कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
५० कथासरित्सागर
५० कथासरित्सागर प्रविश्य स्वस्तिकारं च विधाय गुरुदक्षिणाम्। योगनन्दा मया तत्र हेमकोटि स याचितः ॥१०३॥ ततः स शकटालस्य सत्यनन्दस्य मन्त्रिणम् । सुवर्णकोटिमतरं दापयेति समादिशत् ॥१०४॥ मृतस्य जीवितं दृष्ट्वा सद्यश्च प्राप्तिमर्थिनः । स तत्त्वं ज्ञातवान्मन्त्री किमज्ञेयं हि धीमताम् ॥१०५॥ देव ! दीयत इत्युक्त्वा स च मन्त्रीत्यचिन्तयत् । नन्दस्य तनयो बालो राज्यं च बहुशत्रुमत् ॥१ ०६॥ तत्सम्प्रत्येव रक्षामि तस्य देहमपीदृशम् । निश्चित्यैतत्स वत्कारं शवात्सर्वानदाहयत् ॥१०७॥ चारैरन्विष्य तन्मध्यं लब्ध्वा देवगृहातत । व्याडिं विधूय तद्गेहमिन्द्रदत्तकलेवरम् ॥१०८॥ अत्रान्तरे च राजानं हेमकोटिसमर्पणे । त्वरमाणमथाह स्म शकटालो विचारयन् ॥१०९॥ उत्सवाक्षिप्तचित्तोऽयं सर्वः परिजनः स्थितः । क्षणं प्रतीक्षतामयं विप्रो यावद्ददाम्यहम् ॥११०॥ अथैत्य योगनन्दस्य व्याडिनाक्रन्दितं पुरः । अहहाऽस्मत्सुहृत्क्रान्तजीवो योगस्थितो द्विजः ॥१११॥ प्रताम्यताव द्वयं दग्धाद्गहस्ततोदय । तच्छ्रुत्वा योगनन्दस्य तापश्चिन्ताभवन्महान् ॥११२॥ वह दाहात्स्थिरे तस्मिञ्जात निर्गत्य मे दृढौ । सुवर्णकोटिं स ततः शकटाले महामतिः ॥११३॥ योगनन्दोऽथ विजनं सङ्केतो व्याडिमब्रवीत् । मूढीभूतोऽस्मि विप्रोऽपि कि धिया स्थिरयापि मे ॥११४॥ तच्छ्रुत्वादत्ततस्य तं व्याडि कालोचितमभाषत । ज्ञातोऽसि शकटालेन तदेनं चिन्तयाधुना ॥११५॥ महामन्त्री ह्ययं स्वञ्चन्मन्त्रियत्तो विनाश्यत् । पूर्वानन्दसुतं कुर्याच्चन्द्रगुप्तं हि भूमिपम् ॥११६॥ तस्माद् वररुचिं मन्त्रिसुमुख्यत्वं कुरु यत्नतः । एतद्बुद्ध्या मवद्राज्यं स्थिरं दिष्यानुभावया ॥११७॥
प्रथम लम्बक ५१
प्रथम लम्बक ५१ राजभवन में जाकर राजा को आशीर्वाद देकर मैंने उस योगनन्द से गुरुदक्षिणा के लिए एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा की याचना की ॥१ ३॥ तब योगनन्द ने शकटाल नामक पूर्वनन्द के मन्त्री को आज्ञा दी कि 'तुम इसे एक करोड़ की स्वर्ण-मुद्रा दिला दो' ॥१ ४॥ मृत राजा का तुरन्त जीवित हो उठना और उसी समय याचक का उपस्थित हो जाना देखकर वह मंत्री सच्ची बात को ताड़ गया। सच है बुद्धिमानों के लिए कौन-सी बात अज्ञेय है ॥१ ५॥ 'राजन् ! देता हूँ'—ऐसा कहकर उस मन्त्री ने यह सोचा कि नन्द का लड़का अभी बालक है और राज्य के शत्रु भी बहुत हैं। अतः इस (नकली) राजा के शरीर की अभी रक्षा करनी चाहिए। (कहीं कार्य होने पर यह भाग न जाय) यह निश्चय करके उसने तत्काल राज्य के सभी मुर्दों को जलवा दिया ॥१ ६१ ७॥ राज्य के गुप्तचरों ने ढूँढ़-ढूँढ़कर मुर्दों को जलाना शुरू किया। इसी प्रसंग में देवालय में पड़े हुए इन्द्रदत्त के शव का भी व्याडि से छीनकर हठात् जला दिया गया ॥१ ८॥ इस बीच राजा को स्वर्ण देने में शीघ्रता करते हुए देख कर चतुर शकटाल बोला ॥१ ९॥ महाराज ! सारे राज-कर्मचारी उत्सव के कार्यों में व्यस्त हैं। इसलिए यह ब्राह्मण क्षण- भर प्रतीक्षा करे। तबतक मैं अभी देता हूँ ॥११ ॥ इसी अवसर पर व्याडि ने आकर राजा के सामने रोना प्रारम्भ किया कि आपके इस शुभ उत्सवकाल में अत्यन्त पाप हो गया। प्राणों के शेष रहने पर भी योग-समाधि में स्थित ब्राह्मण के शव को—अनाथ शव कहकर—तुम्हारे नौकरों ने जला डाला। यह सुनकर शोक के कारण योगनन्द¹ की कुछ अद्भुत एवं विचित्र-सी दशा हो गई ॥१११ १२॥ शरीर के दग्ध हो जाने पर नन्द के शरीर में इन्द्रदत्त की आत्मा को स्थिर समझकर महाबुद्धिमान् शकटाल ने उठकर मुझे एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ प्रदान कीं ॥११३॥ इसके अनन्तर वह योगनन्द एकान्त में खेद के साथ व्याडि से बोला—जब मैं ब्राह्मण होकर भी शूद्र हो गया। इसलिए मुझे इस स्थिर राज्यलक्ष्मी से भी क्या लाभ ॥११४॥ यह सुनकर व्याडि ने राजा को कालोचित आश्वासन देते हुए कहा— तुम्हारा रहस्य शकटाल को मालूम हो गया है। इसलिए अब पहले इसकी चिन्ता करो ॥११५॥ यह महामन्त्री है। अपनी इच्छा से शीघ्र ही यह तुम्हारा त्याग करके पूर्वनन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनायेगा ॥११६॥ इसलिए तुम वररुचि को अपना प्रधान मन्त्री बनाओ उसकी दिव्य और प्रतिभागामी बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥ ११७॥
१ योग के द्वारा पुनः जीवित होने के कारण इसका नाम योगनन्द पड़ा था। असली नन्द का नाम हरनन्द या पूर्वनन्द था। इस विषय में विस्तृत विवेचन परिशिष्ट में किया गया है।
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर
तन्मेव तन्न शास्त्रं न पाणिनीयं प्रकाशितम्। तदिच्छानुग्रहादेव मया पूर्णकृतं च तत्॥८८॥ ततोऽहं गृहमगच्छमशाताध्वपरिश्रमः। निशाकरकलामौलिप्रसादामृतनिर्भरः ॥८९॥ अथ मातृगुरूणां च कृतपादामिवन्दनः। तत्रोपकोशावृत्तान्तं समग्रौषं महाद्भुतम् ॥९०॥ तेन मे परमां भूमिमात्मन्यानन्दविस्मयौ। तस्यां च सहजस्नेहबहुमानादगच्छताम् ॥९१॥ वर्षोऽप्य मन्मुखाच्छ्रुत्वैतत्तु व्याकरणं नवम्। ततं प्रकाशितं स्वामिकुमारेण तस्य तत्॥९२॥ ततो व्याडीन्द्रदत्ताभ्यां विज्ञप्तो दक्षिणां प्रति। गुर्वर्षोऽब्रवीत् स्वर्णकोटिं दीयतामिति ॥९३॥ अङ्गीकृत्य गुरोर्वाक्यं तौ च मामित्यवोचताम्। एहि राज्ञः सख ! नन्दाद्याचितुं गुरुदक्षिणाम् ॥९४॥ गच्छामो नान्यतोऽस्माभिरित्यात्कञ्चनमवाप्यते। नवाधिकानां नवतेः कोटीनामधिपो हि सः॥९५॥ वाचा तेनोपकोशा च प्राग्धर्मभगिनी कृता। अत' स्यात् स ते किञ्चित् त्वद्गुणेन समवाप्स्यते ॥९६॥ इति निश्चित्य नन्दस्य भूपतेः कटकं वयम्। मयोध्यास्थमगमच्छाम त्रयः सद्ब्रह्मचारिणः ॥९७॥ प्राप्तमात्रेषु चास्मासु स राजा पञ्चतां गतः। राष्ट्रे कोलाहलः जातो विषादेन सहैव नः ॥९८॥ अवोचदिन्द्रदत्तोऽथ तत्क्षणं योगसिद्धिमान्। गतासोरस्य भूपस्य शरीरं प्रविशाम्यहम् ॥९९॥ मर्थी वररुचिर्मेऽस्तु दास्याम्यस्मै च काञ्चनम्। व्याडी रक्षतु मे देहं ततः प्रत्यागमावधि ॥१००॥ इत्युक्त्वा नन्ददेहान्तरिन्द्रदत्तः समाविशत्। प्रत्युज्जीवति भूपे च राष्ट्रे समोत्सवोऽभवत् ॥१०१॥ शून्यं दवगृहं देहमिन्द्रदत्तस्य रक्षितुम्। व्याडी स्थिते गतोऽभूवमहं राजकुलं तदा ॥१०२॥
प्रथम लम्बक ४९
प्रथम लम्बक ४९ वररुचि का प्रत्यागमन शिवजी ने मुझे उसी पाणिनीय शास्त्र (व्याकरण) का प्रकाश दिया और उन्हीं की कृपा से मैंने (वार्तिक बनाकर) उसे पूर्ण किया ॥८८॥ तब मैं चन्द्रमौलीश्वर (महादेव) के कृपा-रूपी अमृत से तृप्त होकर मार्ग के श्रम को कुछ भी न समझते हुए अनायास ही घर चला आया ॥८९॥ घर आकर माता और गुरुजनों का चरणस्पर्श करके मैंने उपकोशा के अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त को सुना ॥९०॥ इस समाचार से मेरे आश्चर्य और आनन्द की सीमा न रही और उपकोशा के प्रति स्वाभाविक स्नेह और सम्मान की भावना भी असीम हो गई ॥९१॥ उपाध्याय वर्ष ने मेरे मुख से इस नवीन व्याकरण को सुनने की इच्छा प्रकट की किन्तु स्वामिकुमार ने उपाध्याय के हृदय में उसे स्वयं ही प्रकाशित कर दिया ॥९२॥ तब व्याडि और इन्द्रदत्त ने गुरु वर्ष से गुरु-दक्षिणा के लिए प्रार्थना की। उत्तर में गुरु वर्ष ने कहा कि 'एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा मुझे दो' ॥९३॥ गुरु वर्ष की आज्ञा को स्वीकार कर व्याडि और इन्द्रदत्त दोनों ने मुझसे कहा—'आओ मित्र ! राजा नन्द से गुरु-दक्षिणा माँगने के लिए चलें ॥९४॥ अन्य किसी से इतना सुवर्ण नहीं प्राप्त हो सकता क्योंकि राजा नन्द इस समय निन्यानब्बे करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं का स्वामी है ॥९५॥ उसने कुछ समय पहले (तुम्हारी धर्मपत्नी) उपकोशा को धर्म की बहिन भी माना है। अतः वह तुम्हारा साला होता है। इस नाते भी तुम्हारे कहने पर धन मिल सकता है ॥९६॥ ऐसा निश्चय करके हम तीनों सहपाठी अयोध्या में लगे हुए नन्द के शिविर में गये ॥९७॥ हम लोगों के वहाँ पहुँचते ही राजा नन्द का देहान्त हो गया और हमारे दुःख के साथ सारे राष्ट्र में कोलाहल मच गया ॥९८॥ इसी समय योग की सिद्धियों को जाननेवाला इन्द्रदत्त बोला—'मैं इस मृत राजा के शरीर में (पर-काय-प्रवेश¹-विद्या द्वारा) प्रवेश करता हूँ ॥९९॥ वररुचि अर्थी बने मैं इसे धन दूंगा और मेरे पुनः लौटने तक व्याडि मेरे वास्तविक शरीर की रक्षा करे ॥१००॥ ऐसा कहकर इन्द्रदत्त अपनी विद्या के प्रभाव से राजा नन्द के शव में प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार राजा के पुनर्जीवित होने पर सारे राष्ट्र में उत्सव मनाया गया ॥१०१॥ एकान्त देव-मन्दिर में इन्द्रदत्त के शरीर की रक्षा के लिए व्याडि बैठ गया और मैं राजा के समीप गया ॥१०२॥ १ योग के द्वारा परकाय-प्रवेश किया जाता था। इसका रहस्य अगले खण्ड में मय दानव के द्वारा प्रकट किया गया है।—अनु०
५० कथासरित्सागर
५० कथासरित्सागर प्रविश्य स्वस्तिकारं च विधाय गुरुदक्षिणाम्। योगनन्दो मया तत्र हेमकोटिं स याचितः ॥१०३॥ ततः स शकटालस्य सत्यमन्त्रस्य मन्त्रिणम्। सुवर्णकोटिमेतस्मै दापयेति समादिशत् ॥१०४॥ मृतस्य जीवितं दृष्ट्वा सद्यश्च प्राप्तिमधिनः। स तत्त्वं ज्ञात्वा मन्त्री किमज्ञेयं हि धीमताम् ॥१०५॥ देव ! दीयत इत्युक्त्वा स च मन्त्रीत्यचिन्तयत्। नन्दस्य तनयो बालो राज्यं च बहुशत्रुमत् ॥१०६॥ तत्सम्प्रत्यत्र रक्षामि तस्य देहमपीदृशम्। निश्चित्यैतत्स तत्काल शवान्सर्वानदाहयत् ॥१०७॥ चारैरन्विष्य तन्मध्ये रुद्ध्वा देवगृहान्तरे। व्याडिं विधूय तद्देहमिन्द्रदत्तकलेवरम् ॥१०८॥ अत्रान्तरे च राजानं हेमकोटिसमर्पण। त्वरमाणमथाह स्म शकटाली विचारयन् ॥१०९॥ उत्सवाक्षिप्तचित्तोऽयं सर्वं परिजनः स्थितः। क्षण प्रतीक्षतामय विप्रो यावद्ददाम्यहम् ॥११०॥ अथैत्य योगनन्दस्य व्याडिनाक्रन्दित पुरः। भवद्भाष्यमनुत्क्रान्तजीवो योगस्थितो द्विजः ॥१११॥ अनादृत्यैव इत्यद्य वलाद्दग्धस्त्ववोदधे। तच्छ्रुत्वा योगनन्दस्य काप्यवस्थाभवत्तथा ॥११२॥ गेहे बाह्यास्थिरे तस्मिञ्ज्ञाते निर्गत्य मे वशे। सुवर्णकोटिं स तत शकटाली महामतिः ॥११३॥ योगनन्दोऽथ विजने सशोको व्याडिमब्रवीत्। शूद्रीभूतोऽस्मि विप्रोऽपि कि धिया स्थिरमपि मे ॥११४॥ तच्छ्रुत्वाश्वास्य तं व्याडि कालोचितमभाषत। ज्ञातोऽसि शकटालेन तद्वैतं चिन्त्यमाधुना ॥११५॥ महामन्त्री ह्ययं स्वऋद्धमचिरात्त्वां विनाशयेत्। पूर्वनन्दसुतं कुर्याच्चन्द्रगुप्त हि भूमिपम् ॥११६॥ तस्माद् वररुचि मन्त्रिमुरुयत्व कुरु यत्नं ते। एतद्बुद्ध्या भवद्राज्य स्थिर दिव्याश्रुभाषया ॥११७॥
प्रथम लम्बक ५१
प्रथम लम्बक ५१ राजभवन में आकर राजा को आशीर्वाद देकर मैंने उस योगनन्द से गुरुदक्षिणा के लिए एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा की याचना की ॥१ ३॥ तब योगनन्द ने शकटाल नामक पूर्वनन्द के मन्त्री को आज्ञा दी कि 'तुम इसे एक करोड़ की स्वर्ण-मुद्रा दिला दो' ॥१ ४॥ मृत राजा का तुरन्त जीवित हो उठना और उसी समय याचक का उपस्थित हो जाना देखकर वह मंत्री सच्ची बात को ताड़ गया। सच है बुद्धिमानों के लिए कौन-सी बात अज्ञेय है ॥१ ५॥ 'राजन् ! देता हूँ'—ऐसा कहकर उस मन्त्री ने यह सोचा कि नन्द का लड़का अभी बालक है और राज्य के शत्रु भी बहुत हैं। अतः इस (नकली) राजा के शरीर की अभी रक्षा करनी चाहिए। (कहीं कार्य होने पर यह भाग न जाय) यह निश्चय करके उसने तत्काल राज्य के सभी मर्चों को जलवा दिया ॥१ ६ १ ७॥ राज्य के गुप्तचरों ने ढूँढ़-ढूँढ़कर मुर्दों को जलाना शुरू किया। इसी प्रसंग में देवायतन में पड़े हुए इन्द्रदत्त के शव को भी व्याडि से छीनकर हठात् जला दिया गया ॥१ ८॥ इस बीच राजा को स्वर्ण देने में शीघ्रता करते हुए देख कर चतुर शकटाल बोला ॥१ ९॥ महाराज ! सारे राज-कर्मचारी उत्सव के कार्यों में व्यस्त हैं। इसलिए यह ब्राह्मण क्षण- भर प्रतीक्षा करे। तबतक मैं अभी देता हूँ ॥११ ॥ इसी अवसर पर व्याडि ने आकर राजा के सामने रोना प्रारम्भ किया कि आपके इस शुभ उदयकाल में अत्यन्त पाप हो गया। प्राणों के शेष रहने पर भी योग-समाधि में स्थित ब्राह्मण के शव को—अनाथ शव कहकर—तुम्हारे नौकरों ने जला डाला। यह सुनकर शोक के कारण योगनन्द' की कुछ बदहवास एवं विचित्र-सी दशा हो गई ॥१११ १२॥ शरीर के दग्ध हो जाने पर नन्द के शरीर में इन्द्रदत्त की आत्मा को स्थिर समझकर महाबुद्धिमान् शकटाल ने उठकर मुझे एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ प्रदान कीं ॥११३॥ इसके अनन्तर वह योगनन्द, एकान्त में खेद के साथ व्याडि से बोला—अब मैं ब्राह्मण होकर भी शूद्र हो गया। इसलिए मुझे इस स्थिर राजलक्ष्मी से भी क्या लाभ ॥११४॥ यह सुनकर व्याडि ने राजा को कामोचित आश्वासन देते हुए कहा—'तुम्हारा रहस्य शकटाल को मालूम हो गया है। इसलिए अब पहले उसकी चिन्ता करो ॥११५॥ यह महामन्त्री है। अपनी इच्छा से शीघ्र ही यह तुम्हारा नाश करके पूर्वनन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनायेगा ॥११६॥ इसलिए तुम वररुचि को अपना प्रधान मन्त्री बनाओ उसकी दिव्य और प्रतिभाशाली बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥ ११७॥ १ योग के द्वारा पुनः जीवित होने के कारण इसका नाम योगनन्द पड़ा था। असली नन्द का नाम तरुनन्द या पूर्वनन्द था। इस विषय में विस्तृत विवेचन परिशिष्ट में किया गया है।
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वैव गते व्याडौ दातुं तां गुरुदक्षिणाम्। तदवामीय दत्ता म योगनन्देन मन्त्रिणा ॥११८॥ अभोक्तः स मया राजा ब्राह्मये हारितोऽपि ते। राज्यं नैव स्थिरं मन्ये शकटाले पदस्थिते ॥११९॥ तस्मान्नाधाय युक्त्यैनमिति मन्त्रे मयोदिते। योगनन्दोऽन्धकूपान्तः शकटालं तमक्षिपत् ॥१२० ॥ किं च पुत्रंश्च तस्य सन्नैव क्षिप्तवानसौ। जीवन् द्विजोऽमुनादग्ध इति दोषानुकीसनात् ॥१२१॥ एकः शरावः सक्तूनामेकः प्रत्यहमम्भसः। शकटालस्य तत्रान्तः सपुत्रस्य न्यधीयत ॥१२२॥ स चोवाच ततः पुत्रानमीभिः सक्तुभिः सुताः। एकोऽपि कृच्छ्राद्वर्तेतबहूनां तु कथेव का ॥१२३॥ तस्मात्समश्नात्वेकः प्रत्यहं समशनंमूनू। यः शक्तो योगनन्दस्य कर्तुं वैरप्रतिक्रियाम् ॥१२४॥ त्वमेव शक्तो भुङ्क्ष्वेति पुत्रास्तमब्रुवन्। प्राणभ्योऽपि हि धीराणां प्रिया शत्रुप्रतिक्रिया ॥१२५॥ ततः स शकटालस्तैः प्रत्यहं सक्तुवारिभिः। एक एवाकरोद् वृत्तिं कष्टं क्रूरा जिगीषवः ॥१२६॥ अनुवृत्त्या चित्तमप्राप्य विस्रम्भं प्रभविष्णुषु। न स्वेच्छः स्पृहतव्यमात्मनो भूतिमिच्छता ॥१२७॥ इति पाञ्चिन्तयतस्तत्र शकटालोऽन्धकूपगे। तनयानां क्षुधार्तानां पश्यन्प्राणोद्गममव्यथाम् ॥१२८॥ ततः सुतशतं तस्य पश्यतस्तद्व्यपद्यत। तत्करङ्कैर्वृतो जीवन्नतिष्ठत्स च केवलः ॥१२९॥ योगनन्दश्च साम्राज्ये बद्धमूलोऽभवत्ततः। व्याडिरभ्याययौ तं च गुरवे दत्तदक्षिणः ॥१३०॥ अभ्येत्यैव च सोऽवादीच्चिरं राज्यं सुखंस्तु ते। आमन्त्रितोऽस्मि गच्छामि तपस्तप्तुमहं क्वचित् ॥१३१॥ तच्छ्रुत्वा योगनन्दस्तं बाष्पकण्ठोऽभ्यभाषत। राज्यं मे भुङ्क्ष्व भोगांस्त्व भुक्त्वा मां मास्म गा इति ॥१३२॥
प्रथम लम्बक ५३
प्रथम लम्बक ५३ ऐसा कहकर व्याडि गुरु-दक्षिणा देने के लिए चला गया और योगनन्द ने मुझे बुलाकर मन्त्रिपद समर्पित किया ॥११८॥ मन्त्रिपद ग्रहण कर लेने पर मैंने राजा से कहा कि 'तुम्हारा ब्राह्मणत्व तो गया। परन्तु उसके जाने पर भी जबतक शकटाल मन्त्री है, तबतक राज्य भी स्थिर नहीं रह सकता ॥११९॥ इसलिए नीति के साथ इसका नाश करो। इस प्रकार मेरी सम्मति से योगनन्द ने शकटाल को अँधेरे कुएँ में डाल दिया ॥१२०॥ शकटाल के साथ राजा ने उसके सौ पुत्रों को भी उसी अँधेरे कुएँ में डलवा दिया। उसका अपराध यह घोषित किया गया कि उसने जीवित ब्राह्मण को जलवा दिया था ॥१२१॥ मिट्टी के एक पात्रविशेष में सत्तू और ऐसे ही एक पात्र में पानी शकटाल और उसके पुत्रों के लिए कुएँ में रख दिया जाता था ॥१२२॥ शकटाल ने लड़कों से कहा कि 'इस सत्तू और पानी से एक का भी जीवन कठिन है, बहुतों की तो बात ही क्या ? ॥१२३॥ इसलिए बल के सहित इस सत्तू को वही प्रतिदिन खाया करे जो योगनन्द से बदला लेने की शक्ति रखता हो ॥१२४॥ लड़कों ने शकटाल से कहा कि 'राजा से बदला लेने के लिए आप ही समर्थ हैं। अतः आप ही इसे खाया करें'। सच है, महान् कामों के लिए शत्रु से बदला लेना प्राणों से भी प्यारा होता है ॥१२५॥ यह निर्णय होने पर वह अकेला शकटाल ही उस सत्तू और पानी से जीवन-निर्वाह करने लगा। सच है, शत्रु से बदला लेनेवाले अत्यन्त क्रूर प्रकृति के होते हैं ॥१२६॥ अपने कल्याण की कामना करनेवाले या उन्नतिशील व्यक्ति को चाहिए कि अपने मालिक की चित्तवृत्ति को बिना समझे और बिना उसका विश्वास प्राप्त किये उसके साथ व्यवहार न करे ॥१२७॥ भूख से प्राण त्यागते हुए बच्चों की पीड़ा देखकर अन्ध-कूप में पड़ा शकटाल इस प्रकार पश्चात्ताप करने लगा ॥१२८॥ उसके देखते-देखते ही सौ-के-सौ पुत्र मर गये। उनके कंकालों से घिरा हुआ एकमात्र शकटाल ही जीवित रह गया ॥१२९॥ इतने में योगनन्द भी धीरे-धीरे साम्राज्य में स्थिर हो गया तो व्याडि गुरु-दक्षिणा देकर उसके पास आया ॥१३०॥ व्याडि ने आते ही योगनन्द से कहा—'मित्र ! मेरी बताई नीति के अनुसार तुम चिरकाल तक राज्यभोग करो। मैं अब कहीं तपस्या करने जाता हूँ ॥१३१॥ व्याडि की बातें सुनकर गद्गद कण्ठ से राजा ने कहा—'तुम मेरे राज्य में रहकर सांसारिक भोगों को भोगो। मुझे छोड़कर न जाओ' ॥१३२॥
४ कथासरित्सागर
४ कथासरित्सागर व्याधिस्ततोऽवदद्राजञ्शरीरे क्षणनश्वरे । एवंप्रायेष्वसारेषु धीमान्को नाम मज्जति ॥१३३॥ नहि मोहयति प्राज्ञं लक्ष्मीरूमरुमरीचिका । इत्युक्त्वैव स तत्कालं तपसे निर्जगतो ययौ ॥१३४॥ अगमच्च योगनन्दं पाटलिपुत्रं स्वराजनगरं सः । भोगाय चाणमूर्ते ! मत्सहितः सकलसैन्ययुतः ॥१३५॥ तत्रोपक्रोधापरिचर्यमाणः समुद्वहन्मन्त्रिधुरं च तस्य । अहं जनन्या गुरुभिश्च साकमासाद्य लक्ष्मीमवसं चिराय ॥१३६॥ बहु तत्र दिने दिने द्विजेभ्यः कनकं मह्यमदात्प्रसन्ना । वव्राति स्म शरीरिणी च साक्षान्मम कार्याणि सरस्वती सदैव ॥१३७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः ।
पञ्चमस्तरङ्गः एवमुक्त्वा वररुचिः पुनरेतदवर्णयत् । कालेन यागमन्दोऽयं कामादिवसमामयौ ॥१॥ गजेन्द्र इव मत्तश्च नापेक्षत स किञ्चन । अकाण्डपातोपनता न न लक्ष्मीर्विमोहयेत् ॥२॥ अचिन्तयं ततश्चाहं राजा तावद् विमूर्च्छकः । तत्कार्यचिन्तयाक्रान्तः स्वधर्माद् मेऽप्रसीदति ॥३॥ तस्माद् वरं सहायं तं शकटालं समुद्धरे । श्रियेत चेद् विरुद्धं च किं स कुर्यान्मयि स्थिते ॥४॥ निश्चित्यैतन्मयाभ्यर्थ्य राजानं सोऽन्धकूपतः । उद्धृतः शकटालोऽथ मुमुदे हि विजातये ॥५॥ दुर्जयो योगनन्दोऽस्य स्थिते वररुचावतः । आश्रये वैतसीं वृत्तिं काले तावत्प्रतीक्षितुम् ॥६॥ इति सञ्चिन्त्य स प्राज्ञः शकटालो मदिच्छया । अकरोद्राजकार्याणि पुनः सम्प्राप्य मन्त्रिताम् ॥७॥ कदाचिद्योगनन्दोऽथ निर्गतो नगराद् बहिः । क्षिपन्त्यल्पञ्चाङ्गुलिं हस्तं गङ्गामध्ये व्यलोकयत् ॥८॥
प्रथम लम्बक ५५
प्रथम लम्बक ५५ तब व्याडि ने कहा—'हे राजन् ! यह शरीर क्षण-भर में नष्ट हो जानेवाला है। अतः कौन बुद्धिमान् इस अनित्य सुख भोगों में डूबता है ॥१३३॥ लक्ष्मी की मृगतृष्णा किस धीर-पुरुष को मोहित नहीं कर लेती'? ऐसा कहकर तपस्या के लिए निश्चय किए हुए वह व्याडि उसी समय चला गया ॥१३४॥ वररुचि कहता गया—'हे काणभूते ! इसके अनन्तर योगनन्द अयोध्या-शिविर से समस्त सेना के सहित मेरे साथ चलकर प्रधान राजधानी पाटलिपुत्र में राज-भोग करने के लिए आ गया ॥१३५॥ इस प्रकार, पाटलिपुत्र में आकर उपकोशा द्वारा मेरी सेवा होती थी। और, साथ ही राजा नन्द के मन्त्रित्व-भार को वहन करता हुआ मैं माता और सुहृज्जनों के साथ समृद्धि का उपभोग करने लगा ॥१३६॥ पाटलिपुत्र में तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी मुझे प्रतिदिन बहुत-सा सुवर्ण देती थीं और साक्षात् शरीरधारिणी सरस्वती मेरे कार्यों में सर्वदा स्वयं सम्मति देती रहती थीं ॥१३७॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त। पञ्चम तरंग वररुचि की कथा (चालू) वररुचि का वैराग्य ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम क्रोध आदि के वशीभूत हो गया ॥१॥ वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था। आकस्मिक रूप में प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नहीं बना देती ॥२॥ तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता में व्याकुल होकर मेरा कर्तव्य भ्रष्ट हो रहा है। अतः अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी तो मेरे रहते क्या कर सकता है ॥३ ४॥ इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः शान्त होती है ॥५॥ 'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बक के समान मन्द नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए' ॥६॥ ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रित्व-पद प्राप्त कर राजकार्य करने लगा ॥७॥ किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अँगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने कड़ाही में घूमते हुए देखा ॥८॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर किमेतदिति पप्रच्छ मामाहूय स तत्क्षणम्। अहं च द्वे निजाङ्गुल्यौ दिशि तस्यामदर्शयम् ॥१९॥ तेन तस्मिंस्तिरोभूते हस्ते राजातिविस्मयात्। भूयोऽपि तदपृच्छन्मां ततश्चाहं समब्रवम् ॥२०॥ पञ्चभिर्मिलितैः किं यज्जगतीह न साध्यते। इत्युक्तवानसौ हस्तः स्वाङ्गुलीः पञ्च दर्शयन् ॥२१॥ ततोऽस्य राजन्नङ्गुल्यावते द्वे दर्शिते मया। ऐकचित्ये द्वयोरेव किमसाध्यं भवेदिति ॥२२॥ इत्युक्त गूढविज्ञाने समतुष्यत्ततो नृपः। शकटासो ऽप्यपीदक्ष्वं मद्बुद्धिं वीक्ष्य दुर्जयाम् ॥२३॥ ! एकदा योगनन्दश्च दृष्टवान्महिषीं निजाम्। वातायनात्प्राप्स्यन्तीं ब्राह्मणातिथिमुन्मुखम् ॥२४॥ तन्मात्रादेव कुपितो राजा विप्रस्य तस्य सः। आदिदेशवधमीर्ष्या हि विवेकपरिपन्थिनी ॥२५॥ हन्तुं वध्यभुवं तस्मिन्नीयमाने द्विज तथा। अहसद्गतजीवोऽपि मत्स्यो विपणिमध्यगः ॥२६॥ तदव राजा तद् बुद्ध्वा वधं तस्य न्यवारयत्। विप्रस्य मामपृच्छच्च मत्स्यहासस्य कारणम् ॥२७॥ निरूप्य कथयाम्येतदित्युक्त्वा निर्गतं च माम्। चिन्तितोपस्थितान्ते सुरस्वयमब्रवीत् ॥२८॥ अस्य तालतरोः पृष्ठे तिष्ठ रात्रावलक्षितः। अत्र श्रोष्यसि मत्स्यस्य हासहेतुमसंशयम् ॥२९॥ तच्छ्रुत्वा निशि तत्राहं गत्वा तालोपरि स्थितः। अपश्यं राक्षसीं घोरां बालैः पुत्रैः सहागताम् ॥३०॥ सा भक्ष्यं याचमानांस्तानब्रवीत्प्रतिपाल्यताम्। प्रातर्वो विप्रमांसानि दास्याम्यद्य हतो न सः ॥३१॥ कस्मात्स न हतोऽद्येति पृष्टा तैरब्रवीत्पुनः। तं हि दृष्ट्वा मृतोऽपीह मत्स्यो हसितवानिति ॥३२॥ हसितं किमु तनेति पृष्टा भूयः सुतैश्च सा। अद्योपहासासीद् राज्ञः सर्वा रात्रोऽपि निष्कृता ॥३३॥
पंचम लम्बक ५७
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
पंचम लम्बक ५७ राजा ने उसी समय मुझे बुलाकर पूछा कि 'यह क्या है ?' मैंने भी उसी दिशा की ओर अपनी दो अँगुलियाँ दिखा दीं और हाथ अन्तर्हित हो गया ॥९॥ इस प्रकार उस हाथ के तिरोहित हो जाने पर राजा ने अत्यन्त विस्मय के साथ मुझसे फिर पूछा तब मैंने कहा—॥१० ॥ पाँचों अँगुलियों को दिखाते हुए उस हाथ ने कहा कि पाँच के मिलने पर कौन-सा काम सिद्ध नहीं हो सकता ॥११॥ इसीलिए मैंने उसे दो अँगुलियाँ दिखाईं कि यदि दो का एकचित्त हो तो संसार में असाध्य क्या है ? ॥१२॥ राजा योगनन्द का अन्तःपुर मरी मछली का हँसना इस प्रकार गूढ़ विज्ञान बतलाने पर राजा अति प्रसन्न हुआ और सपत्नीक मेरी बुद्धि को सुवर्ण लगाकर सुखी हुआ ॥१३॥ एक बार राजा योगनन्द ने ऊपर मुँह किये हुए एक ब्राह्मण अतिथि को झरोखे से देखती हुई अपनी महारानी को देखा ॥१४॥ राजा ने ब्राह्मण को दुराचारी जानकर उसके वध की आज्ञा दे दी। क्योंकि ईर्ष्या विवेक की विरोधिनी होती है। ॥१५॥ राजाज्ञानुसार जब ब्राह्मण वध्यभूमि में ले जाया जा रहा था तब बाजार में रखा हुआ मृत मत्स्य उसे देखकर हँसने लगा ॥१६॥ जब राजा को यह मालूम हुआ तब उसने ब्राह्मण का वध रोक दिया और मुझसे मछली के हँसने का कारण पूछा ॥१७॥ 'सोचकर कहूँगा' ऐसा कहकर मैं राजभवन से चला गया। जब एकान्त में मैंने सरस्वती का ध्यान किया तब सरस्वती ने उपस्थित होकर यह कहा ॥१८॥ उस ताल के पेड़ पर रात को छिपकर बैठो तब वहाँ मछली के हँसने का कारण निश्चय ही सुनोगे ॥१९॥ यह जानकर मैं रात में वहाँ जाकर ताल-वृक्ष पर बैठा और रात को छोटे-छोटे बालकों के साथ आई हुई एक भीषण राक्षसी को देखा ॥२० ॥ बच्चों के भोजन माँगने पर वह राक्षसी बोली कि अभी प्रतीक्षा करो। प्रातःकाल तुम्हें ब्राह्मण का मांस दूँगी। आज वह मारा नहीं गया ॥२१॥ बच्चों ने पूछा कि आज वह क्यों नहीं मारा गया ? तब राक्षसी ने कहा कि उसे देख कर मरा हुआ मत्स्य भी हँसन लगा इसलिए नहीं मारा गया ॥२२॥ बालकों के यह पूछने पर कि 'वह मृत मत्स्य क्यों हँसा ?' राक्षसी बोली कि 'राजा की सभी रानियाँ भ्रष्ट हो गई हैं' ॥२३॥ ८
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर सर्वत्रान्तः पुरे ह्यत्र स्त्रीरूपाः पुरुषाः स्थिताः । हन्यन्तेऽनपराधस्तु विप्र इत्यहसत्त्विति ॥२४॥ भूतानां पार्थिवात्यर्थनिर्विषक्तत्वहासिनाम् । सर्वान्तश्चारिणां ह्येता भवन्त्येव च विक्रियाः ॥२५॥ एतत्तस्या वचः श्रुत्वा ततोऽप्रक्रान्तवाहनम् । प्रातश्च मत्स्यहासस्य हेतुं राज्ञे न्यवेदयम् ॥२६॥ प्राप्य चान्तःपुरेभ्यस्तान्स्त्रीरूपान्पुरुषांस्ततः । बहुमन्यत मां राजा वधाद् विप्रं च मुक्तवान् ॥२७॥ इत्यादि चेष्टितं दृष्ट्वा तस्य राज्ञो विश्रब्धहृदयम् । श्लिष्टे मयि कदाचिच्च तत्रागाच्चित्रकृन्नरः ॥२८॥ अलिखत्स महादेवीं योगनन्दं च तं पटे । सजीवमिव सञ्चित्रं वाक्चेष्टारहितं त्वभूत् ॥२९॥ तं च चित्रकरं राजा तुष्टो वित्तैरपूरयत् । तं च वासगृहे चित्रपटं भित्तावकारयत् ॥३०॥ एकदा च प्रविष्टस्य वासके तत्र सा मम । सम्पूर्णलक्षणा सर्व्वी प्रतिभाति स्म चित्रगा ॥३१॥ लक्षणान्तरसम्बन्धादभ्यूह्य प्रतिभानतः । अथाकारयमंह तस्यास्तिलकं मेखलापदे ॥३२॥ सम्पूर्णलक्षणां तेन कृत्स्नां गतवानहम् । प्रविष्टो योगनन्दोऽथ तिलकं तं व्यलोकयत् ॥३३॥ केनाप्य रचितोऽत्रेति सोऽपृच्छच्च महत्तरान् । ते च न्यवेदयस्तस्मै कर्त्तारं तिलकस्य माम् ॥३४॥ देव्या गुप्तप्रवेशस्थमियं नान्यो मया विना । वेत्ति तज्ज्ञातवानेवमसौ वररुचिः कथम् ॥३५॥ सन्निहितोऽधुना नूनं ममान्तःपुरविप्लवः । दृष्टवागतएवायम् स्त्रीरूपांस्तत्र तान्नरान् ॥३६॥ इति सन्दिग्धयामास योगनन्दः क्रुधा ज्वलन् । जायन्ते बत मूढानां यत्नादा अपि तादृशाः ॥३७॥ ततः स्वैरं समाहूय शकटालं समादिशत् । त्वया वररुचिर्बध्यो देवीविप्रलम्भनादिति ॥३८॥
प्रथम लम्बक ५९
प्रथम लम्बक ५९ राजा के रनिवास में अनेक पुरुष स्त्रियों के रूप में भरे हैं किन्तु यह बेचारा ब्राह्मण बिना अपराध ही मारा जा रहा है—ऐसा सोचकर मत्स्य हँसा था॥२४॥ राजा की अत्यन्त निर्विवेकिता पर हँसनवाले सब के मन्दर में रहनेवाले प्राणियों का ऐसे विचार होते हैं॥२५॥ राक्षसी की इन बातों को सुनकर मैं वहाँ से भाग आया और प्रातःकाल मैंने राजा से मछली के हँसने का कारण बता दिया॥२६॥ मेरे कथनानुसार राजा ने खोज करने पर रनिवास में रहनेवाले स्त्रीवेषधारी अनेक पुरुषों को पकड़ा। तब से मुझ अत्यधिक मानने लगा और ब्राह्मण को भी वध से मुक्त कर दिया॥२७॥ इस प्रकार की राजकीय अव्यवस्थाओं को देखकर मैं खिन्न हो रहा था कि एक बार राजा के पास एक नया चित्रकार आया॥२८॥ उसने एक चित्रपट पर महादेवी और योगनन्द का चित्र ऐसा सजीव बनाया कि वह केवल बोलने की चेष्टा से ही रहित था॥२९॥ राजा ने चित्रकार पर प्रसन्न होकर उसे भरपूर धन दिया और चित्र को अपने निजी भवन (कमरे) की दीवार पर लटकवा दिया॥३०॥ एक बार जब मैं राजा के शयन-कक्ष में गया तब उस चित्र में महारानी के सम्पूर्ण लक्षणों को देखा॥३१॥ अंगराग लक्षणों के सम्बन्ध में मैंने अपनी प्रतिभा के बल से यह जान लिया कि इसकी कमर में तिल का चिह्न होना चाहिए। मैंने चिह्न बना दिया और महारानी को सम्पूर्ण लक्षण से युक्त कर दिया॥३२॥ कुछ समय के अनन्तर राजा जब उस भवन में आया तब उसने मेरे बनाये हुए तिल-चिह्न को देखा॥३३॥ राजा ने उस तिल को देखते ही कामसूत्र के रचयिता से पूछा कि यह चिह्न किसने बनाया? उन्होंने मेरा नाम बता दिया॥३४॥ 'महारानी के गुप्त प्रदेश के इस चिह्न को मेरे बिना दूसरा नहीं जानता इसे वररुचि ने कैसे जान लिया?'॥३५॥ अतः वररुचि ने गुप्त रूप से अवश्य ही मेरी महारानी को भ्रष्ट किया है और इसलिए उसने रनिवास में स्त्रियों का रूप धारण किए हुये पुरुषों को भी देखा होगा॥३६॥ ऐसा सोचकर योगनन्द क्रोध से जलने लगा। सच है मूर्खों में शंका करने वाले अनुगामी ही होते हैं॥३७॥ तब महाराज ने सकटाल को एकान्त कक्ष में बुलाकर कहा कि वररुचि ने महारानी का सतीत्व-भंग किया है। अतः तुम उसे मार डालो ॥३८॥ १ अरेबियन नाइट्स में शहरयार के अन्तःपुर में इसी प्रकार स्त्री-वेषधारी पुरुषों के रहने की चर्चा आती है। २ शेक्सपियर के नाटक सिम्बेललाइन में भी ऐसी शंका का उत्पन्न होना दीखता है।
९० कथासरित्सागर
९० कथासरित्सागर यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा शकटालोऽगमद् बहिः। अचिन्तयच्च शक्तिः स्याद्धन्तुं वररुचिं न मे ॥३९॥ दिव्यबुद्धिप्रभावोऽसावुद्धर्त्ता च ममापदः। विप्रदोषं तद्वरं गुप्तं सम्प्रति स्वीकरोमि तम् ॥४०॥ इति निश्चित्य सोऽभ्येत्य राज्ञः कोपमकारणम्। वृत्तान्तं कथयित्वा मे शकटालोऽब्रवीत्ततः ॥४१॥ अथ कञ्चित्प्रवादाय हर्म्यह त्वं च मद्गृहे। प्रच्छन्नस्तिष्ठ मामस्माद्रक्षितुं कोपनान्नृपात् ॥४२॥ इति तद्वचनाच्छन्नस्तद्गृहैकस्थितोऽभवम्। स चान्यं हत्वा कञ्चिन्मद्वधवार्त्तामये निशि ॥४३॥ एवं प्रयुक्तनीतिं च प्रीत्याऽप्रोचमहं तदा। एको मन्त्री भवान्येन हन्तुं मां न कृता मतिः ॥४४॥ नहि हन्तुमहं शक्यो राक्षसो मित्रमस्ति मे। ध्यातमात्रागतो विश्वं ग्रसते स मदिच्छया ॥४५॥ राजा त्विहेन्द्रदत्ताख्यः सखा वध्यो न मे द्विजः। तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीन्मन्त्री रक्षो मे दर्शयतामिति ॥४६॥ ततो ध्यानागतं तस्मै तद्रक्षोऽहमदर्शयम्। तद्दर्शनाच्च वित्रस्तो विस्मितश्च बभूव सः ॥४७॥ रक्षस्यन्तर्हिते तस्मिन् शकटालः स मां पुनः। कथं ते राक्षसो मित्रं सञ्जात इति पृष्टवान् ॥४८॥ ततोऽहमब्रुवं पूर्वं रक्षार्थं नगरं भ्रमन्। रात्रौ रात्रौ मया प्राप्तदेकैकको नगराधिपः ॥४९॥ तच्छ्रुत्वा योगनन्दो मामकरोन्नगराधिपम्। भ्रमंश्चापश्यमत्राहं भ्रमन्तं राक्षसं निशि ॥५०॥ स च मामवदद् ब्रूहि विख्याते नगरेऽत्र का। सुरूपा स्त्रीति तच्छ्रुत्वा विहस्याहं तमब्रुवम् ॥५१॥ या यस्याभिमता मूर्ख¹ सुरूपा तस्य सा भवेत्। तच्छ्रुत्वा स्वयमेवैनं जितोऽस्मीत्यवदत्स माम् ॥५२॥ प्रश्नमोक्षाद् वधोत्तीर्णं मां पुनश्चाब्रवीदसौ। तुष्टोऽस्मीति सुहृन्मे त्वं सन्निधास्ये च ते स्मृतः ॥५३॥
प्रथम लम्बक ६१
प्रथम लम्बक ६१ 'जो आज्ञा'-ऐसा कहकर शकटाल अपने घर आकर सोचने लगा कि मुझमें वररुचि को मारने की शक्ति नहीं है॥३९॥ उसका बुद्धि-प्रभाव अलौकिक है। उसने मुझे मृत्यु से बचाया है। फिर वह ब्राह्मण है। अतः इस समय इसे गुप्त रखकर (वध की आज्ञा) स्वीकार कर लेता हूँ॥४०॥ ऐसा सोचकर उसने राजा के अकारण क्रोध और मेरी वधाज्ञा मुझे सुनाकर कहा॥४१॥ 'मैं हण्ड्य मशान में किसी डिण्डी चोर को मारकर तुम्हारे वध की घोषणा कर देता हूँ। तुम मेरे घर में छिपकर रहो और उस पापी राजा से मेरी रक्षा करो'॥४२॥ इस प्रकार शकटाल के कहने पर मैं गुप्त रूप से उसके घर में रहने लगा। उसने मेरा वध प्रचारित करने के लिए रात में किसी अन्य का वध करा दिया॥४३॥ इस प्रकार, नीति प्रयोग करनेवाले शकटाल को मैंने एक दिन प्रेमपूर्वक कहा कि 'एक मन्त्री तुम हो जिसने मेरे मारने का विचार नहीं किया॥४४॥ मैं मारा भी नहीं जा सकता क्योंकि मेरा मित्र राक्षस है जो स्मरण करते ही उपस्थित होकर पल-भर में मेरी इच्छा से सारे विश्व का नाश कर सकता है॥४५॥ राजा नन्द मेरा इन्द्रदत्त नामक मित्र है और ब्राह्मण है। अतः वह भी मेरे लिए वध्य नहीं है। शकटाल ने कहा कि 'उस राक्षस को मुझे दिखाओ'॥४६॥ तब स्मरण करते ही आये हुए राक्षस को मैंने उसे दिखा दिया उसे देखकर शकटाल आश्चर्य-चकित और भयभीत हुआ॥४७॥ गुग्गल कौन है? राक्षस के अन्तर्धान होने पर शकटाल ने प्रश्न किया कि 'यह राक्षस तुम्हारा मित्र कैसे हुआ'? ॥४८॥ तब मैंने कहा 'बात जिस प्रकार से हुई वह सुनो। रात को भ्रमण (गश्त) करते हुए प्रतिदिन एक-एक नगर रक्षक (शहर कोतवाल) मारा जाता था॥४९॥ परस्पर परास्त हुए राजा नन्द ने एक बार जब ही नया नगर रक्षक (कोतवाल) बना दिया। तब व्याकुल होकर (नगर रक्षक बनकर) मैंने उस राक्षस को देखा। उसने मुझे देखकर कहा कि 'बताओ इस नगर में सब से सुन्दरी स्त्री कौन है'? तब मैंने हँसकर गुप्त रूप से कहा॥५०॥ 'जो दूसरे को अच्छी दिखाई पड़ती है वही उसके लिए सुन्दरी है।' इस प्रश्न का उत्तर दे कर उसके चंगुल से छूटे हुए भागे हुए को फिर उसने—'हे नगर रक्षक! तुम बड़े चतुर हो' फिर इस प्रकार की वार्तालाप सुनकर हिंसामुखी बात से छुड़ा दिया तथा उपदेश दिया—॥५१॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्यथागतमगामहम्। एवमापत्सहायो मे राक्षसो मित्रतां गतः ॥५४॥ इत्युक्तवानहं भूयः शकटालेन याचितः। गङ्गामदर्शयं तस्मै मूर्त्तां ध्यानादुपस्थिताम् ॥५५॥ स्तुतिभिस्तोषिता सा च मया देवी शिरोदृशा। बभूव शकटालश्च सहायः प्रणतो मयि ॥५६॥ एकदा च स मंत्री मां गुप्तस्थः सिद्धमब्रवीत्। सर्वथेनापि खेदाय किमात्मा दीयते त्वया ॥५७॥ किं न जानासि यद्राज्ञामविचाररता धियः। अचिराच्च भवेच्छुद्धिस्तथा चात्र कथां शृणु ॥५८॥ आदित्यवर्मनामात्र बभूव नृपतिः पुरा। शिववर्म्माभिधानोऽस्य मन्त्री चाभून्महामतिः ॥५९॥ राज्ञस्तस्यैकदा चका राज्ञी गर्भमधारयत्। तद्बुद्ध्वा स नृपोऽपृच्छदित्यन्तःपुररक्षिणः ॥६०॥ अपंसाय प्रविष्टस्य वर्ततेऽन्तःपुरऽथ मे। तदेषा गर्भसम्भूतिः कुतः सम्प्रति कथ्यताम् ॥६१॥ अथोचुस्ते प्रवेशोऽत्र पुंसोऽन्यस्यास्ति न प्रभो! शिववर्म्मा तु ते मन्त्री प्रविशत्यनिवारितः ॥६२॥ तच्छ्रुत्वाचिन्तयद्राजा नूनं द्रोही स एव मे। प्रकाशं च हते तस्मिन्नपवादो भवेन्मम ॥६३॥ इत्यालोच्य स च युक्त्या शिववर्माणमीश्वरः। सामन्तस्यान्तिकं शत्र्योः प्राहिणोद् भोगवर्मणः ॥६४॥ तद्वधार्थं तस्य लेखेन सन्दिद्य तदनन्तरम्। निगूढं च नृपस्तत्र सप्रहारं व्यसर्जयत् ॥६५॥ याते मन्त्रिणि सप्ताहे गते भीत्या पलायिता। सा राज्ञी रक्षिभिलंघ्या पुंसा स्त्रीरूपिणा सह ॥६६॥ आदित्यवर्मा तद्बुद्ध्वा सानुतापोऽभवत्ततः। धिङ् मया तादृशो मन्त्री घातितोऽकारणादिति ॥६७॥ अत्रान्तरं स च प्राप निकटं भोगवर्मणः। शिववर्म्मा स योगात्साङ्गमपश्यत् पूरणं ॥६८॥
प्रथम लम्बक ६१
प्रथम लम्बक ६१ इस प्रकार कहकर राक्षस के अन्तर्धान हो जाने पर मैं अपने रास्ते से चला गया। इस प्रकार यह राक्षस मेरा मित्र बना ॥५४॥ ऐसा कहकर शकटाल द्वारा पुनः प्रार्थना किये जाने पर मैंने ध्यान से उपस्थित मूर्त्तिमती गंगा को दिखाया ॥५५॥ मुझसे स्तुति द्वारा सन्तुष्ट की गई गंगा देवी तिरोहित हो गईं। यह सब देख-सुनकर शकटाल मुझे प्रणाम करता हुआ मेरा सहायक बन गया ॥५६॥ एक बार मन्त्री शकटाल ने छिपे हुए और खिन्न मुझे देखकर कहा—"तुम अपनी आत्मा में खेद क्यों कर रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि 'राजाओं की बुद्धि अविचार पूर्ण होती है' इसलिए शीघ्र ही तुम्हारी शुद्धि हो जायगी। मैं इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाता हूँ सुनो" ॥५७-५८॥ राजा आदित्यवर्मा और मन्त्री शिववर्मा की कथा पूर्वकाल में आदित्यवर्मा नामक एक राजा था। शिववर्मा नामक उसका महा बुद्धिमान् मन्त्री था ॥५९॥ इस राजा की एक रानी एक बार गर्भवती हुई, यह सुनकर राजा ने रक्षकों से पूछा 'मुझे रनिवास में गये हुए दो वर्ष हो गए फिर भी रानी का यह गर्भ-धारण कैसे हुआ—यह बताओ' ॥६०-६१॥ रक्षकों ने कहा—महाराज आपके इस अन्तःपुर में किसी पुरुष का प्रवेश असम्भव है किन्तु आपका मन्त्री शिववर्मा बे-रोक टोक अन्दर आता-जाता है' ॥६२॥ यह सुनकर राजा ने सोचा कि अवश्य यह मन्त्री मेरा द्रोही है, किन्तु इसे प्रकट रूप में मार देने पर मेरी निन्दा होगी ॥६३॥ ऐसा सोचकर राजा ने शिवशर्मा को अपने मित्र सामन्त राजा गोपवर्मा के पास भेज दिया ॥६४॥ उसके जाने के अनन्तर राजा ने गुप्त रूप से मन्त्री का वध करने के लिए पत्र लिखकर छिपे तौर पर पत्रवाहक को भेजा ॥६५॥ मन्त्री के चले जाने पर एक सप्ताह व्यतीत होने के अनन्तर वह गर्भवती रानी भय से भाग गई और सिपाहियों ने उसे स्त्री-रूप धारण किये हुए पुरुष के साथ पकड़ा ॥६६॥ यह समाचार जानकर आदित्यवर्मा शोक से पश्चात्ताप करने लगा कि मैंने ऐसे भले मन्त्री को बिना कारण ही मार डाला ॥६७॥ इसी बीच शिववर्मा भोगवर्मा के पास पहुँचा किन्तु राजाज्ञा का पत्र लेकर पत्रवाहक भी तबतक न पहुँचा ॥६८॥
६४ कथासरित्सागरे
६४ कथासरित्सागरे वाचमित्या च तं लब्धमेकान्ते शिववर्मणः । शशंस बधनिर्देशं भोगवर्मा विधेयताम् ॥६९॥ शिववर्माऽप्यवोचत्तं सामन्तं मन्त्रिसत्तमः । स्वं व्यापार्य मां नो षश्छिन्द्यादात्मानमात्मना ॥७०॥ सच्छ्रुत्वा विस्मयाविष्टो भोगवर्मा जगाद तम् । किमेतद् ब्रूहि मे विप्र ! शापितोऽसि न वक्षि चेत् ॥७१॥ अथ बक्ति स्म तं मन्त्री हृष्यन् यत्र भूपतेः । तत्र द्वादश वर्षाणि देशे दद्यो न वर्षति ॥७२॥ तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणि श्लाघे भोगवर्मा व्यचिन्तयत् । दुष्टः स राजा देशस्य नाशमस्माकमिच्छति ॥७३॥ किं हि तत्र न सन्त्येव वधका गुप्तगामिनः । तस्मान्मन्त्री म वध्योऽसौ रक्ष्यः स्वात्मबवादपि ॥७४॥ इति सम्भ्रथ दत्वा च रक्षका भोगवर्मणा । शिववर्मा ततो देशात्प्रोषितोऽभूत्ततः क्षणात् ॥७५॥ एवं प्रत्याययो जीवन्स मन्त्री प्रज्ञया स्वया । शुद्धिश्वास्यान्द्यतो जाता नहि धर्मोऽन्यथा भवेत् ॥७६॥ इत्थं तवापि शुद्धिः स्यात्तिष्ठ तावद् गृहे मम । कार्यायन नृपोऽप्यद्य सानुतापो भविष्यति ॥७७॥ इत्युक्तः शकटालम् अच्छोऽहं तस्य वेश्मनि । प्रतीक्षमाणोऽवसरं तान्यहान्यत्यवाहयम् ॥७८॥ तस्याथ योगनन्दस्य कालभूते ! कदाचन । पुत्रो हिरण्यगुप्ताख्यो मृगयाय गतोऽभवत् ॥७९॥ अश्ववेगात्प्रमातस्य क्यञ्चिद्दूरमन्तरम् । एकाकिनो वनं तस्य वासरः पर्यहीयत ॥८०॥ ततश्च तां निशां गतुं वृक्षमारेहति स्म सः । क्षणात्तत्र चारोहदृक्षं सिंहम् भीपितः ॥८१॥ स दृष्ट्वा राजपुत्रं तं भीतं मानुषभाषया । मा भैषीर्मम मित्रं त्वमित्युक्त्वा निर्भय व्यधात् ॥८२॥ विस्रम्भाद्वशवाश्यं राजपुत्रोऽथ सुप्तवान् । ऋक्षस्तु जाग्रदेवाशीदथ सिंहोऽथ सोऽब्रवीत् ॥८३
प्रथम लम्बक १५
प्रथम लम्बक १५ दैववश भोगवर्मा ने पत्र को पढ़कर एकान्त में शिववर्मा से उसके वध की बात सुना दी ॥६९॥ मन्त्रिवर शिववर्मा ने भोगवर्मा से कहा कि तुम निर्देश के अनुसार मुझे मारो। यदि नहीं मारोगे तो मैं स्वयं आत्मघात कर लूँगा ॥७० ॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित भोगवर्मा ने शिववर्मा से कहा कि 'हे मित्र ! यह क्या रहस्य है मुझे बताओ। यदि नहीं बताओगे तो मैं तुम्हें शपथ देता हूँ' ॥७१॥ राजा के आग्रह करने पर मन्त्री ने कहा कि 'हे राजन् ! मैं जिस देश में मारा जाऊँगा वहाँ बारह वर्षों तक वृष्टि न होगी—अकाल पड़ेगा' ॥७२॥ यह सुनकर भोगवर्मा चकित होकर अपने मन्त्रियों के साथ सोचने लगा कि आदित्यवर्मा दुष्ट है। वह हमारे देश का विनाश चाहता है ॥७३॥ क्या उसके यहाँ गुप्त हत्या करनेवाले बधिक नहीं हैं। इसलिए मंत्री की रक्षा करनी चाहिए। भले ही आत्महत्या हो जाय किन्तु इसका वध कदापि न किया जायगा ॥७४॥ इस प्रकार मन्त्री शिववर्मा अपनी बुद्धि से जीवित ही लौट आया उसकी निर्दोष- ता दूसरे प्रकार से सिद्ध हो गई। यश कभी विपरीत नहीं होता यश सहायक ही होता है ॥७५-७६॥ वात्स्यायन इसी प्रकार तुम्हारी भी शुद्धि होगी। अर्थात् निर्दोषता प्रमाणित हो जायगी और राजा पश्चात्ताप करेगा ॥७७॥ शर्वदत्त से इस प्रकार कहा हुआ मैं उसी घर में छिपा रहा और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। वे दिन मैंने अत्यन्त कठिनाई से व्यतीत किए ॥७८॥ मित्रद्रोह का फल एक बार उस पाण्ड्य का पुत्र विक्रमतुंग शिकार खेलने के लिए सदा से गया। घोड़े की तेज दौड़ने के कारण राजपुत्र अति दूर गहन वन में पहुँच गया। उस अकेले भ्रमण करने-डरने दिन समाप्त हुआ ॥७९॥ राजपुत्र उस रात को बिताने के लिए एक उपयुक्त पेड़ पर चढ़ गया। कुछ ही समय के अनन्तर सिंह से डराया हुआ एक भालू भी उसी वृक्ष पर आ चढ़ा॥८०॥ भालू राजपुत्र को घबड़ाया हुआ देखकर मनुष्य की भाषा में बोला—'राजपुत्र तू मेरा मित्र है। डर मत। मैं कष्टदायक नहीं। ऐसा कहकर उसने राजपुत्र के हृदय पर अपना विश्वास जमा दिया और उसे निर्भय कर दिया॥८१-८२ ॥ भालू की बातों से विश्वस्त होकर राजपुत्र का भय और श्रम उपशम हुआ। इतने में नीचे से सिंह बोला॥८३॥