कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
षष्ठम लम्बक ८८७
षष्ठम लम्बक ८८७ किसी ने वहाँ पर सोने का पलंग लाकर बिछा दिया किसी ने उस पर लिहाफ के साथ गद्दई बिछाईं, किसी ने सुन्दर पुष्प चुनकर सेज पर रख दिये । किसी ने उत्तमोत्तम भोजन- पात्र लाकर वृक्ष के नीचे एक ओर सजा दिये ॥१६-१७॥ तदनन्तर, उस बावली के तल से कामदेव को जीतनेवाला रूपवान् दिव्य आभूषणों से विभूषित और तलवार हाथ में लिये हुए एक दिव्य पुरुष बाहर निकला ॥१८॥ वहाँ आकर और उसके आसन पर बैठ जाने पर, उसका सारा सेवक-परिवार उसी बावली में डूब गया ॥१९॥ तब उसने बावली से दो स्त्रियों को निकाला उनमें एक सुन्दरी मन्द वेषधारिणी और मंगलसूचक वस्त्राभरणों से सुशोभित थी और दूसरी अत्यन्त सुन्दरी और भड़कीले वस्त्राभरणों से युक्त थी। वे दोनों उसकी पत्नियां थीं उनमें दूसरी यानी छोटी उसे अधिक प्यारी थी ॥२०-२१॥ तब पहली पतिव्रता स्त्री ने पति और सपत्नी (सौत) के आगे रत्न की दो थालियों में भोजन परोस दिया ॥२२॥ और, उन दोनों के भोजन कर लेने पर उस छठी स्त्री ने स्वयं भोजन किया। तदनन्तर, उसका पति दूसरी छोटी स्त्री के साथ पलँग पर आनन्द-विलास करके नींद में सो गया। तब उसकी बड़ी (पहली) स्त्री उसके पैर दबाने लगी और दूसरी स्त्री भी पलंग पर पड़ी हुई जाग रही थी। ऊपर से यह सब देखकर उन ब्राह्मण-बालकों ने उसी वृक्ष पर बैठे हुए आपस में कहा—'यह कौन होगा यह बात जानने के लिए पैर दबानेवाली इस स्त्री से पूछना चाहिए। ये सभी कोई दैवी व्यक्ति हैं' ॥ २३—२५॥ ऐसा सोचकर और वृक्ष से उतरकर जब वे पहली स्त्री की ओर चले तबतक दूसरी लेटी हुई स्त्री ने यशोधर को देख लिया और इतने में उस चञ्चलाक्षी वह सोये हुए पति के पलंग से उठकर उसके पास आकर कहने लगी—'मेरा उपभोग करो' ॥२७-२८॥ यशोधर ने उससे कहा 'पापिन तू दूसरे की स्त्री है और मैं दूसरा पुरुष हूँ। फिर, इस प्रकार क्या कहती है? तब वह स्त्री बोली—'मैं तेरे जैसे सौ पुरुषों का संगम कर चुकी हूँ तो मुझे क्या डर है? यदि विश्वास न हो तो मेरी इन सौ अंगूठियों को देखो' ॥२९-३ १ ॥
८८६ कथासरित्सागर
[header] ८८६ कथासरित्सागर [/header]
कश्चित्कनकपर्यङ्कमानीयात्र न्यवेशयत् । कश्चितस्ततार तस्मिंश्च तूलिकां प्रच्छदोत्तराम् ॥११६॥ केचित् पुष्पाङ्गरागादि पानमाहारमुत्तमम् । आनीय स्वापयामासुरेकमेकं तरोस्तले ॥११७॥ ततो वापीतलात्तस्माद्रूपेण जितमन्मथः । उदगात्पुरुषः खड्गी दिव्याभरणभूषितः ॥११८॥ तस्मिंस्तत्रासनासीने क्लृप्तमाल्यानुलेपनाः । सर्वे परिजनास्तस्यां वाप्यामेव ममज्जिरे ॥११९॥ अथोज्जगार स सुखादेकां भव्याकृतिं प्रियाम् । विनीतवेषां मञ्जुस्तमाल्याभरणधारिणीम् ॥१२०॥ द्वितीयां चातिरूपाढ्यां सद्वस्त्राभरणोज्ज्वलाम् । ते च भार्ये उभे तस्य पश्चिमा वल्लभा पुनः ॥१२१॥ ततोऽत्र रत्नपात्राणि न्यस्य पात्रद्वये तयोः । भर्तुः सपत्न्याश्चाहारं पानं चोपानयत्सती ॥१२२॥ तयोर्भुक्तवतोः सापि बुभुजे सोऽप्य तत्पतिः । पर्यङ्कशयनं भेजे तया साकं द्वितीयया ॥१२३॥ अनुभूय रतिक्रीडासुखं निद्रां जगाम सः । आद्या च भार्या सा तस्य पादसंवाहनं व्यधात् ॥१२४॥ द्वितीया साप्यनिद्रैव तस्याभूच्छयने प्रिया । दृष्ट्वैतत्तौ विप्रपुत्रौ तस्थतुर्धर्तुमिष्व ॥१२५॥ कोऽयं स्यादवतीर्यैतत् पादवाहिकामिमाम् । एतस्य किन्न पृच्छावः सर्वे ह्यविकृता अमी ॥१२६॥ अवतीर्याथ तौ यावदाद्यां तामुपसर्पतः । ययोधर तयोस्तावद्द्वितीया सा ददर्श तम् ॥१२७॥ उत्थाय शयनात् पत्युः सुप्तस्मोहामघापह्ला । तमुपेत्य सुरूपं सा मां भजस्वेत्यभाषत ॥१२८॥ पापे त्वं परदारा मे तथाहं परपूरुषः । तत्किमेवं ब्रवीषीति तेनोक्ता साब्रवीत् पुनः ॥१२९॥ त्वादृशानां भतन्नाह सङ्गता किं भयं तव । न चान्यस्यापि पश्यैतद्गृह्णीष्वशतं मम ॥१३०॥
दशम लम्बक ८८९
दशम लम्बक ८८९ एक-एक पुरुष से मैने एक-एक अंगूठी ली हैं' ऐसा कहकर उसने अपने आँचल की गाँठ से खोलकर उसे सौ अंगूठियाँ दिखा दीं ॥३१॥ तब यशोधर ने उससे कहा- 'तू सौ से समागम कर या साठ से मेरी तो तू माता है। मैं उसके समान पवित्र नहीं हूँ' ॥३२॥ इस प्रकार यशोधर से तिरस्कृत स्त्री ने क्रोध से अपने पति को जगाकर और उसे यशोधर को दिखाकर रोते हुए अपने पति से कहा- तुम्हारे सोये रहने पर इस पापी ने मुझे बलात्कार करके भ्रष्ट कर दिया है। उससे यह सुनते ही उसका पति तलवार खींचकर उठ खड़ा हुआ ॥३३-३४॥ तदनन्तर दूसरी पतिव्रता स्त्री ने उसके चरणों में गिरकर कहा- 'झूठे ही पाप न करो मेरी बात सुनो ॥३५॥ इस पापिन ने इसे देखकर, तुम्हारी बगल से उठकर इससे आग्रहपूर्वक संगम करने की प्रार्थना की किन्तु इस सज्जन ने इसे स्वीकार नहीं किया ॥३६॥ तू मेरी माता है ऐसा कहकर इसे फटकार दिया। इसी ईर्ष्या से इसने उसका वध कराने के लिए तुम्हें जगाया है ॥३७॥ हे स्वामिन्, इसने वृक्ष पर रात को ठहरे हुए एक सौ पथिकों के साथ समागम किया है और उनसे अंगूठियां ली हैं। वैर बढ़ने के भय से मैंने इस अकथनीय पाप की कथा तुमसे नहीं कही ॥३८-३९॥ यदि तुम्हें विश्वास न हो तो इसके आँचल में बँधी हुई अंगूठियां देखो। यह मेरा सती-धर्म नहीं है कि मैं स्वामी से झूठ बोलूँ ॥४०॥ हे स्वामिन् मेरे सतीत्व का विश्वास करने के लिए मेरा प्रभाव देखो। ऐसा कहकर उसने क्रोध से देखकर एक वृक्ष को भस्म कर डाला और फिर प्रसन्न दृष्टि से देखकर उसे फिर पहले से भी अधिक हरा-भरा बना दिया। यह देखकर उस का सन्तुष्ट पति उसे बड़ी देर तक आलिंगन करता रहा ॥४१-४२॥ और, उस दूसरी स्त्री के आँचल से अंगूठियां पाकर उस पति ने उसकी नाक काटकर उसे दूर कर दिया (निकाल दिया) ॥४३॥ और, पढ़ने के लिए जानेवाले उस यशोधर से क्षमा-प्रार्थना की तथा खेद और वैराग्य के साथ वह उससे बोला- मैं इन दोनों पत्नियों को हृदय में रखकर ईर्ष्या के कारण इनकी रक्षा करता रहा हूँ परन्तु आज इस दुष्टा स्त्री की रक्षा मैं न कर सका ॥४४-४५॥ ११२
४८८ कथासरित्सागर
४८८ कथासरित्सागर एकैकमङ्गुलीयं हि हृतमकैकशो मया। इत्युक्त्वा स्वाञ्चलात्तस्मायङ्गुलीयान्यदर्शयत् ॥३१॥ ततो यशोधरोऽवादीत् सङ्कुचध्वं शतेन वा। लक्षेण वा मम त्वं तु माता नाहं तवाविषः ॥३२॥ एव निराकृता तेन सा प्रबोध्य पतिं क्रुधा। यशोधरं तं सन्दर्श्य जगाद रुदती शठा। ३३॥ अनेन पाप्मना सुप्ते त्वय्यहं ध्वंसिता बलात्। तच्छ्रुत्वैव स उत्तस्थौ खड्गमाकृष्य तत्पतिः ॥३४॥ अथान्यया सा सती भार्या तं गृहीत्वैव पादयोः। अब्रवीन्मा कृथा मिथ्या पापं शृणु वचो मम ॥३५॥ अनया पापया दृष्ट्वा त्वत्पार्श्वोत्थितया हठात्। अर्थितोऽयं वशो नास्याः साधुस्तत्प्रत्यपद्यत ॥३६॥ माता मम त्वमित्युक्त्वा यदनेन निराकृता। प्राबोधयदधर्मात् त्वां वधायतस्य कोपतः ॥३७॥ अनया मत्समक्षं च रात्रिष्विह तरौ स्थिता। हृताङ्गुलीयका भुक्ताः शतसंख्याः प्रगोऽध्वगाः ॥३८॥ द्वेषसम्भावनमगम्या मया चोक्तं न जातु ते। अद्य त्वत्पापभीत्यैवमबाध्यमहमब्रवम् ॥३९॥ वस्त्राञ्चलग्नेऽङ्गुलीयानि पश्यास्याः प्रत्ययो न चेत्। न चैष मे सतीधर्मो यद्गत्यनृतं वचः ॥४०॥ सतीत्वप्रत्ययायमं प्रभावं पश्य मे प्रभो। इत्युक्त्वा भस्म चक्रे सा तद् यं क्रोधवीक्षितम् ॥४१॥ प्रसाददृष्टे च पुनस्तं पूर्वाभ्यधिकं व्यधात्। तद्दृष्ट्वा स चिराद् भर्त्ता तुष्टस्तामुपगूहवान् ॥४२॥ निरास च द्वितीयां तां छित्त्वा नासां कुगेहिनीम्। अङ्गुलीयानि सम्प्राप्य तद्वस्त्रान्तात्स उत्पसि ॥४३॥ क्षमयामास किल तं दृष्ट्वाभ्ययनपाठकम्। यशोधरं भ्रातृपुत्रं संनिवेद्य जगाद च ॥४४॥ भार्ये हृदि निघायैते रक्ष्यामोऽप्यविघातसदा। तथाप्येषा न शकिता पापैका रक्षितुं मया ॥४५॥
दशम लम्बक ८९१
दशम लम्बक ८९१ बिजली को कौन स्थिर रख सकता है और चंचल (दुराचारिणी) स्त्री की कौन रक्षा कर सकता है ? सती स्त्री केवल एक अपने चरित्र से ही रक्षित होती है ॥४६॥ रक्षा की गई पतिव्रता दोनों लोकों में पति की रक्षा करती है, जैसा कि शाप और वर देने में इस स्त्री ने मेरी रक्षा की है ॥४७॥ इसकी कृपा से मैं इस व्यभिचारिणी स्त्री के सम्पर्क से बचा और उत्तम ब्राह्मण की हत्या के पाप से भी बचा' ॥४८॥ इस प्रकार कहकर और यशोधर को बैठाकर उसने पूछा—'तुम दोनों कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो यह मुझे बताओ' तब यशोधर ने अपना वृत्तान्त बताकर और उसका विश्वास प्राप्त करके कुतूहलवश उससे भी पूछा—॥४९-५०॥ हे महापुरुष यदि गुप्त रखने की बात न हो तो यह बताओ कि ऐसा भोग प्राप्त करने पर भी तुम्हें यह जलवास कैसे मिला ? ॥५१॥ 'यह सुनकर, सुनो कहता हूँ' ऐसा कहकर वह पुरुष उससे बोला— हिमालय के दक्षिण की ओर कश्मीर नाम का देश है जिसे मानो ब्रह्मा ने मनुष्यों के लिए, स्वर्ग का कौतूहल दूर करने के हेतु बनाया है ॥५२-५३॥ जहाँ कैलास और श्वेतद्वीप के मुख्य निवास को छोड़कर शिव और विष्णु सैकड़ों स्थलों में स्वयं प्रादुर्भूत होकर निवास करते हैं। जो देश वितस्ता नदी के जल से पवित्र एवं शूर तथा विद्वान् व्यक्तियों से भरा है जो छल कपट आदि दोषों से शून्य है अर्थात् जहाँ छल कपट का नाम नहीं है और जिसे परस्यात् शत्रु भी विजित नहीं कर सकते ॥५४-५५॥ मैं उस कश्मीर में भवनर्मा मात्र का सामान्य स्थिति का ग्रामवासी ब्राह्मण-पुत्र था। पूर्वजन्म में मेरी दो पत्नियाँ थीं। मैंने किसी समय भिक्षुओं के साथ सम्पर्क हो जाने के कारण शास्त्र में कहे गये उपाषथ नाम के नियम व्रत को स्वीकार किया ॥५६-५७॥ उस व्रत के प्रायः समाप्त हो जाने पर मेरी सेज पर मेरी पापिनी पत्नी हठपूर्वक आकर सो गई ॥५८॥ रात के चौथे प्रहर में अपने व्रत का ध्यान न रहा हुआ मोह के वश में मैंने उस स्त्री के साथ समागम कर लिया। इस उस व्रत का इतना ही खण्डन हो जाने से मैं जल-पुरुष बनकर यहाँ उत्पन्न हो गया। और वे ही दोनों पत्नियां यहाँ भी मेरी पत्नियां हुईं ॥ -९ ॥
८९ कथासरित्सागर
८९ कथासरित्सागर विद्युतं कः स्थिरीकुर्यात्को रक्षेच्चपलां स्त्रियम्। साध्वी यदि परं स्वेन शीलेनैकेन रक्ष्यते ॥४६॥ तद्रक्षिता सा भर्त्तारं रक्षत्युभयलोकयोः । यथानया धापवरक्षमयाद्यास्मि रक्षितः ॥४७॥ एतत्प्रसादात् कुलटासङ्गमोऽप्यगतो मम। न चोपनतमप्युग्रं सद्भिप्रवषपातकम् ॥४८॥ इत्युक्त्वा स तमप्राक्षीदुपवेश्य यशोधरम्। आगतोऽसि कुतः कुत्र भ्रमषः कथ्यतामिति ॥४९॥ ततो यशोधरस्तस्मै स्ववृत्तान्तं निवेद्य सः। विश्वासं प्राप्य पप्रच्छ तमप्यथ कुतूहलात् ॥५०॥ न रहस्यं महाभाग यदि तत्प्रब्रूहि मज्जुना। कस्त्वमीदृशि भोगेऽपि किं च ते जलवासिता ॥५१॥ तच्छ्रुत्वा शृणुतां वच्मीत्युक्त्वा स पुरुषस्तदा। जलवासी स्ववृत्तान्तमथ वक्तुं प्रचक्रमे ॥५२॥ हिमवद्दक्षिणो देशः काश्मीराख्योऽस्ति यं विधिः। स्वर्गकौतूहलं कत्तुं मर्त्यानामिव निर्ममे ॥५३॥ यत्र विस्मृत्य कैलासश्वेतद्वीपसुखस्थितिम्। स्वयम्भुवौ स्थानशतान्यभ्यासाते हराच्युतौ ॥५४॥ वितस्ताजलपूतो यः शूरविद्वज्जनाकुलः। अजेयश्छत्रदोषाणां द्विषतां हस्तिनामपि ॥५५॥ तत्राहं भवशर्माख्यो ग्रामवासी किलाभवम्। द्विजातिपुत्रः सामान्यो द्विभार्यः पूर्वजन्मनि ॥५६॥ सोऽहं कदाचित् सञ्जातसन्तप्तो मिथुभिः सह। उपोषणस्य नियमं तच्छास्त्रोक्तं गृहीतवान् ॥५७॥ तस्मिन् समाप्तप्राये च नियमे शयने मम। पापा हठादुपैत्यैका भार्या सुप्तवती किल ॥५८॥ तुर्ये तु यामे विस्मृत्य तद्व्रतं सन्निषेवणम्। निद्रामोहातया साकं रतं सेपितवानहम् ॥५९॥ तन्मात्रखण्डिते तस्मिन्व्रतेऽहं जलपूरुषः। इहाय जातस्ते द्वे च भार्ये जाते इहापि मे ॥६०॥
दशम लम्बक ८९१
दशम लम्बक ८९१ बिजली को कौन स्थिर रख सकता है और चपल (दुराचारिणी) स्त्री को कौन रक्षा कर सकता है? सती स्त्री केवल एक अपने चरित्र से ही रक्षित होती है॥४६॥ रक्षा की गई पतिव्रता दोनों लोकों में पति की रक्षा करती है, जैसा कि शाप और वर देने में इस स्त्री ने मेरी रक्षा की है॥४७॥ इसकी कृपा से मैं इस व्यभिचारिणी स्त्री के सम्पर्क से बचा और उत्तम ब्राह्मण की हत्या के पाप से भी बचा' ॥४८॥ इस प्रकार कहकर और यशोधर को बैठाकर उसने पूछा-'तुम दोनों कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो यह मुझे बताओ' तब यशोधर ने अपना वृत्तान्त बताकर और उसका विश्वास प्राप्त करके कुतूहलवश उससे भी पूछा-॥४९-५०॥ 'हे महापुरुष यदि गुप्त रखने की बात न हो तो यह बताओ कि ऐसे भोग प्राप्त करने पर भी तुम्हें यह वनवास कैसे मिला ? ॥५१॥ यह सुनकर, 'सुनो कहता हूँ' ऐसा कहकर वह पुरुष उससे बोला-'हिमालय के दक्षिण की ओर कश्मीर नाम का देश है जिसे मानो ब्रह्मा ने मनुष्यों के लिए स्वर्ग का कौतूहल दूर करने के हेतु बनाया है ॥५२-५३॥ जहाँ कैलास और श्वेतद्वीप के मुख्य निवास को छोड़कर शिव और विष्णु सैकड़ों स्थानों में स्वयं प्रादुर्भूत होकर निवास करते हैं। जो देश वितस्ता नदी के जल से पवित्र एवं शूर तथा विद्वान् व्यक्तियों से भरा है, जो छल कपट आदि दोषों से अजेय है अर्थात् जहाँ छल कपट का नाम नहीं है और जिसे बलवान् शत्रु भी विजित नहीं कर सकते ॥५४-५५॥ मैं उस कश्मीर में भवशर्मा नाम का सामान्य स्थिति का ग्रामवासी ब्राह्मण-पुत्र था। पूर्वजन्म में मेरी दो पत्नियाँ थीं। मैंने किसी समय भिक्षुओं के साथ सम्पर्क हो जाने के कारण शास्त्र में कहे गये उपोषध नाम के नियम-व्रत को स्वीकार किया ॥५६-५७॥ उस व्रत के प्रायः समाप्त हो जाने पर मेरी सेज पर मेरी पापिनी पत्नी उत्सुक जाकर सो गई ॥५८॥ रात के चौथे प्रहर में अपने व्रत का ध्यान न रहता हुआ नींद के नशे में मैंने उस स्त्री के साथ समागम कर लिया। इस उस व्रत का इतना ही खण्डन हो जाने से मैं झाड़-गुल्म बनकर यहाँ उत्पन्न हो गया। और, वे ही दोनों पत्नियाँ यहाँ भी मेरी पत्नियाँ हुईं ॥५९-६०॥
८९२ कथासरित्सागर
८९२ कथासरित्सागर एका सा कुष्टा पापा द्वितीयेयं पतिव्रता। खण्डितस्यापि तस्येदृक्प्रभावो नियमस्य मे॥६१॥ जातिं स्मरामि यद्यञ्च रात्रौ भोगा ममादृशाः। यदि नाखण्डयिष्यं तदिव स्यां मे न जन्म तत्॥६२॥ इत्याख्याय स्ववृत्तान्तमतिथी तावपूजयत्। समृष्टभोजनैर्दिव्यवस्त्रैश्च भ्रातरावुभौ॥६३॥ ततोऽस्य सा सती भार्या पूर्ववृत्तमवेत्य तत्। विन्यस्य जानुनी भूमाविन्दुं पश्यन्त्यभाषत॥६४॥ भो लोकपालाः सत्यं चेदहं साध्वी पतिव्रता। तदम्बुवाहमुक्तोऽद्य स्वर्गं यात्वेष मे पतिः॥६५॥ इत्युक्तवत्यामवस्थां सा विमानमवातरत्। तदारूढौ च तौ स्वर्गं दम्पती सह जग्मतुः॥६६॥ असाध्यं सत्यसाध्वीनां किमस्ति हि जगत्त्रये। तौ च विप्रौ तदालोक्य विस्मयं ययतुः परम्॥६७॥ नीत्वा च रात्रिमुष ते प्रभाते स यक्षोभटः। लक्ष्मीधरश्च विप्रो तौ भ्रातरौ प्रस्थितौ ततः॥६८॥ सायं च निर्जनारण्ये वृक्षमूलमथापतुः। जलप्रेप्सू च तस्मात्तौ वृक्षाच्छ्रुणुवतुर्गिरम्॥६९॥ हे विप्रौ तिष्ठतं तावदहमाद्य करोमि वाम्। स्नानान्नपानैरातिथ्यं गृहे मे ह्यागतौ युवाम्॥७०॥ इत्युक्त्वा व्यरमद्वाक्यं जज्ञे तत्राम्बुवापिका। अथोपतस्थे तत्तीरे विचित्रं पानभोजनम्॥७१॥ किमेतदिति साश्चर्यौ ततस्तौ द्विजपुत्रकौ। स्नात्वा वाप्यां यथाकाममाहाराद्यत्र चक्रतुः॥७२॥ ततः सन्ध्यामुपास्यन्तौ यावत्तत्तले स्थितौ। तावच्च कोऽपि पुरुषस्तरोस्तस्मादवातरत्॥७३॥ स चाभिवादितस्ताभ्यां विहितस्वागतः क्रमात्। उपविष्टो द्विजातिभ्यां को भवानित्यपृच्छयत॥७४॥ ततः स पुरुषोऽब्रवीत् पुरेह दुर्गतो द्विजः। अभूवन् तस्य न जाता देवान्धभ्रमणसङ्गतिः॥७५॥
दशम लम्बक ८१५
दशम लम्बक ८१५ जिनमें एक बहू पापिन और व्यभिचारिणी थी और दूसरी यह पतिव्रता है। खंडित व्रत का भी इतना प्रभाव है कि मैं पूर्व जन्म का स्मरण भी करता हूँ। यदि मैं अपना व्रत खंडित न करता तो यहाँ मेरा जन्म भी न होता ॥६१-६२॥ इस प्रकार, अपना समाचार कहकर उस पुरुष ने उन दोनों भाइयों को दिव्य भोजन और वस्त्रादि से सम्मानित किया ॥६३॥ तब उस पुरुष की सती पत्नी ने यह समाचार को जानकर, भूमि पर घुटने टेककर और चन्द्रमा की ओर देखकर यह कहा—॥६४॥ 'हे लोकपालो यदि मैं सचमुच पतिव्रता हूँ तो मेरा पति इस जल-वास से मुक्त होकर स्वर्ग को जाय' ॥६५॥ उसके इस प्रकार कहते ही आकाश से विमान उतरा और उस पर चढ़े हुए वे दम्पती (पति-पत्नी) स्वर्ग को चले गये ॥६६॥ सच है सच्ची पतिव्रताओं के लिए तीनों लोकों में असाध्य क्या है ? वे दोनों ब्राह्मण- पुत्र यह दृश्य देखकर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो गये ॥६७॥ शेष रात्रि को व्यतीत कर प्रातःकाल ही वे दोनों ब्राह्मण-पुत्र वहाँ से आगे चल पड़े ॥६८॥ और सायंकाल एक निर्जन वन में जल की इच्छा करते हुए जब वे एक वृक्ष के नीचे खड़े हुए, तब उन्होंने उस वृक्ष से यह वाणी सुनी—॥६९॥ 'हे ब्राह्मणो ठहरो मैं अभी आप दोनों का स्नान और भोजन आदि से आतिथ्य करता हूँ क्योंकि तुम दोनों मेरे घर पर आये हो। ॥७०॥ ऐसा कहकर वह वाणी बन्द हो गई। तदनन्तर, वहीं एक सुन्दर बावली बन गई और उसके किनारे विविध प्रकार की भोजन-पान-सामग्री उपस्थित हो गई। 'यह क्या है' इस प्रकार आश्चर्य-चकित उन दोनों ब्राह्मण-पुत्रों ने वापी में स्नान करके भोजन किया ॥७१-७२॥ तदनंतर, सन्ध्या करके जब वे वृक्ष के नीचे बैठे तभी एक सुन्दर पुरुष उस वृक्ष से उतरा ॥७३॥ उन ब्राह्मणों से प्रणाम किया गया वह पुरुष उनका स्वागत करके स्वयं जब बैठ गया तब उससे उन ब्राह्मण-पुत्रों ने पूछा कि 'तुम कौन हो' ? ॥७४॥ तब वह पुरुष बोला कि मैं पहले जन्म में एक दरिद्र ब्राह्मण था। दैवयोग से कुछ धर्मात्मा (जैन साधुओं) से मेरी संगति हो गई ॥७५॥
कुर्वंस्तदुपविष्टं च जातु व्रतमुपोषणम्। शठेन साय मेनापि भोजिष्ठोऽस्मि बलात्पुनः ॥७६॥ तेनाहं खण्डितात्तस्माद्व्रताज्जातोऽस्मि गुह्यकः। पूर्णं यद्यकरिष्यं तदभविष्यं सुरो दिवि ॥७७॥ एवं मयोक्तः स्वोदन्तो युवां कथयतं तु मे। कुतो युवां किमेतां च प्रविष्टौ स्थो महत्स्थलीम् ॥७८॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीत्तस्मै स्ववृत्तान्तं यशोधरः। ततस्तो ब्राह्मणो यक्षः पुनरेवमभाषत ॥७९॥ यद्येवं सर्वहृद्विद्याः स्वप्रभावादहामि वाम्। कृतविद्यौ गृहं यात विदेशभ्रमणेन किम् ॥८०॥ इत्युक्त्वा स ददौ ताभ्यां विद्यास्तो च तदैव ताः। तत्प्रभावाज्जगृहतुः सोऽथ यक्षो जगाद तौ ॥८१॥ एकाभिदानीं याचेऽहं भवद्भ्यां गुरुदक्षिणाम्। युवाभ्यां मत्कृते कार्यं व्रतमद्यत्वपोषणम् ॥८२॥ सत्याभिभाषणं ब्रह्मचर्यं देवप्रदक्षिणम्। भोजनं भिक्षुवेलायां मनसः संयमः क्षमा ॥८३॥ एकरात्रं विधायैतदर्पणीयं फलं मयि। पूर्णव्रतफलं येन दिव्यत्वं प्राप्नुयामहेम् ॥८४॥ इत्युक्तवान्विनाभ्यां ताभ्यां यक्षस्तथेति सः। विश्राम्य प्रतिपद्यार्थस्तत्रैवान्तर्दधे तरो ॥८५॥ तौ चाप्रयाससिद्धाथौ प्रहृष्टौ भ्रातरावुभौ। रात्रिं नीत्वा परावृत्य स्वमेवाजग्मतुर्गृहम् ॥८६॥ तत्राख्याय स्ववृत्तान्तमानन्द्य पितरौ निजौ। उपोषणव्रतं तत्तौ यक्षपुण्याय चक्रतुः ॥८७॥ अथैत्य स गुह्यक्षो विमानस्थो जगाद तौ। युष्मत्प्रसादाद्युक्त्वं प्राप्तोऽस्म्युत्तीर्य यक्षताम् ॥८८॥ तदात्मार्थमिदं कार्यं युवाभ्यामपि तद्व्रतम्। भविता येन दवत्वं देहान्ते युवयोरिति ॥८९॥ अक्षीणांशाविदानीं च धरामत्र सजिष्यथः। इत्युक्त्वा स विमानेन कामचारी ययौ दिवम् ॥९०॥
दशम स्तम्बक ८१५ एकबार मैं उनके द्वारा उपदिष्ट उपापद्म (व्रत) करने लगा। उस व्रत के मध्य में ही किसी एक दुष्ट ने मुझे सायंकाल में भोजन करा दिया। इस प्रकार व्रत के खण्डित हो जाने पर मैं गुह्यक (यक्ष) योनि में उत्पन्न हो गया। यदि व्रत को पूरा कर लेता तो स्वर्ग में देवता बन जाता ॥७६-७७॥ यह मैंने अपना समाचार तुम्हें सुनाया। अब तुम अपना परिचय मुझे दो कि तुम लोग इस मरुभूमि में क्यों आ गये हो ? ॥७८॥ यह सुनकर यशोधर ने उसे अपना वृत्तान्त सुनाया। तब वह यक्ष उन ब्राह्मण-पुत्रों से फिर बोला—॥७९॥ 'यदि ऐसी बात है तो मैं तुम दोनों को अपने प्रभाव से विद्याएँ प्रदान करता हूँ। तुम लोग विद्वान् होकर घर जाओ। व्यर्थ विदेश भ्रमण से क्या लाभ है ?' ॥८०॥ यह कहकर यक्ष ने उन्हें विद्याएँ प्रदान कीं और उसी यक्ष की कृपा से उन्होंने भी विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर, यक्ष उन दोनों से बोला—'अब मैं तुम दोनों से गुरु-दक्षिणा माँगता हूँ। इस गुरु-दक्षिणा के रूप में तुम दोनों को मेरे लिए उपापद्म (व्रत) करना चाहिए। भूख वासना ब्रह्मचर्य रहना देवता की प्रदक्षिणा करना नियूमा के समय (दिन रहते) भोजन करना मन का संयम करना और क्षमा ये इस के आचरणीय नियम हैं। इस तरह व्रत करके इसका फल मुझे अर्पण कर देना। जिससे कि मुझे पूरे व्रत का फल (देवत्व) मिल जाय ॥८१-८४॥ उन विनम्र दोनों बन्धुओं से इस प्रकार कहकर और उनसे व्रत के लिए स्वीकार-वचन लेकर वह यक्ष उसी वृक्ष में अन्तर्हित हो गया ॥८५॥ बिना परिश्रम और प्रयत्न के अर्थ सिद्ध किए हुए उन दोनों ने रात बिताकर भोर अपने घर वापस आकर तथा माता-पिता को यह सारा वृत्तान्त सुनाकर उन्हें शान्ति दान दिया। तब उन दोनों ने अपने गुरु यक्ष के पुण्य के लिए उपापद्म नामक व्रत किया ॥८६-८७॥ तदनन्तर अप्सरायुक्त यक्ष विमान में बैठकर उनके पास आया और बोला—'मैं इस यक्ष योनि से मुक्त होकर तुम लोगों की कृपा से देवत्व प्राप्त कर लिया है, सो आत्म कल्याण के लिए तुम दोनों को भी यह व्रत करना चाहिए। इससे मृत्यु के पश्चात् तुम लोग भी देवता बनोगे और इस जीवन में मेरे वरदान से अक्षय धनी बनोगे। इस प्रकार कहकर वह कामचारी स्वर्ग को चला गया ॥८८-९१॥
८९६ कथासरित्सागर
८९६ कथासरित्सागर ततो यशोधरो लक्ष्मीधरश्च भ्रातरावुभौ। कृत्वा व्रतं तत्राप्तार्थविद्यावास्तां यथासुखम् ॥९१॥ एव धर्मप्रवृत्तानां शीलं कृच्छ्रेऽप्यमुञ्चताम्। देवता अपि रक्षन्ति कुर्वन्तीष्टार्थसाधनम् ॥९२॥ इत्य वसन्तकाख्यातकथामृतविनोदितः। मत्सेश्वरसुतं प्रेप्सु स शक्तियशसं प्रियाम् ॥९३॥ आहारसमये पित्रा समाहूतस्तदन्तिकम्। नरवाहनदत्तोऽथ ययौ स्वसचिवै सह ॥९४॥ अथानुरूपं भुक्त्वा च तत्र सायं स्वमन्दिरम्। वयस्यैः स निजैः साकमयासी गोमुखादिभिः ॥९५॥ तत्र च गोमुखो भूयो विनोदयितुमब्रवीत्। श्रूयतामिममन्यं वो देवाख्यामि कथाक्रमम् ॥९६॥ लब्धप्रणाशमकरवानरयोः कथा आसीद्रक्तमुखो नाम परिभ्रष्टः स्वयूथतः। उदुम्बरवने तीरे वारिधेर्वानिरर्षम ॥९७॥ तस्य भक्षयतो हस्ताच्च्युतमेकमुदुम्बरम्। जघास शिशुमारोऽत्र वारिराशिजलाशयः ॥९८॥ तत्फलास्वादहृष्टश्च स प्रचक्रे कलं रवम्। यद्वशात् स बहून्यस्मै फलानि कपिरक्षिपत् ॥९९॥ तथैव चाक्षिपन्नित्यं फलानि स तथैव च। शिशुमारो ऽत्त चक्रे जग्ने सख्यं ततस्तयोः ॥१००॥ तेनान्वहं तटस्थस्य जलस्थो निकटे कपेः। शिशुमारो दिनं स्थित्वा च सायं स्वगृहं ययौ ॥१०१॥ ज्ञाताथौ तस्य भार्या च सदा विरहदं विषा। कपिसख्यमनिच्छन्ती भाम्यव्याजमधिष्ठितम् ॥१०२॥ ब्रूहि प्रिये किमस्वास्थ्यं तव केन च शाम्यति। इत्यार्त्तस्तं स पप्रच्छ शिशुमार प्रियां मुहुः ॥१०३॥ निर्बन्धात्पृष्टापि यदा न सा प्रतिवचो ददौ। रहस्यज्ञा सखी तस्यास्तदा तं प्रत्यभाषत ॥१०४॥
दशम लम्बक ८९७
दशम लम्बक ८९७ तब वह यशोधर और लक्ष्मीधर, दोनों भाई यज्ञ करके यक्ष की कृपा से अक्षय धन और विद्या प्राप्त कर सुखपूर्वक रहने लगे ॥९१॥ इस प्रकार धर्म की ओर प्रवृत्ति रखनेवाले और दुःख में भी अपने चरित्र को सुरक्षित रखनेवालों की देवता भी रक्षा करते हैं ॥९२॥ इस प्रकार, वसन्तक द्वारा कही गई अद्भुत कथा से विनोदित और अपनी प्यारी शक्तियशा के लिए उत्कण्ठित वत्सेश्वर का पुत्र वह नरवाहनदत्त भोजन के समय अपने पिता के बुलाने पर अपने मन्त्रियों के साथ वहाँ गया और समुचित भोजन करके सायंकाल गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ अपने भवन में आ गया ॥९३-९५॥ अपने भवन में आने पर पुनः उसका मनोरंजन करने के लिए गोमुख ने कहा—'सुनिए, मैं दूसरी कथा प्रारम्भ करता हूँ' ॥९६॥ मगर और बन्दर की कथा समुद्र के किनारे, गूलर के वन में अपने यूथ से छूटा हुआ रक्तमुख नाम का एक बन्दर था ॥९७॥ वृक्ष पर बैठकर गूलर खाते हुए उसके हाथ से छूटे हुए एक गूलर को समुद्र के जल में रहनेवाले एक शिशुमार नामक मगर ने खा लिया और उसके स्वाद से प्रसन्न होकर उसने मीठी आवाज दी। उसकी वाणी के रस से सन्तुष्ट बन्दर ने उसे बहुत-से गूलर के फल और फेंक दिये ॥९८-९९॥ इसी प्रकार, बन्दर, प्रतिदिन जल में फल फेंकता था और शिशुमार, उन्हें खाकर उसी प्रकार मधुर गान किया करता था। कुछ दिनों में उन दोनों की परस्पर मित्रता हो गयी ॥१००॥ इस कारण प्रतिदिन वह शिशुमार, तट पर रहनेवाले बन्दर के साथ फल खाता हुआ दिन व्यतीत कर सायंकाल अपने घर को जाता था ॥१०१॥ इस प्रकार सारे, दिन का विरह इनवाती बन्दर की मित्रता को न चाहनेवाली शिशुमार की स्त्री ने बीमारी का बहाना बनाया ॥१०२॥ तब अत्यन्त दुःखी शिशुमार ने पत्नी से पूछा—'प्रिये बताओ तुम्हें क्या रोग है और यह कैसे शान्त होगा ? ॥१०३॥ उसके इस प्रकार आग्रहपूर्वक पूछने पर भी जब उसकी स्त्री ने उत्तर न दिया तब उसके गुह्य को न जाननेवाली सखी ने उससे कहा—॥१०४॥ ११३
८९८ कथासरित्सागर
८९८ कथासरित्सागर यद्यपि त्वं न कुरुषे नेच्छस्येषा तथाप्यहम्। ब्रवीमि विदुष ह्येवं जनानां निह्रुतेः कथम्॥१०५॥ स तावदस्या भार्यायास्तत्कालोत्थो महागदः। विना वानरहृत्पद्मयूषं न शममेति यः॥१०६॥ इत्युक्तः स प्रियासख्या शिशुमारो व्यचिन्तयत्। कष्टं वानरहृत्पद्मं कुतः सम्प्राप्नुयामहम॥१०७॥ सख्युः करोमि धग्द्रोहं कपस्तत्किं ममोचितम्। सख्या किमथवा भार्या प्राणेभ्योऽप्यधिकप्रिया॥१०८॥ इत्यालोच्य स्वभार्यां तां शिशुमारो जगाद सः। तद्यानिष्याम्यखण्डं ते कपिं किं ब्रूयसे प्रिये॥१०९॥ इत्युक्त्वा स ययौ तस्य मित्रस्य निकटं कपेः। यथाप्रसङ्गमन्याद्य तमेवमवदत् कपिम्॥११०॥ अद्यापि न सखे दृष्टं गृहं भार्या च मे त्वया। तदेहि तत्र गच्छावो विध्यमार्यकमप्यहम्॥१११॥ भुज्यते यत्र नात्येत्य गृहमभ्य निरर्गलम्। प्रनृत्यन्त न दाराश्च कृतैव तन्न सोङ्गवम्॥११२॥ इति प्रतार्य जलभाववतार्याधिलम्ब्य च। वानरं शिशुमारस्तं गन्तुं प्रवृत्तोऽथ सः॥११३॥ गच्छन्तं तं स दृष्ट्वा च मानरहृच्चिन्ताकुलम्। सखेऽप्यापुद्यमद्य त्वां पश्यामीति स पृष्टवान्॥११४॥ नियन्धनाप पृच्छन्त मत्वा हस्तस्थितं च तम्। प्लवङ्गमं जगादथ शिशुमारो जहाशयः॥११५॥ अस्वस्था मे स्थिता भार्या सा च पथ्योपयोगि माम्। याचते कपिहृत्पद्मं तेनाद्य विमनाः स्थिता॥११६॥ श्रुत्वैतत्स भषस्तस्य कपिः प्राज्ञो व्यचिन्तयत्। हन्ततदर्थमानीय पापेनाहमिहामुना॥११७॥ अहो स्त्रीव्यसनाक्रान्तो मित्रद्रोहेऽप्युद्यतः। किं वा दन्तैः स्वमांसानि भूतग्रस्ता न खादति॥११८॥ इत्थं गच्छिन्नथ च प्राह शिशुमारं स वानरः। यद्येवं तत्त्वयतन्मे किं नास्तं प्रथमं मये॥११९॥
दशम लम्बक ८९९
दशम लम्बक ८९९ 'यद्यपि यह करना नहीं और-यह भी ऐसा चाहती नहीं तो भी कह देती हूँ कोई भी जानकार लोगों के दुःख को कैसे छिपा सकता है ? ॥११५॥ तुम्हारी पत्नी को ऐसा भीषण रोग उत्पन्न हो गया है जो बन्दर के हृदय-कमल के स्वरस के बिना दूर नहीं होता' ॥११६॥ पत्नी की सहेली से इस प्रकार कहा गया शिशुमार सोचने लगा—'दुःख है बन्दर का हृदय- कमल मुझे कहाँ मिलेगा ? ॥११७॥ यदि मैं अपने मित्र बन्दर के साथ विश्वासघात करूँ तो क्या यह मेरे लिए उचित है ? अथवा मित्र से भी क्या ? पत्नी तो मेरी प्राणों से भी प्यारी है ॥११८॥ ऐसा सोचकर शिशुमार ने अपनी भार्या से कहा—'प्रिये क्या दुःखी होती है मैं तेरे लिए समूचा बन्दर ही ले आता हूँ ॥१२०॥ ऐसा कहकर शिशुमार, अपने मित्र बन्दर के पास गया। बातों के प्रसंग में बन्दर से वह इस प्रकार बोला—'मित्र अभी तक तुमने मेरा घर और मेरी पत्नी को नहीं देखा। सो चलो एक ही दिन के विश्राम के लिए सही जहाँ पर जाकर परस्पर प्रेमपूर्वक भोजन नहीं किया जाता और अपनी-अपनी स्त्रियाँ नहीं दिखाई जाती वहाँ मित्रता नहीं कपट-मात्र है ॥१२१ -१२२॥ इस प्रकार, बन्दर को धोखे से समुद्र में उतारकर और उसे पकड़कर वह शिशुमार अपने घर के लिए चल पड़ा ॥१२३॥ बन्दर ने चकित और व्याकुल होकर उसे जाते हुए देखकर पूछा—'मित्र इस समय मैं तुम्हें कुछ दूसरे ही रूप में देख रहा हूँ। तब वह मूढ़हृदय शिशुमार बन्दर से इस प्रकार कहने लगा— 'मेरी पत्नी अस्वस्थ है और वह अपने रोग के लिए बन्दर का हृदय मांगती है इसलिए मैं बेचैन हूँ' ॥१२४-१२६॥ उसकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् बन्दर सोचने लगा—'ओह इसीलिए यह दुष्ट मुझे यहाँ लाया है ॥१२७॥ स्त्री के व्यसन का मारा हुआ यह मित्रद्रोह पर उतर गया है भूत से आक्रान्त व्यक्ति क्या अपने ही दाँतों से अपना ही मांस नहीं खा लेता ! ॥१२८॥ इस प्रकार सोचकर वह बन्दर शिशुमार से कहने लगा—'मित्र यदि ऐसी बात है तो तुमने मुझसे पहले ही क्यों नहीं बताया ॥१२९॥
८१८ कथासरित्सागर
८१८ कथासरित्सागर यद्यपि त्वं न ब्रूषे नेच्छन्त्यपा तथाप्यहम्। ब्रवीमि विबुधं हृदं जनानां निहूते कथम्॥१०५॥ स तादृगस्या भार्यायास्तवोत्पन्नो महागदः। विना वानरहृत्पद्मयूषं न शममेति यः॥१०६॥ इत्युक्तः स प्रियासख्या शिशुमारो व्यचिन्तयत्। कष्टं वानरहृत्पद्मं कुतः सम्प्राप्नुयामद्दम्॥१०७॥ सख्यं करोमि यद्ग्राहं कपेस्तत्किं ममाहितम्। सख्या किमथवा भार्या प्राणेभ्योऽप्यधिकप्रिया॥१०८॥ इत्यालोच्य स्वभार्यां तां शिशुमारो जगाद सः। तदहंनेष्याम्यखण्डं ते कपिं किं दूयसे प्रिये॥१०९॥ इत्युक्त्वा स ययौ तस्य मित्रस्य निकटं कपेः। कथाप्रसङ्गमूत्पाद्य तमवमबदत् कपिम्॥११०॥ अद्यापि न सखे दृष्टं गृहं भार्या च मे त्वया। तदहि तत्र गच्छावो विध्यमायकमप्यहः॥१११॥ भुज्यते यन्न नान्योन्यं गृहमभ्येत्य निर्गलम्। प्रहृष्यन्तं न दाराश्च कतव तन्न सौहृदम्॥११२॥ इति प्रतार्य जलधाववतार्याविस्रम्भ्य च। वानरं शिशुमारस्तं गन्तुं प्रवृवृत्तश्च सः॥११३॥ गच्छन्तं तं स दृष्ट्वा च वानरश्चकिताकुलम्। सखेऽन्यादृगमद्य त्वां पश्यामीति स पृष्टवान्॥११४॥ निबन्धेनापि पृच्छन्तं मत्वा हस्तस्थितं च तम्। प्लवङ्गमं जगादेव शिशुमारो जडाशयः॥११५॥ अस्वस्था मे स्थिता भार्या सा च पश्याद्ययापि माम्। यावत् कपिहृत्पद्मं तनाद्य विमनाः स्थिता॥११६॥ श्रुत्वैतस्य वचस्तस्य कपिः प्राज्ञा व्यचिन्तयत्। हन्तेतदवमानानां पापनाहमहामुना॥११७॥ अहो स्त्रीशब्धगात्राणां मित्रद्रोहस्यमुद्यतः। किं वा स्त्रीणां स्वमांसानां नूनमन्ता न गर्हति॥११८॥ इति सञ्चिन्त्य च प्राह शिशुमारं स वानरः। यद्येवं तत्स्वयत्नश्च किं नास्त प्रथमं मगे॥११९॥
दशम लम्बक ८९९
दशम लम्बक ८९९ 'यद्यपि तू करेगा नहीं और यह भी ऐसा चाहती नहीं तो भी कह देती हूँ कोई भी जानकार लोगों के दुःख को कैसे छिपा सकता है ? ॥१५॥ तुम्हारी पत्नी को ऐसा भीषण रोग उत्पन्न हो गया है, जो बन्दर के हृदय-कमल के स्वरस के बिना दूर नहीं होगा' ॥१६॥ पत्नी की सहेली से इस प्रकार कहा गया शिशुमार सोचने लगा-'दुःख है, बन्दर का हृदय कमल मुझे कहाँ मिलेगा ? ॥१७॥ यदि मैं अपने मित्र बन्दर के साथ विश्वासघात करूँ तो क्या यह मेरे लिए उचित है ? अथवा मित्र से भी क्या ? पत्नी तो मेरी प्राणों से भी प्यारी है ॥१८॥ ऐसा सोचकर शिशुमार ने अपनी भार्या से कहा- प्रिये क्यों दुःखी होती है, मैं तेरे लिए समूचा बन्दर ही ले आता हूँ ॥१ ९॥ ऐसा कहकर शिशुमार, अपने मित्र बन्दर के पास गया। बातों के प्रसंग में बन्दर से वह इस प्रकार बोला-'मित्र अभी तक तुमने मेरा घर और मेरी पत्नी को नहीं देखा। सो चलो एक ही दिन के विश्राम के लिए सही जहाँ घर जाकर परस्पर प्रेमपूर्वक भोजन नहीं किया जाता और अपनी-अपनी स्त्रियाँ नहीं दिखाई जाती वहाँ मित्रता नहीं कपट-मात्र है ॥११०-११२॥ इस प्रकार, बन्दर को धोखे से समुद्र में उतारकर और उसे पकड़कर वह शिशुमार अपने घर के लिए चल पड़ा ॥११३॥ बन्दर ने चकित और व्याकुल होकर उसे जाते हुए देखकर पूछा- मित्र इस समय मैं तुम्हें कुछ दूसरे ही रूप में देख रहा हूँ। तब वह मूर्खहृदय शिशुमार बन्दर से इस प्रकार कहने लगा- 'मेरी पत्नी अस्वस्थ है और वह अपने रोग के लिए बन्दर का हृदय माँगती है इसलिए मैं बेचैन हूँ ॥११४-११५॥ उसकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् बन्दर सोचने लगा-आह, इसीलिए यह दुष्ट मुझे यहाँ लाया है ॥११७॥ स्त्री के व्यसन का मारा हुआ यह मित्रद्रोह पर उतर गया है भूत से आक्रान्त व्यक्ति क्या अपने ही दाँतों से अपना ही मांस नहीं खा लेता! ॥११८॥ इस प्रकार सोचकर वह बन्दर शिशुमार से कहने लगा-'मित्र यदि ऐसी बात है तो तुमने मुझे पहले ही क्यों नहीं बताया ॥११९॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर आगमिष्ये स्वमादाय हृत्पद्मं स्वस्त्रियाकृत । यासोद्युम्बरवृक्षे हि तद्विदानीं मम स्थितम् ॥१२०॥ सच्छ्रुत्वा शिशुमारस्तमार्त्तो मूर्खोऽब्रवीदिदम् । तर्ह्यतैवानयहि त्वमुदुम्बरतरोरिति ॥१२१॥ आनितायाम्बुधेस्तीरं शिशुमारः पुनः स तम् । तत्र तेनान्तकेनेव मुक्तः स च कपिस्तटम् ॥१२२॥ उत्पत्यारुह्य वृक्षाग्रं शिशुमारमुवाच तम् । गच्छ रे मूर्ख हृदयं देहाद्भवति किं पृथक् ॥१२३॥ मयैव मोचितो ह्यात्मा न चात्रेष्याम्यहं पुनः । किमत्र न श्रुता मूर्ख गर्दभाख्यायिका त्वया ॥१२४॥ कर्णहृदयहीनस्य गर्दभस्य कथा आसीद्गोमायुसचिवः सिंहः कोऽपि वने क्वचित् । ॥१२५॥¹ स जात्वासटकायावेनाप्त भूपेन केनचित् । आहुतो धृतिमञ्जीवन् कथमप्यविशद्गुहाम् ॥१२६॥ तत्र स्थित गते तस्मिन् राज्यनाहारनिःसहम् । तच्छेषाभिषवृत्तिः सन्गोमायुः सचिवोऽभ्यधात् ॥१२७॥ निर्गत्य किं यथाशक्ति नाहारं चिनुषे प्रभो । सीदत्येष शरीरं ते समं परिजनेन यत् ॥१२८॥ इत्युक्तः स शृगालेन तत्र सिंहो जगाद तम् । सखे नाहं व्रणाक्रान्तः शक्नोमि भ्रमितुं क्वचित् ॥१२९॥ खरस्य कर्णहृदयं भक्ष्यं प्राप्नोमि चेदहम् ॥ तन्मे व्रणानि रोहन्ति प्रकृतिस्थो भवामि च ॥१३०॥ तदानय कुतोऽपि त्वं गत्वा गर्दभमाशु मे । इत्युक्तस्तं गोमायुः स तथेति ययौ ततः ॥१३१॥ भ्रमञ्जलाश्रयान्तिके दृष्ट्वा रजकस्य स गर्दभम् ॥ प्रीत्येवोपत्य वक्ति स्म दुर्बलः किं भवानिति ॥१३२॥ १ मूलपुस्तके पदार्धं त्रुटितमस्ति ।
प्रथम काण्ड ११ और नृपके पहुँच ही वह महादुःख को न प्राप्त होगा क्योंकि जिस कन्या दुःख-समय गई है अथवा इस समय भी वह दुःख-समयका विश्वास न करके प्रसन्न हो रही है कह देती है ॥ इसप्रकार हँस और बातचितकर जब वह रात्रि बीत गई तब प्रभातकाल में उठ ऐसा कहने लगा कि वह सुरक्षित उपवन में तू रह मैं जाता हूँ और वहाँ से तुझे अपने साथ लियेआऊंगा तबतक तू यहीं पर ठहरना । इसप्रकार उससे कहकर वह दोनों तीरोंपर चढ़कर उस तालाबसे बाहर निकला- जबतक कि भगवान् मरीचिमाली सूर्यदेवका उदय न हुआहो। तबतक तो वह उस कन्याके पास आ पहुँचाजब उसका आगमन देखा तब दमयन्ती भयविह्वल हो उठी इत्यादि ॥ १ ॥ ॥ इति द्वितीय सर्ग समाप्त ॥ पश्चात् नलने राजासे कहा कि हे राजन् ! आप इस कन्याके स्वयंवरके लिये शीघ्र तय्यारी करें क्योंकि यह शुभलग्न बार बार नहीं प्राप्त होता ऐसा सुनकर नलने ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ...
९ कथासरित्सागर
९ कथासरित्सागर आगमिष्य स्वमादाय हृत्पद्मं त्वत्प्रियाकृते। वासोदुम्बरवृक्ष हि तदिदानीं मम स्थितम्॥१२०॥ सञ्छ्रुत्वा शिश्रुमारस्तमार्त्तो मूर्खोऽब्रवीदिदम्। तर्ह्येतदानयेहि त्वमुदुम्बरतरोर्चिरे॥१२१॥ आनितायाम्बुधेस्तीरं शिशुमारः पुन' स तम्। तत्र तनान्तकेनेव मुक्तः स च कपिस्तटम्॥१२२॥ उत्पत्यारुह्य वृक्षाग्रं शिशुमारमुवाच तम्। गच्छ रे मूर्ख हृदयं यद्वाङ्ग्भवति किं पृथक् ॥१२३॥ मयैव मोचितो ह्यात्मा न चात्रैष्याम्यहं पुनः। किमत्र न श्रुता मूर्ख गर्दभाख्यायिका त्वया॥१२४॥ कर्णहृदयहीनस्य गर्दभस्य कथा आसीद्गोमायुसचिवः सिंहः कोऽपि वने क्वचित्। ॥१२५॥¹ स जात्वाखेटकायातेनात्र भूपेन केनचित्। आहतो ह्तिमिश्चिद्वन् कथमप्यविशद्गुहाम्॥१२६॥ तत्र स्थितः गते तस्मिन् राजन्याहारनिःसहम्। तच्छेयामिषवृत्तिं सन्गोमायुः सचिवोऽभ्यधात् ॥१२७॥ निर्गत्य किं यथाशक्ति नाहारं चिनुषे प्रभो। सीदत्येव शरीरं ते मम परिजनेन यत्॥१२८॥ इत्युक्तः स शृगालेन तेन सिंहो जगाद तम्। सद्य नाहं व्रणश्रान्तः शक्नोमि भ्रमितुं क्वचित्॥१२९॥ खरस्य कर्णहृदयं भक्ष्यं प्राप्नोमि चेदहम्॥ तन्मे व्रणानि रोहन्ति प्रकृतिस्थो भवामि च॥१३०॥ तदानय कुतोऽपि त्वं गत्वा गर्दभमाशु मे। इत्युक्तस्तेन गोमायुः स तथेति ययौ ततः ॥१३१॥ भ्रमञ्जलान्तिकं लब्ध्वा रजकस्य स गर्दभम्॥ प्रीत्येवोपेतय वक्ति स्म दुर्बलः किं भवानिति॥१३२॥ १ मूलपुस्तके पदार्धं त्रुटितमस्ति।