खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
१८४ : सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम तत्राप्युभयकर्मजसंयोगवत्तदपि कारणमिति चेन्न । अभावादिसापेक्ष-विशिष्ट- प्रतिपत्तिवत् प्रागुपजातवह्निव्याप्तधूमस्मृतेः प्रथममपि 'योऽसौ वह्निव्याप्तः सोऽयं धूमः' इति परामर्शोपपत्तेः । नित्यसापेक्षेऽर्थेऽस्तु तथा, नान्यत्र प्रथमं तथेति चेन्न । प्राक् तत्कारणोपपत्तौ नान्यत्रैवमिति नियमे प्रमाणास्याभावात् । तस्य व्यापाराभावान् नानुमित्युत्पाद- कत्वमेवेति चेत्; स्यादप्येवं यदि व्यापारवतः करणत्वमित्येव सिद्धं स्यात् । तत्र धूमादिनिर्विकल्पकस्य तद्व्यापारस्य करणत्वमिति चेन्न । नित्यसङ्घटितार्थव- द्विनापि निर्विकल्पकं सविकल्पकोत्पत्तेरविरोथेन त्वदुक्तप्रक्रियानियमे प्रमाणाभावात् । समर्थन—उभयकर्मज संयोग के तुल्य वह परामर्श भी दैववश जात व्याप्ति की स्मृति और प्रथम धूमदर्शन दोनों से जन्य हो सकता है । खंडन—जैसे प्रतियोगी की स्मृति से प्रतियोगिविशिष्ट अभाव की प्रमा होती है, वैसे ही दैववश जात व्याप्ति की स्मृति से प्रथम भी धूमदर्शन के बिना ही ‘जो धूम वह्निव्याप्त है, तद्द्घूमवान् यह पर्वत है’ ऐसा परामर्श हो सकता है । समर्थन—अभावप्रमा के तुल्य धूमत्वविशिष्ट में व्याप्ति के वैशिष्ट्य का भान प्रथम धूमज्ञान के बिना नहीं हो सकेगा; कारण अभाव प्रतियोगी में नित्य साकाङ्क्ष है । अतः प्रतियोगिनिरपेक्ष केवल अभाव की प्रमा नहीं हो सकती । किन्तु प्रथम ही विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही अभाव की प्रमा होती है । प्रकृत में नित्य साकाङ्क्ष न होने से वैशिष्ट्यावगाही ज्ञान प्रथम धूमदर्शन के बिना नहीं हो सकेगा । खंडन—जब व्याप्तिस्मृति, धूम तथा चक्षुःसंयोग आदि कारण विद्यमान हैं, तब ‘नित्य सापेक्ष न होने से प्रथमतः धूमदर्शन के बिना विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही ज्ञान नहीं हो सकता’ यह कथन निर्युक्तिक है । समर्थन—लिङ्गपरामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः वह करण नहीं है । खंडन—यह कथन तभी युक्त होता, जब ‘सव्यापार ही करण होता है’ यह नियम
- होता । परन्तु ऐसा नियम नहीं है; कारण, व्यापाररहित व्यापार भी करण होता है । समर्थन—प्रथम धूम का निर्विकल्पक ज्ञान होता है, अनन्तर विशिष्टवैशिष्ट्याव- गाही धूम का परामर्श होता है। अतः धूम का निर्विकल्पक ज्ञान ही परामर्श द्वारा अनुमिति का करण है । खंडन—प्रतियोगी में नित्य सापेक्ष अभाव की प्रमा के तुल्य निर्विकल्पक के बिना भी पूर्वोक्त रीति से व्याप्तिविशिष्ट धूम का परामर्श हो सकता है। अतः ‘निर्विकल्पक ज्ञान के बिना सविकल्पक ज्ञान नहीं हो सकता’—आपकी इस कल्पित प्रक्रिया में कुछ भी प्रमाण नहीं है ।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८५ नित्यसङ्घटितेऽपि निर्विकल्पकं मंस्यस इति चेन्न । कारणान्तरादेव तदुपपत्तौ तत्र निर्विकल्पककल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत तत्सङ्घटनस्य स्वभा- वानतिरेकोपगमात् । तथापि यत्किञ्चित्जनकं तदेव तत्रानुमितिकरणमास्तामिति चेन्न । तथेन्द्रिया- देरनुमितिकरणत्वापत्तेरिति अलमतिप्रसरेणेति । शब्दश्रोत्रसन्निकर्षस्य च श्रोत्राव्यापारत्वप्रसङ्गात् । अन्यथा श्रोत्रस्य शब्द- प्रतिपत्तावकरणत्वप्रसङ्गात् । सन्निकर्षो हि इन्द्रियव्यापार उच्यत इति व्यापारा- न्तरञ्च तस्य क्षणिकमसिद्धम् , स्थिरे चोक्त एव दोषः । समर्थन—अभाव की प्रमा भी निर्विकल्पकज्ञानपूर्वक ही होती है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जब अभाव की प्रमा प्रतियोगी की स्मृति से युक्त इन्द्रिय-सन्निकर्ष से ही हो सकती है, तब उस प्रमा में निर्विकल्पक ज्ञान को कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं है । प्रत्युत अभाव आदि नित्यसाकाङ्क्ष पदार्थों का यह स्वभाव है कि निर्विकल्पक ज्ञान के विना भी वे विशिष्टज्ञान ( सविकल्पक ज्ञान ) के विषय होते हैं । समर्थन—व्याप्ति की स्मृति ही परामर्शरूप व्यापार की जनक होने से अनुमिति का करण क्यों न मानी जाय । खण्डन—ऐसा होने पर इन्द्रिय ही अनुमिति- करण क्यों न मानी जाय ? जैसे 'वह्निव्याप्यो धूमः' इत्याकारक व्याप्तिस्मृति, 'योऽयं वह्निव्याप्यो धूमस्तद्वान् अयं पर्वत:' इस परामर्श की जनिका है, वैसे ही इन्द्रिय भी उक्त परामर्श की जनिका है। अतः व्याप्तिस्मृति के तुल्य इन्द्रिय की भी उक्त स्मृति व्यापार हो सकती है। यदि इन्द्रिय को अनुमिति का करण मान लें, तो इन्द्रियजन्य होने से अनुमिति प्रत्यक्ष हो जायगी । एवञ्च प्रत्यक्षत्व तथा अनुमितित्व का साङ्कर्य हो जायगा । इतना० ही बहुत है, विस्तार से कुछ फल साध्य नहीं । किञ्च—यदि करण का व्यापार करण से जन्य कहा जाय, तो शब्द के साक्षात्कार में श्रोत्र का शब्द-समवाय [ अजन्य होने से ] व्यापार नहीं होगा । यदि समवाय को उक्त स्थल में व्यापार न मानें, तो श्रोत्र करण न हो सकेगा । कारण, व्यापारवत् कारण को ही करण कहते हैं और श्रोत्र का शब्द से सन्निकर्ष ही व्यापार हो सकता है । जो क्षणिक जन्य हो, ऐसा अन्य व्यापार शब्द-प्रत्यक्ष में असिद्ध है और स्थिर ( समवाय ) व्यापार [ उक्त लक्षण का समन्वय न होने से ] हो नहीं सकता । २४
१८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम शब्द एव तद्व्यापारः किन्न स्यादिति चेन्न । तस्य कर्मत्वेन करणकोटि- बहिर्भावात् । क्वचित्तयोरेकत्वेऽपि का क्षतिरिति चेन्न । शब्दबुद्धौ कार्यायामुपधायकत्वेन प्रविष्टस्य शब्दस्य करणव्यापारतया कारणकोटावपि प्रवेशनेऽशतो नियम्यनिया- मकत्वविरोधापत्तेः । घटादिबुद्धौ चक्षुरादेश्चक्षुर्घटादिसंसर्गव्यापारक्त्वेऽपि सम- मिदमिति चेत् किन्न स्यात् । तथा च— बाधेऽदृढेऽन्यसाम्यात् किं दृढेऽन्यदपि बाध्यताम् । क्व ममत्वं मुमुक्षूणामनिर्वचनवादिनाम् ॥ ३३ ॥ तथा हि मिथिलानाथो मुमुक्षुर्निर्ममः पुरा । आहेदं मिथिलादाहे न मे किञ्चन दह्यते ॥ ३४ ॥ समर्थन—श्रोत्र-इन्द्रिय आकाशरूप है और शब्द आकाश का गुण है। अतः श्रोत्र से जन्य तथा शब्द-प्रत्यक्ष का जनक होने से शब्द को ही शब्द-प्रत्यक्ष में व्यापार क्यों न मानें ? खंडन—शब्द [ प्रत्यक्ष प्रमा का ] कर्म है, अतः उक्त प्रमा का करण नहीं हो सकता समर्थन—यद्यपि सर्वत्र कर्म से अन्य ही करण होता है, तथापि शब्द-प्रत्यक्ष में कर्म को ही करण मानें, तो क्या हानि है ? खण्डन—यदि शब्द को व्यापार मानें, तो विषयतासम्बन्ध से शब्दविशिष्ट प्रत्यक्ष में शब्दरूप व्यापारविशिष्ट श्रोत्र के करण होने से विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी अवश्य रहता है। अतः शब्द का कार्य और कारण दोनों दलों में प्रवेश होने से वह कार्य और कारण दोनों हो जायगा, जो आत्माश्रय होने से अनुचित है । समर्थन—ऐसा मानें, तो विषयतासम्बन्ध से घटविशिष्ट प्रमा में घटसंयुक्त चक्षु के कारण होने से विशेषणरूप से घट का कार्य और कारण दोनों दलों में प्रवेश होने के कारण उसमें भी कार्यत्व और कारणत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । खण्डन—ऐसा क्यों नहीं ? यदि बाधक (दूषण) दृढ़ (अखण्डनीय) है, तो अन्यत्र भी इसी प्रकार से दोष हो जायगा । ऐस साम्य दिखाने से क्या होगा ? उसे भी उक्त दोष से ही खण्डित जानिये । पदार्थमात्र को अनिर्वचनीय माननेवाले मुमुक्षु पुरुषों का भी क्या किसीमें ममत्व हो सकता है ? स्मरण कीजिये, मुमुक्षु और निर्मम मिथिलेश जनक ने मिथिला-दाह के समय भी कहा था कि 'मिथिला के जलने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।'
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८७ नापि द्वितीयः ; लिङ्गपरामर्शस्यानुमितौ अकरणत्वप्रसङ्गात् । निर्विकल्पक- स्यापि तस्योपगमे सविकल्पकानाश्रयत्वात् । अतद्धेत्वाश्रयस्य तद्धेतुव्यापारत्वे चात्यापत्तेः । किञ्च – फलाव्यभिचारित्वं किं तस्मिन्नेव काले फलस्य सत्त्वनियमः , उत तदनन्तरं फलसत्त्वनियमः ? नाद्यः; कारणस्य पूर्वभाविताया अवश्यं वक्तव्यत्वात् । न द्वितीयः ; आनन्तर्यं यद्यव्यवहितानन्तर्यं विवक्षितं तदा यत्किञ्चिद्व्या- पारवतः करणत्वपक्षे हस्तादेरकरणत्वापत्तेः । आफलव्यापारवतस्तथात्वे कर्त्रादिष्वतिव्याप्तिः । अथ व्यवहितस्यापि आनन्तर्यं विवक्षितम्, तदाऽपि यत्किञ्चिद्व्यापाराभिप्राये 'करण में स्थित कारण व्यापार है' यह द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है। कारण, लिङ्ग- परामर्श में कोई व्यापार नहीं है, अतः लिङ्गपरामर्श करण नहीं कहा जायगा । साथ ही धूम का निर्विकल्पक ज्ञान भी करण नहीं होगा, क्योंकि सविकल्पक लिङ्गपरामर्श उसमें नहीं, किन्तु आत्मा में रहता है। यदि अन्य कारण में स्थित को भी करण का व्यापार मानें, तो सहकारीमात्र करण के व्यापार हो जायेंगे । किञ्च—'व्यापारवान् कारण का फल के साथ अव्यभिचार' क्या वस्तु है ? क्या वह व्यापारवान् कारण के काल में फल (प्रधान क्रिया ) का अवश्य होना है अथवा व्यापारवान् कारण के अनन्तर काल में फल का अवश्य होना है ? इनमें प्रथम पक्ष अयुक्त है; क्योंकि जिस काल में कारण हो, उस काल में [ कारण-जन्य होने से ] कार्य नहीं रह सकता, क्योंकि जन्य-जनक में पूर्व और परभाव का नियम है । द्वितीय पक्ष में यदि अव्यवहित अनन्तर ( उत्तर) कहें और 'यत्किञ्चित् व्यापारवान् करण है' इस पक्ष का आश्रयण करें, तो हस्त के यत्किञ्चित् व्यापार के अव्यवहित उत्तर क्षण में फल न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'फलोत्पत्तिपर्यन्त व्यापार- वान् करण है' इस पक्ष का ग्रहण करें, तो हस्त में अव्याप्ति तो न होगी, क्योंकि काष्ठ, अग्नि आदि के व्यापार भी हस्त से प्रयोज्य होने के कारण हस्त के ही व्यापार हैं और उन व्यापार-समूहों के अव्यवहित अनन्तर फल नियमतः होता ही है । परन्तु इसी तरह कर्ता आदि के व्यापार भी फलपर्यन्त होते हैं और उनके अव्यवहित उत्तरक्षण में फल नियमतः होता है; अतः कर्ता आदि में अतिव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में यदि व्यवहित उत्तर कहें और 'यत्किञ्चित् व्यापारवत् करण है' यह मानें, तो जहां अन्तराय ( विघ्न ) होने से हस्त-व्यापार के अनन्तर फल न
१८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अन्तरायसम्भवात् हस्ताद्यव्याप्तिः । आफलव्यापाराभिप्राये च व्यवधानास- म्भवात् कारकमात्रं करणमित्युक्तं स्यात् । व्यापारवतश्च फलाव्यभिचार इति किं तद्व्यापारस्य फलाव्यभिचारित्वम् , व्यापारविशिष्टस्य वा ? नाद्यः ; हस्ताद्यकरणत्वापातात् । अत एव न द्वितीयः ; यागादेः स्वर्गाद्यकरणत्वापातात् । अपूर्ववाक्यार्थत्ववादिनाऽपि चरमयागस्य फलकरणत्वाभ्युपगमादिति । अथोच्यते--यद्वानेव करोति तत्करणम्, यद्वानेव प्रमिमीते तत्प्रमाणम् । मैवम् ; आत्मधर्मप्रध्वंसादीनामकरणानां प्रमाणत्वप्रसङ्गात् । हो, वहाँ हस्त में अव्याप्ति हो जायगी। यदि 'फलपर्यन्त व्यापारवान् करण है' यह पक्ष मानें, तो फल का अव्यवधान होने से 'व्यवहित उत्तर' यह कथन ही युक्त नहीं है। किञ्च - कारकमात्र में फलपर्यन्त व्यापार होने से कारकमात्र में अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—'व्यापारवतः फलाव्यभिचारित्वम्' इस लक्षणवाक्य का क्या अर्थ है, क्या जिस कारण में स्थित व्यापार के अनन्तर फल हो—यह अर्थ है अथवा जिस व्यापारवत् कारण के अनन्तर फल हो—यह अर्थ है ? प्रथम अर्थ में हस्त-व्यापार के उत्तर कदाचित् अन्तराय ( विघ्न ) होने पर फल न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी। द्वितीय अर्थ में भी व्यापारवत् हस्त के अनन्तर कदाचित् अन्तरायवश फल न होने से हस्त में ही अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च--क्रियाकलापरूप याग के क्षणिक होने से अपूर्वविशिष्ट याग के अनन्तर स्वर्गरूप फल न होने से याग में भी अव्याप्ति हो जायगी। जो आचार्य लिङ् का अर्थ भावना या इष्टसाधनता नहीं मानते, किन्तु अपूर्व को ही लिङर्थ मानते हैं, वे भी 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत' इस स्थल में पूर्व-पूर्व अपूर्वविशिष्ट चरम याग को परमापूर्व का कारण मानते ही हैं। समर्थन—जिससे युक्त कर्ता कार्य करता है, वह करण है तथा जिससे युक्त प्रमाता प्रमिति को करता है, वह प्रमाण है। खंडन—अतीत, अनन्त सुखादि के अनन्त ध्वंसों से विशिष्ट ही प्रमाता प्रमिति को करता है। अतः आत्मा के धर्म, सुखादि के ध्वंस में भी प्रमा का करणत्व चला जायगा।
परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८६ येन क्रियाकारणेन युक्त एव प्रमिमीत इति चेन्न । सुखादिप्रमितौ करण- व्यापारस्याऽपि करणत्वप्रसङ्गात् । ओमिति चेन्न । अव्यापारतयाऽकारकत्वेन तद्विशेषकरणभावानुपपत्तेः । व्यापारवताऽपीति चेन्न । एवं हि व्यापारवत एव करणत्वं न स्यात्, न हि व्यापारवतस्तस्य व्यापारान्तरवत्त्वऽस्ति। अथ व्यापारवतो व्यापारांशमपहाय करणत्वम्, तत्र चास्त्येवेदं लक्षणम् । यस्य करणत्वमस्ति तस्य व्यापारवत्त्वमप्यस्तीति व्यापारवत् करणमुच्यत इति । न; पटमुद्यम्य निपात्य च प्रक्षालयतः स कर्मेव हि करणं स्यात् । किंच—किं तस्य करणत्वमिति लक्ष्यीभूतस्य अवश्यवक्तव्यत्वात् । यद्युक्त- समर्थन—जिस प्रमिति के कारण से युक्त होकर प्रमाता प्रमिति करे, वह प्रमाण है, ऐसा कहेंगे । खंडन—तब तो सुखादि-प्रमिति के कारण आत्ममनः- संयोगरूप व्यापार से युक्त ही प्रमाता सुखादि की प्रमिति करता है। अतः सुखादिप्रमिति में आत्ममनःसंयोग भी करण हो जायगा । 'उक्त प्रमिति में आत्ममनःसंयोग करण है ही' इसे इष्टापत्ति नहीं कह सकते, क्योंकि व्यापार न होने से आत्ममनःसंयोग जब कारक ही नहीं, तो कारकविशेषरूप करण कैसे हो सकेगा ? समर्थन–'जिस क्रिया के व्यापारवान् करण से युक्त होकर प्रमाता प्रमिति करता है, वह करण है' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च आत्ममन.संयोग व्यापाररहित है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन--ऐसा होने पर व्यापारवान् कुठारादि भी करण न कहे जा सकेंगे । कारण अंशतः आत्माश्रय दोष होने से व्यापारविशिष्ट कुठार में वह व्यापार तो रह नहीं सकता, जिससे वह विशिष्ट है। फिर उसमें अन्य कोई व्यापार भी नहीं है । समर्थन---व्यापार से उपलक्षित कुठार करण है और उस कुठार में उपलक्षणीभूत व्यापार रहता है, अतः उक्त लक्षण का समन्वय हो जायगा । खण्डन --तब तो पट को उठाकर निपातन करता हुआ रजक जहाँ वस्त्र-प्रक्षालन करता है, वहाँ पटरूप कर्म भी करण हो जायगा । कारण, वहाँ उद्यमन-निपातनरूप व्यापार से युक्त तथा प्रक्षालनरूप क्रिया का कारण जो पट है, उससे युक्त ही कर्ता प्रक्षालन करता है । किञ्च—जिस करण का आप लक्षण करते हैं, वह लक्ष्यभूत करण क्या वस्तु है, यह अवश्य कहना होगा । अन्यथा लक्षणरूप धर्म किस धर्मी में रहेगा ? यदि
१६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम लक्षणावत्त्वमेव तत् स्यात्, तदाऽऽत्माश्रयापातः स्यात् । स्वरूपमिति चेन्न । स्वरूपस्य प्रतिकरणं भिन्नतया एकपरित्यागेन अपरत्र लक्षणं गतमित्यतिव्यापकं स्यात्, न हि चक्षुषः स्वरूपं श्रोत्रस्येति । किञ्च—एवमिन्द्रियादेः प्रमाणत्वं न स्यात्, अतद्गतोऽप्यनुमात्रादेः प्रमातृत्वात् । नासौ प्रत्यक्षमिति चेन्न । नेदमपि हि प्रत्यक्षमात्रस्य लक्षणं भवता क्रियते । ननु यद्यपीन्द्रियादेर्विशेषतो व्यावृत्तिस्तदपि तज्जातीयकरणमात्रतया तज्जातीयमात्रस्य अव्यावृत्तिरेव । न ह्यनुमित्यादावपि अकरणजातीयवान् प्रमिमीते इति । न ; करणतया साधारणभावस्याद्याऽपि निर्णेतुमशक्यत्वात् । उक्त लक्षणविशिष्ट को ही लक्ष्य कहें, तो विशिष्टवृत्ति धर्म विशेषण में भी रहता है । अतः लक्ष्यवृत्ति लक्षण का लक्ष्य में विशेषणरूप 'स्व' में वृत्तित्व होने से आत्माश्रय हो जायगा । यदि स्वरूप को लक्ष्य कहें, तो प्रतिव्यक्ति स्वरूप व्यावृत्त होने के कारण श्रोत्र के स्वरूप को लक्ष्य मानें, तो चक्षु में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'जिससे युक्त ही प्रमाता प्रमिति करे' इत्यादि सावधारण लक्षण करने पर चक्षुरादि में अव्याप्ति हो जायगी। कारण चक्षु के सहकार के बिना भी लिङ्गपरामर्श आदि से अनुमिति आदि प्रमितियाँ होती हैं। अतः चक्षु से युक्त ही प्रमाता प्रमिति करता है, यह नियम नहीं रहा। समर्थन—यद्यपि चक्षुःसहकार के बिना भी अनुमिति होती है, तथापि प्रत्यक्ष तो चक्षुःसहकार के बिना नहीं होता, अतः व्यभिचार नहीं है। खंडन—यदि आप प्रत्यक्ष प्रमाण का यह लक्षण करते होते तथा लक्षण में प्रत्यक्ष-प्रमा का निवेश होता, तो ऐसा कहना उचित भी था । किन्तु आप तो प्रमाणमात्र का लक्षण करते हैं तथा प्रमितिसामान्य का लक्षण में निवेश है। अतः चक्षुरादि के बिना भी अनुमिति आदि के होने से चक्षुरादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस जातीय से युक्त ही प्रमाता प्रमिति करता हो, वह प्रमाण है' ऐसा निवेश करने पर अव्याप्ति नहीं होगी। कारण, अनुमिति में चक्षुरादि की व्यावृत्ति होने पर भी चक्षुर्जातीय परामर्श की व्यावृत्ति नहीं होगी । खंडन—परामर्श में चक्षुर्जातीयत्व करणत्व से अन्य कुछ हो नहीं सकता और उस करणत्व का निर्वचन अभीतक हुआ नहीं है। अतः जातीयत्वघटित लक्षण भी असङ्गत है ।
परिच्छेद ] तृतीय करण-लक्षण का खण्डन १६१ तृतीय-करणलक्षण-खण्डनम् अथ यां प्रमां यद्वानैव जनयति, तस्यां तत्करणमिति । मैवम्; कौपीनाच्छाद- नादेरपि करणत्वप्रसङ्गात् । यज्जातिकामिति चेत् , मैवम् । परोक्षत्वजातिकां प्रमां लिङ्गवानेव शब्दवानेव वा जनयतीति नियमाभावात् तस्याकरणत्वप्रसङ्गात् । साक्षात्कारित्वानुमितित्वादयो जातिभेदा विवक्षिता इति चेन्न । प्रत्येकमुपादाने ऽंशाव्याप्तेः । सम्भूयोपादाने सर्वाव्याप्तेः । अनियमेनोपादाने च लक्षणाननुगमापातादिति ! तृतीय करण-लक्षण का खण्डन समर्थन – प्रमाता जिससे युक्त होकर जिस प्रमा को करता है, उस प्रमा में वह करण है । खंडन---यत्किञ्चित् प्रत्यक्षादि प्रमा कौपीन-आच्छादन से युक्त भी प्रमाता करता है, तब तो कौपीन-आच्छादन में करणत्व-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘यज्जातीय प्रमा को यत्-युक्त ही प्रमाता करे, तज्जातीय प्रमा में वह करण है', ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च वह प्रत्यक्षजातीय प्रमा कौपीनादि से रहित भी करता है, अतः कौपीनादि में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—परोक्षजातीय शाब्दरूप प्रमा को लिङ्गपरामर्श से रहित भी प्रमाता करता है, अतः लिङ्गपरामर्श में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—इस लक्षण में परोक्षत्व का निवेश नहीं है, किन्तु प्रत्यक्षत्व, अनु- मितित्व, उपमितित्व और शाब्दत्वरूप जातियों का निवेश है । अतः लिङ्गपरामर्श में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—लक्षण में इन जातियों का किसी भी रूप से निवेश नहीं हो सकता । यदि प्रत्यक्षत्वादि एक का निवेश करें, अर्थात् प्रत्यक्षजातीय प्रमा को जिससे युक्त हो प्रमाता करे, वह प्रमाण है—ऐसा लक्षण करें, तो परामर्श में अव्याप्ति हो जायगी । यदि सम्पूर्ण का निवेश करें, 'अर्थात् प्रत्यक्ष-अनुमिति-उपमिति- शाब्दप्रमाओं को जिससे युक्त होकर प्रमाता करे, वह प्रत्यक्ष प्रमा है,' ऐसा लक्षण करें, तो सम्पूर्ण प्रमा को चक्षुरादि किसीसे युक्त प्रमाता नहीं करता । अतः सर्वत्र असम्भव हो जायगा । यदि 'प्रत्यक्ष प्रमा को जिससे युक्त ही प्रमाता करे, अनुमिति प्रमा को जिससे युक्त होकर प्रमाता करे, अथवा उपमिति आदि स्थलों में विशेषरूप से उपादान करे, वह सब प्रमाण हैं'—ऐसा निवेश करें; तो अनेक लक्षण होने से अननुगम हो जायगा ।
सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम यदभावात् कर्तृकर्मणी क्रियां न जनयतः, तत्करणम् । तेन यदभावात् प्रमातृ- प्रमेये प्रमां न जनयतः, तत्प्रमाणमिति लक्षणमित्यपि न युक्तम् । किं प्रमातृप्रमेये सती यत्र न जनयतः, उताऽसती अपि ? आद्ये अतीतानागतानुमानादिकरणा- व्याप्तिः । नापि द्वितीयः ; प्रमातृप्रमेययोरपि प्रसङ्गात् । यथा हि तत्र चक्षुराद्य- भावात् प्रमा न जायते, तथा प्रमातृप्रमेययोरप्यभावात् ; अन्यथा तयोः कारणत्वमेव न स्यात् । एतेन सामान्यतोऽभिधानं प्रत्युक्तम् । अस्मदादिकर्तृसापेक्षेश्वरलैङ्गे च अस्मदादिज्ञाने अस्मदादिकर्तृकरणतापत्तेः । एवञ्च सति प्रकारभेदेनापि प्रमाण- प्रमात्रादिव्यवस्थासमर्थना कृता न स्यात्, येनैव रूपेण कर्तृत्वादिना तस्य प्रमायामन्वयस्तेनैव तद्व्यतिरेकस्य प्रमानुत्पत्तौ प्रयोजकत्वादिति । समर्थन—‘जिसके अभाव से कर्ता और कर्म क्रिया को उत्पन्न न कर सकें, वह करण है । इसी तरह जिसके अभाव से प्रमाता और प्रमेय प्रमिति को उत्पन्न न कर सके’ वह प्रमाण है, खंडन—क्या प्रमाता और प्रमेय के स्वयं रहते ‘जिसके अभाव से’ इत्यादि अभिप्रेत है अथवा उनके न रहने पर भी ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण अतीतअनागतविषयक अनुमितिस्थल में सत् प्रमेय प्रमिति का जनक नहीं होता । अतः वहां अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, कारण कर्ता प्रमाता प्रमेय या कर्म अपने अभाव में भी प्रमा को नहीं कर सकते । अतः प्रमाता और प्रमेय में अतिव्याप्ति हो जायगी । जैसे चक्षुरादि के अभाव में प्रमा नहीं होती, वैसे ही प्रमाता और प्रमेय के अभाव में वह नहीं होती । अन्यथा वे कारण ही नहीं कहे जायेंगे । जैसे कर्ता कर्तृत्वरूपसे क्रिया का कारण है, वैसे ही कर्तृत्वरूप से कर्ता का अभाव भी क्रिया के अभाव का प्रयोजक है । समर्थन – सत्त्व, असत्त्व का निवेश न कर सामान्य रूप से ‘प्रमाता और प्रमेय जिसके अभाव से प्रमा को न कर सकें, वह करण है’ यह लक्षण करेंगे । खंडन—इस सामान्यलक्षण में भी कर्ता और कर्म ‘स्व’ के बिना भी प्रमा को नहीं करते, अतः कर्ता और कर्म में ही अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—हम लोग अपने चाक्षुषादि ज्ञान में स्वयं करण हो जायेंगे, कारण ईश्वर हम लोगों द्वारा ही ज्ञान को उत्पन्न करता है, हम लोगों के बिना नहीं । किञ्च—‘जिसके बिना क्रिया न हो’, यह जैसे ‘करण’ का लक्षण हो सकता है, वैसे ही कर्ता और कर्म का भी लक्षण हो सकता है । अतः यदि करण का उक्त लक्षण करें, तो प्रवृत्तिनिमित्त के भेद से कारकों का परस्पर भेद न हो सकेगा ।
परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन चरम-व्यापारवत्त्व-खण्डनम् चरमव्यापारवत्त्वं करणत्वमित्यपि न; व्यापाराभावात् लिङ्गपरामर्शस्याकरण- त्वापातात् । न च सविकल्पकव्यापारवतो निर्विकल्पकस्य तत्र प्रामाण्यम्; केवल- विकल्पनीयलिङ्गविषये तदनुपपत्तेः । संस्कारादिपर्यन्तानुसरणे चानुमितेस्त- ज्जन्यत्वे प्रमाणाभावात्, कार्यहितोश्च कारकाव्यापारत्वात्, अपि चाज्ञातकरण- त्वापातात् । न च लिङ्गमेव परामर्शव्यापारवत्तया करणमिति युक्तम्; अनुमितानुमानादौ परामर्शस्यालिङ्गजत्वेन तद्व्यापारत्त्वानुपपत्तेः । आप्तोक्त्यादिभिः 'तत्रासी- चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन समर्थन—चरम व्यापार जिसमें हो, वह करण है। खंडन—लिङ्गपरामर्श में व्यापार न होने से वह करण न कहा जायगा । समर्थन—सविकल्पक लिङ्गपरामर्शरूप व्यापार होने से निर्विकल्पक लिङ्गपरामर्श ही करण है। खंडन—जिन नित्यसाकाङ्क्ष अभाव, समवाय आदि का निर्विकल्पक ज्ञान होता ही नहीं, वे पदार्थ जहां लिङ्ग हों, वहां करणत्व का अभाव हो जायगा । समर्थन—स्वजन्य संस्कार या 'स्व' का ध्वंस ही लिङ्गपरामर्श का व्यापार क्यों न माना जाय ? खंडन—केवल स्वजन्यत्व व्यापार का लक्षण नहीं है; किन्तु स्वजन्य होकर जो स्वजन्य का जनक हो वही व्यापार है। संस्कार या ध्वंस के अनुमिति- कारणत्व में कुछ प्रमाण नहीं है। अतः संस्कार या ध्वंस व्यापार नहीं हो सकता । किञ्च—यदि ध्वंस या संस्कार को उनका व्यापार मानें, तो उनके अतीन्द्रिय होने से ध्वंसादिविशिष्ट परामर्शरूप करण भी अतीन्द्रिय हुआ। फलतः अनुमिति अज्ञातकरणक हो जायगी । समर्थन—धूम आदि लिङ्ग ही परामर्शरूप व्यापार होने से करण हैं। खंडन—'महत्त्वं क्वचित् प्राप्तकाष्ठाकम् , धर्मत्वात्' इस प्रकार अनुमित परममहत्त्व से जहाँ 'आकाशः सर्वगतः परममहत्त्वात्' इस रीति से आकाश में सर्वगतत्व की अनुमिति करते हैं, वहाँ परममहत्त्व स्वविषयक परामर्श का अजनक होने से करण न होगा। कारण, पारिमाण्डल्य, परममहत्त्व आदि स्वविषयक ज्ञान के भी कारण नहीं होते तथा प्रत्यक्ष से अन्य ज्ञान में विषय भी कारण नहीं होते। किञ्च—आप्त की उक्ति से 'वहाँ धूम था' २५
१६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम धूमः' इति प्रतीत्य 'तदा तत्र वह्निरप्यासीदि'ति यदनुमानं तत्रासत्त्वात् धूमस्य परामर्शव्यापारवत्तया करणताया दूरनिरस्तत्वात् । किञ्च-यत्किञ्चिदपेक्षया चरमव्यापारवत्त्वस्य सर्वकारकसाधारणात्, सर्वकारकापेक्षया चरमव्यापारवत्त्वस्य स्वापेक्षया चरमत्वानुपपत्त्या सर्वत्रासिद्धेः । कर्त्रपेक्षयेति चेन्न । कर्तृ धर्मिमात्रामपेक्षया विवक्षितत्वे कर्तरि प्रसङ्गतादवस्थ्यात्, व्यापारवत्कर्त्रपेक्षाभिप्राये च कर्तरि स एव प्रसङ्गः । एकव्यापारवत्कर्त्रपेक्षया अपरापरकर्तृव्यापारस्य चरमभावित्वात् । यावद्व्यापारवत्कर्त्रपेक्षापत्तौ तु विवक्षितमपि करणं न स्यात्, आफलसिद्धेः कर्तृव्यापाराविरामात् । व्यापारस्य विच्छेदे तद्धेतुत्वलक्षणक्षीणतापत्तेः । यद्व्यापारानन्तरं कारकान्तरं न व्याप्रीयते, तत् चरमव्यापारमिष्टमिति चेन्न । यह जानकर जहाँ 'तब तो वहाँ वह्नि भी था ही' इत्याकारक जो अनुमिति होती है, उस अनुमिति में धूम के अविद्यमान होने से धूम में परामर्शरूप व्यापारवत्त्व न होने के कारण करणत्व न हो सकेगा। किञ्च-व्यापार में चरमत्व यदि किञ्चित् व्यापार की अपेक्षा विवक्षित हो, तो सभी कारकों के व्यापारों में यत्किञ्चित् की अपेक्षा चरमत्व होने से कारकमात्र में अति- व्याप्ति हो जायगी। यदि सभी कारकों के व्यापार की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो स्व में स्व की अपेक्षा चरमत्व न होने से सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी। अथवा यदि कर्ता की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो वह चाहे धर्मिमात्र की अपेक्षा विवक्षित हो या व्यापारवत् धर्मी की अपेक्षा, उभयथा कर्ता में अतिप्रसङ्ग हो जायगा। कारण, कर्ता की अपेक्षा या यत्किंचित् व्यापारवत् कर्ता की अपेक्षा अपर कर्तृव्यापार चरम ( उत्तर ) है ही। यदि यावद्व्यापारवत् कर्ता की अपेक्षा चरमत्व की विवक्षा करें, तो कुठारादि भी करण न हो सकेंगे, कारण फल की सिद्धिपर्यन्त कर्ता के व्यापार का विराम नहीं होता । यदि कहें कि करण के व्यापार उत्पन्नकर कर्तृव्यापार निवृत्त हो जाता है, तो करण-व्यापार में चरितार्थ कर्ता प्रधान क्रिया में [ घट में कुलालपिता के तुल्य ] कारण ही न हो सकेगा। समर्थन-जिस व्यापार के अनन्तर अन्य कारक का व्यापार न होता हो, वह चरम व्यापार है। खण्डन-ईश्वरवादी के मत में फलसिद्धिपर्यन्त ईश्वररूप कर्ता के व्यापार का विराम न होने और ईश्वर के व्यापार के अनन्तर अन्य व्यापार न होने
परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन १६५ सेश्वरपक्षे कर्तृव्यापाराविरमात्, तदानन्तर्यासिद्धेस्तत्करणत्वापातात् । अनीश्वर- पक्षे चाक्षसंयोगादिभिरेव सव्यापारे कर्मण्यपि प्रसङ्गात् । छेद्यादेर्हि करणसंयोगादि- व्यापारश्चरम एवेति कुतस्तद्व्यवच्छेदः, हस्ताद्यव्याप्तेश्चेति । अनन्तरफलं करणमित्यपि न । अविशेषितानन्तर्यस्य सर्वकारणसाधारण्यात् । अव्यवहितानन्तर्यस्य व्यापार्यपेक्षस्य यागाद्यव्यापनात् । व्यापारापेक्षस्य च हस्ता- द्यव्यापनात् । व्यापारपरम्परापेक्षस्य सर्वकारकव्यापनात् । किञ्च तत्कार्यो यदि क्रियाहेतुस्तद्व्यापार इष्टः, तदा इन्द्रियकार्यो लिङ्गपरा- मर्headerर्शोऽनुमितिक्रियाहेतुरिति इन्द्रियकरणिकाऽनुमितिः प्राप्ता । से ईश्वर का व्यापार चरम व्यापार है, अतः ईश्वर को करणत्व हो जायगा । अनीश्वर- वादी के मत में विषयेन्द्रिय-सन्निकर्षरूप व्यापार जैसे इन्द्रिय में है, वैसे ही विषय (कर्म) में भी है । अतः कर्म भी करण हो जायगा । काष्ठ-कुठार-संयोगरूप यापार जैसे कुठार में है, वैसे ही काष्ठ में भी है । अतः काष्ठ का व्यवच्छेद कैसे होगा ? किञ्च— हस्त-व्यापार के अनन्तर भी वह्न्यादि का व्यापार होता ही है, अतः हस्त-व्यापार चरम न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस कुठारादि के व्यापार के अनन्तर (उत्तर) छिदादि फल होते हों, वह करण है ।' खंडन—यदि अव्यवहित विशेषण से रहित अनन्तरमात्र की विवक्षा करें, तो कर्ता, कर्म आदि के अनन्तर भी फल होने से वे भी करण हो जायेंगे । यदि अव्यवहित अनन्तर की या व्यापारी की अपेक्षा आनन्तर्य की विवक्षा करें, तो क्रियाकलापरूप याग में अव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसके अव्यवहित उत्तरक्षण में फल नहीं होता, किन्तु कालव्यवधान से होता है । यदि व्यापार की अपेक्षा आनन्तर्य की विवक्षा करें, तो हस्त में अव्याप्ति हो जायगी, कारण वहाँ शर के व्यापार से व्यवधान है । यदि कहें कि हस्तव्यापार से प्रयोज्य होने के कारण शर का व्यापार भी हस्त का ही व्यापार है और उस व्यापारपरम्परा से अनन्तर फल होता है, अतः अव्याप्ति नहीं होगी, तो कर्तादि के व्यापार से प्रयोज्य होने के कारण और उस व्यापारपरम्परा के कर्तृव्यापार होने से कर्ता में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'जो जिससे जन्य हो तथा प्रधान क्रिया का जनक हो, वह उसका व्यापार है'—यदि ऐसा व्यापार का लक्षण करें, तो लिङ्गपरामर्श इन्द्रियजन्य है तथा अनुमिति- रूप क्रिया का जनक है, अतः लिङ्गपरामर्श इन्द्रिय का व्यापार हो जायगा और इन्द्रियाँ भी अनुमिति की करण हो जायँगी ।
१६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ हेतोः सतः कार्यः क्रियाहेतुस्तद्व्यापारः, तथा सति अनुमित्यहेतोरिन्द्रियस्य कुतः करणत्वं स्यादिति । मैवम् ; किं तद्धेतुत्वं यन्नास्त्यनुमितौ इन्द्रियस्य । नियतपूर्वभावित्वमिति चेत् ; अस्ति तावत् पूर्वभावित्वम् । नियतत्वमपि यदि कारणतायां प्रयोजकमिच्छसि, तदा भवतैव यतितव्यं केनचिद्रूपेणेन्द्रियादेर्नियतत्वं प्रति । अन्यथा लिङ्गेन्द्रियादेः परस्परव्यभिचारादकरणिकैव प्रमा स्यात् । मनःसंयोगादेरेव तथात्वे चाऽप्रमासाधारण्यम् । अपि चाक्षादेरकरणत्वापातः ; यत्सामान्ये यत्सामान्यं प्रयोजकं तद्विशेषस्यैव तद्विशेषे प्रयोजकत्वनियमदर्शनात् । ततो येन केनापि रूपेणेन्द्रियस्य प्रमायां नियतत्वमुपपाद्यते तेनैव रूपेण प्रसङ्गोपपत्तिः । समर्थन—'उस क्रिया का हेतु होकर उससे जो जन्य हो तथा उस क्रिया का जो हेतु हो, वह उस क्रिया का व्यापार है'—ऐसा लक्षण करेंगे। एवञ्च इन्द्रिय अनुमितिरूप क्रिया का हेतु नहीं है, अतः लिङ्गपरामर्श इन्द्रिय का व्य पार नहीं और न इन्द्रिय ही अनुमिति की करण है। खंडन—वह हेतुत्व क्या है, जो अनुमिति में इन्द्रिय को नहीं है ? समर्थन—नियम से पूर्ववृत्तित्व ही वह है, इन्द्रिय अनुमिति में नियम से पूर्व- वर्ती नहीं है। खंडन—जहां 'वह्निव्याप्यो धूमः, तद्वांश्च अयं पर्वतः' इत्याकारक प्रत्यक्ष-ज्ञानरूप परामर्श होता है, वहां इन्द्रिय अनुमिति से पूर्ववर्ती तो अवश्य है। रहा नियम से रहना। यदि उसे भी कारणत्व का प्रयोजक मानना चाहते हों, तो आपको ही यत्न करना चाहिए कि किसी रूप से इन्द्रिय नियतपूर्ववर्ती हो। अर्थात् 'प्रमां प्रति प्रमाणं कारणम्' ऐसा कार्यकारणभाव होने से प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय भी प्रमात्वरूप से अनुमिति के नियतपूर्ववर्ती ही है। अन्यथा (यदि सामान्यरूप से कार्यकारणभाव न मानें तो) परस्पर व्यभिचार होने से इन्द्रियादि करण न कहलायेंगे, अर्थात् प्रमा करणरहित हो जायगी। 'आत्म-मनःसंयोग ही प्रमा का करण है, अतः प्रमा करणरहित नहीं होगी', ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि आत्म-मनःसंयोग अप्रमा का भी करण है। किञ्च—यदि 'प्रमां प्रति प्रमाणं कारणम्' ऐसा सामान्यरूप से कार्यकारणभाव न मानें, तो 'प्रत्यक्षप्रमां प्रति इन्द्रियप्रमाणं कारणम्' ऐसा विशेष कार्यकारणभाव भी नहीं मान सकते। कारण, जिस सामान्य की 'जिस सामान्य में कारणता होती है, उस विशेष की ही उस विशेष में कारणता होती है' ऐसा नियम है। तस्मात् आप जिस प्रमाणत्व रूप से इन्द्रिय के [ प्रमा में ] कारणत्व का उपपादन करेंगे, उसी प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय के करणत्व का अनुमिति के प्रति हम भी प्रसञ्जन करेंगे ।
५ परिच्छेद ] चरम-व्यापारवत्त्व का खण्डन १६७ अथ प्रमात्वे तत् प्रयोजकम्, न त्वनुमितित्वादाविति चेन्न । निरुपाधित्वा- विशेषेणोक्तार्थानधिक्यात् । सामान्यप्रयोजकत्वेन विशेषत्यागानवकाशादिति । अन्यथा व्यक्तेरकारणकत्वापत्तेः । अथान्यत्रास्तु यद्वा तद्वा करणम् प्रमाविवक्षितजातिविशेषव्यपदेशकं प्रमा- णम् । चतस्रः खल्विमाः प्रत्यक्षादिप्रमितयो भिन्नव्यपदेशभाजः । न च प्रमाता प्रमेयं वा तद्धेतुः, प्रमाणानि तु यथायथं चतसृष्वसाधारणानीति भिन्नबुद्धि- व्यपदेशनिबन्धनानीति । मैवम्; विवक्षितपदं तावल्लक्षणे भण्डालेख्यमिव, पुरुषेच्छानामनियतविषय- त्वात् । अर्थजत्वस्य च साक्षात्कारित्वं प्रति इन्द्रियजत्वाविशिष्टतया अर्थस्यापि समर्थन—प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय प्रमा का प्रयोजक है, अनुमिति का प्रयोजक नहीं । खण्डन—यदि प्रमाणत्वरूप से इन्द्रिय का प्रमा में निरुपाधिक (नियत) सम्बन्ध है, तो प्रमाविशेष (अनुमिति) में है ही। अतः आपने उक्त अर्थ से अधिक कुछ नहीं कहा । कारण, जब इन्द्रियाँ प्रमासामान्य की प्रयोजक हैं तो उनके प्रमाविशेष के प्रयोजकत्व का त्याग नहीं हो सकता। अन्यथा विशेष व्यक्ति अकारणक हो जायगी। अर्थात् तन्तुत्वाक्रान्त तन्तु पटव्यक्ति के प्रति अप्रयोजक हो जायगा । समर्थन—प्रमा से अन्यत्र छिदादि क्रियाओं में करण का जो भी कोई लक्षण करें । प्रस्तुत प्रमास्थल में तो करण का यही लक्षण करेंगे कि 'प्रमा में विवक्षित प्रत्यक्षत्व, अनुमितित्वादि जातियों के व्यवहार या बुद्धि का जो हेतु हो, वह प्रमाण (प्रमिति का करण) है।' देखिये—चार प्रकार की प्रत्यक्षादि प्रमाएँ भिन्न-भिन्न व्यपदेश या बुद्धि की विषय होती हैं। प्रमाता या प्रमेय इस भेद के कारण नहीं हैं; किन्तु इन्द्रिय, परामर्श आदि ही यथायोग्य चारों प्रमितियों में असाधारण हेतु हैं। अतः वे ही भिन्न-बुद्धि या भिन्न-व्यपदेश के कारण हो सकते हैं । खण्डन — लक्षण में 'विवक्षित' पद भण्डालेख्यवत् है, क्योंकि पुरुष की इच्छाएँ अनियतविषयक हुआ करती हैं। अर्थात् किसीके सन्तान-विशेषविषयक प्रश्न करने पर कोई भण्ड (धूर्त) 'पुत्रो न पुत्री' कह देता है। वहाँ नञ् का पुत्र या पुत्री दोनों में अन्वय हो सकने से जिस प्रकार सन्तान-विशेष का निश्चय नहीं हो पाता, उसी प्रकार यहाँ भी विवक्षित वस्तु का निश्चय न हो सकने से यह लक्षण नहीं बन सकता । किञ्च—जैसे इन्द्रियाँ प्रत्यक्षप्रमात्व-व्यवहार की हेतु हैं, वैसे अर्थ (विषय) भी हैं। इसी तरह जैसे शब्द शाब्द-व्यवहार का हेतु है, वैसे ही आप्तवक्ता भी है। अतः
१६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम करणत्वप्रसङ्गात् । आप्तोक्तौ तु कर्तुरपि शाब्दप्रमाजातिविशेषकत्वेन आप्तेप्रसङ्गात्, ओमित्युत्तरे च पूर्वमेवोक्तमिति । विवक्षितजातिभेदौपयिकत्वेन प्रमित्यसमवायिकारणविशेषकं प्रमाणमित्यपि अत एव प्रयुक्तम् । प्रथम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् एवं विशेषतोऽपि प्रमाणलक्षणानि प्रतिवक्तव्यानि । तथा हि—प्रत्यक्षमिन्द्रि- यार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यभिचारीत्याहुः । किमर्थमिदमुच्यते, किं सजातीय- विजातीयव्यवच्छिन्नतत्प्रतीत्यर्थम्, उत साक्षात्कारित्वप्रतीतये तच्चिह्नोपदर्शन- मिदम्, उत व्यवहारार्थम्, उत प्रत्यक्षादिशब्दप्रवृत्तिनिमित्तावधारणार्थम्, उत अन्यत्किञ्चिदर्थमेव ? अर्थरूप कर्म तथा आप्तरूप कर्ता भी प्रमाण होने लगेंगे । किन्तु कहीं भी कर्म और कर्ता में करणत्व-व्यवहार कभी नहीं होता । अतः आप यह स्वीकार नहीं कर सकते । समर्थन—विवक्षित प्रत्यक्षत्वादि जातिभेदों के उपायभूत होने से प्रमिति के असमवायी कारण आत्ममनःसंयोग के विशेषक ( अप्रमास्थल से व्यावर्तक ) इन्द्रिय, परामर्शादि प्रमाण हैं । खण्डन—'विवक्षित' पद से घटित होने से यह लक्षण भी भण्डालेख्य के तुल्य ही है । किञ्च—प्रत्यक्षस्थल में अर्थ तथा शाब्दस्थल में आप्त भी असमवायी कारण के विशेषक प्रमाण हो जायँगे । प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन इस रीति से प्रमाणविशेष के लक्षण भी खण्डनीय हैं । देखिये—'इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष (सम्बन्ध) से उत्पन्न तथा अर्थ से अव्यभिचारी ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है' ऐसा प्रत्यक्ष का लक्षण न्यायसूत्रकार ने किया है । किन्तु प्रश्न है कि आखिर यह लक्षण किसलिए किया—क्या सजातीय ( सदृश ), और विजातीय ( असदृश ) से व्यावृत्त ( भेदयुक्त ) लक्ष्य के स्वरूपज्ञान के लिए लक्ष्यभूत प्रत्यक्ष के ज्ञानार्थ चिह्न-हेतु- प्रदर्शन के लिए, व्यवहार के लिए, प्रत्यक्ष, साक्षात्कारी आदि शब्दों के प्रवृत्तिनिमित्त ( शक्यतावच्छेदक ) के प्रदर्शन के लिए अथवा अन्य ही किसी प्रयोजन के लिए ? )
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन १६६ तत्र नाद्यः । तथा हि—किं सजातीयेति प्रत्यक्षत्वेन साजात्यमपेक्षितम्, रूपा- न्तरेण वा ? नाद्यः ; तस्माद् व्यवच्छेदावधेः सजातीयाद्व्यावृत्तत्वेन व्यवच्छेद- कत्वानुपपत्त्या व्यावृत्तत्वस्वीकारेण अव्यापकत्वात् । नापि द्वितीयः ; विजातीय- पदोपादानवैयर्थ्यात् । अस्ति हि प्रमेयत्वादिना सर्वसाजात्यम् । अथ प्रमाणत्वादिना विशेषेण साजात्यं विवक्षितंवेदमुच्यते; तर्हि लक्ष्य- स्यापि प्रमाणत्वेन साजात्याद् व्यवच्छेद्यकोटिप्रविष्टतया सङ्ग्राह्याभावप्रसङ्गः । लक्ष्यस्य यत्प्रमाणत्वादिभिः सजातीयं तद्व्यवच्छेद्यम् । न च लक्ष्यस्य लक्ष्यं सजातीयम् षष्ठ्यर्थस्य भेदव्यवस्थितत्वादिति चेत्; एवं तर्हि लक्ष्यापेक्षया भिन्नात् व्यवच्छेद इत्येवोच्यताम्, कृतं प्रमाणत्वादिना साजात्येन प्रकृतानु- पयोगिना वर्णितेन ? यद्वा च लक्ष्यादन्यत्वं परेषामवगतं तदा परस्मादन्यत्वमपि लक्ष्यस्यार्थादवगम्यत इति सिद्धमग्रत एव लक्षणप्रयोजनमिति वैयर्थ्यमेव स्यात् लक्षणाख्यानस्येति । इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है । देखिये—सजातीयत्व ( सादृश्य ) प्रत्यक्षत्वरूप से इष्ट है या रूपान्तर से ? यदि प्रत्यक्षत्वरूप से साजात्य लें, तो उस व्यवच्छेद के अवधिभूत सजातीय प्रत्यक्ष से व्यवच्छेद ( भेद ) न हो, तो लक्षण न होगा । यदि सजातीय से व्यवच्छेद हो, तो जिस सजातीय से व्यवच्छेद होगा, उसमें लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि अन्यरूप से साजात्य लें, तो विजातीय पद व्यर्थ होगा । कारण, प्रमेयत्वरूप से तो प्रत्यक्ष के सभी सजातीय ही हैं । समर्थन—प्रमाणत्व आदि धर्म से साजात्य की विवक्षाकर विजातीय पद का उपादान करेंगे । खण्डन—प्रत्यक्ष भी प्रमाणत्वरूप से सजातीय है । अतः लक्ष्य की भी व्यावृत्ति होने से संग्राहा ( लक्ष्य ) का अभाव हो जायगा । समर्थन—लक्ष्य से जो प्रमाणत्वरूप से सजातीय हो, वह व्यवच्छेद्य है । लक्ष्य लक्ष्य का सजातीय नहीं है, कारण सादृश्य भेद में ही होता है । अतः 'स्व' में स्व का सादृश्य नहीं होता । खंडन—यदि ऐसा है, तो 'लक्ष्य से जो भिन्न हो, उससे व्यवच्छेद के लिए लक्षण है' इतना ही कहें, प्रकृत में अनुपयोगी प्रमाणत्व आदि से साजात्य की विवक्षा व्यर्थ है । यदि लक्ष्य से अन्यत्व पर में अवगत है, तो पर से अन्यत्व भी लक्ष्य
२०० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अस्तु वा विवक्षावैचित्रीवशात् कथमपीदृशमभिधानम् ; तथापि न तावदनेन लक्षणेनानवगतेनैव व्यवच्छिन्नप्रतीतिसम्भवः ; अतिप्रसङ्गात् । नापि ज्ञातेन ; दुरवधारणत्वात् । तथा हि—न तावदिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पत्तिः , प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्ष- विशेषणत्वात् । नापि कार्येण लिङ्गेन तदुपपत्त्या वा तदवगमः ; ताभ्यां सामान्यतः कारणमात्राक्षेपेण कारणगतानुगतरूपासिद्धौ एकरूपलक्षणासिद्धेः । कार्यस्यैकजात्यात् एकजातीयकारणसिद्धिरिति चेत् ; तर्हि कार्यगतैकजात्यस्य में अवगत ही है। अतः लक्षण करने से पहले ही लक्षण के प्रयोजन व्यावृत्ति की- सिद्धि होने से लक्षण करना व्यर्थ हो जायगा । समर्थन—जैसे घट से पट के अन्यत्व के अज्ञानकाल में भी पट से अन्यत्वरूप से घट का प्रत्यक्षज्ञान होता है, वैसे ही लक्ष्य से अन्यत्वरूप से अज्ञात अलक्ष्य से अन्यत्वरूप से लक्ष्य का ज्ञान लक्षणरूप व्यतिरेकी हेतु से हो सकता है, अतः लक्षण व्यर्थ नहीं है। खण्डन—इस रीति से यदि आप कथञ्चित् विवक्षा-वैचित्र्य अर्थात् लक्ष्य से भिन्न लक्ष्य की व्यावृत्ति या सजातीय विजातीय, लक्ष्य से लक्ष्य की व्यावृत्ति के लिए लक्षण की सार्थकता कहें, तो वह भी युक्त नहीं है। कारण, अज्ञात लक्षण से इतरव्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि अज्ञात लक्षण से इतर-व्यावृत्तत्व- रूप से लक्ष्य की प्रतीति हो, तो सर्वदा व्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य की प्रतीति होनी चाहिए, पर वह होती नहीं। ज्ञात लक्षण से भी इतरव्यावृत्तत्वरूप से लक्ष्य की प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि लक्षण का ज्ञान इन्द्रियरूप अतीन्द्रिय पदार्थ से घटित होने से वह चक्षुरादि इन्द्रियों से हो नहीं सकता । कार्यरूप लिङ्ग से या कार्य की अनुपपत्ति से भी लक्षण का ज्ञान संभव नहीं, क्योंकि कार्य से कारणमात्र की अनुमिति या आक्षेप करें, तो भी कारणगत अनुगतरूप की असिद्धि होने से एकरूप लक्षण भी असिद्ध ही होगा । समर्थन—प्रत्यक्षरूप कार्य एकजातीय है, अतः उससे एकजातीय इन्द्रियार्थों के सन्निकर्षरूप कारण का आक्षेप संभव होने से वही लक्षण हो जायगा। खंडन—यदि ऐसा है, तो कार्यगत ऐकजात्य साक्षात्कारित्व का प्रथम ज्ञान अवश्य मानेंगे। उसीसे सजातीय- विजातीय-व्यावृत्त लक्ष्य की प्रतीति हो जायगी। अतः यह परम्परा-कुसृष्टि ( साक्षात्का-
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०१ पूर्वमवश्यं प्रत्येत्तव्यत्वाङ्गीकारे तत एव सजातीयविजातीयव्यवच्छेदप्रतिपत्तिरस्तु, कृतमनया पारम्पर्यकुसृष्ट्या । नन्वेतावताऽपि न प्रकृतलक्षणखण्डनं भवति, अव्याप्तेरतिव्याप्तेर्वाऽनुद्भावनात् । मैवम्; प्रथमभावितयाऽवश्यानुष्ठेयतया च लघोरुपायात् साध्यसिद्धौ सम्भवन्त्यां चरमभावितयाऽवश्यानुष्ठेयत्वाभावेन च गुरुपाये प्रवर्तमानस्य तवैवेदं दोषोद्भावनं प्रदीपे प्रदीपान्तरं प्रज्वाल्य तमोनाशाय यतमानस्येव पुंसः। न हि तस्य दीपा- न्तरस्य कश्चिद्दोषः , किन्तु तथाकारी पुरुष एव पर्य्यनुयोज्यः । सर्वसाधनसाधा- रणोऽयं वा दोषो यत्सम्भवदेवंविधलघूपायत्वं नाम, स्वरूपासिद्धिरिव सर्व- प्रमाणानाम् । तस्मान्मा नाम भूदतिव्याप्त्यादिदोषः , सामान्यदोषादेवेदं लक्षणं दुष्टमिति । रित्व के ज्ञान से इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व का ज्ञान और उससे सजातीय-विजातीय की व्यावृत्ति ) की कल्पना व्यर्थ है । समर्थन—इससे भी इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप लक्षण का खण्डन नहीं होता, क्योंकि आपने लक्षणमें अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि कोई दोष तो दिया ही नहीं । खण्डन—कार्यगत ऐकरूप्य साक्षात्कारित्व ( इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व ) का अनुमापक होने से पूर्व में ज्ञेय तथा अवश्य स्वीकारणीय है और कारणगत ऐकरूप्य अनुमेय होने से पश्चात् ज्ञेय है। सिवा इसके कार्यगत वैरूप्य से ही व्यावृत्तिरूप स्वकार्य की सिद्धि होने से वह अवश्य स्वीकर्त्तव्य भी नहीं है। अतः जब लघु उपाय से कार्य की सिद्धि हो रही हो, तो गुरु उपाय में आपकी प्रवृत्ति गौरव दोषयुक्त ही कही जायगी । जैसे—समीप में एक प्रदीप के प्रज्वलित रहते तमोनाश के लिए दूरस्थ अन्य प्रदीप के प्रज्वालन में यत्न करनेवाले पुरुष का उद्योग गौरव दोष से युक्त होता है, वैसी ही स्थिति यहाँ भी है। प्रस्तुत दृष्टान्त में अन्य प्रदीप का कुछ दोष नहीं, किन्तु एक प्रदीप के रहते भी अन्य प्रदीप के लिए उद्योगकारी पुरुष का ही दोष है। जैसे स्वरूपासिद्धि सर्वप्रमाण-साधारण दोष है, वैसे ही लघु उपाय होते हुए भी गुरु उपाय का अवलम्बन भी सर्वसाधन-साधारण दोष है। तस्मात् अतिव्याप्ति आदि दोष न होने पर भी गौरवरूप दोष से यह लक्षण दुष्ट ही है । २६
२०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम एतेन द्वितीयोऽपि निरस्तः, साक्षात्कारित्वावगममन्तरेण तदवगमानुपपत्तेः । तदवगमाच्चास्य प्रतीतावन्ग्योन्याश्रयप्रसङ्गः । अस्तु वा अन्यदपि किञ्चिदिन्द्रियजत्वे लिङ्गम्, तथापि तदेव साक्षात्कारित्वा- विनाभूततया प्रत्यक्षलक्षणमुपन्यस्यतां सन्निहितप्रतिपत्तिकत्वात् । न च तदवश्यं व्यापकं वक्तव्यम्, लिङ्गस्य तद्व्याप्यत्वेनैवोपपत्तेरिति चेन्न । यत्र लिङ्गमव्यापकत्वान्नास्ति तत्रेन्द्रियजत्वस्य प्रमाणाभावात् प्रत्त्येतुमशक्यत्वेन कथं ततः साक्षात्कारित्वावगमः । यदा च क्वचित्प्रत्यक्षजातीय एव प्रमाणा- भावादिन्द्रियजत्वमनवधारणीयतया साक्षात्कारित्वव्यापकत्वेनानवगतमपि लक्षणम्, तदा किमपराद्धं लिङ्गान्तरेणाव्यापकेन । 'साक्षात्त्व के अनुमितिरूप ज्ञान के हेतु-प्रदर्शन के लिए लक्षण है' यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है । कारण, ज्ञात हेतु ही अनुमिति का कारण होता है और हेतु का प्रत्यक्षात्मक ज्ञान पूर्वोक्त रीति से हो नहीं सकता । यदि साक्षात्कारित्व से लक्षणरूप हेतु की अनुमिति करें, तो उक्त लक्षणरूप हेतुज्ञान से साक्षात्कारित्व की अनुमिति और साक्षात्त्व के ज्ञान से उक्त हेतु का ज्ञान होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । समर्थन—साक्षात्त्व से उक्त लक्षणरूप हेतु की अनुमिति नहीं होती; किन्तु अपरोक्षव्यवहारहेतु ज्ञानत्वरूप हेतु से होती है। अतः अन्योन्याश्रय नहीं है। खंडन—तब साक्षात्कारित्व का व्याप्य अपरोक्षव्यवहारहेतु-ज्ञानत्व ही लक्षण हो, कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप हेतुज्ञान के लिए वह प्रथम ज्ञेय है । समर्थन—लक्षण लक्ष्य का अवश्य व्यापक होता है । अतः प्रत्यक्ष का व्यापक होने से इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व ही लक्षण है । अपरोक्ष-व्यवहारहेतु-ज्ञानत्व लक्ष्य का व्यापक नहीं है, कारण 'ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' इस स्थल में तृण का त्वाच-प्रत्यक्ष होने पर भी अपरोक्षव्यवहार नहीं होता । प्रत्युत वह व्याप्य है और व्याप्य ही हेतु होता है । अतः अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व उक्त लक्षण का अनुमापक हेतु ही है, प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं। खंडन—जहां उपेक्ष्य तृणादि-ज्ञान में अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्वरूप हेतु के न होने से इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व का अवगम नहीं होता, वहां उक्त हेतु से साक्षात्कारित्वरूप लक्ष्य का अवगम कैसे होगा ? किञ्च—जब उपेक्ष्य तृणादि के त्वाच- प्रत्यक्ष में ज्ञापक हेतु के न होने से साक्षात्कारित्व के व्यापकत्वरूप से अनवगत भी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व लक्षण हो सकता है, तब अव्यापक अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व का क्या अपराध है कि वह लक्षण न हो । कारण, अज्ञात-दशा में व्यापकत्व भी अकिञ्चित्कर है।
परिच्छेद ] प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन २०३ अथ यत्र तदिन्द्रियजत्वे लिङ्गं नास्ति तत्र लिङ्गान्तरात्तत्प्रत्येतव्यम् । तथापि तदेवास्तां साक्षात्कारित्वे लिङ्गम्, कृतमिन्द्रियजत्वानुमानपूर्वकतदनुमानकल्पनया। अथ तथा लिङ्गद्वयं तत् प्रत्येकमव्यापकतया न लक्षणम्, इन्द्रियजत्वन्तु तथात्वात् लक्षणमिति चेन्न । साक्षात्कारित्वानुमानस्य लक्षणप्रयोजनस्योभाभ्यामेव सिद्धेः कृतं व्यापकेन तेन । नापि तृतीयः ; स ह्येवंरूपो यदिन्द्रियार्थसन्निकर्षजनितं तत्प्रत्यक्षमिति व्यवह- र्तव्यमिति। अयमप्यर्थोऽनुपपन्नः ; लक्षणस्य ज्ञातुमशक्यत्वात् । साक्षात्कारित्वा- त्तदवगमे साक्षात्कारित्वमेवास्तु व्यवहारनियमनिदानम्, अव्यवहितप्रतिपत्तिकत्वा- दित्यावेदितम् । अत एव न चतुर्थः , कल्पनागौरवदोषाधिकः । समर्थन—जिस स्थल में अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व नहीं है, वहाँ अन्य लिंग ( सविशेषार्थप्रधानत्व ) से इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व की अनुमिति होगी । खण्डन-तब तो सविशेषार्थप्रधानत्व ही साक्षात्कारित्व का साक्षात् हेतु हो, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्व की अनुमिति द्वारा साक्षात्त्व की अनुमिति व्यर्थ है । समर्थन-अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व तथा सविशेषार्थप्रधानत्व प्रत्येक में अव्यापक हैं। अर्थात् अपरोक्ष्यव्यवहारहेतुत्व उपेक्ष्य तृण के त्वचा में तथा सविशेषार्थप्रधानत्व 'प्रमेयवत्त्वम्' इत्याकारक प्रत्यक्ष में अव्यापक है । अतः वे लक्षण नहीं हो सकते । किन्तु इन्द्रियजत्व ही व्यापक होने से लक्षण है । खंडन—लक्षण का प्रयोजन साक्षात्कारित्व का ज्ञान होना है। वह ज्ञान दोनों से हो जायगा, फिर व्यापक इन्द्रियार्थसन्निकर्षजत्वरूप लक्षण व्यर्थ ही है । 'साक्षात्कारिप्रमिति प्रत्यक्षस्वरूप से व्यवहर्तव्य है, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होने से' यह तृतीय कल्प भी अयुक्त है । कारण, उक्त लक्षण का ज्ञान ही नहीं हो सकता । यदि साक्षात्कारित्वरूप कार्यगत ऐक्यरूप से उक्त लक्षण की अनुमिति करें, तो अच्छा है कि साक्षात्कारित्व से उक्त लक्षण द्वारा व्यवहारानुमिति की अपेक्षा लाघवात् साक्षात् साक्षात्कारित्व से ही प्रत्यक्षत्वव्यवहार की अनुमिति करें । 'प्रत्यक्ष, साक्षात्कारी आदि शब्दों का इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजत्व प्रवृत्तिनिमित्त ( शक्य- तावच्छेदक ) है, इस बात के निश्चय के लिए लक्षण है' यह चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है । कारण, उक्त लक्षण का ज्ञान साक्षात्कारित्व से होगा । अतः उपस्थित होने तथा अनेक विशेषणयुक्त उक्त गुरु लक्षण की अपेक्षा लघु होने के कारण साक्षात्त्व को ही प्रवृत्तिनिमित्त मानना उचित है ।