहले ठाकुरपूजा करते थे । साहिब से कहा कि एक ही परमात्मा हैं—ठाकुर जी । साहिब जी धर्मदास जी को बड़े तरीके से लाइन पर लाए, कहा—
तीन लोक जो काल सतावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥
निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥
त्रिगुण जाल यह जग फँदाना । गहै न अविचल पुरुष पुरान॥
जाकर ई जग भक्ति कराई। अंतकाल जिव सो धरि खाई ॥
कहा कि सब काल की भक्ति कर रहे हैं । जिसको सारा संसार भगवान समझ कर पूजा कर रहा है, वही अंतकाल में जीवों को खा जाता है । उसी निरंजन के त्रिदेव पुत्र हैं ।
सबै जीव सतपुरुष के आहीं । यम दै धोखा फँदाइस ताहीं ॥
प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहँ लाई ॥
दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँघारा ॥
प्रभुता देखि देखि कीन्ह विश्वासा | अंतकाल पुनि करै निरासा ॥
जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥
कहा कि सभी परम-पुरुष की आत्माएँ हैं, पर निरंजन ने धोखे से उन्हें फँसाकर रखा । पहले तो वो खुद ही राक्षस बनता है, जीवों को सताता है, फिर खुद ही अवतार धारण कर राक्षसों को खा जाता है । जीव लीला देखकर सोचते हैं कि यही हमारा रक्षक है, पर अंतकाल में यही जीवों को निराश करता है। साहिब ने कोई भी बात फिज़ूल में नहीं कही । तर्क दिये हैं । कह रहे हैं—
गीता पाठ कै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥
द्वापर देखहु कृष्ण की रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनीति ॥
अर्जुन कहँ तिन्ह दया दृढ़ावा । दया दृढ़ाय पुनि घात करावा ॥
बँधु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहँ बहु काल सतावा॥
भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥
बहु गंजन जीवन कहँ दीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा॥
द्वापर में देख लो, कृष्ण जी ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, फिर घात करवाया। साहिब ने धर्मदास से कहा कि जिनकी भक्ति कर रहे हो, उनमें दोष है । मुझे बताना पड़ेगा; मेरी मजबूरी है। लोगों ने निंदा समझ लिया। बताना पड़ेगा कि यह काल के दायरे की भक्ति है, इससे ऊपर उठ । तो फिर बाद में कहा कि तू पाप कर गया है । अर्जुन चौंका, कहा कि आपने ही तो कहा था। उसने तर्क दिया । पर कृष्ण जी ने कहा- नहीं, वो राजनीति थी, पर तूने बंधुओं को मारा है, धर्म के अनुसार यह पाप है। यदि मैं मोहनलाल को कहूँ कि फलाने को मार । वो कहे कि यह तो पाप है, कैसे करूँ! मैं कहूँ कि मैं आज्ञा दे रहा हूँ, मार। वो मारे तो बाद में मैं कहूँ कि तूने तो पाप कर दिया तो यह कैसा है ! यह तो विरोधी वाणी हुई। मेरे शब्द विरोध में नहीं जाते हैं । तो फिर यज्ञ करवाया। लेकिन तब भी पिण्डा नहीं छूटा पाण्डवों का। फिर कहा कि हिमालय में जाकर प्रायश्चित करो। इतनी सर्दी में गलना पड़ा। फिर भी नहीं छूटा पिण्डा । फिर नरक में जाना पड़ा। तो यह सब निंदा है क्या! नहीं, यह तो सभी को पता है । बस, साहिब तो तर्क देकर समझा रहे हैं कि मुक्ति के लिए कहीं आगे बढ़ना होगा। 'बहु गंजन जीवन कहँ कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥ ' यह कौन सी मुक्ति थी ! तो साहिब धर्मदास को आगे समझाते हुए कह रहे हैं-
बलि ते सो छल कीन्ह बहूता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥
छल बुद्धि दीन्हे ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला॥
लघु सरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवी लीन्ह पुनि स्वस्ति कराये ॥
स्वस्ति कराइ तबै प्रगटाना । दीर्घ रूप देखि बलि भय माना ॥
तीन परग तीनौ पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥
देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥
तेहि कारण पातालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगट न चीन्हा ॥
तब लै पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥
यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्ति हरि हमको दीन्हा ॥
बलि की क्या ग़लती थी ! साहिब तर्क से समझा रहे हैं, मुक्ति के विषय में सोचने को कह रहे हैं। आख़िर हम सब कौन सी मुक्त चाह रहे हैं, यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बाकी उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी । तो कहा कि पहले छोटा रूप धारण कर बलि से साढ़े तीन पग धरती माँग ली, फिर बाद में अपना रूप बड़ा करके तीन-लोक तीन पग में नाप लिये और आधा पाँव रह गया । आधा पाँव बलि राजा दान नहीं दे सका तो उसके परिणाम स्वरूप उसे पाताल भेज दिया गया। साहिब कह रहे हैं कि यह अंधा मनुष्य समझता नहीं है। स्पष्ट देखकर भी समझता नहीं है। यह सब होने के बाद कहता है कि हरि ने मुक्ति दी । पाताल में भेज दिया गया। क्या यह थी मुक्ति ? लोग तो साहिब की वाणी को तोड़ मरोड़ कर कह रहे हैं- तू राम सुमर पछतायेगा। हम कह रहे हैं— तू नाम सुमर पछतायेगा । हम आपको शुद्ध चीज़ दे रहे हैं । हम घी खिला रहे हैं और वो भी शुद्ध दे रहे हैं, बिना लस्सी वाला दे रहे हैं। बाकी से अलग भक्ति दे रहे हैं। बाकी काल की भक्ति दे रहे हैं, हम परम-पुरुष की भक्ति दे रहे हैं । बाकी जितने भी पंथ हैं, सत्य मानना, सब काल - पुरुष की भक्ति कर रहे हैं । कुछ हमारी तरह बातें बोल रहे हैं। सच खंड, अमर लोक, सत्पुरुष की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में भक्ति वो भी काल - निरंजन की ही कर रहे हैं । क्योंकि वाणियों में वो बातें लिखी हैं, इसलिए वो पढ़कर बोल रहे हैं। लेकिन उनके पास अपना कुछ नहीं है । अन्दर से वो खालमखाली हैं। हम बाकी पंथों मुख्य पाँच कारणों से अलग हैं। ये कारण हैं कि हम- तीन लोक से परे एक चौथे लोक ( अमर लोक ) की बात कर रहे हैं ।
तीन लोक से भिन्न पसारा | अमर लोक सतगुरु का न्यारा ।।
तीन लोक प्रलय कराई । चौथा लोक अमर है भाई ।।
सबसे पहले हम तीन लोक से परे एक चौथे लोक (अमर-लोक) की बात कर रहे हैं । कबीर साहिब ने सबसे पहले इस अमर लोक का संदेश संसार को दिया। उन्होंने उस अद्भुत देश की बात कही, जिसकी ख़बर पहले किसी को नहीं थी। जैसे वैज्ञानिक लोग ब्रह्माण्ड के रहस्य जानने के इच्छुक हैं । वे नित्य नयी-नयी सूचनाएँ संसार को दे रहे हैं। इसी तरह साहिब ने भी संसार को एक अनुपम रहस्य दिया । उन्होंने ऐसे अद्भुत लोक की बात कही, जहाँ प्रलय नहीं है। यह तीन लोक तो प्रलय की सीमा में आ जाते हैं यानी इनकी एक निश्चिय अवधि है। जैसे हमारे शरीर की एक अवधि है, हर चीज की एक अवधि है । एक अवधि तक हमारा शरीर रहता है, फिर नष्ट हो जाता है । यानी इसकी एक सीमा है। इसी तरह हर चीज़ की एक सीमा है, पर हमारी आत्मा का किसी भी देश, काल या अवस्था में नाश नहीं होता । यह कभी नष्ट नहीं होती । जिस चीज की उत्पत्ति है, उसका नाश भी अवश्यंभावी है, पर हमारी आत्मा की उत्पत्ति नहीं, इसलिए यह नष्ट भी नहीं होती। यहाँ पर सोचो । यदि आत्मा अमर है तो इस आत्मा का देश या इस आत्मा का असली ठिकाना भी ऐसा होना चाहिए न, जिसका कभी नाश न हो, जो परम सत्य हो । क्योंकि—
सत्य सोई जो विनशे नाहीं ।।
यह तीन लोक काल - पुरुष का देश है । उसी ने सब जीवों को शरीर रूपी पिंजड़े में कैद करके रखा हुआ है। इसी तीन- लोक से परे जो अमर-लोक है, वहाँ परम-पुरुष का निवास है । सब संतों ने उसे साहिब नाम दिया है । परमात्मा नाम तो काल - पुरुष का है। गुरु नानक देव जी ने तो साफ़-साफ़ कह दिया— आठ अटा की अटारी मझारा, देखा पुरुष न्यारा । निराकार आकार न ज्योति, नहिं वह वेद विचारा । ओंकार कत्र्ता नहिं कोई, नहिं वहाँ काल पसारा। वो साहिब सब संत पुकारा, और पाखंड है सारा । सतगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग, नानक नजर निहारा । हम सब मुक्ति की बात करते हैं, पर हमें पता नहीं है कि हम मुक्ति क्यों चाहते हैं। वास्तव में जिस संसार में हम रह रहे हैं, वो काल - पुरुष का संसार है। यहाँ पर आत्मा को दुख ही दुख दिया जा रहा है। काल - पुरुष सब जीवों को कष्ट दे देकर तंग कर रहा है। इसलिए हम सब काल पुरुष की इस
दुनिया से छूटना चाह रहे हैं. पर झंझट यह है कि हमें यह ज्ञान नहीं है कि पूरा तीन लोक काल की सीमा के अन्दर है । हम मृत्यु लोक से छूटकर या स्वर्ग लोक जाना चाहते हैं या ब्रह्म लोक या पार- ब्रह्म लोक। इससे परे की दुनिया का हमें ज्ञान ही नहीं है । हमें आत्मा के सही ठिकाने का पता नहीं है । जाने- अनजाने में हम सभी उस साहिब की तलाश में हैं, पर ठीक से इस रहस्य को समझ न सकने के कारण हमने काल पुरुष को ही अपना परमात्मा मान लिया है। दुख और कष्ट देने वाले को ही अपना परम मित्र समझ लिया है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—
जो रक्षक तहँ चीह्नत नाहीं । जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं । ।
काल- पुरुष का यह तीन लोक पाँच तत्वों से बना है । पाँचों तत्वों की एक सीमा है। शास्त्रों का भी मानना है कि महाप्रलय में ये पाँचों तत्व नष्ट हो जायेंगे। दयानन्द सरस्वती जी के सत्यार्थ प्रकाश में भी इसका उल्लेख मिलता है और वैज्ञानिक लोग भी इस सच्चाई को समझ रहे हैं । क्या यह तीन लोक, जिसमें स्वर्ग लोक, पितर लोक, ब्रह्म लोक आदि आते हैं, नष्ट हो जायेगा ? हाँ, यह सब समाप्त हो जायेगा, इसलिए यह विश्वास के योग्य नहीं है। संत-महापुरुषों ने तभी तो संसार को झूठा, अनित्य, स्वप्नवत् आदि कहा है। इसमें कुछ भी सच नहीं है, क्योंकि सब नाशवान् है । इस अनन्त को संतों ने तीन भागों में बाँटा है - शून्य, महाशून्य और अमर लोक। शून्य और महाशून्य दोनों नाशवान् हैं, पर शून्य वो स्थान है, जहाँ पर ग्रह, उपग्रह आदि हैं, जबकि महाशून्य में निर्गुण सृष्टि है । वहाँ आर्टिकल्स नहीं हैं । यानी जहाँ तक सूर्य, चाँद, तारे, ग्रह, उपग्रह आदि हैं, वो शून्य स्थान कहलाता है । शून्य की सीमा यहाँ तक है। इसके ऊपर फिर महाशून्य है । महाशून्य में ये सब नहीं है। निर्गुण स्थान है । महाशून्य में सात आकाश हैं। इन सात आकाशों को संतों ने सात सुरति कहा है । ये आकाश बड़े विराट् हैं । इनके अन्दर बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। इनमें एक अलोकिक आनन्द है । ये इतने विराट् हैं कि शून्य जैसी करोड़ों सृष्टियाँ एक-एक में समाती जायेंगी । सर्वप्रथम शून्य से पाँच असंख्य योजन ऊपर जाने पर चिंत लोक आता है। अचिंत लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर सोहंग लोक आता है। सोहंग लोक से पुनः पाँच असंख्य योजन ऊपर
जाने पर मूल - सुरति लोक है । यहीं से चेतना आई है। सुरति लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर अंकुर लोक होता है । उसके ऊपर फिर इच्छा लोक, फिर वाणी लोक, जहाँ से अनहद धुनें भी आती हैं। अंत में फिर सहज लोक है। ये सात लोक सात आकाश भी कहलाते हैं। सहज लोक अर्थात सातवें आकाश तक भी प्रलय है। इन लोकों से ऊपर अर्थात सहज लोक से एक असंख्य योजन ऊपर जाने पर अमर लोक आता है। यही वो स्थान है, जहाँ कभी नाश नहीं है । यह तीन लोक तो नष्ट हो जाता है, पर वहाँ प्रलय नहीं है । तभी तो साहिब ने ऐसे लोक की बात कही है, जो अमर है, सत्य है, तीन लोक से परे है, सप्त आकाश से भी परे है । वहाँ कभी प्रलय नहीं है । यदि आत्मा अमर है तो निश्चय ही वो अमर देश ही आत्मा का सही ठिकाना है । चल हंसा तू देश हमारे, साहिब देत पुकारा है ।
सत्य तो केवल अमर लोक है, झूठा सब संसारा है।।
साहिब पुकार-पुकार कर कह गये हैं कि हे बंदे, इस झूठी दुनिया से ऊपर उठ और अपने देश चल। यह देश आत्मा का नहीं है । साहिब की वाणी बार-बार चेता रही है।
चलना तो है दूर मुसाफिर काहे सोवे रे ॥
यह आत्मा बड़ी दूर से आई है । यह देश इसका नहीं है। यदि यह परमात्मा का देश होता तो साहिब की वाणियाँ यह क्योंकर कहतीं ! चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो ।
यहि संसार काल है राजा, कर्म का जाल पसारा हो ॥
चौदह खंड बसे वाके मुख में, सबही को करत अहारा हो ।
बारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवतन धरिया, और को कौन विचारा हो ।
सुन नर मुनि सब छलछल मारले, चौरासी में डारा हो ॥
मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।
ताको रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भानु उजियारा हो ॥
श्वेत स्वरूप शब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।
कोटिन चाँद सूर्य छिपि जैहैं, एक रोम उजियारा हो ॥