काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।१४८] ५. दोष : (६) शब्दहीन १७५ (६) शब्द-हीनमनालक्ष्य-लक्ष्य-लक्षण पद्धतिः । पद-प्रयोगोऽशिष्टेष्टः, शिष्टेष्टस्तु न दुष्यति ॥ १४८ ॥ (६) उदाहरण और स्वरूपप्रतिपादक शास्त्रका मार्ग जिसमें दृष्टि- गोचर नहीं होता, ऐसा अशिष्टजनोंको अभीष्ट सुबन्त और तिङन्त रूप पदों का प्रयोग शब्दहीन (नामक दोष) होता है । किन्तु (ऐसा शास्त्रप्रतिकूल प्रयोग यदि) शिष्टोंको इष्ट होता है, तो दोष नहीं होता ।। १४८ ।। (६) शब्दहीन दोष—भगवान् भाष्यकारके अनुसार लक्ष्य (उदाहरण) और लक्षण (स्वरूपनिरूपणपरक विधान, सूत्र) दोनों मिलकर व्याकरण शास्त्र' निष्पन्न होता है ।' यों, कोई भी शास्त्र उदाहरण और नियम दोनों को मिलाकर पूर्ण होता है । 'शब्दहीन' दोषके सन्दर्भमें आचार्य दण्डीको 'तक्ष्य-लक्षण'से साध्य शब्द एवं साधक सूत्र वार्तिक आदिमें व्यवस्थित 'व्या- करण शास्त्र' अभीष्ट है । न आलख्या = सम्यग् द्रष्टुं शक्या लक्ष्यलक्षणयोः व्याकरणशास्त्रस्य पद्धतिः मार्गः पाणिन्यादिभिस्तत्तत्सम्प्रदायाचार्यैः यस्य, स अनालक्ष्य लक्ष्य लक्षण-पद्धतिः । अर्थात् शब्दोंका अनुशासन करनेका तत्तत् सम्प्रदायके रूपमें प्रथित मार्गका अनुसरण जिस प्रयोगमें दिखाई नहीं देता है, जो शब्दानुशासनके अनुसार सही नहीं उतरता है, वह शब्दप्रयोग 'अना- लक्ष्य लक्ष्य और लक्षणकी पद्धति वाला' है । यत्नश्चायमेव यद् 'आदि' पदैरूल्लेखः । तानि हि तत्तत्स्थानविशेषगामिन एवं प्रतीतिमुपजनयन्ति । अवश्यं चानेन क्रमेणात्र वक्तुमुचितं, तनुत्या- गस्य, विजातीयताविवक्षया पृथगेव वक्तुमर्हत्वात् । एवं चानुपपत्तिः । लोके बन्धुत्यागापेक्षया शरीरत्यागस्यातिकृच्छ्रत्वेन प्रसिद्धिः । अतश्च 'मध्यम आयतक्लेश, आद्यन्तौ क्षणिकज्वरौ ।।' इति वचनमुचितम् । इति आर्थक्रमभ्रंशः कथं न भवति ? तत्राह 'वक्तुश्च (बन्धुत्यागदेश- त्यागयोस्तनुत्यागाद् गरीयस्त्वेनाभिमतत्वात् । इत्यर्थक्रमलङ्घनस्यापि गुणत्वम् । सरस्वती० १।११२ वृत्तिः)' इति । 'अभिमतत्वाद्' इत्यनेन, अभिप्रायाविशेषोऽपवादहेतुः । 'यथारुचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिद्यते । आभासो व्यर्थ एकस्मिन्ननुसन्धानसाधितः' ।। इति न्यायादुपपन्नमेवैतदिति । १. पस्पशाभाष्य, प्रथम आह्निक, वार्तिक १७ : लक्ष्य-लक्षणे व्याकरणम् । लक्ष्यं च लक्षणं चैतत् समुदितं व्याकरणं भवति ।···शब्दो लक्ष्यः । सूत्रं लक्षणम् ।
१७६ काव्यादर्श [३।१४८
इस प्रकारका शास्त्रके द्वारा अननुमोदित पदोंका प्रयोग अनधीतशास्त्र (अशिष्ट) लोग किया करते हैं । अतः व्याकरणके नियमोंका उल्लङ्घन करना उन व्याकरणज्ञानशून्य लोगों (अशिष्टों) को इष्ट होता है । इस प्रकारका व्याकरणविरुद्ध पदप्रयोग शब्दशास्त्रकी दृष्टिसे हीनएवम् अपशब्द के रूपमें होनेके कारण 'शब्दहीन' कहलाता है । इसे 'शब्दच्युत' भी कहा जाता है । व्याकरणसे सिद्ध नहीं होने वाला पदप्रयोग भी शिष्टोंको, शब्दशास्त्रके अनुकूल प्रयोग करने वाले आप्त पुरुषोंको, यदि इष्ट है, वे इसके प्रयोगमें दोष नहीं देखते हैं, तो ऐसा शिष्टानुमोदित प्रयोग दोष नहीं होता । मूर्धन्य ध्वनियोंके दन्त्यी करण, दन्त्य ध्वनियोंके मूर्धन्यविधान, आत्मनेपद-परस्मैपदके प्रयोगमें व्युत्क्रम, देशज शब्द आदि इसी श्रेणीमें आते हैं । इसके अतिरिक्त, व्याकरण मुख्यतया परोक्षवृत्ति शब्दों तक अपना कार्य करता है । अतिपरोक्ष- वृत्ति शब्दोंको मान्यता उसे भी उनके आप्त-गृहीत होनेके कारण देनी पड़ती है । धातुपाठमें ऐसी बहुतसी धातु हैं, जो संस्कृतकी धातुओंसे विकसित हुई हैं । संस्कृतके ध्वनिशास्त्र (वर्णविज्ञान) के अनुसार वे संस्कृतकी प्रकृतिके अनु- कूल नहीं हैं । पर शिष्टेष्ट होनेके कारण उन्हें धातुपाठोंमें समाविष्ट कर लिया गया है । जैसे √घिण्ण्, √घुण्ण् और √घृण्ण् धातु संस्कृत √गृह्ण अङ्गसे विकसित हैं : संस्कृत 'ऋ' का उच्चारण कुछ प्रदेशोंमें इकारश्रुतिसे होता है, तो कुछ प्रदेशोंमें उकारश्रुतिसे¹, महाप्राण ह्' के लोपकी क्षतिपूर्ति अल्पप्राण 'ग्' के 'घ्' के रूपमें उच्चारणसे होती है । (क) अल्पप्राणयोंके इस प्रकार महाप्राणीकरण, (ख) 'ऋ' के रेफातिरिक्त स्वरांशके 'इ' 'उ' के रूपमें उच्चा- रणकी देशज प्रवृत्तियोंसे ये तीन धातु संस्कृत 'गृह्णाति' या 'गृह्णीते' से विक- सित हुई हैं और संस्कृत धातुपाठोंमें ग्रहण कर ली गई हैं ।² यही स्थिति व्या- करणके अन्यविध नियमोंकी है । यह नियमोंका उल्लङ्घन भाषाके विकासकी प्रक्रियामें जब तक तरल रहता है, अभिजात वर्ग द्वारा समादृत नहीं होता है, तब तक इसे 'अशिष्टेष्ट' कहा जाता है, और ये प्रयोग दोषकी कोटिमें आते हैं । जब ये अभिजात वर्गमें प्रवेश कर लेते हैं, तब ये शिष्टोंके चहेते (शिष्टेष्ट) बन जानेके कारण लोकमें और लोकका ही आराधन करने वाले काव्यमें भी स्वीकृत हो जाते हैं । मनस् = मन, = मन् की यात्रा इस प्रकारकी है । 'मन्' १. निरुक्तमीमांसा, पृष्ठ ४३३ देखें । २. पाणिनीय धातुपाठ, भ्वादिगण : घिणि, घुणि, घृणि ग्रहणे । विशेषार्थ सिद्धान्तकौमुदी, भवतोषिणी, भ्वादिगण तथा धातु-सूची देखें ।
३।१२८ ] ५ दोष : (६) शब्दहीन १७७ अवते भवते बाहुर्महीमर्णवशक्वरीम् । महाराजन्नजिज्ञासौ¹ नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥ १४६ ॥ हे महाराजन्, आपके लिये बाहु रक्षा कर रहा समुद्ररूपी शक्वरी (कर- घनी) वाली पृथिवीकी । इस वाणिका रस (शब्दगत अनुप्राससे लभ्य मिठास) अजिज्ञासुके प्रति नहीं है ॥ १४६ ॥ उच्चारणमें शिष्टेष्टताको प्राप्त होकर भी अभी लिपिमें स्वीकृत नहीं हुआ है । 'कवि' शब्द 'कव्' बननेकी ओर चल पड़ा है । जो व्याकरणविरुद्ध प्रयोग समाजके किसी वर्गका अङ्ग न बनकर नितान्त वैयक्तिक प्रयोगका विषय हैं, वे तो प्रयोक्ताको उपहासका पात्र बनाने वाला दोष समझे जाते हैं ॥१४८॥ शब्दहीनका उदाहरण—प्रकृत (१४६वें) श्लोकमें कविने 'अवते'में आत्मने- पदका प्रयोग व्याकरणलक्षणविरुद्ध किया है : अव् धातुपाठमें उदात्तेत् पर- स्मैपदी धातुओंमें पठित है ।² यहाँ आत्मनेपदमें दी है । अतः शब्दहीन है । 'भवते'का सम्बन्ध 'बाहुः' सञ्ज्ञापदसे समुचित है, अतः शेष (कारकेतर) सम्बन्धमें षष्ठी होनी चाहिये । चतुर्थीके कारण इसका 'अवते' क्रियापदसे सम्प्रदान सम्बन्ध प्रकट होता है, जो अपेक्षित नहीं है । पुरुषके दो भुजाएँ होनेके कारण 'बाहु'में द्वित्व उचित है । एकवचन शास्त्रविरुद्ध या आप्त- विरुद्ध होनेसे दोष है । 'अर्णवशक्वरीम्'में बहुव्रीहि समास है : अर्णवः शक्वरी मेखला³ यस्याः, ताम् । दीर्घकारान्त स्त्रीलिङ्ग उत्तरपदमें होनेपर समासान्त 'क' (कप्) प्रत्यय शास्त्रसम्मत है ।⁴ 'अर्णवशक्वरीकाम्' होना चाहिये । वह नहीं किया है । अतः शब्दहीन है । 'महांश्चासौ राजा' व्युत्पत्तिसे कर्मधारय तत्पुरुषसे 'महाराज' (अदन्त) शब्द निष्पन्न होता है ।⁵ उसकी सम्बुद्धिमें १. रत्नश्रीज्ञान : 'महाराजन्, न जिज्ञासा नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥' इत्यपि पाठः । तत्र 'आसां गिरां रसो नास्तीति ईदृशी जिज्ञासा न विद्यते । हेयत्वादीदृशस्य रसस्य ।' इति व्याख्येयम् । वादिजङ्घालदेव और तरुणवाचस्पतिने इसी पाठकी व्याख्या की है । २. पाणिनीय धातुपाठ, वर्ग १५ : अथावत्यन्ताः परस्मैपदिनः । ३. मेदिनीकोष २७।२२१ : शक्वरी छन्दसो भेदे, नदी-मेखलयोरपि ॥ अवन्तिसुन्दरीकथा, पृष्ठ १५७, पंक्ति १८ : राज्ञी तु 'नानुरूपा तवाकृते- रसावसारा मेखला' इति स्वशक्वरीप्रेषणातिप्रसादेन विन्ध्यसेना- मभ्यानन्दयत् । ४. अष्टाध्यायी ५।४।१५३ : नद्यृतश्च । ५. अष्टाध्यायी ५।४।६१ : राजाऽहःसखिभ्यष्टच् ।
१७८ काव्यादर्श [३।१५० दक्षिणाद्रेरुपसरन् मारुतश्चूतपादपान् । कुरुते ललिताधूतप्रवालाङ्कुरशोभिनः ॥ १५० ॥ दक्षिण पर्वत (मलय) से आता हुआ वायु आम्रवृक्षोंको ललित प्रकार (कोमलता) से थोड़ा-थोड़ा कम्पित कोंपलों और मञ्जरियोंसे शोभायुक्त बना रहा है ॥ १५० ॥ ‘महाराज’ बनता है । अतः यह प्रयोग शब्दहीन है । इस प्रकार यह उदाहरण क्रिया, कारक, सङ्ख्या और समासान्तकी दृष्टिसे आदिसे अन्त तक व्याकरण- शास्त्रसे च्युत होनेके कारण नितान्त दोषयुक्त है । भाषाकी तनिकसी समझ रखने वालोंको भी इससे उद्वेग होगा । अधीतशब्दशास्त्र अथवा शब्दपारावार- वेत्तृचूडामणियोंको होने वाले वैरस्यका तो कहना ही क्या है ! यदि यह कहा जाए कि ‘अवते भवते’ में व्याकरणकी ऐसी-तैसी अनुप्रास के लिए की गई है, तो यह उचित नहीं है । क्योंकि अनुप्रासादि उसे रस प्रदान करेंगे, जो उसे जानना चाहेगा । उद्वेजक होनेके कारण इस प्रकारके काव्यके प्रति सहृदयकी जिज्ञासा ही नहीं होगी, तो रसबोध किसे होगा ? ॥ १४६ ॥ व्याकरणनियमके उल्लङ्घनमें भी निर्दोषताका उदाहरण—प्रकृत (१५०) वें श्लोकमें शतृमें √सृका प्रयोग शास्त्रविरुद्ध है : 'उपधावन्' प्राप्त है । किन्तु शिष्टोंके अनुसार धाव् ‘तीव्र गति’ (दौड़ना) अर्थमें प्रसिद्ध है । अतः यदि वायुकी मन्दगतिकी विवक्षामें √धाव्का प्रयोग न करके √सृ (सरकना, रेंगना, धीरे-धीरे चलना) का प्रयोग किया है, तो यह व्याकरणनियमोल्लङ्घन दोष नहीं होता । अपितु शिष्टजन विवक्षितार्थको आदर देकर इसका अनु- मोदन ही करेंगे ।१ इसी प्रकार 'मारुतः'के क्रियापद 'कुरुते' में प्रयुक्त आत्मनेपद भी तब उचित शास्त्रानुसारी होता, अगर हवा खुदके लिये बहती ।२ पर यह तो अन्य लोगोंके सुखके लिये बह रही है । अतः परस्मैपद शास्त्रानुसारी है । इसी प्रकार 'उपसरन्'के योगमें दक्षिणाद्रिकी अपादानता भी उचित नहीं है । 'उपसरन्'का कर्म यदि कोई उक्त होता, तो अपादानता उचित होती । पर 'दक्षिणाद्रिसे' आनेकी कहनेसे वायुकी सुगन्धिता विवक्षित है । अतः यह प्रयोग शिष्टसम्मत है । रत्नश्रीज्ञानने 'दक्षिणाद्रिको स्पर्श करके' अर्थकी विवक्षामें १. अष्टा० ७।३।७८ : प्रा-घ्रा-ध्मा...सर्ति-शद-सदां...धौ-शीय-सीदाः । २. अष्टा० १।३।१२ : स्वरित-ञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ।
३।१५१] ५. दोष : (६) शब्द-हीन अन्य आचार्योंके मतमें १७६ इत्यादि शास्त्रमाहात्म्यदर्शनालसचेतसाम् । अपभाषणवद् भाति, न च सौभाग्यमुज्झति ॥ १५१ ॥ इस प्रकारका प्रयोग शास्त्रके माहात्म्य (प्रभाव अथवा गहराई) के दर्शन में आलस्ययुक्त चित्त वाले लोगोंको अपशब्द (शब्दहीन, व्याकरणविरुद्ध) जैसा प्रतीत होता है । (ऐसा प्रयोग) सौन्दर्यका त्याग नहीं करता (अर्थात् शोभाघातक, दोष नहीं होता) ॥ १५१ ॥ पञ्चमीसे समाधान किया है ।¹ पर जब पञ्चमी शास्त्रानुसार है, तब शब्द- हीन कैसे हुआ ? अतः यह समाधान अनपेक्षित है ॥ १५० ॥ शास्त्रोल्लङ्घनमें भी दोषाभावताकी सङ्गति—विशेष अर्थकी विवक्षासे किये ऐसे शास्त्राननुमोदित प्रयोग शास्त्रकी गम्भीरताको नहीं समझनेवाले, केवल प्राप्तिज्ञ लोगोंको दोष प्रतीत हो सकते हैं । पर काव्यका प्रयोजन अर्थ- को सुचारु रूपमें प्रस्तुत करना होता है। यदि शास्त्रकी किसी बातका उल्लङ्घन उसमें बाधा नहीं पहुँचाता, उससे अर्थकी सौन्दर्यसे प्रस्तुतिमें सुकरता ही आती है, तो वह अप-प्रयोग दोष (शोभाविघातक) नहीं होगा। उदा- हरणार्थ पाणिनिने √सृ को √धौ का आदेशमात्र किया है । पर शिष्टोंने उसका प्रयोग 'वेगित गति'में ही माना है ।² अतः √सृ का शतृमें प्रयोग पाणिनीय शास्त्रके विरुद्ध होते हुए भी मन्दगतिमें शिष्टेष्ट होनेसे दोष नहीं है । काव्यमें दोषता अदोषताका मानदण्ड शोभाका त्याग या आधान है। भरतने इस दोषकी उद्भावना यों की है : अशब्दके योजनसे 'शब्दहीन' दोष समझना चाहिये ।³ 'अशब्द' का तात्पर्य 'शब्दशास्त्रविरुद्ध', या 'शब्द- शास्त्राननुमोदित' है। भामहने इस दोषका निरूपण यों किया है : सूत्रकार १. अत्र किल दक्षिणाद्रेरपसरणे भावात्पञ्चमी न युज्यतेऽपायलक्षणत्वात् तस्याः । उपसरणापेक्षया त्वाधारेण, व्याप्येन वा दक्षिणानिलेन भाव्यम् । ततश्च सप्तमी, द्वितीया वा युज्यते ।···न चैतदेवम्—उपसरणं हि तत आगमनमिति विश्लेषयोगाद् दक्षिणाद्रिमाभृश्योपसरन्निति ल्यब्लोप- लक्षणा पञ्चम्येव युज्यते । २. काशिका ७।३।७८ : सर्तेर्वेगितायां गतौ धावादेशमिच्छन्ति । अन्यत्र 'सरति', 'अनुसरति' इत्येव भवति । ३. शब्द-हीनं च विज्ञेयमशब्दस्य च योजनात् ॥ नाटच० १६।६५
१८० काव्यादर्श [३।१५२ (७) श्लोकेषु नियतस्थानं पदच्छेदं यतिं विदुः । (७) श्लोकोंमें निश्चित स्थानोंमें पदोंके तोड़नेको यति जानते हैं । (पाणिनि आदि), पदकार (पदविच्छेदादिसे सूत्रपाठके व्याख्याता)¹ को इष्ट प्रयोगसे जो भिन्न (विपरीत) होवे, उसे 'शब्दहीन' कहते हैं ।² क्योंकि आप्त श्रोताओंमें उस लक्षणविरुद्ध शब्दकी सिद्धि नहीं है । भामहने इस अन्तिम कथनसे इस दोषके विषयमें आप्त पुरुषोंको भी प्रकारान्तरसे प्रमाणकोटिमें रख लिया है । पर दण्डीके समान निर्भ्रान्त स्पष्ट रूपसे लक्षणविरुद्ध किन्तु आप्तश्रावकसिद्ध (दण्डीके 'शिष्टेष्ट') प्रयोगको निर्दोष नहीं बताया है । इस अंशमें भी दण्डी भामहसे बाजी मार ले गये हैं । अभिनवगुप्तने 'अपशब्द' (शब्दहीन)को दोष ही माना है । पर उनके तर्कसे प्रतीत होता है कि उन्हें 'अपशब्द'से शिष्टों द्वारा अननुमत शास्त्रविरुद्ध प्रयोग अभीष्ट है । उनका कहना है कि अपशब्दसे किसी प्रकारकी अर्थप्रतीति नहीं होती । वह सङ्केत- ग्रहण न होनेसे किसी भी प्रकार भावसम्प्रेषण नहीं कर पाता । अतः अपशब्द दोष ही है ।³ अभिनवगुप्तका यह कथन दण्डीके कथन जितना युक्तियुक्त नहीं है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत लक्षणविरुद्ध किन्तु शिष्टेष्ट उदाहरणमें अर्थप्रतीति- विरह नहीं है । वह भामहकी शब्दावलीमें 'आप्तश्रावकासिद्ध' भी नहीं है । अतः उसे दोष कैसे कह सकते हैं ? ।। १५१ ।। (७) यतिभ्रष्ट दोष—'यतिभ्रष्ट' दोष बतानेसे पूर्व आचार्यने यतिका १. पं० युधिष्ठिर मीमांसकने 'पदकार'से महाभाष्यकार पतञ्जलिको लिया है । द्र० संस्कृत व्याकरण शास्त्रका इतिहास, भाग १, पृष्ठ ३३२ । परन्तु महाभाष्य ३।१।१०६, ६।१।२०७ तथा ८।२।१६ में उल्लिखित 'पदकार' के प्रयोगसे विदित होता है कि सूत्रके संहितापाठका पदविच्छेद करने वाले व्याख्यातामात्र 'पदकार'के रूपमें अभीष्ट हैं, व्यक्तिविशेष नहीं । इन स्थलोंपर प्रदीप देखें । अतः यहाँ सूत्रके व्याख्याता वार्तिक-भाष्य- कार इष्ट हो सकते हैं । २. सूत्रकृतपदकारेष्टप्रयोगाद् योऽन्यथा भवेत् । तमाप्त-श्रावकासिद्धेः शब्दहीनं विदुर्यथा ॥ काव्याल० ४।२२ ‘स्फुरत्तडिद्वलयिनो वित्ताम्भोगरीयसः । तेजस्तिरयतः सौरं घनान् पश्य दिवोऽभितः’ ।। २३ ३. अभिनवभारती १६।६४ : अपशब्दस्तु दोष एव । ततः कस्याश्चिदर्थ- प्रतीतेरभावात् । स हि न कांचिद् भाषामनुपतति, सङ्केताभावान्न तमर्थं प्रतिपादयेत् ।
३।१५२] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट—यतिक स्वरूप १८१ तदपेतं यतिभ्रष्टं श्रवणोद्वे जनं, यथा ॥ १५२ ॥ उससे रहित, कानोंका उद्वेजक यतिभ्रष्ट दोष होता है। जैसे—॥ १५२ ॥ स्वरूप बताया है। आचार्य पिङ्गलने विच्छेदको यति बताया है।¹ श्लोक और तदन्तर्गत पदोंमें विच्छेद, उच्चारणविराम उच्चारणमें सुविधा और लयमें श्रुतिसुख लानेको किया जाता है। भरतने यति अर्थात् विराम के दो प्रकार बताये हैं : (१) छन्दःशास्त्रके नियमोंके अधीन किया जाने वाला (वृत्तपादसमुद्भव) विराम उच्चारण करने वालेके प्राणबलके अनुकूल² उच्चा- रणसुविधाके लिये होता है । अतः उन्होंने इसे 'प्राणवश विराम' कहा है । (२) अभिनयमें रस भावकी सम्यग् अभिव्यक्ति के लिये अर्थके किसी उचित अंशपर विराम 'अर्थवश विराम' होता है । उनकी दृष्टिमें अभिनयकी मुख्यताके कारण प्राणवशा यतिकी अपेक्षा अर्थवशा यति महत्त्वपूर्ण है । पद्यमय काव्यमें उसका महत्त्व नहीं होता । अतः छन्दःशास्त्रमें प्राणवशा यतिका ही विधान किया जाता है। भरतने विरामकी अवधि एक मात्रासे लेकर छह मात्रा तक बताई है।³ १. छन्दःशास्त्रे ६।१ : यतिर्विच्छेदः । नाट्यशास्त्रमें विराम (१७।१३० गद्यके बाद) भी देखें । २. इदमत्रावगन्तव्यमवधानविवर्जितः । यावन्ति शक्नुयाद्वक्तुमप्राणन्नेव मानवः ।। वेङ्कट, ऋग्भा ६।८।१।२१ तावद्भिरक्षरैरर्थः प्रायेण प्रतिपाद्यते । २२ ३. ये विरामाः स्मृता वृत्ते तेष्वलङ्कार* इष्यते । समाप्तेऽर्थे पदे वाऽपि, तथा प्राणवशेन वा ।। नाटच० १७।१३८ कार्यों विरामः पादान्ते, तथा प्राणवशेन वा । शेषमर्थवशेनैव विरामं संप्रयोजयेत् ।। १३६ कलाकालप्रमाणेण पाठ्यं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।। १४१ शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह । एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्कलं च विलम्बितम् ।। १४२ अथवा कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च । समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः ।। १४४ ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये वृत्तपादसमुद्भवाः । उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्ते स्यू रसानुगाः ।। १४५ *उच्चो दीप्तश्च मन्द्रश्च नीचो द्रुतविलम्बितौ । पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणं च निबोधत ।। ११२
१८२ काव्यादर्श [३।१५२ सबसे स्थूल विराम तो होता है श्लोकार्धमें । उससे कम स्थूल होता है पादान्तमें ।¹ उससे सूक्ष्म विराम पादकी लम्बाईके अनुसार अपेक्षित उच्चा- रणसुविधाके लिये एक बार या दो बार लयमें सौन्दर्य जैसे भी आए, वैसे किया जाता है। पादमें यह विच्छेद पदोंके छेदके रूपमें होता है, क्योंकि पाद पदसमुदाय ही होता है । पदोंका यह छेद लम्बे छन्दमें आवश्यकताके अनुसार निश्चित स्थानपर, निश्चित अक्षरसंख्यापर, विहित है । निश्चित स्थानपर भी पदच्छेदके कुछ नियम हैं । शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थ वे सङ्क्षेपसे प्रस्तुत किये जा रहे हैं । विस्तारार्थ छन्दःशास्त्रकी हलायुधकी मृतसञ्जीवनी तथा अन्य छन्दोविषयक ग्रन्थ देखें । (१) विच्छेद (i) व्यक्त विभक्ति वाले पदपर या (ii) समासमें अव्यक्त विभक्ति वाले पदपर होना चाहिये ।² (२) पूर्वापर वर्णोंके एक वर्ण न होनेपर पदके मध्यमें भी यति हो सकती है । पदका यह मध्य तोड़नेपर श्रवणोंको कटु न लगे, यह अपेक्षित है । द्वयक्षर एवं त्र्यक्षर पदके मध्यमें यति नहीं करनी चाहिये । चतुरक्षर पदमें दो अक्षरोंके बाद उचित है । पदमध्ययति पादान्तमें नहीं होनी चाहिये ।³ (३) स्वरोंकी एकादेश सन्धिमें आदेशोपनत स्वरको कभी पूर्वशब्दका अन्तवत् माना जाता है । जैसे 'दिक्कालाद्य- नवच्छिन्नानन्त०' (नीतिशतक १), 'तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः (वही ८) । कभी परशब्दका आदिवत् माना जाता है । जैसे 'स्कन्धे विन्ध्याद्रिबुद्ध्या निकषति महिष, स्याहितोऽसूनहार्षीत् । एकादेश सन्धिमें भी यह बात ध्यानमें रखें कि आदेशके अनन्तर पूर्व या पश्चात् एकाक्षर न रहे । जैसे—अस्या वक्त्राब्जमवजितपूर्णेन्दुशोभं विभाति ।⁴ (४) यणादेश सन्धिमें यणादेश परवर्ती पदका आदिवत् होता है ।⁵ जैसे शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्ति नः केवलम् (नीतिशतक ३६) । (५) च, वा, ह, तु १. यतिः सर्वत्र पादान्ते, श्लोकार्थे तु विशेषतः । हलायुधटीका ६।१ २. समुद्रादिपदान्ते च व्यक्ताव्यक्तविभक्तिके । हलायुध ६।१ ३. क्वचित्तु पदमध्येऽपि समुद्रादौ यतिर्भवेत् । यदि पूर्वापरौ भागौ न स्यातामेकवर्णकौ ।। पदमध्ये यतिः पादान्ते मा भूत् । हलायुध ६।१ ४. पूर्वान्तवत् स्वरः सन्धौ, क्वचिदेव परादिवत् । हलायुध ६।१ ५. द्रष्टव्यो यतिचिन्तायां यणादेशः परादिवत् । हलायुध ६।१
३।१५३] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट १८३ 'स्त्रीणां सङ्गीत, विधिमयम| दित्यवंशयो नरेन्द्रः, 'यह सूर्यवंशी राजा यहाँ शिष्टजनोंके साथ स्त्रियोंके क्लेश (कष्ट) के आदि निपातोंसे पूर्व यति नहीं होती, क्योंकि इनका सम्बन्ध हमेशा पूर्ववर्ती पदसे होता है । ‘स्वादु स्वच्छं, च हिमसलिलं प्रीतये कस्य न स्यात् ?’ में ‘च’ से पूर्व यति उचित नहीं है । ‘प्रत्यादेशादपि च, मधुनो विस्मृतभ्रूविलासम्’ (मेघदूत २।२८) में ‘च’ के बाद यति है, वह उचित है । (५) प्र, परा आदि जब उपसर्गके रूपमें प्रयुक्त होते हैं, तब उनका सम्बन्ध परवर्ती पदसे होता है, इस लिये इनके पश्चात् यति नहीं करनी चाहिये । किन्तु यदि ये कर्म- प्रवचनीयके रूपमें प्रयुक्त हैं, तो इनके पश्चात् यति की जा सकती है ।१ जैसे ‘दुःखं मे प्र, क्षिपति हृदये दुस्सहस्त्वद्वियोगः’में प्रपर यति उचित नहीं है । किन्तु ‘द्वारारूढप्रमोवं हसितमिव परिस्पष्टमासां सखीभिः ।' में परि के पश्चात् यति उचित है ।२ इस प्रकार विहित यतिका भङ्ग होनेपर काव्य श्रुतिकटु हो जाता है । अतः उद्वेगकर होनेके कारण यह दोष होता है ।। १५२ ।। यतिभ्रष्ट दोषका उदाहरण—अगले (१५३वें) श्लोकके पूर्वार्धमें आचार्य ने 'यतिभ्रष्ट' दोषका उदाहरण कतिपय यतिभङ्गोंसे प्रदर्शित किया है । यह श्लोक मन्दाक्रान्ता छन्दमें निबद्ध है । उसके पादमें चौथे, दसवें और सत्रहवें १. नित्यं प्राक्पदसम्बन्धाश्चादयः प्राक्पदान्तवत् । परेण नित्यसम्बन्धाः प्रादयश्च पदादिवत् ।। हलायुधटीका ६।१ २. पादान्त एव केचिच्च पादमध्येऽपि केचन । यतिं वदन्ति; तत्रापि विशेषः स्फुटमुच्यते ।। मन्दारमरन्द, शेषबिन्दु (i) धातुनामस्वभिन्नेषु यतिर्भवति, नान्यथा । (ii) उपसर्गन्तितश्छेदः, (iii) प्रत्ययादौ तयोः क्वचित् ।। (iv) स्वरसन्धौ तु सम्प्राप्तसौन्दर्याद्यतिरिच्यते । (v) तु, चादयो न प्रयोज्या विच्छेदात् परतस्तथा ।। (vi) प्रत्ययादौ यतिर्नाम्नां षष्ठचामेवेति केचन* ।। स्वरसन्धिक्कृते प्रायो, धातुभेदे तदिष्यते । नामभेदे च शेषेषु न दोष इति सूरयः ।। तरुणवाचस्पति द्वारा उद्धृत यह विवरण वामनके कथन (काव्या- लङ्कारसूत्र २।२।४) का सङ्क्षेप है । *जैसे ‘न तव बलमनङ्गस्यापि वा दुःखभाजो’ । आश्चर्यचूड़ामणि ५।६
१८४ काव्यादर्श [३।१५३-१५४ पश्यत्यक्लिष्, टरसमिह शिष्, टंरमेत्यादि दुष्टम् । 'कार्याकार्या, ण्ययमविक्ला, न्यागमेनैव पश्यन् वश्यामुर्वी, वहति नृप इ, त्यस्ति चैवं प्रयोगः' ॥ १५३ ॥ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य पदत्वं निश्चितं यथा । विपरीत सुखकारी रससे युक्त सङ्गीतके अनुष्ठानको देख रहा है ।' इस तरह का प्रयोग दोषयुक्त है । 'समस्त कार्यों और अकार्योंको शास्त्र (रूपी आँख) के द्वारा ही देखता हुआ यह राजा अपने बसमें आई हुई पृथ्वीका पालन करता है।' इस प्रकारका यह (उचित) प्रयोग है ॥ १५३ ॥ पदके अन्तमें (विभक्तिका) लोप होनेपर शेष अंशकी पदस्वरूपता जैसे अक्षरपर यति होती है ।' प्रकृत श्लोकके प्रथम पादमें चौथा अक्षर 'सङ्गीत' पदका मध्यम वर्ण 'ङ्गी' है, तो दसवाँ अक्षर 'आदित्य'का आदिम वर्ण 'भा' है । प्रथम यतिमें यतिके दोनों ओर एकेक अक्षर रहता है । तथा द्वितीय यतिमें यति वाला वर्ण एकाक्षर भाग है । अतः यह यति द्वितीय यतिनियमके विरुद्ध अनुचित प्रकारसे है । इस लिये प्रथम पादमें दो बार यतिभङ्ग लयमें बाधक है । अतः दोष है । इसी प्रकार द्वितीय पादमें चतुर्थ अक्षर 'अक्लिष्ट' का मध्यम अक्षर 'क्लिष्' है । दशम अक्षर 'शिष्ट'के प्रथम वर्ण 'शिष्'के पश्चात् यति प्राप्त है । दोनोंमें ही उभयतः एकेक अक्षर शेष रहनेके कारण उचित यति नहीं है । अतः यह पाद भी द्वितीय यतिनियमके अनुसार सदोष है । उचित यतिका उदाहरण— मन्दाक्रान्ता छन्दमें निबद्ध १५३वें श्लोकके उत्तरार्धमें कविने पदके मध्यमें उचित विच्छेदका उदाहरण प्रस्तुत किया है । 'कार्याकार्या, ण्ययमविक्ला, न्या'में 'चौथे 'र्या' और दसवें 'ला' पर यति पदके मध्यमें ही है । यहाँ पूर्वापर पद यण् सन्धिसे जुड़े हुए हैं । सन्धिज यण् (य्) चतुर्थ यतिनियमके अनुसार परवर्ती पदका आदिम अवयव हो गया है । अतः यहाँ यति पदमध्यमें न मानी जाकर पदान्तमें ही मानी जायेगी । उच्चारणमें भी यह यति वैरस्यकारक नहीं है । चतुर्थ पादमें चौथे अक्षरपर यति पदान्तमें होनेके कारण उचित है । दसवें अक्षर 'इत्यस्ति' के 'इ' पर भी यण्सन्धिके परादिवद्भावसे पदान्तपर ही है । अतः निर्दोष है ॥ १५३ ॥ पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी सङ्गति— आचार्यने यतिभ्रंश दोषका कारण पदपर विच्छेद बताया है । पर उत्तरार्धमें उदाहरण दिये हैं पदमध्यमें १. मन्दाक्रान्ता म्भौ न्तौ त्गौ ग् समुद्रर्तुस्वराः । छन्दःशास्त्र ७।१६
३।१५४] पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी संगति १८५ तथा सन्धिविकारान्तं पदमेवेति गण्यते ॥ १५४ ॥ निश्चित होती है, वैसे ही सन्धिके (कारण होने वाले) विकारोंसे युक्तका अन्त भी पद ही है, यह कहा जाता है ॥ १५४ ॥ विच्छेदके । वहाँ यतिभ्रष्ट दोष कैसे नहीं है ? आचार्यने अगला श्लोक इस शङ्काको दृष्टिमें रखकर दिया है । पाणिनिके अनुसार सुप्-प्रत्ययान्त और तिङ्-प्रत्ययान्त शब्द 'पद' होता है ।१ किन्तु समासमें तथा नामधातुओंमें विभक्तियोंका लोप होनेपर भी अन्तर्वर्तिनी विभक्तिको निमित्त मानकर वहाँ पदत्व माना जाता है । तो, पदके अन्तिम भाग विभक्तिका लोप होनेपर भी जैसे वहाँ पदत्व अव्याहत माना जाता है, वैसे ही पदके अन्त भाग विभक्तिकी परवर्ती पदसे एकादेशरूप या अन्य प्रकारकी यण्, अयादि आदेशके रूपमें सन्धि होनेपर भी विकृत हुए अंशोंके पूर्वान्तवद्भाव या परादिवद्भावसे तथा व्यञ्जनको परवर्ती स्वरसे मिलानेके कारण पराङ्गताके कारण सम्बन्धको रखकर विकारांशसे पूर्ववर्ती या परवर्ती अंशको भी 'पद' मान लिया जाता है ।२ अतः सन्धिविकारोंपर यति होनेसे वह पदमध्यका विच्छेद नहीं, अपितु पदका ही विच्छेद समझा जाता है । इसका सीधा-सा तात्पर्य आचार्य वामनने यह लिया है कि नाम भाग (प्रातिपदिक) और धातु भाग (विकरणान्त अङ्ग) के मध्य यदि विच्छेद होता है, तभी दोष होता है । यह भागविच्छेद यदि स्वरसन्धिके होनेपर होता है, तब दोष नहीं होता ।३ दण्डीने केवल यण्सन्धि होनेपर पदविच्छेदके तीन स्थल प्रकृत उदाहरणमें दिये हैं । एकादेशसन्धि होनेपर पदविच्छेदका उदाहरण नहीं देनेका कारण सम्भवतः यह है कि एकादेश सन्धिमें पदत्व छन्दःशास्त्रकी परम्परामें ही विदित है, व्याकरणमें नहीं । अतः लोकमें अप्रसिद्ध होनेके कारण उसका ही प्रदर्शन आचार्यने किया है ॥ १५४ ॥ १. अष्टा० १।४।१४ : सुप्तिङन्तं पदम् । २. अष्टा० ६।१।८४-८५ : एकः पूर्वपरयोः । अन्तादिवच्च । अज्झीनं परेण संयोज्यम् । पूर्वाङ्ग-पराङ्गताका विवेचन हमारे शीघ्र प्रकाश्य 'शिक्षा- वेदाङ्ग' ग्रन्थमें देखें । ३. काव्यालङ्कारसूत्र २।२।३-४ : विरस-विरामं यतिभ्रष्टम् । तद् धातु- नाम-भाग-भेदे स्वरसन्धयकृते । वृत्ति : 'स्वर-सन्धयकृत' इति वचनात् स्वरसन्धयकृते भेदे न दोषः ।
१८६ काव्यादर्श [३।१५५ तथापि कटु कर्णानां कवयो न प्रयुञ्जते । ‘ध्वजिनी तस्य राज्ञः केतूदस्तजलदे’त्यदः ॥ १५५ ॥ तब भी कानोंको कडुवा लगने वाला प्रयोग कवि लोग नहीं किया करते । जैसे ‘ध्वजिनी तस्य राज्ञः केतूदस्त-जलदा’१ यह प्रयोग है ॥ १५५ ॥ कर्णकटु पदमध्यविराम वर्जनीय है — आचार्य दण्डीने पदमध्यमें ग्रहणीय यति बतानेके बाद प्रकृत (१५५वें) पद्यमें वर्ज्य पदमध्य यति बताई है ।२ पदमध्यमें भी कवि लोग कानोंको अप्रिय लगे, ऐसी यतिका प्रयोग नहीं करते । ‘कर्णोंको कटु’ कहनेका आशय यतिकी वर्ज्यताका निमित्त श्रुतिकटुत्व- जन्य उद्वेग बताना है । उत्तरार्धमें प्रदत्त उदाहरणके दो पादोंके मध्य अपेक्षित यति द्वितीय (श्लोकके चतुर्थ) पादके आदिम द्वक्षर ‘केतू’ पदके मध्यमें ‘के’ पर पड़ती है । यह सुननेमें अच्छी नहीं लगती । अतः यह यतिदोष है । यह कर्णकटुत्व यहाँ और यतिशेष पदभागके एकवर्णात्मक होनेसे है ।३ भरतने ‘यतिभ्रष्ट’ दोषको पृथक् न मानकर इसे कदाचिद् ‘विषम’ वृत्त- दोष में ही समाहित किया है ।४ छन्दःशास्त्रके पिङ्गल आदि आचार्य यति एवं गणव्यवस्था दोनोंको वृत्तके स्वरूपमें समाहित मानते हैं, यह (क) वृत्ताधिकार में यतिका लक्षण देनेसे तथा (ख) वृत्तोंके लक्षणमें विराम और गणव्यवस्था दोनोंको देनेसे सिद्ध होता है । १. उस राजाकी सेना ध्वजोंसे उत्क्षिप्त मेघों वाली (ऊँचे हाथियों पर लगे होनेसे गगनचुम्बी ध्वजों वाली) है । २. रत्नश्रीज्ञान, वादी जी और तरुणवाचस्पतिने इस श्लोकको सन्धि- विकारान्त पदके भङ्गमें यतिकी वर्जनीयताका उदाहरण बताया है । पर ‘केतु + उदस्त = केतूदस्त’ स्थिति न होनेपर ‘केतुक्षिप्त’ पाठ यदि होता, तो ‘के’ पर यति होती, तो क्या यह यति वर्जनीय न होती ? सन्धिविकारसे निष्पन्न दो पदोंके अन्तवद्भाव और आदिवद्भावसे यदि यति निष्पन्न होती, तो उसे ‘सन्धिविकारान्त श्रवणोद्वेजक यति’ कहा जा सकता था । अतः यहाँ पदमध्यमें वर्ज्य यतिका विवरण मानना ही उचित है । ३. पृष्ठ १८२ में हलायुधका द्वितीय यतिनियम देखें । ४. वृत्तदोषो भवेद् यत्र ‘विषमं’ नाम तद् भवेत् । नाट्यशास्त्र १६।६३ वृत्तरत्नाकर १।१२ ‘यतिर्विच्छेदसञ्ज्ञितः’ पर नारायणभट्ट : भरता- दयस्तु यतिमेव नेच्छन्ति ।
३।१५५] कर्ण-कटु पदमध्य विराम वर्जनीय है १८७ पिङ्गलने विरामके स्थानोंका तो निर्देश किया है, किन्तु उस स्थानमें भी विच्छेद करनेसे कहीं लय टूटनेसे छन्द दूषित होगा, यह स्पष्टतः नहीं कहा है । प्राचीन छन्दःशास्त्रियोंकी तो यह दृष्टि थी कि एकाधिक अक्षर कम या अधिक होनेसे छन्दस्त्व व्याहत नहीं होता । १ परवर्ती आचार्योंकी यह मान्यता है कि प्राचीन छन्दःशास्त्रमें यतिभङ्ग जैसा कोई दोष नहीं था; यदि था, तो केवल इस रूपमें कि प्रदत्त स्थानपर यति न करके अन्य स्थान पर कर दी जाये, तब यतिभङ्ग होता है । इसलिये अर्वाचीन आचार्योंने यतिके स्थानातिरिक्त नियमोंको वृत्तका अङ्ग नहीं माना । गुरुलघुव्यवस्थाको ही वृत्त माना । २ इस प्रकार यतिके नियम और गुरुलघुव्यवस्था दोनों भिन्न- भिन्न पदार्थ हैं । और इनमें दोष होनेसे क्रमशः यतिदोष और वृत्तदोष होते हैं । यह भरतोत्तरवर्ती आचार्योंकी दृष्टि है । यों, इस दृष्टिका मूल भरतमें उपलब्ध है : उन्होंने अभिनयके समय काव्यके पाठमें जहाँ भिन्नवृत्तका निषेध किया है, वहीं बिना विराम (यति) के विश्राम करनेका भी निषेध किया है । ३ यह स्पष्ट ही यतिभ्रंशका निषेध है । भरतने अपने शास्त्रके प्रयोगप्रधान होनेके कारण उसके अनुकूल उसकी वर्जनीयता अभिनय (वाचिक) में बताई है; जबकि दण्डी आदि काव्यशास्त्रियोंने काव्यके प्रणयन १. शतपथब्राह्मण १२।२।३।३ : नाक्षराच्छन्दो व्येत्येकस्मान्न द्वाभ्याम् । कौषीतकिब्रा० २७।१ : न ह्येकेनाक्षरेणान्यच्छन्दो भवति; नो द्वाभ्याम् । २. छन्दःशास्त्र ५।१ पर मृतसञ्जीवनी : तथा चोक्तम्- एकदेशस्थिता जातिर्वृत्तं गुरु-लघु-स्थितम् । वृत्तरत्नाकर १।१२ पर नारायणभट्ट : यतिर्वृत्तस्वरूपाद् भिन्नाऽपि गुणालङ्काराद्यपेक्षयाऽन्तरङ्गाङ्गत्वात् सूत्र- कारादिभिर्लक्षणमध्ये निबद्धा, न तु वृत्तस्वरूपतया । मात्रागुरुलघु- नियमनं हि वृत्तलक्षणम्, विरामात्मकत्वं च यतेः । काव्यालङ्कारसूत्र २।२।५ : न वृत्तदोषात् पृथग् यतिदोषो, वृत्तस्य यत्यात्मकत्वात् । ६ : न, लक्ष्मणः पृथक्त्वात् । वृत्ति : गुरुलघुनियमात्मकं वृत्तम् । विरामात्मिका च यतिरिति । ३. (क) नापशब्दं पठेत् तज्ज्ञो (ख) भिन्नवृत्तं तथैव हि । (ग) विश्रमेन्नाविरामेषु (घ) दैन्ये काकुं न दीपयेत् ।। १७।१४६ (क) 'अपशब्द' को १६।८६ में 'शब्दच्युत' और ६५ में 'शब्दहीन' कहा है । (ख-ग) १६।६४ में प्रोक्त 'वृत्तदोष' अपरनाम 'विषम' का विवरण है । (घ) 'काकु' का सम्बन्ध वाचिक अभिनयसे है, छन्दसे नहीं । यह गद्य पद्य दोनोंमें हो सकती है ।
१८८ काव्यादर्श [३।१५६ (८) वर्णानां न्यूनताऽऽधिक्ये गुरु-लघ्वयथास्थितिः । यत्र, तद् भिन्नवृत्तं स्यादेष दोषः सुनिन्दितः ॥ १५६ ॥ (८) जहाँ अक्षरोंकी (क) कमी या बेशी हो, (ख) गुरु और लघुका उसके विपरीत विन्यास हो, वह 'भिन्नवृत्त' होवै । यह दोष बहुत निन्दित दोष होता है ॥ १५६ ॥ में ही यतिभ्रंशको दोष (वर्ज्य) बताया है । इसी दृष्टिके तहत दण्डी या उनसे पूर्वके आचार्योंने भरतके 'विषम' नामक वृत्तदोषको ही 'यतिभ्रष्ट' और 'भिन्नवृत्त' नामक दो दोषोंमें विभाजित कर दिया । भामहका 'यतिभ्रष्ट'का विवेचन दण्डीसे कुछ भिन्न है : छन्दमें प्रयुक्त शब्दोंकी वि-चारणा यति होती है। उससे भ्रष्ट 'यतिभ्रष्ट' कहलाता है ।¹ भामहने पिङ्गलके 'विच्छेद' और दण्डीके 'पदच्छेद' जैसे स्पष्टार्थक शब्दोंके स्थानपर 'शब्दोंकी विचारणा' जैसी अस्पष्ट अभिव्यक्ति दी है । उनके उदाहरणमें तो और भी गड़बड़ है : तमाल + असित = 'तमालासित' में दीर्घ एकादेश सन्धिके अन्तवद्भावके कारण 'तमाला' के शब्दत्व या पदत्वमें न छन्दःशास्त्रियोंके अनुसार यतिभ्रंश दोष है, और न कविपरम्परामें । महाकवियोंने इस प्रकारकी सन्धियोंपर यतिके असङ्ख्य प्रयोग किये हैं । यदि कविसम्प्रदायमें इन्हें दोष माना जाता, तो वे ऐसे प्रयोग क्यों करते ? अतः भामहका न लक्षण निर्दोष है, और न उदाहरण ही ठीक है । निष्कर्ष : यतिभङ्ग दोषके बारेमें दण्डीका विवेचन समस्त आचार्यपरम्परा में सर्वाधिक युक्तिसङ्गत एवं यथार्थपरक है । यतिका उद्देश्य श्रुतिसुख है । श्रुतिकटु यतिका परिहार कविको करना चाहिये । कविकल्पलताके आचार्य का यह कथन दण्डीके मतकी ही पुष्टि करता है : यति मधुरताका हेतु है । उसे इस रूपमें करना चाहिये कि वह उद्वेजक न बने² ॥ १५५ ॥ (८) भिन्नवृत्त दोष—छन्दमें तीन बातें होती हैं : (क) अक्षरोंकी नियत सङ्ख्या; इसमें भेदसे छन्दोंकी जाति बदल जाती है; (ख) गुरु लघुके १. यतिश्छन्दोऽधिरूढानां शब्दानां या विचारणा । तदपेतं यतिभ्रष्टमिति निर्दिश्यते, यथा ॥ काव्याल० ४।२४ विद्युत्वन्तस्तमाला, सितवपुष मे वारिवाहा ध्वनन्ति ॥ २५ २. वृत्तरत्नाकर १।१२ पर नारायणभट्ट : तदुक्तं कविकल्पलतायाम् एवं यथा यथोद्वेगः सुधियां नोपजायते । तथा तथा मधुरतानिमित्तं यतिरिष्यते ॥
३।१५६] ५. दोष : (८) भिन्न-वृत्त १८६ नियत क्रमसे अक्षरोंका विन्यास; मात्रिक छन्दोंमें मात्राओंका तथा वर्णिक छन्दोंमें अक्षरों (केवल स्वरों या व्यञ्जनारूढ स्वरों) का क्रमविशेषमें व्यवस्थित विन्यास; (ग) नियत सङ्ख्यापर विराम अर्थात् यति । यतिदोष का निरूपण पीछे (१५२-१५५ श्लोकोंमें) विस्तरेण किया जा चुका है । अब छन्दकी शेष दो विशेषताओंमें दोष आनेसे होने वाले वृत्तदोषका निरूपण १५६-१५८ श्लोकोंमें आचार्यने किया है । (क) शतपथ और कौषीतकि ब्राह्मणोंके प्रमाणसे पीछे देख चुके हैं कि एक दो अक्षरोंकी कमीसे 'छन्दोभङ्ग नहीं माना जाता था । किन्तु वहाँ भी दो स्थितियाँ शास्त्रकारोंने बताई हैं : (i) यदि अक्षरोंकी न्यूनता एकादेश अथवा यणादि सन्धिके कारण है, तो उसे सन्धिच्छेद (व्यूह¹) के द्वारा पूरा किया जाता है ।² ये सन्धिज छन्दोभङ्ग कविकृत नहीं थे, अपितु भाषामें सन्धियोंका स्वरूप बदलनेपर संहिताकारोंने भाषाके नवविकसित स्वरूपके १. व्यूहकी आवश्यकताके बारेमें वेङ्कटमाधवका ऋग्वेदके छठे अष्टकके सातवें अध्यायकी व्याख्याके प्रारम्भमें दिया वक्तव्य द्रष्टव्य है : समीचीना यदा वृत्तिर्न व्यूहेऽपि भवेदिह । न तदा व्यूहमिच्छन्ति; तत्रैतल्लिङ्गदर्शनम् ।। ७ ।। 'अक्षरे पादकॢप्तिः स्यान्न च हल् केवलोऽक्षरम् । संयोगानामतो व्यूहो न कार्य' इति बह्वृचाः ।। १० ।। भवतो द्वौ यणादेशौ यद्येकस्मिन् पदे, तदा । तथा व्यूहेद् यणादेशं यथा वृत्तिर्न दुष्यति ।। ११ ।। व्यूहे च वृत्तिसिद्धिश्चेद्, व्यूहं नेच्छन्ति केचन । व्यूहेनाक्षरसङ्ख्या च कार्येवेत्याह माधवः ।। १२ ।। श्लोकौ भवतः 'चत्वारि सन्धिजातानि यैश्छन्दो हसते न च । प्रश्लिष्टमभिनिहितं क्षिप्रसन्धिरभिद्रुतम् ।। १ ।। एतानि सन्धिजातानि मिमानश्छन्दसोऽक्षरैः । द्वैधं कुर्यादसम्पूर्णे, न पूर्णे किञ्चनेङ्गयेत्' ।। २ ।। इति । २. व्यूहेदेकाक्षरीभावान् पादेषूनेषु सम्पदे ।। ऋक्प्रातिशाख्य १७।२२ क्षैप्रवर्णांश्च संयोगान् व्यवेयात् सदृशैः पदैः ।। २३ छन्दःशास्त्र ३।२ : इयादिपूरणः । ऋक्सर्वानुक्रमणी १।३ : पादपूरणार्थं तु क्षैप्रसंयोगैकाक्षरीभावान् व्यूहेत् । प्रथम परिच्छेदकी भूमिका, पृष्ठ ३-४ भी देखें ।
१६० काव्यादर्श [३।१५७ (क i) 'इन्दुपादाः शिशिरा स्पृशन्तोत्यूनवर्णता । (ii) 'सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणीत्यधिकाक्षरम् ॥ १५७ ॥ (क i) 'इन्दुपादाः शिशिरा' (शीतल चन्द्रकिरण छूती हैं) में पादमें एक वर्ण (अक्षर) की कमी है । (ii) 'सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणि' (आम की गीली कोंपलोंको) यह काव्य अधिक अक्षर वाला है ॥ १५७ ॥ अनुरूप करनेको कविके प्रयत्नके विपरीत जाकर नवीन सन्धियोंका प्रयोग कर के छन्दोभङ्ग कर दिया था । व्यूहन (सन्धिच्छेद) से उसे पुनः यथापूर्व लाया जाता है । (ii) यदि कविकी अशक्तिवश हो गया है, या कविने वैचित्र्यार्थ स्वेच्छासे किया है, तब व्यूहसे काम नहीं चलता है, तो उसे कविके प्रति श्रद्धावश न बदलकर निचृत् भुरिक् या विराट् और स्वराट् नामसे व्यवस्थित कर दिया जाता था ।१ काव्यशास्त्रियोंने इस प्रकारके औदार्यकी छूट नहीं दी ।२ अक्षरसङ्ख्या यदि अपेक्षितसे कम या अधिक है, तो उसे दोष ही कहा है । इसका उदाहरण आचार्यने १५७वें श्लोकमें दिया है । (ख) छन्दमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु है गुरु लघु का व्यवस्थित क्रममें विन्यास । उसका भङ्ग छन्दमें सदा दोष समझा जाता रहा है । छन्दकी लयके भङ्गका सर्वाधिक उद्वेजक हेतु गणभङ्ग (गुरुलघुविन्यासका भङ्ग) है । (ग) यतिभङ्गपर विचार १५२-१५५ श्लोकोंमें किया ही जा चुका है । छन्दोभङ्ग दोष हर स्थितिमें वैरस्यकारक ही होता है । अतः यह नित्य दोष है ॥ १५६ ॥ (क i) पादमें अक्षरकी न्यूनतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—१५७वें श्लोकके पूर्वार्धमें आचार्यने अक्षरन्यूनताजन्य भिन्नवृत्त दोषकी व्याख्या उदाहरण दे कर की है : इस अर्धालीके अनुष्टुप् छन्दोबद्ध प्रथम पादमें आठ अक्षरोंकी बजाय सात अक्षर हैं । अतः यह पाद सम्पूर्ण श्लोकमें प्रयुक्त लयको भङ्ग करनेके कारण उद्वेजक होनेसे दोष है । १. छन्दःशास्त्र ३।५६-६२ : ऊनाधिकेनैकेन निचूद्भुरिजौ । द्वाभ्यां विराट्- स्वराजौ । आदितः सन्दिग्धे । देवताऽऽदितश्च । छन्दोंसे देवताओंके सम्बन्धके आदिम उल्लेखके लिये ऋ० १०।१३०।४-६ देखें । २. हलायुधवृत्ति ३।६३ : वैदिकेष्वेवच्छन्दस्सु निचृद्भुरिजौ तथा विराट्- स्वराजौ च दृश्येते । न लौकिकेषु ।
३।१५८] ५. दोष : (८) भिन्नवृत्त १६१ (ख i) कामेन बाणा निशाता' विमुक्ता, मृगेक्षणाष्वित्ययथागुरुत्वम् । (ii) मदनबाणा निशिताः पतन्ति वामेक्षणास्वित्ययथालघुत्वम् । १५८। (ख i) 'कामेन बाणा निशाता विमुक्ता' (मृगनयनियोंपर कामदेवने तीखे छोड़े बाण) में गुरु अनुचित है । (ii) 'मदनबाणा निशिताः पतन्ति' '(कामदेवके तीखे बाण तिरछी चितवन वालियों पर पड़ते हैं) में लघु वर्ण अनुचित है ।। १५८ ।। (ii) अक्षरकी अधिकतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—श्लोकके उत्तरार्ध में यण्सन्धिके परादिवद्भावकी स्थितिमें 'किसलया' पर यति होती है । तब इस पादमें आठकी बजाय नौ, एक अक्षर अधिक होनेसे छन्दकी लय टूटती है । इससे यह पाद श्रुतिविरस हो जाता है ।। १५७ ।। (ख i) लघुके स्थानमें गुरुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—१५८वें श्लोकके प्रथमपादमें कविने एकादशाक्षर त्रिष्टुप् जातिके इन्द्रवज्राछन्दका प्रयोग किया है । इस छन्दमें सातवां अक्षर दीर्घ नहीं, अपितु लघु अपेक्षित होता है ।१ किन्तु यहाँ यह 'निशाता' में 'शा' के रूपमें दीर्घ है । अतः गुरुका अयथावत् (अनुचित रूपसे) प्रयोग छन्दोभङ्गकारक है । 'निशिता' पाठसे दोषनिवारण हो जाता है । (ii) गुरुके स्थानमें लघुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—तृतीय पादके द्वितीय अक्षरमें लघु वर्ण 'द'का प्रयोग करनेसे उपजातिमें इस स्थानपर गुरु प्रयोगका उल्लङ्घन हुआ है । अतः यहाँ लघु वर्ण अयथावत् (अनुचित रूपसे) प्रयुक्त हुआ है । इस लिये छन्दोभङ्गके कारण भिन्नवृत्त दोष है । 'मदनबाणाः'के स्थानपर 'अनङ्गबाणाः' पाठसे इस दोषका निवारण हो जाता है । रत्नश्री और वादीटीकामें 'निशिताः' पाठ माना है । रत्नश्रीज्ञानने इस पादको उपेन्द्रवज्राका२ पाद समझकर प्रथम अक्षरमें लघुके स्थानपर दीर्घ 'का'के प्रयोगसे छन्दोभङ्ग बताया है । उन्होंने ऐसा सम्भवतः द्वितीय और तृतीय पादोंमें उपेन्द्रवज्राके शुद्ध और खण्डित प्रयोगको देखकर किया होगा । पर प्रथम और चतुर्थ पादोंमें इन्द्रवज्रा और बीचके दो पादोंमें उपेन्द्रवज्राके मिश्रणसे उपजातिका संभव होते प्रथम और चतुर्थ पादोंमें भी १. रत्नश्री, वादीटीका : निशिता, तरुणवाचस्पति : निशाता । २. छन्दः शास्त्र ६।१५ : इन्द्रवज्रा तौ जगौ ग् । ३, उपेन्द्रवज्रा ज्तौ जगौ ग् । ४. आद्यन्तावृपजातयः ।
१६२ काव्यादर्श [३।१५८ दण्डीको उपेन्द्रवज्रा ही इष्ट है, और दोनों पादोंमें प्रथम अक्षरमें लघुके स्थानमें दीर्घका अयथावत् प्रयोग है, यह माना जाये, इसमें कोई युक्ति नहीं है। अतः यहाँ प्रथम पादमें इन्द्रवज्रामें ही गुरुका अयथावत् प्रयोग बताने वाला ‘निशाता’ (मध्यगुरु) पाठ ही ठीक है। वादिजङ्घालदेवने उपजातिवाले इस श्लोकमें अनुष्टुप्की लघु-गुरु व्यवस्थाका उल्लङ्घन बताया है।¹ इसपर क्या टिप्पणी की जाये ? भरतने इस दोषका निरूपण 'विषम' नामसे किया है। यह 'यतिभ्रष्ट'के प्रसङ्गमें कहा जा चुका है। इसकी व्याख्या उन्होंने 'वृत्तका दोष विषम होता है।' कहकर की है। वृत्तके तीन अवयव पीछे श्लोक १५६ पृष्ठ १८८में बताये जा चुके हैं। अतः भरतके अनुसार इन तीनोंमेंसे किसी भी एक अवयव के लक्षणविरुद्ध होनेसे वृत्तमें दोष निष्पन्न हो जानेसे 'विषम' नामक छन्दो- भङ्ग दोष होगा। आचार्य दण्डीने भरतके कथनको व्याख्यानसे लभ्य इस विशेषप्रतिपत्तिका विस्पष्ट रूपसे 'यतिभ्रष्ट' और 'भिन्नवृत्त' दो दोषोंके रूपमें प्रतिपादित किया है। भामहने भी शब्दान्तरसे इसी प्रकार इन दोषोंका निरूपण किया है।² उन्होंने मालिनी³ छन्दका उदाहरण दिया है। इसके द्वितीय पादमें नवम अक्षर गुरुके स्थानपर लघु दिया है और बारहवां अक्षर दीर्घके स्थानमें लघु दिया है। इसके अतिरिक्त पूरे पादमें १४ अक्षर होनेसे एक अक्षरकी न्यूनता है। आठवें अक्षर ‘को’ पर एकादेश सन्धिके अन्तवद्भावसे यति की गई है⁴ ॥ १५८ ॥ १. वादिटीका ४।३५ : पञ्चमं लघु सर्वत्रानुष्टुपूछन्दस्यषष्ठं द्विचतुर्थयोः पादयोः, षष्ठं गुरु चतुर्ष्वपि भवत्यक्षरमिति नियमः । इह तु 'कामेन बाणा' इति पञ्चमं गुरु । 'निशिता' इत्यषष्ठं लघु । 'द्विचतुर्थयोः' इति विशेषणात् प्रथम-तृतीययोः सप्तमं गुरु भवति । अत्र च प्रथमपादे सप्त- माक्षरस्य लघुत्वादयथागुरुत्वम् ।...अयथालघुत्वमाह—'मदनबाणा निशिताः पतन्ति'। 'शि' स्थाने गुरुणा भवितव्यम् । पञ्चमेन च लघुना सप्तमं द्विचतुर्थयोः पादयोर्लघु, प्रथमतृतीययोश्च गुरु भवतीति लघु प्रयुक्तम् । इत्ययथालघुत्वम् । इति 'नि', 'शि' शब्दौ दोषः । २. गुरोलंघोश्च वर्णस्य योऽस्थाने रचनाविधिः । तन्न्यूनताऽधिकता वाऽपि भिन्नवृत्तमिदं यथा ।। काव्याल० ४।२६ ३. ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः । वृत्तरत्नाकर ४. भ्रमति भ्रमरमाला काननेषून्मदाऽसौ । विरहितरमणीकोऽहंति त्वद्य गन्तुम् ।। काव्याल० ४।२७
३।१५६-१६०] ५. दोष : (६) विसन्धि १६३
(६) न संहितां विवक्षामीत्यसन्धानं पदेषु यत् । तद् विसन्धीति निर्दिष्टं न प्रगृह्यादिहेतुकम् १ ॥ १५६ ॥ (क) मन्दानिलेन चरता अङ्गनागण्डमण्डले । (६) पदोंमें सन्धि नहीं करनेकी इच्छासे जो सन्धिका अभाव होता है, उसे 'विसन्धि' नामसे कहा है। प्रगृह्य आदिके कारण होने वाला सन्धिका अभाव विसन्धि नहीं होता ॥ १५६ ॥ (क) रमणीके गोल-गोल कपोलपर उमगा पसीना आकाशमें और हमारे (६) विसन्धि दोष—'विसन्धि' विगत-सन्धिके अर्थमें है । 'सन्धि' का अर्थ है योग, जुड़ाव, सन्धान, संहिता । (i) पदोंके अवयवोंमें आन्तरिक तथा (ii) पदोंमें परस्पर बाह्य सन्धि होती है । (१) प्रथम और द्वितीय पादोंमें एवम् (२) तृतीय तथा चतुर्थ पादोंमें सन्धि होनी चाहिये । इस प्रकार श्लोकार्ध के घटक दो पादोंमें (i) आन्तरिक और (ii) बाह्य सन्धि व्याकरणमें बताये नियमोंके अनुसार अनिवार्य बताई गई है । व्याकरणके अनुसार सन्धिके तीन रूप हैं : (१) कुछ स्थितियोंमें यह नित्य होती है, तो (२) कहीं विकल्प से । इसी प्रकार (३) कुछ स्थितियोंमें सन्धिका अभाव भी शास्त्रोंमें विहित है । इसे पाणिनीय व्याकरणमें 'प्रकृतिभाव' कहा जाता है और प्रातिशाख्यों तथा तदनुसारी शिक्षावेदाङ्गमें 'विवृत्ति' कहा जाता है ।२ इसके अतिरिक्त, अयादि आदेशोंके पदान्तीय 'य्' और 'व्'का स्वरके पूर्व शाकटायनाभिमत लोप होनेपर अकार और परवर्ती स्वरकी वृद्धि आदि सन्धियाँ नहीं होती ।३ यह सन्ध्यभाव भी नित्य है । (क) शास्त्रके अनुसार सन्धि नित्य विहित है, वहाँ यदि प्रयोक्ता सन्धि नहीं करता तब वह शास्त्रविरुद्ध विवृत्ति सन्धिके जानकारोंको उद्वेजक होनेसे दोष है । किन्तु जहाँ (ख) सन्धिके अभावकी शास्त्रीय विकल्पके कारण प्राप्ति है, अथवा (ii) प्रकृतिभावके कारण, वहाँ वह दोष नहीं होगी ॥ १५६ ॥ (क) विसन्धि दोषका उदाहरण—प्रकृत १६०वें श्लोकमें प्रथमपादान्त- स्थ 'आ' ('ता') की द्वितीयपादादिस्थ 'अ' से दीर्घ एकादेश सन्धि छन्दः- १. यह श्लोक त्रिपुरहरभूपालने काव्यालङ्कारसूत्रकामधेनु २।२।८में 'यदवादि दण्डिना' कहकर उद्धृत किया है । २. अष्टा० ६।१।११५-१२८; विशेषकर 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् । ऋक्प्रा० २।३-४ : स्वरान्तरं तु विवृत्तिः । सा वा स्वरभक्तिकाला । ३. अष्टा० ८।३।१६ : लोपः शाकल्यस्य । ८।२।१ : पूर्वत्रासिद्धम् ।
१६४ काव्यादर्श [३।१६०-१६१ लुप्तमुद्भूदि घर्माम्भो नभस्यस्मन्मनस्यपि१ ॥ १६० ॥ (ख i) 'मानेष्ये इह शीर्यन्ते स्त्रीणां (ii) हिमऋतौ प्रिये । मनमें चलते हुए मन्द पवनके द्वारा लुप्त हो गया ॥ १६० ॥ (ख) हे प्रिये, इस ठण्डीके मौसममें इन रातोंमें स्त्रियोंके पतिके प्रति मान और जिन्हें मानकी आवश्यकता नहीं पड़ती, उन स्वाधीनपतिका शास्त्रके अनुसार आवश्यक (नित्य प्राप्त) है । पर यहाँ यह जानकर नहीं की है । अतः विसन्धि दोष है । तरुण वाचस्पतिने यहाँ 'मन्दानिलेन के स्थानपर 'मेघानिलेन' पाठ मान कर 'नभसि' का अर्थ नभोमास (श्रावण) किया है । मन्दानिल या मेघानिल का नभस (आकाश या श्रावण मास) से आधाराधेयभाव सम्बन्ध है । मनसे इन दोनोंका सम्बन्ध मनोहरताके कारण मनमें घूमनेका है । इससे सुन्दरीके प्रति रतिका व्यभिचारी भाव औत्सुक्य व्यक्त होता हैं । वादिजङ्घाल देवने 'एक और विशिष्ट उदाहरणका ऊह यहाँ किया जा सकता है', कहा है । उसे तरुणवाचस्पतिने दण्डिकृतके रूपमें समझा है ।२ रत्नश्री में यह उपलब्ध नहीं है । अतः प्रतीत होता है कि वादिजीके परामर्शके बाद यहाँ भ्रमसे समझ लिया गया है । तिरुपतिसंस्करणके संस्कर्ताने बिना विचार किये उसे मूलके रूपमें रख दिया है ॥ १६० ॥ (ख) निर्दोष विच्छेदके दो उदाहरण—व्याकरणमें 'प्रकृतिभाव सन्धि'के नामसे विदित सन्धिके अभावकी स्थितिके दो उदाहरण उपलक्षणार्थ दिये हैं : (i) प्रथम उदाहरण नित्य सन्ध्यभावका है : 'मानेष्ये' एकारान्त द्विवचनान्त होनेके कारण प्रगृह्य पद है और इसकी परवर्ती स्वरसे सन्धिका प्रकृतिभावके १. प्रथम पादका पाठ तरुणवाचस्पतिने सम्भवतः काव्यालङ्कारसूत्र २।२।८ और सरस्वती० १।२७के प्रभावमें 'मेघानिलेन अमुना' माना है । या वामन और भोजका उदाहरण दण्डीके उदाहरणसे बिल्कुल भिन्न है । लगता है किसी ने अन्य समान उदाहरणके प्रतीकके रूपमें हाशियेपर लिख दिया और कालान्तरमें भ्रमसे दण्डीके श्लोकका पाठ समझ लिया गया । २. वादिटीका : 'आधिव्याधिपरीताय अद्य श्वो वा विनाशिने' इत्यादिकमपि विशिष्टमुदाहरणमूह्यम् । तरुणटीका : 'पादान्ते सन्धेरकरणं न दोषाय' इति केचित् । तदुदाहरति 'आधिव्याधी'ति । तिरुपतिसं० में उत्तरार्ध यों दिया है : को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ॥