कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ४०१
नवम लम्बक ४०१ सौन्दर्य-सुधामयी उस रूपलता को नेत्रों से पान करता हुआ राजा पृथ्वीरूप उसी प्रकार अतृप्त रहा जैसे अधिकाधिक चन्द्रिका का पान कर लेने पर भी चकोर अतृप्त ही रह जाता है ॥१५४॥ और वह चित्रकार से बोला-'मित्र इसे बनानेवाले ब्रह्मा और इसे चित्र में उल्लेख करनेवाले तुम दोनों के हाथ वन्दनीय हैं जिसने इस रूप का निर्माण किया और जिसने इसे चित्रपट पर चित्रित किया ॥१५५॥ अतः मैं रूपधर राजा की बात को स्वीकार करता हूँ। मुक्तिपुर द्वीप को जाकर उसकी कन्या को विवाहित करता हूँ ॥१५६॥ इतना कहकर भिक्षु तथा दूत को धन आदि से पुरस्कृत करके वह चित्रपट में रूपलता को देखता हुआ बैठा रहा ॥१५७॥ और, अपने उद्यानों में भ्रमण करके उस विरही राजा ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत किया। तदनन्तर, लग्न आदि का निश्चय कराकर दूसरे ही दिन राजा ने बरात-सहित मुक्ति पुर द्वीप की ओर प्रस्थान किया ॥१५८॥ राजा की बरात में हाथी घोड़े सामन्त राजा राजकुमार, राजा रूपधर का चित्रकार और वे दोनों भिक्षु आदि सभी सम्मिलित थे ॥१५९॥ राजा स्वयं मंगलघट नामक हाथी पर चढ़कर क्रमशः जाता हुआ कुछ दिनों में विन्ध्या- टवी के द्वार पर आकर ठहर गया ॥१६०॥ दूसरे दिन वह राजा पृथ्वीरूप शत्रुमर्दत नामक हाथी पर सवार होकर विन्ध्य के घोर जंगलों में प्रविष्ट हुआ ॥१६१॥ जब वह कुछ ही दूर गया था तब उसने अपनी सेना को सहसा वापस भागते हुए देखा ॥१६२॥ 'यह क्या है'-ऐसा घबड़ाकर सोचते हुए राजा पृथ्वीरूप के समीप आकर हाथी पर चढ़े हुए निर्भय नामक राजपुत्र ने कहा-'महाराज आगे भीलों की बड़ी सेना है। उन भीलों ने हमारे पचास हाथी मार डाले और एक हजार पैदल सिपाही और तीन सौ घोड़े भी उन्होंने मार डाले। इसी प्रकार, हमारे सैनिकों ने भी दो हजार भील मार दिये ॥१६३-१६५॥ यदि हमारी सेना में एक शव देखा जाता था तो उनकी सेना में दो। तब उनके बाण-वृष्टी से मारे जाते हुए हमारे सैनिक वहाँ से भाग आये ॥१६६॥ यह सुनकर वह राजा पृथ्वीरूप तुरन्त दौड़ पड़ा और भीलों की सेना का इस प्रकार नाश करने लगा जिस प्रकार कौरवों की सेना का संहार, अर्जुन ने किया था ॥१६७॥ निर्भय आदि राजकुमारों द्वारा अनेक भीलों के काट दिये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने एक बाण से भीलों के सरदार का सिर काट दिया ॥१६८॥ ६
४७४ कथासरित्सागर
४७४ कथासरित्सागर बाणव्रणगलद्रक्तस्तस्तस्येभं शुशुभेर्दन्। सधातुनिर्झरोद्गारमञ्जनाद्रि म्व्यडम्बयत् ॥१६९॥ ततो लब्धजयावृत्ते तत्सैन्ये मिलितेऽखिले। पराभ्य हतशेषास्ते भित्वा दक्ष दिशो ययुः ॥१७०॥ ततो निवृत्तसंग्रामः पृथ्वीरूपो महीपतिः। स रूपभरदूतेन स्तूयमानपराक्रमः ॥१७१॥ व्रणितानीकविश्राम्य तस्यामेवाटवीभुवि। विजयी सरसीतीरे दिवसं वसति स्म सम् ॥१७२॥ प्रातस्तत प्रयातम्च स राजा क्रमशो व्रजन्। तत्राप नगरं वज्रपुरं तीरस्थमम्बुधेः ॥१७३॥ तत्रैकाहं विशश्राम तम्रत्येन महीभुता। उदारचरिताख्येन रचितोचितसत्क्रियः ॥१७४॥ तेनैवोपहृतैर्यानपात्रैस्तीर्त्वा च सागरम्। अष्टभिर्दिवसैः प्राप द्वीप मुत्तिपुर स तत् ॥१७५॥ बुद्ध्वा रूपभरस्तच्च राजा हृष्टस्तमभ्यगात्। मिलन्त स्म च तौ भूपौ कृतकण्ठग्रहौ मिथः ॥१७६॥ ततस्तेन समं पृथ्वीरूपो राजा स तत्पुरम्। विवेश पौरनारीणां पीयमान इवेक्षणैः ॥१७७॥ तत्र हेमलता राज्ञी स च रूपधरो नृपः। दृष्ट्वानुहपं दुहितुर्भर्तारं सं ननन्दतुः ॥१७८॥ अथ स्वसम्पदुचितं राज्ञा रूपधरेण सः। आचाररचितस्वस्तौ पृथ्वीरूपोऽत्र पार्थिवः ॥१७९॥ अम्युद्यतशिरोकाया वेदीमारुह्य शोभनः। लग्ने रूपलतायाः स सोत्सवः पाणिमग्रहीत् ॥१८०॥ सत्यं श्रुतं त्वया पूर्वमिति वक्तुमिव श्रुतिम्। प्रापोत्फुल्ला तयोर्दृष्टिरन्योन्यरूपवर्धिनोः ॥१८१॥ रत्नानि छात्रमोशेषु द्वयो रूपधरस्तयोः। ददौ तथा यथा सैष मन रत्नाकरो जनैः ॥१८२॥ निर्वृत्ते च सुतोद्वाह् पित्रङ्गच्छमणाना तान्। सम्पूज्य वस्त्राभरणैः सर्वानन्यानपूजयत् ॥१८३॥
नवम लम्बक — ४०५
नवम लम्बक — ४०५ बाणों के घावों से गिरते हुए रक्त की धारा से रंजित राजा का हाथी शत्रुमादन गेरू व सरजोंवाले अंजन पर्वत का अनुकरण कर रहा था ॥१६९॥ विजयी होकर राजा के लौटने पर उसकी समस्त सेना आकर वहाँ एकत्र हुई और मरने से बची हुई भीलों की सेना के सिपाही इधर-उधर भाग गये ॥१७०॥ तदनन्तर, युद्ध समाप्त करके लौटे हुए राजा पृथ्वीरूप के पराक्रम की प्रशंसा रूपधर के दूत ने की। विजयी राजा ने थकित सेना की विश्रान्ति के लिए, उसी वनभूमि में एक तालाब के किनारे अपना शिविर लगा दिया ॥१७१-१७२॥ इस प्रकार, क्रमशः यात्रा करता हुआ राजा समुद्र-तट पर पद्मपुर नगर में जा पहुँचा ॥१७३॥ पद्मपुर के राजा उदारचरित द्वारा समुचित सत्कार किये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने एक रात उसी नगर में विश्राम किया ॥१७४॥ और प्रातःकाल उसी राजा द्वारा मंगाये गये जहाजों और नावों पर सवार होकर आठ दिनों में समुद्र के मार्ग से मुक्तिपुर द्वीप में बरात के साथ राजा पृथ्वीरूप जा पहुँचा ॥१७५॥ उसके आगमन की सूचना पाकर प्रमप्रदित राजा रूपधर बरात की अगवानी के लिए आया और वे दोनों राजा परस्पर गले मिले ॥१७६॥ तब राजा रूपधर के साथ राजा पृथ्वीरूप उस द्वीप की राजधानी में जाकर उसके अनुरूप स्वागत-सत्कार करती हुई नागरिक स्त्रियों के मानो वह नेत्रों द्वारा पिया जा रहा था। राजभवन में पहुँचने पर राजा रूपधर और रानी हेमलता ने अपनी कन्या के अनुरूप जामाता को देखकर अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया ॥१७७-१७८॥ तदनन्तर, राजा रूपधर ने अपनी सम्पत्ति के अनुसार समुचित आतिथ्य-सत्कार द्वारा ससैन्य राजा पृथ्वीरूप को वहीं ठहराया ॥१७९॥ दूसरे दिन, वेदी में बैठकर, शुभ लग्न में राजा पृथ्वीरूप ने विधिवत् गो उपांगिया रूपलता का पाणिग्रहण किया ॥१८० ॥ परस्पर सौन्दर्य-साम्य देखने के कौतूहल से उन दोनों की ओर जाती आँखों का मान यह कहने के लिए उनके पास तक चली गई थी कि जैसा ही सुनने लगा था वैसा ही हमने देखा ॥१८१॥ राजा रूपधर ने लाख हवन के प्रचुर अवभृथ पर इतने रत्न उस वर-वधू को दिए कि लोगों ने उसे सचमुच रत्नाकर समझा ॥१८२ ॥ कन्या का विवाह सम्पन्न होने पर उस राजा रूपधर ने चित्रकार कुमारदत्त वैश्य जितुंघा तथा अन्यान्य सम्मानित व्यक्तियों का धन आदि से यथोचित सत्कार किया ॥१८३॥
४७६ - कथासरित्सागर
४७६ - कथासरित्सागर तत पुरे स्थितस्तस्मिन्पृथ्वीरूपनृपोऽथ सः। तद्दीपोचितमाहारं भेजे पानं च सानुगः ॥१८४॥ नृत्तगीतादिविधिभिर्गते दिने नक्तं विवेश च। शूल्को रूपलतावासभवनं सोऽवनीपतिः ॥१८५॥ आस्तीर्णरत्नपर्यङ्कं रत्नकुट्टिमशोभितम्। रत्नस्तम्भोम्भिताबोगं रत्नदीपैः प्रकाशितम् ॥१८६॥ तत्र भेजे तया सार्कं स रूपलतया युवा। धिरसङ्कल्पगुणितं यथेच्छं सुरतोत्सवम् ॥१८७॥ सुरतश्रमसुप्तश्च पठद्भिर्वन्दिमागधैः। बोधितः प्रातरुत्थाय तस्थाविन्द्रो यथा दिवि ॥१८८॥ एवं दश दिनान्यत्र पृथ्वीरूपनृपो वसन्। द्वीपे नवनवैर्भोगैर्विलसन् श्वशुराहृतैः ॥१८९॥ एकादशे दिने युक्तः स रूपलतया ततः। गणकानुगतो राजा प्रतस्थे कृतमङ्गलः ॥१९०॥ कृतानुयामः श्वशुरेणासमुद्रतटं च सः। वध्वा सह प्रवहणान्यारुरोहानुगायितः ॥१९१॥ दिनाष्टकेन तीर्त्वाब्धिं तीरस्थे मिलिते बले। उदारचरिते चाप्तप्राप्ते पत्रपुरं ययौ ॥१९२॥ तत्रोपचरितस्तेन राज्ञा विश्रम्य कानिचित्। दिनानि स ततः प्रायात् पृथ्वीरूपो नरेश्वरः ॥१९३॥ प्रियां रूपलतां हस्तिन्यारोप्य जयमङ्गले। रूक्ष्यांगगिरिनामानमात्मनारुह्य च द्विपम् ॥१९४॥ गच्छन् क्रमादविरतैः सोऽथ राजा प्रयाणकैः। उत्पलाकम्वजं प्राप प्रतिष्ठानं निजं पुरम् ॥१९५॥ तत्र रूपलतां दृष्ट्वा रूपदर्पं पुराङ्गनाः। जहुस्तत्कालमाश्चर्येनिर्निमेषविलोचनाः ॥१९६॥ राजधानीं प्रविश्याथ पृथ्वीरूपः कृतोत्सवः। ददौ चित्रकृते तस्मै ग्रामाम् राजा धनं च सः ॥१९७॥ श्रमणों पूजयित्वा च वसुभिस्तो यथोचितम्। सामन्तान् सचिबान् राजपुत्रांश्च सममानयत् ॥१९८॥
नवम लम्बक ४७७
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तदनन्तर उस नगर में रहते हुए राजा पृथ्वीरूप ने अपने साथियों के साथ उस द्वीप के अनुसार भोजन-पान आदि स्वीकार किया ॥१८४॥ नाच-गान में दिन व्यतीत करके राजा पृथ्वीरूप रात को उत्कण्ठा के साथ रूपलता के शयन-भवन में गया ॥१८५॥ उस शयनागार में रत्नों से जड़ा हुआ पलंग बिछा था। शयनागार की भूमि भी रत्नों से जड़ी हुई थी। भवन के मध्य में रत्नों से जड़े हुए खम्भे चमक रहे थे और भवन रत्नों के दीपों से जगमगा रहा था ॥१८६॥ उस शयनागार में वह युवा राजा पृथ्वीरूप उस रूपलता के साथ चिरकाल की उत्कण्ठा के कारण दूने और चौगुने उत्साह तथा प्रेम से आनन्द-मग्न हो गया ॥१८७॥ आनन्द-विलास से थककर सोया हुआ राजा पृथ्वीरूप प्रातःकाल गाते हुए बन्दियों द्वारा जगाया गया ऐसा शोभित हो रहा था जैसा कि स्वर्ग में इन्द्र ॥१८८॥ इस प्रकार, श्वशुर रूपधर द्वारा प्रस्तुत किये गये नाना प्रकार के भोगों का आनन्द लेता हुआ पृथ्वीरूप दस दिनों तक उस द्वीप में रहा ॥१८९॥ ग्यारहवें दिन ज्योतिषियों के कथनानुसार रूपलता के साथ राजा पृथ्वीरूप मंगला- चरण करके वहाँ से चला ॥१९०॥ समुद्र के तट तक श्वशुर राजा रूपधर द्वारा पहुँचाया गया राजा पृथ्वीरूप जलयान पर सवार हुआ और उसके साथी भी यथायोग्य जलयानों पर उसके साथ सवार हुए। आठ दिनों तक निरन्तर समुद्र-यात्रा करने के पश्चात् उनके जलयान समुद्र के तीर पर पहुँचे जहाँ राजा की सेना अगवानी के लिए उसकी प्रतीक्षा में खड़ी थी। पद्मपुर का राजा उदारचरित भी वहाँ स्वागत के लिए खड़ा था॥१९१-१९२॥ पद्मपुर के राजा द्वारा कुछ दिनों तक आतिथ्य प्राप्त कर विश्राम कर लेने के पश्चात् राजा पृथ्वीरूप वहाँ से चला ॥१९३॥ वह जयमंगल नामक हाथी पर रूपलता को बैठाकर और कल्याणगिरि नामक हाथी पर स्वयं बैठकर वहाँ से चला ॥१९४॥ इस प्रकार, निरन्तर यात्रा करता हुआ राजा क्रमशः तोरणों और ध्वजाओं से सजाये हुए अपने प्रतिष्ठान नगर में पहुँचा ॥१९५॥ उस नगर में रूपलता के सौन्दर्य को देखती हुई नागरिक रमणियों ने अपने रूप का गर्व त्याग दिया ॥१९६॥ तदनन्तर, राजा पृथ्वीरूप ने राजधानी में प्रवेश करके अपने विवाह का उत्सव किया और चित्रकार को गाँव और जागीरें पुरस्कार में देकर तथा धन आदि से उसे सन्तुष्ट किया ॥१९७॥ उन दोनों मित्रों को भी समुचित रूप से धन देकर उसने सन्तुष्ट किया। इसी प्रकार सामन्तों मन्त्रियों तथा यथायोग्य सम्बन्धित राजवंशों का भी उसने यथोचित सत्कार किया ॥१९८॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर ... = ... ... दृन्त्या प्रियया सहितस्त्वया। शेषांश्च तव भजे पृथ्वीपतिः कृती ॥१९९॥ इत्युक्तः स्मरदो मन्त्री गोमुखस्तत्सुखोन्मुखः। नरवाहनदत्तं तमुवाचोत्सुकः पुनः ॥२००॥ एष विरहो वीरं सत्त्वेशो विरहद्विषम्। न तु सोढुं सहते नैकामपि देव निशां कथम् ॥२०१॥ भवन्तमलंकारवती हि परिणेष्यति। श्वेतेतिविदुषो न तत्र तत्समागतः ॥२०२॥ तच्छ्रुत्वाऽथायमुचिवान् मरुभूतिरभाषत। उत्सन्नरससन्ताप स्वस्थस्त्वं किं न जल्पसि ॥२०३॥ कुरुते पुमान् धैर्यं विवेकं धीरुमेव च। यावन्नापतति कामस्य सायकानां न गोचरे ॥२०४॥ इक्ष्वाकुः सरस्वती स्कन्दो जिनश्च जगति त्रयः। एवन्तमतीत्यवाक्षिप्ता व्याभूय यैः स्मरः ॥२०५॥ मरुभूतो वदत्येवमुद्विग्नं वीक्ष्य गोमुखम्। नरवाहनदत्तस्तं समर्थयितुमभ्यधात् ॥२०६॥ विभोऽभ्यर्धमेतन्मे गोमुखो युक्तमुक्तवान्। स्निग्धो हि विरहायासे सानुवादं वदति किम् ॥२०७॥ समाश्वास्यो यथाशक्ति स्वजनैर्विरहातुरः। अतः परं स जानाति देवश्चासमसायकः ॥२०८॥ इत्यादि जल्पन्नुत्सृज्य तास्ताः परिजनाःकथाः। नरवाहनदत्तस्तां त्रियामामप्यवाहयत् ॥२०९॥ अलंकारवतीनरवाहनदत्तयोर्विवाहः अथ स प्रातरुत्थाय विहितावश्यकक्रियः। गगनाववरोहन्तीमपश्यत्काञ्चनप्रभाम् ॥२१०॥ भर्त्रालंकारशीलेन धर्मशीलेन सूनुना। तयालंकारवत्या च स्वदुहित्रा समन्विताम् ॥२११॥ ते चावतीर्य सर्वेऽपि तत्समीपमुपागमन्। अभ्यनन्दच्च तान्सोऽपि सं च तेऽपि यथोचितम् ॥२१२॥
इन कार्यों से निवृत्त होकर राजा पृथ्वीरूप अपनी पत्नी रूपलता के साथ सांसारिक सुख-भोग करने लगा ॥१९९॥ मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा सुनाकर अपनी ओर देखते हुए नरवाहनदत्त की ओर देख कर फिर उससे बोला—॥२ ०॥ महाराज धीर लोग इस प्रकार कष्ट के साथ विरह को चिरकाल तक सहन करते हैं और तुम एक रात्रि का भी वियोग सहन नहीं कर सकते ॥२ १॥ प्रात:काल ही तुम अलंकारवती को विवाहित करोगे। गोमुख के इस प्रकार कहने पर उसी समय आया हुआ यौगन्धरायण का पुत्र मरुभूति बोला-‘गोमुख ! काम-पीड़ा से अनभिज्ञ एवं भ्रान्तचित्त तुम यह क्या कह रहे हो ॥२ २–३ ॥ मानव धीरज विवेक चरित्र आदि को तभी तक धारण करता है, जब-तक वह कामदेव के बाणों का लक्ष्य नहीं बन जाता ॥२ ४॥ सरस्वती स्कन्ध और जिन ये तीन ही संसार में धन्य हैं जिन्होंने काम को वस्त्र के कोने में चिपके हुए कीट के समान फटकार दिया ॥२ ५॥ मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और गोमुख को घबराया हुआ देखकर नरवाहनदत्त ने उसका पक्ष लेते हुए कहा-मेरे मन का विनोद करने के लिए गोमुख ने ठीक ही कहा क्योंकि स्नेही व्यक्ति विरह के दुःख में क्या धन्यवाद देता है ? ॥२ ६-२ ७॥ आत्मीय जनों को वियोगावस्था में अपने व्यक्ति को धीरज ही देना चाहिए। उसके आगे भगवान कामदेव ही जानें ॥२ ८॥ इस प्रकार की बातें और अपने साथियों से विविध प्रकार की चर्चाएँ करते हुए नरवाहन- दत्त ने वह रात्रि किसी प्रकार व्यतीत की ॥२ ९॥ नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् प्रात काल उठकर और प्रातःकालीन आवश्यक क्रियाओं को समाप्त करके नरवाहनदत्त ने आकाश से उतरती हुई काञ्चनप्रभा विद्याधरी को देखा ॥२१ ०॥ वह अपने पति अलङ्कारशील पुत्र धर्मशील और कन्या अलङ्कारवती के साथ थी ॥२११॥ वे सब उतरकर नरवाहनदत्त के समीप आये और उसने उनका यथोचित आदर सत्कार किया ॥२१२॥
४८० कथासरित्सागरे
४८० कथासरित्सागरे
तावच्च हेमरत्नाश्वविमानवाहाः सहस्रशः । अन्येऽप्यवतरन्ति स्म तत्र विद्याधरा दिवः ॥२१३॥ विज्ञायतं च वृत्तान्तं वत्सराजः समन्त्रिकः । सपत्नीकश्च तन्नागासनयोत्कर्षहर्षितः ॥२१४॥ यथार्हविहितातिथ्ये तस्मिन्वत्सेश्वरेऽथ सः । राजालङ्कारशीलस्तमुवाच प्रणयान्नतः ॥२१५॥ राजन्नलङ्कारवती कन्येयं स्तनया मम । जातेव यैषा व्यादिष्टा गगनोद्गतया गिरा ॥२१६॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यामुष्य सुतस्य ते । सर्वविद्याधरेन्द्राणां भाविनश्चक्रवर्तिनः ॥२१७॥ तदेतस्मै ददाम्येनां लग्नो ह्यद्यानयोः शुभः । एतदर्थं मिलित्वाहमेतैः सर्वैरिहागतः ॥२१८॥ एतद्विद्याधरेन्द्रस्य तस्य वत्सेश्वरो वचः । महाननुग्रह इति ब्रुवन्नभिननन्द सः ॥२१९॥ अथ निजविद्याविभवात्पाणितलोत्पादितेन तोयेन । अभ्युक्षति स्म सोऽङ्गनभूमिं विद्याधराधीशः ॥२२०॥ तत्रोत्पेदे वेदी कनकमयी दिव्यवस्त्रसंछन्ना । नानारत्नमयं चाप्यकृत्रिमं कौतुकागारम् ॥२२१॥ उत्तिष्ठ लग्नवेला प्राप्ता स्नाहीत्युवाच तदनुकृती । तं नरवाहनदत्तं राजाऽलङ्कारशीलोऽसौ ॥२२२॥ स्नाताय कौतुकभृते वेदीमानीय धृतवधूवेषाम् । हृष्टोऽलङ्कारवतीं स ददौ कनकसारमर्जा तस्मै ॥२२३॥ मणिकनकवस्त्रभूषणभारसहस्राणि दिव्यनारीश्च । अग्नी लाजविसर्गेऽप्यददाच्च स सारमजो दुहितुः ॥२२४॥ निर्वृत्ते च विवाहे सर्वान्सम्भाव्य तदनु चामन्त्र्य । सह पत्न्या पुत्रेण च नभसैव यथागतं स ययौ ॥२२५॥ अथ वीक्ष्य तपोपचयमानं प्रणते मेघरराजभिस्तनूजम् । उदयोन्मुखमथ वत्सराजो मुदितस्तं चिरमुत्सवं ततान ॥२२६॥
नवम लम्बक ४८१
नवम लम्बक ४८१ इतने में ही सोने और रत्नों के भार उठाए हुए हजारों दूसरे विद्याधर भी आकाश से उतरे ॥२१३॥ यह सब समाचार जानकर राजा उदयन मन्त्रियो और महारानियों के साथ वहाँ आया और पुत्र की उन्नति से अत्यन्त हर्षित हुआ ॥२१४॥ वत्सेश्वर द्वारा यथोचित आतिथ्य-सत्कार आदि करने पर स्नेह से झुके हुए राजा अलङ्कारशील ने वत्सराज उदयन से कहा—॥२१५॥ 'हे राजन्, यह अलङ्कारवती नाम की मेरी कन्या है। जिसके उत्पन्न होते ही आकाश वाणी ने आदेश दिया था कि 'यह तुम्हारे पुत्र और विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की पत्नी बनेगी' ॥२१६-२१७॥ अत मैं इसे नरवाहनदत्त के लिए देता हूँ। आज इन दोनों (वर-वधू) का शुभ लग्न है। इसलिए, मैं अपने परिवार के साथ यहाँ आया हूँ ॥२१८॥ वत्सेश्वर उदयन ने विद्याधरों के राजा अलङ्कारशील की इन बातों को सुनकर 'यह आपकी बड़ी कृपा है' ऐसा कहते हुए उसकी बातों का अभिनन्दन किया ॥२१९॥ तदनन्तर, अपनी विद्या के प्रभाव से उत्पन्न किये जल से उस विद्याधरराज ने आँगन की भूमि को सींचा और वहाँ पर दिव्य वस्त्र से ढकी हुई सोने की वेदी निकल आई। और वह आँगन विविध प्रकार के रत्नों से जड़ा हुआ एक (स्वाभाविक) कौतुकागार-सा बन गया ॥२२०-२२१॥ तब राजा अलङ्कारशील ने नरवाहनदत्त से कहा—'उठो लग्न का समय हो गया।' तदनन्तर स्नान किये हुए तथा मंगलमय विवाह-वेष धारण किये हुए नरवाहनदत्त का वेदी में लाकर, प्रसन्न अलङ्कारशील ने, अपनी कन्या उसे प्रदान की ॥२२२-२२३॥ कन्या-हस्त के समय पुत्र-सहित अलङ्कारशील ने अलङ्कारवती के साथ मणि रत्न सोना वस्त्र भूषण आदि के हजारों भार और अनेक दिव्य नारियां (दासियाँ) दीं ॥२२४॥ विवाह-कार्य सम्पन्न होने पर, अन्य सभी सम्बन्धियों को सम्मानित करके और उनसे विदा लेकर अलङ्कारशील अपनी पत्नी और पुत्र के साथ जैसे आया था उसी प्रकार (आकाश मार्ग) से चला गया ॥२२५॥ तदनन्तर, नम्र होते हुए विद्याधर राजाओं से सम्मानित किये जाते हुए पुत्र नरवाहनदत्त की उन्नति को देखकर अत्यन्त प्रसन्न राजा उदयन ने बहुत काल तक विवाह-उत्सव मनाया ॥२२६॥ ६१
४८२ कथासरित्सागरे
४८२ कथासरित्सागरे स च नरवाहनदत्तः सद्वृत्तमनोरमामुदारगुणाम्। प्राप्यालङ्कारवतीं वाणीमिव सुकविरास्त तद्रसिकः ॥२२७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे अलंकारवती लम्बके प्रथमस्तरङ्गः। द्वितीयस्तरङ्गः नरवाहनदत्तस्यालङ्कारवतीगृहे गमनम् ततोऽलङ्कारवत्या स युक्तो वत्सेश्वरात्मजः। नरवाहनदत्तोऽत्र नववध्वा पितुर्गृहे ॥१॥ तच्चेटिकानां दिव्येन नृत्यगीतेन रञ्जितः। आपानं सेवमानश्च सचिवैः सह तस्थिवान् ॥२॥ एकदा च तमागत्य सा श्वश्रूः काञ्चनप्रभा। [L13: ] अलंकारवतीमाता विहितातिथ्यमब्रवीत् ॥३॥ आगच्छास्मद्गृहं पश्य तत्सुन्दरपुरं पुरम्। रमस्व तत्रोपवनेष्वलङ्कारवतीयुतः ॥४॥ एतच्छ्रुत्वा ससंरयुक्त्या पितुरावन्द्य तद्गिरा। वसन्तकं सहायाय वध्वा सह समन्वितः ॥५॥ श्वश्र्वा विद्याप्रभावेण तयैव स विनिर्मितम्। विमानवरमारुह्य प्रतस्थे व्योमवर्त्मना ॥६॥ विमानस्थश्च गमनात् सोऽधस्तात् प्रविलोकयन्। स्थलीपरिमितों पृथ्वीं समुद्रान् परिखासमान् ॥७॥ ॥८॥१ श्वश्रूभार्यादिभिः साकं क्रमात् प्राप हिमाचलम्। नादितं किन्नरीगीतैः स्वर्गभूसादृशसुन्दरम् ॥९॥ तत्राश्चर्याणि सुबहून्येव पदमवाप्तवान्। नरवाहनदत्तोऽथ तत्सुन्दरपुरे युवा ॥१०॥ १ मूलपुस्तके श्लोकोऽयं त्रुटितः।
नवम लम्बक ४८३
नवम लम्बक ४८३ वह नरवाहनदत्त भी सदाचार से मनोहर और उदार गुणोंवाली अलङ्कारवती को प्राप्त कर उसी प्रकार प्रसन्न हुआ जिस प्रकार अच्छे छन्दोंवाली और उदार गुणोंवाली कविता को पाकर रसिक सुकवि प्रसन्न होता है ॥२२७॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलङ्कारवती लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग नरवाहनदत्त का अलङ्कारवती के घर जाना तदनन्तर, वह वत्सेश्वर का पुत्र नरवाहनदत्त कौशाम्बी नगरी में पिता के घर पर, नई वधू अलङ्कारवती के साथ रहने लगा ॥१॥ वह वहाँ रहकर दहेज में प्राप्त अलङ्कारवती की दासियों के साथ नाच-गान आदि से मनोविनोद करता हुआ तथा अपने साथी मन्त्रियों के साथ मद्य-सेवन करता हुआ समय व्यतीत करता था ॥२॥ एक बार, अलंकारवती की माता काञ्चनप्रभा नरवाहनदत्त के पास आई और उसके उचित स्वागत कर लेने पर, उससे बोली—॥३॥ बेटा तुम हमारे घर सुन्दरपुर आओ और उस नगर के उद्यानों में अलङ्कारवती के साथ विचरण करो' ॥४॥ यह सुनकर वहाँ जाना स्वीकार करके और उसी की बात को पिता से निवेदन करके पिता के सम-सचिव गोमुख तथा अन्य मन्त्रियों एवं वधू अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त सास द्वारा विद्या के प्रभाव से निर्मित विमान पर सवार होकर आकाश-मार्ग से सुन्दरपुर को गया ॥५ ६॥ विमान पर चढ़ा हुआ वह नरवाहनदत्त नीचे की इस पृथ्वी को एक स्थली के समान और समुद्रों को खाइयों के समान लघु रूप में देखता हुआ सास और भार्या के साथ क्रमशः हिमालय पर्वत पर पहुँचा ॥७॥ आठवां श्लोक मूल पुस्तक में ही त्रुटित है ॥८॥ किन्नरों के गीतों और स्वर्गीय रमणियों के स्वर-संयोग से मुखरित वह हिमालय पर्वत उसे अत्यन्त सुन्दर लग रहा था ॥९॥ उस पर्वत पर अनेक आश्चर्यों को देखता हुआ वह युवा नरवाहनदत्त अपने श्वशुर की राजधानी सुन्दरपुर पहुँचा ॥१०॥
सौवर्णे रत्ननिचितैः प्रासादैर्हिमवत्यपि । सुमेरुशिखरभ्रान्तिं कुर्वद्भिरुपशोभितम् ॥११॥ व्योमावतीर्णश्चोत्तीर्य विमानात् प्रविवेश तत् । सानाय्यदर्शनाभ्येत्यदिव लोकैर्बलोत्सुकैः ॥१२॥ प्रविष्टश्चराजधानीं च स श्वश्र्वा कृतमङ्गलः । अलङ्कारवतीयुक्तः सबयस्यवसन्तकः ॥१३॥ तत्र तं दिवसं दिव्यैर्भोगैः श्वश्रूप्रभावजैः । उवास सुकृती स्वर्गे इव श्वशुरवेश्मनि ॥१४॥ अन्येद्युस्तं च सा श्वश्रूरवोचत् काञ्चनप्रभा । अस्ति स्वयम्भूभगवान् नगरेऽस्मिन्नुमापतिः ॥१५॥ स दृष्टपूजितो भोगं मोक्षं चैव प्रयच्छति । अलङ्कारवतीपित्रा तत्रोद्यानं कृतं महत् ॥१६॥ तीर्थं गङ्गासरःसंज्ञमन्वर्थं चावतारितम् । तं तमर्चयितुं देवं विहर्तुं चाद्य गच्छत ॥१७॥ एव श्वश्र्वा सयोक्तस्तु शार्वोद्यानं सहानुगः । नरवाहनदत्तोऽगादलङ्कारवतीसखः ॥१८॥ तद्बभौ काञ्चनस्कन्धे रत्नशाखामनोरमे । मुक्तागुच्छाच्छकुसुमे कान्तं विद्रुमपल्लवे ॥१९॥ तत्र गङ्गासरःस्नात पूजितोमापतिश्च सः । बभ्राम रत्नसोपाना वापी काञ्चनपङ्कजाः ॥२०॥ तासां तीरेषु वृक्षेपू कल्पवल्लीगृहेषु च । सहामलङ्कारवत्या स विजहारानुगाम्बितः ॥२१॥ दिव्यैरापानसङ्गीतैः परिहासैश्च पेशलैः । मरुभूत्यार्यनैरुक्तै रमते स्म च तेषु सः ॥२२॥ मासमात्रमुवासैष क्रीडन्नुद्यानभूमिषु । नरवाहनदत्तोऽत्र श्वश्रूविद्याविभूतिभिः ॥२३॥ ततो देवोचितैर्वस्त्रैरलङ्कारैश्च पूजितः । सबधूकः सहामात्यः काञ्चनप्रभया तया ॥२४॥ आययौ स विमानेन तेनैव सह सानुगः । कौशाम्बीं सहितो वध्वा पित्रोर्दत्तेक्षणोत्सवः ॥२५॥
नवम लम्बक ४८५
नवम लम्बक ४८५ वह सुन्दरपुर रत्नों से जड़े हुए सोने के महलों से हिमालय में भी सुमेरु पर्वत की भ्रान्ति उत्पन्न कर रहा था ॥११॥ आकाश से उतरकर और विमान से बाहर निकलकर वह उस नगर में प्रविष्ट हुआ। उसके आगमन पर हिलती हुई ध्वजाओं से मानों सुन्दरपुर नगर, अपने स्वामी को प्राप्त कर प्रसन्नता प्रकट कर रहा था ॥१२॥ तदनन्तर, सास द्वारा मंगलाचार किये जाने पर, नरवाहनदत्त अपने मित्र वसन्तक और वधू अलङ्कारवती के साथ राजभवन में गया ॥१३॥ वहाँ पर सास द्वारा विद्या के प्रभाव से प्राप्त किये गये दिव्य भोगों को भोगता हुआ वह स्वर्ग में इन्द्र के समान रहने लगा ॥१४॥ किसी दिन उसकी सास काञ्चनप्रभा ने उससे कहा-'इस नगर में स्वयम्भू भगवान् उमापति शिव का मन्दिर है ॥१५॥ उनके दर्शन और पूजन से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं। अलङ्कारवती के पिता ने वहाँ एक विशाल उद्यान बनाया है ॥१६॥ और, यथार्थ नामवाला गंगासर नाम का तीर्थ भी बनाया है। आज वहाँ उनका दर्शन और विहार करने चलो' ॥१७॥ सास के इस प्रकार कहने पर नरवाहनदत्त अपने साथियों और अलङ्कारवती के साथ वहाँ गया ॥१८॥ वह स्थान सोने की प्रधान शाखाओंवाले रत्नों की छोटी डालियोंवाले और लटकते हुए मोतियों के गुच्छों से सुशोभित वृक्षों से युक्त था ॥१९॥ वहाँ पर गंगासर में स्नान और शिव का पूजन कर लेने के उपरान्त नरवाहनदत्त रत्ना की सीढ़ियोंवाली और सोने के कमलों से शोभित बावलियों में भ्रमण करने लगा ॥२०॥ उन बावलियों के रमणीय किनारों पर भ्रमण करता हुआ वह, कल्पलता-गृहों में अलङ्कार वती और साथियों के साथ विहार करने लगा ॥२१॥ दिव्य मद्यपान संगीत गोष्ठी और मरुभूति द्वारा किये जाते हुए सुन्दर हास्य विलासों से वह वहाँ अपना मनोरंजन कर रहा था ॥२२॥ इस प्रकार, सास की विद्या के प्रभाव से जाग्रत् रैनों और उद्यान भूमि में विहार करते हुए नरवाहनदत्त ने वहाँ एक मास व्यतीत किया ॥२३॥ तदनन्तर, उस काञ्चनप्रभा द्वारा दिव्य वस्त्रों एवं आभूषणों से अलङ्कृत नरवाहनदत्त अपनी वधू, मन्त्री और काञ्चनप्रभा के साथ उसी विमान द्वारा कौशाम्बी नगरी को लौट आया और उसने अपने माता पिता की आंखों को आनन्दित किया ॥२४ २५॥
४८६ कथासरित्सागर
४८६ कथासरित्सागर तत्र वासवदत्ताया वत्सराजस्य चाग्रतः। अलङ्कारवतीमाह माता सा काञ्चनप्रभा ॥२६॥ युक्तं स्थाप्यस्त्वया भर्त्ता नेष्यन्कोपेन जातुचित्। तत्पापजो हि विरहः पुत्रि गाढानुतापकृत् ॥२७॥ ईर्ष्यावत्या मया पूर्वं युक्तं यत्स्थापितः पतिः । ततोऽद्य पश्चात्तापेन दग्धे तस्मिन् गते वनम् ॥२८॥ इत्युक्त्वा तां समाश्लिष्य बाष्परुद्धनेत्रया । काञ्चनप्रभया जग्मे समुत्पत्य निजं पुरम् ॥२९॥ ततस्तस्मिन् दिने याते प्रातः कृत्वोचिताः क्रियाः । नरवाहनदत्तोऽत्र स्थिते स्वसचिवान्विते ॥३०॥ अलङ्कारवतीपार्श्वं प्रविश्यैव विलासिनी । एकाब्रवीद् भीतभीता देवि स्त्रीं रक्ष रक्ष माम् ॥३१॥ अशोकमालाया कथा एष हि ब्राह्मणो हन्तुमागतो मां बहिःस्थितः । एतद्भयात् प्रविष्टाहं पलाय्य शरणैषिणी ॥३२॥ मा भैषीब्रूहि वृत्तान्तं कोऽस्य किं त्वां विधांसति । इति पृष्ट्वा च सा वक्तुं भूय एव प्रचक्रमे ॥३३॥ अशोकमाला नामाहमस्यामेव पुरि प्रभो । बलसेनाभिधानस्य क्षत्रियस्यात्मसम्भवा ॥३४॥ साहं कन्या सती पूर्वं स्पटकुम्भेन याचिता । हठधर्माभिधानेन विप्रेणार्थवता पितुः ॥३५॥ नाहं दुराकृतिं घोरमुत्समिच्छाम्यमुं पतिम् । दत्ता मासे गृहेऽस्येति पितरं नाहमब्रुवम् ॥३६॥ तच्छ्रुत्वाप्यकरोत्तावद्धठधर्मा गृहे पितुः । प्रायं यावदहं दत्ता तेनास्मै धमभीरुणा ॥३७॥ ततो विवाहानिच्छन्तीमप्यनीषीत् स मां द्विजः । अहं गता च तं त्यक्त्वाऽन्यं क्षत्रियपुत्रकम् ॥३८॥ सार्थमभूतोऽधर्मसन्दधौवसेनेन हठशर्मणा । तद्द्वितीयो मया सत्रकुमारो धनवाञ्छितः ॥३९॥
नवम लम्बक | ४८७
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कौशाम्बी पहुँचने पर वासवदत्ता और वत्सराज उदयन के सामने माता कांचनप्रभा ने पुत्री अलंकारवती से कहा—॥२६॥ 'बेटी ईर्ष्या और क्रोध से तुम अपने स्वामी को कभी कष्ट न देना। इस पाप से होनेवाला वियोग गम्भीर दुःख और पश्चात्ताप का कारण होता है ॥२७॥ 'मैंने अपने यौवन-काल में ईर्ष्या के कारण पति को कष्ट दिया था इसी कारण आज उनके वन में चले जाने पर पश्चात्ताप और वियोग से जल रही हूँ' ॥२८॥ पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देकर आंसुओं से भरी आँखोंवाली कांचनप्रभा अलंकारवती का आलिंगन करके और आकाश में उड़कर अपनी नगरी को चली गई ॥२९॥ तदनन्तर, प्रातःकालोचित क्रिया (स्नानादि) करके नरवाहनदत्त के मन्त्रियों के साथ बैठे रहने पर एक भयभीता और विलासिनी स्त्री अलंकारवती के पास आकर कहने लगी— 'मेरी रक्षा करो रक्षा करो' ॥३०-३१॥
अशोकमाला की कथा
'यह ब्राह्मण मुझे मारने के लिए बाहर खड़ा है। उसके भय से मैं शरणार्थिनी होकर आपके पास आई हूँ' ॥३२॥ 'डरो मत' अपना हाल बताओ कि वह कौन है और तुम्हें क्यों मारना चाहता है? अलंकारवती के इस प्रकार पूछने पर उसने फिर कहना प्रारम्भ किया—॥३३॥ "हे स्वामिन्, मेरा नाम अशोकमाला है। मैं इस नगरी में बलसेन नामक क्षत्रिय से उत्पन्न हुई हूँ ॥३४॥ जब मैं कुमारी थी तभी मेरे रूप के लोभी हठशर्मा नामक धनी ब्राह्मण ने मुझे मेरे पिता से माँग लिया था ॥३५॥ 'मैं इस बुरी और भीषण आकृतिवाले पुरुष को अपना पति न बनाऊँगी और पिता के दे देने पर भी मैं इसके घर न रहूँगी'—ऐसा मैंने अपने पिता से कहा ॥३६॥ यह सुनकर हठशर्मा ने मेरे पिता के घर पर अनशन प्रारम्भ कर दिया। तब ब्रह्महत्या के भय से मेरे पिता ने मुझे उसे दे दिया ॥३७॥ तदनन्तर, मुझे विवाहित करके मेरे न चाहने पर भी हठशर्मा, मुझे बलात् अपने घर ले गया तब मैंने उसे छोड़कर एक क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥३८॥ हठशर्मा ने राज दण्ड के डर से उसकी उपेक्षा की तो मैं उसे भी छोड़कर दूसरे क्षत्रियकुमार के पास चली गई ॥३९॥
४८८ कथासरित्सागर
४८८ कथासरित्सागर
तस्य चैनाग्निना रात्रौ गत्वोद्दीपितं गृहम्। ततस्तेन विमुक्ताहं तृतीयं क्षत्रियं गता॥४०॥ तस्याप्यादीपितं तेन निशि वेश्म द्विजन्मना। ततस्तेनाप्यहं त्यक्ता सम्प्राप्ता कान्दिशीकताम्॥४१॥ जम्बुकादविवेकेवाथ बिभ्यती हन्तुकामतः। हठधर्मद्विजात्तस्मात् पदात् पदममुञ्चत॥४२॥ इहैव युष्मद्भृत्यस्य बलिनो वीरशर्मणः। राजपुत्रस्य दासी त्वं शरण्यस्याहमाश्रयम्॥४३॥ तद्बुध्वा मयि नैराश्यविधुरो विरहातुरः। खगस्थिरोधः संवृत्तो हठधर्मा स दुर्मतिः॥४४॥ मद्रक्षार्थं प्रवृत्तश्च बन्धनायहू तस्य सः। राजपुत्रो मया देवि वीरशर्मा निवारितः॥४५॥ अद्य मां निर्गतां चैवावृष्ट्वाकृष्टकृपाणिकः। हठशर्मा स हन्तुं मामितो यावत् प्रभाविते॥४६॥ तेनागता पलाय्येह प्रतीहार्या दयार्द्रया। मुक्तद्वारा प्रविष्टोऽङ्ग स च जाने स्थितो बहिः॥४७॥ इत्युक्तवत्यां तस्यां च हठशर्माणमारमन। नरवाहनदत्तस्तमप्रमानायमवृद्विजम् ॥४८॥ क्रोधादधोक्मार्तं घां पश्यन्त दीप्तया दृशा। विकृतं क्षुरिकाहस्त कोपकम्पाङ्गसन्धियम्॥४९॥ उवाच चैनं कुब्रह्मन् स्त्रियं हन्ति वहस्यपि। तदर्थं परवेश्मानि किमचे पापकार्यसि॥५०॥ तच्छ्रुत्वा स द्विजोऽवादीद्धर्मदारा इयं मम। त्यक्त्वा मां चान्यतो याता सहेय तदहं कथम्॥५१॥ इत्युक्तं तन बिम्बा साऽशोकमाला तदाऽब्रवीत्। भो लोकपाला ब्रूतैतत् किं न युष्मासु साक्षिषु॥५२॥ अनिच्छन्ती हठाधीता विवाहाहुमिहामुना। किं तदा च मया मोक्त नामिष्ये ते गृहृण्विति॥५३॥ एवमुक्ते तया तत्र दिव्या वागभवन्यपात्। यथाशाोकमाख्यं यक्ति सत्यं तयव तत्॥५४॥
पंचम लम्बक ४११
पंचम लम्बक ४११ तब हठशर्मा ने धन के मद में आकर उसके घर में भी एक रात्रि को आग लगा दी। उसके बाद मैंने दूसरे धनी क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥४०॥ तत्पश्चात् हठशर्मा ने आग लगाकर उसका घर भी फूँक डाला। तब उसने भी मुझे छोड़ दिया और मैं मारी-मारी फिरने लगी ॥४१॥ शियार से डरती हुई भेड़ के समान मुझे मारने की इच्छा से मेरा पीछा करते हुए हठशर्मा से मैं दूर-दूर भागती रही ॥४२॥ तब भागते-भागते मैंने इसी राजभवन में घर-सामग्रियों की रक्षा करनेवाले आपके बलवान् सेवक वीरशर्मा का आश्रय लिया और उसकी दासी होना स्वीकार किया ॥४३॥ यह जानकर निराशा से पागल और विरह से व्याकुल हठशर्मा के शरीर में केवल हाड़-मांस ही शेष रह गया ॥४४॥ उसके यहाँ आने पर मेरी रक्षा के लिए हठशर्मा को बाँधने को उद्यत वीरशर्मा को मैंने मना कर दिया ॥४५॥ आज अकस्मात् मुझे बाहर निकली हुई देखकर हठशर्मा छुरा लेकर मुझे मारने के लिए दौड़ा ॥४६॥ इसलिए, भागती हुई मैं यहाँ आई हूँ। दयालु प्रतीहारी ने मेरे लिए दरवाजा खोल दिया और मैं आपके समीप आई; मैं समझती हूँ अभी वह बाहर खड़ा है ॥४७॥" उसके ऐसा कहने पर नरवाहनदत्त ने उस ब्राह्मण हठशर्मा को अपने सामने बुलवाया ॥४८॥ क्रोध के कारण लाल आँखों से अशोकमाला को देखते हुए, क्रोध से काँपते हुए अंगोंवाले और हाथ में छुरा लिये हुए उस भीषण आकृतिवाले हठशर्मा से नरवाहनदत्त ने कहा- ॥४९॥ 'हे दुष्ट ब्राह्मण ! स्त्री को क्यों मारते हो और उसके लिए दूसरों के घरों में आग क्यों लगाते फिरते हो ? तुम ऐसा पाप कार्य क्यों कर रहे हो? ॥५०॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण कहने लगा-'यह मेरी धर्मपत्नी है और मुझे त्याग कर दूसरों के पास चली गई, तो भला मैं कैसे सहन कर सकता'? ॥५१॥ उसके ऐसा कहने पर घबराई हुई अशोकमाला बोली- 'हे लोकपालो, यह तुम्हीं कहो कि क्या तुम्हारी सन्निधि में इस ब्राह्मण ने मुझे हठपूर्वक विवाहित नहीं किया ? और, क्या मेरे न चाहते हुए भी यह मुझे बलात् नहीं ले गया ? क्या उस समय मैंने यह नहीं कहा था कि मैं तेरे घर न रहूँगी ? ॥५२-५३॥ अशोकमाला के इस प्रकार कहने पर दिव्यवाणी हुई-'यह अशोकमाला जो कहती है, वह सच है ॥५४॥ ६२
४५० कथासरित्सागर
४५० कथासरित्सागर न चैषा मानुषी सत्यमेतदीय निशम्यताम्। अस्त्यशोककरो नाम धीरो विद्याधरेश्वरः ॥५५॥ तस्यापुत्रस्य चैकैव देवाज्जज्ञे कन्यका। अशोकमाला नाम्ना सावर्धंस्तस्य पितुर्गृहे ॥५६॥ यौवनस्था च सा तेन दीयमानान्वयार्थिना। न कञ्चिदैच्छद् भर्तारमतिरूपाभिमानतः ॥५७॥ तेन शापमदात् सोऽस्यै निर्बन्धकुपितः पिता। मानुष्यं व्रज नामाऽत्र भविता च स्वमेव ते ॥५८॥ परिणेष्यति चात्र त्वां विरूपो ब्राह्मणो हठात्। तं त्यक्त्वा तद्भयाद् भर्तॄन् क्रमेण त्रीनुपैष्यसि ॥५९॥ ततोऽप्युपद्रुता तेन दासीत्वेनाभियेष्यसि। राजपुत्रं बलीयांसं न चैव स निवत्स्यति ॥६०॥ दृष्ट्वा च धाविते तस्मिन् हन्तुकामे पलायिता। प्रविष्टा राजभवनं शापात्तस्माद्विमोक्ष्यसे ॥६१॥ एव माशोकमाला सा पित्रा विद्याधरी पुरा। क्षप्ता तेनैव नाम्नाऽथ सैषा जाताऽत्र मानुषी ॥६२॥ जातश्च सैष शापान्तोऽमुष्या गत्वाधुना पदम्। वैद्याधरं स्वं तत्रस्था प्रवेक्ष्यति निजां तनुम् ॥६३॥ ततोऽभिरचिताख्येन विद्याधरमहीभुजा। वृतेन भर्त्रा सहिता शापं संस्मृत्य रंस्यते ॥६४॥ इत्युक्त्वा विरतं वाचा दिव्यया सापि तत्क्षणम्। अशोकमाला सहसा गतजीवापतद् भुवि ॥६५॥ दृष्ट्वा च तदलङ्कारवती बाष्पायितेक्षणा। नरवाहनदत्तश्च सत्वास्त्वेस्तौ बभूवतुः ॥६६॥ स तु कुत्सितामर्षो रागाधो विस्रपन्नपि। अकस्माद्दृढशर्माऽभूत्पर्योत्सुकमना द्विजः ॥६७॥ किमेतदिति पृष्टश्च सर्वैर्विप्रो जगाद सः। मया जन्म स्मृतं पूर्वं तच्च वच्मि निशम्यताम् ॥६८॥
नवम लम्बक ४११
नवम लम्बक ४११ यह मानुषी नहीं है। इसका रहस्य सुनो। आषाढ़क नाम का विद्याधरों का एक राजा है॥५५॥ उस पुत्रहीन राजा के यहाँ दैवयोग से यह एक ही कन्या हुई और अंगारमाला के नाम से पिता के घर पर ही यह बड़ी हुई॥५६॥ यौवनप्राप्त इस कन्या ने अपने रूप के घमंड में प्रार्थना करने पर भी किसी का पति नहीं माना ॥५७॥ इसके इस हठ से क्रुद्ध होकर पिता ने इसे शाप दिया कि तू मनुष्य योनि में जा। उस योनि में भी तेरा यही नाम होगा ॥५८॥ मत्त सिंह से क्रुद्ध ब्राह्मण मुझसे विवाह करेगा। तू उसे छोड़कर उत्तर मन्द में अनङ्गप्रभ तीन पत्नियों के पास जायगी ॥५९॥ वहाँ से भी भागकर एक बलवान् राजपूत के पास जायगी। वह तुझे रख लेगा। किन्तु, वहीं उन्मत्त देखकर तेरा पति तुझे मारने के लिए दौड़ेगा तब तू राजभवन में घुसकर इस शाप से मुक्त हो जायगी ॥६०-६१॥ इस प्रकार, पूर्वजन्म में जो अङ्गारमाला नाम की विद्याधरी थी, वही इस पिता के शाप से मानुषी बनी है॥६२॥ अब इसके शाप का अन्त हो गया है और अब वह विद्याधर-लोक में जाकर फिर अपना विद्याधर-शरीर प्राप्त करेगी ॥६३॥ तब वह अमितगति नामक विद्याधर राजा से विवाहित होकर और अपने रूप का स्मरण करके अप्सरासमान बनेगी ॥६४॥ ऐसा कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई और वह अङ्गारमाला भी प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ी ॥६५॥ उसे इस प्रकार देखकर अनङ्गप्रभो और मकरन्ददत्त राजा को सौंप कर चले गए ॥६६॥ यहाँ पर ही उन्होंने उस कन्या का दाह-संस्कार किया और दोनों विलाप करने लगे कि हमारी अकारण रक्षा हो गई किन्तु इस कन्या का ॥६७॥ यह सुन कर उन तपस्वियों ने उस राजा तथा अनङ्गप्रभ आदि दोनों को समझा कर शान्त कर दिया है। ...॥६८॥
४९२ कथासरित्सागर
४९२ कथासरित्सागर स्थूलभुजविद्याधरस्य कथा हिमाद्रावस्ति मदनपुर नामोत्तमं पुरम्। प्रलम्बभुज इत्यस्ति तत्र विद्याधरेश्वरः ॥६९॥ तस्योदपद्यत स्थूलभुजाख्यस्तनयः प्रभो। स च राजसुतो भव्यो यौवनस्थोऽभवत् क्रमात् ॥७०॥ ततः सुरभिदत्ताख्यो विद्याधरपतिः स्वयम्। सकन्यो गृहमागत्य प्रलम्बभुजमाह तम् ॥७१॥ इयं सुरभिदत्ताख्या सुता त्वत्सूनवे मया। दत्ता स्थूलभुजायाद्य गुणवान् स वहत्विमाम् ॥७२॥ तच्छ्रुत्वा प्रतिपद्यैव समाहूय स्वसूनवे। स प्रलम्बभुजस्तस्मायेतमर्थं न्यवेदयत् ॥७३॥ ततः स तं स्थूलभुजो रूपदर्पात् सुतोऽब्रवीत्। परिणेष्ये न चार्तेमां रूपेणैवा हि मध्यमा ॥७४॥ किं पुत्रात्यन्तरूपेण मान्या ह्येषा महान्वया। पित्रा दत्ता मया चात्ता त्वत्कृते मान्त्रया कृथाः ॥७५॥ इत्युक्तश्च पुनस्तेन पित्रा स्थूलभुजः स तत्। नाकरोद्यत्ततस्तं स शशाप कुपितः पिता ॥७६॥ रूपाहङ्कारदोषेण मानुष्येष्वधरामुना। भविष्यसि च तत्र त्वं विकृतो विकटाननः ॥७७॥ भार्यामिष्टोक्तमालाख्यां प्राप्य शापच्युतो हठात्। प्राप्तासि विरहक्लेशममिच्छन्त्या तयोज्झितः ॥७८॥ तस्याश्चान्यप्रसक्तायाः कृते दुःसङ्कधीकृतः। करिष्यस्यग्निदाहादि पातकं रागमोहितः ॥७९॥ इत्युक्तशापं रुदती तं प्रलम्बभुजं तदा। साध्वी सुरभिदत्ता सा पादलग्ना व्यजिज्ञपत् ॥८०॥ देहि शापं ममाप्येवं समास्तु गतिरावयोः। मा भून्मे भर्तुरेकस्य क्लेशो मदपराधतः ॥८१॥ एवमुक्तवतीं तुष्टः साध्वीं तां परिसान्त्वयन्। स प्रलम्बभुजः सूनोरेवं शापान्तमभ्यधात् ॥८२॥