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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | १०७

च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषाधानं चामाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति मातृजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में कहा है—मांसशोणितमेदोमज्जहृन्नाभियकृत्प्लीहान्त्रगुदप्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि। पितृज अर्थात् पिता के बीज से उत्पन्न होने वाले भाव—केश, रोम, दाढ़ी, मूंछ, नख, दांत, अस्थियां, शिरा, स्नायु धमनियां तथा शुक्र—ये पितृज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में भी इन्हीं का परिगणन किया गया है—यानि चास्य पितृतः सम्भवतः संभवन्ति तान्तनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा—केशश्मश्रुनखलोमदन्तास्थिसिरास्नायुधमन्यः शुक्रमिति पितृजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—‘‘गर्भस्य केशश्मश्रुलोमास्थिनखदन्तसिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि’’। आत्मज (आत्मा से उत्पन्न होने वाले) भाव—आयु, आत्मज्ञान, मन, इन्द्रियां, प्राण, अपान, धारण (देह का धारण), प्रेरणा (गति), आकृति, स्वर तथा वर्ण का उपचय (वृद्धि), सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, स्मृति, अहंकार, प्रयत्न, अवस्थान्तर गगन (अन्य अवस्थाओं में जाना), सत्व तथा नाना योनियों में उत्पन्न होना—ये आत्मज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में भी कहा है—यानि तु खल्वस्य गर्भस्यात्मजानि, यानि चास्यात्मतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा—तासु तासु योनिक्षूत्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणिः प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वरवर्णविशेषाः सुखदुःखेच्छाद्वेषौ चेतनाधृतिर्बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारः प्रयत्नश्चेत्यात्मजानि। सुश्रुत शा.अ. ३ में कहा है—इन्द्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखदुःखादिक चात्मजानि। सात्म्यज अर्थात् सात्म्य के सेवन से उत्पन्न होनेवाले भाव—आरोग्य, उत्थान (उन्नति), सन्तोष, इन्द्रियों की प्रसन्नता, स्वर, वर्ण तथा बीज का उत्तम होना, मेधा (बुद्धि), हर्ष (प्रसन्नता अथवा मैथुन में हर्ष की अधिकता)—ये सात्म्यज भाव हैं। चरक शा.अ. ३ में कहा है—यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः। तद्यथा—आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसम्पत्प्रहर्षभूयस्त्वं चेति सात्म्यजानि। सुश्रुत शा. अ. ३ में भी कहा है—वीर्यमारोग्यं बलवर्णौ मेधा च सात्म्यजानि। रसज अर्थात् रस के सेवन से उत्पन्न होने वाले भाव शरीर को उत्पन्न करना, शरीरं की वृद्धि, प्राण, बन्ध (बन्धन) वृत्ति (शरीर का यात्रा), पुष्टि तथा उत्साह—ये रसज भाव हैं। चरक शा. अ. ३ में कहा है—यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसततः संभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—शरीरस्याभिनिवृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि। सुश्रुत शा. अ ३ में भी कहा है—शरीरोपचयो बल वर्णः स्थितिर्हानिश्च रसजानि। कल्याण, रोष (क्रोध) तथा मोहात्मक—तीन प्रकार का सत्व पहले (लक्षणाध्याय में) कहा जा चुका है इनमें आत्मा अथवा जीव का शरीरान्तर के साथ संबन्ध कराने वाला सत्व शुभ अशुभ आदि मिश्रित भावों का सूचक (ज्ञान कराने वाला) है। चरक शा. अ. ३ में भी कहा है—अस्ति खल्वपि सत्वमौपपादुकं यज्जीवस्पृक् शरीरेण भिसंबध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यन्ते, बलं हीयते, व्याधय आप्यायन्ते, यस्माद्धीनः प्राणाञ्जहाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहकं च मन इत्यभिधीयते, तत्रिविधमाख्यायते—शुद्धं राजसं तामसं चेति। येनास्य खलु मनो भूयिष्ठं तेन द्वितीयायामजातौ सम्प्रयोगो भवति, यदा तु तेनैव शुद्धेन सयुज्यते तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति, स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैवमनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुरस्कृत्य पुरुषो जातिस्मर इत्युच्यते इति सत्वमुक्तम्। ये सब भाव अपने कर्मों के आश्रित हैं तथा काल की प्रतीक्षा करते हैं। काल सहित वायु शरीर का विभाजन करता है तथा इसे धारण करता है ॥४॥

तत्र श्लोकाः-

शोणिताद्धृदयं तस्य जायते हृदयाद्यकृत् ।। यकृतो जायते प्लीहा प्लीहः फुप्फुसमुच्यते ।।५।।
परस्परनिबन्धानि सर्वाण्येतानि भार्गव ! ।। तेषामधस्ताद्विपुलं स्रोतः कुण्डलसंस्थितम् ।।६।।
जरायुणा परिवीतं स गर्भाशय उच्यते ।। आमपक्वाशयौ तस्मिन्नन्नपानाश्रयौ गुदः ।।७।।
तस्मात् संजायते बस्तिः परिव्यन्दाच्च पूर्यते ।। धमनीमुखसंस्थाने स्रोतसी चाप्यधः स्मृते ।।८।।

१०८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

विण्मूत्रकृमिपक्वामकफपित्ताशयाः पृथक् ।। सन्त्येते देहिनां कोष्ठे स्त्रिया गर्भाशयोऽष्टमः ।। ९ ।।
शुक्रमज्जास्थि पितृतो मातृत्तो मांसशोणितम् ।। षट्कोशं प्रवदन्त्येके देह० ........ ।। १० ।।
....................... । ........................ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८१ तमं पत्रम्¹ ।)

गर्भ के शोणित (रक्त) से हृदय बनता है, हृदय से यकृत्, यकृत् से प्लीहा, तथा प्लीहा से फुफ्फुस (Lungs) बनते हैं। हे भार्गव (भृगुकुल में उत्पन्न जीवक) ! ये सब अङ्ग परस्पर संबद्ध होते हैं। इनके नीचे जरायु से युक्त तथा कुण्डलिनी चक्र में स्थित एक बड़ा स्रोत होता है जिसे गर्भाशय कहते हैं। (स्त्रीणां तु बस्तिपार्श्वगतो गर्भाशय इति सुश्रुतः)। इसमें आमाशय, पक्वाशय तथा अन्न एवं पान का आश्रय गुदा स्थित होती है। उससे बस्ति (श्रोणि गुहा—Pelvis cavity) बनती है जो स्राव से पूरित होती रहती है। इसके नीचे धमनीमुख संस्थान एवं स्त्रोतस् होते हैं। मनुष्यों के कोष्ठ में मल, मूत्र, कृमि, पक्व, आम, कफ तथा पित्त के आशय (स्थान) पृथक् २ होते हैं। तथा स्त्रियों के कोष्ठ में इनके अतिरिक्त आठवां गर्भाशय भी होता है। पिता के अंश से गर्भ में शुक्र, मज्जा तथा अस्थियां बनती हैं और माता के अंश से मांस और शोणित बनते हैं। कुछ लोग देह में ६ कोश बताते हैं ........ ।।५-१०।।

**वक्तव्य—**यह अध्याय यहीं (मध्य में ही) समाप्त हो गया है। इसलिये विषय का पूर्ण ज्ञान होना कठिन है। उपलब्ध विषय से ही सन्तोष करना पड़ता है।


शरीरविचयशारीराध्यायः

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(द्वात्रिंशत्त मता दन्तास्तावन्त्यू) खलिकानि च।
पाणिपादाङ्गुल्यास्थीनि षष्टिः स्युर्विंशतिर्नखाः।
पाणिपादशलाकास्तु विंशतिः परिकीर्तिताः।
पाणिपादशलाकानामधिष्ठानचतुष्टयम् ।
द्वे पाष्ण्यो॑रस्थिनी कूर्चाश्चत्वारः पादयोः स्मृताः।
द्वावेव हस्तमणिकौ चत्वार्याहुररत्निषु।
जान्वस्थिनी द्वे संख्याते चत्वार्यस्थीनि जङ्घयोः।
द्वावूरुनलकौ द्वे च ख्याते जानुकपालिके।
द्वावंसावंसफलकावपि द्वावेव चाक्षकौ।
द्वे बाहुनलके द्वे द्वे श्रोणितालूषके तथा।
एकं जत्रु भगास्थ्येकं ग्रीवा पञ्चदशास्थिकी।
भार्गवाऽस्थीनि पृष्ठ्यानि चत्वारिंशच्च पञ्च च।


१. अस्याग्रे पत्रद्वयात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके।

शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १०९

चतुर्दशास्थीन्युरसि हन्वस्थ्येकं तु निर्दिशेत् ।
शिरसस्तु कपालानि चत्वार्याहुर्मनीषिणः ।
चतुर्विंशतिः पार्श्वे च तावन्ति स्थालकानि च ।
चतुर्विंशतिरेवाहुः स्थालकार्बुदकानि च ।
द्वौ शङ्खौ परिसंख्यातौ द्वे हनुमूलबन्धने ।
ललाटनासिकागण्डकूटास्थ्येकं विनिदिशेत् ।
इत्यस्थिसंख्या सामान्याद् वृद्धिह्रासौ निमित्तजौ ।

वक्तव्य— यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में शरीर के विशेष ज्ञान का वर्णन किया गया है। 'शरीरविचय' शब्द की व्याख्या करते हुए चरक की टीका में चक्रपाणि ने कहा है—‘‘शरीरस्य विचयनं विचयः, शरीरस्य प्रविभागेन ज्ञानमित्यर्थः’’। शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में पूर्व ३६० अस्थियों का उल्लेख किया गया है। यहां सर्वप्रथम उन्हीं का पृथक २ परिगणन करते हैं। यह परिगणन स्थूल रूप में दिया गया है। यह संख्या पूर्णरूप से ठीक नहीं मिलती है। यह संख्या ३६३ होती है।

विवरणसंख्या
दांत३२
दांत के उलूखल (गड्ढे)३२
हाथ तथा पैर की अगुलियों की हड्डियां६०
नख२०
हाथ तथा पैर की शलाकास्थियां<br>(Metacarpus $ metatarsus bones)२०
उपर्युक्त शलाकास्थियों के अधिष्ठान
पाष्णि देश की अस्थियां
पैरों की कूर्चास्थियां
हाथ की मणिबन्ध देश की (मणकास्थि)
अरत्नि (प्रबाहु) की अस्थियां
जानु की अस्थियां
जङ्घाओं की अस्थियां
उस देश की नलकास्थियां
जानु कपालिका (Patella)
अंस
अंसफलक
अक्षकास्थि (Cotterbones)
बाहु की नलिकास्थियां
श्रोणि की अस्थियां
तालु की अस्थियां
जत्रुदेश में

११० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शारीरविचयशारीराध्यायः ? ]

भगास्थि १
ग्रीवा की अस्थियां १५
पीठ की अस्थियां ४५
छाती में उरोस्थियां १४
हन्वस्थि १
शिर की कपालास्थियां ४
पार्श्वास्थियां २४
पार्श्वास्थियों के स्थालक (Facets) २४
अर्बुदाकृति स्थालक २४
शङ्खदेश की अस्थियां २
हनुमूल को बांधने वाली अस्थियां २
ललाटास्थि १
नासिका में १
गण्डास्थि १
कूटास्थि १
कुल— ३६३

**वक्तव्य—**यहां पर पूर्व अस्थियों की संख्या ३६० बताई गई है परन्तु पृथक् २ गिनने पर वे ३६३ हो जाती हैं। चरक शा. अ. ७ में भी ३६० अस्थियों का उल्लेख किया गया है परन्तु उन्हें भी पृथक् २ गिनने पर वे ३६८ होती हैं। जयदेव विद्यालंकार ने अपनी चरक की टीका में हाथ पैर की शलाकास्थियों के ४ अधिष्ठान (चत्वार्यधिष्ठानान्येषां) तथा हाथ और पैरों के ४ पृष्ठ (चत्वारि पाणिपादपृष्ठानि) को नहीं गिना है। इस प्रकार ३६० संख्या पूरी की है। यहां भी यदि हम शलाकास्थियों के अधिष्ठानों को न गिनें तो संख्या कुछ अंश तक पूरी हो सकती है। चरकोक्त अस्थियां निम्न प्रकार से हैं—त्रीणि षष्ठ्यधिकानि शतान्यस्थ्ना सह दन्तोलूखलनखैः; तद्यथा—द्वांत्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, विंशतिः पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्ठानान्येषां, चत्वारि पाणिपाद पृष्ठानि, ष्ठ्यङ्गुल्यस्थीनि, द्वे पाष्ण्योः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्योर्मणिकाः चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे जानुनोः, द्वे कूर्परयोः, द्वे ऊर्वोः, बाह्वोः मांसयोर्द्वे, द्वावक्षकौ, द्वे तालुनी, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पुंसां मेढ्रास्थि, एकं त्रिकसं श्रितम् एकं गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिंशत्, पञ्चदशास्थीनि ग्रीवायां, द्वे जत्रुणि, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णोः, गण्डयोर्द्वे, नासिकाया त्रीणि घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशतिश्चतुर्विंशतिः पञ्जरास्थीनि च पार्श्विकानि, तावन्ति चैषां स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि द्विसप्ततिः द्वौ शङ्खकौ, चत्वारि शिरःकपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति त्रीणि षष्ठ्यधिकानि शतान्यस्थ्नामिति। इस प्रकार हमें प्रकृत ग्रन्थ तथा चरक की अस्थि गणना में निम्न अन्तर मिलता है—

चरककाश्यपसंहिता
पाणिपादपृष्ठानि×
कूर्चास्थियां
हाथों की मणिकास्थि
गुल्फास्थि×
कूर्परास्थि×
अंसफलक×

शरीरविचयशारीराध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् १११

बाहु×
मेढ्रास्थि×
त्रिकास्थि×
गुदास्थि×
पृष्ठास्थि३५४५
जत्रु अस्थि
ललाटास्थि
आंखों की अस्थियां×
गण्डास्थि
नासिकास्थि
छाती में१७१४
जानुकपालास्थि×
कूटास्थि×
योग८२७६

इनके अतिरिक्त अन्य सब अस्थियां परस्पर मिलती हैं। सुश्रुत ३६० अस्थियां स्वीकार नहीं करता। वह केवल ३०० अस्थियां मानता है। वह दांत के उलूखल तथा नखों को अस्थियों में नहीं गिनता। आजकल के शरीरशास्त्र के ज्ञाता शरीर में कुल २०६ अस्थियां मानते हैं। इस प्रकार काश्यपसंहिता, चरक तथा सुश्रुत सब में ही अस्थियों की संख्या बहुत अधिक दी हुई हैं तथा गिनने पर उनकी संख्या ठीक भी नहीं बैठती है तथा बहुत से स्थानों पर उनमें परस्पर समानता नहीं है। उन्होंने अस्थि शब्द से संभवतः शरीर के सभी कठिन पदार्थों का ग्रहण कर लिया है तभी इतना अधिक अन्तर हो गया प्रतीत होता है। आधुनिक विज्ञान एक पूर्ण युवा मनुष्य में निम्न अस्थियां मानता है—

बाहुओं में ३०×२=६०
सक्थियों में ३०×२=६०
शिर और ग्रीवा में=३६
मध्यदेह=५०
कुल२०६

इसका विशेष विवरण शरीर-शास्त्र की किसी पुस्तक में देखना चाहिये। यह साधारण रूप में अस्थियों की संख्या कही गई है। इसमें कारणवश वृद्धि अथवा ह्रास भी हो सकता है॥

दशैवायतनान्याहुः प्राणानां तानि मे शृणु।
मूर्धाऽथ हृदयं बस्तिः कण्ठौजः शुक्रशोणितम्।
शङ्खौ गुदं ततस्त्रीणि महामर्माणि चादितः।

प्राणों के दस आयतन कहे गये हैं। इन्हें तू मुझ से सुना, १. मूर्धा २. हृदय ३. बस्ति ४. कण्ठ ५. ओज ६. शुक्र ७. शोणित ८-९. दोनों शङ्ख प्रदेश (Temporal regious) १०. गुदा। चरक सू. अ. २९ में भी ये ही १० प्राणायतन गिनाये हैं—दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः। शङ्खौ मर्मत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम्॥ परन्तु चरक शा. अ. ७ में शङ्खप्रदेशों के स्थान पर नाभि तथा मांस को गिना गया है—दश प्राणायतनानि तद्यथा—मूर्धा कण्ठो हृदयं नाभिः गुदं बस्तिः ओजः शुक्रं शोणितं मांसमिति। अष्टाङ्गसंग्रह शा. अ. ५ में मांस के स्थान पर जिह्वाबन्धन पढ़ा गया


३० का.सं.

११२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

है—दश प्राणायतनानि–मूर्धा जिह्वा बन्धनं कण्ठो हृदयं नाभिर्बस्तिर्गुदः शुक्रमोजो रक्तं च । तेषामाद्यानि सप्त पुनर्महामर्मसंज्ञानि । इनमें से प्रथम तीन महामर्म कहलाते हैं अर्थात् मूर्धा, हृदय और बस्ति को महामर्म कहते हैं । अष्टाङ्गसंग्रह में महामर्म ७ गिनाये हैं-१. मूर्धा २. जिह्वाबन्धन ३. कण्ठ ४. हृदय ५. नाभि ६. बस्ति ७. गुदा । इनका ऊपर प्राणायतनों में निर्देश किया गया है ॥

नाभिः प्लीहा यकृत् क्लोम हृद्वृक्कौ गुदबस्तयः ।
क्षुद्रान्त्रमथ च स्थूलमामपक्वाशयौ वपा ।
कोष्ठाङ्गानि वदन्ति ज्ञाः प्रत्यङ्गानि निबोध मे ।

कोष्ठ के अङ्ग—१. नाभि (Umblicus) २. प्लीहा (Spleen) ३. यकृत् (जिगर–Liver) ४. क्लोम ५. हृदय (Heart) ६. दोनों वृक्क (गुर्दे–Kidneys) ७. गुदा (Anus) ८. बस्ति (Bladder) ९. क्षुद्रान्त्र (Small Intestines) १०. स्थूलान्त्र (Large Intestines) (११). आमाशय (Stomach) १२. पक्वाशय १३. वपा (हृदय के चारों ओर की मेद–Fatty Tissues) चरक शा. अ. ७ में कोष्ठ के अंग १५ दिये हैं—पञ्चदश कोष्ठाङ्गानि, तद्यथा—नाभिश्च हृदयं च, क्लोम च, यकृच्च, प्लीहा च, वृक्कौ च; बस्तिश्च, पुरीषाधारश्च, आमाशयश्च, पक्वाशयश्च, उत्तरगुदं च, अधरगुदं च, क्षुद्रान्त्रं च, स्थूलान्त्रं च, वपावहनं चेति । इनमें एक पुरीषाधार को अधिक गिना है तथा गुदा के दो भाग उत्तरगुदा तथा अधरगुदा–करके पृथक् २ गिने हैं–इसलिये ये १५ होते हैं ॥१२॥

अक्षिणी नासिके कर्णौ स्तनावेष्ठौ कुकुन्दरौ ।
हस्तौ पादौ भ्रुवौ कूटौ बाहुजङ्घोरुपिण्डिकाः ।
सृक्किणी कर्णशष्कुल्यौ कर्णपुत्राक्षितारके ।
वृषणौ दन्तवेष्टौ च शङ्ककावुपजिह्विके ।
¹दन्तलोहाधिमूलानि द्वे द्वे सर्वाणि निर्दिशेत् ।
बस्तिर्बस्तिशिरः शेफः पृष्ठं सचिबुकोदरम् ।
ललाटमास्यं गोजिह्वा शिरो हृदयमेकशः ।
पाणिपादतलेष्वेव चत्वारि हृदयानि तु ।
शाखाहृदयसंज्ञानि पञ्चमं चेतनाश्रयम् ।
अक्षिबन्धानि चत्वारि विद्याद्विंशतिरङ्गुलीः ।

अब तू मुझसे प्रत्यङ्गों को सुन— २ आंखे+२ नासिका+२ कर्ण+२ स्तन+२ ओष्ठ+२ कुकुन्दर (जघनास्थियों के बाहर की ओर का निम्न भाग–Ischial tuberocities) +२ हाथ+२ पैर+२ भ्रू (भौहें)+२ कूट (अक्षिकूटक–जहां अक्षिगोलक रहते हैं) बाहु की पिण्डिकाएं +२ जङ्घा की पिण्डिकाएं +२ ऊरु देश की पिण्डिकाएं +२ सृक्किणी (होठों के किनारे) +२ कर्णशष्कुलियां–(बाहर से दीखने वाले कान–Pinna of ears) +२ कर्णपुत्रक (कर्णशष्कुली के सामने का उभार–Tragus) +२ अक्षितारक (आंख की पुतलियां–Pupils) +२ वृषण (अण्ड–Testicles) +२ दन्त वेष्ट (मसूड़े) +२ शङ्खदेश (Temporal regious) +२ उपजिह्विका (Tonsils) + २ स्फिक् (नितम्ब–चूतड़ Buttocks) +२ गण्ड (गाल) +२ वंक्षण (रानें–groius) +१ बस्ति (Bladder) +१ बस्तिशिर (नाभि के नीचे का प्रदेश) +१


१. 'स्फिचौ गण्डौ वंक्षणौ च' इति पाठश्चेत् साधु ।

शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११३

शेफ (मूत्रेन्द्रिय) + १ पृष्ठ + १ चिबुक (ठोडी) + १ उदर (पेट) + १ ललाट + १ आस्य (मुख) + १ गोजिह्वा (जिह्वा के नीचे की छोटी जीभ) + १ शिर + ४ पाणितल तथा पादतल के हृदय¹ (इन्हें शाखाहृदय भी कहते हैं) + १ हृदय (चेतनाश्रय) + ४ अक्षिबन्धन + २० अंगुलियां = ८७ प्रत्यङ्ग होते हैं। चरक शा. अ. ७ में निम्न ५६ प्रत्यङ्ग गिनाये हैं— षट्पञ्चाशत्प्रत्यङ्गानि षट्स्वङ्गेषूपनिबद्धानि यानि यान्यपरिसंख्यातानि पूर्वमङ्गेषु परिसंख्यायमानेषु तानि तान्यन्यैः पर्यायैरिह प्रकाश्य व्याख्यातानि भवन्ति; तद्यथा—द्वे जङ्घापिण्डिके, द्वे ऊरुपिण्डिके, द्वौ स्फिचौ, द्वौ वृषणौ, एकं शेफः, द्वे उखे, द्वौ वङ्क्षणौ, द्वौ कुकुन्दरौ, एकं बस्तिशीर्षम्, एकमुदरं, द्वौ स्तनौ, द्वौ श्लेष्मभुवौ, द्वे बाहुपिण्डिके, चिबुकमेकं द्वावोष्ठौ, द्वे सृक्कण्यौ, द्वौ दन्तवेष्टकौ, एकं तालु, एका गलशुण्डिका, द्वे उपजिह्विके, एका गोजिह्विका, द्वौ गण्डौ, द्वे कर्णशष्कुलिके, द्वौ कर्णपुत्रकौ, द्वे अक्षिकूटे, चत्वारि अक्षिवर्त्मानि, द्वे अक्षिकनीनिके, द्वे भ्रुवौ, एकोऽवटुः, चत्वारि पाणिपादहृदयानि। सुश्रुत में निम्न प्रत्यङ्ग गिनाये हैं—मस्तकोदरपृष्ठनाभिललाटनासाचिबुकबस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः। कर्णनेत्रभ्रूशङ्खांसगण्डकक्षस्तनवृषण-पार्श्वस्फिग्जानुबाहूरुप्रभृतयो द्वे द्वे, विंशतिरङ्गुलयः, स्रोतांसि वक्ष्यमाणानि, एष प्रत्यङ्गविभाग उक्तः॥

स्रोतांसि द्विविधान्याहुः सूक्ष्माणि च महान्ति च।
महान्ति नव जानीयाद् द्वे चाधः सप्त चोपरि।
नाभिश्च रोमकूपाश्च सूक्ष्मस्रोतांसि निर्दिशेत्॥

स्रोत दो प्रकार के होते हैं। १. सूक्ष्म २. महान्। महास्रोत नौ होते हैं जिनमें दो नीचे (मूत्रेन्द्रिय अथवा जननेन्द्रिय और गुदा) तथा सात ऊपर शिर में (२ आंखें + २ नाक + २ कान + १ मुखविवर = ७)-ये कुल मिलाकर ९ होते हैं। चरक शा. अ. ७ में कहा है—नव महान्ति छिद्राणि सप्त शिरसि द्वे चाधः। नाभि तथा रोमकूप सूक्ष्म स्रोत समझे जाते हैं।

हृदयात् संप्रतायन्ते सिराणां दश मातरः।
ऊर्ध्वं चतस्रो द्वे तिर्यक्चतस्रोऽधोवहाः सिराः।
व्याप्नुवन्ति शरीरं ता भिद्यमानाः पुनः पुनः।
पर्णानामिव सीवन्यः सरणाच्च सिराः स्मृताः॥

हृदय प्रदेश से शिराओं की १० माताएं (मुख्य या मूल शिराएं-Mother roots) निकलती हैं जिनमें चार ऊपर की ओर, दो तिर्यक् (तिरछी) तथा चार अधोवहा शिरायें होती हैं। ये दस शिरायें ही पुनः २ विभक्त होती हुई सारे शरीर को व्याप्त कर लेती हैं। जिस प्रकार पत्तों में सीवनियां होती हैं उसी प्रकार सारे शरीर में सरण (गति) करने के कारण इन्हें ‘सिरा’ कहते हैं।

वक्तव्य— पूर्व शारीर स्थान के प्रथम अध्याय में शिराओं की संख्या ७०० बताई हैं। यहां ये १० बताई हैं। इसका अभिप्राय यह है कि मूल में ये शिरायें १० ही होती हैं जो कि धीरे २ विभक्त होकर ७०० या इससे भी अधिक संख्या में होकर सारे शरीर में व्याप्त हो जाती हैं। सुश्रुत शा. अ. ७ में छोटी २ जलहारिणियों (नालियों) का उदाहरण देकर बताया है कि जिस प्रकार छोटी २ एवं कृत्रिम असंख्य नालियों द्वारा उद्यान में पानी दिया जाता है उसी प्रकार इन शिराओं से सारे शरीर का पोषण होता है। कहा है—सप्त सिराशतानि भवन्ति, याभिरिदं शरीरमाराम इव जलहारिणीभिः केदार इव च कुल्याभिरुपस्निह्यतेऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः, द्रुमपत्रसेवनीनामिव च तासां प्रतानाः तासां नाभिर्मूलं,


१. इन्हें सुश्रुत ने तलहृदय नामक मर्म कहा है जो कि दोनों हाथों तथा पैरों के तले में होते हैं (मध्यमाङ्गुलीमनुपूर्वेण मध्येपादतलस्य तलहृदयं नाम-सुश्रुत शा. अ. ६-२४)।

११४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शरीरविचयशारीराध्यायः ? ]

ततश्च प्रसरन्त्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च। तथा आगे फिर कहा है-व्याप्नुवन्त्यभितो देहं नाभितः प्रसृताः सिराः। प्रतानाः पद्मिनीकन्दाद्विसादीनां यथा जलम्॥

यथा काष्ठमयं रूपं तृणरज्जुवोपवेष्टितम्। भवेल्लिप्तं मृदा बाह्यं तथेदं देहसंज्ञकम्। अस्थीनि स्नायुबद्धानि स्नायवो मांसलेपनाः। सिराभिः पुष्यते नित्यं तस्य सर्वं त्वचा ततम्।

जिस प्रकार एक लकड़ी का बना हुआ मकान पहले तिनकों तथा रज्जु (रस्सियों) से बांधा जाता है तथा फिर ऊपर से मिट्टी द्वारा लीपा जाता है उसी प्रकार यह देह (शरीर) रूपी मकान है। इसमें सबसे पूर्व अस्थियां स्नायुओं (Ligaments) द्वारा बंधी हुई हैं। स्नायुओं के ऊपर मांस (Museles) चढ़ा हुआ है। शिराओं के द्वारा इसका निरन्तर पोषण होता है। तथा इसके ऊपर त्वचा (Skin) फैली हुई है॥

त....तः (संततं) कर्णमूलाभ्यां धमनीनां शतं शतम्। तासु नित्योऽनिलस्तिष्ठन्नग्नीषोमौ बिभर्त्यधि।।

प्रत्येक कर्णमूल से सौ-सौ धमनियां फैली हुई हैं। इनमें नित्य वायु रहता हुआ अग्नि तथा सोम को धारण करता है।

वक्तव्य—सुश्रुत शा.अ. ९ में ‘धमनी’ शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए टीका में डल्लण ने लिखा है— “धमानादनिलपूरणाद्धमन्यः” उसने भी धमनियों में वायु का होना स्वीकार किया है। वहीं टीका में उसने “शब्दरूपरसगन्धवहत्वादिकं धमनीनाम्” द्वारा धमनियों का कार्य शब्द आदि का वहन दिया है। इस प्रकार ये धमनियां वातवाही नाडियां प्रतीत होती हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान की भाषा में हम Nerves कह सकते हैं। आजकल व्यवहार में धमनी शब्द Artry (रक्तवाहिनी) के अर्थ में प्रयुक्त होता है। वह यहां अभिप्रेत नहीं है॥

साग्रे शतसहस्रे द्वे बहिरन्तश्च कूपकाः। रोमकूपानि तावन्ति जातान्येकैकशो यदि।। वृद्धिह्रासौ निषेकाच्च स्वभावाद्विश्वकर्मणः। चतुर्भागविहीनानि स्त्रीणां विद्धि स्वभावतः।। कूपके कूपके चापि विद्यात् सूक्ष्मं सिरामुखम्। प्रस्विद्यमानस्तैः स्वेदं विमुञ्चति सिरामुखैः।। जातस्य वर्धमानस्य यूनो वृद्धस्य देहिनः। स्वेनाञ्जलिप्रमाणेण द्रवाणि प्रमिमीमहे।।

इसके आगे दो लाख बाह्य एवं आभ्यन्तरिक कूप (छिद्र) होते हैं। रोमकूप भी इतने ही होते हैं। इनमें जन्म से ही अथवा विश्वकर्मा के स्वभाव से वृद्धि एवं ह्रास हो सकता है। अर्थात् इस संख्या में यदि वृद्धि एवं ह्रास हो तो वह जन्म से एवं विश्व के बनाने वाले परमात्मा के स्वभाव से ही समझना चाहिये। स्त्रियों में यह संख्या स्वभाव से चतुर्थांश कम होती है। प्रत्येक रोमकूप में एक २ सूक्ष्म शिरा होती है। स्वेद (पसीना) आने पर उन शिराओं के द्वारा ही पसीना बाहर निकलता है। शरीर से पसीना आने के विषय में आधुनिक विज्ञान भी इसी सिद्धान्त को मानता है। हैलिबर्टन की फिजियोलोजी में कहा है—Sweating in accompanied by a dilatation of the blood-vessels of the region, presumably the result of the production of metabolic products. अब हम उत्पन्न हुए २ (सद्योजात), बढ़ने वाले, युवा तथा वृद्ध पुरुष के शारीरिक द्रवों का अपनी २ अञ्जलि के अनुसार प्रमाण बताते हैं॥

शरीरविचयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११५

मज्जमेदोवसामूत्रपित्तश्लेष्माणि विट् तथा। एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्सप्ताञ्जलिकाः स्मृताः ।।
शोणिताञ्जलयोऽष्टौ तु नव पंक्तिरसस्य तु। दशैवाञ्जलयः प्रोक्ता उदकस्य त्वचाश्रयाः ।।
तेनोदकेन पुष्यन्ति धातवो लोहितादयः। अतीसारे पुरुषं च ततो मूत्रं प्रवर्तते ।।
व्रणे लसीका पूयं च पिच्छा चातः प्रवर्तते। भवन्ति तस्मिन् दुष्टे च दद्रुकण्डूविचर्चिकाः ।।
त्वगामयाः किलासानि पामा केशवधस्तथा। तदग्निमारुतोद्विद्धं (कू) पकैः स्वेद उच्यते¹ ।।
श्लेष्मणस्तु प्रमाणेन प्रमाणं तुल्यमोजसः। शुक्रस्यार्धाञ्जलिर्देहे मस्तिष्कस्य तथैव च ।।
एतत् प्रमाणमुद्दिष्टमुत्कृष्टं सर्वमेव तु। प्रज्ञाप्तपिशितीयस्य ततो मध्यं ततोऽधमम् ।।

मज्जा, मेद, वसा, मूत्र, पित्त, श्लेष्मा तथा मल ये क्रमशः एक, दो, तीन, चार, पांच, छः तथा सात अञ्जलि होते हैं। शोणित (रक्त) की आठ अञ्जलियां तथा पक्तिरस (आहार के परिणत होने-पकने पर जो सबसे पूर्व धातु बनती है तथा जिसे 'रस' कहते हैं) की ९ अञ्जलियां होती हैं। त्वचा के आश्रित उदक (जल) की १० अञ्जलियां होती हैं। इसी उदक (जल) के द्वारा ही शरीर की रक्त आदि धातुओं का पोषण होता है। यही अतिसार में पुरीष के रूप में तथा मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकलता है। यह जल व्रण में लसीका (Lymph), पूय (Pus) तथा पिच्छा (लेसदार द्रव्य) के रूप में निकलता है। इस उदक (जल) के दूषित हो जाने पर दद्रु, कण्डू (खुजली), विचर्चिका, किलास (श्वित्र-श्वेत कुष्ठ) तथा पामा (Eczema) आदि त्वग्रोग तथा केशवध (बालों का झड़ना) आदि होते हैं। यही उदक अग्नि एवं वायु के संयोग से जब रोमकूपों के द्वारा बाहर निकलता है तब स्वेद (Sweat) कहलाता है। श्लेष्मा (कफ) के प्रमाण के समान ही अर्थात् ६ अञ्जलि ओज का प्रमाण है। शरीर में शुक्र का प्रमाण आधी अञ्जलि है तथा मस्तिष्क का भी इतना ही (आधी अञ्जलि) है। यह प्रज्ञप्तिपिशित (पूर्व निर्दिष्ट) नामक शारीरिक संहनन वाले (कलियुगी) पुरुष के सम्पूर्ण शरीर के द्रवों का उत्कृष्ट (Maximum) प्रमाण कहा गया है। मध्य व्यक्तियों का मध्यम (Medium) तथा अधम व्यक्तियों का अधम (Minimum) प्रमाण भी होता है। चरक शा. अ. ७ में भी शारीरिक द्रव्यों का इसी प्रकार अञ्जलि प्रमाण दिया गया है—यत्त्वञ्जलिसंख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्परं प्रमाणमभिक्षेय, तच्च वृद्धिह्रासयोगि, तर्क्यमेव; तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेनाञ्जलिप्रमाणे यत्तत् प्रच्यवमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून्, यत्तत् सर्वशरीरचर बाह्या त्वग्बिभर्ति, यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्धं लोमकूपेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणं, नवाञ्जलयः पूर्वस्याहारपरिणामधातोर्र्यं तं रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणितस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो वसायाः, द्वौ मेदसः, एकः मज्जः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य तावदेव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ।।

शुक्रं तु षोडशे वर्षे सम्पूर्णं संप्रवर्तते । अन्योन्यसंश्रयाण्याहुरन्योन्यगुणवन्ति च ।।
महाभूतानि दृश्यानि दार्वग्नितिलतैलवत् ।

सोलहवें वर्ष में पुरुष में शुक्र सम्पूर्ण (पूर्ण परिपक्व) रूप से प्रवृत्त होने लगता है। जिस प्रकार लकड़ी में अग्नि तथा तिलों में तेल होता है उसी प्रकार ये पञ्चमहाभूत भी परस्पर एक दूसरे के आश्रित तथा एक दूसरे के गुणों वाले होते हैं ।।


१. 'यच्चोष्मणाऽनुबद्धं रोमकूपेभ्यो निष्पतत् स्वेदशब्दमवाप्नोति' इति चरकः (शा.अ. ७) ।

११६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

शरीरसंख्या निर्दिष्टा यथास्थूलं प्रकारतः ।।
देहावयवसूक्ष्मं तु भेदानन्त्यं सुदुर्वचम् ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
इति (शारीरस्थाने) शरीरविचयं नाम शारीरम् ।


यह स्थूल (मोटे) रूप से शरीर के अवयव इत्यादिकों की संख्या का निर्देश किया है। देह के सूक्ष्म अवयवों के भेद तो अनन्त हैं इसलिये उनका परिगणन करना हो तो अत्यन्त कठिन है ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति (शारीरस्थाने) शरीरविचयं नाम शारीरम् ।


जातिसूत्रीयशारीराध्यायः

अथातो जातिसूत्रीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम जातिसूत्रीयं शारीर का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में जन्मशास्त्र या उत्पत्तिशास्त्र की व्याख्या की जायेगी ।।१-२।।

जातौ जातौ खलु स्वभाव एवाकृतिभेदनिर्वर्तयिता भवति । स्वभावतो ह्यस्य वायुपरमाणवः संयोगविभागचेष्टाधिकारा आकुञ्चनप्रसारणकोष्ठाङ्गप्रत्यङ्गधातुचेतनाश्रोतांसि विभजान्त । समत्यके¹ धातुरिव निषिक्तः पुरुषः पुरुषमभिनिर्वर्तयति, गौर्गमिक्ष्वाऽश्वमेवमादि । नृणामपि तु मध्ये गर्भनिर्वृत्तिः । तत्र द्वयोदम्पत्योः स्वभावात् स्वकर्मपरिणामाद्वा प्रजाभिवृद्धिर्भवति, तौ धन्यौ; अतोऽन्यथा भिषजितव्यो । स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनानुवासनैः क्रमश उपचरेन्मधुरौषधसिद्धाभ्यां क्षीरघृतपुष्टं पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमांसा (माषा) भ्यामित्येके; सात्म्यैरेवेति प्रजापतिः ।। ३ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ८४ तमं पत्रम् ।)

प्रत्येक जाति में स्वभाव से ही आकृति भेद होता है। संयोग, विभाग तथा चेष्टा को करने वाले वायु के परमाणु स्वभाव से ही इसके आकुञ्चन (सिकुड़ना), प्रसारण (फैलना), कोष्ठ के अङ्ग, प्रत्यङ्ग, धातु, चेतना तथा स्रोतों का विभाजन करते हैं। जिस प्रकार सांचों में ढला हुआ पुरुष-पुरुष को उत्पन्न करता है और गौ-गौ को तथा घोड़ा-घोड़े को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों में भी गर्भ की निर्वृत्ति होती है। पति और पत्नी दोनों के स्वभाव से अथवा अपने कर्मों के परिणाम से यदि सन्तान उत्पन्न होती है तो वे (पति तथा पत्नी) धन्य (प्रशस्त) हैं। यदि इसके विपरीत हैं अर्थात् किसी कारण से सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती है तो उनकी चिकित्सा करनी चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन,


¹ १. तद्यथा-कनकरजतताम्रत्रपुसीसकान्यवसिच्यमानानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टबिम्बेषु (मधूच्छिष्टविग्रहेषु) तानि यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा मनुष्यविग्रहेण जायन्ते' इति चरकः (शा. अ. ३)

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]शारीरस्थानम्११७

आस्थापन तथा अनुवासन द्वारा क्रमशः शुद्ध करके दूध तथा घृत से पुष्ट हुए २ पुरुष को मधुर ओषधियों से सिद्ध घृत का तथा स्त्री को तैल और मांस (माष पाठ होने पर उड़द अर्थ होगा) का सेवन करायें-ऐसा कुछ लोग कहते हैं परन्तु प्रजापति कश्यप के मत में जिसे जो सात्म्य हो उसे उसी का सेवन करायें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—अथाप्येतौ स्त्रीपुरुषौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुपाचरेत्, उपाचरेच्च मधुरौषधसंस्कृताभ्या पुरुषं, स्त्रिय तु तैलमाषाभ्याम्। अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—विशेषतस्तु धृतक्षीरवद्भिर्मधुरौषधसंस्कारैः पुरुषं, तैलेन नारीं पित्तलैश्च मांसैः शुक्र एवं रज को शुद्ध करने तथा उनको पूर्ण करने के लिये यह निधान दिया गया है ॥३॥

यथा च पुष्पमध्ये फलमनिर्वृत्तं सुसूक्ष्ममस्ति न चोपलभ्यते, यथा चाग्निदारुषु सर्वगतः प्रयत्नाभावान्नोपलभ्यते, तथा स्त्रीपुंसयोः शोणितशुक्रे कालावक्षे स्वकर्मावक्षे च भवतः । षाडशवर्षयोर्हि शोणित१शुक्रयोर्मध्ये प्रभवतः; अर्वागपि यदाहारविशेषादारोग्याच्च पूर्णे भवत इति परिषत् ।।४।।

जिस प्रकार पुष्प में फल सूक्ष्म तथा अनुत्पन्न (Latent) या अदृश्य अवस्था में होने से उपलब्ध नहीं होता अथवा जिस प्रकार लकड़ियों में सब जगह अग्नि होने पर भी प्रयत्न के बिना प्राप्त नहीं होती है उसी प्रकार स्त्री एवं पुरुष में क्रमशः शोणित (आर्तव) तथा शुक्र (वीर्य) काल तथा अपने कर्मों की अपेक्षा रखते हैं अर्थात् उचित समय पर प्रकट होते हैं। स्त्री एव पुरुष के १६ वर्ष के होने पर शोणित तथा शुक्र कार्य करने में समर्थ होते हैं अथवा पूर्ण होते हैं। १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व भी आहार की विशेषता तथा आरोग्य के कारण शोणित और शुक्र पूर्ण हो सकते हैं। अर्थात् साधारणतया १६ वर्ष की अवस्था में शुक्र एवं शोणित पूर्ण परिपक्व होता है परन्तु यदि पौष्टिक आहार मिले तथा स्वास्थ्य उत्तम हो तो इससे पूर्व भी शुक्र एवं शोणित पूर्ण हो सकते हैं।

वक्तव्य—सुश्रुत में पुरुष के २५ वर्ष तथा स्त्री के १६ वर्ष का होने पर ही मैथुन का विधान दिया गया है। शोणित एवं शुक्र की उपस्थिति इससे पूर्व भी होती है परन्तु वे पूर्ण अवस्था में नहीं होते हैं। शारीर स्थान के दशवें अध्याय में कहा है—ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम्। यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ।। जातो वा न चिरञ्जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः ।। इस अवस्था में जो गर्भ की स्थिति होगी वह या तो गर्भाशय में ही मृत हो जाता है अथवा उत्पन्न होने के बाद मृत हो जायगा या अत्यन्त ही दुर्बल सन्तान उत्पन्न होगी। स्त्री में १६-२० वर्ष तक की अवस्था में सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक होती है। उससे पूर्व अपक्वावस्था होती है तथा उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। इसी प्रकार पुरुष में २० वर्ष की अवस्था से लकर प्रायः ३०-३५ वर्ष की अवस्था तक सन्तानोत्पत्ति की शक्ति सबसे अधिक विद्यमान होती है। उसके बाद वह शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगती है। यह सामान्य नियम है। इसके अपवाद भी हो सकते हैं तथा वाजीकरण ओषधियों के द्वारा इस शक्ति को बहुत बड़ी अवस्था तक भी स्थिर रखा जा सकता है ॥४॥

रजस्वलायाश्चेत् प्रथमेऽहनि गर्भ आपद्येत तं वातगर्भमाचक्षते विफलं वातपुष्पमिवोद्भिदानां; द्वितीयेऽहनि चेत् स्रंसते च्यवते वा; तृतीयेऽहनि सूतिकासने म्रियते, न वा दीर्घायुर्भवति, हीनाङ्गश्च जायते; अतऊर्ध्वमृतुर्द्वादशाहं ब्राह्मणीनाम्, एकादशाहं क्षत्रियाणां, दशाहं वैश्यानां, नवरात्रमितरासाम् । ऋतुर्बीजकालमवेक्षत इत्याहुर्महर्षयः । अत ऊर्ध्वमकालजमाहुः । अकालजं हीनं दुर्बलमस्थिरमदृढ़मपीनभङ्गुरं धान्यमिव भवति ।।५।।


१. 'शोताणुशुक्रे पूर्णे भवतः' इति पाठश्चेत् साधु ।

१९८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

यदि रजस्वला स्त्री के रजोदर्शन के प्रथम दिन ही गर्भ की स्थिति हो जाय तो उसे वृक्षों के वातपुष्प की तरह 'वातगर्भ' कहते हैं तथा वह फलशून्य होता है अर्थात् उस गर्भ के सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती है। यदि (रजोदर्शन के) दूसरे दिन गर्भाधान किया जाय तो गर्भपात (स्राव अथवा पतन$^१$) हो जाता है। रजोदर्शन के तीसरे दिन यदि गर्भाधान हुआ हो तो उत्पन्न बालक की सूतिकागृह में ही मृत्यु हो जाती है अथवा यदि मृत्यु न भी हो तो वह बालक दीर्घायु नहीं होता तथा हीन अङ्गों वाला उत्पन्न होता है। चरक. शा. अ. ८ में भी रजोदर्शन के बाद की प्रथम तीन रात्रियों में सहवास करना निषिद्ध है। कहा है—ततः पुष्पात्प्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी पाणिभ्यामन्त्रमजर्जरपात्रे भुञ्जाना न च कांचिद् मृजामापद्येत। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नाञ्जनाश्रुपात-स्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधावनहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिलायासान् परिहरेत्। किं कारणं ? दिवा स्वपन्त्याः स्वापशीलः, अञ्जनादन्धः, रोदनाद्विकृतदृष्टिः, स्नानानुलेपनाद् दुःखशीलः, तैलाभ्यङ्गात् कुष्ठी, नखापकर्तनात् कुनखी, प्रधावनाच्चञ्चल, हसनाच्छ्यावदन्तौष्ठतालुजिह्वः, प्रलापी चातिकथनात्, अतिशब्दश्रवणाद्वधिरः, अवलेखनात् खलतिः, मारुतायाससेवनादुन्मत्तोगर्भं भवतीत्येवमेतान् परिहरेत्। इन तीन रात्रियों के बाद ऋतुकाल होता है जो कि ब्राह्मणी के लिये १२ दिन, क्षत्रिय स्त्री के लिये ११ दिन, वैश्य स्त्री के लिये १० दिन तथा अन्य शूद्र आदि स्त्रियों के लिये ९ दिन होता है। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनमनापुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विमुच्यते, द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा, तृतीयेऽप्येवं पूर्णाङ्गोऽल्पायुर्वा भवति, चतुर्थेतु संपूर्णाङ्गो दीर्घायुश्च भवति। न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्रोतः प्लाविवद्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्त्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेव द्रष्टव्यम्। तस्मान्नियमवर्ती त्रिरात्रं परिहरेत्। अतः परं मासादुपेयात्। चतुर्थ दिन से लेकर अगले रजोदर्शन तक स्त्री-पुरुष परस्पर सहवास कर सकते हैं। यदि रजोदर्शन न हो तो इसका अभिप्राय यह है कि गर्भ की स्थिति हो चुकी है। उस अवस्था में पुनः मैथुन नहीं करना चाहिये। ऋतु-बीज (शुक्र और शोणित) तथा काल की भी अपेक्षा रखता है—ऐसा महर्षियों ने कहा है। अर्थात् केवल ऋतु के यथोचित होने मात्र से ही गर्भोत्पत्ति नहीं होती है अपितु उसके साथ स्त्री-पुरुष का शोणित तथा शुक्र शुद्ध एवं पूर्ण होना चाहिये तथा काल भी यथावत् होना चाहिए तब गर्भ की स्थिति होती है। सुश्रुत शा. अ. २ में गर्भोत्पत्ति की अङ्कुरोत्पत्ति के साथ बड़ी सुन्दर तुलना की गई है—ध्रुवं चतुर्णां सन्निध्याद् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः। ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्र्यादङ्कुरो यथा।। जिस प्रकार अंकुर की उत्पत्ति ऋतु (वर्षा आदि काल), क्षेत्र (खेत-भूमि), अम्बु (जल) तथा बीज पर निर्भर है उसी प्रकार गर्भ की उत्पत्ति भी ऋतु (रजोकाल) क्षेत्र (गर्भाशय का शुद्ध होना), अम्बु (आहार के परिणाम से उत्पन्न होने वाली रसधातु) तथा बीज (शुक्र तथा आर्तव) पर निर्भर है। अर्थात् ये चारों अवस्थायें ठीक हों तभी गर्भ की स्थिति सम्यक् प्रकार से हो सकती है। इन उपर्युक्त १२ रात्रियों के अतिरिक्त समय 'अकाल' कहलाता है अर्थात् इन में मैथुन नहीं करना चाहिये। इसीलिये सुश्रुत में कहा है—"त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः”। इस अकाल में स्थित गर्भ अकाल में होने वाले धान्य की तरह हीन गुणों वाला, दुर्बल, अस्थिर, अदृढ (कमजोर), पतला तथा भङ्गुर होता है ॥५॥

युग्मेष्वहःसु पुत्रकामोऽन्यत्र कन्यार्थी हर्षितस्तृप्तोऽनुरुद्धः स्त्रियमुपेयादिति सिद्धम् ॥६॥

पुरुष यदि पुत्रोत्पत्ति का इच्छुक है तो हर्षयुक्त (प्रसन्न अथवा ध्वजहर्ष होने पर), तृप्त तथा अनुरुद्ध (किसी अन्य स्त्री को न चाहता) हुआ युग्म दिनों में अर्थात् रजोदर्शन से चौथी, छठी, आठवीं, दसवीं तथा बारहवीं रात्रि में स्त्री से


१. सुश्रुत निदान अ. ८ में गर्भपात तथा गर्भास्राव का निम्न भेद दिया है—आचतुर्थातत्तो मासात् प्रस्रवेदगर्भ विद्रवः । ततः स्थिरतर शरीरस्य पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ अर्थात् गर्भाधान से चतुर्थमास तक गर्भस्राव होता है अर्थात् गर्भ, स्राव के रूप में गिरता है तथा उसके बाद पांचवें और छठे मास में स्थिर (घन) गर्भ का पात होता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार गर्भस्राव को Abortion तथा गर्भपात को miscarriage कहते हैं।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् ११९

सहवास करे। यदि वह कन्या की उत्पत्ति का इच्छुक है तो अयुग्म (पांचवीं, सातवीं, नवमी, इग्यारहवीं, तेरहवीं) रात्रियों में मैथुन करना चाहिये। चरक शा. अ. ८ में कहा है—स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृकामौ। सुश्रुत शा. अ. २ में भी कहा है—नारीमुपेयाद्रात्रौ सामादिभिरभिविश्वास्य। विकल्प्यैवं चतुर्थ्यां षष्ठयामष्टम्यां दशम्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः। एषूत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च। प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ।। अतः परं पञ्चम्यां सप्तम्यां नवम्यानेकादश्यां च स्त्रीकामः, त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः ॥६॥

अथ शुद्धस्नातां (ता) स्त्रियं (स्त्री) चतुर्थेऽहनि स्नानगृहे श्वेतेन एवाऽन्येन वाससाऽवगुण्ठ्यानवलोकयन्ती शुचिर्देवगृहं प्रविश्योद्धताग्नि१ प्रज्वलन्तं घृताक्षतेनाभ्यर्च्य ब्राह्मणमीश्वरं विष्णुं स्कन्दं च संप्रेक्ष्याभिवाद्य, निष्क्रम्य सूर्यचन्द्रमसाविति, न तु प्रेतपिशाचरक्षांसि; शुद्धस्नातमात्रा हि स्त्री यं वा पश्यति मनसा वाऽभिध्यायति तादृशाचारवपुषं प्रायेण जनयति; तस्माद्देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धाचार्यान् सन्तः पश्येत्, कल्याणमनाश्च स्यात्। न तु सन्ध्ययोः स्नानं मैथुनं वोपेयान्नान्यमना इति ॥७॥

इससे बाद स्नान आदि के द्वारा शुद्ध हुई स्त्री चौथे दिन स्नानगृह में अन्य श्वेत (शुभ्र) वस्त्र से अपने आपको ढककर इधर उधर न देखती हुई पवित्र मन से देवगृह (मन्दिर) में जाकर प्रज्वलित तथा हवन की हुई अग्नि की घृत तथा अक्षत द्वारा अभ्यर्चना (पूजा) करके, ब्राह्मण, ईश्वर, विष्णु तथा स्कन्द को देखकर तथा उनका अभिवादन करके, सूर्य एवं चन्द्रमा को नमस्कार करे। वह प्रेत, पिशाच तथा राक्षस आदिकों को नमस्कार न करे। स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्री सबसे प्रथम जिसे देखती है अथवा जिसका ध्यान करती है उसी प्रकार के आचार एवं शरीर वाली सन्तान को उत्पन्न करती है। इसलिये सब से पहले वह स्त्री-देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध पुरुष (गुरुजन) तथा आचार्य का दर्शन करे एवं कल्याणयुक्त मन वाली रहे अर्थात् मन में सदा कल्याण की ही इच्छा करे। सन्ध्या काल में स्त्री स्नान तथा मैथुन न करे। तथा उसे अन्यमना (पति के अतिरिक्त किसी दूसरे व्यक्ति में मन वाली) नहीं होना चाहिये। सुश्रुत शा. अ. २ में कहा है—पूर्व पश्येद् ऋतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना। तादृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥७॥

तत ऋत्विक् पुत्रीयामिष्टिं निर्वपेत्। सिद्धमांसौदना वातघ्नौ (?) वाऽऽज्यभागौ, यवमयः पुरोडा- शोऽष्टाकपालो, ब्रीहिमयरुः, उभौ वागायुर्युतौ प्रजायेते; नत्वदे ....... क्षे, 'आब्रह्मन्ब्राह्मण' इति यजमानभागमभिमन्त्र्य शेषं दम्पती प्राश्नीयाताम्। श्वेत ऋषभोऽश्वो वा हिरण्यं वा भिषजे सैव दक्षिणा, सैवमनाहिताग्नेः, शलाग्नौ नित्यं होमं हुत्वा, तेनैव मन्त्रेण हुतशेषं तौ प्रा (श्नीतः)। शयनीये मृदुस्वास्तीर्णोपहितेऽस्यै भर्ता .......... त्र लक्ष्मणामद्भिरालोड्य, 'सोमः पवत' इत्येतेन शतजप्तेन सावित्र्या व्याहृतिभिः 'अपो देवीरुपसृज' इति मन्त्रेण नस्यं दत्त्वा, वामदेव्यं जपित्वा, दक्षिणेन पार्श्वेन स्त्रियं शाययीत, वामपार्श्वेन पुमानूर्ध्वोत्तरेणोपशयीत्। शनैः प्रजार्थं चाचरेत्। बीजेऽवसिक्ते विधार्यावसर्फेत्। शीतोदकेन च शौचं कुर्यात्। तत ऊर्ध्वमग्निकर्मप्रतापायासव्यायामशोकादिवर्जनमिति ॥८॥

इसके बाद ऋत्विक् पुत्रीय इष्टि (पुत्रेष्टि यज्ञ) को करे। एतदर्थ आज्याहुति के निमित्त वातनाशक एवं सिद्ध किये हुए मांस और ओदन, आठ कपालों में संस्कृत होने वाला यव का बना हुआ पुरोडाश (पूड़ा-अपूप) तथा ब्रीहि के बने हुए चरु (हविविशेष) इत्यादि पदार्थों को तैयार करे। इससे वे दोनों (पति तथा पत्नी) वाणी और आयु से युक्त हो जाते हैं। फिर "ओं आब्रह्मन् ब्राह्मण" इत्यादि मन्त्र बोलकर उससे यजमान के भाग को अभिमन्त्रित करके शेष भाग की दम्पती (पति-पत्नी) खायें। अनाहिताग्नि (जिसने अग्नि का आधान नहीं किया है) वद्य को सफेद बैल, घोड़ा अथवा धन की


१. 'उद्वाहाग्निं' इति पाठश्चेत् साधु।

१२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]


दक्षिणा देवे । तदनन्तर शालाग्नि (गार्हपत्य अग्नि) में आहुति डालकर उसी मन्त्र के द्वारा दोनों पति तथा पत्नी यज्ञशेष को खायें । इसके बाद पति मृदु तथा आस्तीर्ण युक्त बिछौने पर पत्नी को लिटाकर लक्ष्मणा (पुत्रदा-श्वेत कटेरी) नामक ओषधि को जल में घोलकर “सोमः पवत” इत्यादि मन्त्र को १०० वार जपकर सावित्री (गायत्री) मन्त्र की “भूर्भुवः स्वः महः” इत्यादि व्याहृतियों के द्वारा 'अपो देवीरुपसृज' इत्यादि मन्त्र से (लक्ष्मणा ओषधि का) नस्य देवे । तदनन्तर वामदेव (सामगान) को गाकर दाईं ओर स्त्री को लिटाये तथा बाईं ओर पुरुष लेटे । फिर ऊपर तथा नीचे की स्थिति में होकर लेट जायें और शनैः २ सन्तानोत्पत्ति के निमित्त आचरण करें अर्थात् मैथुन करें । चरक में भी पुत्रेष्टि का विधान दिया गया है । शारीर स्थान के आठवें अध्याय में कहा है—ततस्तस्या आशासानाया ऋत्विक् प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्याः कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टं निर्वपेत विष्णुर्योनिं कल्पयतु” इत्यनया ऋचा । ततश्चैवाज्येन स्थालीपाकमभिधार्य त्रिजुहुयात्, यथाऽऽम्नायं चोपमन्त्रितमुदकपात्रं तस्यै दद्यात्सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति । ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् । ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति सह भर्त्राऽऽज्यशेषं प्राश्नीयात्, पूर्वं पुमान् पश्चात्स्त्री, न चोच्छिष्टमवशेषयेत्; ततस्तौ सह संवसेतामष्टरात्रं तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, यथेष्टपुत्रं जनयेताम् ।

वक्तव्य—सन्तानोत्पत्ति के लिये मैथुन के समय पुरुष को ऊपर तथा स्त्री को नीचे लेटना चाहिये । केवल मैथुन के आनन्द के लिए यद्यपि कामशास्त्र के अनुसार अनेक प्रकार के आसनों का प्रयोग किया जाता है तथापि उनका उद्देश्य केवल आनन्द मात्र ही है । सन्तानोत्पत्ति नहीं । सन्तानोत्पत्ति के लिये तो सर्वश्रेष्ठ आसन पुरुष को ऊपर तथा स्त्री को नीचे लेटना ही है । इसीलिये चरक शा. अ. ८ में कहा है—न च न्युब्जां पार्श्वगतां वा संसेवेत, न्युब्जाया वातो बलवान् स योनिं पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिदधाति गर्भाशयं, वामे पित्तं पार्श्वे तस्याः पीडितं विदहति रक्तशुक्रं, तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात्; तस्या हि यथास्थानमवतिष्ठते दोषाः । बीज (शुक्र) के योनि में अवसिंचन हो जाने पर स्त्री को उसे धारण करके अलग सो जाना चाहिये । उसके बाद मैथुन के समाप्त हो जाने पर ठण्डे पानी से शुद्धि करनी चाहिये । ठण्डे पानी से योनि की मांसपेशियां सिकुड़ेंगी जिससे धारण किये हुए वीर्य की योनि में स्थिरता होकर गर्भोत्पत्ति की संभावना अधिक होगी । इसीलिये चरक में कहा है-‘पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत्’ इसकी व्याख्या में 'गङ्गाधर' ने लिखा है-एनां कृतकर्मणां स्त्रियं मैथुनश्रमोष्मप्रशमार्थं शोतोदकेन मुखनयनादिषु योनिषु च परिषिश्चेत्” । मुख, नेत्र तथा योनि में शीतल जल के छींटे देने चाहिये । इसके साथ ही चरक शा. अ. ८ में गर्भस्थापनकारक औषधियां दी हुई हैं, इनका सेवन किया जा सकता है। कहा है-अत ऊर्ध्वं गर्भस्थापनानि व्याख्यास्यामः—ऐन्द्रीब्राह्मीशतवीर्यासहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथाशिवा बलाऽरिष्टावाट्यपुष्पीविष्वक्सेनकान्ता च, आसामोषधीनां शिरसादक्षिणेन पाणिना धारणम्, एताभिश्चैव सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नानं, सदा समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयाक्तानामोषधीनां सदोपयोगस्तैस्तैरुपयोगविधिभिः, इति गर्भस्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति । इसके बाद अग्निकर्म (अग्नि के पास बैठकर कार्य आदि का अधिक करना), धूप, आयास (परिश्रम), व्यायाम तथा शोक आदि का त्याग कर देना चाहिये अर्थात् इनका अधिक सेवन नहीं करना चाहिये । चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तस्मादहितानाहारविहारान् प्रयोजसम्पदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्जयेत्, साध्वाचारा चात्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहार विहाराभ्याम् ॥८॥

सा चेदिच्छेद् गौरमोजस्विनं शुचिमायुष्मन्तं पुत्रं जनयेयमिति, तस्या एवं शुद्धस्नानात् प्रभृति, शुक्लयवंसक्तूनां मधुघृताभ्यां श्वेतायाः श्वेतपुंवत्साया गोः क्षीरेण संसृज्य मन्थं राजते पात्रे कांस्ये वा सदा पाययेत्, शालिगौरयवक्षीरदधिघृतप्रायं च काले मात्रया अश्नीयात्, पुष्पाभरणवासांसि च शुक्लानि बिभृयात्, सायं प्रातश्च श्वेतमश्वं वृषभं वा पश्येत्, सौम्यहितप्रियकथाभिरासीत अनुकूलपरिवारा च स्यादिष्टमपत्यं जनयति । या तु श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं पुत्रमिच्छेत् कृष्णं वा तत्र तादृगुपचारो

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२१

भोजनवसनकुसुमाल्याङ्काराणां, तादृग्देशानुचिन्तनं चेति। यवागूं तु कन्यार्थिनीभ्योदद्यात्; क्षीरोदकतिलसिद्धास्तु वर्ण्याः। गौरश्यामकृष्णोभ्योऽन्ये वर्णा निन्दिताः ।।९।।

यदि वह स्त्री गौरवर्ण, ओजस्वी, पवित्र तथा दीर्घायु पुत्र को उत्पन्न करना चाहे तो उसे स्नान द्वारा शुद्ध होने के पहले दिन से ही मधु तथा घृत (असमान मात्रा) सहित सफेद जौ के सतुओं से बनाये हुए मन्थ में श्वेत रंग की तथा जीवित श्वेत रंग के बछड़े वाली गौ का दूध मिलाकर चांदी अथवा कांसी के पात्र में सदा पिलाये। तथा यथासमय शालि, सफेद जौ, दूध, दही तथा घी मिलाकर मात्रा में सेवन करे। वह श्वेत पुष्प एवं वस्त्रों को धारण करे, सायं तथा प्रातः काल श्वेत घोड़े तथा बैल का दर्शन करे। सौम्य, हितकारी तथा प्रिय कथाओं (बातचीत) से युक्त रहे अर्थात् उससे सौम्य तथा प्रिय बातचीत ही करनी चाहिये तथा उसके पास उसके मन के अनुकूल परिवार के व्यक्ति ही रहने चाहिये। इस प्रकार वह अभिलषित पुत्र को उत्पन्न करती है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विनं शुचिं सत्वसंपन्नं पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिभ्यां संसृज्य श्वेताया गौः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा पात्रे काले काले सप्ताहं सततं प्रयच्छेत्पानाय, प्राप्ततश्च शालियवान्निकारान् दधिमधुसर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमावदातशरणशयनासनयानवसनभूषणा च स्यात्, सायं प्रातश्च शश्वच्छ्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूल भिरुपासीत, सौम्याकृतिवचनोपचारचेष्टांश्च स्त्रीपुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चैनां प्रियहिताभ्यां सततमुपचरेयुः, तया भर्ता, न च मिश्रीभावयापद्येयाताम्। जो स्त्री श्याम वर्ण के, लाल आखों वाले, विस्तृत एवं उन्नत छाती वाले अथवा कृष्ण वर्ण के पुत्र को उत्पन्न करना चाहे तो उसके लिये भी भोजन, वस्त्र, पुष्प तथा अलंकार आदिका उसी प्रकार का उपचार करना चाहिये तथा उसीप्रकार के देश (स्थान) का चिन्तन भी करना चाहिये। अर्थात् जिस वर्ण के पुत्र को चाहे उसी वर्ण के वस्त्र, अलंकार भोजन आदि होने चाहिये। चरक शा. अ. ८ में कहा है—या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहुं च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्णमृदुदीर्घकेशं शुक्लाक्षं, शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मवन्तम्, एष एवानयोरपिहोमविधिः, किन्तु परिबर्हवर्ज्यं स्यात्, पुत्रवर्णानुरूपस्तु यथाऽऽशोः परिबर्होऽन्यकार्यः स्यात्। परिबर्ह (भोजन, पुष्प, आसन, बिछौना इत्यादि बाह्य वस्तुओं) को छोड़कर उसके लिये भी शेष होम आदि की वही पूर्वोक्त विधि ही है। इसके आगे स्त्री जैसे भी वर्ण के पुत्रों को चाहती हो उसके लिये चरक में विधान दिया गया है—या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां पुत्राशिषमनुनिशाम्य तांस्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत्, ताननुपरिक्रम्य या या येषां जनपदानां मनुष्याणामनुरूपं पुत्रमाशासीत सा सा तेषां तेषां जनपदानामाहारविहारोपचारपरिच्छादाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात्; इत्येतत्सर्वं पुत्राशिषां समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातं भवति। कन्या को चाहनेवाली स्त्री को यवागू देना चाहिये। सिद्ध किये हुए क्षीरोदक तथा तिल वर्ण्य (वर्ण को बढ़ाने वाले) होते हैं। गौर, श्याम तथा कृष्ण वर्णों से भिन्न वर्ण (रंग) निन्दित माने गये हैं ।।९।।

आहारश्चतुर्विधः, षड्रसाश्रयो, विंशतिविकल्पोगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसर-मृदुकठिनविशदपिच्छिलश्लक्ष्ण-खरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रद्रवविकल्पात्; तेन त्वगादयः शुक्रान्ता धातव आप्यायन्ते। तेषां समानं वर्धनमविरुद्धाशनम्। वातादीनां तु धातूनामन्ये धातवआप्यायिता (रो) भवन्ति; भुज्यमानं मांसं मांसस्य, शोणितं शोणितस्येति; तद्धर्मभयादनिष्टं, तद्गुणैस्तु शुचिभिराहारैः क्षीणधातूनाप्याययेत्। शुक्रक्षये क्षीरघृतोपयोगो मधुरस्निग्धजीवनानां चान्येषामपि द्रव्याणामविदाहिनां प्रशस्यते, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणतक्रगुडत्रपुसोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये यवान्नविकृतिकुल्माषमाषषष्टिकयावकगोरसाम्ललवणस्निग्धशाकोपयोगः, वातक्षये कटुतिक्त-

१२२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

कषायलघुरूक्षशीतयवान्नोपयोगः, पित्तक्षये कटुलवणाम्लतीक्ष्णोष्ण-क्षाराणां, कफक्षये स्निग्धमधुर-गुरुसान्द्रादीनाम् ।।१९०।। ...........................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ८५ पत्रम् १ ।)

आहार चार प्रकार का (पेय, लेह्य, भक्ष्य तथा भोज्य), होता है। यह मधुर आदि ६ रसों के आश्रित होता है तथा गुरु-लघु, शीत-उष्ण, स्निग्ध-रूक्ष, मन्द-तीक्ष्ण, स्थिर-सर, मृदु-कठिन, विशद-पिच्छिल, श्लक्ष्ण-खर, सूक्ष्म-स्थूल, सान्द्र-द्रव आदि विकल्पों (भेदों) से २० प्रकार का होता है। उस आहार से त्वचा से लेकर शुक्र पर्यन्त सम्पूर्ण धातुओं का पोषण होता है। समान गुण तथा समान गुण भूयिष्ठ द्रव्यों के सेवन से उनकी वृद्धि होती है परन्तु विरुद्धाशन नहीं होना चाहिये। वात आदि धातुओं को अन्य धातुऐं बढ़ाने वाली होती हैं। मांस का सेवन करने पर मांस धातु की वृद्धि होती है, शोणित का सेवन करने पर शोणित की वृद्धि होती है। परन्तु अधर्म के कारण इसका सेवन इष्ट (हितकर) नहीं माना जाता है। इसलिये उन्हीं धातुओं के गुण वाले अन्य पवित्र आहारों के द्वारा क्षीण हुई धातुओं को बढ़ाना चाहिये। शुक्र के क्षय में क्षीर एवं घृत का उपयोग तथा अन्य भी मधुर स्निग्ध एवं जीवनीय आदि अविदाही द्रव्यों का सेवन प्रशस्त माना जाता है। मूत्र के क्षय में ईख का रस, वारुणी, मण्ड, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, तक्र, गुड, त्रपुस आदि उपक्लेदी (शरीर को गीला रखने वाले) द्रव्य हितकर होते हैं। पुरीष के क्षय में यवान्न (यवकृतभक्त) विकृति, कुल्माष (कुलत्थ), माष (उड़द), षष्टिक (सांठी के चावल), यावक (यवागू), गोरस (गोदुग्ध आदि), अम्ल, लवण तथा स्निग्ध शाकों का प्रयोग करना चाहिये। वात के क्षय में कटु, तिक्त, कषाय, लघु, रूक्ष एवं शीत द्रव्य तथा यवान्न का, पित्त के क्षय में कटु, लवण, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण तथा क्षार द्रव्यों का और कफ के क्षय में स्निग्ध, मधुर, गुरु तथा सान्द्र आदि द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये।

**वक्तव्य—**आहार विहार आदि की समानता होने पर शारीर धातुओं में वृद्धि होती है। चरक सू. अ. १ में कहा है-सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। गुरु धातुएँ गुरु आहार-विहार से तथा लघु धातुएँ लघु आहार-विहार के सेवन से वृद्धि को प्राप्त होती हैं। इसीलिये चरक शा. अ. ६ में कहा है—‘‘एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिविपर्ययाद् ह्रासः, एतस्मान्मासमाप्याय्यते मांसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यस्तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्जया, शुक्रं शुक्रेण गर्भस्त्वामगर्भेण’’। मांस के सेवन से अन्य धातुओं की अपेक्षा मांस अधिक बढ़ता हैं। रक्त से रक्त, मेद से मेद, वसा से वसा, तरुणास्थि से अस्थि, मज्जा से मज्जा, शुक्र से शुक्र तथा कच्चे गर्भ से गर्भ की वृद्धि होती है। परन्तु इस सामान्य नियम के अनुसार यदि किसी धातु की वृद्धि के लिये तत्समान धातु न मिल सके अथवा मिलने पर भी घृणा अथवा अन्य कारणों से उसका प्रयोग न किया जा सके तो उस अवस्था में उसके समान गुण वाले अन्य द्रव्यों का भी प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिये शुक्र के क्षीण होने पर उपर्युक्त सिद्धान्त के अनुसार उसकी सर्वश्रेष्ठ एवं आदर्श चिकित्सा में तो शुक्र का प्रयोग करना ही है इसीलिये नक्र के वीर्य अथवा बकरे के अण्डों (Testicles) का सेवन कराया जाता है। परन्तु घृणा के कारण यदि कोई व्यक्ति इसका सेवन न कर सके तो उसको शुक्र के गुणों के समान गुणवाले दूध एवं घी का प्रयोग कराना चाहिये। चरक शा. अ. ६ में उसका विस्तार से बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है—यत्रत्वेवं लक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणाम- सांनिध्यं स्यात् संनिहितानां वाऽप्ययुक्तत्वादप्रोपयोगे घृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात् तस्य ये समानगुणाः स्युराहार विकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनामप्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात्, तद्यथा-शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धसमाख्यातानां चापरेषामेव द्रव्याणां, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणो-


१. अस्याग्रे ताडपत्रपुस्तके ८६ तमं पत्रं त्रुटितम्।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् १२३

पक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुष्माण्डामध्ययवशाकधान्याम्लानां, वातक्षये कटुतिक्तकषायरूक्षलघुशीतानां, पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णातीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणां, कर्माणि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्तदासेव्यं, एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिक्षयौ यथाकालं कार्यौ, इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिकराणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥१०॥ .......................................

यानि द्रव्याणि पुण्यानि मङ्गल्यानि शुचीनि च।
नवान्यभग्नखण्डानि पुन्नामानि प्रियाणि च॥
गर्भिण्यै तान्युपहरेद्वासांस्याभरणानि च। न स्त्रीनपुंसकाख्यानि धारयेद्वा लभेत वा ।।

गर्भिणी का आचार व्यवहार—पुण्यकारक, मङ्गलमय, पवित्र, नवीन, अभग्न तथा अखण्डित, पुरुष नाम वाले (अथवा पुल्लिंग) एवं प्रिय द्रव्य तथा वस्त्र आभरणादि गर्भिणी को देवे। स्त्री अथवा नपुंसक नाम अथवा लिङ्ग वाले द्रव्यों को गर्भिणी न धारण करे और न प्राप्त करे।

धूपितार्चितसंभृष्टं मशकाद्यपवर्जितम्। ब्रह्मघोषैः सवादित्रैर्वादितं वेश्म शस्यते ।।
(प्रातरुत्थाय) शौचान्ते गुरुदेवार्चने रता। अर्चेदादित्यमुद्यन्तं गन्धधूपार्घ्यवाजपैः ।।
क्षीयमाणं च शशिनमस्तं यान्तं च भास्करम्। न पश्येद्गर्भिणी नित्यं नाप्युभौ राहुदर्शने ।।
सोमार्कौ सग्रहौ श्रुत्वा गर्भिणी गर्भवेश्मनि। शान्तिहोमपराऽऽसीत मुक्तयोगं तु याचयेत् ।।
न द्विष्यादतिथिं भिक्षां दद्यान्न प्रतिवारयेत्। स्वयं प्रज्वालिते चाग्नौ शान्त्यर्थं जुहुयाद्धृतम् ।।
पूर्णकुम्भं घृतं माल्यं पूर्णपात्रं घृतं दधि। न किञ्चित् प्रतिरुन्धीयान्न च बध्नीत गर्भिणी ।।
सूत्रेण तनुना रज्ज्वा स्तम्भनं बन्धनानि च। वर्जयेद्गर्भिणी नित्यं कामं बन्धानि मोक्षयेत् ।।

गर्भिणी जिस घर में रहती हो उसमें सदा धूप जलानी चाहिये, पूजा होनी चाहिये, घर मच्छर आदि से रहित होना चाहिये तथा गाजे बाजों सहित घर में सदा गाना-बजाना होता रहना चाहिये। गर्भिणी को प्रातः उठकर शौच स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर गुरु तथा देवता की अर्चना करनी चाहिये तथा गन्ध, धूप, अर्घ्य (नैवेद्य) तथा जप आदि के द्वारा उदय होते हुए सूर्य की पूजा करनी चाहिये। गर्भिणी को चाहिये कि वह क्षीण होते हुए (कृष्ण पक्ष के) चन्द्रमा तथा अस्त होते हुए (सायंकालीन) सूर्य को न देखे तथा दोनों राहुओं (राहु तथा केतु) को भी न देखे। चन्द्र ग्रहण तथा सूर्यग्रहण का ज्ञान होने पर गर्भिणी को गर्भगृह में जाकर शान्ति होम आदि कार्यों में लगकर सूर्य तथा चन्द्रमा की ग्रह द्वारा मुक्ति की प्रार्थना करनी चाहिये। वह अतिथि से द्वेष न करे, उसे भिक्षा देवे, अतिथि को कभी खाली न लौटाये तथा स्वयं शान्ति के निमित्त प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति देवे। गर्भिणी स्त्री को जल से भरे हुए घड़े, घृत, माला, तथा घृत एवं दही से भरा हुआ पात्र इत्यादि किसी चीज का प्रतिरोध नहीं करना चाहिये। तथा गर्भिणी स्त्री को धागे अथवा पतली रस्सी आदि से स्तम्भन तथा बन्धन आदि नहीं बांधना चाहिये तथा उसे अपने सम्पूर्ण बन्धनों को ढीला रखना चाहिये। अर्थात् गर्भिणी स्त्री को कोई भी वस्त्र अथवा अन्य बन्धन आदि बहुत कस कर नहीं बांधना चाहिये।

अथ हीमानि रूपाणि गर्भिण्या उपलक्षयेत्।
यानिदृष्ट्वा विजानीयाद्गालजन्म(न्म)न्युपक्रमेत् (मम्) ।।

इसके बाद गर्भिणी के निम्न लक्षणों को देखकर यह जान ले कि अब बालक का जन्म होनेवाला है अर्थात् अब वह उपस्थित प्रसवा है॥

मुखग्लानिः क्लमोऽङ्गानामक्षिबन्धनमुक्तता। कुक्षेश्च स्यादवस्त्रंसस्त्वधोभागस्य गौरवम् ।।
पृष्ठपार्श्वकटीबस्तिवंक्षणं चातितुद्यति। योनिप्रस्रवणौदार्यभक्तद्वेषारतिक्‍लमाः ।।

१२४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ]

उपस्थितप्रसवा के लक्षण—मुख की ग्लानि अथवा मुख का मुरझाना, अङ्गों का क्लम या शिथिलता, अक्षिबन्धन की शिथिलता, कुक्षि का शिथिल होना (उरोदेश से गर्भाशय के नीचे खिसक जाने से), अधोभाग (शरीर के निचले हिस्से) का भारी होना, पीठ, पार्श्व, कटि, बस्ति तथां वंक्षण (राननों) में अत्यन्त पीडा होना, योनिस्राव, उदारता, भक्तद्वेष (भोजन में अरुचि), अरति (अरुचि) तथा थकावट—ये उपस्थित, प्रसवा के लक्षण हैं। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति, तद्यथा—क्लमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनं, अधोगुरुत्वं, वंक्षणबस्तिकटिकुक्षिपाश्वपृष्ठनिस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति, ततोऽनन्तरभावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघना नारी ज्ञेया सा तु प्रजायिनी॥ तथा इसके आगे फिर कहा है—तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटीपृष्ठं प्रति समन्ताद्वेदना भवत्यभीक्ष्णं पुरीषप्रवृत्तिमूत्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च॥

एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । प्रविशेयुः स्त्रियो वृद्धाः कुशलाः शस्तधाविताः १ ॥

इन उपर्युक्त लक्षणों को देखकर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर वृद्ध, कुशल, प्रशस्त तथा स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्रियां गर्भिणी के पास गर्भग्रह में प्रवेश करें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीयाभिः सान्त्वनीयाभिः। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—प्रजनयिष्यमाणां कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमारपरिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषिक्तामथैनां सम्भृतां यवागूमाकण्ठात् पाययेत्। ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णे शयने स्थितामाभुग्नसक्थीमुत्तानामशङ्कनीयाश्चतस्रः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुशलाः कर्तितनखाः परिचरेयुरिति॥

गर्भिणीं सान्त्वयेयुस्ता हर्षयेयुः प्रियंवदाः ।। आश्वासयेयुर्धर्मार्थों चोदयन्तं प्रजापतिम् ।। लोकान् पुत्रवतीनां च सुखानि विविधानि च । कीर्तयेयुरपुत्राणां दुःखानि निरयादिषु ।। अदितिं कश्यपं देवमिन्द्राणीमिन्द्रमश्विनौ । आयुष्मतां पुत्रवतां मङ्गल्यानां च कीर्तनम् ।।

प्रिय वचनों को बोलने वाली वे स्त्रियां धर्म और अर्थ के निमित्त प्रजापति ब्रह्मा को प्रेरित करती हुई गर्भिणी को सान्त्वना दें, उसे हर्षित (प्रसन्न) करें तथा उसे आश्वासन दें। उसके सामने पुत्रवती स्त्रियों के विविध सुखों तथा अपुत्रवती (पुत्र रहित) स्त्रियों के दुःखों का वर्णन करें। तथा उसके सामने अदिति और कश्यप देवता, इन्द्राणी, इन्द्रअश्विनीकुमार तथा अन्य आयुष्मान् पुत्रवान् तथा मङ्गलकारी देवताओं का कीर्तन करना चाहिए॥

तन्त्रीवर्णोऽल्पश२: स्त्रावः पिच्छिलः पुत्रजन्मनि । किंशुकोदकसंकाशः पुत्रिकाजन्म शंसति ।।

पुत्र की उत्पत्ति में स्त्री की योनि से गिलोय के रस के समान थोड़ा २ तथा चिपचिपा स्राव निकलता है। तथा कन्या (पुत्री) की उत्पत्ति में किंशुकोदक (पलाशढाक के फूल) के समान स्राव होता है॥

सूतेरूर्ध्वं तु ये स्त्रावा निन्दिताञ् शमयेत्तु तान् । तस्या अस्यामवस्थायामुपयाचेत देवताः ।।

प्रसव के बाद स्त्री की योनि से जो स्त्राव (Abnormal Dischargés) होते हैं, वे निन्दित माने गये हैं अतः उनको शान्त करे अर्थात् उनकी चिकित्सा करे। इस अवस्था में उसके लिये देवताओं से प्रार्थना करनी चाहिये॥


१. शस्ताः प्रशस्ताः, धाविताः शुद्धाश्चेत्यर्थः। २. गुडूची रस सदृश इत्यर्थः।

जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२५

अव्यावृते स्त्रिया गर्भे विवृते चापरामुखे¹ । ग्राहीषु² वर्तमानासु सा विवर्तेत गर्भिणी ।।

स्त्री के गर्भ के अव्यावृत (संकुचित) होने पर, जरायु के मुख के फैल जाने पर तथा ग्राही (प्रसववेदनाओं Labour Pains) के उपस्थित होने पर गर्भिणी को इसके लिये तैयार हो जाना चाहिये ।।

न तीक्ष्णं³ ग्राहिशूलेषु क्षिप्रं नारी प्रजायते । विलम्बिताभिरावीभिर्गर्भः क्लेशयते स्त्रियम् ।।

प्रसव वेदनाओं के तीक्ष्ण (तीव्र-Acute) हो जाने पर गर्भिणी को शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। परन्तु यदि प्रसव वेदनायें ठीक समय पर न होकर देर में हो तो गर्भिणी को अत्यन्त क्लेश होता है।

केचिदस्यामवस्थायां व्यायामं मुसलादिकम् । जृम्भाचङ्क्रमणायं च भिषजो ब्रुवते हितम् ।।

कुछ वैद्य इस अवस्था में अर्थात् प्रसव वेदनाओं के देर में होने पर कहते हैं कि गर्भिणी को मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई तथा इधर उधर चलना फिरना हितकारी है। अर्थात् इन क्रियाओं द्वारा शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदावीभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात् उत्तिष्ठ मुसलमन्यतरत् गृह्णीष्वानेनतदुलूखलं धान्यपूर्णं मुहुर्मुहुरभिंजहि, मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व, चङ्क्रमस्व चान्तरान्तरा इत्येवमुपदिशन्त्येके ।।

वर्जनीयं तु तत् सर्वं भगवानाह कश्यपः । नार्याः प्रसवकाले हि शरीरमुपमृद्यते ।।
त्रयो दोषाः प्रकुप्यन्ति विचाल्यन्ते च धातवः । गर्भिणी तदवस्था हि यत्नधार्या विशेषतः ।।

परन्तु भगवान् कश्यप कहते हैं कि मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई एवं चङ्क्रमण आदि सब क्रियाओं का त्याग करना चाहिये। अर्थात् प्रसव को शीघ्र करने के लिये उपर्युक्त क्रियाओं का प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रसवकाल के समय स्त्री का शरीर अत्यन्त मृदु होता है, वातपित्त कफ तीनों दोष प्रकुपित होते हैं तथा उस समय शरीर की सब धातुएं अपने स्थान से विचलित हुई होती हैं। गर्भिणी की वह अवस्था अत्यन्त यत्नपूर्वक धारण करने योग्य होती है।

अधिकं सौकुमार्यं हि गर्भिण्याः क्लेद्यमेव च । स्रावकाले विशेषेण विषादभयसंश्रयः ।।
एकपादो यमकुले पाद एक इह स्थितः । दृष्ट्वा दुःखं स्त्रियस्तस्या इत्येवं ब्रुवते मिथः ।।

उस समय गर्भिणी अत्यन्त सुकुमार होती है तथा उसमें क्लेद की वृद्धि हुई होती है। उपर्युक्त क्रियाओं से जब गर्भ का स्राव होता है उस समय विशेष विषाद तथा भय होता है। उस समय अन्य स्त्रियाँ उसके दुःख (कष्ट) को देखकर परस्पर कहती हैं कि इसका एक पैर यम के घर में तथा एक पैर इस लोक में है अर्थात् इसकी इस प्रसवावस्था में कभी भी मृत्यु हो सकती है ।।

तस्यास्त्वस्यामवस्थायां व्यायामो न प्रशस्यते । व्यायामः सेव्यमानो हि गर्भिणीमाशु नाशयेत् ।।
अतिचङ्क्रमणेनापि हन्याद्गर्भमुपस्थितम् । अत्ययं प्राप्नुयाद्घोरं देहान्तकरणं महत् ।।

इसलिये गर्भिणी की इस अवस्था में व्यायाम हितकर नहीं है। व्यायाम करने से गर्भिणी की मृत्यु हो सकती है। अतिचङ्क्रमण (अधिक इधर उधर घूमने) से भी उपस्थित गर्भ नष्ट हो जाता है। उस स्त्री को देह का अन्त करने वाले, महान् तथा भयंकर रोग हो जाते हैं। उपर्युक्त मूसल आदि के व्यवहार तथा चङ्क्रमण आदि क्रियाओं का चरक में भी निषेध किया गया है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तन्नेत्याह भगवानात्रेयः–दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसलव्यायामस्मीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा


१. अपरामुखे जरायुमुखे इत्यर्थः ।
२. 'आवीषु' इति पाठश्चेत् साधु ।
३. 'न तीक्ष्णं' इत्यत्र 'तीक्ष्णेषु' इति पाठश्चेत् साधु ।

१२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् जातिसूत्रीयशरीराध्यायः ? ]

प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति ।।

उपविष्टाऽसकृत्तस्मादनिर्विण्णा(ऽ)त्रपान्विता । वृद्धस्त्रीद्रव्यसंपन्ना प्रजायेत प्रजार्थिनी ।।

इसलिये प्रसव की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह प्रसन्न मन वाली, लज्जा से रहित तथा वृद्धस्त्रियों एवं धन से युक्त हुई बार २ बैठी हुई प्रसव (प्रजननकार्य) को करे।

वचा लाङ्गलीकी कुष्ठं चिरबिल्वैलचित्रकाः । चूर्णितं मुख(हु)राजिघ्रेत्तथा शीघ्रं प्रजायते ।। आजिघ्रेद्भूर्जधूपं वा नमेरोगुग्गुलोस्तथा । अथ(धः) प्रपद्यते गर्भस्तथा क्षिप्रं विमुच्यते ।। पार्श्वसन्धिकटीपृष्ठं तैलेनोष्णेन प्रक्षितम् । मृद्नीयुरवकर्षेयुः शनैः प्राज्ञ्यः स्त्रियः सुखाः(खम्) ।।

चिरप्रसव की चिकित्सा अथवा उपाय—वचा, कलिहारी, कुष्ठ, चिरबिल्व (करञ्ज), छोटी इलायची तथा चित्रक का सूक्ष्म चूर्ण बार २ सूंघने के लिये देने से शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। अथवा भोजपत्र के धुएँ को या सरल देवदारु और गूगल के धुएँ को सूंघने से गर्भ शीघ्र ही नीचे की ओर आ जाता है तथा अपने स्थान से छूट जाता है। तथा बीच २ में निपुण स्त्रियां उसके पार्श्व, सन्धियां, कटी तथा पृष्ठ देश में धीरे २ सुखपूर्वक उष्ण तेल चुपड़कर मालिश करें तथा अवकर्षण करें अर्थात् गर्भ को नीचे लाने का प्रयत्न करें। चरक शा. अ. ८ में भी ये भी ही विधियां दी हैं-अथास्यै दद्यात्कुष्ठैलालाङ्गलिकीवचा चित्रकचिरबिल्वचूर्णमुपाघ्रातुं, सा तन्मुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपाधूमं वा, तस्याश्चान्तरान्तरा कटीपार्श्वपृष्ठ सक्थिदेशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखमवमृद्नीयात्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ।।

दुर्बलां पाययेन्मद्यमित्येके, नेति कश्यपः । पूर्वक्लिष्टा तथैवास्या(ऽसौ)यवागूं तृषिता पिबेत् ।।

उपर्युक्त चिकित्साओं के अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं कि यदि वह दुर्बल हो तो उसे मद्य (Brandy) पिलाये, परन्तु भगवान् कश्यपं कहते हैं कि यह ठीक नहीं है। क्लान्त एवं तृषित (प्यासी) होने पर उसे यवागू पीना चाहिये।

यदा गर्भोदकं योनौ सशूलं संप्रवर्तते । कालेन चोदितो गर्भो विमुच्य हृदयोदरम् ।। बस्तिशीर्षमधोभागमवगृह्णाति जन्मनि । ग्लानिश्च जायतेऽत्यर्थं योन्युत्पीडनभेदनम् ।। इत्येतैः कारणैर्विद्याद्गर्भस्य परिवर्तनम् । अथास्याः प्रसवश्चेति ततः पर्यङ्कमारुहेत् ।। प्रावारमुपधानं वा ....................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ८७ तमं¹ पत्रम्² ।)

(शारीरस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः)


जब शूल सहित गर्भोदक योनि में आ जाये तथा काल से प्रेरित हुआ गर्भ हृदय प्रदेश को छोड़कर नीचे आ जाता है, बस्तिशीर्ष तथा उसके अधोभाग को पकड़ लेता है, ग्लानि अत्यधिक होती है, योनि में उत्पीडन तथा भेदन (वेदना)


१. अस्मिंश्च पत्रे ताडपत्रीयपुस्तके आपाततो दर्शने २२ किल पत्राङ्काः प्रतिभान्ति, परन्त्रापूर्वापरग्रन्थसन्निकर्षौचित्येन ८७ तमत्रुटितपत्रस्थानीयत्वेनेदं निर्दिष्टम् । २. अस्याग्रे चतुष्पत्रात्मको ग्रन्थः खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके ।