कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर चन्दनोदकसंसिक्तचारुरम्या पदे पदे। कटाक्षैः पौरनारीणां प्रकीर्णेन्दीवरामिव ॥७४॥ तत्र सम्बन्धिजामात्रोः कृत्वा वीरभटस्तयोः। पूजां यथावत्तनया-विवाहप्रक्रियां व्यधात् ॥७५॥ विशुद्धस्य हि भाराणां¹ सहस्रं काञ्चनस्य च। भृतं च शतमुष्ट्राणां रत्नाभरणभारकैः ॥७६॥ उष्ट्रपृच्छतशतीं नानावस्त्रभाराभिपूरिताम्। वाजिनां च सहस्राणि सप्त पञ्च च दन्तिनाम् ॥७७॥ रूपाभरणयुक्तानां सहस्रं वारयोषिताम्। वध्वां दुहित्रोः प्रददौ राजा वीरभटस्तयोः ॥७८॥ सूर्यप्रभस्य जामातुस्तत्पितुश्च तयोः पुनः। उपहारं ससद्रत्नैश्चकार विपुलैस्तथा ॥७९॥ समन्त्रिणो यथावच्च प्रहस्तादीनमानयत्। चकार सोत्सवं हृष्यत्स्वेषनगरीजनम् ॥८०॥ सूर्यप्रभश्च तत्रासीत्पितृयुक्तः प्रियासखः। तत्कालं विविधाहारपानगेयादिभोगभुक् ॥८१॥ तावच्च तत्र रम्भस्य सकाशाद्व्यधरात्रतः। आजगामद्रुतं स चास्थाने जगाद स्वप्रभोर्वचः ॥८२॥ विद्याबलाभिलिप्सेन युवराजेन न श्रुतः। सूर्यप्रभेण तनयाहरणोत्थः पराभवः ॥८३॥ अद्य च ज्ञातमस्माभिर्यद्वीरभटभूभृतः। प्रतिपन्ना स्नुषा स्थाने समानव्यसनस्य नः ॥८४॥ तच्चैव चानुमन्यध्वं यद्यस्मत्सन्धिमाशु तत्। इहाप्यागम्यतां नो चेन्मृत्युनो भोऽत्र निष्कृतिः ॥८५॥ तच्छ्रुत्वा तं च सम्मान्य दूतं वीरभटार्चितः। प्रहस्य सोऽब्रवीद्राजा तत्र चन्द्रप्रभः पुनः ॥८६॥ त्वमेव गच्छ तं रम्भमस्मद्वाक्यादिदं वद। किं तप्यसे वृथा भावी चक्रवर्ती हि निर्मितः ॥८७॥ विद्याधराणां विष्ण्वेनैष सूर्यप्रभाधुना। यस्यभाग्यगुणाद्यादन् भार्या सिद्धैरपाहृता ॥८८॥ १ भारः प्राचीनकालप्रचलितो मानः । 'भारः स्याद् विशतितुला' इत्यमरः। तान्त्रिक मानानुसारं सार्द्धद्विमन (२॥ मन) मितं प्रदेशेषु भारवाहकेन वोढुं शक्यते ।
अष्टम लम्बक २४१
[Header] अष्टम लम्बक २४१
[Body] इस अवसर पर, सारी नगरी की गलियाँ और सड़कें चन्दन के जल से सींची गई थीं और नागरिक रमणियों के सकटाक्ष नयन मार्गों उनपर फैले हुए थे ॥७४॥
राजभवन में जाकर वीरभट ने अपने समधी और जामाता का विधिवत् स्वागत-सत्कार करके शास्त्रानुसार कन्यादान की विधि सम्पन्न की। दहेज में विशुद्ध स्वर्ण के दस भार१ रत्न और आभूषणों से लदे हुए एक सौ ऊँट और विविध प्रकार के वस्त्रादि से लदे हुए पाँच सौ ऊँट, साठ हजार घोड़े, पाँच हजार हाथी तथा सुन्दर आभूषणों से सजी हुई एक हजार रूपवती स्त्रियाँ (दासियाँ) उन दोनों कन्याओं के विवाहोत्सव पर दीं ॥७५-७८॥
इसके अतिरिक्त समधी और जामाता का अच्छे-अच्छे रत्नों और वस्त्राभरणों से तथा भूमिदान से विशेष सत्कार किया ॥७९॥
उसी प्रकार अति प्रसन्न नागरिक जनों के साथ राजा के प्रहस्त आदि मन्त्रियों का भी विधिपूर्वक सत्कार किया ॥८०॥
इस अवसर पर माता-पिता के साथ सूर्यप्रभ भी विविध प्रकार के भोजन पान गान वाद्य आदि का आनन्द लेने लगा ॥८१॥
इसी बीच रम्भ के राजा वज्रप्रभ की ओर से दूत आया और दरबार में बैठे हुए सूर्यप्रभ से अपने स्वामी का सन्देश कहा- 'हे महाराज ! विद्याओं के बल से मदोन्मत्त सूर्यप्रभ ने मेरा कन्या हरण-रूपी (अपमान) किया है ॥८२-८३॥
ज्ञात हुआ है कि मेरे ही समान विपत्ति (कन्या-हरण) वाले राजा वीरभट से आज आपने मित्रता स्वीकार की है। इसी प्रकार, आप मेरे साथ सन्धि करें और यहाँ पधारें, अन्यथा अपने प्राण त्याग द्वारा ही मैं अपने अपमान का प्रायश्चित्त करूँगा' ॥८४-८५॥
यह सन्देश सुनकर तथा दूत का सत्कार करके राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त से कहा- 'तुम जाओ और हमारी ओर से राजा रम्भ को कहो कि वह व्यर्थ सन्ताप न करें। सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है। तुम्हारी तथा अन्य राजाओं की कन्याएँ इसी की पत्नियाँ हैं, इस प्रकार शिवजी ने आदेश दिया है ॥८६-८७॥
[Footer] १. भार, प्राचीन समय का एक परिमाण जो दो मन से कुछ अधिक था।—अनु. ३१
२४२ कथासरित्सागर
२४२ कथासरित्सागर तत्प्राप्ता से सुता स्यानं कर्मणस्त्व तु प्रार्थितः । तत्प्रीयस्व सखा नस्त्वमेष्यामोऽत्राप्यमी वयम् ॥८९॥ इति राज्ञोक्तसन्देशः प्रहस्तो गगनेन सः । गत्वा प्रहरमात्रेण वज्ररात्रमवाप सत् ॥९०॥ तत्र रम्भाय सन्देशमुक्त्वा तेनानुमोदितः । तथवागत्य सोऽवादीद्राज्ञे चन्द्रप्रभाय तत् ॥९१॥ चन्द्रप्रभोऽथ सचिवं प्रभासं प्रप्य शाकलात् । आनाययत्तां रम्भस्य पार्श्वे तारावलीं सुताम् ॥९२॥ ततो ययौ विमानेन सह सूर्यप्रभेण सः । राज्ञा वीरभटेनापि सर्वैश्चान्यै सुपूजितः ॥९३॥ वज्ररात्रं च सम्प्राप मार्गोन्मुखजनाकुलम् । रम्भेणाभ्युद्गतस्तस्य राजधानीं विवेश सः ॥९४॥ तत्र रम्भोऽप्यसौ क्लृप्तविवाहप्रक्रियोत्सवः । असङ्ख्यहस्त्यश्वरत्नादि दुहितुर्ददौ ॥९५॥ जामातरं च स तथा सूर्यप्रभमुपाचरत् । यथा यस्य निजा भोगा सर्वे विस्मृतिमाययुः ॥९६॥ यावच्च तत्र ते तिष्ठन्त्युत्सवानन्दिताः सुखम् । तावद्रम्भान्तिकं काञ्चीनगर्या दूत आययौ ॥९७॥ स तस्माच्छ्रुतसन्देशो रम्भश्चन्द्रप्रभं नृपम् । प्राह काञ्चीश्वरो राजा कुम्भीराख्योऽस्ति मेऽग्रजः ॥९८॥ तेनाप्त प्रेषितो मेऽद्य दूतो वक्तुमिदं वचः । मम सूर्यप्रभेणाद्य सुता नीता ततस्त्व ॥९९॥ कृतं चाद्य त्वया सख्यं तै सहति मया श्रुतम् । तन्ममापि तथैव त्वं सख्यं तैः सह साधय ॥१००॥ आयान्तु ते मम गृहं यावत्सूर्यप्रभाय ताम् । स्वहस्तेनार्पयामीह सुतां वरणसेनिकाम् ॥१०१॥ इत्येपाम्यर्थना तस्य क्रियतामिति वादिनः । रम्भस्य शुश्रुवे चन्द्रप्रभो राजा तदा वचः ॥१०२॥ प्रहस्तं प्रेष्य च क्षिप्रं शाकलात्तामनाययत् । पुराद्व्रजसेनां स कुम्भीरस्यान्तिकं पितुः ॥१०३॥
अष्टम लम्बकं २४५
अष्टम लम्बकं २४५ अतः, तुम्हारी कन्या उचित स्थान पर पहुँच गई है। तुम कठोर प्रकृति के व्यक्ति हो अतः तुमसे कन्या की याचना नहीं की गई। अब तुम प्रसन्न हो जाओ तुम हमारे मित्र हो हम लोग भी आ रहे हैं ॥८८-८९॥ चन्द्रप्रभ का यह सन्देश लेकर प्रहस्त आकाश-मार्ग से एक ही प्रहर में मयराष्ट्र जा पहुँचा। वहाँ राजा रम्भ को सन्देश देकर और उसकी स्वीकृति के साथ लौटकर उसका सन्देश राजा चन्द्रप्रभ को सुनाया ॥९०-९१॥ चन्द्रप्रभ ने दूसरे मन्त्री प्रभास को भेजकर शशाङ्क नगर से रम्भ की पुत्री तारावली को रम्भ के पास पहुँचा दिया ॥९२॥ तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ सभी बरातियों ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट तथा साथ आये हुए अन्य सभी व्यक्तियों के साथ चला और सबके साथ मयराष्ट्र डेरा में जा पहुँचा। तदनन्तर, वहाँ राजा रम्भ द्वारा उनकी अगवानी किये जाने के पश्चात् उसकी राजधानी में गया ॥९३-९४॥ वहाँ विवाह की तैयारी किये हुए राजा रम्भ ने उत्सव किया और सोना रत्न वस्त्र आभूषण आदि कन्या के साथ दिये और जामाता सूर्यप्रभ का भी विशेष रूप से सेवा-सत्कार किया जिससे वह अपने भोगे हुए उत्तमोत्तम सुखों को भी भूल गया ॥९५-९६॥ विवाहोत्सव का आनन्द लेते हुए जब वे वहाँ निवास कर रहे थे उसी समय कांची नगरी के राजा कुम्भीर का दूत राजा रम्भ के समीप आया ॥९७॥ उस दूत का सन्देश सुनकर राजा रम्भ ने महाराज चन्द्रप्रभ से कहा कि कांची के राजा मेरे बड़े भाई कुम्भीर हैं। उन्होंने मेरे पास अपने विश्वस्त दूत को भेजकर यह सन्देश दिया है कि सूर्यप्रभ ने पहले मेरी कन्या का अपहरण किया तब तुम्हारी कन्या का। मैंने अभी सुना है कि तुमने उसके साथ मित्रता कर ली है। अतः अपने ही समान उसके साथ मेरी भी मित्रता करा दो ॥९८-१००॥ वे लोग मेरे घर पर आवें तो मैं भी अपनी कन्या वरप्रभा को अपने हाथ से उनके लिये अर्पण करूँ उनकी यह प्रार्थना स्वीकार करें। ऐसा कहते हुए राजा रम्भ की बात को चन्द्रप्रभ ने स्वीकार किया और प्रहस्त को शशाङ्क नगर भेजकर वरप्रभा को उनके पिता कुम्भीर के पास कांची पहुँचा दिया ॥१०१-१०३॥
२४४ कथासरित्सागर
२४४ कथासरित्सागर अन्येद्युश्च विमानेन स च सूर्यप्रभश्च सः। रम्भो वीरभटः सर्वे काञ्चीं ते सानुगा ययुः ॥१०४॥ कुम्भीराभ्युद्गतास्तां च नानारत्नचितां पुरीम्। काञ्चीं काञ्चीमिव भुवः प्राविशन्गुणगुम्फिताम् ॥१०५॥ तत्र तां विधिना दत्त्वा सुतां सूर्यप्रभाय सः। वरबन्धोरदान्भूरि कुम्भीरो द्रविणं तदा ॥१०६॥ निर्वृत्ते च विवाहेऽत्र भुक्तोत्तरसुखस्थितम्। चन्द्रप्रभमुवाचेदं प्रहस्तः सर्वसन्निधौ ॥१०७॥ देव श्रीकण्ठविषये प्रद्युम्नं गतवानहम्। तत्र प्रसङ्गपृष्टो मां कान्तिसेननृपोऽब्रवीत् ॥१०८॥ सूर्यप्रभो ममादाय सुतां कान्तिमतीं हृताम्। गृहेमेतु करिष्यामि विधिवत्तस्य सत्क्रियाम् ॥१०९॥ नो चेत्त्यक्ष्याम्यहं देहं दुहितृस्नेहमोहितः। इत्युक्तस्तेन तत्राहं प्रस्तावे च मयोदितम् ॥११०॥ एवमुक्ते प्रहस्तेन राजा चन्द्रप्रभोऽभ्यधात्। गच्छ कान्तिमतीं तर्हि तां प्रापय तदन्तिकम् ॥१११॥ ततस्तत्र वयं याम इत्युक्तस्तेन भूभृता। तदैव मनसा गत्वा प्रहस्तस्तत्तथाकरोत् ॥११२॥ प्रातश्च ते सकुम्भीराः सर्वे चन्द्रप्रभादयः। श्रीकण्ठविषयं जग्मुर्विमानेन खगामिना ॥११३॥ तत्राप्याप्रगतो राजा कान्तिसेनः स्वमन्दिरम्। तावत्प्रबोद्य दुहितुर्व्यधादुद्वाहमङ्गलम् ॥११४॥ ददौ तस्यै तदा कान्तिमत्त्यै सूर्यप्रभाय च। माद्यद्यजननं राजानमितं रत्नसञ्चयम् ॥११५॥ तत्र स्थितेषु तच्चात्र नानाभोगोपसेविषु। सर्वेषु दूतः कौशाम्ब्या आगत्यैवमभाषत ॥११६॥ जनमेजयभूपालो ब्रवीति भवतामिदम्। हृता केनापि मन्दिरे परपुष्टेति मे सुता ॥११७॥
अष्टम लम्बक २४५
अष्टम लम्बक २४५
दूसरे दिन वह राजा चन्द्रप्रभ सूर्यप्रभ रम्भ वीरभट आदि अपने अनुचरों के साथ विमान द्वारा राजा कुम्भीर की सुन्दर बुर्जों से युक्त तथा अनेक रत्नों से भरी हुई कांची नगरी पहुँच गया ॥१०४-१०५॥ वहाँ पर राजा कुम्भीर ने सूर्यप्रभ को अपनी कन्या तथा उसके साथ बहुत-सा धन दिया ॥१०६॥ विवाहोत्सव सम्पन्न होने पर भोजन आदि से निवृत्त होकर, विश्राम करते हुए चन्द्रप्रभ को प्रहस्त ने सभी के सामने कहा—'महाराज मैं भ्रमण करता हुआ श्रीकंठ देश की ओर गया था वहाँ प्रसंगवश मिले हुए राजा कान्तिसेन ने कहा कि सूर्यप्रभ मेरी कन्या कान्तिमती को लेकर मेरे घर पर आवें मैं उनका विधिपूर्वक सत्कार करूँगा ॥१०७-१०९॥ अन्यथा कन्या के स्नेह से विह्वल होकर मैं शरीर-त्याग कर दूँगा। इस प्रकार, उसके कहने पर प्रस्ताव-रूप से आपसे मैंने निवेदन कर दिया ॥११०॥ प्रहस्त के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने कहा—'तो जाओ और उसकी कन्या कान्तिमती को उसके पास पहुँचाओ ॥१११॥ इसके पश्चात् हमलोग वहाँ आ रहे हैं। राजा के ऐसी आज्ञा देने पर प्रहस्त ने कान्तिमती को पिता कान्तिसेन के समीप पहुँचा दिया ॥११२॥ प्रातःकाल ही वे चन्द्रप्रभ आदि सभी राजा कुम्भीर के सहित आकाशचारी विमान द्वारा श्रीकंठ देश को गये ॥११३॥ वहाँ भी राजा कान्तिसेन ने सबकी अगवानी करके अपनी कन्या का विवाह महास- समारोह के साथ सम्पन्न किया ॥११४॥ तदनन्तर, पुत्री कान्तिमती और जामाता सूर्यप्रभ को रत्नों का अमूल्य संग्रह प्रदान किया जिसे देखकर सभी राजा आश्चर्य-चकित हो गये ॥११५॥ जब वे सब राजा कान्तिसेन के यहाँ विविध प्रकार के स्वागत-सत्कार का आनन्द ले रहे थे तभी सबके सामने कौशाम्बी नगरी से आये हुए दूत ने इस प्रकार कहा—॥११६॥ राजा जनमेजय आपसे यह कहते हैं कि 'कुछ दिन हुए मेरी कन्या वरपुष्टा का किसीने अपहरण कर लिया था ॥११७॥
२४६ कथासरित्सागर
२४६ कथासरित्सागर ज्ञातं चेहाद्य मत्प्राप्ता हस्तं सूर्यप्रभस्य सा । तया सह सोऽस्माकं गृहमायात्वशङ्कितः ॥११८॥ सत्कृत्य प्रेषयिष्यामि सभार्यं च यथाविधि । अन्यथा शत्रवो यूयं मम युष्माकमप्यहम् ॥११९॥ इत्युक्त्वा स्वामिवचनं दूतस्तूष्णीं बभूव सः । अथ चन्द्रप्रभः सर्वानैकान्ते क्षितिपोऽब्रवीत् ॥१२०॥ कथमद्य सदर्पोक्तैर्गम्यते तस्य वेश्मनि । तच्छ्रुत्वा तस्य सिद्धार्थनामा मन्त्र्येवमभ्यधात् ॥१२१॥ नान्यथा देव मन्तव्यं वक्तुमद्य हि सोऽर्हति । स हि राजा महादाता पण्डितः सत्कुलोद्गतः ॥१२२॥ शूरोऽश्वमेधयाजी च सदैवान्यपराजितः । विरुद्धं किं नु तेनोक्तं यथावस्तुमभिधायिना ॥१२३॥ शत्रुतोद्वाह्यता मा वा सा प्राप्तप्रकृतेऽधुना । तद् गन्तव्यं गृहे तस्य सत्यसन्धो नृपो हि सः ॥१२४॥ तदपि प्रेष्यतां कश्चित्तस्य चित्तोपसम्भये । इति सिद्धार्थवचनं सर्वे ददृशुरत्र ते ॥१२५॥ ततो जिज्ञासितुं चन्द्रप्रभस्तं जनमेजयम् । प्रहस्तं व्यसृजत्तं च दूतं तस्याप्यानयत् ॥१२६॥ प्रहस्तश्च स गत्वा तं कौशाम्बीशं ससंविदम् । विधायानीय तल्लेखं चन्द्रप्रभमतोषयत् ॥१२७॥ सोऽपि राजा तमेवाशु प्रहस्तं प्रेष्य धान्ध्रकात् । जनमेजयपार्श्वं तां परपुष्टामनाययत् ॥१२८॥ ततश्चन्द्रप्रभाद्यास्ते सूर्यप्रभपुरोगमाः । सकान्तिसेना कौशाम्बीं विमानेनागमन् नृपाः ॥१२९॥ तत्र सम्बन्धिजामातृमुख्यान् प्रत्युद्गमादिना । प्रहृस्तान्युपभामास स राजा जनमेजयः ॥१३०॥ ददौ च कृत्वा दुहितुर्विवाहविधिसत्क्रियाम् । पञ्च हस्तिसहस्राणि लक्षं च वरवाजिनाम् ॥१३१॥ रत्नकाञ्चनवस्त्रेषुपूगगगपूरित । मारेर्भतानामुष्ट्राणां सहस्राण्यपि पञ्च सः ॥१३२॥
अष्टम लम्बक २४७
अष्टम लम्बक २४७ जब ज्ञात हुआ है कि वह सूर्यप्रभ के हाथ लगी है। अतः वह सूर्यप्रभ उस कन्या (परपुष्टा) के साथ निःशंक होकर हमारे घर आवें। मैं उन्हें विधिपूर्वक सत्कृत करके पत्नी के साथ उन्हें भेज दूंगा। यदि आपने ऐसा न किया तो आप मेरे शत्रु हैं और मैं आप लोगों का शत्रु हूँ—॥११९८-११९९॥ अपने स्वामी के इस सन्देश को कहकर दूत चुप हो गया तब चन्द्रप्रभ ने अपने सभी सम्बन्धी राजाओं से कहा—॥१२० ॥ 'इस प्रकार घमण्ड की बातें करनेवाले उसके घर में कैसे जाया जाय।' यह सुनकर राजा का सिद्धार्थ नामक मन्त्री बोला—'महाराज आपको उसके कहने का बुरा न मानना चाहिए। वह ऐसा कहने के योग्य है। वह राजा जनमेजय महान् दानी बड़ा विद्वान् और अच्छे ऊँचे पांडव कुल में उत्पन्न हुआ है। शूर-वीर है और अश्वमेध यज्ञ कर चुका है। वह कभी किसी से पराजित नहीं हुआ। इस प्रकार, यथार्थता को देखते हुए उसने जो भी सन्देश दिया है वह कुछ भी अनुचित नहीं है॥१२१-१२३॥ उसने जो शत्रुता की बात कही वह दम्भ के लिए है। अतः उसके घर पर चलना चाहिए। वह राजा सुप्रतिष्ठ है॥१२४॥ फिर भी उसका अभिप्राय जाँचने के लिए आप किसी दूत को भेजिए'। मन्त्री सिद्धार्थ के इस प्रकार के वचनों पर सभी ने श्रद्धा प्रकट की ॥१२५॥ तब जिज्ञासा का समाधान करने के लिए चन्द्रप्रभ ने जनमेजय के समीप सिद्धार्थ नामक दूत को भेजा और जनमेजय के दूत का भी सम्मान किया ॥१२६॥ तदनन्तर प्रहस्त कौशाम्बी के राजा के पास गया और उससे विचार-विमर्श करके तथा उनका पत्र लाकर राजा चन्द्रप्रभ को प्रसन्न किया ॥१२७॥ राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त को शीघ्र अपनी नगरी शाकल में भेजकर परपुष्टा को उसके साथ जनमेजय के पास भेज दिया ॥१२८॥ तदनन्तर दूसरे दिन सूर्यप्रभ को लेकर चन्द्रप्रभ आदि सम्बन्धी राजा कान्तिसेन के साथ विमान द्वारा जनमेजय के यहाँ गये ॥१२९॥ वहाँ विप्रभ राजा जनमेजय जामाता के साथ उन सभी सम्बन्धी राजाओं की अगवानी करके समुचित स्वागत किया और अपनी नगरी में ले गया ॥१३०॥ तथा कन्या का विवाह-संस्कार करके राजा जनमेजय ने पाँच हजार हाथी एक लाख श्रेष्ठ घोड़े एवं अच्छे-अच्छे रत्न सुवर्ण वस्त्र कपूर आदि से लदे हुए पाँच हजार ऊँट दहेज में कन्या के साथ दिये ॥१३१-१३२॥
२४८ कथासरित्सागर
२४८ कथासरित्सागर चक्रे च वाद्यनृत्तैकमयं लोकमहोत्सवम्। पूजितब्राह्मणवरं मानिताखिलराजकम् ॥१३३॥ तावच्चाशङ्कितं तत्र नभः पिञ्जरतां ययौ। रक्ताश्मत्वमसम्पूर्णभावि शसदिवात्मनः ॥१३४॥ तुमुलाकुलशब्दाश्च बभूवुः सहसा दिशः। भीता इवागतं दृष्ट्वा परसैन्यं विहायसा ॥१३५॥ तावच्च तत्क्षणं वातुं प्रवृत्तोऽभून्महानिलः। सपरैः सह युद्धाय भूचरानुत्क्षिपन्निव ॥१३६॥ क्षणाच्च ददृशे व्योम्नि विद्याधरबलं महत्। दीप्तिद्योतितविश्वचक्रमुद्यद्भाद महाजवम् ॥१३७॥ तन्मध्ये भातिशुभगं विद्याधरकुमारकम्। एकं सूर्यप्रभाद्यास्ते पश्यन्ति स्म सुविस्मिताः ॥१३८॥ 'आषाढेश्वरतनयो दामोदर एष जयति युवराजः। रे मर्त्य धरणिगोचर सूर्यप्रभ निपत पादयोरस्य ॥१३९॥ प्रणम च रे जनमेजय भवता दत्ता सुता किमस्मैव। आराधय तमिमं तद्देव नैषोऽन्यथा क्षमते' ॥१४०॥ इति तस्मिन्क्षणे विद्याधरबन्दी ततोऽम्बरात्। तस्य दामोदरस्याज्ञाव्यावजहारोच्चया गिरा ॥१४१॥ तच्छ्रुत्वा दृष्टतत्सैन्यो गृहीत्वा खड्गचर्मणी। सूर्यप्रभो नभः क्रोधादुत्पपात स्वविद्यया ॥१४२॥ अनूत्पेतुश्च सचिवास्तस्य सर्वे धृतायुधाः। प्रहस्तश्च प्रभासश्च भासः सिद्धार्थ एव च ॥१४३॥ प्रज्ञाढ्यः सर्वदमनो वीतभीतिः शुभङ्करः। विद्याधराणां तैः साकं प्रावर्तत महाहवः ॥१४४॥ सूर्यप्रभश्चाभ्यधावत्ततो दामोदरस्ततः। खड्गेनाच्छन् रिपून् गुह्यैस्तच्छस्त्राणि स्वचर्मणा ॥१४५॥ तं जनाः कति सख्ये च शतसहस्रा नभश्चराः। समत्वमेव विविद्युद्युध्यमानाः परस्परम् ॥१४६॥ बभु राङ्गलसत्पाशाः साङ्कुशा रुधिराग्णाः। पतन्त्यः शूरचापेभ्यः कृतान्तस्येव दृष्टयः ॥१४७॥
सप्तम लम्बक २४९
सप्तम लम्बक २४९ संगीत नृत्य और वाद्य के साथ भारी महोत्सव मनाया और ब्राह्मणों तथा समागत राजाओं का समुचित सम्मान किया ॥१३३॥ इतने में ही सारा आकाश देखते-देखते पीला हो गया मानों भविष्य में रक्त से लाल होने की सूचना दे रहा हो ॥१३४॥ चारों दिशाओं में भीषण हाहाकार मच गया मानो शत्रुओं की सन्तानों से डरी हुई दिशाएँ दौड़ी जा रही थीं ॥१३५॥ उसी क्षण मानो भू चरों को गे पैरों के साथ उड़ाने के लिए ऊपर की ओर फेंकती हुई महावायु (आँधी) चलने लगी ॥१३६॥ इतने में ही आकाश में अपनी चमक से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई और वेगवती विद्याधरों की सेना दिखाई पड़ी ॥१३७॥ उस सेना के मध्य में चकित सूर्यप्रभ आदि ने अत्यन्त सुन्दर और तेजस्वी एक विद्याधर कुमार को देखा ॥१३८॥ आषाडम्बर के पुत्र युवराज दामोदर की जय हो! अरे, पृथ्वी के रहनेवाले मनुष्य सूर्यप्रभ इसके चरणों में नत होओ ॥१३९॥ अरे जनमेजय तू भी इसके चरणों में पड़कर क्षमा प्रार्थना कर, तूने अपनी कन्या को अवाच्य स्थान में क्यों दिया। इसलिए इस दामोदर देव को प्रसन्न कर। अन्यथा यह तुम्हें कदापि क्षमा न करेगा ॥१४०॥ इस प्रकार आकाश से विद्याधर के बन्दी (चारण भाट) ने उस दामोदर के आगे चलते हुए ऊँचे स्वर से कहा ॥१४१॥ यह सुनकर, विद्याधरों की सेना को देखकर और हाथ-तलवार लेकर सूर्यप्रभ अपनी विद्या के प्रभाव से आकाश में उड़ा॥१४२॥ उसके पीछे उसके सभी मन्त्री प्रहस्त प्रभास सिद्धार्थ प्रह्लादन सर्वदमन वीतभीत और शुभकर भी शस्त्रों को लिए हुए आकाश में उड़े और उनके साथ विद्याधरों का महान् युद्ध छिड़ गया ॥१४३-१४४॥ सूर्यप्रभ ऊपर ही छूटा जिधर दामोदर था वह अपने बाणों से शत्रुओं का संहार कर रहा था और उसके बाणों को अपनी ढाल पर रोक रहा था ॥१४५॥ इधर युद्ध ही इने-गिने कवच और उधर लाखों की संख्या में सशस्त्र सादी विद्याधर। किन्तु, ये आपस में लड़ते हुए भी अपने को सशस्त्र सैकड़ों के समान थे ॥१४६॥ रक्त से सनी और लाल रंग की चमकती हुई मंत्री तलवार विद्याधर सेना की के रुधिर से सराबोर शस्त्रों से रणभूमि का कर रही थी ॥१४७॥ ३२
२५ कथासरित्सागर
२५ कथासरित्सागर विद्याधराश्च धरणी भियेव शरणाथिनः । शिरोभिश्च शरीरैश्च पतुश्चन्द्रप्रभाग्रतः ॥१४८॥ सूर्यप्रभो बभौ शोकदृष्ट्या रुधरधिया। सिन्दूरेणेव कीर्णेन नभोऽभूवसृजारुणम् ॥१४९॥ सूर्यप्रभश्च सम्प्राप्य युयुधे तेन सम्मुखम् । खड्गचर्मधरणेव सह दामोदरेण सः ॥१५०॥ युध्यमानश्च करजप्रयोगेण प्रविश्य सम् । खड्गखण्डितधर्माणं रिपुं भूमावपातयत् ॥१५१॥ छेत्तुमिच्छति यावच्च शिरस्तस्य विहस्ततः । तावदागत्य नभसा हुङ्कारो विष्णुना कृतः ॥१५२॥ तच्छ्रुत्वा वीक्ष्य च हरिं नम्रस्तद्गौरवेण सः । दामोदरममुञ्चत बन्धात् सूर्यप्रभस्ततः ॥१५३॥ बद्धमुक्तं तमादाय भक्तं क्वापि ययौ हरिः । भगवान्स हि सद्भक्तमिहामुत्र च रक्षति ॥१५४॥ दामोदरानुगास्तं च ययुः सर्वे यतस्ततः । सूर्यप्रभोऽपि गगनात् पितुः पार्श्वमबातरत् ॥१५५॥ सामारयमक्षतप्राप्तं पिता चन्द्रप्रभस्य तम् । अभ्यनन्दद्युपाद्धान्त्ये सुदृढुर्द्दष्टविक्रमम् ॥१५६॥ ततोऽत्र यावत्सर्वे ते दृष्टास्तत्कथया स्थिताः । आगात् सुभटसम्बन्धी तावद्दूतोऽपरस्ततः ॥१५७॥ स च चन्द्रप्रभस्यैव लेखमग्रे समर्पयत् । तमुद्घाट्य च सिद्धार्थः सदस्येवमवाचयत् ॥१५८॥ श्रीमान्प्रतववंशमौक्तिकमणिश्चन्द्रप्रभो भूपती राजा धीसुभटेन सादरमिदं धीकोङ्कणाद् बोध्यते । नीता मे सनयापहृत्य रजनी सन्त्वेन भ्नापि या । सा प्राप्ता तय सूनुनेत्यवगतं यत्तेन तुष्टा वयम् ॥१५९॥ तद्युक्तेन सुतेन तेन सह तत्सूर्यप्रभगोद्यमो । युष्माभिः क्रियताममङ्गलमिहाप्यस्मद्गृहाभ्यागमं यावतां परराक्त पुनरिव प्रत्यागतामारजां पश्यामश्च विपाङ्गकर्मण्युना श्वर्भेश्च तस्या वयम् ॥१६१॥
अष्टम लम्बक २६१
अष्टम लम्बक २६१ भूमि पर पड़े हुए राजा चण्डसेन के बाणों के साथ गिरने हुए (मृत) विद्याधर, मानो शिर और शरीर में शरण की प्रार्थना कर रहे थे ॥१४८॥ जनता की दृष्टियों में देखा जाता हुआ सूर्यप्रभ आकाश में युद्ध करता हुआ अत्यन्त शोभित हो रहा था। रक्त से रंजित आकाश मानो छिड़के हुए सिन्दूर की शोभा धारण कर रहा था॥१४९॥ सूर्यप्रभ द्वारा ललकार किये हुए दामोदर के सामने आकर युद्ध करने लगा और युद्ध करते हुए उसने खड्ग प्रयोग (पैंतरेबाजी) से अन्तर घुसकर दामोदर की ढाल-तलवार को काटकर उस पर प्रहार कर दिया ॥१५०-१५१॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ जैसे ही उसका सिर काटने के लिए तैयार हुआ वैसे ही विष्णु भगवान् ने आकाश में आकर उसे मना करते हुए हुंकार दिया॥१५२॥ हुंकार को सुनकर और विष्णु भगवान् को देखकर उदार गौरव से मग्न सूर्यप्रभ ने दामोदर को मारने से अपना हाथ रोक लिया॥१५३॥ फिर भगवान् प्रसन्न व प्रसन्न हुए उस अपने भक्त दामोदर को लेकर अन्तर्हित हो गए क्योंकि भगवान् अपने भक्तों की इस लोक और परलोक में भी रक्षा करते हैं॥१५४॥ दामोदर के लुप्त होते ही उसके साथी सभी विद्याधर इधर-उधर भाग गये और सूर्यप्रभ भी आकाश से उतरकर अपने पिता के पास आ गया॥१५५॥ उसके पिता चन्द्रप्रभ ने अपने सभी अनुचरों के साथ जय-जयकार करते हुए सूर्यप्रभ का यथायोग्य अभिनन्दन किया। और अन्य राजाओं ने भी उसकी वीरता की प्रशंसा की॥१५६॥ इसप्रकार सभी लोग प्रसन्न होकर सूर्यप्रभ की प्रशंसा और उसकी वीरता की चर्चा कर रहे थे कि दूर से ही राजा सुषेण का दूतगण दूत वहाँ आ पहुँचा। उसने आते ही राजा चन्द्रप्रभ को प्रणाम किया। जिन्होंने उस पत्र को खोलकर सभा में इस प्रकार पढ़ा—॥१५७-१५८॥ हे मित्र राजा चन्द्रप्रभ आपके यहाँ के आने के समय राजा चन्द्रप्रभ से इसके पहले जो शिष्टाचार के सम्बन्धी बातों का निर्णय हुआ था वह सब कुछ आपको स्मरण ही होगा। हम सब लोग यहाँ ठीक हैं। यह जानकर इस प्रकार उत्तर दें॥१५९॥ 'प्रहस्त का युद्ध समाप्त होने के पश्चात् राजा चन्द्रप्रभ के साथ उपस्थित होकर हम सबने जो बात तय की थी उसपर विचारकर, जिस तरह युद्ध समाप्त हो उसी का उपाय करने के लिए यह पत्र भेजा गया है।' इस पत्र का उत्तर दें ॥१६०॥
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर इत्यत्र वाचिते लेखे सिद्धार्थेन तथेति सः। राजा चन्द्रप्रभो दूतं सञ्चकार जहर्ष च॥१६१॥ आनाययच्च सुभटस्यान्तिकं चन्द्रिकावतीम्। तत्सुतामपरान्तं तं प्रहस्तं प्रेष्य सत्वरम्॥१६२॥ प्रातश्च जग्मुः सर्वे तं कृत्वा सूर्यप्रभं पुरः। अपरान्तं विमानेन जनमेजयसंयुताः॥१६३॥ तत्र वान्त्सुभटो राजा दुहितृप्राप्तिनन्दितः। भृशमानर्च चक्रे च सुतापरिणयोत्सवम्॥१६४॥ ददौ च चन्द्रिकावत्यै सोऽस्यै रत्नादिकं तथा। यथा वीरभटाद्यास्ते स्वदत्तेन कलञ्जिरे॥१६५॥ ततः सूर्यप्रभे तत्र स्थिते श्वशुरवेश्मनि। आगात् पौरवसम्बन्धी दूतो श्रावणकादपि॥१६६॥ सोऽपि चन्द्रप्रभमिदं निजस्वामिवचोऽभ्यधात्। युता सुलोचना नीता धीमत्सूर्यप्रभेण मे॥१६७॥ ततो मे नैव सन्तापस्तद्युक्तं किं तु मद्गृहम्। आनीयतां स युष्माभिराधारो यद्विदन्महः॥१६८॥ तच्छ्रुत्वैव मुदाम्यर्च्य दूतं चन्द्रप्रभो नृपः। आनाययत्प्रहस्तेन पितुः पार्श्वं सुलोचनाम्॥१६९॥ रातः स सुभटाः सर्वे सह सूर्यप्रभेण ते॥ श्रावाणकं विमानेन ययुर्व्यामोपगामिना॥१७०॥ तत्रोद्वाहोत्सवं कृत्वा सूर्यप्रभसुलोचने। रत्नैरापूरयत्सोऽपि पौरवोऽभ्यर्चितराजकः¹॥१७१॥ तेषूपचर्यमाणेषु सुतस्नुषासु तेषु च। प्रजिघाय सुरोहोऽपि दूतं श्रीमन्नरेश्वरः॥१७२॥ सोऽभ्यन्यदवदूतमुत्सनार्चयामास पार्थिवः। हृतकन्यस्तया साकं तषामागमनं गृहे॥१७३॥ ततश्चन्द्रप्रभो राजा हृष्टस्तस्यापि तां सुताम्। विदामासां प्रहस्तेनानाययामास चेतसम्॥१७४॥ १ विवाहविधिनादित्यर्थः। २ सम्बन्धिराजसमूहः।
अष्टम लम्बक २५१
अष्टम लम्बक २५१ राजा चन्द्रप्रभ पत्र सुनकर प्रसन्न हुए और उन्होंने दूत का सत्कार किया। प्रहस्त द्वारा कोंकणाधीश की कन्या चन्द्रावती को उसके पिता के यहाँ शीघ्र ही पहुँचावा दिया।।१६१ १६२।। प्रातःकाल ही वे सब राजा सूर्यप्रभ को आगे करके जनमेजय के साथ विमान द्वारा अपरान्त (कोंकण) देश को गये ।।१६३।। कन्या के मिल जाने से आनन्दित राजा सुभट ने अपने देश में आए हुए उन बराती राजाओं तथा समधियों का खूब सम्मान और सत्कार किया तथा कन्या के विवाह का समारोह भी कर डाला ।।१६४।। राजा सुभट ने कन्यादान में चन्द्रिकावती को इतना धन रत्न आदिक दिया जिससे अन्य सभी समधी राजा लज्जित हो गये ।।१६५।। जब कि सूर्यप्रभ श्वशुर सुभट के घर पर ही था तभी लाबाणक नगर से राजा पौरव का दूत वहाँ आया ।।१६६।। उसने भी राजा चन्द्रप्रभ से अपनी स्वामी का सन्देश कहा कि 'तुम्हारे पुत्र सूर्यप्रभ ने मेरी कन्या सुलोचना का अपहरण किया है मुझे इसका सन्ताप नहीं है। किन्तु, तुम उसे मेरे घर पर ले आओ, तो हम विवाह-संस्कार सम्पन्न करें' ।।१६७-१६८।। ऐसा सुनते ही राजा चन्द्रप्रभ ने प्रसन्नता से दूत का सत्कार किया और प्रहस्त द्वारा विमान में सुलोचना को उसके पिता के यहाँ पहुँचावा दिया ।।१६९।। तब वे सभी राजा सुभट के साथ सूर्यप्रभ को लेकर ध्यान करते ही उपस्थित होनेवाले विमान से लाबाणक नगर गये ।।१७० ।। वहाँ पौरव ने सूर्यप्रभ और सुलोचना का विवाह करके सभी राजाओं का समुचित सत्कार किया ।।१७१।। सभी बराती राजाओं की जब भली भाँति सेवा-शुश्रूषा की जा रही थी तभी चीन के राजा सुरोह ने भी राजा चन्द्रप्रभ के समीप दूत भेजा ।।१७२।। चीन के राजा ने भी दूत द्वारा वही प्रार्थना की कि 'कन्या और उसे अपहरण करनेवाले सूर्यप्रभ के साथ हमारे घर पधारिए' ।।१७३।। तब प्रसन्नचित्त राजा चन्द्रप्रभ ने चीन-नरेश की कन्या विद्युन्माला को प्रहस्त के साथ उसके पिता के यहाँ पहुँचावा दिया ।।१७४।।
५४ कथासरित्सागरे
५४ कथासरित्सागरे अन्येद्युश्च विमानेन सहसूर्यप्रभा ययुः। चन्द्रप्रभाद्याः सर्वे ते चीनदेशं सपौरखाः ॥१७५॥ तत्राग्रे निर्गतो राजा निजकोट्टं प्रवेश्य तान्। स सुराहोऽपि दुहितुश्चक्रे वैवाहिकं विधिम् ॥१७६॥ अवाञ्च विद्युन्मालायै तस्यै सूर्यप्रभाय च। असङ्ख्यहयहस्त्यश्वरत्नचीनांशुकादिकम् ॥१७७॥ तस्थुश्च तत्र त तैस्तद्भोर्गैश्चन्द्रप्रभादयः। दिनानि कतिचित्सर्वे सुरोहाभ्यर्चितास्तदा ॥१७८॥ आसीत् सूर्यप्रमश्चात्र विलसद्धनयौवनः¹। प्रावृट्कालो यथा विद्युन्मालया शोभितस्तया ॥१७९॥ एवं स बुभुजे तत्र तत्र श्वशुरवेश्मनि। तत्तत्कान्तासखः सूर्यप्रभो भोगान्सबान्धवः ॥१८०॥ ततः समन्त्र्य सिद्धार्थप्रमुखैः सचिवैः सह। ध्रमाङ्गारभटादींस्तानस्वीयसहिता नृपान् ॥१८१॥ विसृज्य निजदेशेषु तं सुरोहमहीपतिम्। आमन्त्र्य सत्कृतामुक्तः पितृभ्यां सह सानुगः ॥१८२॥ भूशासनविमानं तदारुह्य व्योमवर्त्मना। स्वं स सूर्यप्रभः प्रायाच्छाकल नगरं कृती ॥१८३॥ क्वचिन्मृदङ्गसङ्घः क्वचिदपि च सङ्गीतकरवैः। क्वचित् पानक्रीडा क्वचन सुदृशां मण्डनविधिः। क्वचिदप्याभीष्टस्तुतिमुखरवैतालिकरवः पुरे सन्निभ्रासीत्प्रमद इति तस्यागमनजः ॥१८४॥ सभार्य्या पितृवेश्मसु स्थितवतीरानाय्य स स्वप्रियाः। दत्तैस्तत्पितृभिर्गजाश्वनिवहहस्ताभि सहवागतैः। नानारत्नमपूर्णभारविभवैरूष्ट्रैश्च रोष्यादिगं लीलानर्त्तितदिग्गजपोत्यविभवञ्चक्रे प्रजाकौतुकम् ॥१८५॥ १ प्रावृट्पक्षे--विलसत् घनानां यौवनं यस्मिन् सूर्य प्रभपक्षे--विलसद् घनं यौवनं यस्य। २ प्रावृट्पक्षे--विद्युतां मालयापहस्तया, शोभितः सूर्यप्रभपक्षे तन्नाम्न्या वीणाविद्येति गन्तव्या। ३ अङ्गमेवायनात्।
अष्टम लम्बक - २५५
अष्टम लम्बक - २५५ और दूसरे ही दिन वे सभी सूर्यप्रभ को लेकर राजा पौरव के साथ विमान से चीन देश को गये ॥१७५॥ वहाँ अगवानी के लिए बाहर आये हुए राजा ने उन्हें अपने बिम में ले जाकर अपनी कन्या का विवाह-संस्कार किया तथा मुदाह में विद्युन्माला और सूर्यप्रभ को कन्यादान में अमूल्य सोना रत्न एवं चीन के वस्त्र आदि प्रदान किये ॥१७६-१७७॥ विवाह के अनन्तर चन्द्रप्रभ आदि राजा गुरोह से सेवा-सत्कार प्राप्त करते हुए कुछ दिनों तक चीन में रहकर आनन्द करते रहे ॥१७८॥ घनघोर घटाटोपवाले वर्षाकाल के समान उमड़े हुए धन-यौवन से समृद्ध सूर्यप्रभ भी विद्युन्माला [बिजली] के साथ समुद्गृह में विविध प्रकार के भाव-विलासों का आनन्द लेने लगा ॥१७९-१८०॥ कुछ दिनों के अनन्तर सिद्धार्थ आदि मन्त्रियों से सम्मति करके अन्यान्य श्वशुर राजाओं को उपहारों के साथ अपने-अपने देश को भेजकर, सूर्यप्रभ भी राजा गुरोह से आज्ञा लेकर, उनकी कन्या विद्युन्माला तथा अपने माता-पिता के साथ सफल होकर भूतासन नामक विमान में बैठकर अपनी राजधानी शाकल में आ गया ॥१८१-१८३॥ सूर्यप्रभ के राजधानी में आने पर, सारी नगरी हर्ष से पागल-सी हो रही थी। कहीं नाच हो रहा था तो कहीं गाना-बजाना चल रहा था। कहीं मद्यपान-गोष्ठियाँ हो रही थीं तो कहीं स्त्रियों की सजधज चल रही थी। कहीं प्रचुर पुरस्कार-प्राप्त बन्दी-चारण आदि प्रशंसा के गान गा रहे थे ॥१८४॥ सूर्यप्रभ ने अपनी राजधानी में जाकर अपने-अपने पिताओं के घर में छोड़ी गई सभी रानियों को अपने पास बुलवा लिया। वे रानियां भी अपने-अपने पिताओं द्वारा दिये गये असंख्य हाथी घोड़े और दास-दासियों और धन-रत्नों के साथ आईं तो ऐसा प्रतीत होता था कि मानों सूर्यप्रभ के दिग्विजय का वैभव आ गया हो। यह सब देखकर नागरिक जनता आश्चर्य-चकित हो गई ॥१८५॥
२५६ कथासरित्सागर
२५६ कथासरित्सागर बहुवसुभूरिनिधानं सन्न महाभोगिना तदाध्युषितम्। सुर'-दानव'-भुजग'-नगरैः कृतमिव तच्छाकलं विभौ॥१८६॥ ततो मदनसेनया सह स तत्र सूर्यप्रभो यथामिमतभोगभुक्सकलपूर्णसम्पत्सुखी । उवास पितृसंयुतः ससचिवोऽन्यपत्नीयुत श्कृतागमनसंविदं मयमुदीक्षमाणोऽन्वहम्॥१८७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके प्रथमस्तरङ्गः
द्वितीयस्तरङ्गः चत्रप्रभसभायां मयदानवस्यापगमनम्
अथ तत्रैकदास्थानस्थितं चन्द्रप्रभे नृपे। सूर्यप्रभे च तत्रस्थे समग्रसचिवान्विते॥१॥ सिद्धार्थोदीरितकथाप्रसङ्गेन मये स्थिते। अकस्मादत्र वसुधा सभामध्ये व्यदीर्यत॥२॥ ततो भूविवरादादौ सद्यन्धः सुरभिर्मरुत्। आविरासीत्ततः पश्चादुज्जगाम मयासुरः॥३॥ शृङ्गोन्नतांसधिरः पृथुह्रस्वस्नेहमहौषधिः। रक्ताम्बरोष्ठमद्धातुमिश्रायामिव पर्वत॥४॥ यथार्हकृतपूजश्च राजा चन्द्रप्रभेण सः। रत्नासनोपविष्टः सन् दानवेन्द्रोऽभ्यभाषत॥५॥
१ सुरनगरं = स्वर्गः; बहवो वसवः तन्नामका देवता यत्र तत्तादृशम्; शाकलं नगरं च बहु = भूरि वसु = धनं यत्रेति बहुवसु । २ यक्षस्य = कुबेरस्य नगरं भूरिनिधानं शङ्कादिवपुष्करम् शाकलं च भूरिनिधानम् = इतरस्याविशेषपुष्करम्। ३ पाताल भुजगनगरं महाभोगिना = सर्पराजा वासुकिना अध्युषितम् = अधिष्ठि- तम् शाकलं नगरञ्च महाभोगिना महाविलासिना सूर्यप्रभेनाधिष्ठितम्। ४ विहितागमनसुसंवादम्। ५ आस्थानं = सभा गृहम्। ६ तत्र वार्त्तायामेव मयान् निर्गतासीत्।
अष्टम लम्बक २९७
अष्टम लम्बक २९७ अत्यधिक धन से परिपूर्ण और बहुत-सी प्रजाओं से भरा हुआ तथा महाभोगी¹ सूर्यप्रभ से अलंकृत शाकल नगर ऐसा लगता था मानों स्वर्ग अलकापुरी और पाताल तीनों लोकों के सम्मिश्रण से इस पुरी की रचना की गई हो॥१८६॥ तदनन्तर वह युवराज सूर्यप्रभ पटरानी मदनसेना तथा अन्यान्य रानियों के साथ समस्त सम्पत्तियों से भरपूर होकर समस्त उत्तमोत्तम भोगों को भोगता हुआ पिता तथा मन्त्रियों के साथ आने का वचन दिये हुए मयासुर दानव के आने की दिन-रात प्रतीक्षा करता हुआ राजधानी में सुखपूर्वक रहने लगा॥१८७॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागरके सूर्यप्रभ लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग चन्द्रप्रभ की सभा में मय दानव का आगमन एक बार दरबार में सूर्यप्रभ तथा चन्द्रप्रभ के मन्त्रियों के सहित बैठे-बैठे सिद्धार्थ के साथ बातचीत के प्रसंग मे मय का नाम आते ही दरबार-भवन की भूमि बीच में सहसा फट पड़ी ॥ १-२॥ फटी हुई भूमि के दरार से पहले शब्द उत्पन्न हुआ तदनन्तर सुगन्धित वायु निकली और उसके पश्चात् उसमे से मयासुर का आविर्भाव हुआ ॥३॥ वह दानव (मयासुर) पर्वताकार था। उसके काले और ऊँचे सिर-रूपी शिखर पर (पीले वर्ण की) केश-रूपी महौषधियां मानों जल रही थी और रक्त वस्त्र-रूपी धातु शरीर पर दीख रहे थे ॥४॥ राजा चन्द्रप्रभ द्वारा समुचित सत्कार प्राप्त करने के बाद सिंहासन पर स्थित दानवराज मय इस प्रकार बोला—॥५॥ १ महाभोगी—पाताल-पक्ष में महासर्प। सूर्यप्रभ के पक्ष में—महान् भोगी विलासी या ऐश्वर्य-सम्पन्न।—अनु ३३
२५८ कथासरित्सागर
२५८ कथासरित्सागर
भुक्ता भोगा इमे भौमा भवद्भिरधुना च वः। कालोऽन्येषां तदुपभोगे मतिं कुरुत साम्प्रतम् ॥६॥ दूतान् प्रध्यानयध्वं स्वान्नृपान् सम्बन्धिबान्धवान्। ततो विद्याधरेन्द्रेण मिलिष्यामः सुमेरुणा ॥७॥ क्षेष्यामः श्रुतशर्माणि प्राप्स्यामः खचराश्रियम्¹। सुमेरुश्च सहायत्वं अन्त्युबुद्ध्या स्थितोऽत्र नः ॥८॥ रक्षो सूर्यप्रभं दद्यास्त्वं चैतस्मै निजां सुताम्। इत्यादावेव देवेन स ह्यादिष्टः पिनाकिना ॥९॥ एवं मयासुरेणोक्ते प्रहस्तादीन् सखेश्वरान्। चन्द्रप्रभः प्रहितवान् दूतान् सर्वमहीभृताम् ॥१०॥ सूर्यप्रभश्च विद्याभिः स्वभार्या मन्त्रिणोऽखिलान्। सविमेजे मयावशात् संविभक्ता न ये पुरा ॥११॥
सूर्यप्रभास्थाने नारदमुनेरागमनम्
तावच्चात्र स्थितष्वेव प्रभाभासितदिक्मुखः। अवतीर्याम्बरात्साक्षाद्रदो मुनिराययौ ॥१२॥ गृहीतार्घोपविष्टश्च स चन्द्रप्रममब्रवीत्। प्रेषितोऽहमिहेन्द्रेण तेन चोक्तमिदं तव ॥१३॥ ज्ञातं मया यद्युष्माभिर्महेश्वरनिवेशतः। मयासुरसखैः सूर्यप्रभस्याज्ञानमोहितैः ॥१४॥ अस्य मर्त्यशरीरस्य संसाधयितुमिष्यते। सर्वविद्याधराधीशचक्रवर्तिपदं महत् ॥१५॥ तदयुक्तं यदस्माभिर्दत्तं हि श्रुतशर्मणे। विद्याधरकुलाम्पिन्दोस्तच्च तस्य क्रमागतम् ॥१६॥ अस्माकं प्रातिपद्येण धमबाधेन चैव यत्। कुरुध्ये तद्विनाधाय निन्दितं च प्रकल्पते ॥१७॥ पूर्वं च रुद्रयज्ञेन यजमानो भवान् मया। प्राप्यञ्स्वाश्वमयेनेत्युक्तं च कृतवान् न तम् ॥१८॥
१ खे=आकाशे चरन्तीति खचरा=विद्याधराः तेषां श्रियं=राजलक्ष्मीम्।
अष्टम लम्बक ९५१
अष्टम लम्बक ९५१ 'आपने ये पार्थिव भोग (अनल्प) तो भोग किये। अब अन्य दिव्य भोगों के भोगने का समय आ गया है। अतः उसके लिए उद्योग प्रारम्भ कीजिए ॥६॥ दूतों को भेजकर अपने सम्बन्धी बन्धुओं को बुलवाइए। तब विद्याधरों के राजा सुमेरु से मिलिये ॥७॥ तदनन्तर श्रुतशर्मा को जीतने और आकाशचारियों का साम्राज्य प्राप्त करेंगे। सुमेरु नामक विद्याधर राजा हमारी सहायता के लिए सम्बन्धी की भावना से तैयार बैठा है। 'सूर्यप्रभ की रक्षा करना और उसे अपनी कन्या प्रदान करना' शिवजी ने इस प्रकार का आदेश उसे पहले से ही दे रखा है" ॥८-९॥ मयासुर के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने सब बन्धु-राजाओं के पास आकाशचारी प्रहस्त प्रभास आदि दूतों को उन्हें बुलाने के लिए भेज दिया ॥१०॥ तदनन्तर मय दानव की आज्ञा से सूर्यप्रभ ने जिन पत्नियों और मन्त्रियों को इन्द्रजाल आदि विद्याएँ नहीं सिखाई थीं उन सबको अपनी विद्याएँ सिखा दीं ॥११॥ सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन इतने में ही जब सभा में यह चर्चा चल रही थी तभी अपने तपःप्रभाव से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारदमुनि आकाश से उतरे ॥१२॥ अर्घ्य देकर आसन पर विराजमान नारदमुनि ने राजा चन्द्रप्रभ से कहा—'राजन्, मुझे इन्द्र ने भेजा है और यह सन्देश दिया है कि मुझे ज्ञात हुआ है कि आप लोगों ने शिवजी की आज्ञा से और मय दानव की सहायता से अज्ञानवश मानवशरीरधारी सूर्यप्रभ को समस्त विद्याधरों का चक्रवर्ती बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया है ॥१३-१५॥ यह उचित नहीं है। यह पद मैंने श्रुतशर्मा को दिया है। वह विद्याधर कुल-रूपी क्षीर सागर का चन्द्रमा है और कुल-परम्परा से उसे यह पद प्राप्त है ॥१६॥ हमारे विरोधी (शत्रु) के रूप में यदि तुम धर्म-विरुद्ध कार्य करोगे तो वह अवश्य ही तुम्हारे विनाश के लिए होगा ॥१७॥ पहली बार भी यज्ञ-याग करते हुए मैंने तुमसे कहा था कि पहले अश्वमेध यज्ञ करो ऐसा मेरे कहने पर भी तुमने वह नहीं किया ॥१८॥