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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ५३१

नवम लम्बक ५३१ वह अनंगप्रभा भी अपनी विद्याओं को पुनः प्राप्त करके दिव्य शोभा धारण की हुई उसी शरीर में वह दूसरी के समान प्रतीत होती हुई विद्याधरी बन गई ॥४०६॥ शाप-मुक्त वह दम्पती मदनप्रभ और अनंगप्रभा परस्पर शरीर को देखने से अत्यधिक प्रसन्न और अनुरागी तथा विद्याधर-पति समर य तीनों आकाश में उड़कर विद्याधरों के वीरपुर नामक नगर को चले गये ॥४०७॥ वहाँ जाकर समर ने अपनी कन्या अनंगप्रभा को विद्याधराधिपति मदनप्रभ के लिए विधिपूर्वक प्रदान कर दिया। वह मदनप्रभ भी शाप-मुक्त और प्रसन्न अनंगप्रभा के साथ अपने नगर में सुखपूर्वक रहने लगा ॥४०८॥ इस प्रकार, अपनी दुर्नीति के फलस्वरूप दिव्य व्यक्ति मनुष्य-लोक में अवतीर्ण होते हैं और उसके अनुरूप फल भोगकर पूर्वजन्म के पुण्यों के प्रभाव से फिर से अपनी गति को प्राप्त होते हैं ॥४०९॥ अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त अपने मन्त्री गोमुख से इस प्रकार कथा सुनकर सन्तुष्ट हुआ और उसके अनन्तर उसने दैनिक कृत्य (स्नान संध्या आदि) के लिए उठ गया ॥४१०॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तीसरा तरंग नरवाहनदत्त और कार्पटिक (भिखारी) की कथा किसी दिन अलंकारवती के साथ बैठे हुए नरवाहनदत्त से उसके मन्त्री मरुभूति ने कहा--॥१॥ देखिए स्वामी ! चमड़े के वस्त्र, जटाओं और दुबले-सूखे शरीरवाला यह बेचारा भिखारी दिन-रात शीत हो या धूप आपके राजद्वार से जरा भी हटता नहीं। इस पर आप कृपा क्यों नहीं करते ? ॥२-३॥ समय पर थोड़ा दिया हुआ भी बहुत होता है। असमय में बहुत देने पर भी क्या लाभ ? अतः जबतक यह मरता नहीं तबतक इस पर कृपा करो ॥४॥

५४० कथासरित्सागर

५४० कथासरित्सागर सञ्चूङ्क्ष्वा गोमुखोऽथावीत्साधूक्तं मरुभूतिना। किं पुनर्निराशोऽस्ति तव देवात्र कश्चन ॥५॥ क्षयो यावन्न वृत्तो हि पापस्य परिपन्थिनः। तावद्दानप्रवृत्तोऽपि दातुं शक्नोषि न प्रभुः ॥६॥ परिक्षीणे पुनः पापे वार्यमाणोपि यत्नतः। ईश्वरः प्रददात्येव कर्णाभरणमिदं किल ॥७॥ तथा च रूक्षदत्तस्य राज्ञः कार्पटिकस्य च। लब्धदत्तस्य देवेतां कथामाख्यामि ते शृणु ॥८॥ राज्ञो रूक्षदत्तस्य लब्धदत्त कार्पटिकस्य च कथा अभूल्लक्षापुरं नाम नगरं वसुधातले। तत्रासील्लक्षदत्ताख्यस्त्यागिनामग्रणीर्नृपः ॥९॥ रूक्षादूनं न दातुं स जानाति स्म किमार्थिने। सम्भ्रमात् तु य तस्मै ददौ लक्षाणि पञ्च सः ॥१०॥ तुष्टोप यस्मै स पुनर्निर्दारिद्र्यं चकार तम्। रूक्षदत्त इति ख्यातं नाम तस्यात एव तत् ॥११॥ तस्यैको लब्धदत्ताख्यः सिंहद्वारे दिवानिशम्। तस्थौ कार्पटिकश्चर्मखण्डैककटिकर्पटः ॥१२॥ स निवस्त्रटः शीतवर्षे ग्रीष्मातपेऽपि वा। न चचाल ततः क्षिप्रं स राजा च ददर्श तम् ॥१३॥ तथा तस्य चिरं तत्र तिष्ठतः क्लेशवर्तिनः। न स राजा ददौ किञ्चिद्दातापि सकृपोऽपि सन् ॥१४॥ अथैकदा स नृपतिर्जगामासन्नकाटवीम्। स च तं लगुडं बिभ्रदन्वक्कार्पटिको ययौ ॥१५॥ तत्र तस्य ससैन्यस्य वाहनस्थस्य धन्विनः। व्याघ्रान्वराहान्हरिणान्बाणवर्षेण निघ्नतः ॥१६॥ अग्रत पादचारी सन्न कार्पटिक एककः। जघान लगुडेनैव वराहाम्हरिजान्वहून् ॥१७॥ स दृष्ट्वा विक्रमं तस्य चित्रं धूर्तः कियानयम्। इति दध्यौ स राजाऽन्तर्न त्वस्मै किञ्चिदप्यदात् ॥१८॥

नवम लम्बक ५४१

नवम लम्बक ५४१ यह सुनकर गोमुख ने कहा—'स्वामिन् मरुभूति ने ठीक ही कहा है। किन्तु महाराज ! इसमें आपका कुछ भी अपराध नहीं है। जबतक धन के विरोधी उसके पाप का क्षय न होगा तबतक देनेवाला स्वामी चाहने पर भी उसकी दरिद्रता को दूर नहीं कर सकता ॥५६॥ पाप के नष्ट हो जाने पर बलपूर्वक रोकने पर भी ईश्वर, किसी-न-किसी प्रकार दे ही देता है। यह सब कर्म के अधीन है ॥५७॥ इस सम्बन्ध में राजा लक्षदत्त और कार्पटिक लब्धदत्त की कथा १ सुनो ॥५८॥ राजा लक्षदत्त और लब्धदत्त भिखारी की कथा पृथ्वी पर मत्तपुर नाम का एक नगर था। उसमें दानियों में अग्रणी लक्षदत्त नाम का राजा था ॥५९॥ वह राजा याचक को एक लाख से कम देना जानता ही न था। जिस याचक से वह बात कर लेता था उसे पाँच लाख देता था ॥६०॥ जिस पर वह प्रसन्न हो जाता था उसकी तो वह जन्म भर की दरिद्रता ही दूर कर देता था। इसीलिए, उसका नाम लक्षदत्त था ॥६१॥ उस राजा के सिंहद्वार पर एक चमड़े के टुकड़े से शरीर को ढके हुए एक भिखारी दिन-रात बैठा रहता था ॥६२॥ सिर पर जटाओं को बाँधे हुए वह भिखारी शीत में वर्षा में और कड़ी धूप में भी राजद्वार से जरा भी हिलता न था और राजा सदा उसे उसी स्थिति में देखता था ॥६३॥ इस प्रकार, बहुत समय कष्ट के साथ व्यतीत करने पर राजा ने दयालु और दानी होने पर भी कुछ नहीं दिया ॥६४॥ एक बार, वह राजा शिकार खेलने के लिए घने जंगल में गया। उसके पीछे लट्ठ लेकर वह भिखारी भी गया ॥६५॥ जब कि सेना के साथ वाहन पर बैठा हुआ राजा धनुष धारण किये हुए बाघों सूअरों और मृगों को बाणों से मार रहा था तब वह भिखारी कार्पटिक राजा के आगे रहकर सुदृढ़ (मजबूत) डंडे के प्रहार से ही उन हिंस्य पशुओं को मार डालता था ॥६६-६७॥ उस दरिद्र कार्पटिक के अद्भुत पराक्रम को देखकर उसे वीर मानता हुआ भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥६८॥ १ बोकेशियो वोन्ते मर की दसवें दिन की कथा इससे मिलती-जुलती है।—अनु.

५४२ कथासरित्सागर

५४२ कथासरित्सागर

कृतादरः स नगरं स्वसुखायानिशम्भूपः। स च कार्पटिकस्तस्थौ सिंहद्वारे च पूर्ववत् ॥११९॥ कदाचिदेकसीमन्तगोत्रजायतयाय सः। लक्षदत्तो ययौ राजा युद्धं चास्याभवन्महत् ॥१२०॥ तत्र युद्धे स तस्याग्रे राज्ञः कार्पटिको बहून्। युद्धत्वादिरदण्डाग्रप्रहारैरवधीत्परान् ॥१२१॥ जितशत्रुः स राजा च निजं प्रत्याययौ पुरम्। न च तस्मै ददौ किञ्चित्तदपि दृष्टपराक्रमः ॥१२२॥ एवं कार्पटिकस्याथ लक्षदत्तस्य तिष्ठतः। व्यतीयुः पञ्च वर्षाणि तस्य कष्टेन जीवतः ॥१२३॥ षष्ठे प्रवृत्ते दृष्ट्वा तमेकदा दैवयोगतः। स राजा जातकरुणो लक्षदत्तो व्यचिन्तयत् ॥१२४॥ नाद्याप्यस्य मया दत्तं चिरक्लिष्टस्य किञ्चन। तद्यन्मया किञ्चिदेतस्मै दत्त्वा पश्याम्यहं न किम् ॥१२५॥ किं नामास्य वराकस्य वृत्तं पापक्षयो न वा। किं ददाति न वाद्यापि लक्ष्मीरस्य च दर्शनम् ॥१२६॥ इत्यालोच्य भूपः स्वैरं भाण्डागारं प्रविश्य सः। रत्नगर्भ मातुलुङ्गं समुद्गकमिव व्यधात् ॥१२७॥ चकार सर्वस्थानं च स विधाय बहिः सभाम्। तत्र च प्राविशन्सर्वे पौरसामन्तमन्त्रिणः ॥१२८॥ तन्मध्ये च प्रविष्टं तं राजा कार्पटिकं स्वयम्। इतो निकम्मेहीति जगाद स्निग्धया गिरा ॥१२९॥ ततः कार्पटिकः श्रुत्वा सम्मदस्तं प्रहर्षवान्। अग्रे सविधमागत्य राज्ञस्तस्योपविष्टवान् ॥१३०॥ ततस्तमब्रवीद्राजा ब्रूहि किञ्चित्सभाषितम्। तदाकर्ण्य पपाठैवामार्या कार्पटिकोऽथ सः ॥१३१॥ 'पूरयति पूणमेषा तरङ्गिणीसंहतिः समुद्रमिव। मदभीरधमस्य पुनर्मोधनमार्गेऽपि नायाति' ॥१३२॥ श्रुत्वतत्पाठयित्वा च भूयस्तुष्टः स भूपतिः। सद्रत्नपूर्णं तस्मै तन्मातुलुङ्गफलं ददौ ॥१३३॥

नवम लम्बक ५४५

नवम लम्बक ५४५ इस प्रकार, जंगली पशुओं का शिकार कर राजा अपने नगर में लौट आया और वह भिखारी भी पूर्ववत् सिंहद्वार पर आकर टिक गया ॥१९॥ एक बार, सीमान्तवर्ती एक राजा को जीतने के लिए राजा रूपदत्त गया। वहाँ दोनों में घमसान युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा रूपदत्त के सामने ही उस भिखारी ने मजबूत खैरा के डंडे के प्रहार से अनेक शत्रुओं को मार डाला। इस प्रकार, शत्रुओं को जीतकर राजा अपने नगर लौट आया किन्तु दरिद्र भिखारी के अद्भुत पराक्रम को देखकर भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥२०-२२॥ इस प्रकार, निरन्तर राजद्वार पर रहते हुए और ककड़ियाँ चबाकर अपना जीवन व्यतीत करते हुए उसे पाँच वर्ष बीत गये ॥२३॥ छठा वर्ष प्रारम्भ होने पर दैवयोग से एक बार उसे देखकर राजा रूपदत्त को दया उत्पन्न हुई और उसने सोचा - ॥२४॥ बहुत दिनों से कष्ट पाते हुए इसको मैंने आज तक कुछ भी नहीं दिया। तो इसे किसी युक्ति से कुछ देकर क्यों न देखूँ ॥२५॥ कि इस बेचारे के पापों का नाश हुआ या नहीं। अब भी लक्ष्मी इसे दर्शन देती है या नहीं ॥२६॥ ऐसा सोचकर राजा अपने कोषागार में गया वहाँ से उसने एक बिजौरा नींबू में रत्न भरकर के एक डिब्बे के समान उसे बन्द किया ॥२७॥ और, महल के बाहर उसने एक सार्वजनिक दरबार किया। उस दरबार में सभी नागरिक सामन्त और मन्त्री एकत्र हुए ॥२८॥ उन लोगों में आये हुए उस कार्पटिक को राजा ने स्नेह-भरी वाणी से कहा-'यहाँ निकट आओ' ॥२९॥ यह सुनकर लब्धदत्त कार्पटिक प्रसन्न हुआ और राजा के पास आकर उसके आगे बैठ गया ॥३०॥ तब राजा ने उससे कुछ सुभाषित सुनाने के लिए कहा। राजा के यह कहने पर कार्पटिक ने एक आर्या पढ़ी (जिसका अर्थ है-) ॥३१॥ 'जिस प्रकार नदियों का समूह जल से भरे समुद्र को ही भरता है (और, तालाब आदि सूखे ही रहते हैं) उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी भरे हुए (धनवान्) को ही भरती है और निर्धन की आँखों के सामने भी नहीं आती' ॥३२॥ यह सुनकर और इस आर्या को फिर से उससे पढ़वाकर राजा ने प्रसन्न होकर रत्न से भरा हुआ एक बिजौरा नींबू जो डिब्बे के समान उस ने दिया ॥३३॥

५४४ कथासरित्सागर ९

५४४ कथासरित्सागर ९ यस्मै तुष्यति राजायं दारिद्र्यं तस्य कृन्तति। सोऽथ कार्पटिकस्त्वेवं समाहूयैवमादरात् ॥३४॥ मातुलुङ्गमिदं दत्तं तुष्टेनानेन भूभृता। कल्पवृक्षोऽप्यभव्यानां प्रायो याति पलाशताम् ॥३५॥ इति सर्वेऽपि तद्दृष्ट्वा तत्रास्थाने विषादिनः। अज्ञातपरमार्थत्वात्स्वैरमूचुः परस्परम् ॥३६॥ स तु कार्पटिको मातुलुङ्गमादाय निर्ययौ। आययौ चाग्रतस्तस्य भिक्षुरेको विपीदतः ॥३७॥ स राजवन्दिनामा तद्दृष्ट्वा शाटकमग्रहीत्। तस्मात्कार्पटिकान् मातुलुङ्गं दृष्ट्वा मनोरमम् ॥३८॥ प्रविश्य च स भिक्षुस्तद्राज्ञः फलमढौकयत्। राजा च तत्परीक्षाय श्रमणं पृच्छति स्म तम् ॥३९॥ मातुलुङ्गं कुत इदं भदन्त भवतामिति। सतं कार्पटिकं सोऽस्म वदातारं शशंस चम् ॥४०॥ अथ राजा विषण्णश्च विस्मितश्च बभूव सः। अहो अद्यापि न क्षीणं पापं तस्येति चिन्तयन् ॥४१॥ स्वीकृत्य मातुलुङ्गं तदुत्थायास्थानतः क्षणात्। चकार दिनकर्त्तव्यं *रक्तदत्तं स भूपतिः ॥४२॥ सोऽपि कार्पटिको गत्वा सिंहद्वारे यथास्थितः। कृतभोजनपानादिरासीद्विक्रीतशाटकः ॥४३॥ द्वितीयेऽह्नि स राजा च सर्वास्थानं तथैव तत्। विदधे तत्र सर्वे च सपोराः प्राविशन् पुनः ॥४४॥ दृष्ट्वा कार्पटिकं स च प्रविष्टं सोऽथ भूमिभृत्। तथैवाहूय पुनरप्युपावेशयदन्तिके ॥४५॥ पाठयित्वा च भूयोऽपि तामेवार्याँ प्रसादतः। गूढरत्नं ददौ तस्मै मातुलुङ्गं तदेव सः ॥४६॥ अहो द्वितीये दिवसे तुष्टोऽस्यायं वृथा प्रभुः। किं तावदेतदित्यत्र सर्वे दध्युः सविस्मयाः ॥४७॥

यह राजा जिस पर प्रसन्न होता है, उसके जीवन-भर की दरिद्रता दूर कर देता है। किन्तु यह कार्पटिक शोचनीय (अभागा) है, जिसे इस प्रकार आदर से बुलाकर भी इस प्रसन्न राजा ने यह बिजौरा नींबू दिया। सच है, कि अभागों के लिए कल्पवृक्ष भी पलाश का वृक्ष बन जाता है' ॥३४-३५॥ इस प्रकार, वास्तविक बात को न जानते हुए वहाँ बैठे हुए सभी लोग विषाद के साथ आपस में ऐसी बातें करने लगे ॥३६॥ वह कार्पटिक नींबू को लेकर जैसे ही बाहर निकला वैसे ही विषाद करते हुए उसके सामने एक याचक आया ॥३७॥ उसका नाम राजवल्लिक था। उसने कार्पटिक को एक साड़ी देकर बदले में वह नींबू उससे ले लिया ॥३८॥ और उस याचक ने सभा में जाकर राजा को वह बिजौरा नींबू भेंट कर दिया। तब राजा ने उसे पहचानकर विस्मय से पूछा—॥३९॥ 'भद्र! यह नींबू तुम्हें कहाँ मिला ?' तब उसने उस कार्पटिक को उसका देने वाला बताया ॥४०॥ तब राजा खिन्न और चकित होकर सोचने लगा कि इस कार्पटिक का पाप अभी समाप्त नहीं हुआ है ॥४१॥ तब राजा ने उस नींबू की भेंट स्वीकार की और वह उठकर अपने दैनिक कार्यों में लग गया ॥४२॥ याचक की दी हुई साड़ी को बेचकर अपने भोजन आदि का प्रबन्ध करके वह कार्पटिक रूक्ष्मदत्त फिर राजा के सिंहद्वार पर सदा की भाँति आकर खड़ा हो गया ॥४३॥ दूसरे दिन राजा ने फिर उसी प्रकार सार्वजनिक सभा की और उसमें पहले के समान नागरिक, दरबारी और मन्त्री एकत्र हुए ॥४४॥ उसी प्रकार उस सभा में आये हुए कार्पटिक को देखकर और पास बुलाकर उसने बैठाया और उसी आर्या को पुनः पड़वाकर प्रसन्नतापूर्वक दूसरा नींबू उसे प्रदान किया ॥४५-४६॥ आज दूसरे दिन भी राजा इस प्रकार व्यर्थ ही प्रसन्न हुआ, यह क्या बात है, इस प्रकार सभी उपस्थित व्यक्ति आपस में आश्चर्य के साथ कहने लगे ॥४७॥ ६९

५४६ कथासरित्सागर

५४६ कथासरित्सागर स च कार्पटिको विम्नो' हस्तं कृत्वा तु तत्फलम्। राजप्रसादं सफलं मन्वानो निर्ययौ बहिः ॥४८॥ तावत्तस्याययौ कोऽपि विषयाधिकृतो'ऽग्रतः। प्रविविक्षुस्तदास्थानं द्रष्टुकामो महीक्षितम् ॥४९॥ स दृष्ट्वा मातुलुङ्गं तदुपवव्रे कार्पटिकात्ततः। आददे शकुनापेक्षी दत्त्वास्मै वस्त्रयोर्युगम् ॥५०॥ प्रविश्य च नृपास्थानं पावनम्रो नृपाय तत्। मातुलुङ्गं ददावादौ ततोऽन्यत् प्राभृतं' निजम् ॥५१॥ परिज्ञाय च तद्राज्ञा फलं स विषयाधिपः। कुत एतत्तवेत्युक्तोऽवोचत्कार्पटिकादिति ॥५२॥ अहो वदति नाद्यापि लक्ष्मीस्तस्येह दर्शनम्। इत्यन्तश्चिन्तयन्सोऽथ राजाऽभून्मना भृशम् ॥५३॥ उत्सस्र्जो मातुलुङ्गं तद् गृहीत्वास्थानतश्च सः। सोऽपि कार्पटिको वस्त्रयुग्मं प्राप्यापणं ययौ ॥५४॥ चक्रे भोजनपानादि विक्रीत्यैकं च शाटकम्। द्वितीयं च द्विधा कृत्व वाससी द्वे व्यधत्त सः ॥५५॥ ततस्तृतीयेऽपि दिने सर्वास्थानं स पार्थिवः। व्यधात्तथैव सर्वेभ्यः प्रविशेन्न पुनर्जने ॥५६॥ तस्मै प्रविष्टाय च तन्मातुलुङ्गं तथैव सः। भूपोऽप्याहूय तामायां पाठयित्वा नृपो ददौ ॥५७॥ विस्मितेष्वथ सर्वेषु सोऽपि कार्पटिको बहिः। गत्वा राजविलासिन्यै तददाद्बीजपूरकम् ॥५८॥ सा तस्मै राजसम्मानतत्स्वस्तीव जङ्गमा। जातरूपं ददौ पुष्पमिवाग्रफलसूचकम् ॥५९॥ १ व्याकुलः। २ विषयस्य - देशस्य अधिकृत - अधिकारी प्रशासकः। ३ प्राभृतम् - राज्ञे प्रदेयमुपहारम् यत् शुभोदर्कल्पितमासीत्।

नवम लम्बक ५४७

नवम लम्बक ५४७ वह व्याकुल कार्पटिक भी उस फल को हाथ में लेकर उसे ही राजा की कृपा समझता हुआ सभा से बाहर निकला ॥४८॥ उसके बाहर निकलते ही उसके सामने किसी ग्राम का एक अधिकारी राजा के दर्शन के लिए सभा में आता हुआ आ गया ॥४९॥ उसने कार्पटिक के हाथ में नीबू देखकर और उसे अच्छा शकुन समझकर तथा कार्पटिक को धोती-दुपट्टे के दो जोड़े दे कर उसने उससे नींबू ले लिया और राजसभा में जाकर राजा के चरणों में झुककर उसको पहले नींबू ही उसने भेंट-स्वरूप रखा और उसके पश्चात् दूसरी वस्तुएं राजा को अर्पित कीं ॥५०-५१॥ राजा ने उस नींबू को पहचानकर उस ग्रामाधिकारी से पूछा कि यह फल तुम्हें कहाँ से प्राप्त हुआ ? उत्तर में उसने कहा—'कार्पटिक से'। यह सुनकर—'आश्चर्य है कि उस अभागे को लक्ष्मी अब भी दर्शन नहीं देना चाहता'—ऐसा सोचता हुआ राजा बहुत खिन्न हुआ ॥५२-५३॥ और, उस नींबू को लेकर वह सभा से उठ गया। उधर उस कार्पटिक ने उन कपड़ों के जोड़ों में एक को दूकान में बेचकर अपने भोजन-पानी का प्रबन्ध किया और बचे हुए जोड़े के दो हिस्से करके अपने पहनने के काम में लिया ॥५४-५५॥ तब तीसरे दिन राजा ने उसी प्रकार सभा की और सभी लोग पहले की भाँति वहाँ एकत्र हुए ॥५६॥ और, सभा में आये हुए कार्पटिक को पहले की भाँति आर्या पढ़वाकर नींबू का फल पुनः उसे प्रदान किया ॥५७॥ यह देखकर सभी उपस्थित व्यक्ति चकित हुए और कार्पटिक ने उस फल को राजा की वेश्या को ले जाकर दिया ॥५८॥ राजा के सम्मान-वृक्ष की चलती-फिरती लता के समान उस वेश्या ने उस कार्पटिक को भारी फलसूचक सोना उसके बदले में दिया ॥५९॥

५४८ कथासरित्सागर

५४८ कथासरित्सागर

तस्य विक्रीय तद्धस्तस्थं कार्पटिकः सुखम्। विलासिनीमपि सा राज्ञः प्रविशद्यान्तिकं तदा॥६०॥ तस्मै च स्फूरद्रम्यं तन्मातुलुङ्गमदीदृशत्। सोऽपि तत्प्रत्यभिज्ञाय तां पप्रच्छ तदागमम्॥६१॥ ततो जगाद सा दत्तमिव कापटिकेन मे। तच्छ्रुत्वा स नृपो दध्यौ लक्ष्म्या सोऽद्यापि नेक्षितः॥६२॥ मन्दपुण्यो न यो वेत्ति मत्प्रसादमनिष्फलम्। मामेव घतान्यायान्ति महार्हरत्नान्यहो मुहुः॥६३॥ इति ध्यात्वा गृहीत्वा तस्यापयित्वा च रक्षितम्। मातुलुङ्गं स उत्थाय चक्रे भूपतिराह्निकम्॥६४॥ चतुर्धेऽह्नि च साज्रापार्द्राजास्थानं तथैव सत्। पूर्यते स्म च तत्सर्वैः सामन्तसचिवादिभिः॥६५॥ ततस्तत्र तमायान्तं भूयः कार्पटिकं नृपः। उपवेश्याग्रतः प्राग्वत् तामायामपाठयत्॥६६॥ ददौ च मातुलुङ्गं सतस्मै तच्च द्रुतोन्मिषत्। तस्य हस्तार्थसम्प्राप्तं द्विधामूत्पतितं भुवि॥६७॥ पिधानसन्धिभग्नाच्च तस्माद्रत्नानि निर्ययुः। भासयन्ति तदास्थानं महार्घाणि बहूनि च॥६८॥ तानि दृष्ट्वाब्रुवन् सर्वे परमार्थमजानताम्। व्यह्र मुपा भ्रमोऽभून्न प्रभावस्त्वीदृशः प्रभो॥६९॥ एतच्छ्रुत्वावब्रवीद्राजा मया युक्त्यानया ह्ययम्। दर्शनं धीरौदार्यस्य किं न वेत्ति परीक्षितः॥७०॥ पापान्तश्च न्यहं नास्य प्राप्तं प्राप्तोऽस्य राज्यं तु। तन्नद्य दर्शनं रुद्ध्वा दत्तमत्तस्य साम्प्रतम्॥७१॥ इत्युक्त्वा तानि रत्नानि ग्रामान् हस्त्यश्वकाञ्चनम्। दत्त्वा चकार सामन्तं स तं कार्पटिकं प्रभुः॥७२॥ उत्तस्थौ च ततः स्नातुमास्थानात् संस्तुवञ्जनात्। ययौ कार्पटिकः सोऽपि कृतार्थो वसतिं निजाम्॥७३॥ १ संस्तुवन्तः राज्ञ औदार्यं जनाः = तस्या यस्मिन् तदास्थानं तत्संस्तुवञ्जनादित्यर्थः। आस्थानं सभा। माघभर्तौ वनीयमास्थानं रमीषपूर्लस्यो तत्र - 'इत्याद्यः।

नवम लम्बक ५४९

नवम लम्बक ५४९ वह कार्पटिक उस सोने को बेचकर सुख से रहने लगा और उधर वह वेश्या भी किसी कार्य से राजा के समीप आई। उसने राजा के लिए उस सुन्दर और बड़े नींबू को उपहार स्वरूप भेंट किया। राजा ने नींबू को पहचानकर उसकी प्राप्ति का समाचार पूछा। तब वेश्या ने कहा—यह मुझे कार्पटिक ने दिया है। यह सुनकर राजा सोचने लगा कि वह कार्पटिक अब भी लक्ष्मी से नहीं देखा गया ! वह अभागा अब भी मेरी कृपा का सफल नहीं समझ रहा है। ये महान् रत्न बार-बार घूम-फिरकर मेरे ही पास लौट कर आ रहे हैं—॥६१-६३॥ ऐसा सोचकर उस नींबू को लेकर और उसे सुरक्षित रखकर राजा दैनिक कृत्य के लिए उठ गया ॥६४॥ इसी प्रकार चौथे दिन भी राजा ने वैसा ही दरबार किया और कार्पटिक को सामने बैठाकर उसी वार्ता का उससे कहवाया ॥६५-६६॥ और उसे उसी प्रकार वह नींबू दिया किन्तु आज शीघ्रता से उसके हाथ से छूट जाने के कारण उसके हाथ से भूमि पर गिरकर उस नींबू के दो टुकड़े हो गये ॥६७॥ और, उसके जोड़ खुल जाने के कारण रत्न उसमें से निकलकर बिखर गये। उन बहुमूल्य और उच्च कोटि के रत्नों से वह सारी स्थान भी जगमगाने लगा ॥६८॥ यह दृश्य देखकर वहाँ एकत्र लोग कहने लगे कि वास्तविक स्थिति को न जाननेवाले हम लोगों को मिथ्या भ्रम हुआ। राजा की कृपा तो इतनी बहुमूल्य है ॥६९॥ यह सुनकर राजा ने कहा—मैंने इस युक्ति से यह जानना चाहा कि लक्ष्मी इस पर प्रसन्न रहती है या नहीं। इस प्रकार, इसके भाग्य की परीक्षा की गई ॥७०॥ तीन दिनों तक उसके पापों का अन्त नहीं हुआ था वह आज हुआ है, इसीलिए लक्ष्मी ने इसे अभी दर्शन दिया ॥७१॥ ऐसा कहकर राजा ने रत्न और गाँव हाथी घोड़े सोना आदि देकर उस कार्पटिक को अपना एक सामन्त बना दिया ॥७२॥ अनन्तर उसकी प्रशंसा करती हुई उस सभा से उठकर राजा अपने नित्यकर्म के लिए चला गया और कार्पटिक भी अपने निवास-स्थान को गया ॥७३॥

५५ कथासरित्सागर

५५ कथासरित्सागर एवं यावन्न पापान्तो वृत्तस्तावन्न लभ्यते। प्रभुप्रसादो भृत्येन कृते कष्टशतैरपि॥७४॥ इत्याख्याय कथामेतां मन्त्रिमुख्यः स गोमुखः। नरवाहनदत्तं तं जगाद स्वप्रभुं पुनः॥७५॥ तदेवं जान नैतस्य नूनं कार्पटिकस्य तत्। वृत्तं पापक्षयोऽद्यापि येन नास्य प्रसीदसि॥७६॥ श्रुत्वैतद्गोमुखवचो हन्त साध्वित्युदीर्य च। तस्मै कार्पटिकाख्याय निजकार्पटिकाय सः॥७७॥ वत्सेश्वरसुतः सद्यः प्रददौ ग्रामसञ्चयम्। हस्त्यश्वं हेमकोटिं च सहस्राभरणानि च॥७८॥ तदेव राजसदृशः सोऽभूत् कार्पटिकः कृती। इत्थमे तत्परीवारे प्रभौ सर्वाफला कुतः॥७९॥ ब्राह्मणवीरस्य प्रलम्बबाहोः कथा एवं स्थितस्य तस्यात्र जातु सेवायमाययौ। नरवाहनदत्तस्य दाक्षिणात्यो युवा द्विजः॥८०॥ प्रलम्बबाहुनामा च स वीरस्तं व्यजिज्ञपत्। शौर्याकृष्टगतस्याङ्के पादौ देव समाश्रितः॥८१॥ पदानुगश्च देवस्य पदातिर्न शताम्यहम्। गजवाजिरथर्भूभौ गच्छतो माम्बरं पुनः॥८२॥ विद्याधराणां परमास्पदस्य भाविनो प्रभोः। दिनं प्रति सुवर्णार्थं दीयतां भृतये मम॥८३॥ एवमुक्तवतस्तस्मै तद्विण्णापुत्रवत्सलः। नरवाहनदत्तो द्वौ भृतिं निष्कावपाठयत्॥८४॥ ततस्तद्रूप्यं यतिभ्यं गोमृगीभ्यश्च सत्वरम्। प्रत्यहंऽर्पयित्वा गत्वा गत्वा च ददतो यथा॥८५॥ वीरवरब्राह्मण कथा आसीत् शिवपुरं नाम्ना पुरात्र नगरं महत्। तत्र शिवसुताख्या सपाट कृती पुरा॥८६॥

नवम लम्बक ५५१

नवम लम्बक ५५१ इस प्रकार, जबतक पाप का अन्त नहीं होता तबतक लाखों यत्न करने पर भी स्वामी की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती ॥७४॥ इस प्रकार, इस कथा को सुनाकर मन्त्रिश्रेष्ठ गोमुख ने अपने स्वामी नरवाहनदत्त से कहा- महाराज मैं समझता हूँ कि इस कार्पटिक का भी अभी पाप नष्ट नहीं हुआ है। इसीलिए, आप इस पर कृपा नहीं कर रहे हैं ॥७५-७६॥ गोमुख के यह वचन सुनकर और 'हां ठीक है'- ऐसा कहकर उस अपने कार्पटिक को वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त ने बहुत-से ग्राम, हाथी, घोड़े, हजारों मन सोना, कपड़े और आभूषण प्रदान किये ॥७७-७८॥ जिससे वह दरिद्र भिखारी कार्पटिक राजा के समान हो गया। सच है, कृतज्ञ और अच्छे परिवारवाले स्वामी की सेवा निष्फल कैसे हो सकती है ? ॥७९॥ वीर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा इस प्रकार, कौशाम्बी में रहते हुए नरवाहनदत्त के समीप सेवा के लिए दक्षिणदेशवासी एक युवक आया, जिसका नाम प्रलम्बबाहु था। उस वीर ने राजा से निवेदन किया- 'स्वामी मैं आप के यश से आकृष्ट होकर यहाँ आया हूँ। मैं पृथ्वी पर रथ, हाथी और घोड़े पर जाते हुए आपके पीछे-पीछे पैदल चलूँगा, किन्तु आकाश में गमन करते हुए आपके पीछे नहीं चल सकता ॥८०-८२॥ क्योकि भविष्यत् काल में आप विद्याधरों के सम्राट् होंगे ऐसा सुना जाता है। मेरे जीवन-निर्वाह के लिए प्रतिदिन आप एक सौ दीनार (सोने का सिक्का) दीजिए ॥८३॥ नरवाहनदत्त ने ऐसा कहते हुए उस अनुपम तेजस्वी ब्राह्मण के लिए प्रतिदिन एक सौ मुहरों की जीविका प्रदान की ॥८४॥ उसके प्रसंग में गोमुख ने राजा से कहा-'स्वामिन्, इस प्रकार के (अत्यधिक वेतनवाले) राजाओं के जो सेवक होते हैं, उनके सम्बन्ध में एक कथा सुनो ॥८५॥ वीरवर ब्राह्मण की कथा इस भूभाग में विक्रमपुर नाम का एक महान् नगर है। उसमें प्राचीन समय में विक्रमर्तुग नाम का राजा था ॥८६॥

तैक्ष्यं कृपाणे यस्याभून्न दण्डे नयशालिनः । धर्मे च सततासक्तिर्न तु स्त्रीमृगयादिषु ॥८७॥ तस्मिश्च राज्ञि तुल्यो रजःसु गुणविभ्रुतिः । मायक्यविचारश्च गोप्तृषु पङ्कुरक्षिणाम् ॥८८॥ तस्य वीरवरो नाम शूरो मालवदेशजः । स्वाकृतिच्छाययो राज्ञो विप्र सेवार्थमेकदा ॥८९॥ यस्य धर्मवती नाम भार्या वीरवती सुता। पुत्र सत्त्ववरश्चेति त्रयः परिकरा गृहे ॥९०॥ सेवापरिकरश्चान्यस्तस्य कट्यां कृपाणिका। पाणौ करवालैकस्मिन्नचर्मान्यस्मिन्सुदर्पणम् ॥९१॥ द्वयमात्र परिकरे वृत्य्यर्थयते स्म सः। प्रत्यहं भूपतेस्तस्माद्दीनारशतपञ्चकम् ॥९२॥ राजा च स ददौ तस्म वृत्तिं तां रक्षितौजसे। पश्यामि तावन्तस्य प्रकर्षमिति चिन्तयन् ॥९३॥ ददौ च तस्य चारान्स पश्चाज्जिज्ञासितुं नृपः। कुर्वन्नियद्भिर्दीनारैः किं ब्रियाद्दूरसाविति ॥९४॥ स च वीरवरस्त्वेषां दीनाराणां दिने दिने। शतं हस्ते स्वभार्याया भोजनादिकृते ददौ ॥९५॥ शतेन वस्त्रमाल्यादि क्रीणाति स्म शतं पुनः। स्नात्वा हरिरुद्रादीनामर्चनार्थमकल्पयत् ॥९६॥ द्विजातिकृपणादिभ्यो ददाव यच्छतद्वयम् । एव स विनियुङ्क्ते स्म नित्यं पञ्चशतीमपि ॥९७॥ तस्थौ च पूर्वमभ्यासे सिंहद्वारेऽस्य भूपतेः । कृत्वाह्निकादि चागत्य तत्रैवासीन्निशां पुनः ॥९८॥ एतां तद्दिनचर्यां च नित्यं चारा न्यवेदयन्। राज्ञे तस्मै ततस्तुष्टः स तांश्चारान् न्यवर्तयत् ॥९९॥ सोऽपि वीरवरस्तस्य राज्ञस्तस्थौ दिवामिशम्। स्नानादिसमयं मुक्त्वा सिंहद्वारे धृतायुधः ॥१ ॥ अथामं च वीरवर जेतुमिच्छन्प्रियाययौ। सूरप्रतापासहनो गर्जितोग्रो बलागमः ॥१ १॥

नवम लम्बक ५५३

नवम लम्बक ५५३ जिस नीतिमान के कृपाण में तीक्ष्णता थी दंड में नहीं। धर्म में जिसको निरन्तर आसक्ति थी स्त्री मद्य और आखेट में नहीं। ॥८७॥ गुण का टूटना केवल धनुषों में ही देखा जाता था अन्यत्र गुणक्षय नहीं था। अ-विचार (मेढ़ों का चराना) केवल पशु चरानेवालों में देखा जाता था अन्यत्र अ-विचार नहीं था॥८८॥ उस राजा के पास एक बार सुन्दर और भव्य स्वरूपवाला मालव-देशवासी ब्राह्मण सेवा (नौकरी) के लिए आया ॥८९॥ उसकी धर्मवती नाम की पत्नी वीरवती नाम की कन्या और सत्त्ववर नाम का बालक था। इस प्रकार इतना ही उसका परिवार था ॥९०॥ इसी प्रकार, उसके पास सेवा के तीन साधन थे—कमर में कृपाण और एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में शीशे के समान चमकती हुई ढाल ॥९१॥ केवल इतने ही बड़े कुटुम्ब के लिए उसने राजा से पाँच सौ दीनार प्रतिदिन का वेतन माँगा ॥९२॥ राजा ने भी उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण 'उसकी विशेषता देखें'—ऐसा सोचते हुए उसे उतना ही वेतन देना स्वीकार कर लिया ॥९३॥ तदनन्तर राजा ने उसके पीछे गुप्तचर लगा दिये कि देखो यह दो हाथोंवाला इतनी मुहरों को कैसे खर्च कर सकता है ? वह वीरवर उन पाँच सौ मुहरों में से एक सौ मुहरें अपने भोजन आदि की व्यवस्था के लिए अपनी पत्नी को देता था। एक सौ से कपड़े माला आदि खरीदता था एक सौ मुहरें प्रतिदिन स्नान करके विष्णु शिव आदि के पूजन में व्यय करता था और शेष दो सौ मुहरें, प्रतिदिन वह ब्राह्मण और दीन भिक्षुकों को दान देता था। इस प्रकार, वह प्रतिदिन पाँच सौ दीनार व्यय करता था ॥९४–९७॥ वीर, प्रातःकाल से मध्याह्न तक वह प्रतिदिन राजभवन के मुख्य द्वार पर खड़ा रहता था। तदनन्तर स्नान भोजन आदि करके शेष दिन और रात में फिर द्वार पर पहरा देता था ॥९८॥ राजा के गुप्तचर उस ब्राह्मण की प्रतिदिन की इस दिनचर्या की सूचना नित्य राजा को दिया करते थे ॥९९॥ कुछ दिनों के पश्चात् सन्तुष्ट राजा ने उससे गुप्तचरों को हटा लिया। वह वीरवर भी स्नान भोजन आदि के समय को छोड़कर दिन-रात तलवार लिये द्वार पर राजा की सेवा में डटा रहता था॥१००॥ कुछ दिनों के उपरान्त मानो वीरवर को जीतने की इच्छा से वीरों के प्रताप को न सहने वाला वर्षाकाल प्रचंड गर्जना करता हुआ आया ॥१०१॥ ७

५५४ कथासरित्सागर

५५४ कथासरित्सागर सदा च वर्षति घने घोरा धाराधरावली । न स वीरवरः सिंहद्वारास्तम्भ इवाचलत् ॥१०२॥ राजा विक्रमतुङ्गश्च प्रासादाद्वीक्ष्य तं सदा । आरुरोह स जिज्ञासुः प्रासादं तं पुनर्निशि ॥१०३॥ सिंहद्वारे स्थितः कोऽत्रेत्युपरिष्टाज्जगाद सः । सरक्षाङ्गः स्थितोऽत्रेति सोऽपि वीरवरोऽभ्यधात् ॥१०४॥ अहो अयं महासत्त्वः सुमहत्पदमर्हति । सिंहद्वारं न यो मुञ्चत्यम्बुदे वर्षतीदृशे ॥१०५॥ इति यावच्च स श्रुत्वा विचिन्तयति भूमिभृत् । तावद्दूरात् सकरुणं रुदतीमशृणोत् स्त्रियम् ॥१०६॥ दुःखितो मे न राष्ट्रेऽस्ति तदेषा का नु रोदिति । इत्यालोच्याब्रवीद्राजा स तं वीरवरं तदा ॥१०७॥ भो वीरवर कापि स्त्री दूरे रोदित्यसौ शृणु । कपा किं दुःखमस्याश्चेत्यत्र गत्वा निरूपय ॥१०८॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गन्तुं प्रववृते द्रुतः । धुन्वन्करतले वीरवरो बद्धासिधेनुकः१ ॥१०९॥ दृष्ट्वा तं प्रस्थितं मध्ये ज्वलद्विद्युति सादृशे । धारानिपातसंरुद्धरोदोरन्ध्रे सकौतुकः ॥११०॥ सकृपाञ्चावतीर्यैव प्रासादात्तस्य पृष्ठतः । अलक्षितः खड्गपाणिः प्रतस्थे सोऽपि भूमिपः ॥१११॥ स चानुससर्प यदितः पृष्ठान्वागतभूपतिः२ । गत्वा बहिः पुरादेकं प्राप वीरवरः सरः ॥११२॥ हा नाथ हा कृपालो हा शूर त्यक्ता त्वया कथम् । वत्स्यामीति च तन्मध्ये रुदतीं स्त्रीं ददर्श ताम् ॥११३॥ का त्वं शोचसि कं नाथमिति पृष्टा च तेन सा । उवाच पुत्र मामेतां विद्धि वीरवर क्षितिम् ॥११४॥ तस्या विक्रमतुङ्गो मे राजा मान्योऽथ धार्मिकः । मृत्युश्च भविता तस्य तृतीयेऽहनि निश्चितम् ॥११५॥ एतादृशश्च भूयोऽपि पतिः स्यात्पुत्र न ध्रुवं । तेनैतमनुशोचामि स्वात्मानं च सुदुःखिता ॥११६॥ १ कटिबद्धक्षुरिकः । २ पृष्ठं अभ्यागतः पश्चादागतः भूपतिर्यस्येति समासः ।

नवम लम्बक ५५५

नवम लम्बक ५५५ तब जब कि मेघ भीषण धारा-रूपी बाण-वर्षा कर रहा था वह बीरबर राजा के सिंह द्वार पर खम्भे के समान अविचल भाव से खड़ा रहा ॥१२॥ राजा विक्रमतुंग अपने महल की खिड़की से उसे प्रतिदिन पहरा देते हुए देखकर शयन- गृह में चढ़ता था ॥१३॥ एक बार, राजा ने घोर वर्षा के समय ऊपर से कहा— 'यहाँ कौन है ? यह सुनकर बीरबर ने उत्तर दिया—'मैं बीरबर उपस्थित हूँ।' ॥१४॥ आश्चर्य है कि यह महान् बलशाली व्यक्ति है जो ऐसी घोर वृष्टि में भी सिंहद्वार को नहीं छोड़ता ॥१५॥ उसका उत्तर सुनकर राजा जब यह सोच ही रहा था कि इतने में ही उसने दूर से किसी स्त्री को करुण स्वर में रोते हुए सुना ॥१६॥ 'मेरे राज्य में कोई भी दुःखी नहीं है फिर यह कौन रो रही है ? —ऐसा सोचकर राजा ने उसी समय बीरबर से कहा-'बीरबर, दूसरे स्थान पर कोई स्त्री रो रही है सुनो। यह कौन है और इसे क्या दुःख है यह वहाँ जाकर पता लगाओ' ॥१७-१८॥ यह सुनकर और 'जो आज्ञा'— कहकर वह वहाँ जाने के लिए तैयार हुआ। उसकी कमर में खंजर बँधा हुआ था और तलवार को हाथ से सम्भाले रहा था ॥१ ९॥ चमकती हुई बिजलीवाले भीषण मेघ के मूसलाधार वृष्टि के कारण उस समय आकाश और पृथ्वी के एक होने पर भी बीरबर को उधर जाते हुए देखकर दयालु राजा भी महल से उतर कर और तलवार हाथ में लेकर छिपे-छिपे उसके पीछे-पीछे चला ॥११०-१११॥ छिपकर राजा जिसका पीछा कर रहा था रोने के शब्द को लक्ष्य करके जाते हुए उस बीरबर ने नगर के बाहर एक तालाब देखा ॥११२॥ उस सरोवर में उस स्त्री को उसने देखा जो यह कहती हुई रो रही थी- हाय नाथ ! हे दयालो ! हे शूर ! तुमसे परित्यक्ता होकर मैं कैसे जिऊँगी ॥११३॥ 'तू कौन है और किस पति को छोड़कर विलाप कर रही है ? इस प्रकार बीरबर के पूछने पर वह स्त्री कहने लगी— "बेटा बीरबर, मैं पृथ्वी हूँ। मेरा पति धार्मिक राजा विक्रमतुंग है। आज से तीसरे दिन उसकी अवश्य मृत्यु होगी। इसलिए, सोच कर रही हूँ कि ऐसा पति फिर मुझे कहाँ मिलेगा ? इस प्रकार, मैं अत्यन्त दुःखी होकर अपने को ही सोच रही हूँ। ॥११४-११६॥

५५६ कथासरित्सागर

५५६ कथासरित्सागर देवपुत्रस्य सुप्रभस्य कथा अहं हि भावि पश्यामि दिव्यदृष्ट्या शुभाशुभम् । त्रिदिवस्थो यथाद्राक्षीत्सुप्रभो देवपुत्रकः ॥११७॥ स हि पुण्यक्षयात्स्वर्गात्पतनं भावि दिव्यदृक् । सप्ताहात्सूकरीगर्भे सम्भवं श्वशतात्मनः ॥११८॥ ततः स सूकरीगर्भवासक्लेशं विभावयन् । देवपुत्रोऽत्यजोद्भ्रान्तिर्दिव्यान्भोगान्सहारमनाः ॥११९॥ हा स्वर्गं हा ह्यप्सरसो हा नन्दनलतागृहाः । हा वत्स्यामि कथं क्रोडीगर्भे तदनु कर्दमे ॥१२०॥ इत्यादि विलपन्तं तं श्रुत्वाभ्येत्य सुराधिपः । पप्रच्छ सोऽपि स्वं तस्मै दुःखहेतुमवर्णयत् ॥१२१॥ ततः शक्रो जगादैनमस्त्युपायोऽत्र ते शृणु । व्रजौ नमः शिवायेति जपञ्छरणमीश्वरम् ॥१२२॥ तं गत्वा शरणं हित्वा पापं पुण्यमवाप्स्यसि । येन प्राप्स्यसि न क्रोडयोनिं स्वर्गाच्च च्युतिम् ॥१२३॥ इत्युक्तो देवराजेन सुप्रभोऽथ तथेति सः । उक्त्वा नमःशिवायति शम्भुं शरणमग्रहीत् ॥१२४॥ तमयं स दिनं षड्भिस्तत्प्रसादान्न केवलम् । निक्षिप्तं सूकरीगर्भे यावत्स्वर्गादुपर्यगात् ॥१२५॥ सप्तमेऽह्नि च तं स्वर्गे तत्रापश्यत् शतक्रतुः । वीक्षते यावदधिकं लोकान्तरमसौ गतः ॥१२६॥ इत्थं शुशोष स यथा दृष्ट्वाघं भावि सुप्रभः । तथैव भाविनं मृत्युं दृष्ट्वा शोचामि भूभृतः ॥१२७॥ एवमुक्तवतीं भूमिं तां स वीरवरोऽब्रवीत् । यथाम्ब सुप्रभस्याभूदुपायः शक्रवाक्यतः ॥१२८॥ तथा यद्यस्ति राज्ञोऽस्य रक्षोपायस्तदुच्यताम् । इति वीरवरोक्ते पृथिवी तमुवाच सा ॥१२९॥ १ अदृष्ट्वेत्यर्थः । अपश्येति प्रयोगश्चिन्त्योऽमीषां पाणिनीयानाम्।

नवम लम्बक ५५७

नवम लम्बक ५५७ देवपुत्र सुप्रभ की कथा मैं दिव्यदृष्टि से भावी होनेवाले शुभ और अशुभ को जानती हूँ। जैसे स्वर्ग में स्थित देवपुत्र सुप्रभ जानता था ॥११७॥ उस दिव्य दृष्टिवाले सुप्रभ ने पुण्य-क्षय के कारण स्वर्ग से अपना पतन और एक सप्ताह तक शूकरी के पेट में रहना जान लिया था ॥११८॥ तब शूकरी के गर्भ में रहने के कष्ट की कल्पना करते हुए देवपुत्र अपने सातों स्वर्गीय सुखों के लिए चिन्ता करने लगा-'हाय स्वर्ग हाय अप्सराओ और हाय नन्दन-वन के लतागृहो हाय मैं अब तुम्हें छोड़कर शूकरी के गर्भ में कैसे रहूँगा और उसके पश्चात् कीचड़ में कैसे जीवन व्यतीत करूँगा' ॥११९-१२०॥ इस प्रकार, रोते हुए देवपुत्र को सुनकर, देवराज इन्द्र ने आकर उससे विलाप का कारण पूछा और उसने भी अपना दुःख उसे बता दिया ॥१२१॥ तब इन्द्र ने कहा कि 'तेरे लिए एक उपाय है सुन'। 'ओं नमः शिवाय' इस मन्त्र का जप करता हुआ भगवान् शिव की शरण में जा ॥१२२॥ तू उनकी शरण में जाकर पापों से छूटकर पुण्य प्राप्त करेगा और उस पुण्य के प्रभाव से सूकर की योनि तुझे न मिलेगी और न तू स्वर्ग से ही पतित होगा ॥१२३॥ देवराज के इस प्रकार कहने पर सुप्रभ ने उसे स्वीकार किया और 'ओंनमः शिवाय' कह कर शम्भु की शरण ली ॥१२४॥ छः दिनों तक तन्मय होकर शिवजी का जप करके वह सूकर-योनि से ही नहीं बच गया प्रत्युत स्वर्ग से भी ऊपर चला गया ॥१२५॥ सातवें दिन उसे स्वर्ग में न देखकर इन्द्र ने विशेष दृष्टि डाली तो देखा कि वह स्वर्ग से ऊपर दूसरे लोक में चला गया है ॥१२६॥ इस प्रकार, जैसे सुप्रभ ने भावी अशुभ के लिए शोक किया था उसी प्रकार मैं भी राजा की होनेवाली मृत्यु के लिए शोक कर रही हूँ ॥१२७॥ इस प्रकार, कहती हुई पृथ्वी से उस वीरवर ने कहा-'माता ! जैसे इन्द्र द्वारा मुक्ति बताने पर सुप्रभ पापमुक्त हो गया उसी प्रकार राजा के भी जीवित रहने का कोई उपाय हो तो बताओ।' वीरवर के ऐसा कहने पर पृथ्वी बोली- ॥१२८-१२९॥

५५८ कथासरित्सागर

५५८ कथासरित्सागर एक एवास्त्युपायोऽत्र स्वाधीनः स तवैव च। तच्छ्रुत्वैव च सोऽवादीत्तुष्टो वीरवरो द्विजः ॥१३०॥ तर्हि ब्रूहि द्रुतं देवि यदि श्रेयो भवत्प्रभोः। प्राणैर्मे पुत्रदारैर्वा राज्यं सफलं मम ॥१३१॥ इत्युक्तवन्तमब्रूत् सा स वीरवर क्षितिः। अस्त्यत्र चण्डिकादेवी सैषा राजकुलान्तिके ॥१३२॥ तस्यै सत्त्ववरं पुत्रमुपहारीकरोषि चेत्। ततो जीवति राजासौ नास्त्युपायोऽपरः पुनः ॥१३३॥ श्रुत्वैतद्वसुधावाक्यं धीरो वीरवरस्तदा। यामि देवि करोम्येतदधुनैवेत्युवाच सः ॥१३४॥ कोऽन्यः स्वामिहितस्त्वाङ्गभद्रं तेऽस्तु व्रजेति भूः ॥ उक्त्वा तिरोऽभूत्सर्वं च राजा सोऽन्वागतोऽशृणोत् ॥१३५॥ ततो विक्रमतुङ्गोऽस्मिन् राज्ञि च्छन्नोऽनुगच्छति। द्रुतं वीरवरस्तस्यां रात्रौ स स्वगृहं ययौ ॥१३६॥ तत्र प्रबोध्य भार्यायै धर्मवत्यै शशंस सः। स्वपुत्रमुपहर्तव्यं राजार्थे वचनाद् भुवः ॥१३७॥ सा तच्छ्रुत्वाब्रवीत्कार्यमवश्यं स्वामिनो हितम्। तत्पुत्रश्चाथ भवता प्रतिबोध्योच्यतामिति ॥१३८॥ ततः प्रबोध्य बालाय तस्मै वीरवरेण तत्। ऊचे तदुपहारान्तं राजार्थे यद् भुवोदितम् ॥१३९॥ तच्छ्रुत्वा स यथार्थाख्यो बालः सत्त्ववरोऽभ्यधात्। प्रभुकार्योपयुक्तासुः पुण्यवांस्तात नास्ति किम् ॥१४०॥ भुक्तं मया तदन्नं यच्छोधनीयं ममापि तत्। तन्नीत्वा तत्कृते देव्या उपहारीकुरुष्व माम् ॥१४१॥ इत्यूचिवांसं तं सत्त्ववरं वीरवरः शिशुम्। 'सत्यं भवसि मज्जातः' इत्यवोचदविक्लवम् ॥१४२॥ एतद्विक्रमतुङ्गः स राजा श्रुत्वा बहिः स्थितः। अचिन्तयदहो सर्वे समसत्त्वा अमी इति ॥१४३॥ ततो वीरवरः स्कन्धे सुतं सत्त्ववरं स तम्। भार्या धर्मवती चान्ये पृष्ठे वीरवतीं सुताम् ॥१४४॥ गृहीत्वा जग्मतुस्तौ द्वौ रात्रौ तच्चण्डिकागृहम्। राजा विक्रमतुङ्गश्च पश्चाच्छन्नो ययौ तयोः ॥१४५॥