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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५६
भवदन्यत्वव्यक्तिभेदपर्यन्तगमनं प्रमाणस्य न सहते । यदि चान्यत्वव्यक्ति-
भेदोऽपि स्यात्तथापि प्रसङ्गमूलभूता व्याप्तिः सामान्याकारपुरस्कारित्वात् एतेनैवो-
पधीयमानानामन्यत्वव्यक्तीनामैक्यमादाय प्रवृत्ता तथैव प्रसङ्गे विपर्यये चोपनयन्ती
स्यादेवोक्तदोषालङ्घनायेति ।
एवं प्रकारता चाऽऽश्रयाश्रयिभाववत् प्रकारान्तराश्रयेष्वपि आत्माश्रयोदाहरणे-
ष्वतिदिश्यते ।
अन्योन्याश्रयो यथा—भेदेनावगताद्भेदज्ञानोपगमे, सोऽपि त्वया कथङ्कार-
ऐसा कहा जा सकता, यदि प्रतियोगी भेद से अन्यत्व का भेद होता । किन्तु अन्यत्व
का भेद है नहीं, कारण आकाश की तरह अन्यत्व एक होने पर भी घट-पटप्रति-
योगिरूप उपाधियों के भिन्न होने से घटाकाश, मठाकाश की तरह 'घटो न, मठो न'
इत्यादि प्रतीतियों के भेदों की उपपत्ति हो सकती है। फिर प्रतियोगी भेद से अन्यत्व का
भेद क्यों माना जाय ? यदि किसी प्रकार अन्यत्वव्यक्ति का भेद मान भी लें, तब
भी उपलक्षण-कल्प में निर्वाह नहीं हो सकता । कारण उक्त प्रसङ्ग का मूल (कारण)
व्याप्ति सामान्यरूप से प्रवृत्त होती है । एवञ्च वह एतत्त्व से उपलक्षित अनन्त
अन्यत्व-व्यक्तियों के ऐक्य का ग्रहण करके ही होगी । अतः वह एतत्त्व से उपलक्षित
अन्यत्वरूप से प्रसङ्ग तथा विपर्यय में प्राप्त होगी । तथाच उक्त दोष का लंघन
(निवारण) नहीं हो सकता । अर्थात् पट का अन्यत्व घट मे रहने से उक्त प्रसङ्ग हो
ही नहीं सकता ।
इसी प्रकार 'स्वस्मात् स्वं जायते' इत्यादि आत्माश्रय-प्रकारों में भी दोष जानने
चाहिए । कारण वहां भी 'स्व यदि स्व से उत्पन्न हो, तो स्व से अन्य हो जायगा'
ऐसा ही आपादन-आकार होने से व्याघात और विपर्यय में अपर्यवसान स्पष्ट है ।
आत्माश्रय की तरह अन्योन्याश्रय भी तात्त्विक नहीं । कारण तार्किक अन्योन्याभाव
वहीं मानते हैं, जहां [अभाव भाव का प्रतियोगी रूप होने तथा प्रतियोगी से
अनालिङ्गित अभाव की प्रतीति न होने से ] भेदज्ञानजन्य प्रतियोगिज्ञान से भेद का
ज्ञान और प्रतियोगिज्ञानजन्य भेदज्ञान से प्रतियोगी का ज्ञान माना जाता है । किन्तु
आप उसका उपन्यास कैसे करेंगे ? 'यदि भेद, भेदज्ञान के अधीन जो प्रतियोगिज्ञान,
उसके अधीन ज्ञान का विषय होता, तो ज्ञान का विषय न होता' इस प्रकार
आपादन तो हो नहीं सकता । कारण प्रतियोगिज्ञानाधीन ज्ञान का विषय भेद अन्यत्र

५६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
मुपन्यसनीयः ? न तावत् 'यद्येतत् एतद्बोधाधीनबोधं स्यात्तदा न बुद्धयेते'ति ।
तथा सति व्याप्त्यसिद्धेः, एतद्बोधाधीनबोधं यत्तद्बोधाधीनबोधस्य तस्यैवा-
दृष्टचरत्वात् ।
कयाचन व्याप्यव्यापकभेदकल्पनया व्यभिचाराप्रतीतचरत्वयोर्वारणेऽपि
अतथाभावशङ्काखण्डकदण्डदुर्लभत्वात् ।
एवमन्योन्याश्रयान्तरेऽपि ।
चक्रकं च मध्ये परन्तर्भाव्य आत्माश्रयान्योन्याश्रयावेव विपरिणमत
इति तद्दोषं नातिक्रामति ।
व्याघातस्तु यथा—सन्नास्तीत्यत्र । तमपि कथं प्रयोक्ष्यसे ? यदि 'यद्ययं
सन् स्यात्तदानीमसन्न स्यादि'ति ; तर्हि 'असन्न स्यादि'त्यस्यापि 'सन् स्यादित्य'-
स्मिन्नेवार्थे पर्यवसानादभेदेन व्याप्यव्यापकभावस्यैवासिद्ध्यापत्तिः ।
दृष्ट है या नहीं ? यदि दृष्ट है तो 'न बुद्ध्येते' इस आपाद्य ( व्यापक ) के वहाँ न
होने से व्यभिचार है । यदि दृष्ट नहीं है, तो धर्मी के अज्ञान से आपाद्य ( ज्ञानावि-
षयत्व ) तथा आपादक ( भेदज्ञानाधीन जो प्रतियोगिज्ञान, तदधीन ज्ञानविषयत्व )
दोनों का सामानाधिकरण्य न होने से व्याप्ति का ग्रहण ( ज्ञान ) ही नहीं होगा ।
एवञ्च शिथिल-मूल होने से वह तर्क नहीं, तर्काभास हो जायगा ।
समर्थन—'जो वस्तु होती है, वह परस्पराधीनसिद्धिक नहीं होती; जैसे—घट-
द्वय' इस प्रकार हम सामान्यमुखी व्याप्ति मानते ही हैं । एवञ्च विशेषरूप से भेद
की अज्ञानदशा में भी व्याप्ति का ग्रह हो ही जायगा और व्यभिचार भी नहीं होगा ।
खंडन —आपादन का यह प्रकार भी युक्त नहीं । कारण ॰ 'वस्तुत्व रहे और
परस्पराधीनबोधत्व का अभाव न रहे, तो क्या हानि है' इस प्रकार व्यभिचार-शङ्का
होने पर उसका निवर्तक अनुकूलतर्क नहीं है ।
इसी प्रकार अन्यान्य अन्योन्याश्रयों में भी दोष जानने चाहिए ।
मध्य में अन्य को देकर आत्माश्रय तथा अन्योन्याश्रय ही चक्रकरूप में परिणत
होता है । अतः चक्रक भी उन दोनों के दोषों का उल्लंघन नहीं कर सकता । तथान
वह भी तर्क नहीं, तर्काभास ही है ।
व्याघात भी 'सन् नास्ति' इस स्थल में तार्किक बतलाते हैं । किन्तु उसका भी
आपादन कैसे होगा ? 'यदि यह सत् है तो असत् नहीं है' इस प्रकार आपादन तो
हो नहीं सकता । कारण 'असत् न' इसका भी फलितार्थ 'सत्' ही है और अभेद

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६१
स्वभावविरुद्धोपजीविनी च विरुद्धान्तरे तद्व्याघातनिरासादेव निरस्तप्राये ।
'गौर्महिषः ततो न भवति, अगवात्मतानियता यतो महिषात्मता' इति, एष हि
तयोर्विरोधः ।
अनवस्था तु यथा—सत्तायामपि सत्तान्तरमित्यनवधौ सत्ताप्रवाहे इष्य-
माणे । तत्र कथं प्रत्यवस्थेयम् ? न तावत् 'यदि सत्तायां सत्ता स्यात्तदा न
विश्रान्तिः स्यादि'ति ; सत्तायां सत्ताभ्युपगमस्य विश्रान्त्यभावेन सह व्याप्तिसिद्धय-
सिद्धयोर्दोषग्रस्तत्वात्
प्रतिबन्दी च खण्डितैव ।
किञ्च—प्रमेयत्वाभिधेयत्वव्यवहार्यत्वसन्निकर्षवत्त्वाभावप्रतियोगित्वादीना-
मात्माश्रितत्वदर्शनात् कथमात्माश्रयताखण्डिका व्याप्तिः सव्यभिचारा न स्यात् ।
में व्याप्य-व्यापकभाव या उद्देश्य-विधेयभाव नहीं होता । एवञ्च शिथिल-मूल होने से
व्याघात भी तर्क नहीं, तर्काभास है ।
स्वभाव से ही विरुद्ध सत् और असत् का उपजीवन करनेवाले अन्य विरुद्ध तो
सत्-असत् के व्याघात के खण्डन से ही खण्डितप्राय हैं । जैसे—'गौर्महिषः' यह
व्याघात भी इसी रीति से प्रवृत्त होता है कि 'यतः अगवात्मता से नियत महिषात्मता
है, अतः गौ महिष नहीं है।' एवञ्च—'गौर्महिषः' इस व्याघात का भी 'अमहिषः
महिषः' इस सत्-असत् के व्याघात में ही पर्यवसान जानना चाहिए ।
सत्ता में सत्ता का निरवधि प्रवाह माना जाय, तो अनवस्था हो जाती है । किन्तु उसमें
भी अनिष्ट का आपादन कैसे होगा ? 'यदि सत्ता में सत्ता हो, तो कहीं विश्रान्ति नहीं
होगी' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण यदि सत्ता में सत्ता के अभ्यु-
पगमरूप आपादक और विश्रान्तिरूप आपाद्य की व्याप्ति को प्रमित मानें, तो प्रमित
होने से ही वह अनवस्था दोष नहीं है । यदि वह अप्रमित है, तो प्रमाण न होने से
उसका आपादन ही नहीं होगा ।
प्रतिबन्दी का खण्डन द्वितीय परिच्छेद में निग्रहस्थान-खण्डन के प्रसंग में ही
हो चुका है ।
किञ्च—प्रमेयत्व अभिधेयत्व ( वाच्यत्व ), व्यवहार्यत्व, सन्निकर्षवत्त्व, भेदप्रतियो-
गित्व आदि धर्म आत्माश्रित देखे जाते हैं । फिर आत्माश्रय का खण्डन करनेवाली
व्याप्ति में व्यभिचार क्यों न हो ?
७१

५६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
द्वारव्यक्तिभेदस्यापि व्यभिचारिव्यतिरेकत्वात् । स्वप्रकाशवादिना स्वयमेव
स्वज्ञानत्वस्य, एवमभावेऽप्यन्यमभावमस्वीकुर्वता स्वयमेव स्वाभावत्वस्य, एवं
तदेव ग्राह्यं ग्राहकं चाऽऽत्मप्रतीतौ, एवं तदेव ज्ञाप्यं ज्ञप्तिकारणं च शब्दो वाचक
इत्यत्र, एवं तदेव नाश्यं नाशकं च प्रध्वंसिनि, एवं तदेव सम्बन्धि सम्बन्धश्च
स्वभावसम्बन्धोपगमे, इत्यादि बहुलमुपगमात् आत्माश्रयतदाभासविवेकाय किं
नियामकमुपेयम् ?
अन्योन्याश्रये चान्त्योपान्त्यशब्दयोरन्योन्यनाशकतायाम्, समव्याप्तिकयो-
श्चान्योन्यव्याप्यव्यापकतायाम्, एककार्यकारिणां चान्योन्यसहकारितायाम्, एव-
समर्थन—प्रमेयत्व आदि स्थलों में द्वार-भेद है। अर्थात् घट में घटप्रमाविषयत्व-
रूप प्रमेयत्व है, अतः आत्माश्रय-खण्डक व्याप्ति में व्यभिचार नहीं है। खण्डन—
'वक्ष्यमाण ( स्वप्रकाश-ज्ञानादि ) स्थलों में व्यक्ति-भेद का अभाव व्यभिचरित
होने और आत्माश्रय होने से व्यक्ति के ऐक्य में भी आत्माश्रय की अदोषता
देखी जाती है। अतः व्यक्ति-भेद भी आत्माश्रय की आभासता का प्रयोजक
नहीं है। देखिये—स्वप्रकाशवादी के मत में स्वज्ञान में ही स्वविषयकज्ञानत्व
माना जाता है; इसी प्रकार अभाव में अभावान्तर न माननेवालों के मत में
अभाव में स्वनिष्ठाभावत्व माना जाता है; आत्मविषयक-प्रतीतिस्थल में आत्मा में ही
ज्ञाप्यत्व और ज्ञापकत्व दोनों मानते हैं; 'शब्दो वाचकः' इस वाक्य से जन्य बोधस्थल
में शब्द में ही ज्ञानविषयत्व तथा ज्ञानकरणत्व माना जाता है; क्षणिकवादी के मत में
एक ही पदार्थ में नाश्यत्व और नाशकत्व दोनों माने जाते हैं तथा स्वरूप को सम्बन्ध
माननेवालों के यहाँ उसी स्वरूप को सम्बन्धी और सम्बन्ध दोनों स्वरूप मानते हैं।
इस तरह बहुत-से उदाहरण दिये जा सकते हैं। अतः 'यहाँ आत्माश्रय अनाभास है और
यहाँ आभास है' इस विवेक का नियामक क्या माना जायगा ?
इसी प्रकार अन्त्य शब्द का नाशक उपान्त्य शब्द होता है और
उपान्त्य शब्द का नाशक अन्त्य शब्द, अतः इनकी परस्पर नाशकता में; गन्ध
और पृथिवीत्व आदि समव्यास साध्य-हेतुकस्थलों में तथा घटादि एक कार्य के
कारण दण्ड, चक्र आदि के परस्पर सहकारित्व में एवं अन्यत्र भी अन्योन्याश्रय
दोष में व्यभिचार देखने से अन्योन्याश्रय का खण्डन करनेवाली व्याप्ति का
भङ्ग क्यों न माना जाय ? ज्ञान, संस्कार आदि स्थलों में व्यक्ति-भेद विशेष

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६३
मन्यस्मिन्नपि तत्र तत्र दर्शनात्कथं न व्याप्तिभङ्गः । कश्च विशेषो यद्व्यतिरेको
विशेषणमुपादीयेत ।
तत्र तत्राविरोधान्नैवमिति चेत् । न ; अन्यत्र तथाभावादर्शनस्य विरोधाभ्युपगम-
मूलस्याविशेषात् । तत्र तत्र तथात्वे प्रमाणसद्भाव एव विशेष इति चेत् ;
तर्हि सर्वत्रानभ्युपगममूलं तथात्वे प्रमाणाभाव एवोपजीव्यो दूषणमिष्यताम्,
कृतमन्योन्याश्रयेण व्यभिचरितदोषत्वेनेति ।
चक्रकेऽपि 'दुःखजन्मादि'सूत्रोक्तादिषु व्यभिचारदर्शनादव्याप्तिः, विशेषव्यति-
है, अतः वहाँ अन्योन्याश्रय को आभास मानते हैं । किन्तु उक्त शब्दादि-स्थलोंमें
व्यक्ति-भेदरूप विशेष भी नहीं है । फिर क्या विशेष है, जिसके होने से अन्योन्या-
श्रय का आभासत्व तथा उस विशेष का अभाव लक्षण-घटक करके अन्योन्याश्रय के
अनाभासत्व की व्यवस्था हो ?
समर्थन—अन्त्य-उपान्त्य शब्द-स्थल में परस्पराश्रयत्व में विरोध नहीं है और
प्रतियोगी तथा भेदस्थल में परस्पराश्रयत्व में विरोध है । अतः अन्योन्याश्रय में विरोध
तथा अविरोध ही विशेष है । खण्डन—विरोध के स्वीकार ( विरोध की अदोषता )
का मूल विरोध का अदर्शन है । प्रतियोगी और भेदस्थल में भी उसमें कोई विशेष
नहीं है । अर्थात् अन्त्य-उपान्त्य शब्दस्थल में ( परस्पराश्रित प्रतीति होने से )
परस्पराश्रय में विरोध का दर्शन नहीं होता । एवञ्च वहाँ भी विरोध की अदोषता
माननी चाहिए ।
समर्थन—अन्त्य-उपान्त्य शब्दादि-स्थल में अन्योन्याश्रय को अनाभास मानने में
प्रमाण का सद्भाव ही विशेष है । खण्डन—तब तो सर्वत्र अन्योन्याश्रय को दोष
मानने का कारण प्रमाण का अभाव ही हुआ । अतः उपजीव्य होने से प्रमाणाभाव को
ही दोष मानिये; जिसमें दोषत्व व्यभिचरित है, ऐसे अन्योन्याश्रय को दोष मानना
व्यर्थ है ।
चक्रक का भी 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः'
इस न्यायसूत्रोक्त दुःखादि में व्यवधानेन परस्पर जन्यजनकभाव होने से व्यभिचार
है, अतः लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि 'अन्य जन्मव्यक्ति अन्य
दुःखव्यक्ति की जनिका है । इसी तरह व्यवधान से वह अन्य दुःखव्यक्ति से
जन्य है, अतः व्यक्तिभेद चक्रक के आभासत्व का तथा उसका अभाव चक्रक के

५६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [चतुर्थे
रैकदर्शनदुःशक्यत्वं च । कार्यकारणभावस्य तज्जातीयतया नियतत्वेन
व्यक्तिभेदस्य चक्रकानन्तर्भूतत्वात् ।
व्याघातेऽप्येकस्यैव जनकत्वाजनकत्वे तथा । न च कालभेदादिविशेषः ;
घटतत्प्रध्वंसादौ कालभेदेऽपि तादात्म्यव्याघातोपगमादेव ।
'सत्प्रतिपक्षजात्योश्च को विशेषो व्याघाते येन पूर्वत्र बाध्यबाधकयोर्द्वयो-
रप्याभासत्वम्, उत्तरत्र तु उत्तरस्य परं तथोपेयत इति गुरवः ।
यद्यपि प्रतिपक्षहेतुः साध्यान्तरसाधक इत्यस्ति तस्य जात्युत्तरवैधर्म्यम्,
अनाभासत्व का प्रयोजक है', तो यह कथन भी, चक्रक में व्यक्ति-भेद का अभाव-
ज्ञान असंभव होने से, असङ्गत है । कारण कार्यकारणभाव दुःखादि जातीय में
नियत है । अतः व्यवधान से परस्पर कार्यकारणभावरूप चक्रक के लक्षण में व्यक्ति-
विषय का प्रवेश नहीं है ।
एक ही बीज में अङ्कुर की जनकता और अजनकता प्रामाणिक होने से व्याघात
भी आभास है ।
समर्थन--जिस काल में जनकत्व हो, उसी काल में अजनकत्व का होना व्याघात
है। बीज और अंकुर में काल-भेद होने से व्याघात नहीं है। खण्डन—जो आचार्य
प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव को प्रतियोगिरूप मानते हैं, उनके प्रति काल-भेद होने
पर भी आप तो 'यदि घटः प्रागभावात्मकः प्रध्वंसाभावात्मको वा स्यात् व्याघातः स्यात्'
इस प्रकार व्याघात का प्रसञ्जन करते हैं । अतः लक्षण में काल के अभेद का निवेश
नहीं हो सकता ।
'सत्प्रतिपक्ष तथा जाति दोनों में एक-सा व्याघात होने पर भी क्या विशेष है,
जिससे सत्प्रतिपक्ष में बाध्य और बाधक दोनों आभास होते हैं और जाति में केवल
उत्तर ही आभास होता है'—ऐसा गुरु (प्रभाकर) ने कहा है।
समर्थन—सत्प्रतिपक्षस्थल में व्याप्ति होने से हेतु साध्य का साधक होता है
और जातिस्थल में हेतु में साध्य की व्याप्ति न होने से वह साध्य का साधक नहीं
होता, यही दोनों में भेद (विशेष) है । खण्डन—यह भेद अकिञ्चित्कर है, कारण
१. व्याघात में कोई विशेष न होने पर भी श्रीउदयनाचार्य सत्प्रतिपक्ष से जात्युत्तर को
विलक्षण मानते हैं । यहाँ प्रसंगतः उनके इस मत का भी प्रभाकर (गुरु) के शब्दों से ही
खण्डन करते हैं—'सत्प्रतिपक्षजात्योश्च' इत्यादि से ।

परिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६५
तथापि 'त्वद्धेतुरसाधकः समबलप्रतिपक्षप्रतिहतत्वादित्यस्य दूषणत्वार्थमवश्या-
पेक्ष्यस्य द्वाराऽऽत्मव्याघातकत्वात् साक्षाद्वा अवश्योपस्थाप्यद्वारेण वा स्वव्याघा-
तकतायामुपयुक्तविशेषाभावः ।
न च तत्राऽऽस्तामेव व्याघातः, सत्प्रतिपक्षता तु निरवद्यैवेति शक्यं
वक्तुम् । यतः शब्दादेर्नित्यत्वमेकस्मादनित्यत्वं चापरस्मादनुमानात्तथा सति किं
न स्यात् । तयोर्विरोधग्राहिणः प्रमाणस्य बलादिति चेन्न । यथा नित्यत्वम-
नित्यत्वमित्युभयमास्तामित्याचक्ष्महे तथा 'विरुद्धमविरुद्धं चाऽस्तामि'त्यपि
ब्रुवतोऽस्मान् कथं निवारयिष्यसि ?
दोष देने के लिए अवश्य अपेक्षणीय 'तुम्हारा हेतु, सम-बल प्रतिपक्ष से पराहत होने
से असाधक है' इत्याकारक अनुमितिरूप द्वार से आत्मव्याघात दोनों स्थलों में तुल्य
ही है। भेद यही है कि नैयायिक के यह कहने पर कि 'सब सत् है, अर्थक्रिया-
कारी होने से', बौद्ध के 'सर्व असत् है, ज्ञेय होने से' इस जातिरूप उत्तर
में ज्ञेयत्व हेतु [ स्व के भी ज्ञेय होने से स्व के स्वरूप रूप जो प्रतिपक्ष, उससे ]
साक्षात् ही व्याहत है। किन्तु 'शब्द अनित्य है, कृतक होने से' इस नैयायिक के
अनुमान में 'शब्द नित्य है, केवल आकाश-गुण होने से' इस सत्प्रतिपक्ष स्थल में
प्रथम हेतु समबल प्रतिपक्ष आकाशैकगुणत्व से पराहत होने के कारण उसकी
असाधकता के साधन द्वारा आकाशैकगुणत्वरूप हेतु अपना भी व्याघातक है।
अर्थात् जैसे दूसरे के नाश के लिए स्वयं उसकाया हुआ भूत दूसरे का नाशकर अपने
नाश का भी कारण होता है, वैसे ही स्थापना-हेतु के बाधनार्थ आकाशैकगुणत्व हेतु
से उत्थापित समबलप्रतिपक्ष-प राहतत्वरूप हेतु अपने नाश का भी कारण हो जाता है।
समर्थन—व्याघात तुल्य होने पर भी व्याप्ति होने से सत्प्रतिपक्ष सत् उत्तर है
तथा व्याप्ति न होने से जाति असत् उत्तर । खण्डन—यदि सत्प्रतिपक्ष स्थल में दोनों
हेतुओं में व्याप्ति मानें, तो दोनों हेतुओं के बल पर नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों
विरुद्ध धर्मों का एकत्र ज्ञान होना चाहिए ।
समर्थन—नित्यत्व, अनित्यत्व दोनों धर्मों के विरोध को विषय करनेवाले
प्रमाण के बल पर दोनों का एकत्र ज्ञान नहीं होगा । खण्डन—जैसे दोनों हेतुओं
में व्याप्ति के बल पर हम एकत्र नित्यत्व का आपादन करते हैं, वैसे ही यदि उक्त
व्याप्ति के बल पर 'नित्यत्व, अनित्यत्व कहीं विरुद्ध तो कहीं अविरुद्ध हैं' ऐसा
आपादन करें, तो कौन हमें रोकेगा ?

५६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
स्यादप्येवं यदि सत्प्रतिपक्षत्वमेव तत्र दोषो न स्यादिति चेत्; तर्हि
मन्तव्यं प्रथमस्य हेतोः समानबलप्रतिपक्षप्रतिहतत्वादसाधकत्वमित्युक्तमावर्तते ।
अनवस्थायां च यस्यां यस्यां सत्तायामपरापरसत्ता यायात्, तस्यास्तस्याः
प्रमाणेन सिद्धौ नानवस्था दोषः स्यात्, असिद्धौ चाऽऽश्रयासिद्धविषयमापादन-
मिति । यदिच आत्माश्रयादिषु सर्वत्र विशेषोऽयमभिधीयते प्रमाणसिद्धत्वात्तत्र
तथोपेयतं इति; तर्ह्यापादनस्थाने तथाभ्युपगमाय प्रमाणं नास्तीत्युक्तं भवति ।
तथाच तत्र प्रमाणप्रश्नस्यावसरो न प्रसङ्गस्येति ।

अप्रसङ्गात्मक-तर्कनिरूपणम्

अपरेऽपि विषयभेदात्तर्कभेदा आत्माश्रयादिवत् मन्तुमुचिताः । तद्यथा—
अविनिगमः, उत्सर्गः, कल्पनागौरवलाघवे च, अनौचित्यं चेति ।
विकल्पेन अन्वयावगमयोग्येऽनेकस्मिन्नभ्युपगते तदेकदेशान्वयनियम-
समर्थन—सत्प्रतिपक्षरूप दोष न होने पर व्याप्ति के बल पर साध्य की सिद्धि होती
है । यहाँ तो सत्प्रतिपक्ष दोष है, अतः नित्यत्व और अनित्यत्वरूप विरुद्ध धर्मों का
एकत्र अध्यास नहीं होता । खण्डन—तब यह मानना चाहिए कि प्रथम हेतु समानबल-
प्रतिपक्ष-पराहृत होने से असाधक है । यदि ऐसा मान लें, तो उक्त वेताल-न्याय से वही
स्वव्याघातक भी होने से जाति से सत्प्रतिपक्ष में कुछ विशेष ही नहीं रह जायगा ।
किञ्च—अनवस्था-स्थल में जिस-जिस सत्ता में अपर-अपर सत्ता का आपादन करते
हैं, उस-उस सत्ता में यदि प्रमाण है, तो प्रामाणिक होने से अनवस्था दोष नहीं है ।
यदि प्रमाण नहीं, तो आश्रय की असिद्धि होने से अनवस्था का आपादन हो ही
नहीं सकता । यदिच आत्माश्रयादि सभी स्थलों में यह विशेष कहा जाय कि 'अमुक
स्थल में प्रमाणसिद्ध होने से आत्माश्रयादि दोष नहीं हैं,' तो इसका अर्थ यही
होता है कि आपादन के स्थान में अमुक आत्माश्रय आदि मानने में प्रमाण नहीं है ।
एवञ्च प्रमाण-प्रश्न का यह स्थल है, प्रसङ्ग का नहीं ।

अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण

विषय-भेद से आत्माश्रयादि की तरह अविनिगम, उत्सर्ग, कल्पना-गौरव,
कल्पना-लाघव और अनौचित्य ये भी अन्य पांच तर्क मानने योग्य हैं ।
विकल्प से अन्वययोग्य अनेक के प्रसक्त होने पर उनमें से एक के अन्वय का

परिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५६७
निर्द्धारणाशक्यत्वमविनिगमः, सत्प्रतिपक्षहेतोरिव निर्द्धारयितुमशक्यानन्वयोः
परस्परप्रतिक्षेप एव पर्यवसानात् ।
नन्वन्यतरमादायापि प्रकृतस्योपपत्तिसम्भवेन अविनिगमस्य दोषत्वमेवा-
नुपपन्नम् । केवलं पुंसस्तत्र यदि संशयः स्यात्स च किं न स्यादिति चेन्न ।
भावानवबोधात् । प्रमाणासम्भवेन क्वचिदपि विशेषः कथमभ्युपगन्तुं शक्यो यमादाय
वस्तुगत्याऽप्येकस्यान्वयः स्यात् ।
नन्वेवं प्रमाणाभाव एव दोषः स्यान्न अविनिगम इति चेन्न । तस्य अवि-
निगमोन्नेयत्वेन अविनिगमस्यैव प्रथमोत्पन्नस्योपन्यासोचित्यात् ।
जो नियम है, उसके निर्धारण की अशक्यता अविनिगम है। जैसे—भूतत्व और मूर्तत्व
दोनों में जातित्व के अन्वय की योग्यता है और दोनों को जाति मानने में साङ्कर्य
दोष होगा, अतः एक को ही जाति मानना चाहिए। यहाँ अनुगत-प्रतीतिरूप
जातित्वसाधक प्रमाण दोनों स्थलों में तुल्य होने से यह विकल्प होता है कि भूतत्व
जाति है या मूर्तत्व ? दोनों के बीच एक में भी जातित्व का अन्वय अशक्य नहीं है,
यही अविनिगम है। यहाँ सत्प्रतिपक्षि-हेतु की तरह एक के जातित्व की ग्राहक सामग्री,
इतर के जातित्व की प्रतिबन्धिका हो जाती है।
समर्थन—एक भूतत्व को जाति मान लेने पर सङ्कर-दोष का परिहार हो जाता
है, अतः अविनिगम दोष ही नहीं है। अविनिगम-स्थल में पुरुष को केवल सन्देह होता
है, उसकी भी निवृत्ति हो सकती है। खण्डन—आपने मेरे भाव को नहीं जाना।
भूतत्व और मूर्तत्व दोनों के मध्य एक में कोई विशेष (जातित्वसाधक अतिशय)
मानने में प्रमाण ही नहीं है। फिर किसके बल पर एक में जातित्व का अन्वय
करेंगे। अर्थात् अनुगत-प्रतीतिरूप प्रमाण दोनों में तुल्य है और इससे अतिरिक्त
अन्य विशेष होने में कोई प्रमाण नहीं है।
समर्थन—यदि ऐसा है, तो 'प्रमाणाभाव' को ही दोष मानिये, 'अविनिगम'
को दोष मानना व्यर्थ है। खंडन—प्रमाणरूप विशेष अतीन्द्रिय होने से वह अविर्नि-
गम से अनुमेय ही है। अतः प्रथम उपस्थित होने से अविनिगम ही दोष है,
प्रमाणाभाव नहीं।
१. 'प्रकृतोद्देश्यविधेयभावतद्व्याप्यतरान्यमितस्तथा तुल्यबलानेकसंसर्गको तादृश्यान्वयितया तदेकदेशनिर्द्धारणा-
सम्भवत्वम्' यह अविनिगम का लक्षण है।

५६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
नन्वेवमनुमाने व्यक्त्यविनिगमो दोषः स्यादिति चेन्न । तत्रानेकव्यक्तीना-
मभ्युपगमसिद्धयभावात् सामान्योपसंहारस्यैकामेव व्यक्तिमाक्षेप्तुं सामर्थ्यात्,
अविनिगमस्य चानेकाभ्युपगमे सत्युपस्थानादिति ।
बाहुल्यादृष्टमपेक्ष्य बाहुल्यदृष्टतयाऽदुर्बलस्योपगमार्हता उत्सर्गः । तथथा—
स्वस्थस्य जाग्रतो ज्ञानं प्रामाण्याप्रामाण्यनिर्धारकप्रमाणानुपनिपाताविशेषेऽपि
विना बाधमप्रामाण्यमभ्युपगच्छन्तं प्रति स्यात्, न तु प्रामाण्यम्, यं
तर्कमेतमालम्ब्याऽऽहुः—
'तस्माद्बोधात्मकत्वेन प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता ।
अर्थान्यथात्वहेतूत्थदोषज्ञानादपोद्यते ॥'—इति ।
द्रष्टव्योदाहरणं चैतदीश्वराभिसन्धौ वेदप्रामाण्ये तथा, यथा न सौगतोऽपि
विप्रतिपत्तुमर्हति ।
समर्थन—यदि अविनिगम को दोष मानें, तो धूम से पर्वत में तार्ण (तृणजन्य),
पार्ण (पर्णजन्य) या काष्ठज वह्नि के बीच एक का भी अन्वय अशक्य होने से सर्वत्र
अनुमिति-स्थल में अविनिगम रहेगा । एवञ्च अनुमितिमात्र का उच्छेद हो
जायगा । खण्डन—अनुमिति-स्थल में अनेक व्यक्तियों की प्रसक्ति ही नहीं होती। कारण
वह्नित्वरूप-सामान्यधर्मावच्छिन्नं व्याप्तिग्रह की एक व्यक्ति के आक्षेप में ही सामर्थ्य
है और अविनिगम तो अनेक व्यक्तियों के प्रसक्त होने पर ही होता है ।
लोक में अप्रसिद्ध की अपेक्षा अतिप्रसिद्ध अदुर्बल के स्वीकार की योग्यता १उत्सर्ग
है । जैसे जो किसी स्वस्थ (निर्दोषताक्ष) और जाग्रत मनुष्य के ज्ञान को [ प्रामाण्य-
अप्रामाण्य के निर्णायक प्रमाणरूप विशेष न होने पर भी बाध के अभावकाल में ]
अप्रमाण मानते हैं, उनके प्रति उत्सर्ग दोष होता है। जो
उक्त ज्ञान को प्रमाण मानते हैं, उनके प्रति उत्सर्ग दोष नहीं
होता । इस उत्सर्गरूप तर्क का अवलम्बनकर भट्टपाद ने चोदना-सूत्र के प्रसङ्ग
में ५३ वीं कारिका द्वारा कहा है कि बोधस्वरूप होने से ही बुद्धि को उत्सर्गतः
प्रामाण्य प्राप्त हो जाता है, [कारण प्रायशः ज्ञानमात्र प्रमा हुआ करता है ] ।
किन्तु वह प्रामाण्य कहीं-कहीं विषय के अभाव से विषय या चक्षुरादिनिष्ठ दोष
से बाधित भी हो जाता है ।
'ईश्वराभिसन्धि' के वेद-प्रामाण्य नामक प्रकरण में उत्सर्ग का उदाहरण हमने
इस प्रकार दिखलाया है, जिसमें बौद्ध भी विप्रतिपत्ति नहीं कर सकते ।
१ इस तरह भूयोदर्शनरूपता वा भूयः सहचाररूपता ही उत्सर्ग का स्वरूप सिद्ध होता है ।

परिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५६६
ननु बलवदेककोटिकः संशय एवोत्सर्गः, तत्कथं तर्कः स्यादिति चेन्न ।
उत्सर्गस्य सम्भावनायाः स्वार्थस्थित्यनुकूलतयाऽवलम्ब्यत्वात् ; संशयस्य त्वनेव-
म्भावात् , उत्सर्गस्यैककोटिनिष्ठत्वात् संशयस्य च कोटिद्वयावगाहित्वात् ।
एतेन संशयस्यैवैका बलवती या कोटिः सैवोत्सर्ग इति निरस्तम् । निर्णयोऽपि
संशयस्यैव वस्तुनियतकारणजत्वरूपबलवती कोटिः स्यात् ।
स्यादप्येवं यद्युत्सर्गवन्निर्णयेऽपि संशयस्यानुस्फूर्तिः स्यादिति चेन्न ।
उत्सर्गोदाहरणे उत्सर्गमाद्रियमाणैः संशयोच्छेदानुमतेरेव बाधाभावं सहकारिण-
मपेक्ष्य उत्सर्गेणार्थैक्याभाव एव प्रमाणीभवनात् । तस्माद्यथा अनवस्थादयो
बाधाद् दूषणत्वं त्यजन्तस्तदभावे दूषणानि भवन्ति तथोत्सर्गेऽपि तथैवेति ।
प्रश्न—हम उत्सर्ग को 'प्रायशः ज्ञानं प्रमैव स्यात्' इत्याकारक बलवान् एक-
कोटिवाला सम्भावनारूप सन्देह ही मान लेंगे । उसको तर्क क्यों माना जाय ?
उत्तर—तथाकथित सम्भावनारूप उत्सर्ग स्वप्रयोजन ( ज्ञान-प्रामाण्य ) की सत्ता के
साधनार्थ माना जाता है, पर संशय उभयकोटिक होने से उक्त प्रयोजन का साधन
नहीं हो सकता । इसी तरह उत्सर्ग एककोटिक होता है, जब कि सन्देह कोटि-
द्वयावगाही हुआ करता है । अतः उत्सर्ग सन्देह नहीं, किन्तु तर्क ही है ।
अतएव 'संशय की ही एक बलवती कोटि उत्सर्ग है' यह कथन भी खण्डित
जानना चाहिए । प्रयोजन का साधक होने पर भी उत्सर्ग को यदि सन्देह मानें, तो
निश्चय को भी वस्तु से नियत सन्निकर्षरूप कारण से जन्य सन्देह की ही एक बलवती
कोटि क्यों न माना जाय ?
प्रश्न—उत्सर्ग के उदाहरण में संशय की स्फूर्ति होती है, पर निश्चय में वह
नहीं होती । अतः निश्चय सन्देह की बलवती कोटि नहीं हो सकता । उत्तर—जो
उत्सर्ग का आदर करते हैं, वे उत्सर्ग के उदाहरण में संशय की स्फूर्ति नहीं, किन्तु
संशय का उच्छेद ही मानते हैं । कारण बाधाभाव से सहकृत होकर उत्सर्ग ज्ञान के
प्रामाण्य में प्रमाण होता है । तस्मात् जैसे बाध होने पर अनवस्था आदि अपना दूषकत्व
त्याग देते हैं, पर बाधाभावस्थल में दूषक होते हैं, वैसे ही उत्सर्ग भी बाध के
अभाव में प्रमाण होता ही है ।

'सुगमासुगमयोरसुगमदुर्बलत्वं कल्पनागौरवम्, दृष्टजातीयमपेक्ष्यादृष्ट-
जातीयं दुःखेन प्रमीयते, स्वल्पमपेक्ष्य च बह्विति अखिलजनानुभवसिद्धमेतत् ।
दर्शितं च विविच्येदमीश्वराभिसन्धौ । यथा—नैयायिकादिकं प्रति क्षित्यादिषु
प्रतिकार्यं कर्तॄणां भिन्नानामभ्युपगमापादके, यथा च सौगतं प्रति प्रत्येकं
कारणानां समर्थानामेकसमानदेशकालानामनेकनीलादिव्यक्त्युत्पादापादके
चेति दूषणानुकूलमिदम् । तद्व्यतिरेकेण कल्पनालाघवं साधनानुकूलम् ।
प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमसमाधेयजातीयमनौचित्यं वैयात्यनामकम् । तस्य
भेदाः प्रश्नवैयात्यादयः । प्रश्नविषयमप्रमिण्वतां प्रति प्रश्नानौचित्यं प्रश्न-
सुबोध और दुर्बोध के मध्य दुर्बोध की दुर्बलता कल्पना-गौरव है। दृष्टजातीय
की अपेक्षा अदृष्टजातीय तथा स्वल्प की अपेक्षा बहु पदार्थ दुःख से जाना जाता है—यह
सर्वसाधारण के अनुभव से सिद्ध है। इस कल्पना-गौरव का उदाहरण 'ईश्वराभिसन्धि'
नामक ग्रन्थ में विवेचनपूर्वक दिखाया गया है। जैसे—नैयायिक द्वारा कार्यत्व-हेतु
से क्षित्यादि में कर्तृजन्यत्व का साधन करने पर, 'क्षित्यादि कार्य अनेक होने से अनेक
कर्ताओं की सिद्धि क्यों नहीं होती ?' वादी की इस आपत्ति की निवृत्ति कल्पना-गौरवरूप
तर्क से होती है। इसी प्रकार बौद्धमत में 'प्रत्येक समर्थ (फलोपधायक), अनेक
और समान देश-कालवाले कारणों का प्रत्येक, अनेक नीलादि-कार्यकारित्व क्यों न हो ?'-
इस शंका की निवृत्ति कल्पना-गौरवरूप तर्क से होती है। कल्पना-गौरव प्रतिवादी
द्वारा कथित दूषण के अनुकूल है और उसका अभावरूप कल्पना-लाघव स्वपक्ष के
साधन के अनुकूल है।
'प्रामाणिकों के व्यवहार का अविषय तथा समाधान के लिए अयोग्य' अनौचित्य
है और अनौचित्य का ही नाम 'वैयात्य' है। अनौचित्य के भेद प्रश्न, वैयात्य आदि
हैं। जो पण्डित प्रश्न के विषय को ही नहीं मानते, उनके प्रति उस 'विषय में विशेष
के ज्ञानार्थ प्रश्न करना प्रश्नानौचित्य है। जैसे—प्रमाणव्यवहारी नैयायिक आदि के
प्रति यदि बौद्ध यह प्रश्न करे कि 'आप जगत् को अवस्तु (असत्) तो मानते ही हैं,
१. अर्थात् जहाँ उपस्थितिकृत, शरीरकृत या सम्बन्धकृत लाघव हो, वहीं सुगम है और
तदन्य असुगम है। असुगम की दुर्बलता का अर्थ है, प्रमाणापरिच्छेद्यता; कारण प्रमाता
स्वभावतः लघु अर्थ का ही ग्रहण करता है। एवञ्च 'इदमस्माद् गुरु', 'इदमस्मात् लघु' इत्याकारक
प्रतीतिसिद्ध स्वरूपसम्बन्ध-विशेष ही गौरव-लाघव हैं।

परिच्छेद ] अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ५७१
वैयात्यम् । यथा—अवस्तुनि विधिनिषेधयोः किमिच्छसीति पृच्छति प्रमाणव्यव-
हारिणां सौगते । अत एवात्र अनौचित्यापरनामकं वैयात्यं परस्य दोषं मनसि
कृत्वैके ब्रुवते—'अत्र सहृदयानां मूकतैवौचिता' इति । अपरे च—'न ह्यप्रतीते
देवदत्तादौ स किं गौरः कृष्णो वेति वैयात्यं विना प्रश्नः स्यादि'ति ।
यदि च इदमनौचित्यं नाम दोषो नाभ्युपेयते, तदानीमर्थान्तरेण प्रकृतमर्थं
निरस्य अर्थान्तरस्यार्थान्तरेण परिहारात् तत्परम्परामालम्बितुकामः केन दोषेण
अर्थान्तरपरिहाराभासत्ववादिनी अर्थान्तरेणैव तत्परिहरणमनुचितमित्यतोऽन्येन
जीयेत । अर्थान्तरनिग्रहतायां विप्रतिपन्नोऽपि प्रश्नपरम्परामालम्ब्य स्वभङ्गभयात्
कथावसानमनिच्छन्तं कथं जयेत ?
न चानवस्थया जयतीति वाच्यम् ; यावदुत्तरमर्थान्तरेण परिहरणे प्रश्ना-
न्तरेण वा द्वयोरप्यनवस्थासाम्यात् ।
परन्तु उस असत्त्व को भावरूप या अभावरूप मानते हैं ?' तो वह प्रश्नानौचित्य है ।
अतएव पर के ऐसे प्रश्न में प्रश्न-वैयात्य नामक दोष मानकर एक आचार्य ने कहा
है—'ऐसे प्रश्न पर सहृदय पण्डितों के लिए मौन ही उचित है।' दूसरे आचार्य ने
कहा है कि "अज्ञात देवदत्त के विषय में देवदत्त कृष्ण है या गौर ?' यह प्रश्न धृष्टता
के सिवा और कुछ नहीं।"
यदि अनौचित्य को दोष न मानें, तो प्रतिवादी का किसी भी प्रकार निग्रह न
हो सकेगा । देखिये, वादी कहता है—'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात् ।' प्रतिवादी इसका
अर्थान्तर से यों परिहार करता है—'शब्द विभु होने से उसे कृतक कहना अज्ञान
है।' इस पर वादी कहेगा—'यह परिहार 'अर्थान्तर' होने से उचित नहीं है।'
इस पर प्रतिवादी भी चुप न रहेगा और 'फिर वह 'अर्थान्तर ही क्या है ?' इस
प्रकार प्रश्नों की परम्परा चलाता ही रहेगा । अर्थात् 'अर्थान्तर' होने से परिहार को
'आभास' कहनेवाले के प्रति 'पुनः अर्थान्तर से ही परिहार अनुचित है' इस
प्रकार अनौचित्य के उद्भावन से ही उक्त प्रतिवादी निगृहीत हो सकता है । किञ्च—
जो स्वयं अर्थान्तर को निग्रहस्थान नहीं मानते, वे यदि पराजय के भय से प्रश्न-
परम्परा का अवलम्बनकर शास्त्रार्थ की समाप्ति ही न चाहें, तो अनौचित्य से अन्य
किस निग्रह से आप उन्हें परास्त करेंगे ? तस्मात् अनौचित्य अवश्य मानना चाहिए ।
प्रश्न—स्वपराजय के भय से प्रश्न-परम्परा का अवलम्बन करनेवाले पुरुष को
अनवस्था से ही पराजित कर सकते हैं । उत्तर—अनवस्था ही क्या है, ऐसा प्रश्न
होने से प्रश्न और उत्तर दोनों पक्षों में अनवस्था समान है ।

'दोषं व्यक्तिविवेकेऽमुं कविलोकविलोचने ।
काव्यमीमांसिषु प्राप्तमहिमा महिमाऽऽदृत ॥'
ननु कथमत्र प्रामाणिकाव्यवहार्यत्वमिति पृष्टेन यदि मूकत्वमालम्ब्य तथात्वं
वादिनि न व्युत्पाद्यते, तदानीमप्रतिभाऽऽपतेत् । अथ तथात्वं व्युत्पाद्यते प्रश्ना-
र्थादेः प्रमाणाविषयत्वमुपन्यस्य, तदाऽत्यन्तासद्व्यवहार्यता स्वीकृतैव स्यादिति
चेत् । अत्र ब्रूमते--मूकतैवात्र विजयायेति । न चाप्रतिमैवं प्रसज्येत; उत्तरस्या-
ऽप्रतिपत्तिरुत्तरार्हस्येति तल्लक्षणात् ।
यदि चायं नियमो वादिना इष्यते, यद्भ्रान्त्यैन तेन व्यवहर्तव्यमनुवादा-
दन्यत्रेति; तदा मध्यस्थोद्भाव्यत्वमस्य दोषस्योपन्यस्यताम् । मध्यस्थेन
ह्यपभ्रंशभाषयाऽपि यथा वादिप्रबोधनं क्रियते, तथा यद्यप्रमाणमवलम्ब्यापि
क्रियते, तदा को दोषस्तस्य स्यात्, तत्र विषये तथैव तेन वादिबोधनस्य शक्य-

काव्यतत्त्वविवेचक पण्डितों में अत्यन्त समादृत आलंकारिक महिम भट्ट ने कविजनों
के नेत्र-तुल्य 'व्यक्तिविवेक' नामक अपने ग्रन्थ में ध्वनिकार प्रभृति आद्य आचार्यों के
इस कथन का उल्लेख करते हुए कि 'अनौचित्यादृ ते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्'
(रसभंग का कारण अनौचित्य के सिवा और कुछ भी नहीं है । सभी रसभंजक
दोषों में अनौचित्य अनुस्यूत ही रहता है ), इस दोष का आदर किया है ।
प्रश्न--'अनौचित्य प्रामाणिकों द्वारा अव्यवहार्य कैसे हैं ?' ऐसा प्रश्न होने पर
यदि मूकता का अवलम्बन कर वादी के प्रति अनौचित्य की अव्यवहार्यता का प्रतिपादन
न किया जाय, तो 'अप्रतिभा' नामक निग्रह होगा । तदर्थ यदि अनौचित्य में प्रमाणा-
विषयत्व का प्रतिपादनकर 'अनौचित्य की प्रामाणिक अव्यवहार्यता' का प्रतिपादन किया
जाय, तो अत्यन्त असत् वस्तु में भी आपने व्यवहार्यता मान ली, कारण 'अनौचित्यं
प्रामाणिकाव्यवहार्यम्, प्रमाणाविषयत्वात्' इस प्रकार शब्द-व्यवहार का विषय वह हो
ही गया । उत्तर--अनौचित्य अव्यवहार्य कैसे है, इस प्रश्न में मूकता ही विजय का हेतु
है । वहाँ मूकत्व के अवलम्बन में भी अप्रतिभा नहीं होती, कारण 'उत्तर-योग्य प्रश्न
की अप्रतिपत्ति' ही अप्रतिभा है, अनौचित्य तो उत्तरार्ह ही नहीं है ।
यदि वादी इस नियम को स्वीकार करता हो कि 'अनुवाद से अन्यत्र मैं भ्रान्ति
से व्यवहार नहीं करूँगा' तो मध्यस्थ को ही वहाँ अनौचित्य का उद्भावन करना
चाहिए । मध्यस्थ जैसे अपभ्रंश शब्दों से ( जो कि निरर्थक निग्रहस्थान से निग्रह के

त्वात् । तस्मात् मध्यस्थं प्रत्यनुत्तरदाने स्वदोषपरिहाराय प्रतिवादिनाऽपि वैयात्य-
लक्षणदर्शनं कार्यम्, मध्यस्थं प्रति तस्याप्रमाणेनापि प्रतिबोधने निर्दोषत्वात् ।
ननु वादिभ्यामेव वा, वादिनि मध्यस्थेन वा, तं प्रति वादिना वाऽत्यन्ता-
सद्धिषये व्यवहारोपगमे कथं नासत्ख्यातिः स्वीकृता स्यात् ? किं न स्यात् ।
विशिष्टरूपे सम्बन्धांशे चासत्ख्यातेरन्यथाख्यातिवादिभिरप्यभ्युपगमात् ।
ननु 'वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नम्'त्यादिषु व्यवहरतः कथं विशेष्ये
विशेषणेऽपि नासत्ख्यातिरूपगन्तव्येति चेत् । न ; असत्ख्यात्यभ्युपगमस्य
सत्ख्यातित्वात्यागनियमोपगमविश्रान्तत्वात् । असदपि सदुपश्लिष्टमेव प्रतिभासते,
न तु केवलमसत् कयाऽपि ख्यात्या समुल्लिख्यते इत्यन्यथाख्यातिवादिभिरिष्य-
माणत्वात् । वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नमिति प्रतिपत्राऽपि भिन्नमित्ययमंशः
सामान्यतोऽन्यत्र दृष्ट एव प्रतीयते । केवलं भेदस्य सदाश्रयः प्रतियोगी चेति
प्रयोजक होते हैं ) वादी का प्रबोधन करता है, वैसे ही अप्रमाण का अवलम्बन करके
भी वादी का प्रबोधन करे तो क्या हानि है ? कारण मध्यस्थ वादी के प्रति अनौचित्य
का प्रबोधन भ्रान्ति से ही कर सकता है, उसके लिए अभ्रान्तता से व्यवहार्यता का
नियम नहीं है । तस्मात् मध्यस्थ के प्रति प्रतिवादी भी उत्तर न देने के अपने दोष
( अप्रतिभा ) के परिहारार्थ अनौचित्य का बोध करा ही सकता है । कारण मध्यस्थ
के प्रति अप्रमाण से भी प्रतिबोधन में उसे कोई दोष नहीं है । एवञ्च वादी के
नियोग के बिना मध्यस्थ भी उसके अनौचित्य का उद्भावन कैसे करेगा, यह शंका
भी नहीं रहती ।
प्रश्न—अत्यन्त असत् वादी के प्रति वादी के, वादी के प्रति मध्यस्थ के या
मध्यस्थ के प्रति वादी के को व्यवहार का विषय मान लेने पर तो असत्ख्याति
का स्वीकार हो जायगा । उत्तर—अन्यथाख्यातिवादी विशिष्ट अंश या सम्बन्ध-अंश
में जैसे असत्ख्याति मानते हैं, वैसे ही अनौचित्य के विषय में भी असत्ख्याति
मानें, तो हानि क्या है ?
प्रश्न—'वन्ध्या-सुत से शश-विषाण भिन्न है' इस स्थल में विशेष्य-विशेषण अंश
में भी असत्ख्याति क्यों न मानी जाय ? उत्तर—असत्ख्याति के अस्वीकार का अर्थ
है, सत्ख्याति का अत्याग । सर्वथा असत्ख्याति को न मानना उसका अर्थ नहीं है,
कारण असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् किसी ख्याति
से नहीं भासता । यही तो अन्यथाख्यातिवादी भी मानते हैं । 'वन्ध्या-सुत से

५७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
यद्वस्तुतः तदसदाश्रयः प्रतियोगी च तस्येत्यन्यथा कृत्वा प्रतीयत इत्यन्यथा-
ख्यातिरेवोपगता भवति ।
यथा तु विशिष्टमत्यन्तासदेव तथाऽऽश्रयप्रतियोगिनी अत्यन्तासती
एव किं न प्रतिभासेते ? तावताऽपि यथोक्तान्यथाख्यात्यनुलङ्घनादेव ।
न चैवमसत्ख्यातिवादिनाऽपि शक्यं वक्तुम् ; केवलं सदेव प्रकाशत इत्य-
स्मात्पक्षाद्विपरीतं विशिष्टं सम्बन्धश्च क्वचिद्विशेषणाद्यपि अत्यन्तासद् भ्रान्त्योल्लि-
ख्यत इत्येवंरूपा तावदसत्ख्यातिः परेणोपगतैव । यदि तु सदपि प्रकाशते
किञ्चित्, तत्किं नासत्प्रकाशत इति । यतः परेण विकल्पः सर्वथा वस्त्वनुल्लेखी
केवलमलीकमुल्लिखन् असत्ख्यात्यात्मा स्वीक्रियते ।
यदि तु यथोक्तमेव परोऽप्यभ्युपगच्छति; तदानीमनुमानप्रमाणादिवत्
अत्राप्यविप्रतिपत्तिरेवेति ।
शशविषाण भिन्न है' इस स्थल में भी सामान्यतः अन्यत्र दृष्ट ही भेद प्रतीति का
विषय होता है । अन्तर केवल यह है कि अन्यत्र भेद का सत् आश्रय और प्रतियोगी
भासता है और प्रकृत में अन्यथा रूप से भेद का असत् प्रतियोगी और असत् आश्रय
भासता है । फिर यहाँ भी अन्यथाख्याति ही क्यों न मानी जायगी ? जैसे विशिष्ट
अत्यन्त असत् ही भासता है, वैसे ही उक्त प्रतीति में आश्रय आश्रय और प्रतियोगी
अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसा मानने पर भी अन्यथाख्याति का उल्लंघन नहीं है ।
प्रश्न—असत्ख्यातिवादी भी कह सकता है कि "जैसे 'केवल सत् ही
भासता है' इस पक्ष से विपरीत विशिष्ट, सम्बन्ध और कहीं-कहीं विशेषण भी
अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसी असत्ख्याति को अन्यथाख्यातिवादी मानते हैं,
वैसे ही असत् भी 'सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल नहीं भासता । अतः सर्वज्ञान
असत्ख्याति ही है।" उत्तर—बौद्ध सद्वस्तु की अनवगाहिनी केवल उल्लेख करनेवाली
विकल्परूप असत्ख्याति मानते हैं और अन्यथाख्यातिवादी सत्-उपश्लिष्ट ही असत्
भासता है, ऐसा मानते हैं । दोनों मतों में यह महान् भेद है ।
यदि कहें कि 'बौद्ध भी सत् से उपश्लिष्ट ही असत् के भान को असत्ख्याति मान
लेंगे। अर्थात् जैसे किञ्चित् सत् के भासने पर भी वे अन्यथाख्याति मान लेते हैं, वैसे
ही किञ्चित् असत्के भासने पर असत्ख्याति भी क्यों न मानी जाय ?', तो यह भी ठीक
नहीं। कारण अनुमान के प्रामाण्य के तुल्य उक्तस्वरूप असत्ख्याति मानने में हमें तो
कोई विप्रतिपत्ति नहीं होगी, किन्तु आप बौद्धों के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा ।

परिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७५
ननु सर्वथैवासत्ख्यातिरपि भवताऽनुमन्तव्यैव । तथाहि-'वन्ध्यासुत-शशविषाणे
कूर्मरोमैवे'ति वदतः शब्दादर्थं प्रतिपादयतां किं तदणुमात्रमपि समुल्लेख्यं तत्प्र-
तीतेरिति चेन्न । तत्रापि तादात्म्यस्य सामान्यतोऽन्यत्र प्रतीतस्यैव असदुपहितस्य
स्फुरणोपगमात् । प्रकारभेदवैशिष्ट्येन भिन्नयोरेकत्वं हि तादात्म्यम्, तच्चाऽन्य-
त्रास्त्येव ।
तर्कसंशयाभ्यामप्रमाभ्यां जननेऽपि तत्तत्प्रमावत् मध्यस्थाद्यप्रमया तथा
प्रश्नानौचित्यादिप्रमोत्पादनाविरोधः । बाधवद्भ्रमविषयातथाभावेऽपि भ्रमस्या-
अप्रमात्वपारमार्थिकतावत् प्रश्नविषयासत्यत्वेऽपि प्रश्नानौचित्यसत्यतोपपत्तिरेव ।
एतेन भ्रान्तिजाया धियः प्रमात्वं तथाप्यदृष्टचरमित्यपि परास्तप्रायमिति ।
एवमन्यत्राप्येवंविधोदाहरणे वाच्यम् ।
प्रश्न—आपको सर्वथा असत्ख्याति भी अवश्य माननी होगी। देखिये—'वन्ध्या-
सुत और शशविषाण कूर्मरोम ही हैं' इस शब्द का क्या अणुमात्र भी अर्थ है, जो उक्त
प्रतीति का विषय हो ? उत्तर—सामान्यरूप से अन्यत्र प्रतीत ही असत् से उपहित
तादात्म्य इस प्रतीति का विषय होता है। कारण प्रकार-भेद से विशिष्ट विभिन्न अर्थों
का ऐक्य 'तादात्म्य' पदार्थ है और वह अन्यत्र सत् ही है।
किंच—तर्क तथा संशय स्वयं तो अप्रमाण हैं, फिर भी जैसे उनसे प्रमात्मक
अनुमिति होती है, वैसे ही मध्यस्थ के अनौचित्यरूप विषय को विषय करनेवाली अप्रमा
से भी प्रश्नानौचित्यविषयक प्रमा उत्पन्न हो ही सकती है। अथवा बाधित भ्रम का
विषय भी असत् ही होता है, फिर भी उक्त भ्रम अपने में अप्रमात्व की पारमार्थिकता
( प्रमा ) का जनक होता ही है। इसी तरह 'शशशृङ्गमृजु वक्रं वा ?' इस
प्रश्न का विषय असत् होने पर भी प्रश्नानौचित्य में सत्यत्व का अवगाहन करनेवाली
प्रमा हो ही सकता है।
इसीसे 'भ्रान्ति से जायमान बुद्धि में प्रमात्व कहीं नहीं देखा गया है' यह कथन
भी खंडितप्राय है। कारण पीछे अनेक उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया जा चुका
है कि भ्रान्तिज बुद्धि से भी प्रमा होती है। इसी प्रकार वन्ध्यासुत, गगनारविन्द,
कूर्मरोम आदि असत्ख्यातियों में सत् से उपश्लिष्ट ही असत् का भान मानना
चाहिए।

५७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
न च कश्चिदुक्तप्रकारमन्यथाख्यातिसमाधानं नानुमन्तुं शक्नोति ।
अन्यथा कथमसत्ख्यातिवादिनो मतमपि जानीयात्, अज्ञात्वा च स्वपरमत-
वैचित्र्यं वादे प्रवर्तेत ।
एते सर्वेऽपि तर्काः प्रमाणविरोधे वा प्रमाणाभावे वा निष्पीडिताः प्रविशन्तो
न बाधासिद्धिभ्यां भिद्यन्ते । पूर्वैरपि लोकसिद्धत्वात् व्यवहृताः । केवलमस्माभिरेव
तर्कपदव्यामभिषिक्ताः, ततो न प्रबन्धेन निरस्यन्ते - 'विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं
च्छेत्तुमसाम्प्रतम्' इति ।
तर्काभास-खण्डनम्
ये च परैस्तर्कदोषाः षट् स्वीक्रियन्ते—आश्रयासिद्धिः, अनुकूलत्वम्, मूलशैथि-
ल्यम्, इष्टापादनम्, विपर्ययापर्यवसानम्, मिथोविरोधश्चेति; सोऽयं तर्कस्य दोषविभागो
'असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् नहीं भासता और यही
अन्यथाख्याति है'— कोई भी अन्यथाख्यातिवादी इस प्रकार उक्त अन्यथाख्याति के
निर्वाह का अस्वीकार नहीं कर सकता । यदि अस्वीकार करे, तो असत्ख्यातिवादी के
मत को कैसे जानेगा ? कारण वह असत् का भान तो मानता नहीं । मेरे कथन के
अनुसार तो सत् जो ख्याति, उससे उपश्लिष्ट असत् का भान होता है, अतः असत्-
ख्यातिवादी का मत जानने में उसे कोई बाधक नहीं है । स्व और परमत का
वैलक्षण्य बिना जाने कोई भी पुरुष वाद में प्रवृत्त ही कैसे हो सकेगा ?
विचार करने पर यदि अविनिगम आदि चार तर्क प्रमाण के विरोधरूप हों, तो
बाध में और यदि प्रमाण के अभावरूप हों, तो असिद्धि में अन्तर्भूत हो जाते हैं,
इनसे पृथक् नहीं हैं। पूर्वाचार्यों ने भी इन तर्कों को लोकसिद्ध माना है। मैंने ही
केवल इन्हें तर्क-पदवी पर आरूढ़ किया है। इसीलिए हम अतियत्न से इनका
खण्डन नहीं करते। कारण विष का वृक्ष भी स्वयं बढ़ाकर स्वयं छेदन के अयोग्य
होता है, ऐसा वृद्धजन कहते हैं। अर्थात् बाध और असिद्धि से पृथक् पूर्वोक्त
अविनिगम आदि तर्कों की सत्ता ही नहीं है और उन दोनों का खण्डन हो ही
चुका है। अतः इनका खण्डन व्यर्थ है, यह भाव है।
तर्काभासों का खण्डन
आश्रयासिद्धि, अनुकूलत्व, मूलशैथिल्य, इष्टापादन, विपर्ययापर्यवसान और मिथो-
विरोध तर्क के ये पांच अन्य दोष भी आचार्यों ने माने हैं। यह दोषविभाग भी ठीक

अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७७

नोपपद्यते । व्याप्तिपक्षधर्मतयोः प्रतीतिमपेक्ष्य यथाऽनुमानं जायते तथैव
तर्कोऽपि । इयान् परमनयोर्विशेषो यदनुमानं तयोः प्रमित्या जायते, तर्कस्त्व-
वास्तवाभ्यामपि ताभ्यां पराभ्युपगममात्रसिद्धाभ्यां भवति । तेन विमृष्यमाणः
तर्कः पराभ्युपगममात्रप्रसादसिद्धपरिकरो नाऽऽश्रयासिद्धिमपि तावद्वास्तवीमनु-
रोद्धुमधिकरोति । ततः प्रमित्यभ्युपगमसिद्धिकृतवैचित्र्याश्रयाङ्गे'दादन्यो यावान्
यथा च हेत्वाभासविभागः, तद्वदेव च तर्काभासविभागोऽपि न्याय्यः ।
तस्मादाश्रयासिद्धिमूलशैथिल्येष्टापादनानि असिद्धिरेकैव दोषोऽनुमानवत् ।
तत्र अप्रमितत्वावलम्बिनी, इह त्वनभ्युपगमावलम्बिनीति विशेषः ।
मिथोविरोधश्च सत्प्रतिपक्षतैव । विपर्ययापर्यवसानं तु दोष एवाऽऽपादनस्य
न भवति । यन्नाम विपर्ययापर्यवसानादापादनमात्मसाधनानुकूलं न भवति,
तदन्यदेव किमपि ।
नहीं है । कारण व्याप्तिपक्षधर्मता की प्रतीति के बल पर जैसे अनुमिति होती है, वैसे
ही तर्क भी होता है । किन्तु दोनों में भेद यह है कि अनुमिति तो 'व्याप्ति-पक्षधर्मता
की प्रमिति' के बल पर से होती है और तर्क अवास्तव, किन्तु 'पर के अभ्युपगम-
मात्र से सिद्ध व्याप्ति-पक्षधर्मता' से भी होता है । इस प्रकार विचारने पर तर्क पर के
अभ्युपगममात्ररूप प्रसाद से सिद्ध सामग्रीवाला है । अतः वह वास्तविक आश्रयासिद्धि
को भी रोक नहीं सकता । तस्मात् प्रमिति और अभ्युपगम की सिद्धि के वैचित्र्य-
मूलक भेदों को छोड़ जितने और जिस प्रकार के हेत्वाभास के विभाग अनुमान
में होते हैं, तर्क में भी उतने ही और उसी प्रकार के तर्काभास-विभाग जानने
चाहिए ।
तस्मात् आश्रयासिद्धि, मूलशैथिल्य, इष्टापादन ये तीनों तर्कदोष असिद्धिरूप एक ही
दोष के अन्तर्गत है, जैसा कि अनुमान में होता है । दोनों में अन्तर इतना ही है कि
वह असिद्धि 'अप्रमितत्व' का अवलम्बन करती है, तो तर्क में 'अभ्युपगम' मात्र का ।
इसी तरह मिथोविरोध सत्प्रतिपक्ष ही है । फिर, विपर्ययापर्यवसान तो तर्क का दोष ही
नहीं है । जो आपादन, विपर्यय में पर्यवसान न होने से, आत्मसाधन के अनुकूल
नहीं होते वे और ही कुछ दोष हैं । अर्थात् जहां पर-पक्ष में दोषमात्र देना हो वहाँ
विपर्ययापर्यवसित तर्क का भी उपयोग होने से विपर्ययापर्यवसान को तर्काभास तो
मान ही नहीं सकते । फिर जहां स्वपक्ष-साधनार्थ विपर्ययापर्यवसित तर्क का उपन्यास
नहीं होता, वहाँ उसका कारण कुछ और ही दोष हैं, कथित तर्काभास नहीं ।

५७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
बाधविरुद्धत्वव्यभिचारास्तु अनुमानवत् तर्केऽपि दोषाः पृथग्वाच्याः ।
बाध उत्सर्गसम्भावनादेरन्यत्रानुकूलः ।
तर्कस्य सप्तममपि दोषं तर्कस्याऽऽपत्तिसाम्यं न नामोपगच्छामः , स चोभा-
भ्यामभ्युपगतव्याप्येनानभ्युपगतव्यापकेन प्रागेव दर्शित इत्यास्तां विस्तर इति ।
सर्वखण्डन-प्रकारोपदेशः
एवं प्रकाराणि तत्तल्लक्षणेषु खण्डनान्यूहनीयानि । तदेतासु खण्डनयुक्तिषु
कामपि स्थानान्तरस्थां केनापि प्रकारान्तरेणाऽऽनीय तत्सदृशीमन्यादृशीं वा
स्वयमूहयित्वा परैर्विविच्यमानानि पदार्थान्तराण्यपि बुद्धिमता बाधनीयानि ।
अत्र चास्माभिर्दूषयितुं शङ्कितेभ्यः परपक्षप्रकारेभ्यो यदि प्रकारान्तरं
कोऽपि स्वयमूहति, उक्तानां बाधकानां मध्ये क्वचित्प्रज्ञयाऽपि समाधानमभिद-
इतना ही नहीं बाध, विरोध और व्यभिचार अनुमान की तरह तर्क में भी पृथक्
ही दोष हैं । उत्सर्ग तथा सम्भावनारूप तर्क से भी अन्य तर्कों में बाध अनुकूल है,
अर्थात् आभासत्व का प्रयोजक नहीं है ।
कुछ लोग तर्क में 'आपत्तिसाम्य'रूप सप्तम दोष भी मानते हैं। यह आपत्तिसाम्य
वहाँ होता है, जहाँ दोनों पक्षों ने व्याप्य का स्वीकार किया हो और व्यापक का स्वीकार
न किया हो । किन्तु इस दोष को 'यदि सत्ता सद्द्व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो
जायगी' इस स्थल में तर्क-खण्डन के प्रस्ताव में 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि से
हम पहले ही दिखा चुके हैं, अतः विस्तार व्यर्थ है ।
सर्व-खण्डन-प्रकार का उपदेश
हमने विस्तार-भय से जिन लक्षणों का खण्डन नहीं किया है, उन लक्षणों में
भी अस्मदुक्त खण्डन के सदृश खण्डनों की स्वयं ऊहा कर या इन्हीं खण्डन-युक्तियों के
बीच अन्य स्थानस्थित किसी खण्डनयुक्ति का किसी प्रकार आनयन कर या तत्सदृश
युक्तियों की ऊहा कर वादी द्वारा विवेचित अन्यान्य पदार्थों के लक्षणों का भी बुद्धि-
मान् खण्डन करें ।
इस ग्रंथ में हमने जिन लक्षणों का खण्डन किया है, यदि वादी उनके तुल्य
अन्य लक्षणों की ऊहा करे या उक्त बाधकों के बीच अपनी प्रज्ञा के बल किसीका समा-
धान भी कर दे और खण्डनवादी को प्रस्तुत समाधान की स्फूर्ति न हो, तो वादी द्वारा