खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
५२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ नापि द्वितीयः ; ‘अस्मादयं दीर्घः' इतिवत् ‘अस्मादयं वर्तते' इत्यवध्यपेक्षा- मन्तरेण प्रतीयमानत्वात् सर्वदैव च त्रिविधावध्यपेक्षया ‘आसीदस्ति भविष्यती'ति प्रत्ययाव्यवस्थाप्रसङ्गात् । अत एव न तृतीयः । नापि चतुर्थः; अतीतानागतप्रतीतिकाले क्रियावच्छेदप्रकारेण वर्तमानप्रत्यय- विषयत्वप्रसङ्गात् । नासौ क्रियावच्छेदलक्षणः प्रकारोऽतीतानागतकाले वर्तत इति चेन्न । वर्त- मानताया अद्याप्यनिरूपणेन वर्तत इत्युक्त्वा विशेषस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । तत्क्रियाकाले तत्क्रियावच्छिन्नः कालो वर्तमान इति चेन्न । कालस्य काला- भी तत्क्रिया से अवच्छिन्न काल है । अतः उस क्रियारूप उपाधि की अपेक्षा उस काल में वर्तमानत्व हो जायगा, यह दोष हम बार-बार कह आये हैं । द्वितीय और तृतीय कल्प भी युक्त नहीं हैं। कारण जैसे ‘अस्मात् अयं दीर्घः' इत्यादि व्यवहार में नियमतः अवधि की अपेक्षा होती है या जैसे ‘घटात् भिन्नः पटः' इत्यादि व्यवहार में भेद प्रतियोगी की अपेक्षा करता है, वैसे ही ‘वर्तते’ इस व्यवहार में नियमतः ‘अस्मात्’ ऐसी अवधि या प्रतियोगी की अपेक्षा नहीं होती । अर्थात् ‘घटो वर्तते' ऐसा व्यवहार होता है, 'घटाद् वर्तते' ऐसा व्यवहार नहीं होता । यदि अवधि को प्रतियोगी की नियमतः अपेक्षा हो, तो 'घटाद् वर्तते' ऐसा व्यवहार भी होने लगेगा । ‘उसे क्रिया की अपेक्षा से' अर्थात् उस क्रियारूप प्रकार से, यह चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है । कारण अतीत-अनागत व्यवहार में भी ध्वंसादि के विशेषणत्वरूप से उस क्रिया का अवच्छेद काल में है । अतः उस क्रिया-प्रकार से अतीतादि व्यवहारकाल में भी वर्तमानत्व-व्यवहार हो जायगा । समर्थन—वह क्रियारूप प्रकार अतीतादि व्यवहारकाल में वर्तमान नहीं है । लक्षण में ‘वर्तमान जो क्रियारूप प्रकार, उस प्रकार से वह काल वर्तमान है' ऐसा निवेश होने से उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—अभी तक वर्तमान का लक्षण न होने से वर्तमान के निवेशविशेष को आप नहीं दिखा सकते । अर्थात् वर्तमान के लक्षण में वर्तमान का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा । समर्थन—‘उस पाकादि क्रिया-काल में उस क्रिया से अवच्छिन्न काल, उस क्रिया-प्रकार से वर्तमान है।' खण्डन—काल काल का आश्रय नहीं हो सकता, कारण
परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२५ श्रयतया निरूपणसम्भवात्कालान्तरस्यानभ्युपगमात् , तस्यैव कालस्य तदाश्रय- वत्त्वे व्यक्तमात्माश्रयत्वापत्तेः । स्यादेतत्—ग्राहकविज्ञानविषयो ग्राहकविज्ञानाश्रयश्च कालो वर्तमानः, वर्तमानोपाधिप्रागभावावच्छिन्नश्च पूर्वः, तत्प्रध्वंसाभावावच्छिन्नश्चानागतः । प्रागभावप्रध्वंसयोश्च स्वाभाविकमेव भेदमादाय व्यवस्था । प्राग्व्यवस्थाहेतुरभावः प्रागभाव इति स्वभावभूतस्यैव विशेषस्य कार्यमादाय लक्षणम्, अनागत- व्यवस्थानिदानमभावः प्रध्वंस इति च प्रध्वंसस्येति । मैवम् ; ज्ञानास्वप्रकाशतापक्षे स्वोपहितस्य स्वयं ग्रहणानुपपत्तेः कथं वर्तमा- नताग्रहः ? ज्ञानान्तरेण च तथाग्रहे वर्तमानतावभासाङ्गीकारे 'तदाऽसौ दृष्टो मये'ति प्रत्ययस्य 'तदाऽसौ मया दृश्यते' इत्याकारतापत्तिः । वह एक है । दो काल तो आपके मत में भी हैं नहीं। फिर उसी काल को उसी काल का अधिकरण मानें, तो आत्माश्रय हो जायगा । अतः यह भी लक्षण अयुक्त है । समर्थन—'ग्राहक-ज्ञान का विषय होकर ग्राहक-ज्ञान का आश्रय जो काल, वह वर्तमान है' यह वर्तमान का लक्षण हो सकता है । इसी तरह 'वर्तमान जो उपाधि ( सूर्यादि-क्रिया ), उसके प्रागभाव से अवच्छिन्न काल' अतीत है तथा 'वर्तमान उपाधि के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल' भविष्यत् है, ऐसे लक्षण कर सकते हैं । प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव का जो स्वाभाविक भेद ( स्वरूपरूप विशेष ) है, उसको लेकर ही परस्पर भेद-व्यवस्था हो जायगी । प्रागभाव के स्वभावभूत विशेष के प्राग्व्यवस्थारूप कार्य का ग्रहण कर 'प्राग्व्यवस्था ( उपाधि की पूर्व अवस्था ) का हेतु जो अभाव, वह प्रागभाव है', यह लक्षण हो सकता है और अनागत व्यवस्था ( उपाधि की उत्तर अवस्था ) का कारण' ध्वंसाभाव है । खंडन—जो ज्ञान को स्वप्रकाश नहीं मानते, उनके मत में ज्ञानघटित उक्त लक्षण से उपहित वर्तमान काल का ग्रहण कैसे होगा ? यदि कहें कि अन्य ज्ञान से लक्षणघटक ज्ञान का ग्रहण होने से लक्षणयुक्त वर्तमान काल का भी अन्य ज्ञान से ही ग्रहण होगा, तो 'तदाऽसौ दृष्टो मया' इत्याकारक ज्ञान में 'तदाऽसौ दृश्यते' इस प्रकार वर्तमानाकारतापत्ति हो जायगी । कारण 'स्वग्राहक ज्ञान का विषय तथा स्वग्राहक ज्ञान का-आश्रय जो काल, तद्विषय पर देवदत्तरूप' उक्त वाक्यार्थ का उक्त अतीत ज्ञानस्थल में बाध नहीं है, किन्तु सम्भव ही है।
५२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ अत एव स्वप्रकाशपक्षेऽप्यनिस्तारः । यावानर्थः स्वप्रकाशे वर्तमानतयोक्त- स्तावत एव परेण ग्रहणे व्यभिचारात्, स्वप्रकाशतायाश्चाधिक्येऽपि विषये विशेषाभावात् । स्वरूपमेव विशेष इति चेन्न । तस्यानुगमाननुगमाभ्यामनुपपत्तेः । प्राक्प्रध्वंसा- भावयोश्च स्वरूपतोऽविशेषेऽपि कतरो भूतव्यवहारस्य कतरश्च अनागतव्यवहार- स्योपाधिरित्यनुयुक्ते कार्यभेदजनकत्या च तन्निरुक्तावुत्तरे पूर्वप्रत्युक्तां पूर्वता- परतानिरुक्तिं विना जन्यजनकत्वाज्ञानमिति । उपाधिभेदाच्च कालभेदे योऽप्येकतयाऽभिमतः कालः, सोऽपि चन्द्रसूर्यक्रिया- द्यसङ्ख्योपाधिभेदसम्भवेन नाना स्यात् । तत्रायमेवोपाधिर्नायमिति चाविनि- 'ज्ञान स्वप्रकाश है' इस मत में भी 'तदाऽसौ दृश्यते' यह आकार होने लगेगा । इसी दोष से वर्तमान का उक्त लक्षण अयुक्त है। कारण जो अर्थ स्वप्रकाश-मत में वर्तमानत्वरूप से उक्त है, उसी अर्थ का 'तदाऽसौ दृष्टः' इस स्थल में अन्य ज्ञान से भी ग्रहण है । 'जो काल स्वप्रकाश ज्ञान का आश्रय हो, वह वर्तमान है' इस प्रकार यदि लक्षण में स्वप्रकाश यह अधिक विशेषण दें, तब भी लक्ष्यभूत वर्तमानरूप विषयों में किसी विशेषण का लाभ नहीं होता । समर्थन—'स्वप्रकाश ज्ञान का ही विषय हो, अन्य का नहीं' इस प्रकार निवेश करने से लक्ष्य में भी विशेष हो जायगा । खंडन— ऐसा लक्षण करने पर लक्षणघटक 'स्व' शब्द से यदि चैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो मैत्रज्ञान में और मैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो चैत्रज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि लक्ष्यभेद से लक्षण का भेद मान लें, तो अनुगम दोष हो जायगा । किञ्च—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव दोनों ही अभाव हैं, अतः इनके स्वरूप में तो कोई विशेष है नहीं। फिर 'कौन-सा अभाव भूत-व्यवहार का और कौन-सा अनागत व्यवहार का हेतु है' यह प्रश्न होने पर कार्यभेद (-प्रागवस्था, अनागत-अवस्था ) के जनकत्व से दोनों अभावों में भेद बतलाकर उक्त प्रकार से उत्तर हो नहीं सकता। कारण जबतक अतीतत्व का लक्षण न हो, तबतक कारण का लक्षण न होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—उपाधि-भेद से वर्तमान आदि कालों के भेद की कल्पना करें, तो जो एक ही वर्तमान काल है, वह भी सूर्य, चन्द्र आदि की क्रियारूप उपाधियों के भिन्न भिन्न होने से अनेकरूप हो जायगा। सूर्य की क्रिया ही उपाधि है, चन्द्र की क्रिया नहीं,
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२७ गम्यत्वात् । प्रतिक्षणस्वभावभेदादिपन्ते च नानाक्षणेषु वर्तमानत्वादिव्यवहारार्थ- मुपाध्यनुसरणावश्यम्भावेन उक्तोपाधिदोषग्रासस्यैवाऽऽपातादिति । संशय-लक्षण-खण्डनम् ननु तथापि तावद्विषयभेदेनावश्यं भवितव्यम्, प्रतीतिभेदस्य दुरपह्नवत्वात् । अतः सामान्यतः सिद्धौ विशेषतो विवेचनाशक्तौ भेदे संशय एवास्तामिति चेन्न । संशयस्यापि निर्वक्तुमशक्यत्वात् । तथाहि-- संशयस्य निश्चयात्किमुपाधिकृतो विशेषः, उत जातिकृतः ? आद्ये किं विषयविशेषेणोपाधिना, उत कारणविशेषेण, उतान्येनैव केन- चित्सम्बन्धिना कृतः ? न प्रथमः; तस्यानिर्वचनात् । उभयकोटिविषयः संशय इति चेन्न । कोटिद्वयसमुच्चयनिश्चयस्यापि संशयत्व- इसमें कुछ प्रमाण नहीं। इसी तरह जो बौद्ध प्रतिक्षण काल का स्वाभाविक भेद मानते हैं, उनके मत में भी अनेकक्षणसमूह में उपाधि-भेद के बिना वर्तमानादि-व्यवहार हो नहीं सकता । अतः सूर्यादिक्रियारूप उपाधि अवश्य माननी पड़ेगी और उसे मानने में पूर्वोक्त दोष स्पष्ट हैं । संशय-लक्षण का खण्डन समर्थन--वर्तमानादि प्रतीतियों ( 'वर्तते, वर्त्स्यति, अवर्तिष्ट' आदि प्रतीतियों) का भेद अनुभवसिद्ध होने से उनके विषय-भेदों का अपलाप नहीं किया जा सकता । प्रतीति निर्विषय तो हो नहीं सकती, अतः विषय का रहना निर्विवाद है । एवञ्च उस विषय का कालविशेष का लक्षण करना संभव न होने के कारण 'अयमसो' इस प्रकार विशेष-दर्शन असंभव होने से विशेषाग्रहणसहित सामान्यग्रहण काल-विषयक संशय उत्पन्न करता है । तथाच संशयीय एककोटि-प्रविष्टतया काल की सिद्धि हो ही जायगी । खण्डन--संदेह का लक्षण भी आप नहीं कर सकते । देखिये, संदेह में निश्चय से भेद क्या उपाधिकृत है या जातिकृत ? प्रथम पक्ष में विषयविशेष उपाधि है, कारणविशेष या अन्य ही कोई सम्बन्धी उपाधि है, जिससे संदेह में भेद है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण विषयकृत निश्चय से संशय में भेद है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । समर्थन--'एकधर्मी में उभयकोटियों का अवगाही ज्ञान संदेह है।' खंडन--एक
प्रसङ्गात् । प्रतीतिरेव नैवमिति चेन्न । भेदाभेदप्रतीतीनां शाब्दस्वाप्नादि- प्रतीतीनां च तादृशां सम्भवात् । समुच्चयप्रकाशे कोट्योरविरोधः प्रकाशते, संशये तु विरोध इति चेन्न । 'पीतः शङ्खः' इत्यादिषु पीतत्वशङ्खत्वादेर्भिन्नाश्रयतानियमं विरोधं जानतोऽपि प्रत्ययात् । तथापि तस्यां बुद्धौ न भासते विरोध इति चेन्न । कथमेवमिति प्रकाशेऽपि तत्प्रकाशात् । तयोरेकाश्रययोर्विरोधप्रतीतेरवश्योपेयत्वात् । मिथ्याधियस्ता इति चेन्न । संशयस्यापि भवद्भिरतत्त्वबुद्धितयाऽङ्गीकारात् । तत्त्वातत्त्वबुद्धयोश्च तद्विषयत्वेन विशेषाभावात् । नहि मिथ्यारजतबुद्धौ रजतबुद्धिरेव न भवति । अव्यवस्थितकोटिद्वयविषयः संशय इति चेत्; केयमव्यवस्थितता ? धर्मी में उभयकोटियों के अवगाही निश्चय में संशय-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। 'एकधर्मी में विरुद्ध कोटिद्वय का अवगाही निश्चय होता ही नहीं' ऐसा नहीं कह सकते, कारण भेदाभेदवादी के मत में 'भिन्न और अभिन्न यह घट है' यह प्रतीति तथा शब्द से स्वप्न में भी ऐसी प्रतीति होती है। 'निश्चय में दोनों कोटियों का विरुद्धत्व नहीं भासता और संशय में वह भासता है—यही दोनों में भेद है' ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण पीतत्व और शङ्खत्व के भिन्नाश्रयत्वरूप विरोध को जो जानता है, उसे भी पित्तरोग-काल में 'पीत शङ्खः' ऐसी प्रतीति होती ही है। समर्थन—यद्यपि पीतत्व और शंखत्व विरुद्ध हैं, तथापि उक्त निश्चय में विरोध नहीं भासता । खंडन—'पीतः शंखः कथम्' ऐसी विरोधविषयक प्रतीति भी होती है, कारण पीतत्व और शंखत्व की एकाधिकरण में प्रतीति निश्चय ही विरोधविषयक माननी होगी । समर्थन—'पीतः शंखः' यह प्रतीति भ्रम है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । कारण संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' यह भी निवेश है। खण्डन—यदि संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' निवेश करें, तो संशय के अयथार्थ होने से असम्भव हो जायगा। किञ्च—तत्त्वबुद्धि और अतत्त्वबुद्धि दोनों के विरुद्धकोटिद्वयावगाही होने से संशयत्व में कोई विशेष नहीं है, कारण मिथ्या रजत-बुद्धि भी रजतबुद्धि ही है । अर्थात् जहाँ शुक्ति में 'रङ्गं रजतं वा' ऐसा संशय होता है, वहाँ अव्याप्ति के भय से संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' यह निवेश नहीं कर सकते । समर्थन—'अव्यवस्थित जो कोटिद्वय, वह जिसका विषय हो, वह संशय है', ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन—'अव्यवस्थितता' क्या वस्तु है ? यदि आप कहें, अव्यवस्थितता
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२६ पाक्षिकतेति चेत्; न पर्यायं पृच्छामः, अपितु किं कोटिद्वयस्वरूपमेव उत कोटिद्वयस्य धर्मः कश्चित् ? आद्ये कोटिद्वयनिश्चयेन सहाविशेषस्तदवस्थः। द्वितीये यद्यसौ केनचित्प्रमाणेन सिद्धस्तदा तस्यैव कोटिद्वयाश्रिततद्धर्मविषयस्य संशयत्वप्रसङ्गेन प्रमाणत्वव्याघातः। अथ कस्यचित्प्रमाणस्य नासौ विषयः; नास्ति तर्हि विषयकृतो विशेषः । एतेन—अन्योऽपि यः कश्चिद्विषयविशेषः स्थाणुतदभाव-पुरुषतदभावादिरूपो- ऽभिधीयते, सोऽपि निरस्तो वेदितव्यः । अत्यन्तासत एव च तस्य प्रतिभासे जितं जिनैरसत्ख्यातिवादिभिः । क्वचित्सतश्चेत्तत्रैव प्रसङ्गः । नापि द्वितीयः ; कारणविशेषो हि विशिष्य सामग्री स्यात्तदेकदेशो वा ? पाक्षिकता है, तो यह पर्याय-कथन हुआ । हम तो पर्याय नहीं पूछते, किन्तु पाक्षिकता कोटिद्वय का स्वरूप है या कोटिद्वय का धर्म ? यह पूछते हैं । प्रथम पक्ष में ‘पीतः शङ्खः’ इस कोटिद्वय के निश्चय में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । द्वितीय पक्ष में यदि वह पाक्षिकता किसी प्रमाण से सिद्ध है, तो वह प्रमाण कोटि- द्वय में आश्रित पाक्षिकता-विषयक होने से संशय हुआ । फिर वह प्रमाण कैसे हो सकता है ? यदि पाक्षिकता किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं है, तो विषयकृत संशय में कुछ विशेषता सिद्ध नहीं हुई । ‘स्थाणुत्व, पुरुषत्व आदि जो संदेह के विषय हैं, तद्-रूप या तन्निष्ठ कोई अतिशय अनुभवसिद्ध है और तद्विषयक ज्ञान संशय है’ यह कथन भी उक्त युक्ति से खण्डित है । अर्थात् यदि वह अतिशय प्रमाणसिद्ध है, तो प्रमाणत्व का व्याघात है । यदि प्रमाण से असिद्ध है, तो प्रमाण के अभाव से अतिशय ही असिद्ध है । यदि कहें कि संशय में अत्यन्त असत् ही अतिशयरूप भासता है, तो असत् का स्वीकार होने से आपके लिए अपसिद्धान्त हुआ और शून्यवादी बौद्ध विजयी हुए । यदि कहें कि वह क्वचित् सत् है, तो जिस प्रमाण से वह सिद्ध हुआ, उसी प्रमाण में उस संशय-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘'संशय में कारणकृत विशेष है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि वह कारणविशेष सामग्री है या सामग्री का एकदेश ? ६७
५१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नाद्यः; तस्या अप्रत्यक्षत्वेन तदुपहितस्य प्रत्यक्षतोऽवगमानुपपत्तेः। न च तस्या अनुमेयत्वम्; लिङ्गासम्भवात्। कार्यविशेष एव लिङ्गमिति चेन्न । कार्यगतस्यैव विशेषस्य चिन्त्यमानस्याद्याप्यप्राप्तेः जातिभेदस्य दूषणीयत्वात्। नापि द्वितीयः ; दृश्यस्य तदेकदेशस्य साधारणधर्मदर्शनादेर्विशेषद्वयस्मरणा- देश्च साधारणधर्मविशेषद्वयज्ञानप्रत्यक्षादावपि हेतुत्वेन साधारणत्वात् । अदृश्ये च तस्मिँल्लिङ्गाभावात् । तेन कार्ये विशेषजात्याधानस्य निरस्यत्वात्। तस्या अविषयत्वेन अनुव्यवसायसाक्षिककार्यगतविशेषीभवनासामर्थ्यात् । नापि तृतीयः ; तस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । यदि सामग्री कहें, तो सामग्री का प्रत्यक्ष न होने से उक्त लक्षणयुक्त संशय का भी प्रत्यक्ष नहीं होगा। लिङ्ग के न होने से वह सामग्री अनुमेय भी नहीं है। समर्थन—कार्य-विशेष ( संशय ) ही लिङ्ग है। खंडन—संशयगत विशेष का ही तो विचार हो रहा है और अबतक कुछ भी निश्चित नहीं हुआ है। 'संशयत्व जाति है' इस पक्ष का तो आगे खण्डन करेंगे । 'सामग्री के एकदेश से संशय में विशेष है' यह द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है; क्योंकि संशय का दृश्य कारण साधारणधर्म का दर्शन या विशेषद्वय का स्मरण है। वे दोनों स्वप्रत्यक्ष ( अपने अनुव्यवसाय ) के भी कारण हैं। अतः यदि वे संशयत्व-व्यवहार के कारण हों, तो उनके अनुव्यवसाय में भी संशयत्व-व्यवहार होने लगेगा। यदि अदृश्य सामग्री के एकदेश को विशेष मानें, तो उसमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि संशयत्व जाति को लिङ्ग कहें तो उसका ( संशयत्व जाति का ) आगे निरास करने- वाले ही हैं। यदि कहें कि 'संदेह्मि' इत्याकारक प्रत्यक्ष ? अनुभवसिद्ध संशयत्व जाति का आगे आप के द्वारा निरास करने पर भी संशय में कोई अन्य अतीन्द्रिय कारणवृत्ति उपाधि मान लेंगे, तो वह भी ठीक नहीं। कारण वह उपाधि प्रत्यक्ष की अविषय होनेसे अनुव्यवसायसाक्षिक 'मम संशयो जातः' इत्याकारक जो संशयज्ञानात्मक कार्य है, उसका विशेष होने की सामर्थ्य ही उसमें नहीं है। अथवा प्रत्यक्षात्मक अनुव्यवसाय उक्त अतीन्द्रिय कारणाधेया उपाधि में प्रमाण न होने से अन्य कोई प्रमाण कहना होगा । वह अशक्य होने से ऐसी उपाधि मान नहीं सकते । 'विषय या कारण से अन्य किसी सम्बन्धिकृत संशय में विशेष है' यह तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है; कारण उसे दिखा नहीं सकते ।
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५३१ न च द्वितीयः ; धर्मिस्वरूपादेरपि तद्विषयतया संशयितत्वप्रसङ्गात् । न चैवं 'न ह्ययं स्थाणुर्वा पुरुषो वे'ति संशये सति इदमा परामृश्यमानस्य ऊर्ध्वत्वशालिनो धर्मिणः स्वरूपसत्त्वेऽपि स्वरूपमेव भवति न वेति तद्द्रष्टुरभिमानो व्यवहारो वा, किं नाम ? तत्र स्वरूपसत्त्वमात्रांशावलम्बिनस्तस्य ज्ञानस्य निश्चयत्वमेव । ततः किमिति चेत् , एकस्यैव ज्ञानस्य निश्चयत्वसंशयत्वजातिसङ्करः । स प्रामाण्याप्रामाण्यवद् भविष्यतीति चेन्न । अत एव हि तयोरपि जातित्वा- नङ्गीकारः । किं नाम ? तथाभूतातथाभूतार्थतालक्षणोपाधिद्वयरूपताङ्गीकार एव तयोः । यदा च संशयत्वनिश्चयत्वलक्षणजातिद्वयसम्भिन्नं तद्विज्ञानमास्थीयते तदा कञ्चिद्विषयमपेक्ष्य संशयत्वं कञ्चिदपेक्ष्य निश्चयत्वमित्यापेक्षिकी जातिव्यव- स्थितिरित्यपूर्वः पन्थाः । ईदृशस्य पथः पान्थेनापि भवता किं नियामकमभिधेयम्, येन धर्मिणि तस्य निश्चयत्वं व्यवतिष्ठते, विशेषद्वये च संशयत्वम् । 'संशय में संशयत्व जाति अनुभवसिद्ध है, उसीसे संशय में निश्चय से भेद है' यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है । कारण संशयत्व जाति को भेदक मानें, तो धर्मी भी उसका विषय होने से उस अंश में भी वह ज्ञान संशय हो जायगा । किन्तु धर्मी- अंश में वह ज्ञान संशय नहीं है, कारण 'स्थाणु है या पुरुष' इस संशय-काल में 'इदम्' शब्द से परामृष्ट ऊर्ध्वत्वशाली धर्मी के स्वरूपसत्त्व में 'स्वरूप है या नहीं' ऐसा अभिमान या व्यवहार किसीको नहीं होता, किन्तु स्वरूप-अंश में वह ज्ञान निश्चय ही है । यदि कहें, धर्मी-अंश में उक्त ज्ञान का निश्चय होने से क्या हुआ ? तो यह हुआ कि एक ज्ञान में निश्चयत्व और संशयत्व दोनों जातियों का सङ्कर हो जाने से संशयत्व जाति ही सिद्ध नहीं हुई । यदि कहें कि गुण-जाति में संकर-दोष नहीं होता, अतः प्रमात्व-अप्रमात्व के तुल्य निश्चयत्व और संशयत्व दोनों का एक ही ज्ञान में संकर होने पर भी क्या हानि है, तो वह भी ठीक नहीं । सङ्कर-दोष होने से ही प्रमात्व-अप्रमात्व को भी हम जाति नहीं मानते । किन्तु 'तथाभूतार्थत्व' तो प्रमात्व है और 'अतथाभूतार्थत्व' अप्रमात्वं है, ऐसा मानते हैं । यदि एक ही ज्ञान में किसी विषय की अपेक्षा संशयत्व जाति और किसी विषय की अपेक्षा निश्चयत्व जाति मानें, तो आपने यह आपेक्षिकी (आंशिकी) जाति-व्यवस्थारूप अपूर्व मार्ग का स्वीकार किया । इस अपूर्व पथ के पथिक होकर भी आप किसे नियामक कहेंगे, जिससे धर्मी-अंश में उस ज्ञान के निश्चयत्व और विशेषद्वय-अंश में संशयत्व व्यवस्थित हो ।
५३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेषदर्शनादर्शने इति चेत् ; तर्हि भवति स्थाणोः स्थाणुत्वं पुरुषत्वं पुरुषस्य विशेषः प्रतीयते चासाविति विशेषदर्शनात्तत्रापि निश्चयप्रसङ्गः । संशयात्पूर्व्वं नास्ति विशेषदर्शनमिति युक्तस्तत्रापि संशय इति चेन्न । धर्मिधियः पूर्व्वं तर्हि कथं तद्गतविशेषदर्शनं स्यात् । संशयकाले चास्ति विशेष- दर्शनमित्यनन्तरं तर्हि संशयाननुवृत्तिप्रसङ्गोऽपि युक्त एव । तदीयविषयाद्विशेषाद् व्यतिरिक्तस्य विशेषस्य दर्शनं विवक्षितमिति चेन्न । ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वे’ति संशयानन्तरं ‘दारुमयो मांसमयो वाऽयमि’ति संशयो नोपपद्येत, तदुभयमयत्वातिक्तिोः स्थाणुत्वपुरुषत्वयोर्विशेषयोः पूर्वज्ञानेनो- ल्लिखितत्वात् । अन्यतरविशेषदर्शनं संशयप्रतिरोधकम्, संशयेन तु उभयोरुपदर्शनम्, अतो नोक्तदोषप्रसङ्ग इति चेत् ; तर्हि स्थाणुः पुरुषश्चेति कुतोऽपि विभ्रमे जाते ‘दारुमयो समर्थन—विशेष का दर्शन और अदर्शन ही क्रमशः निश्चयत्व और संशयत्व के प्रयोजक मानेंगे । खंडन—तब तो स्थाणु में स्थाणुत्वरूप विशेष है और पुरुष में पुरुषत्वरूप विशेष है ही और उनकी प्रतीति भी होती है । अतः विशेष-दर्शन होने से विशेषद्वय-अंश में भी निश्चयत्व हो जायगा । समर्थन—संशय से पूर्वकाल में विशेषदर्शन नहीं है, अतः उस अंश में संशयत्व युक्त ही है । खण्डन—तब तो उक्त ज्ञान के धर्मी-अंश में भी निश्चयत्व न होना चाहिए । कारण उस ज्ञान से पूर्वकाल में विशेष दर्शन नहीं है । किञ्च—संशयरूप विशेषदर्शन होने से संशय से उत्तरकाल में संशय-धारा की अनुवृत्ति भी नहीं होनी चाहिए । समर्थन— संशय के विषय जो कोटिद्वयरूप विशेष, उनसे अन्य विशेष का दर्शन संशय का प्रतिबन्धक है, ऐसा कहेंगे । एवञ्च संशय-धारा की अनुवृत्ति में कोई प्रतिबन्धक नहीं है । खण्डन—तब तो ‘स्थाणु है या पुरुष’ इस संशय के अनन्तर ‘दारूमय है या मांसमय’ यह संशय नहीं होगा ; कारण दारूमयत्व और मांसमयत्वरूप जो उस संशय के विषय हैं, उनसे अन्य स्थाणुत्व-पुरुषत्वरूप विशेष का दर्शन पूर्वकाल में हो चुका है । समर्थन—एक विशेष का दर्शन संशय का प्रतिबन्धक है । संशय में तो दोनों विशेषों का दर्शन है, अतः संशय के बाद उक्त संशय का प्रतिरोध नहीं होता ।
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५३३ वा मांसमयो वा' इति संशयप्रतिरोधो न स्यात्, पूर्वज्ञानेन विशेषद्वयोपदर्शनस्य कृतत्वात् । विशेषदर्शनं हि विशेषनिश्चयो विवक्षितो न तु विशेषज्ञानमात्रम्, येन संशयोपनीतादपि विशेषात्संशयप्रतिरोधः प्रसज्येतेति चेत् । मैवम्; संशयेन यावुप- दर्शितौ विशेषौ तत्र न संशयस्य निश्चयत्वमिति व्यवस्थायां सिद्धायामुप- दर्शितनियामकसिद्धिर्भवति । सिद्धे चास्मिनियामके संशयस्य विशेषद्वयं प्रति निश्चयत्वं नास्तीति सिद्ध्येदित्यन्योन्याश्रयापत्तेः को वारयिता ? स्यादेतत्—संशयज्ञानस्य धर्मिविषयत्वेऽप्युपगम्यमाने अर्धवैशसमपद्येत । तच्च तदनभ्युपगम एव निवर्तते । तेन धर्मिज्ञानं निश्चयात्मकमन्यदेव, 'स्थाणुर्वा पुरुषो वे'ति चान्यदेव संशयज्ञानमित्यभ्युपैष्याम इति चेत् । मैवम्; एकधर्मिसम्बन्धोपनयनव्यतिरेकेण स्थाणुत्वपुरुषत्वयोर्विरोध एव नास्तीति 'स्थाणुर्वा पुरुषो वे'त्येतदेव न स्यात् । न हि यस्य कस्यचित्स्थाणुत्वेन खंडन—तब तो किसी कारण 'स्थाणुः पुरुषश्च' ऐसा भ्रम होने पर 'दारुमयो वा मांसमयो वा' इस संशय का प्रतिरोध नहीं होगा; कारण पूर्वज्ञान का विषय एक नहीं, दो हैं । समर्थन—'विशेष-दर्शन' शब्द से विशेष-निश्चय विवक्षित है, ज्ञानमात्र नहीं । अतः संशयोपनीत विशेष-विषय से संशय का प्रतिरोध नहीं होता । खंडन—'संशय के विशेषद्वय अंश में निश्चयत्व नहीं है' इस व्यवस्था के सिद्ध होने पर 'विशेष-निश्चय संशय का प्रतिबन्धक है' यह नियम सिद्ध होगा और इस नियम के सिद्ध होने पर उक्त "स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह ज्ञान विशेषद्वय-अंश में संशय है", यह सिद्ध हो सकेगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । इस अन्योन्याश्रय का वारण कौन करेगा ? समर्थन—यदि संशय को धर्मी-अंश में निश्चयात्मक मानें, तो एक ही ज्ञान में अंशभेद से संशयत्व और निश्चयत्व दोनों के होने से संकर हो जायगा । वह संशय में निश्चयत्व अस्वीकार करने पर ही निवृत्त हो सकता है । अतः धर्मी का निश्चयरूप ज्ञान अन्य ही है और 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इत्याकारक धर्म-अंश में संशय-ज्ञान अन्य ही है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जबतक एक धर्मी में सम्बन्ध की प्रतीति न हो, तबतक स्थाणुत्व और पुरुषत्व का विरोध ही नहीं है। फलतः 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह उसका आकार ही नहीं होगा; कारण जिस किसीके स्थाणुत्व से जिस किसीका पुरुषत्व विरुद्ध
५३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ यस्य कस्यचित्पुरुषत्वं विरुद्धयते । एकधर्मिसम्बन्धमनन्तर्भाव्य विरोधे जगति तयोरन्योन्यस्य व्यतिषक्तोरसत्त्वमेव प्रसज्येत । तस्य धर्मिणो वा पुरुषत्व- निश्चयाद्यथा संशयो निवर्त्तते नोत्पद्यते वा, तथा स्वात्मनः पुरुषत्वनिर्णयात्संशयो निवर्त्तेत नोत्पद्येत वा । विशेषाभावाद्यथाऽयं द्रष्टुर्न स्वशरीरविषयः संशयः, तथैव पुरोवर्तिविषयोऽपि नासौ । कथं चेदमर्थेन सामानाधिकरण्याभिमानः—'योऽयमूर्ध्वताधर्मा स किं स्थाणुरुत पुरुषः' इति । कस्माद्वा प्रत्यभिज्ञानादयोऽप्येकं ज्ञानमङ्गीकृता इत्यु- च्छिन्ना विशिष्टज्ञानसङ्कथा । सञ्जातश्च 'गौरश्वः पुरुषः' इतिवद्विशकलितो विज्ञानसंसार इत्यास्तां विस्तराभिनिवेशः । नन्वस्ति तावदयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति परस्परविरुद्धार्थावगाही प्रत्ययः, स स्वविषयं तथाभूतमुपस्थापयिष्यति । न; उक्तबाधकैः सर्वप्रकारखण्डने परि- शेषासम्भवात् । नहीं है । यदि एक धर्मी के सम्बन्ध के बिना भी विरोध हो, तो अन्योन्य के नाशक उन दोनों का जगत् में असत्त्व ही हो जायगा । अथवा उस धर्मी में पुरुषत्व-निश्चय से जैसे संशय की निवृत्ति या अनुपपत्ति होती है, वैसे ही अपनी आत्मा में पुरुषत्व-निश्चय से भी संशय की निवृत्ति या अनुत्पत्ति हो जायगी । कारण जैसे विशेष न होने से यह संशय द्रष्टा के शरीर-विषयक नहीं है, वैसे ही पुरोवर्ती-विषयक भी नहीं है । किञ्च—यदि संशय धर्मी-विषयक नहीं है, तो 'जो यह ऊर्ध्व है, वह स्थाणु है या पुरुष' इस तरह इदमर्थ के साथ सामानाधिकरण्य का अभिमान कैसे होता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि को भी एक ज्ञान कैसे मानते हैं । वहाँ 'सः' इस अंश को भिन्न ज्ञान कह ही सकते हैं । इस प्रकार दो ज्ञानों को भी एक मानें, तो विशिष्ट ज्ञान का नाम ही उच्छिन्न हो जायगा । गौ, अश्व, पुरुष जैसे भिन्न-भिन्न हैं, वैसे ही विज्ञान- संसार भी विशकलित हो जायगा । बस, इतना ही संशय का खण्डन पर्याप्त है, अतः विस्तार का आग्रह न रखें । समर्थन—'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इत्याकारक परस्पर विरुद्ध अर्थों का अवगाहन करनेवाला ज्ञान होता है, वही ज्ञान परस्पर विरुद्ध स्वविषय ( संशय ) में प्रमाण होगा । खण्डन—पूर्वोक्त प्रकार से संशय में विषय, कारण या जातिकृत विशेषत्व खण्डित हो जाने से संशय और उसका विषय अनिर्वचनीय ही है ।
परिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डन ५३५ भावाभाव-विरोध-खण्डनम् यच्च स्वरूपमादाय विरुद्धार्थत्वमभिधीयते, तदपि निर्वक्तुं न शक्यते । तथाहि—भावतदभावयोः को विरोधः ? सहानवस्थानमिति चेन्न । देशभेदेन सहाप्यवस्थानात् । देशाभेदेनेति चेन्न । संयोगाद्यव्यापकत्वं यद्यभ्युपैषि तथाप्यनुपपत्तिः, प्रकारभेदेन तथाभावस्याभ्युपगमात् । तस्य पक्षे एकेन प्रकारेणैकस्मिन् सहानवस्थानं विरोधः, संयोगाद्यव्या- पक्त्वानभ्युपगन्तृपक्षे च देशाभेदेन सहानवस्थानं स इति चेन्न । तद्धि तदुभया- वस्थानसाहित्यनिषेधो वा तदुभयावस्थाननिषेधसाहित्यं वा स्यात् । आद्ये- ऽप्रसिद्धप्रतियोगिकत्वम्, तदुभयावस्थानसाहित्यस्य क्वचिदप्यप्रमितेः । शशविषाण- भावाभाव-विरोध का खण्डन किञ्च—भाव और अभाव के जिन परस्पर विरोधी स्वरूपों को ग्रहण कर आपने संशय में जो विरुद्धार्थत्व (विरुद्धधर्म-विषयत्व) का अभिधान किया है, उसका (भावाभाव के विरोध का) भी निर्वचन अशक्य है । आखिर बताइये, भाव और अभाव का विरोध क्या है ? निर्वचन—सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—यह ठीक नहीं, कारण देश-भेद से भाव का तदभाव के साथ [एक काल में] अवस्थान होता ही है । समर्थन—एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं; कारण जो आचार्य संयोग और तदभाव को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में मूल- शाखादि प्रकार-भेद से संयोग और तदभाव का वृक्षादिरूप एकदेश में भी अवस्थान होता ही है । समर्थन—जो संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में एक प्रकार से एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । जो संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति नहीं मानते, उनके मत में एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—'सह-अनवस्थान' शब्द का क्या अर्थ है—क्या उभय के अवस्थान के साहित्य का निषेध अर्थ है या उभय के अवस्थान के निषेध का साहित्य है ? प्रथम कल्प में उभयावस्थान साहित्य रूप प्रतियोगी की अप्रसिद्धि से सह-अनवस्थान भी अप्रसिद्ध है । 'गवि शशविषाणं
५३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ निषेधादेश्च शशके विषाणनिषेधादिरूपत्वाङ्गीकारेण प्रसिद्धप्रतियोगिकत्वा- भ्युपगमात् । यदाह एकः—'वस्तुनः प्रतियोगिता'ति । अन्यश्च— 'लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित्तादृगेव निषिध्यते ।'—इति । द्वितीये तु तदुभयावस्थानसाहित्यस्वीकार एव स्यात्, तदुभयनिषेधयो- स्तदुभयत्वैवाङ्गीकारात् । परस्परप्रतिक्षेपकत्वं विरोध इति चेन्न । तद्धि परस्परप्रतिक्षेपं प्रति कारणत्वं नास्ति' यहाँ शश के शिरोरूप प्रमित धर्मी में गौ में प्रमित विषाण का आरोप कर उसका निषेध होने से वह अभाव प्रसिद्धप्रतियोगिक ही है । एक आचार्य, उदयनाचार्य 'कुसुमाञ्जलि' में कहते हैं कि अभावाभाव का प्रतियोगित्व वस्तुनिष्ठ ही हो सकता है । उनके मत में 'गवि शशशृंगं नास्ति' यह प्रसिद्धि होती ही नहीं । किन्तु दूसरे आचार्य, मण्डन मिश्र 'ब्रह्मसिद्धि' के तर्ककाण्ड (कारिका २) में कहते हैं कि जो कहीं लब्धरूप होता है, उसीका अन्यत्र निषेध होता है । एवञ्च पूर्वोक्त प्रकार से 'शशशृंगं नास्ति' की गति लग सकती है । द्वितीय पक्ष में उभय के अवस्थान का साहित्य ही स्वीकार करना होगा । वह हो नहीं सकता, कारण भाव का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध भावरूप ही होता है । समर्थन—परस्पर प्रतिक्षेपकत्व ही विरोध है । खण्डन—'परस्पर प्रतिक्षेपकत्व' शब्द का परस्पर प्रतिक्षेप (निषेध) का कारण, यह अर्थ है या परस्पर के प्रतिक्षेप का तादात्म्य अर्थ है ? प्रथम पक्ष अयुक्त है; कारण घट का कार्य घटाभाव है और घटाभाव का कार्य घट है, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त ही है, कारण उभय (भावाभाव) में अनुगत प्रतिक्षेप का निर्वचन नहीं हो सकता । १. पूरा वचन इस प्रकार है—'अभावविरहात्मत्वं वस्तुनः प्रतियोगिता ।' २. पूरी कारिका इस प्रकार है—'लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित्तादृगेव निषिध्यते । विधानमन्त- रेणातो न निषेधस्य संभवः ॥'
[Page Header: परिच्छेद ] \qquad भावाभाव-विरोध का खण्डन \qquad ५३७]
वा तादात्म्यं वा ? न प्रथमः ; प्रमाणाभावेन तथाविधतत्कार्यानङ्गीकारात् । न द्वितीयः ; प्रतिक्षेपशब्दार्थस्य उभयानुगतस्यानिर्वचनात् । यत्रैकस्य सत्त्वं तत्रापरस्यासत्त्वं नियमेन यत्स विरोधस्तयोरिति चेन्न । सत्त्वासत्त्वयोरेकापराश्रयत्वे वैयधिकरण्यात् । सम्बन्धस्य तद्व्यतिरिक्तत्वे एकसत्त्वस्यैव चापरासत्त्वात्मकतया स्वीकारेण यत्रैकस्य सत्त्वं तत्रैकस्य सत्त्वमिति वचनार्थप्रसङ्गेन पौनरुक्त्यापातात् । यत्र घटाभाव इत्यत्र खल्वयमर्थो यन्नाम ? यस्याऽऽधेयतया सम्बन्धी घटा- भावः । तत्र घटो नास्तीत्यस्याप्ययमर्थः—तस्याऽऽधेयतया सम्बन्धी घटाभाव इति । यत्र घट इत्यस्य कोऽर्थः ? यस्याऽऽधेयतया सम्बन्धी घटः । तत्र घटाभावो नास्तीति कोऽर्थः ? तस्याऽऽधेयतया सम्बन्धी घटाभावसम्बन्धनिषेधः । घटाभावसम्बन्धस्य घटाभावात्मकतया घटाभावनिषेधस्यापि घटात्मकतेति । अर्थात् भाव के प्रतिक्षेप का तादात्म्य अभावरूप है और अभाव के प्रतिक्षेप का तादात्म्य भावरूप है। अतः उभयानुगत ( एकरूप ) प्रतिक्षेप का निर्वचन नहीं हो सकता । समर्थन—'जहां एक ( भाव या अभाव ) का सत्त्व हो, वहाँ अपर (अभाव- या भाव ) का नियम से जो असत्त्व है, वही भावाभाव का विरोध है।' खण्डन— सत्त्व तो एक में रहेगा और असत्त्व दूसरे में । अतः सत्त्व और असत्त्व का सामाना- धिकरण्य न होने से असम्भव हो जायगा । यदि सत्त्व-शब्द का 'सम्बन्ध' तथा असत्त्व-शब्द का 'तदभाव' अर्थ करें और इस तरह उन एकापर प्रतियोगियों का सामानाधिकरण्य संभव मानें, तो वह भी ठीक नहीं । कारण इस तरह एक के सत्त्व को अपर के असत्त्वरूप ( घट के सत्त्व को घटाभाव के असत्त्वरूप ) मान लिया गया । एवञ्च घटाभाव के असत्त्व का घटसत्त्व में ही पर्यवसान होने से उसका यही अर्थ हुआ कि 'जहाँ एक का सत्त्व है, वहाँ एक का सत्त्व है।' तथाच यह पौनरुक्त्य हो जायगा । फलतः प्रतियोगी के अभिधान में अपर का अनभिधान होने से अव्याप्ति हो जायगी । देखिये, 'जहाँ घटाभाव है' इसका अर्थ यह है कि जिसका आधेयरूप से सम्बन्धी घटाभाव है । 'वहाँ घट नहीं है' इस वाक्य का भी यही अर्थ है कि उसका आधेयरूप से सम्बन्धी घटाभाव है। 'जहां घट है' इसका क्या अर्थ है ? जिसका आधेयरूप से सम्बन्धी घट है । 'वहाँ घटाभाव नहीं है' इसका क्या अर्थ है ? उसका आधेयरूप से सम्बन्धी घटाभावसम्बन्ध का निषेध है । घटाभाव का
तस्मात्तस्य आधेयतया सम्बन्धी घट इत्येवार्थः। अतो घटतदभावयोर्भेदं मनसि कृत्यपि न विप्रतिपत्तव्यमिति। यत्रैकस्यावस्थानं तत्रैकस्यैवेति नियमाभिप्रायेण न पौनरुक्त्यादिरिति चेन्न! नियमस्य यत्किञ्चिदन्यव्यवच्छेदकत्वेऽसिद्धत्वापातात्। विरोधिम्यवच्छेद- कत्वस्य च विरोधानिर्वचनेऽनिर्वचनात्। अभावपक्षे भावव्यवच्छेदो भावपक्षे चाभावव्यवच्छेदो नियमार्थ इति चेन्न। एकरूपानभिधाने अनुगतविरोधानिर्वचनात्। किञ्च—भावाभावव्यवच्छेदयोरभावाभावविधानातिरिक्तयोरनभ्युपगमे पुनरपि च यत्र भावस्तत्र भावो यत्राभावस्तत्राभाव इत्युद्देश्यविधेयभावानुपपत्ति- रभेदादिति पौनरुक्त्याधिकफलाभाव एव। सम्बन्ध घटाभावरूप है और घटाभाव का निषेध घटरूप है। एवञ्च 'उसका आधेयरूप से सम्बन्धी घट है', यही अर्थ हुआ। फलतः घट और उसके अभाव का भेद हृदय में रहते हुए भी [पौनरुक्ति आदि दोष होने से] उन दोनों के विरोध का लक्षण न होने के कारण उक्त पौनरुक्त्यादि में विप्रति पत्ति न कर विरोध का असत्त्व ही मान लेना चाहिए। समर्थन—जहाँ एक का सत्त्व हो, वहाँ एक का ही सत्त्व हो, ऐसा उसका नियमरूप अभिप्राय मानें, तो पुनरुक्ति नहीं होगी। खंडन—नियम से यदि यत्किंचित् अन्य धर्म का व्यवच्छेद करें, तो कहीं भी विरोध की सिद्धि नहीं होगी। कारण भूत- लादि सर्वत्र ही प्रतियोगी या अभाव से अतिरिक्त भूतत्वादि धर्म विद्यमान हैं। नियम से विरोधी धर्म का व्यवच्छेद तो मान नहीं सकते, कारण अद्यावधि विरोध का निर्वचन ही नहीं हुआ है। एवञ्च आत्माश्रय हो जायगा। समर्थन—जहाँ एक शब्द से भाव का अभिधान हो, वहाँ अभाव व्यवच्छेद्य है और जहाँ एक शब्द से अभाव का अभिधान हो, वहाँ भाव व्यवच्छेद है, ऐसा नियमार्थ कहेंगे। एवञ्च आत्माश्रय भी नहीं होगा। खण्डन—भाव और अभाव उभय- स्थलसाधारण एक लक्षण न होने से लक्षण का अनुगम नहीं होगा। किञ्च—'जहाँ एक भाव का सत्त्व हो, वहां एक भाव का ही सत्त्व हो, अभाव का सत्त्व न हो' यहां 'व्यवच्छेद अभाव का सत्त्व न हो' इसका 'भाव का सत्त्व हो' इसी अर्थ में पर्यवसान होने से उद्देश्य-विधेयभाव की अनुपपत्ति तथा पुनरुक्ति दोष बना ही हुआ है।
परिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डनं ५३६ स्यादेतत्—भावाभावयोः स्वरूपमेव विरोधः । न चैवं सत्यविरुद्धतापत्तिः, यथा सत्ता भावरूपैव सती स्वात्मनि सदिति भवितृव्यवहारं करोति, तथा भावा- भावौ विरोधात्मानावेव स्वात्मनि विरुद्धरूपं भवितृव्यवहारं कुरुतः । कस्यैतौ विरोध इति चानुयोगे स्वाश्रयस्येत्युत्तरम् । किं तत्र विरोधफलमिति प्रश्ने भेदव्यव- स्थानमित्यभिधेयम् । यदाह—‘अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद्विरुद्धधर्मा- ध्यासः कारणभेदश्चे’ति । तदेतदनुपपन्नम् ; एतयोर्विरोधत्वं प्रत्येकं वा स्यान्मिलितयोर्वा ? नाद्यः ; प्रत्येकमेवाऽऽश्रयैकत्वभङ्गप्रसङ्गात् । नैकत्वाभावो भेदोऽभिमतः , किन्तु अन्योन्याश्रयापेक्षभेदरूपधर्मवत्त्वमिति चेन्न । तस्याभावात् । कालभेदेनेकस्य भावाभावाश्रयत्वाभ्युपगमान्नतद्भेद इति चेन्न । तदभेदस्य स्वाभाविकस्य विवक्षितत्वे विशेषणवैयर्थ्यात् । समर्थन—भाव-अभाव का स्वरूप ही विरोध है । यदि कहें कि भाव-अभाव का स्वरूप विरोध है, तो भाव-अभाव में विरोध नहीं रहा; फिर उनमें अविरुद्धत्व व्यवहार क्यों न हो ?, तो वह ठीक नहीं। कारण जैसे सत्ता में अन्य सत्ता के न होने पर भी अपने में वह स्वयं ही 'सत्' व्यवहार कराती है, वैसे ही भाव और अभाव दोनों अपने में [अन्य विरोध न होने पर भी] विरोध-व्यवहार कराते हैं । 'यह विरोध किनका है ?' इस प्रश्न पर 'अपने आश्रय का है' यह उत्तर है और 'विरोध का फल क्या है ?' इस प्रश्न पर 'भेद की व्यवस्था' यह उत्तर है। आचार्य ने भी यही कहा है कि ‘जो विरुद्ध धर्म का अवस्थान या कारण का भेद है, वही भेद है या भेद का हेतु है ।’ खंडन—यह मत भी युक्त नहीं; कारण भाव और अभाव प्रत्येक का विरोधत्व ( वैधर्म्यत्व और स्वाश्रय-भेदकत्व ) है या मिलित का ? इनमें प्रथम पक्ष अयुक्त है; कारण प्रत्येक में आश्रय की एकता का भंग हो जायगा । अर्थात् भावत्व और अभावत्व का अन्यानपेक्ष विरोध मानने पर प्रत्येक तदधिकरण में विरुद्ध धर्म का अध्यास होने से स्वयं से भी उसका भेद होने लगेगा । समर्थन—एकत्व का अभाव भेद नहीं है, किन्तु अन्योन्य ( भाव और अभाव ) का आश्रय है प्रतियोगी जिसका, ऐसा भेदरूप जो धर्म, तद्वत्त्व ही वह है । एवञ्च प्रत्येक के आश्रय का भेद नहीं है । खंडन—काल के भेद से एक ही घट में रक्त- रूप और उसका अभाव रहता है और आश्रयभेद भी नहीं है । अतः अन्योन्य का जो आश्रय, तत्प्रतियोगिक भेद विरोध का फल नहीं है ।
५४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ एकोपाध्यवच्छिन्नस्य विवक्षितत्वे कालभेदाभिमतेऽपि सम्भवात् । भिन्नो- पाध्यनवच्छिन्नत्वस्य विवक्षितत्वेऽसम्भवात् । असहावस्थितभिन्नोपाध्यनवच्छिन्नत्वस्य वाञ्छितत्वे सहत्वस्यैककाल- रूपत्वेन तत्रापि कालाभेदविकल्पानुवृत्त्यापत्तेः । मिलितत्वं चानयोरेकदेशत्वं वाऽभिमतम्, एककालत्वं वा, एकप्रकारेण समर्थन—एक काल में अन्योन्य ( भाव-अभाव ) का जो आश्रय, तत्प्रतियो- गिक भेद विरोध का फल है। घट-रक्तता-स्थल में कालभेद से भाव-अभाव दोनों के रहने पर भी आश्रय का भेद नहीं होता । खण्डन—काल का अभेद (एकत्व) स्वाभाविक है या औपाधिक ? यदि स्वाभाविक है तो विशेषण व्यर्थ है, कारण काल का भेद तो स्वाभाविक है नहीं। फिर किसकी व्यावृत्ति के लिए लक्षण में अभेद का निवेश है। यदि काल का अभेद औपाधिक है, तो यह अर्थ हुआ कि एक उपाधि से अवच्छिन्न काल में रक्त और उसका अभाव नहीं रहता, अतः आश्रय-भेद नहीं है। किन्तु यह भी युक्त नहीं है; कारण एक ही दिनरूप उपाधि से अवच्छिन्न काल में मुहूर्त, प्रहर आदि उपाधियों के भेद से घट में रक्तरूप और उसका अभाव होने से घटरूप आश्रय का भेद हो जायगा । समर्थन—भिन्न उपाधि से अनवच्छिन्न काल में विद्यमान भाव और तदभाव का अन्योन्य आश्रयप्रतियोगिक भेद विरोध का फल है। उक्त स्थल में मुहूर्त और प्रहररूप उपाधि-भेद होने से दोष नहीं है। खण्डन—सूर्य-चन्द्र-परिस्पंद, कालयंत्र (घड़ी)- परिस्पन्द आदि से एक ही काल अवच्छिन्न होने के कारण भिन्न उपाधियों से अन- वच्छिन्नत्व अप्रसिद्ध होने से असम्भव हो जायगा। समर्थन—असह-अवस्थित जो भिन्न उपाधि, उससे अनवच्छिन्न काल में भाव और तदभाव का अन्योन्याश्रयप्रतियोगिक भेद विरोध का फल है। चन्द्र-सूर्य- परिस्पन्द आदि सह-अवस्थित हैं, अतः असम्भव नहीं है। खण्डन—इस लक्षण में सहशब्द का अर्थ एक काल ही है। उसमें भी काल का एकत्व स्वाभाविक है या औपाधिक ? ऐसा विकल्प करने पर पूर्वोक्त दोष हो जायेंगे। 'भाव और अभाव दोनों का मिलितत्व विरोध है' यह कल्प भी युक्त नहीं है।
परिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डन ५४१ वृत्तिर्वा, वृत्तिप्रकारान्यैकोपाध्यवच्छेदो वा ? नाद्यः ; भावात्यन्ताभावयोस्तदभावात् । न द्वितीयः ; भावस्य प्रध्वंसप्राग्- भावाभ्यां तदनुपपत्तेः । न तृतीयः ; संयोगाद्यव्याप्यवृत्तित्वादिपक्षे गगनादौ संयोगाभावाभावयोस्तदभावात् । अव्याप्यवृत्तिधर्मानभ्युपगन्तृपक्षे भावाभावयोर्वृत्तौ प्रकारान्तराभावे प्रमाणाभावात् । नापि चतुर्थः ; स हि यदि निर्देष्टुं शक्यते, तदाऽपि भावप्रागभावयोर्भाव- प्रध्वंसयोर्व्वैकदाऽनभ्युपगमेन तद्विशेषितयोरपि एकदाऽवश्यमनभ्युपगन्तव्यतया कदा विरोधस्य तदाश्रयतेति वक्तुमशक्यत्वात् । किञ्च—भावप्रागभावयोर्भावप्रध्वंसयोर्वा यदि तथाभावोऽभ्युपगम्यते, तदाऽऽश्रयभेदप्रसङ्गः । अथ नाऽभ्युपगम्यते, तदा भावप्रागभावयोर्भावप्रध्वंसयोश्चा- विरोधापत्तिः । कारण भाव और अभाव का मिलितत्व एकदेश में वृत्तित्व है, एक प्रकार से वृत्तित्व है या इनसे भिन्न उपाधि विशेष से अवच्छिन्नत्व है ? प्रथम कल्प मानें, तो भाव और अत्यन्ताभाव का मिलितत्व नहीं होगा । द्वितीय कल्प मानें, तो भाव और तत्प्रागभाव-तत्प्रध्वंस का मिलितत्व नहीं होगा । तृतीय कल्प कहें, तो भी संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति माननेवालों के मत में भी आकाश आदि में संयोग और तदभाव अवच्छेद (देश)-भेद से ही रहते हैं । अतः उनके मत में भी एकप्रकारेण भाव और तदभाव का मिलितत्व अप्रसिद्ध है । जो संयोगादि को व्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में भाव और तद्भाव के वृत्तित्व में प्रकारान्तर (अवच्छेदक-भेद) मानने में कोई प्रमाण न होने से प्रकार में 'एक' विशेषण व्यर्थ है । इनसे अतिरिक्त किसी चतुर्थ कल्प का कथन तो हो ही नहीं सकता । यदि किसी प्रकार हो भी, तो वह युक्त नहीं है। कारण भाव और तत्प्रागभाव तथा भाव और तत्प्रध्वंसाभाव कभी एक काल में नहीं रहते। फिर प्रकार से भिन्न उपाधियों से युक्त भाव और तत्प्रागभाव एक काल में कैसे रहेंगे ? और यदि एक काल में नहीं रहते, तो वे विरोध के आश्रय या स्वरूप भी कैसे और कब होंगे ? किञ्च—यदि भाव, तत्प्रागभाव और भाव, तत्प्रध्वंस का विरोध मानें, तो रक्तरूप और तत्प्रागभाव के अधिकरण घट का भी भेद हो जायगा । भाव और तदत्यन्ताभाव ही परस्पर निषेधरूप हैं। यदि भाव और तद्ध्वंसाभाव तथा भाव और तत्प्रागभाव का परस्पर विरोध न मानें, तो दोनों का अविरोध होने से एक काल और एक अधिकरण में दोनों की प्रतीति हो जायगी ।
५४२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ अभावान्तरेऽपि सावकाशत्वात् न परस्परप्रतिषेधात्मकत्वम् । परस्परप्रति- षेधात्मकत्वं हि भावात्यन्ताभावयोरेव । तत्तदसत्त्वमात्रयोर्विरोधो न तु तत्तदसत्त्वविशेषयोरिति चेन्न । विशेषस्य तथाप्यविरोधात् कदाऽपि सहावस्थितियोग्यतापत्तेः । नियमेन तथात्वे च विरोधव्याघातात् । मात्रशब्देन च यदि विशेषशून्यत्वमसत्त्वस्योच्यते तदा तदनभ्युपगम एव प्रमाणाभावात् । नहि निर्विशेषासत्त्वमात्रसद्भावे प्रमाणमभिधातुं शक्यते । अथ मात्रशब्दोपादानं सत्यपि विशेषेऽसत्त्वस्य साधारणरूपपुरस्कारेण विरोध- व्यवस्थितिप्रदर्शनार्थं तदा भावप्रध्वंसयोस्तादृगेव दोषापत्तिः । प्रध्वंसादौ विशेषे सामान्यरूपस्यावश्याभ्युपगम्यत्वात् तदादायैव विशेषे विरोधपर्यवसानात् । किञ्च—घट और तत्प्रागभाव तथा घट और तत्प्रध्वंसाभाव परस्पर निषेधरूप भी नहीं हैं; कारण घट ध्वंसाभाव का निषेधरूप भी है तथा घटप्रागभाव भी घटध्वंस का निषेधरूप है । समर्थन—केवल भाव और सामान्यतः अभाव का विरोध है, भाव और विशेषरूप से अभाव का विरोध नहीं है । खण्डन—ऐसा मानने पर विशेष प्रागभावादि के साथ अविरोध होने से कदाचित् सह-अवस्थिति हो जायगी । यदि कहें, 'घट तत्प्रागभाव तथा घट तत्प्रध्वंस का स्वभाव है कि वे नियम से साथ नहीं रहते, तो 'इनमें विरोध नहीं है' इस कथन से व्याघात हो जायगा । किञ्च—यदि मात्रशब्दार्थ के बल पर सामान्य में विशेषशून्यत्व का प्रतिपादन करें, तो प्रमाण न होने से सामान्य असत्त्व का अभाव हो जायगा । कारण निर्विशेष सामान्य को असत्त्व में प्रमाण कह ही नहीं सकते । यदि मात्रशब्द का उपादान, विशेष के होने पर भी असत्त्व का सामान्यधर्म के पुरस्कार से विरोध-प्रदर्शन करने के लिए है, तो भाव और प्रध्वंस का भी सामान्य- रूपेण विरोध होने से अधिकरण का भेद हो जायगा । कारण प्रध्वंस आदि विशेषों में सामान्यरूप अवश्य होने के कारण उसी सामान्यरूप का ग्रहण कर विशेष (प्रध्वंसादि) में विरोध का पर्यवसान हो जायगा ।
परिच्छेद ] तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन ५४३ तर्क-सामान्य-लक्षण-खण्डनम् भावाभावयोर्विरोधानभ्युपगमे तवाप्यनिष्टापत्तिरिति चेत्; केयमापत्तिः ? तर्कभेद इति चेत् ; अथ कस्तर्कः ? अभ्युपगतव्याप्यं प्रति व्यापकप्रसञ्जनं सः। तत्प्रसञ्जनं च स्वीकारार्हता- बोधनमिति चेन्न । अव्याप्तेः। अस्ति ह्यप्रसङ्गोऽपि सम्भावना नाम तर्कः। तद्यथा - 'यदि जलं सहकारिभिः सम्पत्स्यते तदा मे तृषं शमयिष्यती'ति; इष्टापादनेऽपि गतत्वाच्च। अनभ्युपगतव्यापकमित्यपीति चेन्न । तथाभूतमपि प्रत्यव्याप्यादव्यापकप्रस- ञ्जने गतत्वात् । व्याप्येनेत्यपि कार्यमिति चेन्न। विकल्पासहत्वात्—किं तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन यदि कहें कि “इस तरह भाव और अभाव का विरोध ही न मानें, तो आप पर भी अनिष्ट की आपत्ति हो जायगी। अर्थात् अद्वैत से द्वैत का प्रतिक्षेप नहीं होगा; क्योंकि इनमें विरोध ही न रहा” तो कहिये, आपत्ति ही क्या वस्तु है ? यदि तर्कभेद (तर्कविशेष) है, तो वह तर्क ही क्या वस्तु है ? निर्वचन—‘जो व्याप्य का स्वीकार किये हों, उनके प्रति व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है।’ व्यापक की स्वीकारार्हता का बोधन ही व्यापक का प्रसञ्जन है। खंडन—इस लक्षण की 'यदि जल सहकारी से सम्पन्न ( पीत ) हो, तो मेरी पिपासा की निवृत्ति करेगा' इस सम्भावनारूप तर्क में अव्याप्ति हो जायगी। यदि कहें कि प्रसङ्गरूप तर्क का ही यह लक्षण है, सम्भावनात्मक तर्क का नहीं, अतः सम्भावना के लक्ष्य ही न होने से उसमें लक्षण का न जाना अव्याप्ति नहीं है, तो जहाँ व्यापक वह्नि इष्ट ( प्रथम से सिद्ध ) है, वहां 'यदि धूम है, तो वह्नि अवश्य है' आदि इष्टापादनरूप तर्काभास-स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—‘जो व्याप्य का स्वीकार करे और व्यापक का स्वीकार न करता हो, ऐसे पुरुष के प्रति व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है।' खण्डन—उस पुरुष के प्रति भी 'यदि इन्धन है, तो वह्नि अवश्य है' इस स्थल में, जहां अव्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन है, अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—लक्षण में 'व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है' यह भी निवेश