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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक २२७

सप्तम लम्बक २२७ और, अपनी रानियों के साथ उसके बनाये हुए विमानों के द्वारा व्योम-विहार करता हुआ मानो विद्याधर चक्रवर्ती होने की शिक्षा प्राप्त करने लगा॥२७४॥ इस प्रकार, अपने बन्धु-बान्धवों एवं मित्रों को आनन्दित करता हुआ नरवाहनदत्त मदनमंचुका और रत्नप्रभा में तीसरी कर्पूरिका के साथ सुख से दिन बिताने लगा॥२७५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभा लम्बक का नवम तरंग समाप्त रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक समाप्त

सूर्यप्रभो नामाष्टमो लम्बक

सूर्यप्रभो नामाष्टमो लम्बक अव गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रचयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्ग मङ्गलाचरणम् चलत्कर्णानिलोद्भूतसिन्दूरारुणिताम्बरः । जयत्यकालेऽपि सृजन् सन्ध्यामिव गजाननः॥१॥ नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं वत्सेश्वरसुतः कौशाम्ब्यां स पितुर्गृहे। नरवाहनदत्तस्ता भार्या प्राप्यावत्सत्सुखम् ॥२॥ एकदा पितुरास्थाने स्थितस्य पुण्ये दिने । अवतीर्यागतं तत्र दिव्यरूपं ददर्श सः ॥३॥ प्रणतं तं च सत्कृत्य पित्रा साकं क्षणान्तर। कस्त्वं किमागतोऽसीति पृष्टवान्सोऽप्यथाब्रवीत् ॥४॥ वज्रप्रभार्पिता आत्मकथा अस्तीह वज्रकूटाख्यं पृष्ठे हिमवतः पुरम्। वज्रसारमयप्राकारख्यातमन्वर्थनामकम् ॥५॥

सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक

सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक मृगेन्द्र-गामिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-सम्भ्रमावलोक के मन्थान द्वारा शिवजी के मुख-रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और श्रद्धा-पूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर दिव्य पद लाभ करते हैं। प्रथम तरंग मंगलाचरण हिलते हुए कानों की वायु द्वारा उड़े हुए सिन्दूर से आकाश को लाल करते हुए, अतएव मानो असमय में ही सन्ध्या की सृष्टि करते हुए गजानन की जय हो ॥१॥ नरवाहनदत्त की कथा (कथामुख) तदनन्तर, वत्सेश्वर (उदयन) का पुत्र नरवाहनदत्त कौशाम्बी नगरी में पिता के घर पर उन पत्नियों को पाकर आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥२॥ एक बार पिता के दरबार में बैठे हुए उसने (नरवाहनदत्त ने) आकाश से उतरे हुए किसी दिव्य पुरुष को देखा ॥३॥ प्रणाम करते हुए उस पुरुष को पिता के साथ सत्कार करके 'आप कौन हैं? कैसे आये हैं? नरवाहनदत्त के ऐसा प्रश्न करने पर उसने कहा—॥४॥ वज्रप्रभ से वर्णित आत्मवृत्तान्त इस धरातल में हिमालय के शिखर पर वज्रकूट नाम का नगर है, जो वज्र के सार से निर्मित होने के कारण नाम के समान ही गुणवाला भी है॥५॥

२१० कथासरित्सागर

२१० कथासरित्सागर तत्र वज्रप्रभाख्योऽहमास विद्याधराधिपः। वज्रनिर्मितदेहत्वात्नामान्वर्थं तदेव मे ॥६॥ 'मन्निमित्ते यथाकालं भक्तः सद्यश्चक्रवर्त्तिनि । अजेयस्त्वं विपक्षाणां मत्प्रसादाद् भविष्यसि' ॥७॥ इति चाह तपस्तुष्टेनादिष्टः शम्भुना यदा। तदा प्रभो प्रणामार्थमागतोऽस्मीह साम्प्रतम् ॥८॥ वत्सराजसुतो दिव्य कल्प कामोद्यसम्भवः। नरवाहनदत्तो नः शशिशेखरनिर्मितः ॥९॥ मर्त्योऽप्युभयवेद्यर्धचक्रवर्त्ती भविष्यति । इति विद्याप्रभावेन विज्ञातं शृणुमो मया ॥१०॥ आसीच्च दिव्य कल्प न पुरा मर्त्योऽप्यनुग्रहात्। सावत्त्सूर्यप्रभो नाम चक्रवर्तीह यद्यपि ॥११॥ तथाप्यभूत् स एकस्मिन्वेद्यर्धे दक्षिणे प्रभुः। उत्तरे श्रुतशर्माख्यश्चक्रवर्ती त्वभूत्तदा ॥१२॥ उभयोस्तु तयोरेक कल्पस्थायी शुभाशिषाम्। चक्रवर्त्यत्र भविता देव एवातिपुण्यवान् ॥१३॥ इत्युक्तवन्तं मन्त्येधसहितस्तं कुतूहलात्। नरवाहनदत्तः स प्राह विद्याधरं पुनः ॥१४॥ कथं विद्याधरैश्वर्यं मानुषेण सता पुरा। प्राप्तं सूर्यप्रभेणेति त्वया मः कथ्यतामिति ॥१५॥ ततो विविक्ते देबीनां मन्त्रिणां सन्निधौ च सः। राजा वज्रप्रभो वक्तुं कथां तामुपाचक्रमे ॥१६॥ सूर्यप्रभचरितम् शाकलः नाम मद्रेषु बभूव नगरं पुरा। चन्द्रप्रभाख्यस्तत्रासीद्राजाङ्गारप्रभात्मजः ॥१७॥ १ उत्तरमुख-दक्षिणमुखौ देवस्थानत्वेन वर्ण्येते दक्षिणमुखदेवस्थानं पितृयान-मार्गत्वेन, उत्तरमुखदेवस्थानं च देवयानमार्गत्वेन कथ्यते। अत्र द्वयोरपि स्थानयोर्विद्याधराणां राज्यमासीत्। २ साम्प्रतं 'स्यालकोट' इति प्रसिद्धं नगरं पाकिस्ताने सम्मिलितम्।

अष्टम लम्बक २३१

अष्टम लम्बक २३१ मैं उस नगर में वयप्रभ नाम का विद्याधरों का राजा था और मेरा शरीर वय-निर्मित होने के कारण मेरा नाम पावक था ॥६॥ 'यथासमय मेरे बनाये हुए विद्याधर-चक्रवर्ती का तू भक्त बनकर मेरी कृपा से शत्रुओं के लिए अजेय होया' मेरी तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के इस आदेशानुसार, हे स्वामिन् ! इस समय मैं आपको प्रणाम करने आया हूँ ॥७-८॥ कामदेव के अंश से उत्पन्न वत्सराज का पुत्र नरवाहनदत्त ही मनुष्य होने पर भी विद्याधरों की दोनों वेदियों¹ का एक दिव्य कल्प तक शिवजी के द्वारा भावी चक्रवर्ती बनाया गया है। मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से यह जाना और इसीलिए अभी आपके समीप आया हूँ ॥९-१०॥ शिवजी की कृपा से पहले भी मनुष्य होकर एक दिव्य कल्प तक दक्षिण ओर की आधी वेदी का स्वामी सूर्यप्रभ हुआ था और उत्तर में श्रुतशर्मा नामका चक्रवर्ती हुआ था किन्तु दोनों वेदियों के आकाशचारियों के एक चक्रवर्ती होनेवाले आप अत्यन्त पुण्यवान् हैं ॥११-१३॥ वयप्रभ के इस प्रकार कहने पर वत्सराज और नरवाहनदत्त दोनों ने अत्यन्त कौतूहल के साथ उस विद्याधर से फिर कहा-॥१४॥ 'मनुष्य होकर भी सूर्यप्रभ ने विद्याधरा में चक्रवर्ती का पद पहले समय में कैसे प्राप्त किया यह तुम हमें बताओ' ॥१५॥ तब एकान्त में महारानियों और मन्त्रियों की उपस्थिति में राजा वयप्रभ ने उनसे कहना प्रारम्भ किया-॥१६॥ सूर्यप्रभ का चरित 'प्राचीन समय में मद्र देश में शाकल² नाम का एक नगर था। वहाँ अग्नि के समान तेजस्वी अंगारप्रभ का पुत्र चन्द्रप्रभ नाम का राजा था ॥१७॥ १ उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के दो देश-स्थान। आर्य कर्मशास्त्रों में दक्षिणी ध्रुव के देश-स्थान को पितृयान-मार्ग और उत्तरी ध्रुव के देश-स्थान को देवयान-मार्ग कहा गया है। इन दोनों स्थानों पर विद्याधरों का निवास और राज्य था। दोनों वेदियों का शासक चक्रवर्ती कहा जाता था।—अनु २ शाकल: वर्तमान समय का स्यालकोट नगर, जो अब पाकिस्तान में है। -अनु

२३२ कथासरित्सागर

२३२ कथासरित्सागर आह्लादकारी विश्वस्य नाम्नान्वर्थोऽपि यो भवन्। सन्तापकारी शत्रूणां बभूव ज्वलनप्रभः ॥११८॥ कीर्तिमत्यभिधानायां तस्य देव्यामजायत। पुत्रो नृपस्यातिशुभैर्लक्षणैः सूचितोदयः ॥११९॥ एष सूर्यप्रभो नाम राजा जातः पुरारिणा। भावी विद्याधराधीशश्चक्रवर्ती विनिर्मितः ॥१२०॥ इत्युच्चचार गगनात्तस्मिञ्जाते स्फुटं वचः। सुधावर्षं श्रवणयोश्चन्द्रप्रभमहीभृतः ॥१२१॥ ततस्तस्य पुरारातिप्रसादोत्सवशालिनः। सूर्यप्रभः स बवृधे राजपुत्रः पितुर्गृहे ॥१२२॥ बाल एव च विद्यानां कलानां च क्रमेण सः। धर्त्ता सुमतिः पारमुपासितगुरुर्ययौ ॥१२३॥ पूर्णषोडशवर्षं च गुणैरावर्जितप्रजम्। यौवराज्येऽभ्यषिञ्चत्तं पिता चन्द्रप्रभोऽथ सः ॥१२४॥ स एव मन्त्रिपुत्रांश्च निजांस्तस्मै समर्पयत्। भासप्रभाससिद्धार्थप्रहस्तप्रभृतीन्बहून् ॥१२५॥ तैः समं युवराजत्वधुरं तस्मिंश्च बिभ्रति। आजगामैकदा तत्र मयो नाम महासुरः ॥१२६॥ आस्थाने च स तं चन्द्रप्रभं सूर्यप्रभे स्थिते। उपेत्य रचितातिथ्य जगादैवं मयो नृपम् ॥१२७॥ राजन् विद्याधरेशानां चक्रवर्ती त्रिशूलिना। अयं विनिर्मितो भावी पुत्रः सूर्यप्रभस्तव ॥१२८॥ तत्किं न साधयत्येष विद्यास्तत्प्राप्तिधायिनीः। एतदर्थं विसृष्टोऽहमिह देवेन शम्भुना ॥१२९॥ अनुजानीहि तद्यावत्तीरथेनं शिक्षयाम्यहम्। विद्याधरेन्द्रताहेतुं विद्यासाधनसत्क्रियाम् ॥१३०॥ एतस्य परिपन्थी¹ हि कार्येऽस्मिन्खेचरेन्द्रकः। विद्यत श्रुतशर्माख्यः सोऽपि शक्रेण निर्मितः ॥१३१॥ १ परिपन्थी - विरोधी, शत्रुः।

अष्टम लम्बक २३१

अष्टम लम्बक २३१ चन्द्रप्रभ नाम का वह राजा विश्व को आह्लाद देनेवाला अतएव समुचित नामवाला होने पर भी शत्रुओं के लिए अग्नि के समान सन्तापदायक था ॥१८॥ उस राजा की कीर्तिमती नाम की महारानी से अत्यन्त शुभ लक्षणों से भूषित उत्कर्षवाला प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१९॥ ‘यह सूर्यप्रभ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जिसे शंकर भगवान् ने पहले से ही विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है' ॥२०॥ उसके उत्पन्न होने पर राजा चन्द्रप्रभ के कानों के लिए अमृत-वर्षा के समान इस प्रकार स्पष्ट आकाशवाणी हुई ॥२१॥ तदनन्तर, शिवजी की कृपा से अत्यन्त उत्सव-युक्त चन्द्रप्रभ के राजगृह में वह सूर्यप्रभ क्रमशः बड़ा होने लगा ॥२२॥ तीव्रबुद्धि वह सूर्यप्रभ बालकपन में ही क्रमशः गुरुओं की उपासना से सभी विद्याओं और कलाओं में पारंगत होगया ॥२३॥ अपने गुणों से प्रजा को आकृष्ट करनेवाले सोलह वर्ष के उस कुमार सूर्यप्रभ को पिता चन्द्रप्रभ ने युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया ॥२४॥ और, अपने मन्त्रियों के पुत्र भास प्रभास सिद्धार्थ प्रहस्त आदिको कुमार के लिए मन्त्री नियुक्त कर दिया ॥२५॥ जब सूर्यप्रभ उन मन्त्रिपुत्रों के साथ युवराज का कार्य कर रहा था इसी बीच एक बार मय नामक असुर वहाँ आया ॥२६॥ आतिथ्य-सत्कार कर लेने के उपरान्त महासुर ने सूर्यप्रभ के साथ दरबार में बैठे हुए चन्द्रप्रभ से कहा—॥२७॥ ‘राजन्, शिवजी ने तुम्हारे इस पुत्र सूर्यप्रभ को विद्याधर-राजाओं का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है ॥२८॥ तो यह सूर्यप्रभ उस विद्याधर-चक्रवर्ती के पद को प्राप्त करानेवाली विद्याओं को क्यों नहीं सिद्ध करता' इसीलिए शिवजी ने मुझे भेजा है॥२९॥ आप आज्ञा दीजिए कि मैं उसे ले जाकर विद्याधर चक्रवर्ती के पद की साधक विद्याओं को सिद्ध करने की क्रिया उसे सिखा देता हूँ ॥३०॥ इस सूर्यप्रभ का विरोधी विद्याधरों का सम्राट् श्रुतशर्मा है जिसे इन्द्र ने बनाया है ॥३१॥ १

२४४ कथासरित्सागर

२४४ कथासरित्सागर सिद्धविद्याप्रभावस्तु सहास्माभिर्विजित्य तम्। एष विद्याधराधीशचक्रवर्तित्वमाप्स्यति ॥३२॥ एवं मयेनाभिहिते राजा चन्द्रप्रभोऽब्रवीत्। धन्याः स्मः पुण्यवानेष यथेच्छं नीयतामिति ॥३३॥ ततस्तमामन्त्र्य नृपं तदनुज्ञानमादृ सम्। सूर्यप्रभं स सामात्यं पाताल नीतवान्मयः ॥३४॥ तत्रोपदिश्यैतस्तस्मै स तपांसि तथा यथा। राजपुत्रः स सामात्यो विद्या शीघ्रससाधयत् ॥३५॥ विमानसाधनं तस्मै तथैवोपदिवेश सः। तेन भूतासनं नाम स विमानमुपार्जयत् ॥३६॥ तद्विमानाधिरूढं तं सिद्धविद्यं समन्त्रिकम्। सूर्यप्रभं स पातान्तान्मयः स्वपुरमानयत् ॥३७॥ प्रापय्य पित्रो पार्श्वं च तं जगाद व्रजाम्यहम्। त्वं सिद्धिभोगा भुङ्क्ष्वेह यावदप्याभ्यहं पुन ॥३८॥ इत्युच्चिदानात्सपूज्यो जगाम स मयासुरः। ममन्द विद्यासिद्ध्या च सूनोश्चन्द्रप्रभो नृपः ॥३९॥ सोऽथ सूर्यप्रभो विद्याप्रभावात्सचिवैः सह। नानादेशान् विमानेन सदा बभ्राम लीलया ॥४०॥ यत्र यत्र च या या तमपश्यद्राजकन्यका। तत्र तत्र स्वयं वव्रे सा सा तं काममोहिता ॥४१॥ एका मदनसेनाख्या ताम्रलिप्त्यां महीपतेः। सुता वीरभटाख्यस्य कन्या लोकैकसुन्दरी ॥४२॥ द्वितीया सुभटाख्यस्य तनया चन्द्रिकावती। अपरान्ता१धिराजस्य सिद्धैर्नीत्वोन्मिषत्कान्त्यत् ॥४३॥ काञ्चीनगर्यां नृपतेः कुम्भीराख्यस्य चात्मजा। ख्याता वरुणसेनाख्या तृतीया रूपशालिनी ॥४४॥ १ साम्प्रतं 'तामलुक' इति बङ्गदेशे प्रसिद्धम्। २ 'गोवा' प्रान्तः साम्प्रतं पुर्तगाल साम्राज्येनाधिष्ठितः।

अष्टम लम्बक २१५

[Header] अष्टम लम्बक २१५

'यह सूर्यप्रभ विद्याओं की सिद्धि से प्रभावशाली होकर, हम लोगों के साथ उसे जीत कर, विद्याधर-चक्रवर्ती का पद प्राप्त करेगा' ॥३२॥ मय के ऐसा कहने पर राजा चन्द्रप्रभ ने कहा—'मैं धन्य हूँ और यह सूर्यप्रभ भी पुण्यवान् है आप अपनी इच्छानुसार इस से कार्य' ॥३३॥ तदनन्तर चन्द्रप्रभ से परामर्श कर और उससे आज्ञा प्राप्त सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियों के साथ मयासुर पाताल ले गया ॥३४॥ पाताल ले जाकर मयासुर ने सूर्यप्रभ को जैसे-जैसे उपदेश किया उसने भी मन्त्रियों के साथ वैसे ही वैसे तपस्याओं द्वारा विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की ॥३५॥ अन्य विद्याओं के अतिरिक्त मय ने उसे विमान की साधना का भी उपदेश दिया जिससे उसने भूतासन नाम के विमान का निर्माण किया ॥३६॥ तदनन्तर मय उसी विमान पर आरूढ़ विद्याओं को सिद्ध किये हुए सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियों के साथ उसके पिता राजा चन्द्रप्रभ के समीप ले आया ॥३७॥ उसे माता-पिता के समीप पहुँचाकर मय ने कहा— मैं जाता हूँ तुम अपनी सिद्धि से सांसारिक भोगों को भोगो तबतक मैं फिर आऊँगा' ॥३८॥ ऐसा कहकर और सूर्यप्रभ से सत्कृत मयासुर चला गया और राजा चन्द्रप्रभ पुत्र की विद्या सिद्धि से बहुत प्रसन्न हुआ ॥३९॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ विद्याओं की सिद्धि के प्रभाव से अपने मन्त्रियों के साथ विमान के द्वारा भिन्न-भिन्न देशों में स्वेच्छापूर्वक घूमने लगा ॥४०॥ जहाँ जहाँ जो-जो राजकुमारी उसे देखती थी वह-वह उस पर मोहित होकर उसका वरण कर लेती थी ॥४१॥ उनमें ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट की अद्वितीय सुन्दरी पुत्री मदनसेना पहली राजकुमारी थी ॥४२॥ दूसरी अपरान्त (कोंकण) के राजा सुभट की चन्द्रिकावती कन्या थी जिस सिद्ध लोग कहीं से लाकर सुभट के पास छोड़ गये थे ॥४३॥ तीसरी अत्यन्त सुन्दरी कन्या कांची नगरी के राजा कुम्भीर की वल्लभसेना नाम की थी ॥४४॥


१ यह प्रदेश आजकल गोआ में सन्निग्ध है।—अनु० २ कांची मद्रास के पास प्रसिद्ध पुण्यपुरी है। यहाँ के पल्लव राजा प्रसिद्ध थे।—अनु०

२३६ कथासरित्सागर

२३६ कथासरित्सागर लावणकाधिराज्यस्य पौरवस्यस्य भूपतेः। सुता सुलोचना नाम चतुर्थी चारुलोचना ॥४५॥ चीनवङ्गपते राज्ञः सुरोहस्यात्मसम्भवा। हारिहेमावदाताङ्गी विद्युन्मालेति पञ्चमी ॥४६॥ कान्तिसेनस्य नृपतेः श्रीकण्ठविषयप्रभोः। सुता कान्तिमती नाम षष्ठी कान्तिजिताप्सराः ॥४७॥ जनमेजयभूपस्य कौशाम्बीनगरीपतेः। तनया परपुष्टाख्या सप्तमी मञ्जुभाषिणी ॥४८॥ अविज्ञातहृतानां च तासां बुद्ध्वापि बान्धवाः। विद्याबलोद्धते तस्मिन्नासंश्चेतसवृतयः १ ॥४९॥ ताभिश्चोपात्तविद्याभिः समं युगपदारमत्। विद्याधरर्षितानेकस्नेहः सूर्यप्रभोऽत्र सः ॥५०॥ नभोविहारसङ्गीतपानगोष्ठ्यादिभिस्तथा । चिक्रीड सहितस्ताभिः प्रहस्ताद्यैश्च मन्त्रिभिः ॥५१॥ दिव्यचित्रकलाभिश्च लिखंश्चिद्याधराङ्गनाः। कुर्वंश्च नर्मवक्रोक्तीः कोपयामास ताः प्रियाः ॥५२॥ रेमे च तासां वदनैः सभ्रभङ्गारुणेक्षणैः। वचनैश्च सकम्पौष्ठपुटविस्खलिताक्षरैः ॥५३॥ सर्वारस्ताम्रलिप्तीं च गत्वोद्यानेषु सेश्वरः। स राजसूनुर्व्यहरत् समं मदनसेनया ॥५४॥ स्थापयित्वा प्रियाश्चात्र भूतासनविमानगः। जगाम वज्रसाराख्यं प्रहस्तेनसखः पुरम् ॥५५॥ जग्राह तत्र समयां राज्ञो रम्भस्य पश्यतः। रक्तां तारावली नाम दह्यमानां स्मराग्निना ॥५६॥ आययौ ताम्रलिप्तीं च पुनस्तत्राप्युपाहरत्। अपरां राजतनयां कन्यां नाम्ना विलासिनीम् ॥५७॥ तदर्थं कुपितायातं तस्या भ्रातरमुद्यतम्। स गङ्गायुधं नाम विद्यया स्तम्भितं व्यधात् ॥५८॥ १ मुग्धाश्चेतसवृत्तयः। २ वज्रप्रभाख्ये चेत्यवप्रभा।

अष्टम लम्बक २३७

अष्टम लम्बक २३७ चौथी लावाणक के राजा पौरव की सुनयनी सुलोचना नाम की कन्या थी ॥४५॥ पाँचवीं चीन के राजा मुरोह की सोने के रंगवाली विद्युन्माला नाम की सुन्दरी कन्या थी ॥४६॥ छठी श्रीकंठ देश के राजा कान्तिसेन की कुमारी कान्तिमती थी जो अपने सौन्दर्य से अप्सराओं को जीतती थी ॥४७॥ कौशाम्बी नगरी के राजा जनमेजय की मधुरभाषिणी परपुष्टा नाम की कन्या सातवीं थी ॥४८॥ अनजान में अपहरण की गई उन कन्याओं के बन्धुगण सूर्यप्रभ को जान लेने पर भी उसकी विद्याओं के प्रभाव से बेंत के समान काँपते थे ॥४९॥ सूर्यप्रभ ने उन कन्याओं को भी विद्याओं का उपदेश कर दिया था और स्वय विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके एक साथ ही सबके साथ रमण करता था ॥५० ॥ राजा सूर्यप्रभ आकाश-विहार, संगीत पान-गोष्ठी आदि से उनके तथा प्रहस्त आदि मन्त्रियों के साथ आनन्द भाव में समय व्यतीत करता था ॥५१॥ और, दिव्य चित्रकला का जानकार वह सूर्यप्रभ दिव्य विद्याधरियों के चित्र बनाकर अपनी प्रियतमाओं को प्रणय-कुद्ध करता था ॥५२॥ टेढ़ी भौंहों और क्रोध से लाल नेत्रोंवाली तथा काम से काँपते हुए ओठों से फड़फड़ा कर मन्दमन्द बोलती हुई उन पत्नियों के साथ हास्य-विनोद करता हुआ वह आनन्द का अनुभव करता था ॥५३॥ वह राजपुत्र आकाश-मार्ग से ताम्रलिप्ती नगरी में आकर उसके उद्यानों में मदनसेना के साथ विहार करता था ॥५४॥ एक बार वह, अपनी सभी पत्नियों को भूतासन नामक विमान में बैठाकर, प्रहस्त नामक मन्त्री को साथ लेकर, वज्रसार नामक नगरी में गया ॥५५॥ यहाँ राजा रम्भ के देखते-देखते कामाग्नि से सन्तप्त उसकी तारावती नाम की कन्या को उठा लाया ॥५६॥ वह वहाँ से फिर ताम्रलिप्ती आया और वहाँ से विलासिनी नाम की दूसरी राजकन्या का भी अपहरण कर लिया ॥५७॥ इस बात से क्रुद्ध और युद्ध के लिए आये हुए रुह्व्रायुध नामक उसके भाई को सूर्यप्रभ ने अपनी विद्या के प्रभाव से बाँधकर स्तब्ध और विजय कर दिया ॥५८॥

२४८ कथासरित्सागर

२४८ कथासरित्सागर मातुलं च सहायातं तस्य ससम्भ्रमं सानुगम्। चक्रे मुण्डितमूर्धानं सत्कान्ताहरणैषिणम् ॥५९॥ भार्याबन्धू इति क्रुद्धोऽप्यवधीन्न स तावुभौ। दर्पभङ्गलक्षी तु विहस्य प्रतिमुक्तवान् ॥६० ॥ ततः स नवभिः सूर्यप्रभः कान्ताभिरन्वितः। पित्राहूतो विमानेन स्वपुरं शाकलं ययौ ॥६१॥ ततश्चास्य पितुश्चन्द्रप्रभभूमिभृतोऽन्तिकम्। प्राहिणोत्ताम्रलिप्तीतो दूतं वीरभटो नृपः ॥६२॥ सन्निवेशं च पुत्रेण तव मेऽभूदृते सुते । तदस्तु विलासिभ्यो हि श्लाघ्य एष पतिस्तयोः ॥६३॥ स्नेहश्च यदि वोऽस्मासु तदिहागच्छताधुना। विवाहाचारसंस्कारस्तस्य यावद्विदध्महे ॥६४॥ एतच्छ्रुत्वा स सत्कृत्य दूतं निश्चितवांस्तदा। श्व एव तत्र गमनं राजा चन्द्रप्रभो द्रुतम् ॥६५॥ सत्यत्वनिश्चयं ज्ञातुं राज्ञो वीरभटस्य तु। प्रहस्तं प्राहिणोमत्त्वा दूरं द्रुतगमागमी ॥६६॥ स प्रहस्तो जवाद् गत्वा दृष्ट्वा वीरभटं च तम्। नृपं दृष्ट्वा च तत्कार्यं तच्छ्रितैस्सुपूजितः ॥६७॥ तस्मै सविस्मयायोक्त्वा प्रभूणां प्रातरागमम्। मुहूर्तेनाययौ चन्द्रप्रभपार्श्वं विहायसा ॥६८॥ शशंस तस्मै राज्ञे च सज्जं वीरभटं स्थितम्। सोऽपि तं सचिवं सूनोस्तुष्टो राजाभ्यपूजयत् ॥६९॥ ततः कीर्तिमतीदेव्या सह चन्द्रप्रभः प्रभुः। सूर्यप्रभो विलासिन्या तथा मदनसेनया ॥७० ॥ भूतासनमानं तदारुह्य सपरिच्छदौ। सामात्यौ चापरेद्युस्तो प्रातः प्रययतुस्ततः ॥७१॥ अह्नः प्रहरमात्रेण ताम्रलिप्तीमवापतुः । दृश्यमानौ जनैर्व्योम्नि कौतुकोत्क्षिप्तलोचनैः ॥७२॥ नभस्तरावतीर्णौ च कृतप्रत्युद्गमेन तौ। राजा वीरभटेनैतां क्षमं विविशतुः पुरीम् ॥७३॥

मध्यम लम्बक २३९

मध्यम लम्बक २३९ सेना के साथ आये हुए उसके मामा को भी बाँधकर उसका सिर मुँड़वा दिया। दर्पभंग और विच्छिन्ननाम के साठों का उसने क्रुद्ध होकर भी वध नहीं किया प्रत्युत हँसकर उन्हें छोड़ दिया ॥५९१॥ तदनन्तर पिता के बुलाने पर वह सूर्यप्रभ अपनी उन सब पत्नियों के साथ अपने घर शाकलपुर (स्यालकोट) चला गया ॥५९२॥ तब उसके पिता चन्द्रप्रभ के समीप ताम्रलिप्ती से राजा वीरभट ने दूत भेजा और सन्देश दिया कि तुम्हारे पुत्र ने मेरी दो कन्याओं का अपहरण किया है, वह विद्याओं की सिद्धिवाला योग्य पति है इसलिए ठीक है॥५९३॥ यदि आपको हम पर स्नेह है, तो आप यहाँ आयें जिससे विवाह-संस्कार द्वारा हम मित्रता स्थापित कर सकें ॥५९४॥ दूत का यह वाक्य सुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने उसका सत्कार करके दूसरे ही दिन ताम्रलिप्ती जाने का निश्चय किया ॥५९५॥ राजा चन्द्रप्रभ ने राजा वीरभट की सच्चाई परखने के लिए दूत का आना-जाना दूर होने से कठिन समझकर प्रहस्त को पहले वहाँ भेज दिया ॥५९६॥ प्रहस्त शीघ्र ही जाकर वीरभट से मिला और वीरभट द्वारा उसका श्रद्धापूर्वक स्वागत सत्कार किया गया ॥५९७॥ प्रहस्त ने आश्चर्य चकित वीरभट को प्रातःकाल ही स्वामी के आने की सूचना दी और घड़ी-भर में ही आकाश-मार्ग से वह चन्द्रप्रभ के समीप लौट आया ॥५९८॥ और कहा कि राजा वीरभट कन्यादान के लिए तैयार बैठे हैं। चन्द्रप्रभ ने भी प्रसन्न होकर मन्त्री प्रहस्त का समुचित स्वागत-सम्मान किया ॥५९९॥ तदनन्तर प्रातःकाल ही राजा चन्द्रप्रभ महारानी कीर्तिमती के साथ था तथा सूर्यप्रभ विलासिनी और मदनसेना के साथ अपने रोषम आदि को संग लेकर भूवामन नामक विमान में बैठकर मन्त्रियों-सहित बरात लेकर चल दिये ॥७०१॥ प्रातःकाल दिन के पहले प्रहर में ये लोग ताम्रलिप्ती नगरी जा पहुँचे जब कि नागरिक जन कौतुक के साथ आँख ऊपर करके उन्हें देख रहे थे ॥७०२॥ आकाश-मार्ग से उतरे हुए उन लोगों की वीरभट द्वारा अगवानी किये जाने पर उसी के साथ वे लोग नगरी म प्रविष्ट हुए ॥७०३॥

२४ कथासरित्सागर

२४ कथासरित्सागर चन्दनोदकसंसिक्तचारुरम्या पदे पदे। कटाक्षैः पौरनारीणां प्रकीर्णेन्दीवरामिव ॥७४॥ तत्र सम्बन्धिजामात्रोः कृत्वा वीरभटस्तयोः। पूजां यथावत्तनया-विवाहप्रक्रियां व्यधात् ॥७५॥ विशुद्धस्य हि भाराणां¹ सहस्रं काञ्चनस्य च। भृतं च शतमुष्ट्राणां रत्नाभरणभारकैः ॥७६॥ उष्ट्रपृच्छतशतीं नानावस्त्रभाराभिपूरिताम्। वाजिनां च सहस्राणि सप्त पञ्च च दन्तिनाम् ॥७७॥ रूपाभरणयुक्तानां सहस्रं वारयोषिताम्। वध्वां दुहित्रोः प्रददौ राजा वीरभटस्तयोः ॥७८॥ सूर्यप्रभस्य जामातुस्तत्पितुश्च तयोः पुनः। उपहारं ससद्रत्नैश्चकार विपुलैस्तथा ॥७९॥ समन्त्रिणो यथावच्च प्रहस्तादीनमानयत्। चकार सोत्सवं हृष्यत्स्वेषनगरीजनम् ॥८०॥ सूर्यप्रभश्च तत्रासीत्पितृयुक्तः प्रियासखः। तत्कालं विविधाहारपानगेयादिभोगभुक् ॥८१॥ तावच्च तत्र रम्भस्य सकाशाद्व्यधरात्रतः। आजगामद्रुतं स चास्थाने जगाद स्वप्रभोर्वचः ॥८२॥ विद्याबलाभिलिप्सेन युवराजेन न श्रुतः। सूर्यप्रभेण तनयाहरणोत्थः पराभवः ॥८३॥ अद्य च ज्ञातमस्माभिर्यद्वीरभटभूभृतः। प्रतिपन्ना स्नुषा स्थाने समानव्यसनस्य नः ॥८४॥ तच्चैव चानुमन्यध्वं यद्यस्मत्सन्धिमाशु तत्। इहाप्यागम्यतां नो चेन्मृत्युनो भोऽत्र निष्कृतिः ॥८५॥ तच्छ्रुत्वा तं च सम्मान्य दूतं वीरभटार्चितः। प्रहस्य सोऽब्रवीद्राजा तत्र चन्द्रप्रभः पुनः ॥८६॥ त्वमेव गच्छ तं रम्भमस्मद्वाक्यादिदं वद। किं तप्यसे वृथा भावी चक्रवर्ती हि निर्मितः ॥८७॥ विद्याधराणां विष्ण्वेनैष सूर्यप्रभाधुना। यस्यभाग्यगुणाद्यादन् भार्या सिद्धैरपाहृता ॥८८॥ १ भारः प्राचीनकालप्रचलितो मानः । 'भारः स्याद् विशतितुला' इत्यमरः। तान्त्रिक मानानुसारं सार्द्धद्विमन (२॥ मन) मितं प्रदेशेषु भारवाहकेन वोढुं शक्यते ।

अष्टम लम्बक २४१

[Header] अष्टम लम्बक २४१

[Body] इस अवसर पर, सारी नगरी की गलियाँ और सड़कें चन्दन के जल से सींची गई थीं और नागरिक रमणियों के सकटाक्ष नयन मार्गों उनपर फैले हुए थे ॥७४॥

राजभवन में जाकर वीरभट ने अपने समधी और जामाता का विधिवत् स्वागत-सत्कार करके शास्त्रानुसार कन्यादान की विधि सम्पन्न की। दहेज में विशुद्ध स्वर्ण के दस भार१ रत्न और आभूषणों से लदे हुए एक सौ ऊँट और विविध प्रकार के वस्त्रादि से लदे हुए पाँच सौ ऊँट, साठ हजार घोड़े, पाँच हजार हाथी तथा सुन्दर आभूषणों से सजी हुई एक हजार रूपवती स्त्रियाँ (दासियाँ) उन दोनों कन्याओं के विवाहोत्सव पर दीं ॥७५-७८॥

इसके अतिरिक्त समधी और जामाता का अच्छे-अच्छे रत्नों और वस्त्राभरणों से तथा भूमिदान से विशेष सत्कार किया ॥७९॥

उसी प्रकार अति प्रसन्न नागरिक जनों के साथ राजा के प्रहस्त आदि मन्त्रियों का भी विधिपूर्वक सत्कार किया ॥८०॥

इस अवसर पर माता-पिता के साथ सूर्यप्रभ भी विविध प्रकार के भोजन पान गान वाद्य आदि का आनन्द लेने लगा ॥८१॥

इसी बीच रम्भ के राजा वज्रप्रभ की ओर से दूत आया और दरबार में बैठे हुए सूर्यप्रभ से अपने स्वामी का सन्देश कहा- 'हे महाराज ! विद्याओं के बल से मदोन्मत्त सूर्यप्रभ ने मेरा कन्या हरण-रूपी (अपमान) किया है ॥८२-८३॥

ज्ञात हुआ है कि मेरे ही समान विपत्ति (कन्या-हरण) वाले राजा वीरभट से आज आपने मित्रता स्वीकार की है। इसी प्रकार, आप मेरे साथ सन्धि करें और यहाँ पधारें, अन्यथा अपने प्राण त्याग द्वारा ही मैं अपने अपमान का प्रायश्चित्त करूँगा' ॥८४-८५॥

यह सन्देश सुनकर तथा दूत का सत्कार करके राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त से कहा- 'तुम जाओ और हमारी ओर से राजा रम्भ को कहो कि वह व्यर्थ सन्ताप न करें। सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है। तुम्हारी तथा अन्य राजाओं की कन्याएँ इसी की पत्नियाँ हैं, इस प्रकार शिवजी ने आदेश दिया है ॥८६-८७॥

[Footer] १. भार, प्राचीन समय का एक परिमाण जो दो मन से कुछ अधिक था।—अनु. ३१

२४२ कथासरित्सागर

२४२ कथासरित्सागर तत्प्राप्ता से सुता स्यानं कर्मणस्त्व तु प्रार्थितः । तत्प्रीयस्व सखा नस्त्वमेष्यामोऽत्राप्यमी वयम् ॥८९॥ इति राज्ञोक्तसन्देशः प्रहस्तो गगनेन सः । गत्वा प्रहरमात्रेण वज्ररात्रमवाप सत् ॥९०॥ तत्र रम्भाय सन्देशमुक्त्वा तेनानुमोदितः । तथवागत्य सोऽवादीद्राज्ञे चन्द्रप्रभाय तत् ॥९१॥ चन्द्रप्रभोऽथ सचिवं प्रभासं प्रप्य शाकलात् । आनाययत्तां रम्भस्य पार्श्वे तारावलीं सुताम् ॥९२॥ ततो ययौ विमानेन सह सूर्यप्रभेण सः । राज्ञा वीरभटेनापि सर्वैश्चान्यै सुपूजितः ॥९३॥ वज्ररात्रं च सम्प्राप मार्गोन्मुखजनाकुलम् । रम्भेणाभ्युद्गतस्तस्य राजधानीं विवेश सः ॥९४॥ तत्र रम्भोऽप्यसौ क्लृप्तविवाहप्रक्रियोत्सवः । असङ्ख्यहस्त्यश्वरत्नादि दुहितुर्ददौ ॥९५॥ जामातरं च स तथा सूर्यप्रभमुपाचरत् । यथा यस्य निजा भोगा सर्वे विस्मृतिमाययुः ॥९६॥ यावच्च तत्र ते तिष्ठन्त्युत्सवानन्दिताः सुखम् । तावद्रम्भान्तिकं काञ्चीनगर्या दूत आययौ ॥९७॥ स तस्माच्छ्रुतसन्देशो रम्भश्चन्द्रप्रभं नृपम् । प्राह काञ्चीश्वरो राजा कुम्भीराख्योऽस्ति मेऽग्रजः ॥९८॥ तेनाप्त प्रेषितो मेऽद्य दूतो वक्तुमिदं वचः । मम सूर्यप्रभेणाद्य सुता नीता ततस्त्व ॥९९॥ कृतं चाद्य त्वया सख्यं तै सहति मया श्रुतम् । तन्ममापि तथैव त्वं सख्यं तैः सह साधय ॥१००॥ आयान्तु ते मम गृहं यावत्सूर्यप्रभाय ताम् । स्वहस्तेनार्पयामीह सुतां वरणसेनिकाम् ॥१०१॥ इत्येपाम्यर्थना तस्य क्रियतामिति वादिनः । रम्भस्य शुश्रुवे चन्द्रप्रभो राजा तदा वचः ॥१०२॥ प्रहस्तं प्रेष्य च क्षिप्रं शाकलात्तामनाययत् । पुराद्व्रजसेनां स कुम्भीरस्यान्तिकं पितुः ॥१०३॥

अष्टम लम्बकं २४५

अष्टम लम्बकं २४५ अतः, तुम्हारी कन्या उचित स्थान पर पहुँच गई है। तुम कठोर प्रकृति के व्यक्ति हो अतः तुमसे कन्या की याचना नहीं की गई। अब तुम प्रसन्न हो जाओ तुम हमारे मित्र हो हम लोग भी आ रहे हैं ॥८८-८९॥ चन्द्रप्रभ का यह सन्देश लेकर प्रहस्त आकाश-मार्ग से एक ही प्रहर में मयराष्ट्र जा पहुँचा। वहाँ राजा रम्भ को सन्देश देकर और उसकी स्वीकृति के साथ लौटकर उसका सन्देश राजा चन्द्रप्रभ को सुनाया ॥९०-९१॥ चन्द्रप्रभ ने दूसरे मन्त्री प्रभास को भेजकर शशाङ्क नगर से रम्भ की पुत्री तारावली को रम्भ के पास पहुँचा दिया ॥९२॥ तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ सभी बरातियों ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट तथा साथ आये हुए अन्य सभी व्यक्तियों के साथ चला और सबके साथ मयराष्ट्र डेरा में जा पहुँचा। तदनन्तर, वहाँ राजा रम्भ द्वारा उनकी अगवानी किये जाने के पश्चात् उसकी राजधानी में गया ॥९३-९४॥ वहाँ विवाह की तैयारी किये हुए राजा रम्भ ने उत्सव किया और सोना रत्न वस्त्र आभूषण आदि कन्या के साथ दिये और जामाता सूर्यप्रभ का भी विशेष रूप से सेवा-सत्कार किया जिससे वह अपने भोगे हुए उत्तमोत्तम सुखों को भी भूल गया ॥९५-९६॥ विवाहोत्सव का आनन्द लेते हुए जब वे वहाँ निवास कर रहे थे उसी समय कांची नगरी के राजा कुम्भीर का दूत राजा रम्भ के समीप आया ॥९७॥ उस दूत का सन्देश सुनकर राजा रम्भ ने महाराज चन्द्रप्रभ से कहा कि कांची के राजा मेरे बड़े भाई कुम्भीर हैं। उन्होंने मेरे पास अपने विश्वस्त दूत को भेजकर यह सन्देश दिया है कि सूर्यप्रभ ने पहले मेरी कन्या का अपहरण किया तब तुम्हारी कन्या का। मैंने अभी सुना है कि तुमने उसके साथ मित्रता कर ली है। अतः अपने ही समान उसके साथ मेरी भी मित्रता करा दो ॥९८-१००॥ वे लोग मेरे घर पर आवें तो मैं भी अपनी कन्या वरप्रभा को अपने हाथ से उनके लिये अर्पण करूँ उनकी यह प्रार्थना स्वीकार करें। ऐसा कहते हुए राजा रम्भ की बात को चन्द्रप्रभ ने स्वीकार किया और प्रहस्त को शशाङ्क नगर भेजकर वरप्रभा को उनके पिता कुम्भीर के पास कांची पहुँचा दिया ॥१०१-१०३॥

२४४ कथासरित्सागर

२४४ कथासरित्सागर अन्येद्युश्च विमानेन स च सूर्यप्रभश्च सः। रम्भो वीरभटः सर्वे काञ्चीं ते सानुगा ययुः ॥१०४॥ कुम्भीराभ्युद्गतास्तां च नानारत्नचितां पुरीम्। काञ्चीं काञ्चीमिव भुवः प्राविशन्गुणगुम्फिताम् ॥१०५॥ तत्र तां विधिना दत्त्वा सुतां सूर्यप्रभाय सः। वरबन्धोरदान्भूरि कुम्भीरो द्रविणं तदा ॥१०६॥ निर्वृत्ते च विवाहेऽत्र भुक्तोत्तरसुखस्थितम्। चन्द्रप्रभमुवाचेदं प्रहस्तः सर्वसन्निधौ ॥१०७॥ देव श्रीकण्ठविषये प्रद्युम्नं गतवानहम्। तत्र प्रसङ्गपृष्टो मां कान्तिसेननृपोऽब्रवीत् ॥१०८॥ सूर्यप्रभो ममादाय सुतां कान्तिमतीं हृताम्। गृहेमेतु करिष्यामि विधिवत्तस्य सत्क्रियाम् ॥१०९॥ नो चेत्त्यक्ष्याम्यहं देहं दुहितृस्नेहमोहितः। इत्युक्तस्तेन तत्राहं प्रस्तावे च मयोदितम् ॥११०॥ एवमुक्ते प्रहस्तेन राजा चन्द्रप्रभोऽभ्यधात्। गच्छ कान्तिमतीं तर्हि तां प्रापय तदन्तिकम् ॥१११॥ ततस्तत्र वयं याम इत्युक्तस्तेन भूभृता। तदैव मनसा गत्वा प्रहस्तस्तत्तथाकरोत् ॥११२॥ प्रातश्च ते सकुम्भीराः सर्वे चन्द्रप्रभादयः। श्रीकण्ठविषयं जग्मुर्विमानेन खगामिना ॥११३॥ तत्राप्याप्रगतो राजा कान्तिसेनः स्वमन्दिरम्। तावत्प्रबोद्य दुहितुर्व्यधादुद्वाहमङ्गलम् ॥११४॥ ददौ तस्यै तदा कान्तिमत्त्यै सूर्यप्रभाय च। माद्यद्यजननं राजानमितं रत्नसञ्चयम् ॥११५॥ तत्र स्थितेषु तच्चात्र नानाभोगोपसेविषु। सर्वेषु दूतः कौशाम्ब्या आगत्यैवमभाषत ॥११६॥ जनमेजयभूपालो ब्रवीति भवतामिदम्। हृता केनापि मन्दिरे परपुष्टेति मे सुता ॥११७॥

अष्टम लम्बक २४५

अष्टम लम्बक २४५

दूसरे दिन वह राजा चन्द्रप्रभ सूर्यप्रभ रम्भ वीरभट आदि अपने अनुचरों के साथ विमान द्वारा राजा कुम्भीर की सुन्दर बुर्जों से युक्त तथा अनेक रत्नों से भरी हुई कांची नगरी पहुँच गया ॥१०४-१०५॥ वहाँ पर राजा कुम्भीर ने सूर्यप्रभ को अपनी कन्या तथा उसके साथ बहुत-सा धन दिया ॥१०६॥ विवाहोत्सव सम्पन्न होने पर भोजन आदि से निवृत्त होकर, विश्राम करते हुए चन्द्रप्रभ को प्रहस्त ने सभी के सामने कहा—'महाराज मैं भ्रमण करता हुआ श्रीकंठ देश की ओर गया था वहाँ प्रसंगवश मिले हुए राजा कान्तिसेन ने कहा कि सूर्यप्रभ मेरी कन्या कान्तिमती को लेकर मेरे घर पर आवें मैं उनका विधिपूर्वक सत्कार करूँगा ॥१०७-१०९॥ अन्यथा कन्या के स्नेह से विह्वल होकर मैं शरीर-त्याग कर दूँगा। इस प्रकार, उसके कहने पर प्रस्ताव-रूप से आपसे मैंने निवेदन कर दिया ॥११०॥ प्रहस्त के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने कहा—'तो जाओ और उसकी कन्या कान्तिमती को उसके पास पहुँचाओ ॥१११॥ इसके पश्चात् हमलोग वहाँ आ रहे हैं। राजा के ऐसी आज्ञा देने पर प्रहस्त ने कान्तिमती को पिता कान्तिसेन के समीप पहुँचा दिया ॥११२॥ प्रातःकाल ही वे चन्द्रप्रभ आदि सभी राजा कुम्भीर के सहित आकाशचारी विमान द्वारा श्रीकंठ देश को गये ॥११३॥ वहाँ भी राजा कान्तिसेन ने सबकी अगवानी करके अपनी कन्या का विवाह महास- समारोह के साथ सम्पन्न किया ॥११४॥ तदनन्तर, पुत्री कान्तिमती और जामाता सूर्यप्रभ को रत्नों का अमूल्य संग्रह प्रदान किया जिसे देखकर सभी राजा आश्चर्य-चकित हो गये ॥११५॥ जब वे सब राजा कान्तिसेन के यहाँ विविध प्रकार के स्वागत-सत्कार का आनन्द ले रहे थे तभी सबके सामने कौशाम्बी नगरी से आये हुए दूत ने इस प्रकार कहा—॥११६॥ राजा जनमेजय आपसे यह कहते हैं कि 'कुछ दिन हुए मेरी कन्या वरपुष्टा का किसीने अपहरण कर लिया था ॥११७॥

२४६ कथासरित्सागर

२४६ कथासरित्सागर ज्ञातं चेहाद्य मत्प्राप्ता हस्तं सूर्यप्रभस्य सा । तया सह सोऽस्माकं गृहमायात्वशङ्कितः ॥११८॥ सत्कृत्य प्रेषयिष्यामि सभार्यं च यथाविधि । अन्यथा शत्रवो यूयं मम युष्माकमप्यहम् ॥११९॥ इत्युक्त्वा स्वामिवचनं दूतस्तूष्णीं बभूव सः । अथ चन्द्रप्रभः सर्वानैकान्ते क्षितिपोऽब्रवीत् ॥१२०॥ कथमद्य सदर्पोक्तैर्गम्यते तस्य वेश्मनि । तच्छ्रुत्वा तस्य सिद्धार्थनामा मन्त्र्येवमभ्यधात् ॥१२१॥ नान्यथा देव मन्तव्यं वक्तुमद्य हि सोऽर्हति । स हि राजा महादाता पण्डितः सत्कुलोद्गतः ॥१२२॥ शूरोऽश्वमेधयाजी च सदैवान्यपराजितः । विरुद्धं किं नु तेनोक्तं यथावस्तुमभिधायिना ॥१२३॥ शत्रुतोद्वाह्यता मा वा सा प्राप्तप्रकृतेऽधुना । तद् गन्तव्यं गृहे तस्य सत्यसन्धो नृपो हि सः ॥१२४॥ तदपि प्रेष्यतां कश्चित्तस्य चित्तोपसम्भये । इति सिद्धार्थवचनं सर्वे ददृशुरत्र ते ॥१२५॥ ततो जिज्ञासितुं चन्द्रप्रभस्तं जनमेजयम् । प्रहस्तं व्यसृजत्तं च दूतं तस्याप्यानयत् ॥१२६॥ प्रहस्तश्च स गत्वा तं कौशाम्बीशं ससंविदम् । विधायानीय तल्लेखं चन्द्रप्रभमतोषयत् ॥१२७॥ सोऽपि राजा तमेवाशु प्रहस्तं प्रेष्य धान्ध्रकात् । जनमेजयपार्श्वं तां परपुष्टामनाययत् ॥१२८॥ ततश्चन्द्रप्रभाद्यास्ते सूर्यप्रभपुरोगमाः । सकान्तिसेना कौशाम्बीं विमानेनागमन् नृपाः ॥१२९॥ तत्र सम्बन्धिजामातृमुख्यान् प्रत्युद्गमादिना । प्रहृस्तान्युपभामास स राजा जनमेजयः ॥१३०॥ ददौ च कृत्वा दुहितुर्विवाहविधिसत्क्रियाम् । पञ्च हस्तिसहस्राणि लक्षं च वरवाजिनाम् ॥१३१॥ रत्नकाञ्चनवस्त्रेषुपूगगगपूरित । मारेर्भतानामुष्ट्राणां सहस्राण्यपि पञ्च सः ॥१३२॥