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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१४२ कथासरित्सागर

१४२ कथासरित्सागर

तैरागते तदह्नाने समं स सचिवान्वितः। निशि सूर्यप्रभः प्रायाच्चन्द्रपादाचलं प्रति॥१९८॥ गच्छतां च क्रमात्तेषामुत्तस्थुर्मार्गरोधिनः। यक्षगुह्यककूष्माण्डा विघ्ना नानायुधोद्यताः॥१९९॥ कांश्चिदस्त्रैर्विमोह्यैतान् कांश्चित् संस्तभ्य विद्यया। चन्द्रपादगिरिं तं ते प्रापुः सूर्यप्रभादयः॥२००॥ तत्रत्यां तद्गुहाद्वारप्राप्तानां शाङ्करा गणाः। एत्य प्रवर्त्त रुरुधुर्विचित्रविकृताननाः॥२०१॥ एतैः सह न योद्धव्यं कुप्येद्धि भगवान् हरः। तस्मादष्टसहस्रेण तमद्य परव स्तुमः॥२०२॥ येनैव ते प्रसीदन्ति तद्गणा इत्यबोचत। स सुवासकुमारस्तानथ सूर्यप्रभादिकान्॥२ ३॥ ततस्तथेति सर्वे त तथैव हरमस्तुवन्। स्वामिस्तुतिप्रसन्नाश्च तान् वदन्ति स्म ते गणाः॥२०४॥ मुक्तेयं भो गुहास्माभिर्गृहीतास्यां महौषधीः। सूर्यप्रभेण त्वेतस्यां न प्रवेष्टव्यमात्मना॥२०५॥ प्रभासः प्रविशत्वेतामेतस्य सुगमा ह्यसौ। एतद्गणवचः सर्वे ते तथेत्यनुमेनिरे॥२ ६॥ ततः प्रविशतस्तस्य प्रभासस्य तदैव सा। गुहा बद्धान्धकारापि सुप्रकाशा किमप्यभूत्॥२०७॥ उत्थाय च महाघोररूपा अप्यत्र राक्षसाः। चत्वारः किङ्करा ऊचुः प्रणताः प्रविशेति तम्॥२०८॥ अथ प्रविश्य संगृह्य दिव्याः सप्ताौषधीः स ताः। प्रभासो निर्गतः सूर्यप्रभाय निखिला ददौ॥२ ९॥ महाप्रभावाः सप्तैताः सिद्धाः सूर्यप्रभश्च ते। ओषध्य इति तत्कालं गगनादुदगाद्वाक्॥२१०॥ सञ्जातहर्षा मुदिताः सूर्यप्रभाद्याः सर्वे एव ते। स्वसैन्यमाययुः क्षिप्रं सुमेर्वास्पदमाश्रितम्॥२११॥ तत्रापृच्छत् सुनीतोऽथ तं सुवासकुमारकम्। मुने सूर्यप्रभं हित्वा प्रभासः किं प्रवेशितः॥२१२॥

षष्ठम लम्बक १७५

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षष्ठम लम्बक १७५ तथा यक्षों और किन्नरों ने भी गुहा में उसका स्वागत किया इसका क्या रहस्य है? यह सुनकर सभी को सुनाते हुए मुनि गुणघकुमार ने कहा—'सुनो कहता हूँ। प्रभास गुप्तप्रभ का अत्यन्त हितकारी है, इन दोनों में परस्पर भेद नहीं है॥२१३-२१४॥ प्रभास के समान शूरता और प्रभावशालिता में दूसरा व्यक्ति नहीं है। इसके पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से यह गुफा वशी की है॥२१५॥ अब इसके पूर्वजन्म का हाल कहता हूँ जैसा कि वह पहले था। प्राचीन समय में नमुचि नाम का श्रेष्ठ दानव था॥२१६॥ वह इतना महान् दानी था कि माँगते हुए शत्रु के लिए भी उसे कुछ अदेय नहीं था॥२१७॥ उसने दस हज़ार वर्षों तक केवल धुँआँ पीकर ही तपस्या की। इस कारण उसने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया कि वह लोहा पत्थर और लकड़ी से मारा न जाय॥२१८॥ तब उसने इन्द्र को बाँधकर भगा दिया। कश्यप आदि महर्षियों ने मध्यस्थ बन करके देवसभा में उसकी सन्धि (मित्रता) करा दी॥२१९॥ तदनन्तर, सुरों और असुरों ने परस्पर बैर-भाव छोड़कर मन्दराचल द्वारा क्षीरसमुद्र का मथन किया और उससे निकले हुए लक्ष्मी आदि रत्नों को विष्णु आदि देवताओं ने परस्पर बाँट लिया और उसी नियमानुसार नमुचि दानव के अपने हिस्से में उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा पाया॥२२०-२२१॥ इसी प्रकार, भगवान् देवताओं और दानवों ने ब्रह्मा के निदेशन के अनुसार समुद्र से निकले रत्नों को बाँट लिया॥२२२॥ मन्थन के अन्त में जब अमृत निकला तब उसे देवता लोग हरण कर ले गए। इस कारण देवों और दानवों की आपस में फिर शत्रुता हो गई॥२२३॥ और उनमें परस्पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में जो भी असुर सुरों द्वारा मारे जाते थे उन्हें उच्चैःश्रवा सूँघ-सूँघकर पसीने द्वारा पुनर्जीवित कर देता था॥२२४॥ इस कारण दैत्य और दानव देवताओं के लिए अजेय हो गए। तब चिन्तित इन्द्र को एकान्त में ले जाकर बृहस्पति ने कहा—'अब तुम्हारे लिए एक ही उपाय है। उसे शीघ्र ही कर डालो। तुम स्वयं जाकर नमुचि से उच्चैःश्रवा को दान में माँगो॥२२५-२२६॥ क्योंकि नमुचि दानव ऐसा दानी है कि वह अपनी दानशीलता के कारण प्राणों के लिए पूछे जाने पर संकोच नहीं करेगा। तब उसने इन्द्र से छल किया और इन्द्र द्वारा वध का भागी होने के कारण वह मारा गया॥२२७॥ ४४

१४६ कथासरित्सागर

१४६ कथासरित्सागर इत्युक्तो देवगुरुणा महेन्द्रस्त्रिदशैः सह। गत्वा ययाचे नमुचिं तमुच्चैःश्रवसं हयम् ॥२२८॥ न मे पराङ्मुखो गच्छेत्प्रार्थी सन्नापि वासवः। तस्मै नमुचिर्भूत्वा दद्यां नाहं कथं हयम् ॥२२९॥ जगत्सु वसुदाकीर्तिर्या मया चिरमर्जिता। सा चेन्म्लानिं गता तन्मे किं धिया जीवितेन वा ॥२३०॥ इति सञ्चिन्त्य शक्राय तमुच्चैःश्रवसं ददौ। वार्यमाणोऽपि शुक्रेण नमुचिः स महायशः ॥२३१॥ दत्ताश्वमथ विश्वास्य तं गाङ्गेन जघान सः। शस्त्राद्यवध्यं फेनेन वञ्चयन्नस्तनं वृत्रहा ॥२३२॥ अहो दुरन्ता संसारे भोगतृष्णा यया हताः। अनौचित्यादकीर्तेश्च देवा अपि न बिभ्यति ॥२३३॥ तच्छ्रुत्वा तस्य नमुचेरनुमाता तपोबलात्। चकार दुःखसन्तप्ता सङ्कल्पं शोकशान्तये ॥२३४॥ स एव मे पुनर्गर्भे सम्भूयान्नमुचिर्बली। भूयाच्च सर्वदेवानामजेयः संयुगेष्विति ॥२३५॥ ततः स तस्याः सम्भूय गर्भे जातोऽसुरः पुनः। सर्वरत्नमयो नाम्ना प्रबलो बलयोगतः ॥२३६॥ सोऽपि तप्ततपाः प्रीणन् प्राणैरप्यर्थिनः कृती। शतकृत्वो जिगायेन्द्रं प्रबलो दानवेश्वरः ॥२३७॥ ततः सम्मन्त्र्य देवास्तमुपेत्येदं ययाचिरे। देहं पुरुषमेधार्थमस्मभ्यं देहि सर्वथा ॥२३८॥ तच्छ्रुत्वा स रिपुभ्योऽपि तेभ्यो देहमदान्निजम्। प्राणानुदारा विसृजन्त्यर्थिनो न पराङ्मुखान् ॥२३९॥ ततः स खण्डशो देवैः कृतः प्रबलदानवः। मनुष्यलोके जातोऽथ प्रभाववपुषा पुनः ॥२४०॥ तदेयमास्ते नमुचिस्ततोऽभूत् प्रबलश्च सः। शैष मस्तत्पुन न्ददुर्जयोऽरिभिः ॥२४१॥ गमनम्। वेदेषु नरमेधविचारो नास्तीति श्रौतप'

देव गुरु के ऐसा कहने पर इन्द्र स्वयं देवताओं के साथ नमुचि से घोड़ा मांगने गया ॥२२८॥ मुझसे मांगनेवाला याचक कभी विमुख नहीं होता उसमें भी देवराज इन्द्र। तो मैं नमुचि होकर इसे घोड़ा क्यों न दूँ ? मैंने तीनों लोकों में चिरकाल से जो कीर्ति अर्जित की है, यदि वही मलिन हो गई, तो मेरे वैभव और जीवन से क्या लाभ ? ॥२२९-२३०॥ ऐसा सोचकर उदारहृदय नमुचि ने गुरु शुक्राचार्य के रोकने पर भी इन्द्र को घोड़ा दे दिया ॥२३१॥ उसके घोड़ा देने पर भी उसे निःशस्त्र बनाकर इन्द्र ने वज्र पर रखे हुए गंगा के फेन से उसे मार डाला क्योंकि वह अन्य अस्त्र-शस्त्रों से नहीं मारा जा सकता था ॥२३२॥ आश्चर्य है कि संसार में भोग की तृष्णा का अन्त नहीं है। इस तृष्णा के वशीभूत होकर देवता भी अनुचित कार्य करने से तथा अपयश से नहीं डरते ॥२३३॥ इस वृत्तान्त को जानकर दुःखित नमुचि की माता दनु ने अपने तपोबल से शोक की शान्ति के लिए यह संकल्प किया कि 'बलवान् नमुचि फिर मेरे गर्भ से उत्पन्न हो और वह युद्ध में देवताओं से अजेय रहे' ॥२३४-२३५॥ तदनन्तर, वह बलवान् नमुचि अत्यन्त बलशाली होने के कारण प्रबल नाम से पुनः दनु के गर्भ से उत्पन्न हुआ। उस प्रबल नामक दानवराज ने इन्द्र को सौ बार पराजित किया और वह याचकों के लिए जीवन तक देने के लिए सदा सन्नद्ध रहता था ॥२३६-२३७॥ उससे बार-बार पराजित होकर देवताओं ने मन्त्रणा करके उससे कहा—'हमलोग नरमेध यज्ञ करना चाहते हैं इसके लिए हमें अपना शरीर-दान करो ॥२३८॥ यह सुनकर उस प्रबल दानी दानव ने माँगने पर उन शत्रुओं को भी अपना शरीर दान में दे दिया। उदार व्यक्ति अपने प्राणों का दान कर देते हैं किन्तु याचक को विमुख नहीं होने देते ॥२३९॥ तदनन्तर देवताओं ने उस दानव के टुकड़े-टुकड़े कर डाला। वही प्रबल दानव आज प्रभास के रूप में मनुष्य-लोक में उत्पन्न हुआ है ॥२४०॥ यह पहले नमुचि तदनन्तर प्रबल रूप में जन्मा। वही आज प्रभास के रूप में है और पूर्व पुण्य के कारण शत्रुओं से अजेय है ॥२४१॥

४८ कथासरित्सागर

४८ कथासरित्सागर या च सम्बन्धिनी तस्य प्रशस्तस्यौषधीगुहा । तेन प्रभासस्यात्मीया वश्या सास्य सकिङ्करा ॥२४२॥ तदधश्चास्ति पाताले मन्दिरं प्रबलस्य तत् । यत्र द्वादश सन्त्यस्य मुख्यभार्याः स्वलङ्कृताः ॥२४३॥ विविधानि च रत्नानि नानाप्रहरणानि च । चिन्तामणिश्च लक्षं च योधानां तुरगास्तथा ॥२४४॥ तत्प्रभासस्य सम्बन्धि सर्वमस्य पुरोजितम् । सर्वोदृशं प्रभासोऽयं नास्त्येद किञ्चिदद्भुतम् ॥२४५॥ एवं ततो मुनिकुमारक्तो निशम्य सूर्यप्रभप्रभृतयः समयप्रभासाः । रत्नाद्यवाप्तुमथ संश्रयमुस्तदैव पातालमङ्गं प्रबलवेश्मबिलप्रवेष्ठम् ॥२४६॥ तेम प्रविश्य परिगृह्य च पूर्वपत्नी— श्चिन्तामणिं च तुरगानसुरांश्च योधान् । निर्गत्य प्राप्तनिखिलद्रविणः स एकः सूर्यप्रभं किमपि तोषितवान् प्रभासः ॥२४७॥ अथ समयसुनीथः सप्रभासः सुमेरु— प्रभृतिभिरनुयातो राजभिर्मन्त्रिभिश्च । द्रुतमभिमतसिद्धिं प्राप्य सूर्यप्रभोऽसौ पुनरपि निजसेनासन्निवेशं तमागात् ॥२४८॥ तत्र सोऽसुरनराधिपादिषु स्वस्ववासकगतेषु तेषु तम् । रात्रिशेषमनयत् कुशास्तरे सन्निगृह्य रणदीक्षितः पुनः ॥२४९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके तृतीयस्तरङ्गः । चतुर्थस्तरङ्गः रणभूमौ सूर्यप्रभस्य युद्धसज्जा ततः प्रातः समं सैन्यैः स सुमेरुतपोवनात् । तस्मात्सूर्यप्रभः प्रायाच्छत्रून्विजिगीषया ॥१॥ सनिवासस्य निकटं त्रिकूटाद्रेश्चाप्य च । भावासितोऽभूत्तत्रत्यं बलेनोत्सार्य तद्बलम् ॥२॥

अष्टम लम्बक ३४९

अष्टम लम्बक ३४९ यह गुफा उसी प्रबल दानव की है। इसी कारण वह उन पहरेदारों के साथ यह उसी के अधीन है॥२४२॥ उस गुफा के नीचे प्रबल का भवन है, जहाँ अलंकारों से सजी हुई उसकी बारह पत्नियां रहती हैं॥२४३॥ वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्न और विविध प्रकार के मन्त्र-शस्त्र हैं। चिन्तामणि है और एक लाख घोड़ा है और उतने ही घड़े भी हैं॥२४४॥ प्रभास की ये सब वस्तुएँ उसके पहले जन्म की कमाई हैं। इस प्रकार यह प्रभास की कहानी है। अतः इसके लिए यह सब कुछ आश्चर्य नहीं है ॥२४५॥ मुनि सुबाहुकुमार के मुख से यह सब सुनकर सूर्यप्रभ, सुनीथ, मय, प्रभास आदि सभी रत्न आदि की प्राप्ति के लिए पाताल-स्थित प्रबल के गुहा-मन्दिर में गए ॥२४६॥ उसमें प्रवेश करके प्रभास ने अपने पूर्वजन्म की पत्नियों, चिन्तामणि, घोड़ा, मणियाँ तथा मन्त्र-रत्नों को बाहर लाकर सूर्यप्रभ को कुछ सन्तुष्ट किया ॥२४७॥ तब मय, सुनीथ और सुमेरु के साथ अपने मन्त्रियों के संग सूर्यप्रभ अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर फिर सेना-शिविर में लौट आया ॥२४८॥ वहाँ पर असुर और मानव-राजाओं के अपने-अपने निवास-भवन में चले जाने पर स्वयं भी रण-दीक्षा का व्रत लेकर सूर्यप्रभ ने गुहा के आँगन पर रात्रि व्यतीत की ॥२४९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथामरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना रात बीतने पर प्रातःकाल वह सूर्यप्रभ सुमेरु के शासन से अपनी सेना के साथ अमरावती को जीतने के लिए चला ॥१॥ वहाँ से चलकर मन्दरादि के विशाल-स्थल त्रिकूट पर्वत पर पहुँचकर वहाँ पड़ी हुई उसकी सेना, काहलपूर्वक सुनकर सूर्यप्रभ ने अपनी सेना का शिविर स्थापित किया ॥२॥

१५० कथासरित्सागर

१५० कथासरित्सागर आराधितश्च सत्रास्मिन् गन्तुमभ्यधिके। आख्यानस्य त्रिरेतेनमन्वयो द्रुत आनये ॥३॥ स पादाय जगादैतं मुदद गन्धर्वदारकम्। अवाप्यैतां राजा तव गच्छिष्यसि ॥४॥ दूरङ्गमेण स तन्त्राभिगणार्थं जातुचित् श्रुतः। मदाग्मन्त्यियं प्राप्य स एनं प्रापयिष्यति गृहम् ॥५॥ ततस्तिलोत्तमानाम्नी या विद्याध्र्या व्योमगाम्। अगमत् शत्रु गच्छन् मुमद प्रत्युवाच तम् ॥६॥ मातु नामसमयं पात्यमश्विव शान्तदारकम्। प्रादिशन्न पर घोरे गच्छशीघ्रं स्वकालयम् ॥७॥ गमिष्य वरमादित्यं विशामित्यभ्यधत्त। गच्छन्त्या तपसागारं स दूतः स प्रभू दिशः ॥८॥ अथाप्राक्... गुं... गुर्दप्रभाच। गेयानि शृण्वन् गीतानि निर्विन्तानि पृथक्पृथक् ॥९॥ सा गताथ गिरं समुवाच भवगुहम्। इहिला स्थानातादयतोदय तंग न ॥१०॥ तत बभोव सुप्तोत्थातुका निष्प्रभा। तत्क्षणं च गतं त्वां दृष्ट्वाच हताशम् ॥११॥ अहो कदर्यचित्तो मेऽसिन्ना शठस्तथा। यस्त्वां तदवस्थं दृष्ट्वा निम्प्रीति बा ॥१२॥ इतस्ततश्चेव शठस्यानेया कृपा। अधुने परिणामश्च दुर्जनस्याभवत्किल ॥१३॥ पुनस्ते दृश्यां विद्याधर्या कुभार्या। त्वां तद्विमुदं तव मुक्त्वा यत ॥१४॥ इत्याशा हीनश्च व्योमगो गन्तुमुद्यतः। यावत् पश्यति खे तावत्तदीयं फलम् ॥१५॥ दृष्ट्वा विस्मयवान् गन्धर्वः सखे ह। त्वं कश्च्युतोऽसि कस्माद् वा तव । (१६) किञ्च कथय तत्सर्वं भवतः। इत्युक्तः सतु तस्मै स्ववृत्तान्तमकथयत् ॥ १७॥

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१५२ कथासरित्सागरे

१५२ कथासरित्सागरे भवेयुस्त्रिगुणा एते रथा राजसुताः सुता। सुशर्मा बाहुशाली च विशाखः क्रोधनोऽप्ययम् ॥११८॥ प्रचण्डश्चेत्यमी राजपुत्रा रथचतुर्गुणाः। कुञ्जरो वीरवर्मा च प्रवीरवर एव च ॥११९॥ सुप्रतिज्ञोऽमरा रामश्चण्डदत्तोऽथ नास्तिकः। त्रय सिंहभटव्याघ्रभटशत्रुभटा अपि ॥१२०॥ राजानो राजपुत्राश्च रथाः पञ्चगुणा अमी। उग्रवर्मा स्वयं राजपुत्रः स्यात् षड्गुणो रथः ॥१२१॥ राजपुत्रो विशाखश्च सुतन्तुः सुगमोऽपि च। नरेन्द्रधर्मा चेत्येते रथाः सप्तगुणा मताः ॥१२२॥ महारथः पुनरयं सहस्रायुधपारगः ॥ महारथानां यूथस्य शतानीकस्त्वयं पतिः ॥१२३॥ सुभासहर्षविमलाः सूर्यप्रभवयस्यकाः। महाबुद्ध्यचलाख्यौ च प्रियङ्करशुभङ्करौ ॥१२४॥ एते महारथा यक्षरुचिवर्मरुची तथा। एव विश्वरुचिर्भासः सिद्धार्थश्चेत्यमी त्रयः ॥१२५॥ सूर्यप्रभस्य सचिवाः स्युर्महारथयूथपाः। प्रहस्तश्च महार्थश्च द्वावेतावरथयूथपौ ॥१२६॥ यूथपौ रथयूथानां प्रज्ञाढ्यस्थिरबुद्धिकौ। दानवः सर्वदमनस्तथा प्रमथनोऽप्यसौ ॥१२७॥ धूमकेतुः प्रभहणो वज्रपञ्जर एव च। कालचक्रौ मरुद्गमो रथातिरथा अमी ॥१२८॥ प्रकम्पनः सिंहनादो रथाधिरथयूथपौ। महामायः कामबलः कालकम्पनकोऽप्ययम् ॥१२९॥ प्रहृष्टरोमा चेत्येते चरवारोऽप्यसराधिपाः। पुत्रातिरययूपाधिपतीनामधिपा इमे ॥१३०॥ सूर्यप्रभसमद्वाय प्रभासः सैन्यनायकः। सुमेरुतनयश्चैव धीकुञ्जरकुमारकः ॥१३१॥ द्वौ महारथयूपाधिपतियूथाधिपाविमौ। इत्येतेऽस्मद्बलेऽन्ये च शूराः सर्वे स्वकर्मयुताः ॥१३२॥

अष्टम सम्बर्ग १५१ ये सभी राजकुमार त्रिगुणरथी हैं। सुशर्मा बाहुशाली विशाल क्षोभन और प्रचंड ये राजपुत्र चतुर्गुण रथी हैं। कुंजरी वीरवर्मा प्रवीरवर सुप्रविज्ञ अमरशाम चन्द्रदत्त काशिक आदि राजकुमार एवं सिंहभट व्याघ्रभट और शत्रुभट राजा पंचगुण रथी हैं। यह उपवर्मा नाम का राजकुमार षड्गुण रथी है॥१८-२१॥ राजपुत्र विधाता सुतन्तु, सुगम और नरेन्द्रसखाँ ये सप्तगुण रथी हैं॥२२॥ राजा सहस्रायु का पुत्र महारथी है। यह शतानीक महारथियों के दल का सरदार है॥२३॥ सूर्यप्रभ के मित्र सुमाप इर्य विमल महाबुद्धि मचल प्रियंकर और दुर्मकर महा रथियों के नायक हैं॥२४॥ धर्मरुचि और यज्ञरुचि ये दोनों महारथी हैं। इसी प्रकार विश्वरुचि भास और सिद्धार्थ ये तीनों सूर्यप्रभ के मन्त्री महारथियों के नायक हैं। प्रहस्त और महार्थ ये अतिरथियों के नायक हैं॥२५ २६॥ प्रज्ञाडप और स्थिरबुद्धि ये रथयूथों के नायक हैं। दानव सुवदमन प्रभंजन धूमकेतु, प्रवहण वज्रपंजर, कालवक और मङ्कुवेग रथियों और अतिरथियों के नायक हैं। मरुन्मत्त सिंहनाद ये दोनों रथियों तथा अतिरथियों के सरदार हैं। हे पुत्र महामाय काम्बलिक कालकम्पनक और दृष्टरोमा ये चारो असुरराज महारथियों के अधिपतिओं के अधिपति हैं ॥२७-३१॥ सूर्यप्रभ के समान शक्तिशाली प्रभास और सुभद का पुत्र धीरपुंधरकुमार ये प्रधान षोडश महारथियों के नायक हैं। ये तथा अन्यान्य अपनी-अपनी सेनाओं के साथ साथ हुए अनेक योद्धा हमारी सेना में हैं॥३१ ३२॥

३५४ कथासरित्सागर

३५४ कथासरित्सागर परसैन्येऽधिकाः सन्ति यद्यप्यस्मद्वलस्य ते। न पर्याप्ता भविष्यन्ति सप्रसादे महेश्वरे ॥३३॥ इति यावत्सुनीथं स ब्रवीति स मयासुरः। श्रुतशर्मपितुः पार्श्वादूतोऽन्यस्तावदाययौ ॥३४॥ स चोवाच त्रिकूटाधिपतिरेवं ब्रवीति वः। सङ्ग्रामो नाम शूराणामुत्सवो हि महानयम् ॥३५॥ सस्यैषा सङ्कटा भूमिस्तस्मादागम्यतामितः। यामः कलापग्रामाख्यं प्रदेशं विपुलान्तरम् ॥३६॥ एतच्छ्रुत्वा सुनीथाद्याः सैन्यैः सह तथेति ते। सर्वे कलापग्रामं च सूर्यप्रभयुता ययुः ॥३७॥ श्रुतधर्मादयस्तेऽपि तथैव समरोन्मुखाः। तमेव देशमाजग्मुर्विद्याधरबलैर्वृताः ॥३८॥ श्रुतशर्मबले दृष्ट्वा गजाम्त्सूर्यप्रभादयः। आनाययन्गजानीकं स्वं विमानाधिरोपितम् ॥३९॥ ततः सेनापतिश्चक्रे सेनायां श्रुतशर्मणः। दामोदरो महासूचिव्यूहं विद्याधरोत्तमः ॥४०॥ तस्य पार्श्वे स्वयं तस्थौ श्रुतशर्मा समन्त्रिकः। अग्रे दामोदरश्चासीदन्यत्रान्ये महारथाः ॥४१॥ सैन्ये सूर्यप्रभस्यापि प्रभासोऽनीकिनीपतिः। अर्धचन्द्रं व्यधाद्व्यूहं मध्ये तस्याभवत्स्वयम् ॥४२॥ स कुञ्जरकुमारेण प्रहस्तेनास्य कोष्ठयोः। सूर्यप्रभसुनीथाद्यास्तस्थुः सर्वेऽत्र पृष्ठतः ॥४३॥ सुमेरौ तत्समीपस्थे ससुवासकुमारके। आहन्यन्त रणातोद्यान्युभयोरपि सैन्ययोः ॥४४॥ तावच्च गगनं देवैः संग्रामं द्रष्टुमागतैः। सेन्द्रैः सलोकपालैश्च साप्सरस्करपूरयत् ॥४५॥ आययौ चात्र विश्वेशः शङ्करः पार्वतीयुतः। देवताभिर्गणैर्मूर्तेर्मतिभिश्चाप्यनुद्रुतः ॥४६॥ १ अग्रे सूचिमुखमिव तीक्ष्णं पश्चाच्च विपुलं सेनासन्निवेशं निर्मितवान्। २ अर्धचन्द्राकारः सेनासन्निवेशः।

अष्टम लम्बक ३५५

अष्टम लम्बक ३५५ यद्यपि शत्रु की सेना में सैनिक योद्धा हमसे अधिक हैं, फिर भी शिवजी की कृपा से वे हमारी सेना के लिए पर्याप्त नहीं हैं ॥३३॥ इस प्रकार, मय दानव अपने ज्येष्ठ पुत्र सुनीथ को जब अपनी शक्ति का परिचय दे रहा था, इतने में ही श्रुतशर्मा के पिता द्वारा भेजा हुआ दूत उसके समीप आया ॥३४॥ और कहने लगा—'त्रिकूटाधिपति ने आपको यह सन्देश दिया है कि संग्राम शूर-वीरों का महोत्सव है ॥३५॥ किन्तु, इस संग्राम-महोत्सव के लिए यह भूमि छोटी है, अतः हमलोग विस्तृत मैदानवाले कलापग्राम में चलें इसलिए यहाँ से आप वहीं आवें' ॥३६॥ यह सन्देश सुनकर सुनीथ आदि ने इस बात को स्वीकार किया और सूर्यप्रभ आदि सभी कलापग्राम को गये ॥३७॥ इसी प्रकार युद्ध के लिए तत्पर श्रुतशर्मा आदि भी विद्याधर-सेना के साथ उसी स्थान पर पहुँचे ॥३८॥ श्रुतशर्मा की सेना में हाथियों को देखकर सूर्यप्रभ आदि ने विमानों द्वारा अपने हाथी मँगवाये ॥३९॥ तदनन्तर, श्रुतशर्मा के सेनापति विद्याधरराज दामोदर ने अपनी सेना में महासूचीव्यूह की रचना की ॥४०॥ उस व्यूह के पार्श्व में श्रुतशर्मा स्वयं मन्त्रियों के साथ खड़ा हुआ और उसके अग्रभाग में दामोदर सेनापति था तथा अग्रगण्य विशेष स्थानों में और और विद्याधर-राजा थे ॥४१॥ उधर सूर्यप्रभ के सेनापति प्रभास ने अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया और उसके बीच स्वयं रहा। व्यूह के दोनों कोनों पर कुम्भीरवार और प्रहस्त खड़े थे। सूर्यप्रभ और सुनीथ आदि व्यूह के पृष्ठ भाग में उनकी रक्षार्थ तत्पर हुए ॥४२-४३॥ सुमेरु और श्रुतशर्मकुमार के इन व्यूहों के समीप खड़े होने पर दोनों सेनाओं में रण भेरी बज उठी ॥४४॥ भयङ्कर युद्ध देखने के कौतुक से आये हुए चारणादि देवताओं, सिद्धगणों और अप्सराओं से स्थान भर गया ॥४५॥ पार्वती के साथ शिवजी स्वयं भी आये। उनके पीछे देवता गण, मातृगण एवं भूत प्रेत आदि भी थे ॥४६॥

१५६ कथासरित्सागर

[Page Header] १५६ कथासरित्सागर

[Main Text] आगाच्च भगवान्ब्रह्मा सावित्र्यादिभिरन्वितः । मूर्तेर्वेदैश्च शास्त्रैश्च निखिलैश्च महर्षिभिः ॥४७॥ आजगाम च देवीभिर्लक्ष्मीकीर्तिजयादिभिः । धृतचक्रामुषो देवः पक्षिराजरथो हरिः ॥४८॥ सभार्यः कश्यपोऽप्यागादादित्या वसवोऽपि च । यक्षराक्षसनागेन्द्राः प्रह्लादाद्यास्तथासुराः ॥४९॥ तैरावृते नभोभागे शस्त्रसम्पातदारुणे¹। प्रावर्त्तत महानादः संग्रामः सेनयोस्तयोः ॥५०॥ दिक्चक्रे बाणजालेन घनेनाच्छादिते तदा । अन्योऽन्यशर सङ्घर्षजातानलतडिल्लते ॥५१॥ शस्त्रक्षतगजाश्वौघरक्तधारावपूरिता । वीरकायबृहद्ग्राहा निर्ययुः शोणितापगाः ॥५२॥ नृत्यत्सु सरसं रक्ते नभतो वोत्सवाय सः । शूराणां फेरवाणां च भूतानां चाभवद्रणः ॥५३॥ शान्ते तुमुलसंग्रामे निहतासंख्यसैनिके । लक्ष्यमाणे विभागे च शनैः स्वपरसैन्ययोः ॥५४॥ प्रतिपक्षप्रवीराणां प्रयुद्धानां सुमेरुतः । नामावौ श्रूयमाणे च क्रमात्सूर्यप्रभादिभिः ॥५५॥ पूर्वं सुबाहोर्नृपतेर्विद्याधरपतेस्तथा । अट्टहासाभिधानस्य द्वन्द्वयुद्धमभून्महत् ॥५६॥ सुचिरं युध्यमानस्य तस्य विद्धस्य सायकैः । अट्टहासोऽर्धचन्द्रेण सुबाहोरच्छिनच्छिरः ॥५७॥ दृष्ट्वा सुबाहुं निहतं मुष्टिकोऽभ्यापतत्क्रुधा । सोऽपि तेनाट्टहासेन भुवि बाणहतोऽपतत् ॥५८॥ मुष्टिके निहते भूयः प्रलम्बो नाम भूपतिः । अभिभाष्याट्टहासं तं शरवर्षैरयोधयत् ॥५९॥ अट्टहासोऽपि तत्सैन्यं हत्वा हत्वा च मर्मणि । प्रलम्बमपि तं वीरं रथपृष्ठे न्यपातयत् ॥६०॥

[Footnotes] १ शस्त्राणां संपातेन दारुणः = भीषणः।

[Page-header] षष्ठम लम्बक १५७

[Page-header] षष्ठम लम्बक १५७ सावित्री के साथ ब्रह्मा तथा उनके साथ मूर्तिमान् वेद और महर्षि भी आये ॥४७॥ और लक्ष्मी कीर्ति जया आदि के साथ चक्रधारी भगवान् विष्णु भी गरुड़वाहन पर बैठ- कर वहाँ आये ॥४८॥ अपनी सभी पत्नियों के साथ महर्षि कश्यप द्वादश आदित्य अष्ट वसु, यक्षों, राक्षसों और नागों के राजा एवं प्रह्लाद आदि असुरों के राजा भी युद्ध देखने के लिए वहाँ एकत्र हुए ॥४९॥ इन दर्शकों के कारण आकाश-मण्डल भर जाने पर, शस्त्रों की झनझनाहट से भीषण और महान् कोलाहल दोनों ओर की सेनाओं में फैल गया। सारी दिशाओं के आकाश बादलों के समान बाणों के जाल से छा गये। दोनों ओर से फंकते हुए बाणों के आपस में टकराने पर अग्नि-रूपी बिजली चमकने लगी ॥५०-५१॥ नीचे भूमि पर शस्त्रों से काटे गए हाथी-घोड़ों के वीरों के रक्त की नदियाँ बह चलीं। वीरों के शरीर-रूपी ग्राह उस नदी में बह रहे थे। नाचते कूदते और रक्त की नदी में तैरते तथा चिल्लाते हुए शूरों-वीरों पर टूटते हुए पियासों और भूत-प्रेतों के लिए वह युद्ध अत्यन्त उत्सव और आनन्द का कारण बन गया था ॥५२-५३॥ असंख्य सैनिकों के कट जाने और उस घोर संग्राम के शनै-शनै शान्त होने पर शेष सैनिक धीरे-धीरे अपने और शत्रु के पक्ष को भली भाँति जान सके ॥५४॥ तब सुमेरु द्वारा शत्रु-पक्ष के वीरों के नाम सूर्यप्रभ आदि ने सुने और उन्हें पहचाना ॥५५॥ सबसे पहले उत्तर के एक राजा सुबाहु तथा विद्याधरों के राजा अट्टहास का परस्पर द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥५६॥ बहुत समय तक युद्ध करते हुए और बाणों से छिदे हुए सुबाहु के सिर को अट्टहास ने अर्धचन्द्राकार बाण से काट दिया ॥५७॥ सुबाहु को मृत देखकर मुष्टिक नामक राजा अट्टहास पर टूट पड़ा। अट्टहास ने उसे भी छाती में बाण मारकर धराशायी बना दिया ॥५८॥ मुष्टिक के मारे जाने पर प्रलम्ब नामक राजा ने आगे बढ़कर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिया ॥५९॥ अट्टहास ने उसकी सेना को मारकर और उसके मर्मस्थानों पर प्रहार करके प्रलम्ब को भी रथ पर ही सुला दिया ॥६०॥

१५८ कथासरित्सागर

१५८ कथासरित्सागर वीक्ष्य प्रलम्बं निहतं मोहनो नाम भूपतिः। सक्षिप्त्याट्टहासं च सादयामास सायकैः ॥६१॥ ततोऽट्टहासस्तं छिन्नकोदण्डं हतसारथिम्। दृढप्रहाराभिहतं पातयामास मोहनम् ॥६२॥ दृष्ट्वाऽट्टहासन हतांश्चतुरश्चतुरेष्व तान्। श्रुतशर्मबलं हर्षाद्भुवनाव भयोन्मुखम् ॥६३॥ तद्दृष्ट्वा कुपितो हर्षं सूर्यप्रभवयस्यकः। ससैन्यमभ्यधावत्तमट्टहासं ससैनिकः ॥६४॥ निवार्य च शरैस्तस्य क्षरान्सैन्यं निहत्य च। व्यापाय सारथिं द्वित्रिर्धनुश्छित्वा च सभ्यजम् ॥६५॥ हर्षो यदट्टहासस्य निर्बिभेद शरैः शिरः। तेनासौ रुधिरोद्गारी निपपात रथाद्भुवि ॥६६॥ अट्टहासे हते तादृक् क्षोभोऽभूत्तत्र संयुगे। क्षणादर्धावशेषं तद्येन जज्ञे बलद्वयम् ॥६७॥ निपेतुश्चैवं निहतास्तत्राश्वगजपत्तयः। रणमूर्धनि चोतस्थुः कबन्धा एव केवलम् ॥६८॥ ततो विकृतदंष्ट्राख्यो हर्षं विद्याधरेश्वरः। एत्याट्टहासनिधनक्रुद्धो बाणैरवाकिरत् ॥६९॥ हर्षोऽपि तस्य निर्भिद्य शराञ्छत्रध्वजसारथीन्। हत्वा रथाश्वांश्चिच्छेद शिरो लुलितकुण्डलम् ॥७०॥ हते विकृतदंष्ट्रे तु चक्रवाल इति श्रुतः। राजा विद्याधरो हर्षमभ्यधावदमर्षितः ॥७१॥ स युध्यमानमवधीदसकृच्छिन्नकार्मुकम्। चक्रवालो युधि श्रान्तं हर्षं क्षीर्णपरायधम् ॥७२॥ तत्क्षेत्रेधावेक्ष्य नृपतिं प्रमाथस्तमयोभयत्। सोऽप्यहन्यत तेनाथ चक्रवालेन संयुगे ॥७३॥ तथैव तेन चात्रान्येऽप्येकशो धाविताः क्रमात्। चत्वारश्चक्रवालेन राजमुख्या निपातिताः ॥७४॥ कङ्कटश्च विशाखश्च प्रचण्डश्चास्रुरी सभा। तद्दृष्ट्वाभ्यपतत्तत्रेमाधिभर्त्तो नाम तं नृपः ॥७५॥

द्वादश लम्बक १६१

द्वादश लम्बक १६१ तदनन्तर, प्रलम्ब को मरा हुआ देखकर मोहन नामक राजा ने सामने आकर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिया ॥६१॥ अट्टहास ने धनुष काटकर और सारथी को मारकर दृढ़ प्रहारों द्वारा मोहन नामक राजा को भी गिरा दिया ॥६२॥ रण-चतुर अट्टहास द्वारा चार वीरों के मारे जाने पर श्रुतशर्मा की सेना विजय मनाती हुई हर्ष से कोलाहल करने लगी ॥६३॥ यह देखकर हर्य नामक क्रुद्ध सूर्यप्रभ के मित्र ने अपनी सेना के साथ अट्टहास का सामना किया। अपने बाणों से उसके बाणों को हटाकर दो बाणों से उसके सारथी और तीन से उसके धनुष और ध्वजा को काट दिया ॥६४-६५॥ उसके पश्चात् हर्य ने बाणों से अट्टहास का सिर काट डाला जिससे रक्त उगलता हुआ अट्टहास रथ से भूमि पर गिर पड़ा ॥६६॥ अट्टहास के मरते ही ऐसा घमासान युद्ध मचा कि क्षण-भर में ही दोनों ओर की सेना आधी आधी रह गई ॥६७॥ सारी रणभूमि में हाथी घोड़े और पैदल सैनिक कटकर मर रहे थे। केवल सिरों से हीन धड़ ही धड़ खड़े दीख रहे थे ॥६८॥ तब अट्टहास की मृत्यु से क्रुद्ध हुआ विकृतदंष्ट्र नामक विद्याधरराज ने सामने आकर हर्य को बाणों से घेर लिया ॥६९॥ हर्य ने भी उसके बाणों का जाल काटकर उसकी ध्वजा और सारथी को भी काटा और उसके घोड़ों को मारकर सुन्दर कुंडलवाले उसके सिर को भी काट डाला ॥७०॥ विकृतदंष्ट्र के मारे जाने के कारण चक्रवाल नामक विद्याधर-राजा क्रोध से हर्य के प्रति दौड़ा ॥७१॥ चक्रवाल ने भी बार-बार हर्य के धनुष को काटा और दूसरे शस्त्र को उठाने के पहले ही उसने थके हुए हर्य को मार दिया ॥७२॥ यह देखकर प्रभास नामक राजा ने चक्रवाल को ललकारा किन्तु चक्रवाल ने सामने आये हुए चार मुख्य राजाओं को क्रमशः मार डाला ॥७३-७४॥ जिनके नाम थे कंकट, विशाल प्रचंड और अंगुरी। यह देखकर निर्घात नाम का राजा क्रोध से चक्रवाल पर टूट पड़ा ॥७५॥

५५ कथासरित्सागर

५५ कथासरित्सागर तौ चक्रवालनिर्घातौ युध्यमानौ चिरं क्रमात् । अन्योन्यचूर्णितरथावभूतां पादचारिणौ ॥७६॥ असिचक्रधरौ द्वावप्याकोपाभिमुखौ च तौ। खड्गाहतिद्विधाभूतसूर्धानौ भुवि पेततुः ॥७७॥ विपक्षौ वीक्ष्य तौ वीरौ विपण्णेऽपि बलद्वये । रणाग्रमाययौ विद्याधरेन्द्रः कालकम्पनः ॥७८॥ राजपुत्रोऽभ्यधावच्च तं प्रकम्पननामकः । स कालकम्पनेनाशु क्षणात्तेन न्यपात्यत ॥७९॥ तस्मिन्निपतिते तस्य पञ्चान्यऽभ्यपतन् रथाः । जालिकश्चण्डदत्तश्च गोपकः सोमिलोऽपि च ॥८०॥ पितृशर्मा च सर्वे ते शराँस्तस्मिन् सहासृजन्। स तु पञ्चापि तान्कालकम्पनो विरथीकृतान् ॥८१॥ जघान युगपद्भिष्मशराचैर्हृदि पञ्चभिः। प्रणष्टुं खेचरास्तेन व्यषीदन् मनुजासुराः ॥८२॥ ततोऽभ्यधावन्नपरे चत्वारस्त रथाः समम् । उमसकः प्रथस्तश्च विस्रम्भकधुरन्धरौ ॥८३॥ स तानप्यवधीत्कालकम्पनो लीलयाखिलान्। तथैव धावितानन्यान्क्रुद्धांश्चिजघान सः ॥८४॥ तेजिकं गेयिकं चैव वेगिलं शालिलं तथा। भद्रङ्कुरं दण्डिनं च भूरिसैन्यान् महारथान् ॥८५॥ अपरांश्च पुनः पञ्च सोऽवधीन्मिलितान्युधि । भीमभीषणकुम्भीरविकटाक्षविलोचनान् ॥८६॥ तद्दृष्ट्वा कदनं कालकम्पनेन कृतं रणे। भयावत्सुगणो नाम राजपुत्रोऽस्य सम्मुखः ॥८७॥ स तेन तावद्विदधे समं युद्धमुभावपि । हताश्वसारथी यावद्विरथौ तौ बभूवतुः ॥८८॥ ततस्तं खड्गयुद्धेन सुगणं पादचारिणम्। स कालकम्पनः पादचार्येव भुवि जघ्निवान् ॥८९॥ तावच्च मानुषविद्याधराणां सममाहवम्। असम्भाव्यं विलोक्येव क्षिप्रमस्तं प्रययौ रविः ॥९० ॥

षष्ठम लम्बक १६१

षष्ठम लम्बक १६१ वे चक्रवाल और निर्घात परस्पर घमासान युद्ध करते हुए रथ घोड़े सारथी आदि के मारे जाने पर पैदल ही युद्ध करने लगे ॥७६॥ ढाल और तलवार से युद्ध करते हुए और क्रोध से भिड़े हुए, परस्पर के ही खड्ग प्रहार से कटे हुए सिरोंवाले दोनों ही भूमि पर गिर पड़े ॥७७॥ उन दोनों वीरों को गिरे हुए देखकर दोनों ओर की सेनाएँ निराश हो गई तब विद्याधरों का राजा कालकम्पन रणभूमि में सामने आया ॥७८॥ उधर से प्रकंपन नाम का राजकुमार उसके सामने आया। उसे कालकम्पन ने क्षण-भर में ही गिरा दिया ॥७९॥ उसके गिरते ही दूसरे पाँच महारथी मैदान में आये। वे ये—वालिक दंडदत्त नौपक, सोमिल और पितृशर्मा। सभी ने एक साथ कालकम्पन पर बाणों की बौछार की किन्तु उस काल- कम्पन ने पाँचों को रथहीन कर दिया ॥८०-८१॥ और, एक साथ ही पाँच बाणों से पाँचों के कलेजे बींध दिये। इससे खेचर (विद्याधर) तो प्रसन्न हुए और मनुष्य और असुर दुःखी हुए ॥८२॥ तब चार रथ एक साथ उसकी ओर दौड़ पड़े। वे चारों रथों में थे—उग्रतक्क प्रधस्त विप्रंचक और धुरंधर। कालकम्पन ने उन चारों को भी सहज में ही मार गिराया। और, उसी प्रकार दौड़कर आये हुए दूसरे छह महारथियों को भी मार डाला ॥८३-८४॥ तदनन्तर, कालकम्पन ने युद्ध में सामने आये हुए और पाँच महारथियों को भी मार दिया। वे पाँच महारथी थे—तेजिक मेधिक वेगिल शालित भयंकर और पंडी। इनके साथ बड़ी-बड़ी सेनाएँ भी मारी गई ॥८५॥ इसके अतिरिक्त युद्ध में आये हुए भीम भीषण कुम्भीर, विकट और विलोचन नामक पाँच महारथियों को भी धराशायी कर दिया ॥८६॥ इस प्रकार, कालकम्पन द्वारा किये जानेवाले संहार को देखकर सुपद्म नामक राजपुत्र युद्ध में उसके सामने आया ॥८७॥ वे दोनों परस्पर युद्ध करते हुए सारथी और रथ से विहीन हो गये ॥८८॥ तब पैदल युद्ध करते हुए कालकम्पन ने सुपद्म को तलवार से काटकर भूमि पर गिरा दिया ॥८९॥ इतने में ही मनुष्यों के साथ विद्याधरों के युद्ध को अयुक्त समझकर, अतएव मानों खिन्न होकर सूर्य भगवान् अस्ताचल को चले गये ॥९०॥ ४१

रक्ताम्बुपूरभरितं न परं समराङ्गणम्। यावत्सन्ध्याकृतपदं ययौ व्योमापि शोणताम् ॥९१॥ कबन्धैः सह भूतेषु सन्ध्यान्नृत्तोद्यतत्विष । संहृत्य युद्धं ययतुः स्वनिवेशाय तद्वले ॥९२॥ श्रुतशर्मबलं तस्मिन्दिने वीरा हतास्त्रयः । त्रयस्त्रिंशत्प्रवीरांस्तु बले सूर्यप्रभे हताः ॥९३॥ तत बान्धवमित्रादिनिधनेन सुदुर्मना । सूर्यप्रभस्त्रियामां तामासीदन्तःपुरैर्विना ॥९४॥ अनिद्र एव सचिवैः सह सङ्ग्रामसत्कथा । तास्ताः कुर्वन्निनायतां पुनर्युद्धोन्मुखो निशाम् ॥९५॥

स्त्रीषु युद्धचर्चा सूर्यप्रभचर्चा च

तद्भार्याश्च मिलन्ति स्म हतबान्धवदुःखिताः । एकत्र तस्यां रजनावन्योन्याश्वासनागताः ॥९६॥ रुदितावसरेष्वत्र कथा नानाविधा व्यधुः । स्त्रीणां न स क्षणो यत्र न कथा स्वपराश्रया ॥९७॥ तत्प्रसङ्गेन तत्रैका राजपुत्रीदमब्रवीत् । आश्चर्यमार्यपुत्रोऽद्य कथं सुप्तो निरञ्जनः ॥९८॥ तच्छ्रुत्वा व्याजहाराया सङ्ग्रामे स्वजनक्षयात् । दुःखितो ह्यार्यपुत्रोऽद्य रमते स्त्रीजने कथम् ॥९९॥ ततोऽपरा ब्रवीति स्म प्राप्नोत्यभिनवां यदि । वरकन्यां स तद्दुःखं विस्मरेत्यधुनैव तत् ॥१००॥ अथेत्तराब्रवीन्मैवं यद्यपि स्त्रीषु लम्पटः । तथापि न स दुःखेऽस्मिन्नीदृशः स्यात्तथाविधः ॥१०१॥ इति तासु वदन्तीषु जगादैका सविस्मयम् । धूत स्त्रीलम्पटः कस्मादार्यपुत्रो यतादृशः ॥१०२॥ आहितास्वपि भार्यासु भूयसीषु नवां नवां । अनिशं राजपुत्रीर्यस्तं शृङ्गैश्चैव तुष्यति ॥१०३॥ एतच्छ्रुत्वा विदग्धैका तासु नाम्ना मनोरथी । उवाच श्रूयतां येन राजानो बहुवल्लभाः ॥१०४॥

अष्टम लम्बक १६३

अष्टम लम्बक १६३ रक्त-रूपी जल से भरी हुई युद्ध-भूमि ही केवल लाल नहीं हुई, प्रत्युत सन्ध्या के कारण आकाश भी लाल हो गया ॥ ९१ ॥ तदनन्तर भूत-प्रेत मृत-कबन्धों¹ के साथ आनन्द-नृत्य करने लगे और दोनों ओर की सेनाएँ भी युद्ध समाप्त करके अपने-अपने शिविरों को लौट गईं ॥९२॥ उस दिन के युद्ध में श्रुतशर्मा की सेना के तीन वीर मारे गये और सूर्यप्रभ की सेना के छब्बीस वीर काम आये ॥९३॥ इस प्रकार, बन्धुओं मित्रों और वीर सैनिकों के मारे जाने के कारण विप्रचित्त सूर्यप्रभ उस रात्रि को रानियों के बिना ही रह गया ॥९४॥ और, निद्रा-रहित होकर युद्ध-सम्बन्धी आवश्यक विचार करते हुए उसने रात्रि व्यतीत की ॥९५॥ रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा उसी रात में मृत बन्धुओं के कारण दुःखित और एक दूसरे को आश्वासन देने के लिए आई हुई उसकी पत्नियाँ भी एक स्थान पर आकर मिलीं ॥९६॥ उस शोक मनाने और रात बीतने के समय में भी वे विभिन्न प्रकार की बातें परस्पर करने लगीं। स्त्रियों का ऐसा कोई भी क्षण नहीं जाता जिसमें वे अपनी या पराई चर्चा न करें ॥९७॥ इसी प्रकार की चर्चा के प्रसंग में एक राजकुमारी बोली—आश्चर्य है कि आज आर्यपुत्र (सूर्यप्रभ) अकेले कैसे सो गये ? ॥९८॥ यह सुनकर दूसरी ने कहा—'युद्ध में अपने प्रिय व्यक्तियों की मृत्यु हो जाने के कारण दुःखित आर्यपुत्र पत्नियों के साथ आमोद-प्रमोद कैसे करते ? ॥९९॥ यह सुनकर तीसरी बोल उठी—यदि आज ही उन्हें नवीन सुन्दरी कन्या मिल जाती तो वे सारे स्वजनों का दुःख भूल जाते ॥१००॥ तब चौथी ने कहा कि यद्यपि आर्यपुत्र स्त्रियों में अधिक आसक्ति रखते हैं किन्तु ऐसे कष्ट के समय वे ऐसा कार्य कैसे कर सकते हैं ?। वे सब परस्पर जब इस प्रकार की बातें कर रही थीं तब एक स्त्री ने आश्चर्य के साथ कहा—यह तो बताओ कि हमारे आर्यपुत्र भला इतने स्त्री-लम्पट क्यों हैं ? ॥१०१–१०२॥ बहुत-सी स्त्रियों के रहते हुए भी वे दिन-रात नई-नई स्त्रियों को ही ग्रहण करके सन्तुष्ट होते हैं ॥१०३॥ यह सुनकर उनमें से एक चतुरा मनोवती नाम की स्त्री बोली—'सुनो राजा लोग बहुत पत्नियोंवाले क्यों होते हैं यह मैं बताती हूँ ॥१०४॥ १. सिर से रहित धड़ = मृत कलेवर।