कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
३३२ कथासरित्सागर
३३२ कथासरित्सागर
चक्रवर्त्तिविमानं ते सिद्धमेतदमूष्य च। पुरेष्वन्तःपुराख्येषु सर्वेषु स्थापयिष्यसि ॥१२५॥ येन तान्यप्रधृष्याणि भविष्यन्ति भवद्विषाम्। इत्यन्तरिक्षाद्गीर् समुवाचाथ सरस्वती ॥१२६॥ ततः स याज्ञवल्क्यं स गुरुं प्रह्वो व्यजिज्ञपत्। आदिश्यतां प्रयच्छामि कीदृशीं दक्षिणामिति ॥१२७॥ निजाभिषेककाले मां स्मरेरेषैव दक्षिणा। गच्छ तावत् स्वकं सैन्यमिति तं सोऽब्रवीन्मुनिः ॥१२८॥ मत्वा ततस्तं स मुनिं विमानं चाधिरुह्य तत्। तत्सुमेरुनिवासस्थं सैन्यं सूर्यप्रभो ययौ ॥१२९॥ तत्राख्यातस्ववृत्तान्तं ससुनीथसुमेरवः। सिद्धविद्याविमानं तमभ्यनन्दन् मयादयः ॥१३०॥ ततः सुनीथः सस्मार तं सुवासकुमारकम्। स चागत्य मयादींस्ताञ्जगादैव सरात्रकान् ॥१३१॥ सिद्धं विमानं विद्याश्च सर्वाः सूर्यप्रभस्य तत्। उदासीनाः किमद्यापि स्थिताः स्थ रिपुनिर्जये ॥१३२॥ तच्छ्रुत्वा स मयोऽवादीद्युक्तं भगवतोदितम्। किन्तु प्राक्प्रेष्यतां दूतो नीतिस्तावत् प्रयुज्यताम् ॥१३३॥ एवं मयासुरेणोक्ते सोऽब्रवीन् मुनिपुत्रकः। अस्मद्देवं का क्षतिस्तर्हि प्रहस्तः प्रेष्यतामयम् ॥१३४॥ एष सप्रतिभो वाग्मी गतिज्ञः कार्यकाक्षयोः। कर्मक्षमश्च सहिष्णुश्च सर्वदूतगुणान्वितः ॥१३५॥ इति तद्वचनं सर्वे श्रद्धाय व्यसृजंस्ततः। प्रहस्तं दत्तसन्देशं वीराय श्रुतशर्मणे ॥१३६॥ तस्मिन् गतेऽब्रवीत् सूर्यप्रभस्तान्निखिलाभिजान्। श्रूयतां यन्मया दृष्टमपूर्वं स्वप्नकौतुकम् ॥१३७॥ 'जानेऽद्य क्षीयमाणायां पश्यामि रजनावहम्। यावन्महाजलौघेन वयं सर्वे ह्रियामहे ॥१३८॥ ह्रियमाणाश्च नृत्यामो न मज्जामः कथञ्चन। अथाद्य स परावृत्तः प्रतिकूलेन वायुना ॥१३९॥
अष्टम लम्बक १३३
अष्टम लम्बक १३३ इतने में आकाशवाणी हुई कि यह चक्रवर्ती विमान तुम्हें सिद्ध हुआ है। इसके सभी नगरों (पुरा) में अपनी-अपनी रानियाँ रखोगे तो वे शत्रुओं की बाधा से सुरक्षित रहेंगी ॥१२५ १२६॥ तब उसने प्रणाम करके गुरु याज्ञवल्क्य से निवेदन किया कि आज्ञा दीजिए कि किस प्रकार गुरु-दक्षिणा अर्पण करूँ ॥१२७॥ अपने चक्रवर्ती-अभिषेक के समय मुझे स्मरण करना यही मेरी दक्षिणा है। अब तुम अपने सेना शिविर में जाओ ॥१२८॥ मुनि के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ मुनि को प्रणाम कर और उस विमान पर बैठकर सुमेरु के आश्रम में स्थित अपने सेना-शिविर में आया ॥१२९॥ वहाँ सब समाचार सुनाते हुए उसे मय सुनीथ और सुमेरु ने विमान और विद्या प्राप्ति पर बधाई दी ॥१३० ॥ तब सुनीथ ने सुवासकुमार का स्मरण किया। उसने आकर मय आदि तथा अन्य राजाओं से कहा—'सूर्यप्रभ को विमान भी सिद्ध होगया और सब विद्याएँ भी सिद्ध हो गईं। अब आप लोग शत्रु पर विजय प्राप्त करने में उदासीन क्यों हो रहे हैं ? ॥१३१ १३२॥ यह सुनकर मय ने कहा— आपने सच कहा किन्तु पहले दूत भेजा जाय तो ठीक हो। यहाँ नीति का प्रयोग करना चाहिए' ॥१३३॥ यह सुनकर मुनि-पुत्र ने कहा—'ऐसा ही करो। हानि क्या है ? प्रहस्त को दूत के रूप में भेजो' ॥१३४॥ यह (प्रहस्त) प्रतिभाशाली गम्भीर भाषण करनेवाला कार्य और काल की स्थिति को जाननेवाला कठोर और सहिष्णु है। इसमें दूत के सभी गुण हैं' ॥१३५॥ इस प्रकार, सुवासकुमार के वचनों पर श्रद्धा करके मय आदि ने सन्देश देकर प्रहस्त को श्रुतशर्मा के प्रति भेजा ॥१३६॥ उसके चले जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने उन सभी साथियों से कहा— मैंने आज जो एक कौतूहलपूर्ण सपना देखा है उसे सुनिए—'आज रात के अन्त में मैंने देखा कि हम सभी प्रबल जल- धारा में बहे जा रहे हैं। बहाये जाने हुए हमलोग नाच रहे हैं पर डूबते नहीं। कुछ समय बाद उस जलका प्रवाह विपरीत वायु के कारण बदल गया ॥१३७-१३९॥
११४ कथासरित्सागर
११४ कथासरित्सागर
ततः केनापि पुरुषेणैत्य ज्वलिततेजसा। उद्धृत्य वह्नौ क्षिप्ताः स्मो न च दह्यामहेऽग्निना ॥१४०॥ एत्याथ मेघो रक्तौघं प्रवृष्टस्तेन चासृजा। व्याप्ता दिशस्ततो निद्रा नष्टा मे निशया सह ॥१४१॥ इत्युक्तवन्तं तं स्माह स मुनिकुमारकः। 'आयासपूर्वोऽभ्युदयः स्वप्नेनानेन सूचितः ॥१४२॥ यो बलीयः स संग्रामो धैर्यं सद्यदमज्जनम्। नृत्यतो ह्रियमाणानां जलैस्तत्परिवर्तकः ॥१४३॥ यो युष्माकं महत् सोऽपि शरणं कोऽपि रक्षिता। यश्चोद्धर्त्ता ज्वलत्तेजाः पुमान् साक्षात् स शङ्करः ॥१४४॥ क्षिप्ताः स्वाग्नौ च यत्तेन तच्छस्ताः स्थ महामृधे' । मेघोद्यस्ततो यच्च स भूयोऽपि भयागमः ॥१४५॥ रक्तौघवर्षर्ण यच्च तदुभयस्य विनाशनम्। दिशां यद्रक्तपूर्णत्वमृद्धिः सा महती च वः ॥१४६॥ स्वप्नश्चानेकधान्यार्थो यथार्थोऽन्यार्थ एव च। यः सद्यः सूचयत्यर्थमन्यार्थं सोऽभिधीयते ॥१४७॥ प्रसन्नदेवतावेशरूपः स्वप्नो यथार्थकः। गाढानुभवचिन्ताविष्कृतमाहुरपार्थकम् ॥१४८॥ रजोमूढेन मनसा बाह्यार्थविमुखेन हि। जन्तुर्निद्रावशः स्वप्नं तैस्तैः पश्यति कारणैः ॥१४९॥ चिरशीघ्रफलत्वं च तस्य कालविशेषतः। एष रात्र्यन्तदृष्टस्तु स्वप्नः शीघ्रफलप्रदः ॥१५०॥ एतन्मुनिकुमारात्ते श्रुत्वा तस्मात् सुनिर्वृताः। उत्थाय दिनकर्तव्यं व्यधुः सूर्यप्रभादयः ॥१५१॥ तावत् प्रहस्तः प्रत्यागाच्छ्रुतशर्मसकाशतः। पृष्टो मयादिभिश्चैवं यथावृत्तमवर्णयत् ॥१५२॥ 'इतो गतोऽहं तरसा त्रिकूटाचलवर्त्तिनीम्। तां त्रिकूटपताकाख्यां नगरीं हेमनिर्मिताम् ॥१५३॥
१ महासंग्रामे।
अष्टम लम्बक ११५
अष्टम लम्बक ११५
तब किसी जाज्वल्यमान पुरुष ने आकर हमलोगों को जल से निकालकर आग में फेंक दिया। किन्तु, वहाँ पर भी हम आग में जले नहीं ॥१४०॥
इसके बाद घटा घिर आई और उसने रक्त की वर्षा की जिससे सारी दिशाएँ रक्तमय हो गईं। और, रात के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई, प्रातःकाल हो गया' ॥१४१॥
ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से सुवासकुमार ने कहा—'इस स्वप्न से कठिन परिश्रम द्वारा अभ्युदय की सूचना मिलती है ॥१४२॥
जो पानी का प्रवाह था वह संग्राम का सूचक था। नहीं डूबना धैर्य का सूचक था। जो नाचते हुए और बहते हुए तुम लोगों को वायु ने विपरीत दिशा में बदल दिया वह तुम्हें कोई शरण देनेवाला रक्षक है। जो ऊर्ध्वरेता तेज से जलते हुए पुरुष थे वह साक्षात् शंकर भगवान् हैं। उसने तुम्हें अग्नि में फेंका वह तुम्हें महासंग्राम में झोंका। मेघों का उमड़ना किसी भय का सूचक था और रक्त-वृष्टि का होना भय के विनाश का सूचक था। इसी प्रकार, दिशाओं का लाल हो जाना तुम्हारी समृद्धि या अभ्युदय का सूचक हुआ ॥१४३-१४६॥
स्वप्न कई प्रकार के होते हैं—जैसे अपार्थ यथार्थ और अपार्थ। जिसका फल तुरन्त होता है, वह अयथार्थ है। प्रसन्न हुए देवता आदि का आदेश यथार्थ होता है। गम्भीर अनुभव और चिन्ता आदि से होनेवाला स्वप्न अपार्थ है ॥१४७-१४८॥
रजोगुणप्रधान और बाह्य विषयों से विमूढ़ प्राणी निद्रा के वश में होकर उन-उन कारणों से स्वप्न देखता है ॥१४९॥
स्वप्नों का विलम्ब से अथवा तुरन्त फल मिल जाना समय-भेद से होता है। रात्रि के अन्त में देखा हुआ यह स्वप्न शीघ्र फल देनेवाला है' ॥१५०॥
मुनि-कुमार से यह सुनकर सूर्यप्रभ आदि प्रसन्न हुए और उठकर अपने-अपने दैनिक कार्यों में लग गये ॥१५१॥
इतने में ही श्रुतशर्मा के पास से प्रहस्त लौट आया और मय आदि के पूछने पर वहाँ जो कुछ हुआ कहन लगा—॥१५२॥
यहाँ से मैं वेग के साथ त्रिकूट पर्वत स्थित सोने की बनी विद्युत्प्रभाका नाम की नगरी को गया ॥१५३॥
१६४ कथासरित्सागर
१६४ कथासरित्सागर तस्यां प्रविश्य चापश्यमहं क्षत्तृनिवेदितः। वृतं च श्रुतशर्माणं तैस्तैर्विद्याधराधिपैः ॥१५४॥ पित्रा त्रिकूटसेनेन तथा विक्रमशक्तिना। पुरन्धरेण चान्यैश्च शूरैर्दामोदरादिभिः ॥१५५॥ उपविष्टामथ तमहं श्रुतशर्माणमभ्यधाम्। श्रीमता प्रहितं सूर्यप्रभेणाहं स्वदन्तिकम् ॥१५६॥ सन्दिष्टं तन् चेद ते प्रसादाद् धूर्जटेर्मया। विद्या रत्नानि भार्याश्च सहायाश्चैव साधिताः ॥१५७॥ तदेहि मिल सैन्ये मे सहेतैः खेचरेश्वरैः। निहन्ताहं विरुद्धानां रक्षिता नमतां पुनः ॥१५८॥ या चागम्या हृतास्ताते सुनीथतनया त्वया। कामचूडामणिः कन्या मुञ्च तामशुभं हि तत् ॥१५९॥ एव मयोक्ते सर्वे ते क्रुद्धास्तत्रैवमभ्यधुः। को नाम स यदस्मासु दर्पात् संदिशतीदृशम् ॥१६०॥ मर्त्येषु सन्दिग्धत्वेव कस्तु विद्याधरेषु सः। वराको मानुषो भूत्वाप्येवं दृप्यन्विनङ्क्ष्यति ॥१६१॥ तच्छ्रुत्वोक्तं मया किं किं को नाम स निशम्यताम्। स हरेणेह युष्माकं चक्रवर्ती विनिर्मितः ॥१६२॥ मर्त्यो वा यदि तन्मर्त्यैर्देवत्वमपि साधितम्। विद्याधरैश्च मर्त्यस्य तस्य दृष्टः पराक्रमः ॥१६३॥ माशङ्केहागते तस्मिन् कदाचिद् वो हि दृप्यते। इत्यवोक्ते मया क्रुद्धा सा सभा क्षोभमाययौ ॥१६४॥ अधावतां च हन्तुं मां श्रुतशर्मधुरन्धरौ। एवं पश्यामि शौर्यं वामित्यवोचमहं च तौ ॥१६५॥ ततो दामोदरेणैताबुत्थाय विनिवारितौ। शान्तं दूतश्च विप्रश्च न वध्य इति जल्पता ॥१६६॥ ततो विक्रमशक्तिर्मामब्रवीद् गच्छ दूत भोः। स्वस्वामीव हि सर्वेऽपि वयमीश्वरनिर्मिताः ॥१६७॥ तदायातु स पश्यामस्तस्यातिथ्यक्षमा वयम्। एवं सगर्वं तेनोक्ते विहसन्नहमब्रुवम् ॥१६८॥
अष्टम लम्बक १३७
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वहाँ जाकर प्रतीहार से सूचित और सभागृह में गए हुए मैंने उन विद्याधर-राजाओं से घिरे हुए श्रुतशर्मा को देखा ॥१५४॥
पिता त्रिकूट, सेनापति विक्रमशक्ति और दामोदर आदि शूरवीर उसके समीप बैठे थे। तदनन्तर, आसन पर बैठकर मैंने श्रुतशर्मा से कहा—'मुझे श्रीमान् सूर्यप्रभ ने दूत के रूप में आपके पास भेजा है और आपके लिए उन्होंने सन्देश दिया है कि मैंने शिवजी की कृपा से विद्या, रत्न, भार्या और सहायक सिद्ध कर लिये। इसलिए, तुम भी इन विद्याधरों के साथ मेरी सेना में आकर मिलो। मैं विरोधियों का घातक और नम्रों का रक्षक हूँ ॥१५५-१५८॥
तुमने अनजान में मुनीश की अगम्या कन्या कामचूडामणि का जो अपहरण किया है, उसे मुक्त करो। यह कार्य तुम्हारे लिए अशुभ है॥१५९॥
मेरे ऐसा कहने पर वे सब क्रुद्ध होकर बोले—'वह कौन होता है, जो घमंड के साथ हमें यह सन्देश भेजता है॥१६०॥
वह मनुष्यों के लिए ऐसा सन्देश दे। विद्याधरों में इस प्रकार का सन्देश देनेवाला वह कौन होता है। मनुष्य होकर ऐसा घमंड करता हुआ वह बेचारा नष्ट हो जायगा' ॥१६१॥
यह सुनकर मैंने कहा—'क्या कहा वह कौन होता है? तो सुनो, शिवजी ने अब उन्हें तुम लोगों का चक्रवर्ती बनाया है॥१६२॥
यदि वे मनुष्य हैं तो क्या? मनुष्यों ने तो देवत्व भी सिद्ध कर लिया है और विद्याधरों ने उस मनुष्य का पराक्रम देख लिया है॥१६३॥
उसके यहाँ आने पर तुम लोगों का विनाश होगा, यह निश्चित है। मेरे ऐसा कहने पर वह सारी सभा क्षुब्ध होगई ॥१६४॥
और, श्रुतशर्मा तथा शूरवीर मुझे मारने के लिए दौडे। 'यही आपकी वीरता है?' इस प्रकार मेरे कहने पर दामोदर ने उन्हें रोका तथा शान्त किया और कहा—दूत और ब्राह्मण दोनों अवध्य हैं। उन्हें न मारना चाहिए' ॥१६५-१६६॥
तब विक्रमशक्ति ने मुझसे कहा—'हे दूत, तुम जाओ। तुम्हारे स्वामी के ही समान हम सब भी ईश्वर के बनाये हुए हैं॥१६७॥
'वह आवे। हम सब उसका आतिथ्य करने में समर्थ हैं।' गर्व के साथ उसके इस प्रकार कहने पर मैंने हँसते हुए कहा—॥१६८॥
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३३८ कथासरित्सागर
३३८ कथासरित्सागर शंखाः पश्यन्ते तावन्मात्र कुर्वन्ति सुस्थिताः । यावत् पश्यन्ति नायान्तं मेघमाच्छादिताम्बरम् ॥१६९॥ इत्युक्त्वोत्थाय सावक निर्गत्याहमिहागतः । एवम् प्रहस्ताच्छ्रुत्वा तैस्तुष्टिः प्रापि मयादिभिः ॥१७०॥ निश्चित्य चाह्वोद्योगं सर्वे सेनापति व्यधुः । प्रभासमथ ते सूर्यप्रभाद्या रणदुर्मदम् ॥१७१॥ सर्वे च रणदीक्षायां ते सुवासकुमारातः । निदेशं प्राप्य तवह प्राविशन्नियतव्रताः ॥१७२॥ रात्री सूर्यप्रभश्चात्र शतंरम्यागृहान्तरम् । प्रविष्टामीक्षतापूर्वमिन्द्रो वरकन्यकाम् ॥१७३॥ सा तस्य व्याजसुप्तस्य प्रसुप्तसखिस्य च। स्वैरं निकटमागत्य सखीमाह सहस्मिताम् ॥१७४॥ यदि सुप्तस्य विश्रान्तविलासा'पीयमीदृशी । रूपशोभास्य तत् कीदृक् प्रबुद्धस्य भवेत् सखि ॥१७५॥ तवस्तु न प्रबोध्योऽसौ पूरितं कौतुकं दृशोः । अधिकं हि निमज्जेत किमत्र हृदयेन मे ॥१७६॥ भविष्यत्यस्य संग्रामः समं हि श्रुतशर्मणा । तत्तत्र को विजानाति भाविता किल कस्य किम् ॥१७७॥ प्राप्तव्ययाय शूराणां जायते हि रणोत्सवः । तत्रास्यास्तु शिवं तावत् ततो ज्ञास्यामहे पुनः ॥१७८॥ कामचूडामणियेन किं च व्योमविहारिणा । दृष्टा तस्यास्य हृदयं मादृशी का नु रञ्जयेत् ॥१७९॥ एव तयोक्ते साचावीत् तद् सखी किं ब्रवीष्यतः । असङ्गो हृदयस्यास्मिन्नायत्तश्चण्डि किं तव ॥१८०॥ येन दृष्टेन हृदयं कामचूडामणेह तम् । सोऽप्यस्या न हरेत् कस्या यदि साक्षादरुन्धती ॥१८१॥ विद्याबलाच्च कल्याणं वेत्सि किमास्य सङ्गरे । एतस्य भार्यादृषोक्ताः स्वं सिद्धं सम्भ्रमातिनः ॥१८२॥ १ विश्रान्तः व्यपगतः, विलासो यस्याः, रूपशोभाया विशेषचन् ।
'हंस पद्मवन में तभी तक निश्चिन्तता से बोलते हैं, जबतक आकाश को ढकनेवाले मेघ उन्हें नहीं दीखते ॥१६९॥ वज्रप्रभ के साथ ऐसा कहकर और उठकर मैं चला आया। प्रहस्त द्वारा यह समाचार सुनकर मय आदि ने सन्तोष प्रकट किया ॥१७०॥ तदनन्तर, युद्ध की तैयारी का निश्चय करके सूर्यप्रभ आदि ने युद्ध में पूर्वम प्रभास को सेनापति बनाया ॥१७१॥ अन्य सभी सुवासकुमार से आज्ञा लेकर उस दिन नियम के साथ (विधि-पूर्वक) रण-दीक्षा में दीक्षित हुए ॥१७२॥ नियमानुसार रात्रि में शयन-गृह में जाकर सूर्यप्रभ ने निद्रा-रहित रहकर एक सुन्दरी कन्या को वहाँ देखा ॥१७३॥ वह कन्या जान-बूझकर सोये हुए मन्त्रियोंवाले सूर्यप्रभ के पास आकर साथ खड़ी हुई सखी से कहने लगी—॥१७४॥ 'हे सखि यदि सोये हुए अतएव विकास-रहित (निश्चेष्ट) इसकी रूपशोभा ऐसी है, तो जगी हुई दशा की शोभा कैसी होगी ॥१७५॥ अब रहने दो इसे मत जगाओ आँखों का कौतूहल पूरा हो गया। इसके साथ अधिक दृग्मयता से हृदय को बाँधने से क्या काम है ? ॥१७६॥ श्रुतिधर्मा के साथ होनेवाले युद्ध में कौन जानता है कि किसका क्या होगा ? ॥१७७॥ युद्धोत्सव शूरों के प्राण विनाश के लिए होता है। इसका (सूर्यप्रभ का) भी जाने क्या होगा। इसका कल्याण हो ॥१७८॥ जिस इस आकाशचारी ने कामचूड़ामणि को देखा है, वहाँ मुझ जैसी इसका क्या हृदय- रंजन कर सकती है ? ॥१७९॥ उसके ऐसा कहने पर उसकी सखी ने कहा—'सखि ऐसा क्या कह रही हो क्या तुम्हारा हृदय उसके प्रति आसक्त नहीं हुआ ? ॥१८०॥ जिसने देखते ही कामचूड़ामणि का हृदय हरण कर लिया वह किसका हृदय हरण नहीं कर सकता। भले ही वह सरस्वती क्यों न हो। क्या तू अपनी विद्या के प्रभाव से युद्ध में होनेवाले इसके कल्याण को नहीं जानती ? सिद्धों ने तुम सभी को इसी चक्रवर्ती की भार्या बनाया है ॥१८१ १८२॥
३१० कथासरित्सागरः
३१० कथासरित्सागरः साक्षाद्ब्रह्माभिगम्यश्च मन्त्रना चक्षुरादयः। यावच्च गणिताश्चात्र निष्पन्नेन सुरासुराः॥१८३॥ मर्त्याणामाधिपं यद्ध नहि सिद्धवधो मृषा। किं चादृष्टं श्रुतंमया विस्मयस्यास्य तन्महत् ॥१८४॥ माहात्म्यं भवती यं हि रूपेणाभ्यधिकानघे। मानवाकारता वा मे प्रियस्या यदि तत् सत् ॥१८५॥ ततो हि निखिला भाग्य गतीनामस्ति बाधकः। एतत्तद्भाषितं श्रुत्वा सावाधद्धरकन्यका ॥१८६॥ सखे येन समो भर्त्ता मयार्य मेऽन्यवद्युभिः। मर्त्यं मानुषगोत्रोत्थं जगं जाने स्वविद्यया ॥१८७॥ भिन्दन्मि धारणे ग्लानिं शिक्षाणाञ्चापि किं पुनः। नैतद्योग्यञ्च विज्ञातेण मे दूयते मनः ॥१८८॥ पश्चात्पश्चाद्गिरौ तस्मिं स्तर्सा सार्धं रतिं गुहान्तरे। चित्रार्पित गुणाभाजनं ननर्तिता एव सा ॥१८९॥ रामेण सागरेणू गत्वा सत्र शचींपीयैदि। सत्र तत् प्रभातवत्तारा प्रातरग यदाह्वयः ॥१९०॥ एतच्छ्रुत्वासित सखना व्याजगाद्रौ स वत्सितः। सूर्यप्रभं समिगत्य तामुपाचात वचफाम् ॥१९१॥ दर्शितोऽस्मिन् शुभानि पञ्चाशतो मयि त्वया। तद्येव तत्र गच्छामि कापि लम्बिति संशये ॥१९२॥ एतच्छ्रुत्वा भूतै सर्वगतोऽति प्रपानता। तूष्णीं बभूव सा कन्या तत्सखी तु जगाद सा ॥१९३॥ एषा विद्याधरेन्द्रस्य सुमेरोरनुजात्मजा। कन्या विलासिनी नाम त्वद्दर्शनमकौतुका ॥१९४॥ एवमुक्तवतीमेव तां सखीं सा विलासिनी। 'एहि सम्प्रति गच्छाम' इत्युक्त्वा प्रययौ ततः ॥१९५॥ ततः प्रभासाविभ्यस्तद् प्रबोध्य तदुदीरितम्। सूर्यप्रभः स्वमन्त्रिभ्यः शशंसौषधिसाधनम् ॥१९६॥ चिरायन्ते प्रहस्तं च योग्यं तत्साधनाय सः। तदाख्यातं सुनीथस्य सुमेरोश्च मयस्य च ॥१९७॥
अष्टम लम्बक ३४१
अष्टम लम्बक ३४१
कामचूडामणि तू और सुप्रभा एक ही गोत्र में उत्पन्न हुई हो। इसने इन्हीं दिनों में सुप्रभा का विवाह किया है। तो क्या युद्ध में इसका कल्याण नहीं होगा। सिद्धों की वाणी व्यर्थ नहीं जाती। फिर, सुप्रभा ने इसका चित्त-हरण किया है, तो उससे इसका क्या ? ॥१८४-१८७॥ क्या तू इसका चित्त हरण नहीं कर सकती ? क्योंकि तू रूप में उससे अधिक सुन्दरी है। अपने बन्धु-बान्धवों के कारण यदि तुझे सन्देह है, तो यह ठीक नहीं ॥१८५॥ सती स्त्रियों का पति के सिवाय और कोई बन्धु नहीं है। सखी की यह बात सुनकर वह सुन्दरी कन्या बोली—॥१८६॥ 'हे सखि तूने सच कहा। मुझे अन्याय्य बन्धु-बान्धवों से क्या प्रयोजन ? मैं अपनी विद्या के प्रभाव से जान रही हूँ कि युद्ध में आर्यपुत्र की जीत होगी ॥१८७॥ उसे विद्याधर-चक्रवर्ती होने के कारणभूत सभी रत्न सिद्ध हो चुके हैं और विद्याएँ भी सिद्ध हो गई हैं, किन्तु ओषधियाँ उसे अभी सिद्ध नहीं हुई हैं। इससे मन कुछ व्याकुल है ॥१८८॥ वे सभी ओषधियाँ चन्द्रपाद नामक पर्वत पर गुफा के अन्दर रखी हैं। वे ओषधियाँ किसी पुण्यात्मा चक्रवर्ती को ही सिद्ध होती हैं ॥१८९॥ यदि यह अभी जाकर उन सब ओषधियों को सिद्ध करे, तो इसका कल्याण हो। क्योंकि प्रातःकाल ही इसका युद्ध प्रारम्भ होगा' ॥१९०॥ यह सुनकर, जान-बूझकर सोया हुआ सूर्यप्रभ उठकर उस कन्या से नम्रता के साथ बोला—'हे सुलोचने तून मुझपर अत्यधिक पक्षपात प्रकट किया है। इसलिए मैं अभी वहीं (चन्द्रपाद गिरि पर) जाता हूँ। अब सुबता कि कौन है? ॥१९१-१९२॥ उसकी बातें सुनकर वह कन्या इसलिए लजा गई कि सूर्यप्रभ ने उसकी सारी बातें सुन लीं। अतः वह चुप हो गई। तब उसकी सखी ने सूर्यप्रभ से कहा—॥१९३॥ 'यह विद्याधरों के राजा सुमेरु के छोटे भाई की कन्या विलासिनी है। तुम्हें देखने को बहुत उत्सुकता थी' ॥१९४॥ वह विलासिनी इस प्रकार कहती हुई सहेली को 'आओ चलें' कहकर वहाँ से चली गई ॥१९५॥ तब सूर्यप्रभ ने प्रभास आदि मन्त्रियों को जगाकर ओषधियों की सिद्धि की चर्चा उनसे की ॥१९६॥ और, इनकी सिद्धि के लिए योग्य प्रहस्त को सुमेरु, मय और सुनीथ के समीप भेजा ॥१९७॥
१४२ कथासरित्सागर
१४२ कथासरित्सागर
तैरागतैः सह्याने समं स सचिवान्वितः । निशि सूर्यप्रभः प्रायाच्चन्द्रपादाचलं प्रति ॥१९८॥ गच्छतां च श्रमात्तेषामुतस्थुर्मार्गरोधिनः । यक्षगुह्यककूष्माण्डा विघ्ना नानायुधोद्यताः ॥१९९॥ कांश्चिच्छस्त्रैर्विमोह्यास्थान् कांश्चित् संस्तभ्य विद्यया । चन्द्रपादगिरिं तं ते प्रापुः सूर्यप्रभादयः ॥२००॥ तत्रैषां तद्गुहाद्वारप्राप्तानां शाङ्करा गणाः । एत्य प्रवेशं रुरुधुर्विचित्रविकृताननाः ॥२०१॥ एतैः सह न योद्धव्यं कुप्येद्धि भगवान् हरः । तस्मादष्टसहस्रेण तमथ वरदं स्तुमः ॥२०२॥ तेनैव ते प्रसीदन्ति तद्गणा इत्यवोचत । स सुवासकुमारस्तानथ सूर्यप्रभाविकान् ॥२०३॥ ततस्तथेति सर्वे ते समेत्य हरमस्तुवन् । स्वामिस्तुतिप्रसन्नाश्च तान् वदन्ति स्म ते गणाः ॥२०४॥ मुक्तैषा भो गुहास्माभिर्गृहीतास्यां महौषधीः । सूर्यप्रभेण स्वेनैत्या न प्रवेष्टव्यमात्मना ॥२०५॥ प्रभासः प्रविशत्वेतामेतस्य सुगमा ह्यसौ । एतद्गणवचः सर्वे ते तथेत्यनुमेनिरे ॥२०६॥ ततः प्रविशतस्तस्य प्रभासस्य तदैव सा । गुहा बह्वन्धकारापि सुप्रकाशा किमप्यभूत् ॥२०७॥ उत्थाय च महाघोररूपा अप्यत्र राक्षसाः । चत्वारः निष्ठुरा ऊचुः प्रणता प्रविशेति तम् ॥२०८॥ अथ प्रविश्य संगृह्य दिव्याः सप्तौषधीः स ताः । प्रभासो निर्गतः सूर्यप्रभाय निखिला ददौ ॥२०९॥ महाप्रभावाः सप्तैताः सिद्धाः सूर्यप्रभस्य ताः । ओषध्य इति तत्कालं गगनादुदनादयत् ॥२१०॥ तच्छ्रुत्वा मुदिताः सूर्यप्रभाद्याः सर्व एव ते । स्वसैन्यमायुः क्षिप्रं सुमेर्वास्पदमश्रितम् ॥२११॥ तत्रापृच्छत् सुनीतोऽथ तं सुवासकुमारकम् । मुने सूर्यप्रभं हित्वा प्रभासः किं प्रवेशितः ॥२१२॥
अष्टम लम्बक १४१
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इस बात पर विश्वास करके उन सब के जाने पर उनके वीर मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ रात्रि में ही चन्द्रपाद गिरि पर गया ॥१९८॥ जाते हुए उनके मार्ग में शस्त्र उठाये हुए यक्ष गुह्यक कूष्मांड आदि विघ्न करने के लिए खड़े हो गये ॥१९९॥ उनमें से कुछ को शस्त्रों से विवश करके और कुछ को विद्या-प्रभाव से मोहित करके सूर्यप्रभ आदि चन्द्रपाद गिरि पर पहुँच गये ॥२००॥ वहाँ गुफा के द्वार पर पहुँचने पर विचित्र आकृतिवाले शिवजी के गणों ने उन्हें गुफा में आने से रोका ॥२०१॥ 'इसके साथ युद्ध न करना चाहिए क्योंकि इससे भगवान् शिव क्रुद्ध हो जायेंगे। इसलिए शिव के अष्टोत्तर शत नाम के पाठ से उन्हीं वरदायक की स्तुति करते हैं। ये उनके गण इसी से प्रसन्न होते हैं' सुबाहुकुमार ने इस प्रकार सूर्यप्रभ आदि से कहा ॥२०२-२०३॥ तब वे इसी प्रकार शिव की स्तुति करने लगे। स्वामी की स्तुति से प्रसन्न होकर वे गण उनसे बोले—'हमने इस गुफा को छोड़ दिया है। आपलोग महौषधियों को लें किन्तु सूर्यप्रभ स्वयं उसमें प्रवेश न करें ॥२०४-२०५॥ केवल प्रभास ही उसमें जाय यह गुफा उसके लिए सुगम है। गणों की बातें सुनकर उन सब ने उसे स्वीकार किया ॥२०६॥ तदनन्तर प्रभास के प्रवेश करते ही वह अँधेरी गुफा कुछ प्रकाशित हो गई ॥२०७॥ गुफा के अन्दर बैठे हुए अति भयंकर रूपवाले चार राक्षस उठकर प्रणाम करते हुए उससे बोले—'आइए' ॥२०८॥ तब प्रभास ने अन्दर जाकर और उन दिव्य सात ओषधियों को लेकर और बाहर आकर उन्हें सूर्यप्रभ को दिया ॥२०९॥ उसी समय आकाशवाणी हुई कि ये सातों ओषधियाँ महाप्रभावशालिनी हैं। हे सूर्यप्रभ ये ओषधियाँ तुम्हें सिद्ध हो गई ॥२१०॥ यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न वे सभी वहाँ से चलकर सुमेध के आश्रम में स्थित अपने सेना शिविर में लौट आये ॥२११॥ वहाँ आकर सुनीथ ने सुबाहुकुमार से पूछा कि 'गुफा में सूर्यप्रभ को रोककर प्रभास को क्यों जाने दिया इन दोनों में क्या अन्तर है ?॥२१२॥
१४२ कथासरित्सागर
१४२ कथासरित्सागर
तैरागते तदह्नाने समं स सचिवान्वितः। निशि सूर्यप्रभः प्रायाच्चन्द्रपादाचलं प्रति॥१९८॥ गच्छतां च क्रमात्तेषामुत्तस्थुर्मार्गरोधिनः। यक्षगुह्यककूष्माण्डा विघ्ना नानायुधोद्यताः॥१९९॥ कांश्चिदस्त्रैर्विमोह्यैतान् कांश्चित् संस्तभ्य विद्यया। चन्द्रपादगिरिं तं ते प्रापुः सूर्यप्रभादयः॥२००॥ तत्रत्यां तद्गुहाद्वारप्राप्तानां शाङ्करा गणाः। एत्य प्रवर्त्त रुरुधुर्विचित्रविकृताननाः॥२०१॥ एतैः सह न योद्धव्यं कुप्येद्धि भगवान् हरः। तस्मादष्टसहस्रेण तमद्य परव स्तुमः॥२०२॥ येनैव ते प्रसीदन्ति तद्गणा इत्यबोचत। स सुवासकुमारस्तानथ सूर्यप्रभादिकान्॥२ ३॥ ततस्तथेति सर्वे त तथैव हरमस्तुवन्। स्वामिस्तुतिप्रसन्नाश्च तान् वदन्ति स्म ते गणाः॥२०४॥ मुक्तेयं भो गुहास्माभिर्गृहीतास्यां महौषधीः। सूर्यप्रभेण त्वेतस्यां न प्रवेष्टव्यमात्मना॥२०५॥ प्रभासः प्रविशत्वेतामेतस्य सुगमा ह्यसौ। एतद्गणवचः सर्वे ते तथेत्यनुमेनिरे॥२ ६॥ ततः प्रविशतस्तस्य प्रभासस्य तदैव सा। गुहा बद्धान्धकारापि सुप्रकाशा किमप्यभूत्॥२०७॥ उत्थाय च महाघोररूपा अप्यत्र राक्षसाः। चत्वारः किङ्करा ऊचुः प्रणताः प्रविशेति तम्॥२०८॥ अथ प्रविश्य संगृह्य दिव्याः सप्ताौषधीः स ताः। प्रभासो निर्गतः सूर्यप्रभाय निखिला ददौ॥२ ९॥ महाप्रभावाः सप्तैताः सिद्धाः सूर्यप्रभश्च ते। ओषध्य इति तत्कालं गगनादुदगाद्वाक्॥२१०॥ सञ्जातहर्षा मुदिताः सूर्यप्रभाद्याः सर्वे एव ते। स्वसैन्यमाययुः क्षिप्रं सुमेर्वास्पदमाश्रितम्॥२११॥ तत्रापृच्छत् सुनीतोऽथ तं सुवासकुमारकम्। मुने सूर्यप्रभं हित्वा प्रभासः किं प्रवेशितः॥२१२॥
षष्ठम लम्बक १७५
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षष्ठम लम्बक १७५ तथा यक्षों और किन्नरों ने भी गुहा में उसका स्वागत किया इसका क्या रहस्य है? यह सुनकर सभी को सुनाते हुए मुनि गुणघकुमार ने कहा—'सुनो कहता हूँ। प्रभास गुप्तप्रभ का अत्यन्त हितकारी है, इन दोनों में परस्पर भेद नहीं है॥२१३-२१४॥ प्रभास के समान शूरता और प्रभावशालिता में दूसरा व्यक्ति नहीं है। इसके पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से यह गुफा वशी की है॥२१५॥ अब इसके पूर्वजन्म का हाल कहता हूँ जैसा कि वह पहले था। प्राचीन समय में नमुचि नाम का श्रेष्ठ दानव था॥२१६॥ वह इतना महान् दानी था कि माँगते हुए शत्रु के लिए भी उसे कुछ अदेय नहीं था॥२१७॥ उसने दस हज़ार वर्षों तक केवल धुँआँ पीकर ही तपस्या की। इस कारण उसने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया कि वह लोहा पत्थर और लकड़ी से मारा न जाय॥२१८॥ तब उसने इन्द्र को बाँधकर भगा दिया। कश्यप आदि महर्षियों ने मध्यस्थ बन करके देवसभा में उसकी सन्धि (मित्रता) करा दी॥२१९॥ तदनन्तर, सुरों और असुरों ने परस्पर बैर-भाव छोड़कर मन्दराचल द्वारा क्षीरसमुद्र का मथन किया और उससे निकले हुए लक्ष्मी आदि रत्नों को विष्णु आदि देवताओं ने परस्पर बाँट लिया और उसी नियमानुसार नमुचि दानव के अपने हिस्से में उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा पाया॥२२०-२२१॥ इसी प्रकार, भगवान् देवताओं और दानवों ने ब्रह्मा के निदेशन के अनुसार समुद्र से निकले रत्नों को बाँट लिया॥२२२॥ मन्थन के अन्त में जब अमृत निकला तब उसे देवता लोग हरण कर ले गए। इस कारण देवों और दानवों की आपस में फिर शत्रुता हो गई॥२२३॥ और उनमें परस्पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में जो भी असुर सुरों द्वारा मारे जाते थे उन्हें उच्चैःश्रवा सूँघ-सूँघकर पसीने द्वारा पुनर्जीवित कर देता था॥२२४॥ इस कारण दैत्य और दानव देवताओं के लिए अजेय हो गए। तब चिन्तित इन्द्र को एकान्त में ले जाकर बृहस्पति ने कहा—'अब तुम्हारे लिए एक ही उपाय है। उसे शीघ्र ही कर डालो। तुम स्वयं जाकर नमुचि से उच्चैःश्रवा को दान में माँगो॥२२५-२२६॥ क्योंकि नमुचि दानव ऐसा दानी है कि वह अपनी दानशीलता के कारण प्राणों के लिए पूछे जाने पर संकोच नहीं करेगा। तब उसने इन्द्र से छल किया और इन्द्र द्वारा वध का भागी होने के कारण वह मारा गया॥२२७॥ ४४
१४६ कथासरित्सागर
१४६ कथासरित्सागर इत्युक्तो देवगुरुणा महेन्द्रस्त्रिदशैः सह। गत्वा ययाचे नमुचिं तमुच्चैःश्रवसं हयम् ॥२२८॥ न मे पराङ्मुखो गच्छेत्प्रार्थी सन्नापि वासवः। तस्मै नमुचिर्भूत्वा दद्यां नाहं कथं हयम् ॥२२९॥ जगत्सु वसुदाकीर्तिर्या मया चिरमर्जिता। सा चेन्म्लानिं गता तन्मे किं धिया जीवितेन वा ॥२३०॥ इति सञ्चिन्त्य शक्राय तमुच्चैःश्रवसं ददौ। वार्यमाणोऽपि शुक्रेण नमुचिः स महायशः ॥२३१॥ दत्ताश्वमथ विश्वास्य तं गाङ्गेन जघान सः। शस्त्राद्यवध्यं फेनेन वञ्चयन्नस्तनं वृत्रहा ॥२३२॥ अहो दुरन्ता संसारे भोगतृष्णा यया हताः। अनौचित्यादकीर्तेश्च देवा अपि न बिभ्यति ॥२३३॥ तच्छ्रुत्वा तस्य नमुचेरनुमाता तपोबलात्। चकार दुःखसन्तप्ता सङ्कल्पं शोकशान्तये ॥२३४॥ स एव मे पुनर्गर्भे सम्भूयान्नमुचिर्बली। भूयाच्च सर्वदेवानामजेयः संयुगेष्विति ॥२३५॥ ततः स तस्याः सम्भूय गर्भे जातोऽसुरः पुनः। सर्वरत्नमयो नाम्ना प्रबलो बलयोगतः ॥२३६॥ सोऽपि तप्ततपाः प्रीणन् प्राणैरप्यर्थिनः कृती। शतकृत्वो जिगायेन्द्रं प्रबलो दानवेश्वरः ॥२३७॥ ततः सम्मन्त्र्य देवास्तमुपेत्येदं ययाचिरे। देहं पुरुषमेधार्थमस्मभ्यं देहि सर्वथा ॥२३८॥ तच्छ्रुत्वा स रिपुभ्योऽपि तेभ्यो देहमदान्निजम्। प्राणानुदारा विसृजन्त्यर्थिनो न पराङ्मुखान् ॥२३९॥ ततः स खण्डशो देवैः कृतः प्रबलदानवः। मनुष्यलोके जातोऽथ प्रभाववपुषा पुनः ॥२४०॥ तदेयमास्ते नमुचिस्ततोऽभूत् प्रबलश्च सः। शैष मस्तत्पुन न्ददुर्जयोऽरिभिः ॥२४१॥ गमनम्। वेदेषु नरमेधविचारो नास्तीति श्रौतप'
देव गुरु के ऐसा कहने पर इन्द्र स्वयं देवताओं के साथ नमुचि से घोड़ा मांगने गया ॥२२८॥ मुझसे मांगनेवाला याचक कभी विमुख नहीं होता उसमें भी देवराज इन्द्र। तो मैं नमुचि होकर इसे घोड़ा क्यों न दूँ ? मैंने तीनों लोकों में चिरकाल से जो कीर्ति अर्जित की है, यदि वही मलिन हो गई, तो मेरे वैभव और जीवन से क्या लाभ ? ॥२२९-२३०॥ ऐसा सोचकर उदारहृदय नमुचि ने गुरु शुक्राचार्य के रोकने पर भी इन्द्र को घोड़ा दे दिया ॥२३१॥ उसके घोड़ा देने पर भी उसे निःशस्त्र बनाकर इन्द्र ने वज्र पर रखे हुए गंगा के फेन से उसे मार डाला क्योंकि वह अन्य अस्त्र-शस्त्रों से नहीं मारा जा सकता था ॥२३२॥ आश्चर्य है कि संसार में भोग की तृष्णा का अन्त नहीं है। इस तृष्णा के वशीभूत होकर देवता भी अनुचित कार्य करने से तथा अपयश से नहीं डरते ॥२३३॥ इस वृत्तान्त को जानकर दुःखित नमुचि की माता दनु ने अपने तपोबल से शोक की शान्ति के लिए यह संकल्प किया कि 'बलवान् नमुचि फिर मेरे गर्भ से उत्पन्न हो और वह युद्ध में देवताओं से अजेय रहे' ॥२३४-२३५॥ तदनन्तर, वह बलवान् नमुचि अत्यन्त बलशाली होने के कारण प्रबल नाम से पुनः दनु के गर्भ से उत्पन्न हुआ। उस प्रबल नामक दानवराज ने इन्द्र को सौ बार पराजित किया और वह याचकों के लिए जीवन तक देने के लिए सदा सन्नद्ध रहता था ॥२३६-२३७॥ उससे बार-बार पराजित होकर देवताओं ने मन्त्रणा करके उससे कहा—'हमलोग नरमेध यज्ञ करना चाहते हैं इसके लिए हमें अपना शरीर-दान करो ॥२३८॥ यह सुनकर उस प्रबल दानी दानव ने माँगने पर उन शत्रुओं को भी अपना शरीर दान में दे दिया। उदार व्यक्ति अपने प्राणों का दान कर देते हैं किन्तु याचक को विमुख नहीं होने देते ॥२३९॥ तदनन्तर देवताओं ने उस दानव के टुकड़े-टुकड़े कर डाला। वही प्रबल दानव आज प्रभास के रूप में मनुष्य-लोक में उत्पन्न हुआ है ॥२४०॥ यह पहले नमुचि तदनन्तर प्रबल रूप में जन्मा। वही आज प्रभास के रूप में है और पूर्व पुण्य के कारण शत्रुओं से अजेय है ॥२४१॥
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर या च सम्बन्धिनी तस्य प्रशस्तस्यौषधीगुहा । तेन प्रभासस्यात्मीया वश्या सास्य सकिङ्करा ॥२४२॥ तदधश्चास्ति पाताले मन्दिरं प्रबलस्य तत् । यत्र द्वादश सन्त्यस्य मुख्यभार्याः स्वलङ्कृताः ॥२४३॥ विविधानि च रत्नानि नानाप्रहरणानि च । चिन्तामणिश्च लक्षं च योधानां तुरगास्तथा ॥२४४॥ तत्प्रभासस्य सम्बन्धि सर्वमस्य पुरोजितम् । सर्वोदृशं प्रभासोऽयं नास्त्येद किञ्चिदद्भुतम् ॥२४५॥ एवं ततो मुनिकुमारक्तो निशम्य सूर्यप्रभप्रभृतयः समयप्रभासाः । रत्नाद्यवाप्तुमथ संश्रयमुस्तदैव पातालमङ्गं प्रबलवेश्मबिलप्रवेष्ठम् ॥२४६॥ तेम प्रविश्य परिगृह्य च पूर्वपत्नी— श्चिन्तामणिं च तुरगानसुरांश्च योधान् । निर्गत्य प्राप्तनिखिलद्रविणः स एकः सूर्यप्रभं किमपि तोषितवान् प्रभासः ॥२४७॥ अथ समयसुनीथः सप्रभासः सुमेरु— प्रभृतिभिरनुयातो राजभिर्मन्त्रिभिश्च । द्रुतमभिमतसिद्धिं प्राप्य सूर्यप्रभोऽसौ पुनरपि निजसेनासन्निवेशं तमागात् ॥२४८॥ तत्र सोऽसुरनराधिपादिषु स्वस्ववासकगतेषु तेषु तम् । रात्रिशेषमनयत् कुशास्तरे सन्निगृह्य रणदीक्षितः पुनः ॥२४९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके तृतीयस्तरङ्गः । चतुर्थस्तरङ्गः रणभूमौ सूर्यप्रभस्य युद्धसज्जा ततः प्रातः समं सैन्यैः स सुमेरुतपोवनात् । तस्मात्सूर्यप्रभः प्रायाच्छत्रून्विजिगीषया ॥१॥ सनिवासस्य निकटं त्रिकूटाद्रेश्चाप्य च । भावासितोऽभूत्तत्रत्यं बलेनोत्सार्य तद्बलम् ॥२॥
अष्टम लम्बक ३४९
अष्टम लम्बक ३४९ यह गुफा उसी प्रबल दानव की है। इसी कारण वह उन पहरेदारों के साथ यह उसी के अधीन है॥२४२॥ उस गुफा के नीचे प्रबल का भवन है, जहाँ अलंकारों से सजी हुई उसकी बारह पत्नियां रहती हैं॥२४३॥ वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्न और विविध प्रकार के मन्त्र-शस्त्र हैं। चिन्तामणि है और एक लाख घोड़ा है और उतने ही घड़े भी हैं॥२४४॥ प्रभास की ये सब वस्तुएँ उसके पहले जन्म की कमाई हैं। इस प्रकार यह प्रभास की कहानी है। अतः इसके लिए यह सब कुछ आश्चर्य नहीं है ॥२४५॥ मुनि सुबाहुकुमार के मुख से यह सब सुनकर सूर्यप्रभ, सुनीथ, मय, प्रभास आदि सभी रत्न आदि की प्राप्ति के लिए पाताल-स्थित प्रबल के गुहा-मन्दिर में गए ॥२४६॥ उसमें प्रवेश करके प्रभास ने अपने पूर्वजन्म की पत्नियों, चिन्तामणि, घोड़ा, मणियाँ तथा मन्त्र-रत्नों को बाहर लाकर सूर्यप्रभ को कुछ सन्तुष्ट किया ॥२४७॥ तब मय, सुनीथ और सुमेरु के साथ अपने मन्त्रियों के संग सूर्यप्रभ अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर फिर सेना-शिविर में लौट आया ॥२४८॥ वहाँ पर असुर और मानव-राजाओं के अपने-अपने निवास-भवन में चले जाने पर स्वयं भी रण-दीक्षा का व्रत लेकर सूर्यप्रभ ने गुहा के आँगन पर रात्रि व्यतीत की ॥२४९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथामरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना रात बीतने पर प्रातःकाल वह सूर्यप्रभ सुमेरु के शासन से अपनी सेना के साथ अमरावती को जीतने के लिए चला ॥१॥ वहाँ से चलकर मन्दरादि के विशाल-स्थल त्रिकूट पर्वत पर पहुँचकर वहाँ पड़ी हुई उसकी सेना, काहलपूर्वक सुनकर सूर्यप्रभ ने अपनी सेना का शिविर स्थापित किया ॥२॥
१५० कथासरित्सागर
१५० कथासरित्सागर आराधितश्च सत्रास्मिन् गन्तुमभ्यधिके। आख्यानस्य त्रिरेतेनमन्वयो द्रुत आनये ॥३॥ स पादाय जगादैतं मुदद गन्धर्वदारकम्। अवाप्यैतां राजा तव गच्छिष्यसि ॥४॥ दूरङ्गमेण स तन्त्राभिगणार्थं जातुचित् श्रुतः। मदाग्मन्त्यियं प्राप्य स एनं प्रापयिष्यति गृहम् ॥५॥ ततस्तिलोत्तमानाम्नी या विद्याध्र्या व्योमगाम्। अगमत् शत्रु गच्छन् मुमद प्रत्युवाच तम् ॥६॥ मातु नामसमयं पात्यमश्विव शान्तदारकम्। प्रादिशन्न पर घोरे गच्छशीघ्रं स्वकालयम् ॥७॥ गमिष्य वरमादित्यं विशामित्यभ्यधत्त। गच्छन्त्या तपसागारं स दूतः स प्रभू दिशः ॥८॥ अथाप्राक्... गुं... गुर्दप्रभाच। गेयानि शृण्वन् गीतानि निर्विन्तानि पृथक्पृथक् ॥९॥ सा गताथ गिरं समुवाच भवगुहम्। इहिला स्थानातादयतोदय तंग न ॥१०॥ तत बभोव सुप्तोत्थातुका निष्प्रभा। तत्क्षणं च गतं त्वां दृष्ट्वाच हताशम् ॥११॥ अहो कदर्यचित्तो मेऽसिन्ना शठस्तथा। यस्त्वां तदवस्थं दृष्ट्वा निम्प्रीति बा ॥१२॥ इतस्ततश्चेव शठस्यानेया कृपा। अधुने परिणामश्च दुर्जनस्याभवत्किल ॥१३॥ पुनस्ते दृश्यां विद्याधर्या कुभार्या। त्वां तद्विमुदं तव मुक्त्वा यत ॥१४॥ इत्याशा हीनश्च व्योमगो गन्तुमुद्यतः। यावत् पश्यति खे तावत्तदीयं फलम् ॥१५॥ दृष्ट्वा विस्मयवान् गन्धर्वः सखे ह। त्वं कश्च्युतोऽसि कस्माद् वा तव । (१६) किञ्च कथय तत्सर्वं भवतः। इत्युक्तः सतु तस्मै स्ववृत्तान्तमकथयत् ॥ १७॥
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